उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

अनास्था से केवल आक्रोश ! आस्था से परिवर्तन !!


स्वामी विवेकानंद के राष्ट्र चिंतन के प्रथम दिन :
Del Road Rageप्रश्न आस्था का है । मनुष्य आस्था के बल पर कुछ भी चमत्कार कर सकता है । अनास्था से या तो निराशा जन्म लेती है या फिर विद्रोह । हम कहते है परिस्थितियों की विपरितता से अनास्था जन्म लेती है । कुछ हद तक ये बात भी कारक हो सकती हैं । किंतु आस्था तो संस्कारों का विषय है। यदि भावात्मक संस्कारों में पला मन हो तो विपरित से विपरित परिस्थिति में भी आस्था नहीं छोडता । आज समाज में अनास्था का वातावरण है । किसी पर ही आस्था नहीं बची । नेता, प्रशासक इन पर से तो पूरा ही विश्वास उड गया है । न्यायव्यवस्था पर बची खुची आस्था को भी कुछ लोगों के भ्रष्ट आचरण के प्रचार के कारण समाप्त हो गई है । जितना आज का युवा मानता है उतना निराशा की स्थिति नहीं है । आज भी सही पध्दति का धैर्य के साथ लगन से अवलम्बन किया जाय तो न्याय मिल सकता है । धर्म व संतों पर से भी सुनियोजित अपप्रचार से आस्था उड गई है । कुछ तथाकथित संतो के आर्थिक व नैतिक दुव्र्यवहार के माध्यमों द्वारा इस प्रकार प्रचारित किया गया कि आधुनिक पिढि को ऐसा लगने लगा कि सभी धार्मिक नेता ऐसे ही पाखंडी है । युग ऐसा है कि व्यक्ति के दोषों का सामान्यीकरण किया जाता है । उसके अपराधों को पूरे वर्ग के प्रतीकस्वरूप प्रचारित किया जाता है । इस प्रचार तन्त्र के कारण युवा वर्ग की अनास्था अपने चरन शिखर पर है । जब आस्था टूटती है तब फिर मार्ग नहीं दिखाई देता । व्यवस्था उपलब्ध सभी मार्ग निष्प्रभावी लगते है । फिर अपने आक्रोश को सडक पर व्यक्त करने का एकमात्र भोंडा मार्ग इस सन्तप्त, सामूहिक उर्जा को दिखाई देता है । यही कारण है कि हर बात पर धरना, रास्ता रोको आदि बातें आम होती जा रही है । यह उबाल अत्यन्त अस्थायी होता है । और इसमें सम्मिलित होनेवाले लोग केवल अपाने आप को संतुष्ट कर रहे होते है कि हमने कुछ तो किया । वास्तव में व्यवस्था परिवर्तन के लिए आवश्यक साधना का धैर्य ना होने के कारण ऐसे प्रदर्शन आम होते जा रहे है ।
इस भडास निकालने के दो दुष्परिणाम हैं । प्रेशर कुकर के सफ्टी वाॅल्व के समान क्रोध को इस नपुंसक तरिके से अभिव्यक्त कर देने के कारण क्रांति के लिए आवश्यक लाग खदकता ही नहीं । प्रत्यक्ष परिवर्तन दूसरों को दोष देने से नहीं स्वयं पर जिम्मवारी लेने से होता है । शासन को कटघरे में खडा करना आवश्यक है । वह लोकतन्त्र का आधार है । किन्तु अपनी जिम्मेवारी के बारे में चिंतन ेिए बिना सब बातों के लिए सरकार से मांग करना परिवर्तन का मार्ग नही हो सकता । इस भडास निकालू तमाशें का दूसरा घातक परिणाम है सामूहिक हताशा । परिणाम काल्पनिक होने के कारण नारेबाजी के बाद भी ठोस कुछ हाथ आता नाहीं है । जब क्रोध का ज्वार उतरता है । झुठा संतोष समाप्त होता है तब निराशा छा जाती है । फिर जब आवश्यक हो तब नियोजित प्रदर्शन के लिए भी उत्साह नहीं रहता ।
kk dhyanप्रभावी परिवर्तन के सुत्र हमें स्वामी विवेकानन्द के जीवन से मिलते है । जो क्रांति करना चाहता है उसे स्वयं से प्रारम्भ करना होता है । स्वामी विवेकानन्द ने स्वयं किसी भी बात को केवल इसलिए स्वकार नहीं किया क्यों कि किसी ने कहा है । उन्होंने सत्य का साक्षात्कार करने के लिए स्वयं प्रयोग किए । अपनी आंखों से पूरे दश को देखा । जन जनार्दन को करीब से देखा समझा । आज से भी अधिक बिकट व विपरित परिस्थिती स्वामीजी के समय थी । पूरे देश का भ्रमण करने के बाद उस 29 वर्षीय युवा की मनःस्थिती क्या रही होगी? किन्तु उसने अपने अन्दर की उथलपुथल को विद्रोह नही करने दिया । सारे समाज पर बम की तरह फट पडने की बात उन्होंने अवश्य की पर समाज का प्रबोधन व जागरण करने से पूर्व उन्होंने पूर्ण धैर्य से तैयारी की । अपने जीवन लक्ष्य व उसको साकार करने की योजना का साक्षात्कार किया ।
25 से 27 दिसम्बर 2012 को कन्याकुमारी की श्रीपादशिला पर किया ध्यान इसमें महत्वपूर्ण मोड
था । यह केवल व्यक्तिगत ध्यान नहीं था । वह भारत को अपने अन्दर जीने का राष्ट्रध्यान था । भारत की जीवन्तता का ध्यान था । यह सहस्त्राब्दियों से चल रही अविरल शाश्वत राष्ट्रसाधना की प्रतीती थी। प्रतीती से ही प्रबोधन का अधिकार प्राप्त होता है । स्वामी विवेकानन्द ने अपने राष्ट्रचिंतन में भारत के अद्वितीय स्वभाव का साक्षात्कार किया । भारत को भारत के रूप में बनानेवाले मल तत्वों को समझा । इन्हीं का प्रबोधन उन्होंने अपने जीवन में किया । भारत के जीवन ध्येय का भी उनके मन में उदय इसी राष्ट्रध्यान में हुआ । समूची मानवता को विज्ञानमय, आनन्ददायक, शाश्वत, सर्वजन सुखकारक जीवनपध्दती का शिक्षण प्रशिक्षण देना जगद्गुरू भारत का जीवनोदेश्य है यह बात स्वामीजी ने कन्याकुमारी में जानी ।
इसीलिए घोट बिकट परिस्थिति में भी उन्होंने भारत के धर्म, जाति, समाज, परम्परा, संस्कृति अथवा साहित्य का अवमूल्यन नहीं किया । वे इसके अंतनिहित उदात्तता को पहचानते थे । उन्हे कन्याकुमारी की शिला पर साक्षात्कार हुआ कि भारत को भारत की महानता का परिचय करवाना ही उनका जीवन कार्य है । आगे के 10 वर्ष उन्होंने इसे ही अनथक किया ।
स्वयं के जीवनोद्देश्य की स्पष्ट प्रतीती क्रांति का प्रथम सोपान है । इसके लिए आस्था अत्यंत आवश्यक है । आस्था से उत्पन्न आत्मबल ही आक्रोश को क्रांति की उर्जा में बदल सकता है ।
आइये इस राष्ट्र चिंतन पर्व पर संकल्प ले समाज में आस्था जगाने का । संकल्प लें स्वामीजी की योजना को साक्षात् कर अपने अन्दर भारत की प्रतीती का । यह काम नारे लगाने से नहीं होता । अपने अन्दर धैर्य को जगाना होता है । प्रतीती ही प्रबोधन का अधिकार प्रदान करती है । स्वामीजी के प्रबोधन का अधिकार प्रदान करती है । स्वामीजी के प्रबोधन के तत्व व विषय को अगले चरण में देखते है ।
आज तो आक्रोशित युवा को केवल इतना स्मरण करा दें – आक्रोश के विलाब में ना बहा दो अपनी उर्जा को । इसे अन्दर लावा बनने दो । फिर इसे नवसृजन होगा ।

दिसम्बर 26, 2012 - Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , ,

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