उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

स्वामीजी और संघ


16‘‘माँ आज मुझे किसी से प्यार हो गया है ।’’ एक शाम स्वामी विवेकानन्द ने साराह ओले बुल को कहाँ, जिन्हें वे मेरी ममतामयी अमेरिकी माँ कहा करते थे। ठिठोली करते हुए माँ ने पूछा ‘‘कौन है वह भाग्यवान युवती?’’ स्वामीजी ने गंभीरता से उत्तर दिया -‘‘ संगठन! माँ वह कोई युवती नहीं अमेरिका की संगठन क्षमता है जिससे मूझे प्यार हो गया है।’’

हिन्दूओं की खोई संघ क्षमता का पुनः परिचय स्वामी विवेकानन्द ने करवाया । उन्होंने संगठन की शक्ति को बार बार अधोरेखित किया । हिन्दू धर्म के सम्मान को विश्वमंचपर प्रतिष्ठित करने के बाद स्वामी विवेकानन्द जब भारत लौटे तब उन्होंने भारत को चार मन्त्र दिए – आत्म गौरव, संगठन, पुनरूत्थान तथा विश्वविजय। भेड़ों के मध्य पले सिंह के समान अपने पराक्रम को भूल चुके हिन्दुओं के आत्मगौरव को स्वामी विवेकानन्द ने जागृत किया । ‘तभी और केवल तभी तुम हिंदू कहलाने के अधिकारी हो जब इस शब्द को सुनते ही आपकी नसों में विद्युत तरंग दौड़ जाती हो । जब इस नामाभिधान को धारण करनेवाले किसी जाति, वर्ग, भाषा, प्रांत के व्यक्ति को देखते ही तुम्हारा हृदय अकथनीय आत्मीयता व स्नेह से भर पड़े कि यह मेरा बन्धू है ।’

उन्होंने संगठन के महत्व को केवल प्रतिपादन ही नहीं किया अपितु श्रीरामकृष्ण संघ की स्थापना की । स्वामीजी ने भारत में हर क्षेत्र में संगठन की 31आवश्यकता पर बल दिया । किसी युवा के पूछने पर कि देश में कितने संगठन होने चाहिए । स्वामीजी ने कहा असंख्य । हम करोड़ो है । हमारे कार्य भी अनेक है । सब संगठित होकर ही चल सकते है । संगठन को ही उन्होंने भारत के पुनरूत्थान का मार्ग बताया । उन्होंने स्पष्ट किया समाज सुधार कोई नवनिर्माण की प्रक्रिया नहीं है । यह तो खोए गौरव को प्राप्त करना है । अतः यह पुनर्निमाण है । पुनरूत्थान है नवोत्थान नहीं । यह महत्वपूर्ण दृष्टिभेद था । अंग्रेजों के शासन में पश्चिम की हर बात को ही अनुकरीणय मानकर कार्य करनेवाले सुधारकों को स्वामीजी ने आगाह किया – यह तो विनाश का मार्ग है । यह समाज सदियों से अपनी जड़ों से जुड़ा है । उसका उत्थान उनकी आस्थाओं को क्षति पहुँचाये बिना करना होगा ।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि स्वामीजी ने भारत को उसके जीवनध्येय के प्रति जागृत किया । उन्होंने घोषणा की – ‘‘उठो भारत! अपनी आध्यात्मिकता से विश्वविजय करो!’’ विश्वविजय को स्वामीजी ने भारत का लक्ष्य बताया । उन्होंने स्पष्ट किया भारत की आकांक्षा विश्वगुरू बनने  की है । मानवता को जीवन जीने की वैज्ञानिक पद्धति का पाठ पढ़ाना ही भारत का अवतार कार्य है । इसी के लिए भारत को कार्य करना है ।

dr Hedgewar1925 में जब पूरे भारत में स्वतंत्रता आंदोलन चरम पर था तब डा केशव बलिरामपंत हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की । केवल स्वतंत्रता नही भारत के पूर्ण विजय को लक्ष्य बनाकर हिन्दूओं के संघटन का लक्ष्य उन्होंने सामने रखा । आज पूरे विश्व में वटवृक्ष की भाँति फैला संघ स्वामी विवेकानन्द के स्वप्न को साकार करने का ही कार्य कर रहा है । चरित्र निर्माण के प्रेरणा केन्द्र निर्माण करने की योजना स्वामी विवेकानन्द ने मद्रास में युवाओं के संम्मूख रखी थी । ऐसे प्रेरणाकेन्द्र जहाँ सभी जाति, मतों के हिन्दू एकत्रित हो सके । उन्होंने ॐ कार के मंदिरों की स्थापना का भी संकेत दिया था । जनसमान्य को संगठित कर आत्मबल से परिपूर्ण समाज का निर्माण ही स्वामीजी के अनुसार भारत निर्माण का एकमात्र मार्ग था । अनुशासन, प्रामाणिकता, निष्ठा, श्रद्धा से सम्पन्न व्यक्तिगत चारित्र्य व एकात्मता देशभक्ति, त्याग, सेवा व समर्पण से युक्त राष्ट्रीय चारित्र्य के निर्माण की जो योजना स्वामी विवेकानन्द ने रखीथी उसी को डा हेडगेवार ने संघ शाखा के रूप में व्यवहारिक तन्त्र प्रदान किया । स्वामीजी के मन्त्र मनुष्य निर्माण – चरित्रवान् मनुष्यों का राष्ट्रगठन के लिए निर्माण को संघ ने साकार कर दिखाया ।

वर्तमान में विश्व के सबसे विशाल स्वयंसेवी संगठन के रूप में ख्यात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने shakhaस्वामी विवेकानन्द के विचारों को ही मूर्त रूप प्रदान किया है । सभी जाति, वर्ग, भाषा, प्रांत, मत, सम्प्रदायों के हिन्दू समस्त मतभेदों को भूल भारतमाता की पूजा करने प्रतिदिन भगवे ध्वज के सम्मूख एकत्रित होते है । भारत की सामान्य जनता को एकसूत्रता में बांधने क यह अभिनव प्रयोग है । अमेरिका से अपने शिष्य आलासिंगा पेरूमाल को लिखे पत्र में स्वामीजी ने आहवान किया कि देशकार्य के लिए लाखों युवक समर्पित हो । संघ ने प्रचारकों की टोली के रूप में स्वामीजी के इसी कार्य को मूर्तरूप प्रदान किया है । सन्यासेतर समर्पित कार्यकर्ताओं की श्रृखंला का निर्माण संघ ने किया है । स्वयं के व्यक्तिगत जीवन को पूर्णतः आहूत कर अपना सर्वस्व राष्ट्रकार्य में लगानेवाले प्रचारक स्वामीजी के आहवान का ही प्रत्युत्तर हैं ।

Shri Gurujiराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक प.पू. श्री. गुरूजी स्वामी विवेकानन्द के गुरूभाई स्वामी अखण्डानन्द से दिक्षित थे । यह संघ का स्वामीजी से सीधा आध्यात्मिक नाता है । स्वामी अखण्डानन्द ने बंगाल के सारागाछी में श्रीरामकृष्ण आश्रम के सेवाकार्यों का प्रारम्भ किया । ‘जीवभावे शिव सेवा’ के श्रीरामकृष्ण परमहंस के मन्त्र को उन्होंने वहाँ साकार किया । पः पू. श्री गुरूजी ने सारगाछी आश्रम में स्वामी अखण्डानन्उ जी की सेवा की । उन्हीं के आदेशानुसार गुरूजी ने जीवनभर केशधारण किए । गुरू ने कहा था ये दाढ़ी व बाल तुम्हें जँचते है इसे काटना मत । गुरू अन्य सभी शिक्षाओं के साथ ही इस व्रत का भी पालन इस अद्भूत शिष्य ने जीवनभर किया ।

सेवा को समाजधारण व सभी के उत्थान का सर्वोत्तम साधन के रूप में स्वामी विवेकानन्द ने प्रतिपादित किया । वंचितों के उद्धार का मार्ग संघर्ष नहीं अपितु प्रभावी लोंगों के हृदय में जागृत संवेदना से उपजी सेवा है । स्वामीजी के इस संर्वांगीण उत्कर्ष के सेवा मंत्र को संघ ने अपने विविध क्षेत्रों के माध्यम से साकार किया है । स्वामीजी ने सेवा के भिन्न भिन्न स्तर बताये थे । भौतिक सेवा सबसे निम्न पहला स्तर है । भूखे को रोटी और बेघर को घर देनेवाली सेवा । उससे उपर लौकिक ज्ञान के दान की सेवा । और सबसे उँची आध्यात्मिक ज्ञान के दान की सेवा । पर इन सबसे भी परे एक ऐसी सामूहिक साधना की ओर स्वामीजी ने संकेत किया जिसके द्वारा एक ऐसे आदर्श समाज का निर्माण करना जिसमें सब सूखी हो । किसी को सेवा की आवश्यकता ही ना लगे । इस हेतु एकात्म विचार पर आधारित व्यवस्थाओं की रचना करनी होगी । आज संघ पूर्ण समर्पण से संगठन व सेवा के कार्य में लगा है ।

स्वामीजी ने तिसरा मन्त्र दिया था विश्वविजय का । संघ का कार्य विश्व के अनेक देशों में चल रहा है । आज स्वामी विवेकानन्द की सार्द्ध शती के अवसर पर ‘भारत जागो ! विश्व जगाओ !’ इस बोधविचार के साथ जनजागरण का महाअभियान चल पड़ा है इस निमित्त राष्ट्रीय आध्यात्मिक शक्तियों के संगठन में लगायी है । इसी के माध्यम से स्वामी विवेकानन्द की ऐतिहासिक भविष्यवाणी साकार होगी –

bharatmata
‘‘एक दृश्य में जीवंत स्पष्टता से अपनी आँखो के सामने देखता हूँ – यह मेरी चिरपुरातन भारतमाता जागृत होकर पूर्व से भी अधिक गौरव व दिप्ती के साथ विश्व के गुरू पद पर सिंहासनारूढ़ है । आइये अपने जीवन की आहूति देकर विश्व के सम्मूख उसके विजय की घोषणा करे ।’’

फ़रवरी 13, 2013 - Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , ,

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