उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

हमारे राष्ट्रीय जीवनमूल्य


गढ़े जीवन अपना अपना -18
एक माँ अपनी युवा बच्ची की शिकायत करती है कि मेरी बेटी मुझसे प्रेम नहीं करती। कारण उपर से बड़ा ही मूर्खतापूर्ण दिखता है, — मदर्स डे पर बेटी ने माँ को कार्ड दिया “I Love You !” पर माँ का कहना है जो कार्ड से बताना पड़े वो प्यार नहीं हो सकता। दूसरी ओर कालेज मे पढ़ने जा रही एक युवती कहती है मेरे पिताजी मुझसे प्रेम नहीं करते। कैसे पता चला– होण्डा की एक्टीवा मांगी थी। पिताजी ने सस्ती छोटी गाड़ी खरीदी। दोनों बातों में तत्व एक ही है। क्या भावों को वस्तुओं से तौला जा सकता है? यह समाज के बदलते सांस्कृतिक मूल्यों का अनिवार्य संघर्ष है जिसे हम पीढ़ियों के भेद (Generation Gap) के रुप में देखते है। माँ सोचती है कि प्रेम जैसे सूक्ष्म भावों की अभिव्यक्ति भौतिक वस्तू के रूप में नहीं हो सकती। ऐसा करने का प्रयास उन भावों का अपमान है। सस्ती गाड़ी से अपने पिता का प्रेम तौलनेवाली बेटी भौतिकवाद की शिकार है। उसके लिये सम्बन्धों की अभिव्यक्ति वस्तुओं से ही होती है। इसमें उसका दोष नहीं है। बचपन से ही जन्मदिन के अवसर पर मिलनेवाले उपहारों से उसने मित्रता को तौलना सीखा। अपने व्यवसाय की व्यस्तता के कारण समय ना दे पाने वाले अभिभावकों को उपहारों से भरपाई करते हुऐ पाया। तो उसको यही समझ आया कि प्यार का अर्थ है मेरे लिये जो अधिक खर्च कर सकें।

समाज का व्यवहार उसके द्वारा पोषित मूल्यों से निर्धारित होता है और मूल्यों का पोषण व्यवहार से ही होता है। भारतीय संस्कृति का विकास सहस्राब्दियों की विकट यात्रा से हुआ है। अनेक आक्रमणों के मध्य भी हमने अपने मूल्यों का पोषण किया है। इन मूल्यों ने ही हमारी रक्षा की है। हमने इन मूल्यों को धर्म के अधिष्ठान में सहजता से प्रवाहित किया। धर्म का अर्थ सामान्यतः उपासना से लिया जाता है। किन्तु भारत मे धर्म प्रत्येक के विकास का सामान्य मार्ग है। हमारी विकास की अवधारणा समुत्कर्ष की है। समुत्कर्ष अर्थात सम्यक, संतुलित उत्कर्ष। भौतिक विकास को अभ्युदय तथा आध्यात्मिक विकास को निःश्रेयस कहा जाता है। अभ्युदय तथा निःश्रेयस के संतुलित विकास को समुत्कर्ष कहते है। इसका मार्ग है -धर्म।

धर्म का पालन कर विकास करने पर मूल्यों का हास सम्भव नहीं है। हमने भौतिक उन्नति को कभी नहीं रोका। हम तो महालक्ष्मी के पूजारी है। आज भी हमारे मंदिरों में धन के भाण्डार भरे हैं। हमारा आग्रह केवल इतना था कि यह धन, सम्पदा धर्म से अर्जित हो। किसी एक की कीमत पर दूसरे कि कमाई तो सच्चे अर्थ में कमाई कहाँ होगी। वह तो एक जेब से पैसा दूसरे जेब में ड़ालने जैसी बात है। आज विश्व के सम्मूख यही समस्या है। हमने पर्यावरण की, मानवीय सम्बन्धों की कीमत पर ऐश्वर्य तो बना लिया पर मानव सुखी नहीं हो पाया। अतः आज विश्व की मानवता की रक्षा के लिये भारतीय जीवनमूल्यों की रक्षा अत्यावश्यक है। ये मूल्य कालाबाधित नहीं है। समय के साथ इनको युगानुकुल व्यवस्था में ढ़ाला जा सकता है और इसी अर्थ में ये सार्वकालीक हैं। आईये इनमें से कुछ राष्ट्रीय जीवनमूल्यों को सूचिबद्ध करने का प्रयास करते है।

एकात्म मानव :- समाज में व्यवहार करते समय यह द्वंद्व सदैव रहा है -व्यक्ति का स्वातन्त्र्य अधिक महत्वपूर्ण होगा या समाज का हित। भारतीय संस्कृति व्यक्ति को एकात्म स्वरूप में देखती है अतः व्यक्ति-परिवार-समाज इन सब को पृथक पृथक ना देखते हुए मावन का ही विस्तारित रुप देखा जाता है। जब परिवार मेरी ही विकसित अभिव्यक्ति है तब उसके लिये किया गया त्याग मुझे हर्ष देगा। ऐसे ही समाज-राष्ट्र-मानवता-सृष्टि इन विकसित रुपों का भी मुझसे जो एकात्म है वह मेरे देनिक व्यवहार का अंग बनना चाहिये। इसी में से प्राणियों को प्रतिदिन ग्रास देना, वनस्पति को जल ऐसी परम्पराओं का निर्माण हुआ। अतिथि को भोजन कराना गुहस्थ का धर्म माना गया। यह सब एकात्म मावन के जीवनादर्श के व्यावहारिक प्रगटन से उपजे जीवनमूल्य है। सरस्वती सभ्यता के पुरातत्व अवशेषों से प्रारम्भ कर आजतक इन परम्पराओं का सातत्य देखा जा सकता है। इसी क्रम का अंतीम चरण परमेष्टि भी मेरा ही विकसित स्वरुप है और उसका साक्षत्कार भी इसी जीवन का आदर्श है। अतः प्रतिदिन ध्यान पूजा का भी महत्व है।

त्याग :- स्वामी विवेकानन्द त्याग और सेवा को भारत के राष्ट्रीय आदर्श मानते थे। उनके अनुसार जब जब हमने इन आदर्शों को दुर्लक्षित किया तब तब हमारी संस्कृति का पतन हुआ। आज भी हम समाज में त्याग को ही प्रतिष्ठा प्रदान करते है। भोग का अधिकार ही त्याग द्वारा प्राप्त होता है यह हमारा आदर्श है। जिसका त्याग जितना बड़ा होगा समाज में उसका सम्मान उतना ही अधिक होगा। त्याग का प्रगटीकरण जब धन के रूप में होता है तो वह दान होता है। शास्त्रों के अनुसार दान से ही आय का अर्जन शुद्ध होता है। अतः आय का छठा हिस्सा दान करने की आज्ञा शास्त्र देते है। त्याग का कर्म रुप में प्रगटीकरण है सेवा। प्रत्यक्ष सेवा से प्राप्त निर्मलता का वर्णन नहीं किया जा सकता। यह तो अनुभव करने से ही सम्भव है। एक छोटे से प्रत्यक्ष सेवा कार्य से जो आनन्द अनुभव होता है वह करोड़ों की प्राप्ति अथवा विश्वविजय से भी नहीं हो सकता।

सौन्दर्य बोध :- शरीर को भोग का आधार माननेवाले समाज में शारीरिक सौन्दर्य के बाह्य स्वरुप को अधिक महत्व दिया जाता है। प्रसाधन जीवन में अनावश्यक वर्चस्व पा जाते हैं। जैसा वर्तमान में पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव में हमारे शहरों में हो रहा है। अपने शरीर को निर्मल रखने के स्थान पर पसीने की बदबु को छिपाने के लिये बदबुनाशकों (Deodorant)  का प्रचार हो रहा है। और विज्ञापनों में उनके प्रयोग का उद्देश्य भी केवल यौनाकर्षण को ही दर्शाया जा रहा है। भारत में हम सौन्दर्य के आंतरिक रुप को महत्व देते है। शरीर भी धर्म का साधन माना जाता है इस कारण उसके अन्दर से निर्मल होने को महत्व दिया जाता है। सौन्दर्य का बोध भी इसी निर्मलता से जुड़ा होता है अतः प्रसाधन शास्त्र भी आंतरिक शुद्धता के उपाय को बताते है। यह उपाय अधिक स्थायी सौन्दर्य प्रदान करते है। दिखावे को महत्व ना होने के कारण वेषभूषा भी अंगप्रदर्शन करनेवाली ना होकर अंगों के प्रमाणबद्ध होने को ठीक से प्रदर्शित करनेवाली होती है। सम्बन्धों का भी प्रगटतः दिखावा नहीं किया जाता। प्रेम जेसे नाजुक भावों को एकान्त में ही प्रगट किया जाता है। सार्वजनीक दिखावे से सम्बन्ध भी प्रदर्शन की वस्तु बन जाते है और छोटे से झटके से ही टूट जाते है।

सम्बन्ध :- भारतीय संस्कृति सम्बन्धों की संस्कृति है। हम अजनबी से भी सम्बन्ध स्थापित कर लेते है। सड़क चलते हुए भी किसी को संबोधित करने में भैया, मौसी, ताउ ऐसे सम्बन्धो का ही प्रयोग करते है। पूरा गाँव सम्बन्धों से जुड़ा होता है। प्रकृति से भी हम सम्बन्ध जोड़ लेते है और गंगा मैया बन जाती है तो चन्दा मामा। यह सम्बन्ध ही मानवीय एकात्मता की कूँजी है। सम्बन्धों का निर्वाह यदि समाज में होता रहे तो धर्म सदा जीवित रहेगा।

विविधता :- भारत ही एकमात्र देश है जहाँ विविधता का केवल सम्मान ही नहीं होता समारोह होता है। एक अन्दरुनी तत्व का प्रगटीकरण विविधता से ही होता है इस नैसर्गिक नियम को भारत में ठीक से समझा गया। अतः हमने वेषभूषा, भोजन जैसे सामान्य व्यवहार से लेकर उपासना की पद्धति जैसे धार्मिक विषयों में भी विविधता को प्रोत्साहित किया है। हमने कही भी एकरुपता का आग्रह नहीं किया। योग जैसी वैज्ञानिक विधा में भी यह अभिव्यक्ति स्वातन्त्र्य भारत में दिया गया है। आज सूर्यनमस्कार के 6 प्रकार भारत में प्रचलित हैं। कला में भी हमने एकरुपता का आग्रह नही किया। श्रेष्ठता का मापदण्ड सामान्यीकरण (Generalization) ना होकर मौलिकता रहा। अतः चंदेरी, बनारसी अथवा कांजिवरम् की साडियों को बनाने वाले कारीगरों को नकल की जगह मौलिक नाविन्य का प्रशिक्षण दिया जाता है। उस कलाकार को श्रेष्ठ माना जायेगा जो नया प्रारुप (Design) तैयार करें। जिसमें कला अधिक ना हो उसको पूराने प्रारुप दोहराने की मजदूरी पर लगाया जाता है। आज भी यह परम्परा जीवित है। उपासना पद्धति में विविधता के सम्मान ने इस देश में सहजीवन व सर्वपंथसमभाव का अनुकरणीय आदर्श प्रस्तुत किया है। कट्टरता के कारण फैले आतंकवाद के स्थायी समाधान हेतु विश्व को यह जीवनमूल्य अपनाना अनिवार्य है।

निर्भयता :- स्वामी विवेकानन्द कहते है हमारे उपनिषदों में एक शब्द बार बार आता है अभिः अभिः – ड़रो मत। माताये बच्चों को निर्भयता से जीने की शिक्षा दे तब समाज वीर होगा। सबसे बड़ा भय तो मृत्यु का ही होता है ना, हम तो बचपन से जानते है कि आत्मा अमर है। केवल इसे व्यवहार में उतारने की आवश्यकता है। यह अन्य सभी जीवमूल्यों की नीव है। हम अपने जीवन में मूल्यों से समझौता भय के कारण ही करते है। असफलता का भय, पिछड़ने का भय, अस्तीत्व का भय, प्रतिष्ठा का भय इन्हीं के कारण हम जीवन में मूल्यों को छोड़ने की भूल करते है। यदि भय को जीत ले तो फिर मूल्याधारित जीवन जीना सहज ही हो जाता है।

इन जीवनमूल्यों ने काल के कठीन प्रवाह में भारतीय संस्कृति को जीवित रखने का कार्य किया। हमारे पूर्वजों ने प्राणों पर खेलकर इन जीवनमूल्यों की रक्षा की। बड़े बड़े साम्राज्य तहस नहस हो गये पर भारत केवल जीवित ही नहीं विजय पथ पर अग्रेसर हो रहा है। आज सारा विश्व इन जीवनमूल्यों को अपनाने को लालायित है। केवल हमें अपने सामूहिक प्रयास से इनकी पूनस्र्थापना कर प्रतिष्ठा प्रदान करनी है।

अगस्त 31, 2012 Posted by | आलेख | टिप्पणी करे

स्वाधीनता का मर्म


गत माह अमेरिकी विदेषमंत्री हिलेरी क्लिंटन ने एक व्याख्यान में कहा कि चीन में लोकतन्त्र के विकास की ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है और यह चीन के विकास में सबसे बड़ी बाधा है। चीन के एक शोध संस्थान ने इसकी प्रतिक्रीया में एक लेख प्रकाशित किया जिसमें चीनी विद्वानों ने अमेरिकी वैश्विकवाद को चुनौति दी। उन्होंने प्रश्न किये कि जो पश्चिम में अपनाया गया है उसी व्यवस्था को अपनाना विकास कैसे माना जायेगा? क्या पश्चिमी देश दावे के साथ कह सकते है कि उनके द्वारा गत कई वर्षों से अपनाये गये तन्त्र ने देश के सभी लोगों को सुख प्रदान किया है? यदि पश्चिम द्वारा अपनायी व्यवस्था आदर्श होती तो आज उन देशों में बेराजगारी, कर्ज, सामाजिक व पारिवारिक विघटन क्यों बढ़ रहा है? लोकतन्त्र यदि आदर्श व्यवस्था है तो क्या इसने सभी देशों में आदर्श परिणाम दिये है? जिन देशों ने इसे अपनाया वे आज भी जब आदर्श समाज, राजनीति व अर्थव्यवस्था को नही प्राप्त कर सके हैं तो फिर अमेरिका को क्या अधिकार है कि वो इस अधुरी असफल व्यवस्था को सबके उपर थोपें? चीनी विद्वान केवल प्रश्नों तक ही सीमित नहीं रहे। उन्होंने दावा किया कि चीन में व्यवस्थागत सुधार उसके अपने ऐतिहासिक अनुभव, संस्कृति व दर्शन के अनुसार ही होना चाहिये। उनके अनुसार चीन के लिये लोकतन्त्र के स्थान पर कन्फुशियन द्वारा प्रणीत ‘मानवीय सत्ता’ के सिद्धान्त पर विकसित व्यवस्था अधिक उपकारक व सम्यक होगी। शोधकारकों ने इस सिद्धान्त पर आधारित एक व्यवस्था के बारे में विस्तार से प्रस्ताव भी लिखा।

लोकतन्त्र की उपयोगिता अथवा चीनी विद्वानों द्वारा प्रस्तुत राजनयिक व्यवस्था पर विचार विमर्श अथवा विवाद भी हो सकता है किन्तु सबसे महत्वपूर्ण विचारणीय बिन्दू है कि उन्होंने छाती ठोक कर यह कहा कि उनके देश के लिये उनके अपने विचार व इतिहास में से निकली व्यवस्था ही उपयोगी है। किसी और के लिये जो ठीक है वह सबके लिये ठीक ही होगा यह साम्राज्यवादी सोच नहीं चलेगी। साथ ही अपने अन्दर से तन्त्र को विकसित करने के स्थान पर विदेशी विचार से प्ररित होकर व्यवस्था बनाना भी मानसिक दासतता का ही लक्षण है। जब हम स्वतन्त्रता के छः दशकों के बाद के भारत की स्थिति का अवलोकन करते हे तो हमे निराशा ही होती है। 15 अगस्त 1947 को जब भारत स्वतन्त्र हुआ तो हमारे राष्ट्रीय नेतृत्व के साथ ही पूरे विश्व को भी भारत से अनेक अपेक्षायें थी। इसी कारण 1950 के दशक में पूरा विश्व जब दो खेमों में बटा हुआ था तब भारत के आहवान पर 108 देशों ने ‘‘निर्गुट आंदोलन’’ के रूप में भारत का नेतृत्व स्वीकार किया था। भारत के इतिहास व संस्कृति के कारण विश्व के समस्त दुर्बल देशों को भारत से एक कल्याणकारी मार्गदर्शक नेतृत्व की अपेक्षा थी। हमारे प्रथम प्रधानमंत्री ने 14 व 15 अगस्त की मध्यरात्री पर लाल किले पर तिरंगा फहराते हुये ही घोषणा की थी कि भारत विश्व के राष्ट्रपरिवार में अपनी सकारात्मक भुमिका को निभाने के लिये तत्पर है। 15 अगस्त को आकाशवाणी पर प्रसारित संदेश में महायोगी अरविन्द ने स्वतन्त्र भारत के समक्ष तीन चरणो में लक्ष्य रखा था। पहले चरण में भारत के अस्वाभाविक, अप्राकृतिक विभाजन को मिटा अखण्ड भारत का पुनर्गठन, द्वितीय चरण में पूरे एशिया महाद्विप का भारत के द्वारा नेतृत्व तथा अन्ततः पूरे विश्व में गुरूरूप में संस्थापना। आज 65 वर्ष के बाद क्या हम इनमें से किसी भी लक्ष्य के निकट भी पहूँच पाये है?

विश्व के मार्गदर्शन की तो बात दूर रही हम अपने देश को ही पूर्णतः समर्थ, समृद्ध व स्वावलम्बी भी कहाँ बना पाये है? सारा विश्व भारत की असीम सम्भावनाओं की चर्चा करता है। किन्तु उन सम्भावनाओं को प्रत्यक्ष धरातल पर उतारने का काम अभी भी कहाँ हो पाया है? देश 70 प्रतिशत जनता अभाव में जी रही है। धनी व निर्धन के बीच की खाई बढ़ती जा रही है। संस्कारों का क्षरण तेजी से हो रहा है। भारतीय भाषाओं का महत्व व प्रासंगिकता दोनों ही इतनी गति से कम हो रही है कि कई देशी बोलियों के अस्तीत्व पर ही प्रश्नचिन्ह लग रहा है। कुल मिलाकर भारत में से भारतीयता की प्रतिष्ठा समाप्त हो रही है। कहीं पर भी कोई व्यवस्था नहीं दिखाई देती। राजनयिक, सामाजिक तथा प्रशासनिक व्यवस्था पूर्णतः शिथिल व दिशाहीन हो रही है। शिक्षा व्यवस्था भी इतनी प्राणहीन हो गई है कि चरित्रनिर्माण तो दूर की बात सामान्य लौकिक ज्ञान को प्रदान करने में भी इसे सफलता नहीं मिल पा रही। स्नातकोत्तर उपाधि धारण करनेवाले छात्र भी किसी भी एक भाषा में सादा पत्र भी नहीं लिख पाते है। इन शिक्षितों को बिना अंगरेजी का उपयोग किये 4 वाक्य बोलना भी असम्भव सा लगता है। दूसरी ओर वही उच्चशिक्षित छात्र शुद्ध अंगरेजी में भी 4 वाक्य नहीं बोल पाता है। ऐसी शिक्षापद्धति के कारण उत्पन्न चरित्रहीनता से सर्वत्र भ्रष्टाचार व अराजकता का वातावरण बन गया है। इस सबको बदलने के लिये अनेक आंदोलन भी चलाये जा रहे है। जब तक हम समस्या की जड़ को नही जान जाते तब तक सारे प्रयास पूर्ण प्रामाणिक होते हुए भी व्यर्थ ही होंगे।

देश की इस परिस्थिति के कई कारण है। समस्याएं बहुआयामी हैं। आर्थिक, नीतिगत, कार्यकारी, संस्थागत, सामाजिक, व्यक्तिगत कई कारणों से समस्या जटील होती जा रही है। कई प्रकार के देशभक्त व्यक्ति व संगठन इन कारणों के निवारण पर कार्य कर रहे है। फिर भी अपेक्षित परिणाम दिखाई नहीं दे रहा। समस्या के समाधान हेतु सभी पहलुओं पर काम तो करना ही पड़ेगा किन्तु दिशा एक होना आवश्यक है। हमें अपने देश के मूलतत्व, चिति के अनुरूप व्यवस्थाओं का निर्माण करने की ओर प्रयास करना होगा। भारत का जागरण भारतीयता का जागरण है। हमारा राष्ट्रीय तन्त्र हमारे स्वबोध को लेकर विकसित करना होगा तभी यह स्वतन्त्र कहा जायेगा। राज्यव्यवस्था हमारे राष्ट्रीय स्वभाव के अनुसार होगी तभी स्वराज्य का स्वप्न साकार होगा। स्वामी विवेकानन्द ने बार बार कहा है प्रत्येक राष्ट्र का विश्व को संप्रेषित करने अपना विशिष्ट संदेश होता है, नियति होती है जिसे उसे पाना होता है और जीवनव्रत होता है जिसका उसे पालन करना होता है। वे कहते है भारत का प्राणस्वर धर्म है और उसी के अनुरूप उसका मानवता को संदेश है आध्यात्म, नियति है जगत्गुरू तथा जीवनव्रत है मानवता को ऐसी जीवनपद्धति का पाठ पढ़ाना जो सर्वसमावेशक, अक्षय व समग्र हो।

स्वतन्त्र भारत को अपनी नियति को पाने के लिये अपने जीवनव्रत के अनुसार व्यवस्था का निर्माण करना था। उसके स्थान पर हम सदैव उधार की व्यवस्थाओं को अपनाते रहे। हमने अपना संविधान तक विभिन्न देशों से उधार लिया। अनेक शताब्दियों तक विविधता से सम्पन्न विस्तृत राज्य पर सुचारू संचालन करने वाली नैसर्गिक व्यवस्था का सैद्धान्तिक व व्यावहारिक प्रतिपादन करनेवाले चाणक्य, विद्यारण्य तथा शिवाजी आदि स्वदेशी चिंतको की सफल राजव्यवस्थाओं का अध्ययन कर उन्हें कालानुरूप समायोजित करने का विचार ही नहीं हुआ। क्या विदेशी आधार पर बने संविधान से विकसित तन्त्र स्वदेशी हो सकता है? इसी का परिणाम हुआ कि हमने आगे चलकर राष्ट्र के प्राण ‘धर्म’ को ही राजतन्त्र से नकार दिया। यही कारण है कि पूरी व्यवस्था ही प्राणहीन हो गई।

अर्थतन्त्र में भी हमने प्रथम चार दशक तक रूस की साम्यवादी व्यवस्था से प्रेरणा ग्रहण कर समाजवादी अर्थव्यवस्था का निर्माण किया। उसकी निष्फलता सिद्ध हो जाने पर 1991 के बाद आर्थिक उदारता के नाम पर पश्चिम के मुक्त बाज़ार व्यवस्था को अपनाया। जब कि यह विश्वमान्य तथ्य है कि 18 वी शति के प्रारम्भ तक भारत ना केवल विश्व का सबसे समृद्ध देश था अपितु वैश्विक संपदा का 33 प्रतिशत भारत में था। विश्व के धनी देशों के संगठन Organisation for Economic Co-operation and Development (OECD) ने ख्यातनाम अर्थवेत्ता एंगस मेडीसन को इसवी सन के प्रारम्भ से विश्व की सकल सम्पदा (गडप) पर अनुसंधान करने का प्रकल्प दिया। उन्होंने विश्व के आर्थिक इतिहास का संकलन किया। उनके अनुसार भारत व चीन विश्व के सबसे धनी देश रहे है। इसा के काल के प्रारम्भ से 14 वी शती तक तो चीन भी किसी होड़ में नहीं था। अंगरेजों ने इस प्राचीन समग्र व्यवस्था को तोड़ अपनी शोषण पर आधारित व्यवस्था को लागु किया तब से इस देश में विपन्नता का राज प्रारम्भ हुआ। आज राजनैतिक स्वतन्त्रता के 65 वर्षों बाद भी हम उसी दासता को क्यों ढ़ो रहे है? इस देश का अतीत जब इतना समृद्ध रहा है तब यदि आज भी हम अपने सिद्धान्तों पर आधारित व्यवस्था का निर्माण करेंगे तो पुनः विश्व के सिरमौर बन सकते है।

आज हम अपनी स्वतन्त्रता को खोने के कगार पर आ पहूँचे है ऐसे में मानसिक स्वाधीनता का वैचारिक आंदोलन प्रारम्भ करने की आवश्यकता है। एक ऐसे तन्त्र के निर्माण का आन्दोलन जो देशज हो अर्थात इस देश के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक तथा धार्मिक अनुभव से उपजा हो। ऐसे तन्त्र का स्वाधीन होना भी आवश्यक है। अर्थात इसके सभी कारकों पर अपने राष्ट्र का ही निर्णय हो। इस हेतु शिक्षा के राष्ट्रीय बनने की आवश्यकता है। जिससे निर्णायक भी स्वदेश की भावना व ज्ञान से परिपूर्ण हो। स्व-तन्त्र का तिसरा आवश्यक पहलु है स्वावलम्बी तन्त्र। तन्त्र की सहजता व सफलता उसके निचली इकाई तक स्वावलम्बी होने में है। गाँव अपने आप में स्वावलम्बी हो तो ही सबका अभ्युदय सम्भव होगा। भारतीय व्यवस्था हर स्तर पर स्वावलम्बी होती है। इसमें तन्त्र के निर्माण के बाद नियमित संचालन के लिये शासन के भी किसी हस्तक्षेप अथवा सहभाग की आवश्यकता नहीं होती। समाज ही स्वयं संचालन करता है। आपात् स्थिति में ही शासन को ध्यान देना पड़ता है।

आज हम सब स्वाधीनता दिवस मनायेंगे। केवल देशभक्ति की भावना को उजागर करने के साथ ही स्वाधीनता के मर्म पर विचार भी हो यह शुभाकांक्षा।

अगस्त 15, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , , , , , , , | 1 टिप्पणी

क्रांतिकारी कृष्ण


इस वर्ष जन्माष्टमी का पर्व अगस्त क्रांति के दिनांक पर आ रहा है। 9 अगस्त को सच्चे अर्थ में क्रांति दिवस मनाया जाना चाहिये अथवा नहीं इस पर विवाद हो सकता है किन्तु इस बात पर कोई दुमत नहीं हो सकता कि कृष्ण का तो पूरा जीवन ही क्रांतिकारी है। उन्होंने प्रस्थापित को पूरी तरह से बदल डाला। यह परिवर्तन अपनी किसी अलौकिक दैवी शक्ति का प्रयोग कर चमत्कार के द्वारा नही किया अपितु समाज के जागरण के द्वारा सामूहिक शक्ति के सुनियोजित प्रयोग के माध्यम से यह परिवर्तन घटित किया गया। इसलिये वे सामाजिक क्रांतिकारियों के आदर्श कहे जा सकते है। उनके जीवन से हम सफल सामाजिक क्रांति के लिये आवश्यक तत्वों को समझ सकते हैं।

श्रीकृष्ण के जीवन के तीन स्पष्ट भाग हैं। नंदग्राम की लीलाओं से लेकर कंसवध तक का प्रथम भाग मूलतः असुरों के दमन का है। पुतना से प्रारम्भ कर कालिया मर्दन सहित अनेक राक्षसों के निःपात के बाद चाणूर तक पूरा बाल्यकाल इस संघर्ष का साक्षी है। जरासंध के मथुरापर सतत आक्रमण के बाद रणछोड़दास का दोष लेते हुए द्वारिका गमन तथा वहाँ पर शून्य से प्रारम्भ कर स्वयं हल चलाकर स्वर्णीम राज्य का निर्माण यह रचनात्मक सृजन का कालखण्ड। तीसरा कालखण्ड है महाभारत का – पूर्ण व्यवस्था का परिवर्तन। गीता का सिद्धान्त इस धर्मराज्य की स्थापना का आधार है।

वर्तमान समय मे भी यह तीनों कार्य सफल क्रांति तथा पूर्ण व्यवस्था परिवर्तन के लिये आवश्यक है। भ्रष्टाचारियों के विरूद्ध लड़ाई असुर निर्दालन के समान ही है। आज के कंस-चाणूरों का मर्दन भी आवश्यक है। पुतना बनकर आये सम्बंधियों को भी सबक सिखाना होगा और धरति के संसाधनों में विष फैलाते कालिया की फन पर नृत्य भी करना होगा। कंस के गुण्डों के पोषण हेतु मथुरा जा रहे दूध-दही की मटकियों को फोड़ अपने गोपबालों का पोषण करने की सहज बाललीला भी आज अनिवार्य है। काले धन के प्रवाह को रोकना तथा इसे पुनः देश में लाकर स्वदेशी संसाधनों के स्वदेश विकास में प्रयोग की क्रांति ही कान्हा की दहीहांडी का संदेश है। द्वारिका की रचना पूरे समाज को सुखी करनेवाले विकास की व्यवस्था का एक छोटे स्तर पर प्रयोग है। आज अनेक संगठन अपने अपने स्तर पर ऐसे प्रयोग कर रहे है। राजकीय स्तर पर गुजरात में विकसित विकास के प्रादर्श को भी इसी रूप में देखा जा सकता है। पाण्डवों को स्थापित करने महाभारत के युद्ध का सारथी बन निर्देशन तथा उसके तात्विक आधार को स्पष्ट करता गीता का आख्यान आज की आवश्यकता है। यह निर्णायक धर्मयुद्ध धर्माधारित राज्य की स्थापना के लिये अनिवार्य है। पर युद्ध से पूर्व आज के समय के अनुसार क्रांतिगीता की रचना भी आवश्यक है। वर्तमान व्यवस्था परिवर्तन में रत क्रांतिकारी इस मुख्य चरण की ओर ध्यान नहीं दे रहे इसी कारण सारे प्रयास अधुरे ही सिद्ध हो रहे हैं। वर्तमान समय के अनुरूप सनातन सिद्धान्तों की व्याख्या कर युगानुकुल गीता की रचना के द्वारा ही व्यवस्था परिवर्तन का संघर्ष अपने अंतिम युद्ध में सफल हो सकता है।

क्रांति पथ के इस अनुपम मार्गदर्शन के साथ ही क्रांति की कार्यपद्धति के बारे में भी संकेत भगवान कृष्ण के जीवन से हमें प्राप्त होते हैं। सभी संघर्षों में उनकी भौतिक शक्ति विरोधी के सामने कम ही थी। चाणूर मुष्टिक के सामने कान्हा-दाउ तो सुकुमार बालक ही थे। जरासंध से संरक्षित कंस के सम्मूख विस्थापित कृष्ण और उसकी गोपसेना का बल था ही क्या? महाभारत में भी कौरवों की 11 अक्षोहिणी सेना का सामना पाण्डवों की सात अक्षोहिणी सेना को करना था। महारथियों की सुचि भी ऐसीही विषम थी। सारे जीवन श्रीकृष्ण ने संख्या व संसाधनों में कमजोर होते हुए भी अपने से कई गुना बलशाली शत्रु का निर्दालन किया। केवल सत्य व धर्म के अपने पक्ष में होने के आदर्शवाद के सहारे ही नहीं अपितु व्यावहारिक चतुराई के द्वारा यह विजय सम्भव हुई। अतः क्रांति का पहला पाठ जो कृष्ण के जीवन से हम पढ़ सकते है वह है – युक्ति से शक्ति का सामना। कालयवन का मारना उनके बस में नही था तो भाग कर चतुराई से उसे उस गुफा में ले गये जहाँ मुचकुन्द तपस्या कर रहे थे। कालयवन द्वारा तपस्या भंग किये जाने पर मुचकुन्द के तपोबल से वह भस्म हुआ। मुचकुन्द ने कृष्ण को श्राप दिया कि उसे रणछोड़ का लांछन प्राप्त होगा। धर्म व समाज के भले के लिये कन्हाई ने इस लांछन को भी गर्व से धारण किया। महाभारत में तो पार्थसारथी की युक्तियों के बिना धर्म की विजय सम्भव ही नहीं होती। जयद्रथ, द्रोण, भीष्म, कर्ण, घटोत्कच के वध तथा अंत में दुर्योधन की जंघा का मर्दन होने तक सब प्रसंगों में कृष्ण की व्यावहारिक नीतियों ने पाण्डवों की सुनिश्चित हार को विजय में परिवर्तित किया। कृष्णनीति में साध्य की शुद्धता को अधिक महत्व दिया गया। यदि साध्य धर्म के अनुसार है तो उसकी प्राप्ति में लगनेवाले साधन की शुद्धता पर अति मीन मेख करना कृष्णनीति का अंग नहीं है। द्रोण को शोकाकुल करने ‘अश्वत्थामा हतः’ का अर्धसत्य बोलने के लिये धर्मराज को तत्पर करना अथवा दलदल में फँसे रथचक्र में उलझे कर्ण पर बाण चलाने के लिये अर्जुन को प्रेरित करने में पार्थसारथी ने दिखा दिया कि खोखली नैतिकता से स्वयं के हाथ बांधकर दमनकारी राक्षसों नहीं लड़ा जा सकता। इस व्यावहारिकता के साथ क्रांति की रचना करना आज अत्यावश्यक है। सभी अधर्मी षड़यन्त्रों से राज्य कर रहे दुष्टों का सामना केवल आदर्शवाद के सहारे करना असम्भव ही लगता है।
क्रांतिकारी कृष्ण के आंदोलन का दूसरा महत्वपूर्ण पाठ है — सामान्य जन के आत्मबल को जागृत कर पूरे समाज को क्रांति में सम्मिलित करना। नंदग्राम में सामान्य गोपबालों को उनके अन्दर के असीम बल के प्रति जागृत कर कंस के शोषण से मुक्ति दिलाने का कार्य कान्हा ने किया। गोवर्धन पूजा के समय इन्द्र के प्रकोप से रक्षा अपनी कनिष्ठिका के बल पर करने का सामाथ्र्य रखने वाले गिरीधारी ने उंगली लगाने से पूर्व सारे गोप-गोपियों को अपनी लाठी का आधार देने के लिये प्रवृत्त किया। सबके सहभाग से ही क्रांति की सफलता सम्भव है। द्वारिका के निर्माण में भी बहुजन समाज के सहभाग से ही रचनात्मक आंदोलन खड़ा किया गया। कृष्ण चरित्र के इस भाग के विस्तार से अध्ययन की आवश्यक है। द्वारिका के वैज्ञानिक निर्माण में वहाँ के स्थानिय समाज का सहभाग भी उतना ही महतवपूर्ण था। अतः सामान्यजन के आत्मबल को जगाना कृष्ण की क्रांति का महत्वपूर्ण घटक है। वर्तमान समय में इस सामूहिक आत्मविश्वास के जागरण की अत्यन्त आवश्यकता है। केवल संख्या जुटाने से जगनेवाले उत्साह को आत्मबल मान लेना ठीक नहीं है। जबतक क्रांति में जुटनेवाला प्रत्येक व्यक्ति निस्वार्थ भाव से अपने अन्दर की शक्ति को जानकर संघर्ष में नहीं जुट जाता क्रांति का समग्र परिणाम सम्भव नहीं है। महाभारत का विनाशकारी युद्ध भी केवल सत्ता परिवर्तन मात्र ही रह जाता यदि गीता के द्वारा धर्म की क्रांतिकारी व्याख्या का प्रतिपादन भगवान् कृष्ण ने नहीं किया होता। गीता जनप्रबोधन का गीत है। जनजागरण के तीन स्तरों को कृष्ण के जीवन से हम सीख सकते है। नन्दलाला के वेणुद्वारा किया गया भावात्मक जागरण, द्वारिका में बलराम के हल के साथ जुट़े समाज के हाथों से क्रियात्मक जागरण व धर्मक्षेत्र कुरूक्षेत्र की रणभूमि में गाये गीता के विशुद्ध तत्वज्ञान द्वारा वैचारिक जागरण। तीनों में से केवल किसी एक के होने से ही क्रांति नहीं हो जाती। मन की संवेदना, बुद्धि की योजना व हाथों के कर्म से ही रचनात्मक क्रांति सुफल होती है।

कृष्ण की क्रांति का तिसरा तत्व है – सकारात्मकता। क्रांति मूल रूप से प्रस्थापित के परिवर्तन के लिये होती है अतः सामान्यतः ऐसे आंदोलनों में प्रतिक्रियावाद का हावी होना स्वाभाविक होता है। किसी के विरोध में लोगों का समर्थन जुटाना भी सहज होता है। शत्रु प्रत्यक्ष होने से संघर्ष भी स्पष्ट होता है। किन्तु प्रतिक्रिया के नकारात्मक विचार की नीव पर खड़ी क्रांति का भवन अधिक समय तक स्थिर नहीं हो सकता। अभावात्मक अथवा नाकारा विचार के लिये किया गया शुभ कर्म भी समग्र तथा स्थायी परिणाम नहीं दे सकता। द्वारिका में पहुँचना भले ही जरासंध के मथुरा पर 17 बार किये आक्रमणों की प्रतिक्रिया थी किन्तु उसके पीछे का भाव मथुरा की जनता की रक्षा ही था। स्वयं पर पलायन का लांछन भले ही लगे किन्तु अपने वैमनस्य के कारण जनता का नुकसान ना हो इस सद्भावना पर आधारित होने के कारण ही यादव राज्य के निर्माण का रचनात्मक आंदोलन सफल रहा। उससे पहले भी नन्दग्राम में किये समरसता के सामाजिक आंदोलन की नीव भी सबके अन्दर विद्यमान देवत्व के जागरण की एकात्मता ही थी। इसीलिये गोवर्द्धन पूजा की पर्यावरण क्रांति के समय भी इन्द्र के साम्राज्यवादी पुंजीवाद का प्रत्यक्ष विरोध ना करते हुए सकारात्मक विकल्प प्रदान कर परिवर्तन किया गया। इसी कारण गोपबालों के आत्मजागरण की क्रांति सफल हो सकी और कंस के वध के बाद भी जनता के कोप का सामना नहीं करना पड़ा। क्रांति का लक्ष्य, वैचारिक आधार व मार्ग तीनों का सकारात्मक होना आवश्यक है। वर्तमान में अधिकतर आंदोलन इस प्रकार का सकारात्मक लक्ष्य ना रख पाने के कारण ही सीमित व अस्थायी सिद्ध हो रहे है। यह कृष्ण की ही विशेषता है कि महाभारत का युद्ध पाण्डवों का प्रतिशोध मात्र होने के स्थान पर धर्मयु़द्ध का सकारात्मक रूप ले सका। भले ही उसके लिये उन्हें स्वय कौरव राजसभा में पाण्डवों के दूत के रूप में पैरवी कर अपमान सहना पड़ा।

क्रांतिकारी कृष्ण की कार्यपद्धति का सबसे महत्वपूर्ण चैथा आयाम है उनका स्वयंका पूर्णतः सत्ता निरपेक्ष होना। कंस के वध के बाद यदि कृष्ण स्वयं राजा बन जाते तो जनता तो उनका स्वागत ही करती किन्तु कृष्ण का जीवन इससे कई गुना उदात्त है। इसी कारण वे कंस के जन्मदाता उग्रसेन को बंदिगृह से मुक्त कर उनका राज्याभिषेक मथुरा के राजा के रूप में करते है। कृष्ण को तो सारी जनता के हृदय पर राज करना है। द्वारिका में भी राज्यस्थापना के बाद वे स्वयं कोई पद ग्रहण नहीं करते है। अपने पिता वसुदेव को यादवराज्य के राजा के रूप में प्रतिष्ठित करते है। महाभारत युद्ध से पूर्व भी बिना किसी पक्षपात के कौरव पाण्डवों दोनों को सहयोग प्रदान करते है। यह निरपेक्षता ही कृष्ण की नैतिक शक्ति है जिसके कारण वे पूरे विश्व के हृदय पर शासन करते है और सही शासक को सत्ता प्रदान कर बाहर से नीतिगत मार्गदर्शन कर सकते है। वर्तमान में भी इसी प्रकार के राजनैतिक आकांक्षाओं से पूर्णतः अलिप्त निःस्वार्थ नैतिक नेतृत्व की क्रांति को प्रतिक्षा है।

आज की जन्माष्टमी हमारे लिये आत्मावलोकन का समुचित अवसर प्रदान करती है। आज जब दैवी असंतोष से पीड़ित जनता भारत में आमूलचूल परिवर्तन के लिये समग्र स्थायी क्रांति के लिये उद्यत है तब हम अपने अन्दर के कन्हाई को जगाये। युक्ति की शक्ति, सर्वसामान्य जन का भावात्मक, क्रियात्मक व वैचारिक जनजागरण, सकारात्मक लक्ष्य तथा सत्ता निरपेक्ष निःस्वार्थ नेतृत्व के चिरंतन तत्वों को आचरण में उतारकर सच्ची क्रांति का निर्धार करे। क्रांतिकारी कृष्ण हमारा नेतृत्व अवश्य करेंगे, पार्थसारथी की गीता हमारा सारथ्य करेगी और कंस चाणूर का मर्दन करनेवाले विश्ववन्द्य जगत्गुरू माँ भारती को पुनःप्रतिष्ठित करने में हमारे साथी बनेंगे।

अगस्त 9, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , | 5 टिप्पणियाँ

   

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