उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

अनास्था से केवल आक्रोश ! आस्था से परिवर्तन !!


स्वामी विवेकानंद के राष्ट्र चिंतन के प्रथम दिन :
Del Road Rageप्रश्न आस्था का है । मनुष्य आस्था के बल पर कुछ भी चमत्कार कर सकता है । अनास्था से या तो निराशा जन्म लेती है या फिर विद्रोह । हम कहते है परिस्थितियों की विपरितता से अनास्था जन्म लेती है । कुछ हद तक ये बात भी कारक हो सकती हैं । किंतु आस्था तो संस्कारों का विषय है। यदि भावात्मक संस्कारों में पला मन हो तो विपरित से विपरित परिस्थिति में भी आस्था नहीं छोडता । आज समाज में अनास्था का वातावरण है । किसी पर ही आस्था नहीं बची । नेता, प्रशासक इन पर से तो पूरा ही विश्वास उड गया है । न्यायव्यवस्था पर बची खुची आस्था को भी कुछ लोगों के भ्रष्ट आचरण के प्रचार के कारण समाप्त हो गई है । जितना आज का युवा मानता है उतना निराशा की स्थिति नहीं है । आज भी सही पध्दति का धैर्य के साथ लगन से अवलम्बन किया जाय तो न्याय मिल सकता है । धर्म व संतों पर से भी सुनियोजित अपप्रचार से आस्था उड गई है । कुछ तथाकथित संतो के आर्थिक व नैतिक दुव्र्यवहार के माध्यमों द्वारा इस प्रकार प्रचारित किया गया कि आधुनिक पिढि को ऐसा लगने लगा कि सभी धार्मिक नेता ऐसे ही पाखंडी है । युग ऐसा है कि व्यक्ति के दोषों का सामान्यीकरण किया जाता है । उसके अपराधों को पूरे वर्ग के प्रतीकस्वरूप प्रचारित किया जाता है । इस प्रचार तन्त्र के कारण युवा वर्ग की अनास्था अपने चरन शिखर पर है । जब आस्था टूटती है तब फिर मार्ग नहीं दिखाई देता । व्यवस्था उपलब्ध सभी मार्ग निष्प्रभावी लगते है । फिर अपने आक्रोश को सडक पर व्यक्त करने का एकमात्र भोंडा मार्ग इस सन्तप्त, सामूहिक उर्जा को दिखाई देता है । यही कारण है कि हर बात पर धरना, रास्ता रोको आदि बातें आम होती जा रही है । यह उबाल अत्यन्त अस्थायी होता है । और इसमें सम्मिलित होनेवाले लोग केवल अपाने आप को संतुष्ट कर रहे होते है कि हमने कुछ तो किया । वास्तव में व्यवस्था परिवर्तन के लिए आवश्यक साधना का धैर्य ना होने के कारण ऐसे प्रदर्शन आम होते जा रहे है ।
इस भडास निकालने के दो दुष्परिणाम हैं । प्रेशर कुकर के सफ्टी वाॅल्व के समान क्रोध को इस नपुंसक तरिके से अभिव्यक्त कर देने के कारण क्रांति के लिए आवश्यक लाग खदकता ही नहीं । प्रत्यक्ष परिवर्तन दूसरों को दोष देने से नहीं स्वयं पर जिम्मवारी लेने से होता है । शासन को कटघरे में खडा करना आवश्यक है । वह लोकतन्त्र का आधार है । किन्तु अपनी जिम्मेवारी के बारे में चिंतन ेिए बिना सब बातों के लिए सरकार से मांग करना परिवर्तन का मार्ग नही हो सकता । इस भडास निकालू तमाशें का दूसरा घातक परिणाम है सामूहिक हताशा । परिणाम काल्पनिक होने के कारण नारेबाजी के बाद भी ठोस कुछ हाथ आता नाहीं है । जब क्रोध का ज्वार उतरता है । झुठा संतोष समाप्त होता है तब निराशा छा जाती है । फिर जब आवश्यक हो तब नियोजित प्रदर्शन के लिए भी उत्साह नहीं रहता ।
kk dhyanप्रभावी परिवर्तन के सुत्र हमें स्वामी विवेकानन्द के जीवन से मिलते है । जो क्रांति करना चाहता है उसे स्वयं से प्रारम्भ करना होता है । स्वामी विवेकानन्द ने स्वयं किसी भी बात को केवल इसलिए स्वकार नहीं किया क्यों कि किसी ने कहा है । उन्होंने सत्य का साक्षात्कार करने के लिए स्वयं प्रयोग किए । अपनी आंखों से पूरे दश को देखा । जन जनार्दन को करीब से देखा समझा । आज से भी अधिक बिकट व विपरित परिस्थिती स्वामीजी के समय थी । पूरे देश का भ्रमण करने के बाद उस 29 वर्षीय युवा की मनःस्थिती क्या रही होगी? किन्तु उसने अपने अन्दर की उथलपुथल को विद्रोह नही करने दिया । सारे समाज पर बम की तरह फट पडने की बात उन्होंने अवश्य की पर समाज का प्रबोधन व जागरण करने से पूर्व उन्होंने पूर्ण धैर्य से तैयारी की । अपने जीवन लक्ष्य व उसको साकार करने की योजना का साक्षात्कार किया ।
25 से 27 दिसम्बर 2012 को कन्याकुमारी की श्रीपादशिला पर किया ध्यान इसमें महत्वपूर्ण मोड
था । यह केवल व्यक्तिगत ध्यान नहीं था । वह भारत को अपने अन्दर जीने का राष्ट्रध्यान था । भारत की जीवन्तता का ध्यान था । यह सहस्त्राब्दियों से चल रही अविरल शाश्वत राष्ट्रसाधना की प्रतीती थी। प्रतीती से ही प्रबोधन का अधिकार प्राप्त होता है । स्वामी विवेकानन्द ने अपने राष्ट्रचिंतन में भारत के अद्वितीय स्वभाव का साक्षात्कार किया । भारत को भारत के रूप में बनानेवाले मल तत्वों को समझा । इन्हीं का प्रबोधन उन्होंने अपने जीवन में किया । भारत के जीवन ध्येय का भी उनके मन में उदय इसी राष्ट्रध्यान में हुआ । समूची मानवता को विज्ञानमय, आनन्ददायक, शाश्वत, सर्वजन सुखकारक जीवनपध्दती का शिक्षण प्रशिक्षण देना जगद्गुरू भारत का जीवनोदेश्य है यह बात स्वामीजी ने कन्याकुमारी में जानी ।
इसीलिए घोट बिकट परिस्थिति में भी उन्होंने भारत के धर्म, जाति, समाज, परम्परा, संस्कृति अथवा साहित्य का अवमूल्यन नहीं किया । वे इसके अंतनिहित उदात्तता को पहचानते थे । उन्हे कन्याकुमारी की शिला पर साक्षात्कार हुआ कि भारत को भारत की महानता का परिचय करवाना ही उनका जीवन कार्य है । आगे के 10 वर्ष उन्होंने इसे ही अनथक किया ।
स्वयं के जीवनोद्देश्य की स्पष्ट प्रतीती क्रांति का प्रथम सोपान है । इसके लिए आस्था अत्यंत आवश्यक है । आस्था से उत्पन्न आत्मबल ही आक्रोश को क्रांति की उर्जा में बदल सकता है ।
आइये इस राष्ट्र चिंतन पर्व पर संकल्प ले समाज में आस्था जगाने का । संकल्प लें स्वामीजी की योजना को साक्षात् कर अपने अन्दर भारत की प्रतीती का । यह काम नारे लगाने से नहीं होता । अपने अन्दर धैर्य को जगाना होता है । प्रतीती ही प्रबोधन का अधिकार प्रदान करती है । स्वामीजी के प्रबोधन का अधिकार प्रदान करती है । स्वामीजी के प्रबोधन के तत्व व विषय को अगले चरण में देखते है ।
आज तो आक्रोशित युवा को केवल इतना स्मरण करा दें – आक्रोश के विलाब में ना बहा दो अपनी उर्जा को । इसे अन्दर लावा बनने दो । फिर इसे नवसृजन होगा ।

दिसम्बर 26, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , | टिप्पणी करे

फिर फूंको पांचजन्य ! फिर सुनाओ गीता !!


Bhagawad Gitaआज भ्रमित अर्जुन
विषादग्रस्त नहीं
आक्रोशित है।

तमस नहीं आज
रजस का प्रकोप है।
अपने में सिमटा
सकुचा, परास्त नहीं
आज का अर्जुन,
संख्याबल की शक्ति में मदमस्त,
व्यवस्था के हर स्तम्भ में
अनास्था के प्रचार से
अभिशप्त आज का अर्जुन
सबसे आक्रोशित है।

या तो कुटील कपट से
अपनी झोली भरने में व्यस्त
या फिर क्रांति के
खोखले नारों में मस्त !

हे पार्थ के सारथी
आओ फिर आज
जीवन का यथार्थ
समझाने
ज्ञान से तपे हुए
कर्म का रहस्य
बतलाने।

जब जब दुःशासन ने
द्रौपदी के चीर पर
ड़ाला हाथ
तुमने शासन से
नहीं मांगी सुरक्षा
अपने बल पर
दिये वस्त्र अपरिमित !
आज पुनः द्रौपदी पुकारे
आओ मधुसूदन . . .
अबके पार्थ को
जगा दो
दुःशासन का करने अंत |

जितना फाड़ो
जर्जर व्यवस्था के
जरासंध को बार बार . . .
इस भ्रष्टाचारी का
होता नहीं अंत |
अबके फिर
सुझाओ भीम को
कोई युक्ति
ताकि भारती हो
कंस के श्यालकों
से सदा के लिये मुक्त।

विदेशी पुंजी का
दुर्वासा है फिर
चिरभुभुक्षित
दल बल सह
आतिथ्य के लिये
चला आया
अबकी बार आमंत्रित !
आओ हे पार्थ सारथी
याज्ञसेनी के
अक्षयपात्र की राखों लाज
हर किसान की
थाली के अंतिम शाग पात
को करो ग्रहण
और करदो सारी सृष्टि
को फिर तृप्त
दो ऐसी अक्षय विकास रचना
हो जन जीवन सुमंगल !

द्वारिका की स्वर्णीम
रचना फिर करनी ही है
पर अबके कुरूओंकी
अधर्मसेवी महासेना को
पहले करना है भस्म

है सन्नध
हर अभिमन्यु आज
आधा ना रहे
अबके व्यूहभेद|
केवल पार्थ नहीं
सारी की सारी
भारती है उत्सुक
बताओ शुभ मार्ग

हे कृष्ण मुरारी
इस मोक्षदा एकादशी को
तुम हमको
फिर सुना दो गीता
मुक्त कर दो अपने
ही रचें बन्धनों से
और दो आत्मबल
आसन्न अरि के दमन हेतु
निर्णायक युद्ध का

पार्थ के चिर सारथी
आओ आज
फिर फूंकों पांचजन्य!
फिर सुनाओ गीता !!

दिसम्बर 24, 2012 Posted by | कविता, सामायिक टिपण्णी | , , , , | टिप्पणी करे

स्वामी विवेकानन्द का व्यावहारिक ज्ञान


LONDON_DEC_96_20x30_53_RGB_FINALआज दिनांक 17 दिसम्बर 2012 को इकोनामिक टाइम्स नामक अंग्रेजी समाचार पत्र में वर्तमान समय के विद्वान अर्थशास्त्री श्री बिबेक देब्राय का स्वामी विवेकानन्द के आर्थिक चिन्तन के बारे में आलेख उपरोक्त शिर्षक से प्रकाशित हुआ।
लेखक ने स्वामीजी के 4 उद्धरण दिये है और उनमें से प्रगटे आधुनिक अर्थशास्त्रीय सिद्धान्तों का संकेत दिया है। 23 फरवरी 1894 को डेट्राईट के एक समाचार पत्र में स्वामीजी के व्याख्यान के अंश छपे। स्वामीजी ने अमेरिका तथा भारत में मजदुरी के दरों की तथा कपास के मूल्यों की तूलना की तथा स्पष्ट किया कि भले ही ये दर उपर से बहुत विपरित लग रहे हो किन्तु अमेरिकी महंगाई को ध्यान में लिया जाये तो भारत के दर ठीक ही थे। वर्तमान अर्थशास्त्र में इसे क्रय क्षमता के अंतर (Purchasing Power Parity PPP) के रूप में कहा जाता है।
एक अन्य स्थान पर विधवा विवाह की समस्या पर जो चर्चा स्वामीजी ने की है उसमें उच्च जाति में महिलाओं की संख्या के अधिक होने का सन्दर्भ दिया है। इस प्रकार अर्थशास्त्र के मांग व आपूर्ति के सिद्धान्त की सामाजिक उपयोगिता को ही स्वामीजी प्रतिपादित करते दिखाई देते है।
तीसरा उद्धरण राज्य की व्यवस्था व्यय व उस पर जनमत के प्रभाव आदि की चर्चा करता है। जिसमें से निर्णय प्रक्रिया के विकेन्द्रीकरण, नागरी समाज के दबाव, सरकारी आय व्यय आदि के सिद्धान्तों की स्वामीजी विस्तार से चर्चा करते है।
श्री बिबेक देब्राय जो चैथा उद्धरण शिक्षा के लोकव्यापीकरण के बारे में देते है जिसमें स्वामीजी बालकों के खेति आदि उत्पादक कामों में व्यस्त होने की व्यावहारिकता को ध्यान में रखते हुए शिक्षा की व्यवस्था को उनके कार्यस्थल तक ले जाने की बात कहते है। उनका प्रसिद्ध उदाहरण ‘यदि पहाड़ मोहम्मद तक नहीं आता तो मोहम्मद को पहाड़ तक जाना होगा’ इसी प्रसंग में आता है।
लेख के अन्त में श्री देब्राय पाठकों से आहवान करते है कि स्वामीजी ने कही बातों को उनके बारे में कही बातों से अधिक महत्व देकर पढ़ना चाहिये उसमें से वर्तमान के लिये सुत्र प्राप्त हो सकते है।
यहाॅं नीचे मूल अंग्रेजी लेख भी दिया जा रहा है। श्री देब्राय को ध्यन्योस्मि प्रेषण के साथ ही यह अपेक्षा भी कि स्वामीजी के साहित्य के अध्ययन द्वारा यह मूर्धन्य अर्थशास्त्री वर्तमान सम्भ्रमित अर्थचिंतन को अधिक सार्थक दिशा देनेवाले सिद्धान्त का वर्तमान परिभाषाओं में वर्णन करेगा। मूलतः अनुसंघान का पिण्ड रखनेवाले इस अध्येता से भारत की अनेक अपेक्षायें है।
सनातन धर्म में शाश्वत सिद्धान्तों के युगानुकूल व्याख्या व व्यवहार के लिये युगधर्म के निर्माण की बात कही गई है। विदेशी सिद्धान्तो पर आधारित अर्थचिन्तन ने आज देश को विश्वबाजार का अंग बना दिया। विकास के पश्चिमी स्वप्न ने उसके रंगीन फलों के साथ ही पकृति, मानव के विनाश के विष को भी प्रदान किया है। आज जब सारा विश्व ही वेकल्पिक अर्थचिन्तन की ओर मुड़ रहा है तब श्री बिबेक देब्राय जैसे युवा विद्वानों से अपेक्षा है कि स्वामी विवेकानन्द जैसे मौलिक चिन्तको से प्रेरणा प्राप्त कर एक युगानुकुल नवचिन्तन को प्रस्तुत करें।

Vivekananda’s Material Wisdom

He had instincts of a cutting-edge economist and used deductive logic to enunciate economic principles

Vivek debroyBIBEK DEBROY
Swami Vivekananda was born on January 12, 1863. So, in a few days, his 150th birth anniversary will be celebrated in sundry ways. A lot has been written on Swami Vivekananda and more will be written, with additional volumes in 2013. They will focus on religious, philosophical, political and nationalist aspects. Let me give a few instances that aren’t that well-known.
“In a conversation concerning the material condition of the Hindu working men, the learned monk said that the poor lived on porridge alone… A day labourer on a farm received only 12 pence a day, but a dollar in India brought 10 times as much as it would in this country. Cotton was raised, but its fibre was so short it had to be woven by hand, and even then it was necessary to import American and Egyptian cotton to mix with it.” This is from Detroit Journal, dated February 23, 1894, and is nothing but purchasing power parity (PPP), though understandably, that expression wasn’t used. I am not sure how many economists would have used PPP notions in 1894.
Here is another quote, on the issue of widow remarriages, a complicated socio-cultural phenomenon. “In the higher castes of every country, you will find the statistics show that the number of women is always much larger than the number of men… The number of girls in the higher castes is much larger than in the lower. Conditions are quite opposite in the lower castes. Relative to such questions as to widows not marrying:
among the first two castes, the number of women is disproportionately large, and here is a dilemma. Either you have a non-marriageable widow problem and misery, or the non-husband-getting young lady problem. To face the widow problem, or the old maid problem? There you are; either of the two.”
Now go back again to the idea that the Indian mind is socialistic. It says, “Now look here! We take the widow problem as the lesser one.” Why? “Because they have had their chance; they have been married. If they have lost their chance, at any rate, they have had one. Sit down, be quiet and consider these poor girls — they have not had one chance of marriage.” So, the Indian mind said to the widows, “Well, you have had your chance, and now we are very sorry that such mishaps have come to you, but we cannot help it; others are waiting. Then religion comes into the question.” As every economist will appreciate, this is a remarkable way of stating the problem. Leaving aside the broader issue, if one looks at the quote, it is almost in an economist’s language: an excess supply of women and a fair means of allocating them.
Let us move on to a third quote. “To protect the state, to meet the expenses of the personal comforts and luxuries of himself and his long retinue, and, above all, to fill to overflowing the coffers of the all-powerful priesthood for its propitiation, the king is continually draining the resources of his subjects, even as the sun sucks up moisture from the earth… The power of the populace is struggling to express itself in indirect and disorderly ways without any method. The people have not as yet the conscious knowledge of the existence of this power. There is neither the attempt on their part to organise it into a united action, nor have they got the will to do so; there is also a complete absence of that capacity, that skill, by means of which small and incoherent centres of force are united together, creating insuperable strength as their resultant. Is this due to want of proper laws? — no, that is not it. There are laws, there are methods, separately and distinctly assigned for the guidance of different departments of government, there are laws laid down in the minutest detail for everything, such as the collection of revenue, the management of the army, the administration of justice, punishments and rewards… The laws have, it can almost be said, no elasticity in them. Under the circumstances, it is never possible for the people to acquire any sort of education by which they can learn to combine among themselves and be united for the accomplishment of any object for the common good of the people, or by which they can have the concerted intellect to conceive the idea of popular right in the treasures collected by the king from his subjects, or even such education by which they can be fired with the aspiration to gain the right of representation in the control of state revenues and expenditure.” This is essentially about countervailing pressure by civil society, public revenue and public expenditure, not to speak of devolution and decentralisation of decision-making.
As a final quote, “The great difficulty in the way of educating the poor is this. Supposing even your Highness opens a free school in every village, still, it would do no good, for the poverty in India is such that the poor boys would rather go to help their fathers in the fields, or otherwise try to make a living, than come to the school. Now, if the mountain does not come to Mohammed, Mohammed must go to the mountain. If the poor boy cannot come to education, education must go to him.” These quotes aren’t that well-known. People should read more of what Swami Vivekananda wrote or said, and less of what people have written about him.
(The author is professor at the Centre for Policy Research)

दिसम्बर 17, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , | 1 टिप्पणी

जगत् हो विनम्र ऐसा शील हमको दें!


गढ़े जीवन अपना अपना -20
panchajanyaभागवत महापुराण के दशम स्कंध में एक कथा आती है पौण्ड्रक वासुदेव की। ये कुराह प्रदेश के राजा है। जरासंध के साथ है और इस कारण भगवान् कृष्ण से मत्सर करते है। ये अपने आप को कृष्ण से श्रेष्ठ बताने के लिये कृष्ण के समान ही वेशभूषा करने लगते है। वैसे ही पीताम्बर, मोरमुकुट, सारंग धनुष्य, नकली कौस्तुभ मणि, छातीपर श्रीवत्स का चिह्न भी सब कुछ कृष्ण के ही समान। यहाँ तक की एक नकली सुदर्शन चक्र भी बना लिया और उसे भी धारण करने लगे। हर बात पर कृष्ण का अपमान भी करते है और कहते है, ‘‘मै ही साक्षात् वासुदेव हूँ। ये नन्द का लला तो ढ़ोंगी है। भगवान कृष्ण इस नौटंकी को महत्व नहीं देते और जब भी यह विषय उनके सामने आता तो महत्वहीन कहकर टाल देते। एक बार अपने स्वयं के प्रलाप से ही भ्रमित पौण्ड्रक वास्तव में स्वयं को कृष्ण से अधिक शक्तिशाली मान बैठते है। कृष्ण को युद्धभूमि में ललकारते है।  पौण्ड्रक अपनी 2 अक्षोहिणी सेना और साथ काशी नरेश की 3 अक्षोहिणी सेना। फिर भी युद्ध तो कितना चलना था? नकली सुदर्शन से सज्ज नकली वासुदेव को साक्षात भगवान् से वारगती प्राप्त होती है। कृष्ण भगवान् उसे अपने नकली पाखण्ड से सदा के लिये मुक्त कर देते है। साथ में काशी नरेश को भी मुक्ति मिलती है।

पौण्ड्रक वासुदेव ने भगवान की नकल की तो कम से कम मृत्यु तो भगवान के हाथों मिली। आज हमारे युवा अपनी वेशभूषा और केशभूषा में ना जाने किस किस की नकल कर रहे है? इनका और इनके साथियों का क्या होगा भगवान ही जाने। पंचतन्त्र की कथा में नील के पानी में गिर कर रंगे सियार की भांती अपने बालों को रंगाकर ना जाने किसे प्रभावित करना चाह रहे है? बारीश के पानी में रंग धुल जाने के बाद जो दूर्गती सियार की हुई वही स्थिति जीवन संग्राम में उतरने के बाद इन नकली युवाओं की हो रही है।

वास्त्विक सौंदर्यबोध को समझकर अपने आप को आकर्षक बनाया जा सकता है। सही तरिके से सुदर्शन होना भी सदाचार का अंग है। सौन्दर्य बोध का जीवनमूल्य जब आचरण में आता है तब हर काम में सुव्यवस्था आ जाती है। अपने कपड़े अपने मन की स्थिति प्रगट करते है। केवल नकल और प्रचलित शोभाचार (Fashion) के नाम पर उटपटांग परिवेष कर लेना आकर्षक भले ही लगता हो पर दूरगामी प्रभाव तो सादे किन्तु साफसुथरे, सुव्यस्थित परिधान से ही होता है। अपना परिधान अपने भाव का परिचायक होना अपेक्षित है परिवार की आर्थिक स्थिति का नहीं। दूसरे के प्रति भी बाहरी बातों के कारण उपेक्षा, परिहास या व्यंग का आचरण नहीं हो। हम स्वयं बात को समझ गये है अतः शोभाचार के चक्कर में नहीं फँसेंगे पर कोई दूसरा कर रहा है तो उसपर हसेंगे भी नहीं।

कपड़े शरीर के अंगों को ढ़ककर उनकी रक्षा के लिये होते है उन्हें उघाड़ने के लिये नहीं यह याद रखना आवश्यक है। हमारे कपड़ों में हमारी परम्परा भी झलकती है। भारत में तो इसमें भी वैज्ञानिकता को सहजता से अपनाया गया है। हमारे यहाँ स्थान एवं ऋतु के अनुसार वेशभूषा का प्रयोग होता है। कश्मिर से लेकर कन्याकुमारी तक सारी विविधता के मध्य भी हम पायेंगे कि बालिकाओं के परिधान सदैव कमर के नीचे ढ़ीले और फैले हुए होते है। इसके पीछे वैज्ञानिक तथ्य है। बाल्यावस्था और किशोरावस्था में शरीर का विकास होता है। ऐसे में कसे (Tight) वस्त्रों से मांसपेशियों की ताकद नहीं बन पाती। ये भाई-बहनों दोनों के लिये सत्य है। बहनों को मातृत्व के लिये तत्पर होना है इसलिये जंघाओं को विकास का पूर्ण अवसर भारतीय पारम्पारिक परिधान देते है। ब्रह्मचर्य की रक्षा के लिये भाइयों को लंगोट कसना चाहिये किन्तु हमारी परम्परा में उनके भी बाकि वस्त्र शरीर से कस कर सटे नहीं होते। शरीर के रक्ताभिसरण, पेशियों के विकास एवं वायु के समुचित संचरण को ध्यान में रखकर विकसित ये परिधान रंग और आकर (Design) की सुन्दरता के साथ ही शील के भी परिचायक हैं। आनन्द का विषय है कि धीरे धीरे ये प्रचलित शोभाचार केा भी अंग बन रहे हैं।

केवल परिधान की ही बात नहीं है, सौन्दर्यबोध के अन्तर्गत हमारे हावभाव, उठना, बैठना सब आता है। इन सब में ही शील झलकना चाहिये। दूसरे के साथ व्यवहार में, बोलने, देखने में भी शरीर का महत्व न्यून हो उसके पूर्ण व्यक्तित्व को हम संबोधित करें। जहाँ तक सम्भव हो चिकित्सक ओर दर्जी को छोड़ किसी और के साथ शरीर हमारी चर्चा का विषय ही ना बनें। एक प्रोफेसर की कक्षा में छात्र ने उनकी तारिफ करने के लिये कहा कि आपकी टी-शर्ट बड़ी सुंदर है। प्राध्यापक ने छात्र को यह कहकर कक्षा से बाहर किया कि मेरे पढ़ाने में कोई कमी है जो तुम्हारा ध्यान मेरे कपड़ों की ओर गया। आजकल एक-दूसरे को परिधान के लिये बधाई (Complements) देने का रिवाज़ है। पर वास्तविकता में सुशील व्यक्ति को यह शोभा नहीं देता। न तो ऐसी क्षुद्र बातों पर किसी को बधाई देनी चाहिये ना ही बधाई को स्वीकार करना चाहिये। परस्पर सद्गुणों का सत्कार कर बधाई देना ही अपना अभ्यास बन जाये।

इससे ठोस बातों पर आधारित होने के कारण सम्बन्धों में भी प्रगाढ़ता आ जायेगी। सम्बन्ध हमें शक्ति और सत्व प्रदान करते है अतः सदाचार में सम्बन्धों का सम्मान सबसे अग्रणी है। माता-पिता और गुरु हमारे सर्वस्व के निर्माता होने के कारण हमारे स्वामी है। अतः इस सम्बन्ध का सम्मान तो चरणस्पर्श के द्वारा ही हो सकता है। प्रांत विशेष में परम्परा की भिन्नता के अनुसार इसका परिपालन अवश्य किया जाना चाहिये। उत्तरी भारत के कुछ प्रांतों में परम्परा है कि कन्या को देवी का रुप मानते है और उसका पूजन करते है। अतः, अविवाहित पुत्री अपने पिता के चरण नहीं छूती उलटे पिता ही उसका आशिर्वाद लेता है। इस परम्परा के पीछे के दिव्य तत्व का आचरण तो सबको ही करना चाहिये। छोटी से छोटी बालिका में भी माँ का देवी का शक्ति का दर्शन करना चाहिये। दक्षिण भारत में बालिका को भी अम्बा, अम्मा ही कहते है। सम्बन्धों की सफलता विस्तार में है। प्रत्येक अजनबी से भी सम्बन्ध बनाने की क्षमता शीलवान व्यक्ति में होती है। उसके लिये सब केवल ‘अंकल’ ‘आंटी’ नहीं है। कोई मामा है कोई मौसी है, दीदी है, भैया है, ताऊ है। आयु, परिचय और व्यवहार के अनुसार सम्बन्ध प्रस्थापित कर निभाना भी सदाचार का अंग है।

विविधता का सम्मान हमारी संस्कृति है। अतः हम सबके मतों का आदर करते है। शास्त्रार्थ होगा, चर्चा भी होगी, एक दूसरे के मतों के खण्डन-मण्डन से वाद विवाद भी होगा। पर सब विनम्रता से। एक नियम सर्वोपरी होगा ‘मत भिन्नता हो सकती है इस बात पर हमारा मतैक्य है।’ (We agree to disagree) तर्क तो करना ही चाहिये उससे मतों में स्पष्टता आती है। किन्तु संवाद होना चाहिये विवाद भी विनम्रता से हो तो चलेगा पर वितण्डा कभी नहीं होगा। विनम्रता कायरता या कमजोरी की निशानी नहीं है। विनम्रता तो ध्यैर्य, शक्ति और साहस की अभिव्यक्ति होती है। जिसकी बात में दम होता है और अपने सत्य पर आत्मविश्वास होता है उसे आवाज़ नहीं बढ़ानी पड़ती। चिल्लाते या तो असत्य भाषण करनेवाले या आत्मबलहीन व्यक्ति या फिर कपटी धुरन्धर। अपने वचन में तथ्यों की कमी को वे आवाज की मात्रा से पूरा करना चाहते है।

भारत में हम मानते है कि एक ही सत्य को समझने, कहने और प्रगट करने के भिन्न भिन्न मार्ग हो सकते हे अतः हम सभी मार्गोंका सम्मान करेंगे। किन्तु इसका अर्थ ये भी नहीं कि हम सबके आगे झुकेंगे और मूह देखी शालीनता के लिये असत्य या आसुरी तत्वों का साथ देंगे। जो मत यह कहे कि मेरी ही बात सत्य है बाकि सब झूठ अर्थात जो विविधता को नकारे ऐसी नाकारा भेदबुद्धि विचारधारा का विरोध हम निर्भयतासे करेंगे। अन्याय, अत्याचार और भ्रष्ट व्यवहार को सहन करना भी अपराध में सहभागिता है। अतः सुशील व्यक्ति निड़रता से ऐसे आचरण के विरोध में खड़ा हो जाता है। सहज भी अपने नित्य व्यवहार में यह निर्भयता झलकनी चाहिये। विनम्रता के साथ ही दृढ़ता भी हमारे चाल-ढाल, अंग-काठी (Posture) और संवाद में स्पष्टता से प्रगट होनी चाहिये। खड़े हो, बैठे हो या चल रहे हो गर्दन और मेरुदण्ड सीधा हो, सीना आगे और मस्तक उंचा हो। जब बोले तो स्पष्ट बिना झिझक और उचित गति से हो। अधिक जल्दी से बोलना भ्रम और न्यूनगण्ड (Inferiority Complex) का लक्षण है। बोलने में स्पष्टता हो और जितने लोगों तक बात पहुँचानी है उसके अनुसार स्वर (Pitch) एवं आवाज (Volume) हो। अभ्यास से शब्दों का चयन भी सही होने लगता है और फिर अनावश्यक स्पष्टीकरण या क्ष्मायाचना की आवश्यकता नहीं पड़ती। मृदु, मधुर व दृढ़ वाणी विचारों, भावों का ही नहीं पूरे व्यक्तित्व का ही सम्प्रेषण करती है। और फिर केवल पाँच शब्दों में सारे श्रोता अभिभूत हो जाते है। करतल ध्वनि ही नहीं पूर्ण आत्मीयता से सम्मान करने लगते है। केवल ढ़ाइ मिनट के वक्तव्य में शील की प्रतिमूर्ति, योद्धा हिन्दू सन्यासी विश्वविजय कर लेता है। उसी वीर विवेकानन्द से आओ हम प्रार्थना करें।
‘जगत् हो विनम्र ऐसा शील हमको दें!’

दिसम्बर 4, 2012 Posted by | आलेख | , , , , | 1 टिप्पणी

   

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