उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

सदाचार अर्थात सेवा में पहले मै और सुविधा में पहले आप!


गढ़े जीवन अपना अपना -19

राजा की सवारी निकली थी। आगे आगे सेना की एक टुकड़ी मार्ग में आनेवाले लोगों को रोककर मार्ग खाली करने के काम पर लगी थी। एक महात्मा बीच रास्ते में बैठे थे। अपनी ही मस्ती में थे। एक सैनिक उनके पास जाकर चिल्लाया, ‘‘उठो! रास्ता खाली करो!! राजा की सवारी आ रही है।’’ महात्मा हटे नहीं और उस सैनिक से पूछा, ‘‘तूम कौन हो?’’ अपना गणवेष दिखाकर बोला, ‘‘मूझे नहीं जानते? मै राजा की विशेष रक्षा वाहिनी का सिपाही हूँ। हटो!    नहीं तो. . .’’ महात्मा ने मुस्कुराकर कहा, ‘‘तभी’’। सिपाही कुछ समझा नहीं, अपने सुभेदार को ले आया। सुभेदार अकड़कर बोला, ‘‘ना जाने कहाँ कहाँ से आ जाते है भीखमंगे? अरे इतनी सी बात नहीं समझते, राजा की सवारी आ रही है। फूटों यहाँ से! दीखना मत कही आसपास भी।’’ महात्मा ने फिर पुछा, ‘‘तुम कौन?’’ सुभेदारी का परिचय पाकर फिर वही टिप्पणी की, ‘‘तभी!’’ जब महात्मा फिर ध्यानमग्न हो गये और राह से ड़िगे नहीं तो सेनापति आया। ठसन तो थी पर भाषा सभ्य थी, ‘‘महात्माजी हमारी विवशता को समझे, आप नहीं हटेंगे तो राजा की सवारी में विघ्न आयेगा। कृपया राह दें।’’ महात्मा ने फिर परिचय मांगा और परिचय पाने पर फिर वही, ‘‘तभी!’’ अब मंत्री की बारी थी मन्त्री ने प्रणाम कर बड़ी विनम्रता से राह छोड़ने की प्रार्थना की। राजा के गन्तव्य का महत्व भी बताया और राष्ट्रीय आवश्यकता की भी दूहाई दी। महात्मा ने मुस्कुराकर परिचय पूछा। पता चलने पर फिर, ‘‘तभी!’’ अब बात राजा तक पहुँची। महात्मा है कि हटता नहीं और केवल ‘तभी’ ‘तभी’ कहता है। राजा ने रथ से उतरकर साष्टांग दण्डवत किया और महात्मा का आशिर्वाद मांगा। कहा, ‘‘मै राह बदलकर चला जाउंगा पर जिस कार्य पर जा रहा हूँ उसकी सफलता का आशिष दें।’’ महात्मा केवल मुस्कुराये और परिचय पुछा। राजा ने उत्तर दिया, ‘‘महाराज प्रजा का सेवक हूँ। धर्म के अनुसार राज्यपालन का दायित्व है।’’ महात्मा मुस्कुराये और आशिर्वाद का हाथ उठाकर बोले, ‘‘तभी!’’

राजा मार्ग बदलकर आगे बढ़ा। रथ में साथ विराजमान राजगुरु से बोला, ‘‘इस ‘तभी’ का क्या रहस्य है?’’ राजगुरु ने समझाया, ‘‘अपने आप में तो ‘तभी’ कुछ नहीं कहता पर उसके पूर्व के विधान के साथ जोड़कर देखे तो पता चलेगा। सिपाही हो ‘तभी’। सुभेदार हो ‘तभी’। सबके स्तर के अनुसार उनके व्यवहार पर यह टिप्पणी थी। राजन् महात्मा ने अपने ‘तभी’ से सदाचार पर भाष्य किया है। व्यक्ति का शील ही उसका वास्तविक परिचय है। यह शील उसके व्यवहार में झलकता है। आप राजन् है, विनम्रता और सेवाभाव आपका शील है। ‘तभी’ ! इसको उलटा देखने से भी बड़ी शिक्षा मिलती है। उद्दण्ड व्यवहार है तभी केवल सिपाही हो। ठसन है तभी सुभेदार हो। विनम्रता है पर पूर्ण अधिकार नहीं तभी मंत्री हो।’’ राजा मन ही मन गुनगुनाता रहा ‘तभी’।

हमको भी अपने जीवन का ‘तभी’ समझना होगा। अपने व्यवहार का सदा अवलोकन करते रहना होगा। महात्मा जैसे स्पष्ट बोलनेवाले लोग तो मिलेंगे नहीं पर मन ही मन सभी कहेंगे ‘तभी’। और नियती तो कहेगी ही। हमारे शील से ही हमारे मार्ग प्रशस्त होंगे। हमारा आचरण ही हमारा परिचय है। शास्त्र कहते है, ‘‘आचार प्रभवो धर्मः’’। आचरण से ही धर्म जीवित रहता है। अतः हमारे शील को बनानेवाले हमारे राष्ट्रीय जीवनमूल्य हमारे व्यवहार में उतरेंगे तभी धर्म जागृत रहेगा। हम इस सदाचार के कुछ सूत्रो की चर्चा ही कर सकते है। पूरी सूचि बनाना ना तो व्यावहारिक है ओर ना ही आवश्यक। भारत में जन्मा हर व्यक्ति सुशील होने का मर्म तो जानता ही है। प्रयत्न भी करता है। संगती और तथाकथित आधुनिकता के चक्कर में भूल गया होगा तब भी कुछ संकेत मात्र संचित स्मृति को चलित कर शील को आचरण में लाने के लिये पर्याप्त होंगे।

सदाचार मनसा, वाचा, कर्मणा होता है। अपने विचार, वचन और व्यवहार तीनों में जीवनमूल्य परिलक्षित होने चाहिये। केवल दिखावे का सदाचार (Manners & Etiquette) अपेक्षित नहीं है। प्रशिक्षण से अपनाया बनावटी, दिखावे का व्यवहार तात्कालिक प्रभाव तो ड़ाल सकता है पर हृदय को जीतने की क्षमता तो अंतरमन से सुशील होने पर ही आयेगी।

मानव की एकात्मता का जीवनमूल्य सदाचार में परिलक्षित होता है बड़ों के सम्मान और आदर से, पशु-पक्षी पेड़-पौधों के प्रति अनुकम्पा से। जब हम उनमें भी अपने ही अंग होने की आत्मीयता का अनुभव करते है तब सबके साथ उसी आत्मभाव से व्यवहार भी करते है। राह चलते, बस-रेल में कहीं भी दुसरों की सुविधा का ध्यान रखनेवाला व्यवहार हो जाता है। अनावश्यक फूलों को तोड़ना, सहज ही मसल देना, राह चलते आवारा कुत्ते या बकरी को पीड़ा पहुँचाना ये सब स्वतः ही बन्द हो जाता है। पौधे के पत्ते तोड़ने के लिये बढ़ा हाथ किसी के द्वारा अपने कान उमेठने की वेदना को याद कर स्वतः ही रुक जाता है। अति की भी अपेक्षा नहीं है कि आवारा कुत्ते को ही घर ले आये और माँ को नाराज कर दिया। माँ से भी तो आत्मीयता है ना? उसके भाव को भी तो समझना है। फिर हमारे मन में उठी अनुकम्पा का क्या करें? सभी शहरों में आवारा पशुओं की देखभाल के लिये शासकीय और स्वयंसेवी दोनों प्रकार की व्यवस्था होती है। उसकी जानकारी प्राप्त करें और वहाँ तक सूचना पहुँचाये। पीछे पड़कर व्यवस्था होने तक अनुवर्तन करें। अब इतनी बात पर्याप्त है बाकि जब अपने पांव में ठोकर लगती है तो हम उपचार का मार्ग ढूँढ ही लेते है ना? तो जब यही आत्मीयता का भाव होगा तो उसे व्यवहार में उतारने के नव नवीन रास्ते स्वतः सर्जकता से खोज लेंगे।

आधुनिक जीवन में पर्यावरण से लेकर मनुष्यमात्र को जो सर्वाधिक हानी हो रही है वह ऊर्जा एवं अन्य संसाधनों के व्यर्थ जाया करने से हो रही है। हमारी पूरी जीवनशैली ही बिजली पर निर्भर हो गई है। अब हम इस जीवनचर्या को वापिस पूर्णतः प्राकृतिक मार्ग पर तो नहीं लौटा सकते। किन्तु, अस्तीत्व की एकात्मता के जीवनमूल्य को सदाचार में उतारते हुए इतना तो कर ही सकते है कि ऊर्जा की बचत के लिये हर सम्भव उपाय करें। छोटी छोटी आदतों से यह सम्भव है जैसे कमरा छोड़ते समय लाइट, पंखा बन्द करना, पानी का संयम से उपयोग करना आदि।

त्याग का जीवनमूल्य तो पग पग पर प्रगट होता है। हमने देखा था कि त्याग का कर्मरुप सेवा है। सेवा स्वतःस्फूर्त होनी चाहिये। शील प्रगट होता है पहल में। सामने कार्य देखकर स्वतः ही, बिना किसी के कहे, फुर्ति से हम उठ पड़े। आज्ञापालन तो करना ही चाहिये किन्तु घर आये अतिथि को पानी पिलाने के लिये हर बार माँ या पिताजी को आज्ञा देनी पड़े तो समझना होगा कि कुछ गड़बड़ है। ये तो सेवा के छोटे छोटे अवसर हैं इन्हें तो उत्साहपूर्वक हथियाना चाहिये। इससे पहले की अपने भाई या बहन में से कोई और काम करें, हमें कर लेना चाहिये। सच्चा सेवक तो वही होता है जो दरी बिछाने और उठाने में सहजस्फूर्त उत्साही हो। सेवामें सबसे आगे रहना तो ठीक है पर सुशील व्यक्ति सुविधा में ऐसी प्रतिस्पद्र्धा नहीं करता। वहाँ तो उसका मन्त्र होता ‘मै नहीं तू ही।’ विद्यालय में एकसाथ अवकाश होने पर पानी पीने के लिये झुम्बड़ लगती है। बस में से उतरते समय पता है सब उतरेंगे फिर भी धक्का देते है। सदाचारी छात्र तो पहले दूसरे को अवसर देंगे। स्वतः अनुशासन आ जायेगा।

सेवा में पहले मै और सुविधा में पहले आप।

नवम्बर 25, 2012 - Posted by | आलेख | , , , , , ,

3 टिप्पणियाँ »

  1. सही सिद्धाँत।

    टिप्पणी द्वारा sanjay @ mo sam kaun.....? | नवम्बर 25, 2012 | प्रतिक्रिया

  2. “Tabhi” Prayek ki liye. Bahu sunder, Sewa main pahle aur suvidha main aap, Jane anjane purane sanskaron ki punravrati. Padh kar bahut anad aaya.

    टिप्पणी द्वारा Pradeep | नवम्बर 26, 2012 | प्रतिक्रिया

  3. bahut achha or prerak ……

    टिप्पणी द्वारा indrajeet sharma | नवम्बर 30, 2012 | प्रतिक्रिया


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