उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

जैविक कृषि : लाभकारी कृषि


स्वतंत्रता के समय भारत में ७५ प्रतिशत जनता कृषि में संलग्न थी । इस बात को ध्यान में रखते हुए ग्राम केन्द्रित विकास की योजना की जानी आवश्यक थी । किन्तु ऐसा नहीं हुआ । महात्मा गांधी ने भी ग्राम स्वराज्य की संकल्पना साकार करने का विचार रखा था । किन्तु उस समय सत्ता में आसीन नेताओं के पश्चिमी अंधानुकरण के कारण औद्योगिक क्रांति के पीछे पड़कर देश में उद्योगों को फैलाने पर जोर दिया गया । इस हेतु विदेशी तकनीक को अपनाया गया । उद्योग भी परावलम्बी हो गये । इस दृष्टिदोष में ही किसानों की वर्तमान दुर्दशा का मूल है । कृषि की उपजाऊ जमीन उद्योगों को दी गई और जमीन का बड़ा हिस्सा कृषि से दूर हो गया । उत्पादन की कमी के कारण अनाज की कमी अनुभव की जाने लगी । सारी बातों का समग्र विचार किये बिना हरित क्रांति के नाम पर रासायनिक खेती को बढ़ावा दिया गया । युरोप अमेरिका में वर्जित रसायनों को बड़े जोर-शोर से हमारे देश में अपनाया गया तथा इस कृत्रिम उपाय से उत्पादन बढ़ाया गया । इस कदम के समय दूरगामी दुष्परिणामों का विचार नहीं किया गया । कुछ समय के लिये उत्पादन तो बढ़ गया किन्तु रसायनों के अंधाधुंध उपयोग से जमीन की उत्पादकता कम होगी इस तथ्य को जानबूझकर दुर्लक्षित किया गया।
आज देश के अनेक भागों में रासायनिक खेती के कारण जमीन बंजर हो रही है और उपज कम हुई है । साथ ही ओजोन कवच को भी क्षति पहुंची है । जमीन की गरमी बढ़ने के कारण इसका उत्पाद पर असर हुआ । जहाँ सिंचाई की व्यवस्था नहीं थी वहाँ जमीन कठोर हो गई, हल चलाना भी असम्भव हो गया । किसान कर्ज के बोझ तले दब गया । समय पर कर्ज ना भर पाने के कारण ब्याज व मूल के बढ़ाते भस्मासुर के चलते किसानों को आत्महत्या के अलावा कोई मार्ग नहीं बचा । अनेक गरीब किसानों ने आत्महत्या की । इस परिस्थिति में से मार्ग निकालना हो तो किसानों को कम लागत वाली जैविक कृषि का सहारा लेना होगा । इसमें भी खतरा मुंह बाहे खड़ा है । जैविक खेती के प्रचार के साथ ही जैविक खाद के भी कारखाने चल पड़े हैं और इन कम्पनियों के खाद व कीटनाशक रासायनिक खाद व कीटनाशक से महंगे दर पर बेचे जाते हैं । इस प्रकार बाजारू ताकतों ने इस उपाय को भी किसानों के शोषण का साधन बना लिया । यदि वास्तव में लाभकारी व कम लागतवाली खेती करनी हो तो गो आधारित कृषि ही अपनानी होगी । हमारा किसान परम्परागत रूप से अनेक सदियों से गो आधारित खेती करता रहा है । यदि प्रत्येक किसान गोपालन कर गोमुत्र व गोबर खाद का उपयोग खेती में करने लगे तो कम लागत की लाभकारी खेती सम्भव है । लेखक का स्वयं का गत ८ वर्षों का यह प्रत्यक्ष अनुभव है । उस अनुभव पर आधारित कुछ सरल, लाभदायक, स्वावलम्बी उपाय नीचे दिये जा रहे हैं । जिनका प्रयोग कर सभी किसान अपनी लागत को कम कर अधिक लाभ की उत्पादक खेती कर सकते हैं । 
१. नीम सबसे सहज उपलब्ध वृक्ष है । नीम के पत्तों का प्रयोग कर अत्यन्त प्रभावी कीटनाशक बनाया जा सकता है । नीम के पत्ते एक मिट्टी के घड़े में गोमुत्र में भिगोये जाते हैं । घड़े को जमीन में गाड़ कर कपड़े से उसका मुंह बन्द किया जाता है । २१ दिन इस प्रकार रखने से जो द्रव्य तैयार होता है वह कीटनाशक के रूप में प्रयोग किया जाता है । फसल पर छिड़कते समय इसे पानी में तरल कर उपयोग में लिया जाता है ।
२. नीम के बीज-निमोणी को पीसकर उसका प्रयोग खाद के रूप में किया जा सकता है । इसका खेत में पाँच वर्ष तक सतत प्रयोग करने के बाद फिर उस खेत में खाद की आवश्यकता ही समाप्त हो जाती है ।
३. जमीन जोतने से पूर्व अमृत-जल का प्रयोग करने से उपज के लिये आवश्यक व उपयोगी जीव जमीन में पनपते हैं । अमृत-जल बनाने की विधि अत्यन्त सरल है । २० किलो गोबर, ५ से १० लीटर गोमुत्र, एक किलो बेसन, एक किलो काला गुड न मिलने पर कोई भी गुड, २०० लीटर पानी में आठ दिन तक भिगोकर रखें । यह २०० लीटर अमृत-जल एक एकड़ के लिये पर्याप्त होता है । गोबर व गोमुत्र देसी गाय का होने से अधिक प्रभाव देखा गया है ।
४. केवल गोमुत्र को भी कीटनाशक के रूप में उपयोग में लिया जा सकता है । छिड़कने से पूर्व गोमुत्र को तरल किया जाता है । देसी गाय के १ लीटर गोमुत्र को ८ लीटर पानी में मिलाकर प्रयोग किया जाता है । गोमुत्र के माध्यम से नैसर्गिक युरिया भी मिलने से कीटनाशक के साथ ही खाद के रूप में भी यह छिड़काव उपयोगी होता है ।
५. गोमुत्र के साथ नीम का तेल प्रयोग करने से भी कीट को भगाया जा सकता है । २ लीटर गोमुत्र में १४ लीटर पानी तथा ५० ग्राम नीम का तेल मिलाकर छिड़काव किया जाता है।
६. सिंचाई के समय पानी के साथ गोमुत्र प्रवाहित करने से खाद के रूप में उपयोग होता है ।
इन उपायों अलावा कुछ किसानों में लहसुन, मिर्च के द्वारा भी कीटनाशक के रूप में प्रयोग किया है । तम्बाकू के पानी का छिड़काव कीटनाशक के रूप में तथा बचे तम्बाकू के थोथे का प्रयोग खाद के रूप में किया जाता है । केवल गोमुत्र, गोबर से लगभग बिना लागत के जैविक कृषि के द्वारा उत्पादन में स्थायी वृद्धि कर लाभ की खेती की जा सकती है।
इन सब उपायों के साथ ही संकरित तथा रासायनिक प्रक्रिया से प्रसंस्कारित बीजों के स्थान पर स्वयं की उपज से रक्षित बीजों का प्रयोग अधिक लाभकारी होता है ।
– मुकुंद दामोदर कानिटकर
९८, सरस्वती ले आउट, दीनदयालनगर, नागपुर ।

सितम्बर 22, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , | 1 टिप्पणी

…स्वप्न साकार होता देखें !


 ‘‘अमेरिका निवासी मेरी प्यारी बहनों तथा भाइयों” ११ सितम्बर १८९३ को शिकागो के कोलम्बस हॉल में स्वामी विवेकानन्द के इन शब्दों ने मानों चमत्कार कर दिया । ३००० से अधिक श्रोता स्वयंस्फूर्त खड़े  हो गये । कुछ कूदकर मंच पर चढ़ गये । सभी एक क्षण में अपने सगे से प्रिय बने इस युवा संन्यासी के निकट जाना चाहते थे । कुछ उन्हें छूना चाहते थे । सभी उन्हें अपने हृदय में बसा चुके थे । उन शब्दों में नाविन्य नहीं था । अनुसंधान बताते हैं  कि स्वामीजी से पूर्व उसी सभा में ४ और वक्ताओं  ने भातृत्व भाव वाले इस संबोधन का प्रयोग किया था । क्या सभी को ऐसा प्रतिसाद श्रोताओं से मिला ? निश्चित ही नहीं । स्वामीजी के शब्दों ने नहीं भावों ने केवल श्रोताओं का ही नहीं पूरी अमेरिका का दिल जीत लिया था । भगिनी निवेदिता लिखती हैं  कि वे तो बन्धुत्व की प्रतिमूर्ति बन गये थे । वहां विद्यमान प्रत्येक को लगा उनका सबसे निकट व्यक्ति उनसे बात कर रहा है ।
अमेरिका का वह श्रोता समाज जो केवल हठधर्मिता का दावा ही सुनते आया था, उन्होंने प्रथमत: स्वामी विवेकानन्द के द्वारा धार्मिक एकता का संदेश सुना था ।  उन्होंने कहा था कि शुद्धता, पवित्रता और दयाशीलता किसी सम्प्रदाय विशेष की एकान्तिक सम्पत्ति नहीं है एवं प्रत्येक धर्म ने श्रेष्ठ एवं अतिशय उन्नत-चरित्र के स्त्री-पुरुषों को जन्म दिया है। अब इन प्रत्यक्ष प्रमाणों के बावजूद भी यदि कोई ऐसा स्वप्न देखे कि अन्यान्य सारे धर्म नष्ट हो जायेंगे और केवल उसका धर्म ही जीवित रहेगा, तो उस पर मैं अपने हृदय के अंत:स्थल से दया करता हूँ और उसे स्पष्ट बता देता हूँ कि शीघ्र ही सारे प्रतिरोधों के बावजूद, प्रत्येक धर्म की पताका पर यह स्वर्णअक्षरों में लिखा होगा- ‘युद्ध नहीं, सहायता’, ‘विनाश नहीं, सृजन’, ‘कलह नहीं, शांति’ और ‘मतभेद नहीं, मिलन’ |
पहली बार स्वामी विवेकानन्द के रूप में पश्चिमात्य श्रोता समाज ने विश्वबंधुत्व का संदेश उचित समय पर सही परिप्रेक्ष्य में समझा। इसलिये विवेकानन्द केन्द्र के संस्थापक श्री एकनाथजी रानडे यह चाहते थे कि यह दिन ‘विश्वबंधुत्व दिन’ के रूप में मनाया जाये। बनावटी एकता अपने व्यक्तित्व और परम्परागत मूल्यों को नष्ट करती है। किन्तु एकात्मता विविध समुदायों की विशेषताओं को कायम रख कर बंधुत्व के सूत्र में बांधती है। इसलिये इस दिन का संदेश उनके लिये भी है जो हठधर्मी है और मतान्तरण के माध्यम से विविध जनजाति समुदायों की मान्यताओं और संस्कृति को नष्ट करते हैं। अपने दर्शनों और सर्व समावेशक दृष्टि के कारण ही नियति ने भारत को बंधुत्व स्थापित करने के लिए चुना है। परंतु इस दायित्व को निभाने के लिए हमें इस धार्मिक एकात्मभाव को समझना होगा।
स्वामीजी के विश्वबंधुत्व के इस दिग्विजयी मर्म को हम तब समझ पायेंगे जब हम यह जानेंगे कि उससे पूर्व लगभग एक माह तक अमेरिका में स्वामीजी ने किस प्रकार के कष्ट और अपमान को सहा था । अपने सामान को खोने के बाद भूख और ठंड से पीडित स्वामीजी को कहीं भी कोई सहायता न मिली । बोस्टन में भी जिस माँ ने आश्रय दिया वह भी उनका अपनी मित्रों के मनोरंजन के लिए और एकाकी जीवन की उब मिटाने के लिये प्रदर्शन करती थीं । स्वामीजी अपने भारतीय शिष्यों और गुरुभाइयों को लिखे पत्रों में अपने कष्ट का हृदयविदारक वर्णन करते हैं | उनसे पैसे भेजने का अनुरोध करते हैं । भारत में संन्यासी को जिस सम्मान एवं आदर के साथ देखा जाता है उसके पूर्ण विपरीत वहाँ स्वामीजी को उनके वेष, उच्चारण एवं काले होने के लिए पग-पग पर अपमानित किया जाता रहा । किन्तु वे टूटे नहीं । लक्ष्य से विचलित भी नहीं हुए । सभी संकटों का धैर्य के साथ, ईश्वर पर पूर्ण आस्था रखते हुये सामना किया । भौतिक व शारीरिक दोनों चुनौतियों को श्रद्धापूर्वक स्वीकार करते हुए पार पाया ।
विश्वधर्म सभा के एक दिन पूर्व उन्हें ना तो भोजन प्राप्त हुआ और ना ही नींद । मिली तो केवल झि‹डकियाँ और उपहास । जिन अमेरिकावासियों ने उन्हें – ‘You Nigger ‘ और ‘Away black dog’ कहकर अपमानित किया था उन्हीं को उन्होंने न केवल क्षमादान दिया अपितु हृदय के तल से स्नेह प्रदान कर बहन व भाई के रूप में संबोधित किया । इससे बड़ा वीरत्व का उदाहरण क्या होगा ? ध्यान से देखा जाये तो स्वामीजी का यह धैर्य अंगुलीमाल को परिवर्तित करने वाले बुद्ध अथवा अपने हत्यारों को क्षमा करने वाले ईसा से कई गुना श्रेष्ठ है । उन दोनों महापुरुषों के तो केवल देह को ही ललकारा गया था । स्वामीजी ने तो शरीर, मन ही क्या आत्मा तक को विदीर्ण करने वाले कष्टों के बाद भी उस समुदाय के प्रति लेशमात्र भी द्वेष नहीं रखा । यही तो वीरता है ।
काशीपति विश्वनाथ के प्रसाद स्वरूप जन्मे स्वामी विवेकानन्द का नामकरण शिवजी के ही नाम वीरेश्वर से किया गया । उन्होंने अपने जीवन के संघर्ष पर विजय से और उससे भी अधिक इस संघर्ष के मध्य भी हृदय की उदारता से इस नामकरण को सार्थक किया । वर्तमान समय में जब भारत माता के सपूत पूरे विश्व को जीतने चल पडे हैं,  ऐसे युवाओं को स्वामीजी से प्रेरणा लेकर इस वीरव्रत को धारण करना होगा । इसी हेतु हम जरा वीरता के आयामों को विस्तार से समझने का प्रयत्न करते हैं।
१. ध्येय निश्चित करना : कन्याकुमारी की समुद्र मध्य शिला पर भारत के अतीत, वर्तमान और भविष्य के दर्शन करने के बाद हिन्दू राष्ट्र के जागरण को ही स्वामी विवेकानन्द ने अपना जीवनध्येय बनाया । उनका शिकागो अभियान भी भारत के पुनर्जागरण का ही अंग था । हम भी वीरता से जीवनध्येय चुनें, व्यक्तिगत नहीं अपितु राष्ट्रीय ।
२. हिमालय सदृश्य कठिनाइयों में भी ध्येय को न भूलना : मद्रास में यात्रा व्यय के निधि-संकलन से लेकर धर्मसभा में प्रवेश तक सैकडों प्रसंग ऐसे हैं जहाँ थोडा भी दीन हृदय व्यक्ति ध्येय छोड देता या समझौता कर लेता । किन्तु स्वामीजी डटे रहे । यही तो व्रत का लक्षण है । क्षणिक वीरत्व तो प्रसंगवश सामान्य व्यक्ति भी दिखाता है किन्तु आज आवश्यकता है वीरव्रतधारियों की जो विकट से विकटतम स्थितियों में भी लक्ष्य से न डिगें । जिस पत्र में स्वामीजी अपने कष्ट का वर्णन करते है उसी में यह भी लिखते हैं कि भारत के जागरण हेतु ऐसे संगठन की आवश्यकता है जिसमें लाखों युवक-युवतियाँ देश के कोने-काने में जाकर सेवाकार्य करेंगे ।
३. श्रद्धा : नचिकेता के समान मृत्यु का सामना करने की श्रद्धा ही स्वामीजी को हर परिस्थिति में विजय दिलाती है । आत्मश्रद्धा अर्थात अपने दिव्यत्व पर श्रद्धा, ईशश्रद्धा और शास्त्र श्रद्धा अर्थात धर्म के मार्ग पर श्रद्धा यह वीरता के अनिवार्य घटक हैं । हिन्दू जीवनपद्धति की वैज्ञानिकता पर स्वामीजी को इतनी श्रद्धा है कि वे इसके विपरीत कोई बात सहन ही नहीं कर सकते । विदेशों में ईसाई मिशनरियों द्वारा हमारे धर्म के बारे में फैलाये भ्रम का वे आक्रमक प्रखरता से खंडन करते हैं । ईसाइयों द्वारा आयोजित धर्मसभा में भी मतांतरण का स्पष्ट विरोध करते हुए कहते हैं कि भारत में मिशनरी भेजने की आवश्यकता नहीं है । एक अध्ययन के अनुसार स्वामीजी के अमेरिका भ्रमण के बाद मिशनरियों को मिलने वाली आर्थिक सहायता घटकर १० प्रतिशत रह गई थी । लोग कहने लगे ‘‘ऐसे महान देश में धर्मप्रचार की क्या आवश्यकता ?”
४. हृदय की विशालता : वीरेश्वर विवेकानन्द का जीवन इसका उदाहरण है । संकीर्ण अमेरिकावासियों को अपनाना हो, या ककडीघाट के फकीर को स्मरण करना हो, अथवा राजस्थान में चर्मकार के स्नेहभोज का पान हो, या राज गायिका से पाठ प‹ढने के बाद उससे क्षमा मांगना हो, स्वामीजी का जीवन विश्व को समेटने की क्षमतावाले विशाल हृदय की ही तो गाथा है ।
५. संवेदना : विश्व के प्रति प्रेम से भी बढ़कर है स्वामीजी का देशप्रेम । यश और कीर्ति के परमोच्च शिखर पर भी वे भारत के वंचितों को नहीं भूले । वहाँ की चकाचौंध में भी वे भारत के सर्वांगीण उत्थान का ही विचार करते । छत से शिकागो की रंगीन शाम देखते हुए उनके मन में आता है मेरा भारत कब ऐसे वैभव को पुन: पा लेगा ? सुविधापूर्ण आतिथ्य के मध्य भी उनका हृदय अपने दीन-दुखी बांधवों के लिये रोता था । आज हमारे युवाओं में इसी संवेदना की आवश्यकता है । एक ओर हम विश्व के सर्वाधिक धनाढ्य लोग तैयार कर रहे हैं, दूसरी ओर ऋण में डूबा किसान आत्महत्या को विवश हो रहा है । संसाधन तो अगाध हैं, आवश्यकता है तो केवल वीर हृदय संवेदना की । केवल शाब्दिक सांत्वना से काम नहीं चलेगा । स्वामीजी ललकारते हैं, ‘‘मैं उसे ही महात्मा मानता हूँ जिसका हृदय दूसरों के लिये रोता है अन्यथा वह तो दुरात्मा है ।”
६. संगठन : ऐसे वीरों को संगठित होने की आवश्यकता है । उस हेतु अपने व्यक्तिगत अहं, सुविधा और स्वार्थ को समष्टि के हित में तिरोहित करने की तत्परता भी वीरता का अनिवार्य लक्षण है । स्वामीजी ने सबको साथ लेकर संन्यासियों को संगठित करने का दुष्कर कार्य कर दिखाया । स्वयं को खपाकर भी इस संगठन को दृढ़ किया । आइये, हम शिकागो व्याख्यान की १२१वीं वर्षगांठ पर स्वामीजी की प्रेरणा से वीरव्रत का संकल्प लें । रामेश्वर के समुद्र किनारे दिये उनके ही संबोधन को याद करें – ‘‘सुदीर्घ रजनी अब समाप्त हो रही है । यह भारत अब जाग उठा है । दृष्टिहीन देख नहीं सकते, विक्षिप्त-बुद्धि समझ नहीं पाते किन्तु यह सुप्त तिqमगल अब जाग उठा है ।”
एक तरफ हमारे देश में तुष्टीकरण और अलगाववाद की राजनीति चल रही है तो दूसरी ओर भ्रष्टाचार और बेईमानी से कमाने वाले लोगों की संख्या में बढोतरी हो रही है । भौतिक सुखों की प्राप्ति के लिए लोग प्रकृति और मानवता के सारी मर्यादाओं को लांघने से भी नहीं चुकते । ऐसी परिस्थिति में आज स्वामी विवेकानन्द के विचारों को समाज के प्रत्येक वर्ग तक ले जाने की आवश्यकता है ।  स्वामी विवेकानन्द  ऐसे राष्ट्र की रचना करना चाहते थे जहां के निवासी लोहे की मांसपेशियाँ और फौलाद के स्नायु वाले हो, जो सिंह के पौरुष से युक्त, परमात्मा के प्रति अटूट निष्ठा से सम्पन्न और पवित्रता की भावना से उद्दीप्त हो । ऐसे वीरव्रति युवाओं के दृढ़ निश्चय से ही भारत परम वैभव को प्राप्त करेगा ।
आनेवाले वर्ष में स्वामी विवेकानन्दजी की १५० वीं जयन्ती है । स्वामीजी के इस सार्ध शती के अवसर पर उनके विचारों पर कार्य करनेवाले युवाओं के निर्माण के लिए निश्चित समय देने वाले लोगों की आवश्यकता है । आइये, अपने तीव्र तप से वीरता का नया अध्याय लिखें और निश्चित समयदान कर इसी जीवन में भारत माता को विश्वगुरु बनाने का स्वप्न साकार होता देखें ।

सितम्बर 12, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | 3 टिप्पणियाँ

   

%d bloggers like this: