उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

हमारे राष्ट्रीय जीवनमूल्य


गढ़े जीवन अपना अपना -18
एक माँ अपनी युवा बच्ची की शिकायत करती है कि मेरी बेटी मुझसे प्रेम नहीं करती। कारण उपर से बड़ा ही मूर्खतापूर्ण दिखता है, — मदर्स डे पर बेटी ने माँ को कार्ड दिया “I Love You !” पर माँ का कहना है जो कार्ड से बताना पड़े वो प्यार नहीं हो सकता। दूसरी ओर कालेज मे पढ़ने जा रही एक युवती कहती है मेरे पिताजी मुझसे प्रेम नहीं करते। कैसे पता चला– होण्डा की एक्टीवा मांगी थी। पिताजी ने सस्ती छोटी गाड़ी खरीदी। दोनों बातों में तत्व एक ही है। क्या भावों को वस्तुओं से तौला जा सकता है? यह समाज के बदलते सांस्कृतिक मूल्यों का अनिवार्य संघर्ष है जिसे हम पीढ़ियों के भेद (Generation Gap) के रुप में देखते है। माँ सोचती है कि प्रेम जैसे सूक्ष्म भावों की अभिव्यक्ति भौतिक वस्तू के रूप में नहीं हो सकती। ऐसा करने का प्रयास उन भावों का अपमान है। सस्ती गाड़ी से अपने पिता का प्रेम तौलनेवाली बेटी भौतिकवाद की शिकार है। उसके लिये सम्बन्धों की अभिव्यक्ति वस्तुओं से ही होती है। इसमें उसका दोष नहीं है। बचपन से ही जन्मदिन के अवसर पर मिलनेवाले उपहारों से उसने मित्रता को तौलना सीखा। अपने व्यवसाय की व्यस्तता के कारण समय ना दे पाने वाले अभिभावकों को उपहारों से भरपाई करते हुऐ पाया। तो उसको यही समझ आया कि प्यार का अर्थ है मेरे लिये जो अधिक खर्च कर सकें।

समाज का व्यवहार उसके द्वारा पोषित मूल्यों से निर्धारित होता है और मूल्यों का पोषण व्यवहार से ही होता है। भारतीय संस्कृति का विकास सहस्राब्दियों की विकट यात्रा से हुआ है। अनेक आक्रमणों के मध्य भी हमने अपने मूल्यों का पोषण किया है। इन मूल्यों ने ही हमारी रक्षा की है। हमने इन मूल्यों को धर्म के अधिष्ठान में सहजता से प्रवाहित किया। धर्म का अर्थ सामान्यतः उपासना से लिया जाता है। किन्तु भारत मे धर्म प्रत्येक के विकास का सामान्य मार्ग है। हमारी विकास की अवधारणा समुत्कर्ष की है। समुत्कर्ष अर्थात सम्यक, संतुलित उत्कर्ष। भौतिक विकास को अभ्युदय तथा आध्यात्मिक विकास को निःश्रेयस कहा जाता है। अभ्युदय तथा निःश्रेयस के संतुलित विकास को समुत्कर्ष कहते है। इसका मार्ग है -धर्म।

धर्म का पालन कर विकास करने पर मूल्यों का हास सम्भव नहीं है। हमने भौतिक उन्नति को कभी नहीं रोका। हम तो महालक्ष्मी के पूजारी है। आज भी हमारे मंदिरों में धन के भाण्डार भरे हैं। हमारा आग्रह केवल इतना था कि यह धन, सम्पदा धर्म से अर्जित हो। किसी एक की कीमत पर दूसरे कि कमाई तो सच्चे अर्थ में कमाई कहाँ होगी। वह तो एक जेब से पैसा दूसरे जेब में ड़ालने जैसी बात है। आज विश्व के सम्मूख यही समस्या है। हमने पर्यावरण की, मानवीय सम्बन्धों की कीमत पर ऐश्वर्य तो बना लिया पर मानव सुखी नहीं हो पाया। अतः आज विश्व की मानवता की रक्षा के लिये भारतीय जीवनमूल्यों की रक्षा अत्यावश्यक है। ये मूल्य कालाबाधित नहीं है। समय के साथ इनको युगानुकुल व्यवस्था में ढ़ाला जा सकता है और इसी अर्थ में ये सार्वकालीक हैं। आईये इनमें से कुछ राष्ट्रीय जीवनमूल्यों को सूचिबद्ध करने का प्रयास करते है।

एकात्म मानव :- समाज में व्यवहार करते समय यह द्वंद्व सदैव रहा है -व्यक्ति का स्वातन्त्र्य अधिक महत्वपूर्ण होगा या समाज का हित। भारतीय संस्कृति व्यक्ति को एकात्म स्वरूप में देखती है अतः व्यक्ति-परिवार-समाज इन सब को पृथक पृथक ना देखते हुए मावन का ही विस्तारित रुप देखा जाता है। जब परिवार मेरी ही विकसित अभिव्यक्ति है तब उसके लिये किया गया त्याग मुझे हर्ष देगा। ऐसे ही समाज-राष्ट्र-मानवता-सृष्टि इन विकसित रुपों का भी मुझसे जो एकात्म है वह मेरे देनिक व्यवहार का अंग बनना चाहिये। इसी में से प्राणियों को प्रतिदिन ग्रास देना, वनस्पति को जल ऐसी परम्पराओं का निर्माण हुआ। अतिथि को भोजन कराना गुहस्थ का धर्म माना गया। यह सब एकात्म मावन के जीवनादर्श के व्यावहारिक प्रगटन से उपजे जीवनमूल्य है। सरस्वती सभ्यता के पुरातत्व अवशेषों से प्रारम्भ कर आजतक इन परम्पराओं का सातत्य देखा जा सकता है। इसी क्रम का अंतीम चरण परमेष्टि भी मेरा ही विकसित स्वरुप है और उसका साक्षत्कार भी इसी जीवन का आदर्श है। अतः प्रतिदिन ध्यान पूजा का भी महत्व है।

त्याग :- स्वामी विवेकानन्द त्याग और सेवा को भारत के राष्ट्रीय आदर्श मानते थे। उनके अनुसार जब जब हमने इन आदर्शों को दुर्लक्षित किया तब तब हमारी संस्कृति का पतन हुआ। आज भी हम समाज में त्याग को ही प्रतिष्ठा प्रदान करते है। भोग का अधिकार ही त्याग द्वारा प्राप्त होता है यह हमारा आदर्श है। जिसका त्याग जितना बड़ा होगा समाज में उसका सम्मान उतना ही अधिक होगा। त्याग का प्रगटीकरण जब धन के रूप में होता है तो वह दान होता है। शास्त्रों के अनुसार दान से ही आय का अर्जन शुद्ध होता है। अतः आय का छठा हिस्सा दान करने की आज्ञा शास्त्र देते है। त्याग का कर्म रुप में प्रगटीकरण है सेवा। प्रत्यक्ष सेवा से प्राप्त निर्मलता का वर्णन नहीं किया जा सकता। यह तो अनुभव करने से ही सम्भव है। एक छोटे से प्रत्यक्ष सेवा कार्य से जो आनन्द अनुभव होता है वह करोड़ों की प्राप्ति अथवा विश्वविजय से भी नहीं हो सकता।

सौन्दर्य बोध :- शरीर को भोग का आधार माननेवाले समाज में शारीरिक सौन्दर्य के बाह्य स्वरुप को अधिक महत्व दिया जाता है। प्रसाधन जीवन में अनावश्यक वर्चस्व पा जाते हैं। जैसा वर्तमान में पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव में हमारे शहरों में हो रहा है। अपने शरीर को निर्मल रखने के स्थान पर पसीने की बदबु को छिपाने के लिये बदबुनाशकों (Deodorant)  का प्रचार हो रहा है। और विज्ञापनों में उनके प्रयोग का उद्देश्य भी केवल यौनाकर्षण को ही दर्शाया जा रहा है। भारत में हम सौन्दर्य के आंतरिक रुप को महत्व देते है। शरीर भी धर्म का साधन माना जाता है इस कारण उसके अन्दर से निर्मल होने को महत्व दिया जाता है। सौन्दर्य का बोध भी इसी निर्मलता से जुड़ा होता है अतः प्रसाधन शास्त्र भी आंतरिक शुद्धता के उपाय को बताते है। यह उपाय अधिक स्थायी सौन्दर्य प्रदान करते है। दिखावे को महत्व ना होने के कारण वेषभूषा भी अंगप्रदर्शन करनेवाली ना होकर अंगों के प्रमाणबद्ध होने को ठीक से प्रदर्शित करनेवाली होती है। सम्बन्धों का भी प्रगटतः दिखावा नहीं किया जाता। प्रेम जेसे नाजुक भावों को एकान्त में ही प्रगट किया जाता है। सार्वजनीक दिखावे से सम्बन्ध भी प्रदर्शन की वस्तु बन जाते है और छोटे से झटके से ही टूट जाते है।

सम्बन्ध :- भारतीय संस्कृति सम्बन्धों की संस्कृति है। हम अजनबी से भी सम्बन्ध स्थापित कर लेते है। सड़क चलते हुए भी किसी को संबोधित करने में भैया, मौसी, ताउ ऐसे सम्बन्धो का ही प्रयोग करते है। पूरा गाँव सम्बन्धों से जुड़ा होता है। प्रकृति से भी हम सम्बन्ध जोड़ लेते है और गंगा मैया बन जाती है तो चन्दा मामा। यह सम्बन्ध ही मानवीय एकात्मता की कूँजी है। सम्बन्धों का निर्वाह यदि समाज में होता रहे तो धर्म सदा जीवित रहेगा।

विविधता :- भारत ही एकमात्र देश है जहाँ विविधता का केवल सम्मान ही नहीं होता समारोह होता है। एक अन्दरुनी तत्व का प्रगटीकरण विविधता से ही होता है इस नैसर्गिक नियम को भारत में ठीक से समझा गया। अतः हमने वेषभूषा, भोजन जैसे सामान्य व्यवहार से लेकर उपासना की पद्धति जैसे धार्मिक विषयों में भी विविधता को प्रोत्साहित किया है। हमने कही भी एकरुपता का आग्रह नहीं किया। योग जैसी वैज्ञानिक विधा में भी यह अभिव्यक्ति स्वातन्त्र्य भारत में दिया गया है। आज सूर्यनमस्कार के 6 प्रकार भारत में प्रचलित हैं। कला में भी हमने एकरुपता का आग्रह नही किया। श्रेष्ठता का मापदण्ड सामान्यीकरण (Generalization) ना होकर मौलिकता रहा। अतः चंदेरी, बनारसी अथवा कांजिवरम् की साडियों को बनाने वाले कारीगरों को नकल की जगह मौलिक नाविन्य का प्रशिक्षण दिया जाता है। उस कलाकार को श्रेष्ठ माना जायेगा जो नया प्रारुप (Design) तैयार करें। जिसमें कला अधिक ना हो उसको पूराने प्रारुप दोहराने की मजदूरी पर लगाया जाता है। आज भी यह परम्परा जीवित है। उपासना पद्धति में विविधता के सम्मान ने इस देश में सहजीवन व सर्वपंथसमभाव का अनुकरणीय आदर्श प्रस्तुत किया है। कट्टरता के कारण फैले आतंकवाद के स्थायी समाधान हेतु विश्व को यह जीवनमूल्य अपनाना अनिवार्य है।

निर्भयता :- स्वामी विवेकानन्द कहते है हमारे उपनिषदों में एक शब्द बार बार आता है अभिः अभिः – ड़रो मत। माताये बच्चों को निर्भयता से जीने की शिक्षा दे तब समाज वीर होगा। सबसे बड़ा भय तो मृत्यु का ही होता है ना, हम तो बचपन से जानते है कि आत्मा अमर है। केवल इसे व्यवहार में उतारने की आवश्यकता है। यह अन्य सभी जीवमूल्यों की नीव है। हम अपने जीवन में मूल्यों से समझौता भय के कारण ही करते है। असफलता का भय, पिछड़ने का भय, अस्तीत्व का भय, प्रतिष्ठा का भय इन्हीं के कारण हम जीवन में मूल्यों को छोड़ने की भूल करते है। यदि भय को जीत ले तो फिर मूल्याधारित जीवन जीना सहज ही हो जाता है।

इन जीवनमूल्यों ने काल के कठीन प्रवाह में भारतीय संस्कृति को जीवित रखने का कार्य किया। हमारे पूर्वजों ने प्राणों पर खेलकर इन जीवनमूल्यों की रक्षा की। बड़े बड़े साम्राज्य तहस नहस हो गये पर भारत केवल जीवित ही नहीं विजय पथ पर अग्रेसर हो रहा है। आज सारा विश्व इन जीवनमूल्यों को अपनाने को लालायित है। केवल हमें अपने सामूहिक प्रयास से इनकी पूनस्र्थापना कर प्रतिष्ठा प्रदान करनी है।

अगस्त 31, 2012 Posted by | आलेख | टिप्पणी करे

   

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