उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

जीवनमूल्य – जो हमें मूल्यवान बनायें।


गढ़े जीवन अपना अपना -18
किसी भी नोट पर उसका मूल्य लिखा होता है। किन्तु वह मूल्य रिजर्व बैंक के गवर्नर के आश्वासन का मूल्य होता है ना कि नोट के कागज और छपाई आदि का। अर्थात जिस देश का नोट है उसमें तो उसका वहीं मूल्य होगा पर उस देश के बाहर जाते ही उस कागज का मूल्य कुछ भी नहीं रहेगा क्योंकि उस नोट का मूल्य उसका अपना नहीं है, राज्य की सत्ता द्वारा प्रदत्त मूल्य ही वह कागज का टुकड़ा धारण करता है। उसी प्रकार मनुष्य भी अपने स्थान, परिवार, व्यवसाय, पद आदि के कारण जो महत्व पाता है वह भी उसका स्वयं का मूल्य नहीं होता अपितु उस उस उपाधि के द्वारा मनुष्य पर भावित मूल्य होता है। ऐसे उपाधि मूल्य (Face Value) की अवधि (Expiry) उपाधि के साथ ही समाप्त होती है। जैसे जिले के जिलाधीश (Collector) को मिलने वाला मान-सम्मान पद के होने तक ही होता है। पद के छूट जाने के बाद वह सम्मान नहीं मिलेगा। हृदयरोगियों के बारे में किये आधुनिक अनुसंधानों में पाया गया है कि सेवानिवृत्ति के प्रश्चात के 1-2 सप्ताह में हृदयाघात के प्रकरण अधिक होते है। कारणों की मिमांसा में दो प्रमुख कारण पाये गये – 1. अचानक कार्यनिवृत्ति के कारण आये खालीपन से उत्पन्न निरर्थकता का भाव तथा 2. पदविहीन होने से लोगों के व्यवहार में आये परिवर्तन का झटका (Shock)  जो अधिकारी प्रतिदिन सम्मान का आदी हो जाता है उसे अचानक खाली हो जाने से सम्मान मिलना बन्द हो जाता है जिसको सहन करना कठीन हो जाता है। यह स्थिति उपाधि मूल्य के नष्ट हो जाने से इस कारण होती है क्योंकि हम अपने वास्तविक मूल्य का ध्यान नहीं देते।

हमारा वास्तविक मूल्य हमारा आंतरिक मूल्य (Intrinsic Value) होता है जो हमारे चरित्र का प्रभाव होता है। जिस प्रकार सिक्के में धातु का मूल्य होता है वह उसका आंतरिक मूल्य होता है। वर्तमान में जो एक रूपये का सिक्का है उसके धातु का मूल्य 1 रूपये से अधिक है इस कारण कई शहरों में ऐसे गिरोह कार्य कर रहे हैं जो इन सिक्कों को गलाकर इनमें से प्राप्त होने वाली मूल्यवान धातु को बेंचने का धंदा करते हैं। यह ऐसा उदाहरण है जहाँ उपाधि मूल्य से आंतरिक मूल्य अधिक है। मनुष्य का भी आंतरिक मूल्य ही महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि वह परिस्थिति, पद, सम्बंद्ध ऐसे परिवर्तनीय कारकों पर निर्भर नहीं होता। चाहे बाह्य कारक पूर्णतः बदल जाय फिर भी जो आंतरिक चरित्र है उसका मूल्य वैसे ही बना रहेगा। इसी आधार पर कठीन परिस्थितियों में भी वीर अपने लक्ष्य की प्राप्ति कर ही लेते है। स्वामी विवेकानन्द जब अमेरिका में गये तब उनका परिचय पत्र, सामान सब चोरी हो गया। पराये देश में कोई एक भी परिचित व्यक्ति नहीं जहाँ जाना है वहाँ का पता नहीं। अर्थात उपाधि मूल्य कुछ भी नहीं। ऐसे समय उनका साथ दिया उनके आंतरिक मूल्य नें उनके चरित्र ने, ज्ञान ने। इस असम्भव स्थिति में भी पूर्ण श्रद्धा के साथ उन्होंने अपने लक्ष्य को प्राप्त किया।

बोस्टन में, शिकागो में जिन लोगों से उनका परिचय हुआ वे सब उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रहें। जिस घर में वे रहते थे, वहाँ की गृहस्वामीनी अपनी सहेलियों की चाय पार्टी में स्वामीजी को एक अजूबे के रूप में, मसखरे के रूप में प्रस्तुत करती थी। पर उनकी बातों में भरा जीवन का ज्ञान इस विडम्बना और अपमान को पार कर फैलता गया। फिर उन महिलाओं के परिवारों के प्रबुद्ध सदस्य आकर्षित हेाते गये और स्वामी विवेकानन्द की ख्याति सुरभी की भाँति सर्वत्र फैल गई। विद्वानों ने उन्हे परिचय और सन्दर्भ देकर शिकागो भेजा। प्रोफेसर राइट ने धर्मसभा के आयोजक फादर बैरोज को पत्र लिखा। यह सब आंतरिक मूल्य का परिणाम थे।

हम अपने जीवन में सतत अपने आंतरिक मूल्य को बढ़ाते रहे ताकि उपाधि मूल्य पर हमारे जीवनलक्ष्य की प्राप्ति निर्भर ना हो। अभितक इस श्रृंखला में हमने जो भी जीवननिर्माणकारी बातों की चर्चा की हे वे सारी ही आंतरिक मूल्यवृद्धि में सहायक है। हमारा मूल्य कैसे निर्धारित होगा? दूसरों के मूल्यांकन से ना तो हमारा मूल्य घटता है ना बढ़ता है। सारी बात हमारे अपने जीवन में हम किन बातों को वरीयता देते है इस पर निर्भर हैं। हम जीवन में जिन बातों को मूल्य देंगे वे तय करेंगी की हमारा आंतरिक मूल्य क्या है? अतः हमारे जीवनमूल्य हमारा मूल्य निर्धारित करते है। कोई व्यक्ति पैसे को इतना मूल्यवान समझता हे कि उसके लिये सबकुछ कर सकता है। अब उसके जीवनमूल्य इस बात से प्रभावित होंगे। उसका व्यवहार व दिनचर्या, आदते, मित्र, सम्बन्ध सब इसी से निर्धारित होंगे। कोई अपनी कलासाधना को सर्वाधिक मूल्य प्रदान करता है और उसके लिये कुछ भी त्यागने को तैयार हो सकता है और ऐसे भी उदाहरण है जिन्होंने देशकार्य में समर्पित होने के लिये अपनेकला जीवन को तिलांजली दी। हम जीवन में जिन बातों को मूल्यवान समझते है उनके लिये त्याग करते है। कुछ चीजों को धारण करते हे कुछ को छोड़ देते है। इस प्रकार की छटनी से हमारे जीवन की अपनी शैली विकसित होती है। यह शैली ही हमारे जीवनमूल्य तय करती है। अर्थात ये प्रक्रिया परस्पर पूरक है।

यह केवल व्यक्तिगत स्तर पर ही नहीं होता अपितु सामूहिक भी होता है। समाज अपनी जीवन दृष्टि के अनुसार वरीयतायें निश्चित करता है और इस आधार पर ही उन बातों का भी निर्धारण होता है जिनको सर्वाधिक मूल्य प्रदान करना है। जैसे विश्वविद्यालय के शिक्षकों के समूह में ज्ञान व अनुसंधान को अधिक मूल्य होगा तो सेना के अधिकारियों के क्लब में मान वीरता को दिया जायेगा फिर ज्ञान कुछ कम ही क्यों ना हो। पर कई बार यह इतना स्पष्टरुपेण विभाजित नहीं होता। जैसे जब समाज में सब ओर पैसे का ही बोलबाला हो और संपदा के आधार पर ही प्रतिष्ठा भी मिलती हो ता फिर शिक्षको की चर्चा में भी पगार और बैंकों के ब्याजदरों की बाते प्रमुख स्थान लेने लगती है। पूरे देश की जीवनशैली उसके द्वारा विकसित एवं प्रचलित जीवनमूल्यों पर निर्भर होती है।

स्वामी विवेकानन्द कहते है प्रत्येक देश का अपना स्वभाव होता है। उसी के अनुसार जीवन जीने से उसका पूर्ण विकास सम्भव है। भारत का प्राणतत्व है-धर्म! उसी के अनुरूप जीवनमूल्यों को प्रतिष्ठित करने से ही भारत अपने जीवनध्येय को प्राप्त कर सकेगा। क्या है हमारे राष्ट्रीय जीवनादर्श और उनपर आधारित जीवनमूल्य? देखते है अगली बार!

जुलाई 21, 2012 Posted by | आलेख | , , , , , | 4 टिप्पणियाँ

महाप्रयाण . . . किन्तु कार्य निरन्तर


एक मनोचिकित्सकीय मासिक में छपे लेख के अनुसार अमेरिका में 9/11 के आतंकी हमले के बाद चर्च में जानेवाले लोगों की संख्या दुगनी हो गई। लेख में इसका कारण मृत्युका भय बताया गया। मरने के डर से ही व्यक्ति ईश्वर की ओर मुड़ता है ऐसा पश्चिमी संस्कृति का अनुमान है। भारत में स्थिति अलग है। हमारे यहाँ पुनर्जन्म पर विश्वास के कारण कहो या शास्त्रों की वैज्ञानिकता के कारण कहो मृत्यु को ही पूजनीय बना दिया है। उजैन का महाकाल मंदिर शिव की संहारक शक्ति के पूजन का स्थान है। सृजन व पालन के जितना ही संहार भी अस्तीत्व का आवश्यक तत्व है यह हमारे वैज्ञानिक ऋषियों ने जान लिया था। इसीलिये संहार के देवता शिव का स्थान सृजन के देव ब्रह्मा तथा पालनकर्ता विष्णु के समकक्ष त्रिदेव में रखा गया। इतना ही नहीं इन्हें महादेव कहा गया। काल का एक अर्थ जहाँ समय है वही दूसरा अर्थ मृत्यु है। यह केवल भाषाविज्ञान ही नही अपितु साक्षात भौतिक विज्ञान है। आज समय के सन्दर्भ में जो खगोलीय अनुसंधान चल रहे है वे बताते है कि यही सबसे संहारक तत्व है। जलते तारे से उत्पन्न सूपर नोव्हा व मृत तारे से बने श्याम(Black hole) के अध्ययन से जो विस्मयकारी निष्कर्ष सामने का रहे है वे काल की संहारक महत्ता के बारे में हिन्दू शास्त्रों में दिये तत्वों की ओर ही संकेत कर रहे है। जहां विश्व के संहार के लिये महादेव है वहीं मृत्यु के व्यवस्थापन के लिये भी पूरा तन्त्र है। यमराज पर इसके सुचारू संचालन का दायित्व है। हिसाब-किताब के लिये चित्रगुप्त के रूप में एक प्रशिक्षित कार्यालय उनकी सेवा में है।

हमने सदा ही मृत्यु का सामना करने को वीरता का द्योतक माना है। शास्त्रों में नचिकेता व सावित्री ये दो ऐसे उदाहरण है जिन्होंने सफलतापूर्वक यमराज का सामना किया है और उनसे ज्ञान भी प्राप्त किया है। हम जानते है कि मृत्यु तो सदा साथ चलती है। जिस शरीर के प्राणहीन होने को हम मृत्यु मानते है वह तो प्रतिक्षण मर रहा है। जन्म और मृत्यु का यह सतत चलता नर्तन हमने समझा है। प्रत्येक क्षण हमारे शरीर में लाखों कोशिकायें मर रही है और लाखों नवीन कोशिकायें उनका स्थान ले रही है। कोशिकाओं के मरने को चय तथा नयी कोशिकाओं के बनने का अपचय कहते है। यह  चयापचय की प्रक्रिया किसी भी जीवन्त प्रणाली का अनिवार्य अंग हैं। अर्थात जीवन के लिये भी मृत्यु आवश्यक है। शरीर के जीवित रहने के लिये कोशिका की मृत्यु अनिवार्य है। जब कोशिका शरीर का अनुशासन मानने से चूकती है तब वह मरने के स्थान पर अपने आप को कई गुना विभाजित कर लेती है और कर्करोग की गाँठ बन जाती है। कोशिका का मरने से नकार शरीर की मृत्यु का कारण बन जाता है। अतः मृत्यु जीवन का अविभाज्य अंग है। यही कारण है कि हिन्दुओं ने मृत्यु को कभी अंतिम सत्य के रूप में स्वीकार नहीं किया। हमारे लिये तो ये आगे की यात्रा पर प्रयाण मात्र है।

साधक इस बात के मर्म को पहचानते है अतः मृत्यु का समारोह मनाते है। संत तुकाराम मराठी में कहते है- ह्याची देही ह्याची डोळा, पाहीन मृत्युचा सोहळा। इसी देह में इन्हीं आँखों से अपनी मृत्यु का समारोह देखुंगा। सोहळा किसी पवित्र उत्सव को कहते है। जैसे रथयात्रा का समारोह- पवित्र, आध्यात्मिक और उल्हास से परिपूर्ण। अपनी स्वयं की आँखों से इस प्रकार अपनी ही मृत्यु को देखना जन्म मरण के फेरे से मुक्ति के लिये पात्र साधक के लिये ही सम्भव है। समय को जीत लेने के कारण वे काल के परे हो जाते है। ऐसे कालजयी साधक ही अपनी मृत्यु के प्रत्यक्ष दर्शक बनते है। स्वामी विवेकानन्द इसी कोटी के साधक थे। अतः उनका शरीर छोडना सामान्य प्रयाण नहीं महाप्रयाण है। लौकिक दृष्टि से स्वामीजी के मृत्यु का निमित्त कुछ भी बना हो किन्तु वास्तव में उनके जीवन में ऐसे अनेक प्रमाण है जिससे ये कहा जा सकता है कि उन्होंने योग की विधि से अपने प्राणें का विसर्जन कर 4 जुलाई 1902 को महाप्रयाण किया। अमरनाथ की यात्रा पर बाबा बरफानी की गुफा में समाधिस्थ होने के बाद उन्होने अपने सहयात्रियों को बताया था कि बाबा ने उन्हें इच्छामरण का वरदान दिया है। अपने शरीर त्याग से कुछ दिन पूर्व ही स्वामी प्रेमानन्द जी को अपने अंतिम संस्कार का स्थान व विधि बताना, पूर्वसंध्या पर रात्रिभोजन में शिष्यों को परोसना व ईसा के समान अंतिम भोज पर शिष्यों के हाथ धोना। भगिनी निवेदिता के पूछने पर उस बात की ओर संकेत करना। ये सब बताता है कि स्वामीजी ने अपनी ईच्छा से महासमाधि ग्रहण की। दिनभर पूरे मनोयोग से कार्य करते हुए सायं संध्या के गोधुली मूहूर्त पर जब सब आरती में रत थे तब अपने प्राणों का प्रायोपवेशन कर शरीर का त्याग किया।

भारतमाता को पुनः जगद्गुरू बनाने इतने महान कार्य को आरम्भ कर उसकी पूर्णता की चिंता किये बिना स्वामीजी का महाप्रयाण इस बात का संकेत है कि उन्हें अपने शिष्यों पर पूरा विश्वास था कि वे उनका कार्य अवश्य सम्पन्न करेंगे। अब यह हमारा कर्तव्य है कि उस कार्य के सभी आयामों को समझ उसे पूर्णता तक ले जाये।

स्वामीजी ने कहा था कि आनेवाले 1500 वर्षों के लिये उन्होंने कार्य का नियोजन किया है। उन्होंने यह भी कहा था कि शरीर छोड़ने के बाद भी मैं कार्य करता रहुंगा। मद्रास के व्याख्यान ‘मेरी समर नीति’ में स्वामीजी ने युवाओं को अभिवचन दिया, ‘यदि तुम मेरी योजना को समझ कर कार्य में लग जाओगे तो मै तुम्हारे कंधे से कंधा मिलाकर कार्य करूंगा।’ स्वामीजी के कार्य में पूर्ण समर्पण से लगे साथियों को यह अनुभूति समय समय पर आती है कि स्वामीजी उनके साथ कार्य कर रहे है। आइये उनके महाप्रयाण पर हम सब भी इस कार्य में तन, मन, धन, सर्वस्व के समर्पण के साथ लग जाये  . . .

जुलाई 3, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , , | 5 टिप्पणियाँ

   

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