उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

या देवी सर्वभूतेषु धर्मरूपेण संस्थिता . . .


आज ललिता पंचमी है| आइये स्वाध्याय करें|

गत वर्ष लिखा एक और आलेख सदर ……

या देवी सर्वभूतेषु धर्मरूपेण संस्थिता . . ..

अक्टूबर 20, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | टिप्पणी करे

या देवी सर्व भूतेषु संघ रूपेण संस्थिता ||


गत वर्ष नवरात्रिपर यह लेखमाला लिखी थी| साधकों के लिए पुनः समर्पित है|

या देवी सर्व भूतेषु संघ रूपेण संस्थिता ||.

अक्टूबर 17, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | टिप्पणी करे

अहिंसा वीरों का व्रत है ।


गत माह असम के तीन जिलों में हिंसा का ताण्डव हुआ। सारा देश जानता है कि अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों द्वारा स्थानीय लोगों की जमीनों का कब्जे तथा जनसांख्यकीय असंतुलन के कारण यह भयावह स्थिति निर्माण हुआ। गत ३०-४० वर्षों में नियोजित रूप से बांग्लादेश से भारत में घुसपैठ जारी है । सरकारी अनुमान के अनुसार भी २ करोड़ से अधिक अवैध घुसपैठी भारत में रह रहे हैं। विशेषज्ञों के निजी अनुमान के साथ ही असम के पूर्व राज्यपाल जनरल सिन्हा द्वारा भारत के राष्ट्रपति को लिखे पत्र में यह कहा गया कि भारत में अवैध बांग्लदेशियों की संख्या ५ करोड़ के निकट है। सभी राज्यों में ये लोग पहुंच चुके हैं। किन्तु असम व पश्चिमी बंगाल के उत्तरी जिलों की स्थिति सर्वाधिक विकट है। जनसंख्या के इस अवांछित दबाव के कारण जहाँ एक ओर आर्थिक संसाधनों पर विपरीत परिणाम हो रहा है वही दूसरी ओर सांस्कृतिक सौहार्द में भी तनाव बढ़ता रहा है। जनगणना के आंकड़ें बताते हैं कि अनेक ग्रामों से स्थानीय हिन्दू जनता का पलायन हो रहा है। असम में हुए दंगों ने घुसपैठ की इस विघातक वस्तुस्थिति को देश के सामने उजागर किया। संसद में सभी दलों ने अपने मतभेदों को भूलाकर समस्या के भयावह स्वरूप को अधोरेखित किया। असम के मुख्यमन्त्री ने घोषणा की कि अवैध विदेशी नागरिकों की पहचान कर उन पर कार्रवाई की जायेगी। 
किन्तु सारे एकमत में खटास तब पड़ी जब हैद्राबाद के सांसद ने धमकी दे दी कि यदि विदेशी बांग्लादेशियों पर कार्रवाई की गई तो भारत का एक विशिष्ट समुदाय आतंकी बन जायेगा। इस विभेदकारी घोषणा ने समस्या को साम्प्रदायिक स्वरूप प्रदान कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि म्यान्मार व असम में घुसपैठ के विरोध में मुम्बई के आझाद मैदान में एक समुदाय के लोगों ने प्रदर्शन किया। संयमित पुलिस के विरूद्ध हिंसा का प्रयोग हुआ। सरकारी वाहनों के साथ ही प्रसार माध्यमों के वाहनों को भी जलाया गया। शहीद स्मारक को क्षति पहुँचाई गई। इसी हिंसा को आतंक के रूप में प्रयोग किया गया। अनाम लोगों द्वारा प्रसारित धमकियों के कारण पूर्वोत्तर के भाइयों को देश के अनेक नगरों से अपने घर की ओर वापसी करनी पड़ी। आंदोलनकारियों के हिंसक रवैये के कारण देश की सम्प्रभुता से जुड़े संवेदनशील मसले को साम्प्रदायिकता का रूप प्रदान कर दिया।
सामूहिक मानस में हिंसा के प्रति झुकाव बढ़ता हुआ ही दिख रहा है। अनेक आंदोलनों में इस प्रकार की असहिष्णु घटनाओं को देखा गया है। गुडगाँव में मारुति कारखाने के श्रमिकों के आन्दोलन में प्रबन्धन के प्रति इतनी हिंसा प्रगट हुई कि एक वरिष्ठ प्रबन्धक को जिन्दा जलाकर मार दिया गया। ओडिसा में एक आंदोलन में महिला पुलिस को अत्यन्त क्रूरता से मारा गया। वाहनों को जलाना तो हर आंदोलन की आम बात हो गई है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भरपूर प्रसिद्धि पाने के लिये इस प्रकार के दृश्यों को दोहराया जाता है । समाज में बढ़ती हिंसा केवल सामूहिक मानस ही नहीं है। व्यक्तिगत जीवन में भी हिंसा की घटनायें बढ़ रही हैं। सडकों पर क्रोध के प्रसंग रोज घटित हो रहे हैं। केवल अपने से अधिक गति से जानेवाला वाहन आगे बढ़ गया इस क्रोध से लोग हत्या तक कर देते हैं। घरों के अन्दर हिंसा की घटनायें बढ़ रही हैं। माता-पिता बालकों के छोटे से व्यवहार पर इतने अधिक क्रुद्ध हो जाते हैं कि उनको भयावह तरीके से दण्डित करते हैं। कई प्रसंगों में मरणांतक हमले हुए हैं। गत सप्ताह एक बालक को उसके शिक्षक ने इतनी दयाहीनता से पीटा कि उसका सिर फट गया। 
समाज में बढ़ती हिंसा के कई कारण है किन्तु सबसे मूल में है धारणा के स्तर पर भ्रम। अहिंसा के गलत अर्थ के कारण हम समाज में इस मूलभूत मूल्य को प्रस्थापित करने में असफल रहे हैं। अहिंसा के नकारात्मक अर्थ ने नई पीढ़ी को इसके मूल से दूर किया। आधुनिक समय में अहिंसा को प्रतिष्ठा प्रदान करनेवाले गांधी, विनोबा जैसे नेताओं ने अहिंसा को नकारात्मक रूप में परिभाषित किया था। ‘ हिंसा  ना करना ‘ अहिंसा का सही अर्थ नहीं है । अहिंसा कमजोरी अथवा अकर्मण्यता नहीं है अपितु एक वीर का व्यवहार है। भगवान महावीर ने भी अहिंसा के प्रतिष्ठित होने को ही वीरता का लक्षण बताया था। इस वीरता का अभाव ही क्रोध को जन्म देता है और उसी से हानी होती है। कलिंग के युद्ध के बाद प्रचण्ड प्राणहानी से विचलित सम्राट अशोक ने अहिंसा के सीमित अर्थ को अपनाया तथा उसे राजनयिक संरक्षण प्रदान कर समाज में कायरता का भ्रम स्थापित किया। गीता के प्रथम अध्याय में अर्जुन को यही भ्रम ग्रसित कर रहा है। किन्तु भगवान श्रीकृष्ण ने कर्म के योग का प्रतिपादन कर अर्जुन को युद्ध के धर्म का पालन करने के लिये तत्पर किया। आज अशोक का मानसिक भ्रम पूरे समाज का भ्रम बन चुका है जिसकी प्रतिक्रिया के रूप में व्यक्तिगत तथा सामाजिक जीवन में हिंसा बढ़ रही है। अत: अहिंसा के वास्तविक अर्थ को समाज में पुनर्स्थापित करना अनिवार्य है।
अहिंसा की व्युत्पत्ति अ-हिंसा ना होकर अहिं- सा है। इस भेद को समझने से ही इसकी सकारात्मक परिभाषा हो सकती है। सारी सृष्टि में एक व्यवस्था स्थापित है। जीवन एक चक्र के रूप में कार्य करता है। गीता के तीसरे अध्याय में इस चक्र का वर्णन किया है। सारे प्राणी अन्न के द्वारा जीवित रहते हैं। अन्न पर्जन्य अर्थात वर्षा के कारण उपजता है। सृष्टि में ऊर्जा को संतुलित रखने के लिये त्याग करने से ही ॠतुचक्र व्यवस्थित रहता है। इसे गीता में ‘यज्ञ’ कहा गया है। इस यज्ञकर्म से कर्म ब्रह्म से और ब्रह्म परमात्मा से प्रेरित है। इस प्रकार पूरे चक्र को ही जीवन कहा जाता है। हम अपने जीवित रहने के लिये इस चक्र में बाधा डालते हैं। मानव अपनी कर्म स्वतन्त्रता के कारण वह सर्वाधिक विनाश करता है। अत: उसे प्रयत्नपूर्वक सृष्टि के जीवनचक्र को प्रस्थापित करने के लिये कर्म करना पड़ता है। इस कर्म को अहिंसा कहते हैं । ‘अहिं’ अर्थात सुचारू  और  ‘सा’ का अर्थ है- बनें । तो जीवनचक्र को सुचारू करने का नाम अहिंसा है । इस अर्थ को समझने से मानव मानव से, मानव समाज से, राष्ट्र से और समूची मानवता तथा प्रकृति से भी सामंजस्य के लिये, जो भी पराक्रम करता है वह सब अहिंसा के आचरण में आयेगा । अत: प्रात: माता-पिता के चरण स्पर्श करना, पेड़ों को जल तथा गाय आदि पशुओं को अन्न देना सब अहिंसा के कार्य हैं। वास्तव में अहिंसा एक जीवनशैली है।
इसे जीवनमूल्य के रूप में समाज में प्रतिष्ठित करने के लिये कुछ पूरक मूल्यों को संजोना आवश्यक है। अहिंसा का पहला तत्व है- संवेदना। प्रत्येक के प्रति आत्मीयता के अनुभव से ही संवेदना जगती है। जब हम सबको अपने समान देखते हैं तब उनका कष्ट भी अपना हो जाता है। स्वामी विवेकानन्द विदेशों में सब सुविधाओं के मध्य भी अपने विपन्न बान्धवों का स्मरण कर रोते थे। यह संवेदना ही वीर के मन में अनुकम्पा का निर्माण करती है जो उसे सबके हित में कर्म करने के लिये प्रवृत्त करती है। संवेदनशील हृदय ही सुबह उठते ही धरती का पैरों से स्पर्श करने के लिये उससे क्षमाप्रार्थना करता है। दूसरा मूल्य है- सहनशीलता। जैसे, सब द्रव्यों के उबलने का एक तापमान होता है उसी प्रकार प्रत्येक के सहन करने की भी सीमा होती है। हमारे तप से हम इस सीमा को किसी भी हद तक बढ़ा सकते हैं। सहनशील व्यक्ति अन्याय का प्रतिकार अधिक शक्ति के साथ कर सकता है। वह अन्याय को सहन नहीं करता किन्तु उसका शिकार भी नहीं बनता। हम शिकार हैं, शोषित हैं, वंचित हैं, यह मानसिकता ही हिंसा को जन्म देती है। इस शिकार मानसिकता का व्यक्ति बड़ा ही कमजोर होता है और अपनी शक्तिहीनता को छिपाने हिंसा का आधार लेता है।
सर्वसमावेशकता का मूल्य भी सामूहिक स्तर पर  अहिंसा के पालन के लिये आवश्यक है। बढ़ती हुई मतांधता व कट्टरता के कारण हम भेद को स्वीकार नहीं कर पाते हैं। इस कारण मानव मानव के बीच के सुचारू जीवनचक्र को तोड़ देते हैं। अत: हम विविधता के उत्सव के द्वारा सबको स्वीकार करने की मानसिकता को जन्म दे सकते हैं। इसी से समाज के स्तर पर अहिंसा के वीरव्रत का पालन सम्भव है। भारतीय संस्कृति सबके अन्दर के वैविध्य को स्वीकार करती है। केवल अलग दिखने के लिये किसी को नकारती नहीं। इसी कारण विश्व को एक कुटुम्ब के रूप में देखने का साहस एक सच्चा हिन्दू कर सकता है। अहिंसा वीरों का व्रत है, अत: साहस के बिना इसका निर्वाह सम्भव नहीं है। स्वयं की क्षमता में आत्मविश्वास के साथ ही प्रयोगधर्मिता से साहस की समाज में वृद्धि हो सकती है। साहसी व्यक्ति ही वास्तव में अहिंसा का पालन कर सकता है। समाज का साहस टूट जाता है तब वह अकरणीय उपायों का अंगीकार करता है। अत: व्यक्तिगत जीवन के साथ ही सामूहिक जीवन में भी साहस का संस्कार अqहसक जीवन पद्धति के लिये अनिवार्य है। अहिंसा वीरों की जीवनशैली है जिसका उद्देश्य सबके कल्याण का होता है।

अक्टूबर 2, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी, Uncategorized | , | 7 टिप्पणियाँ

   

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