उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

धर्म का मर्म राम


rama-hanumanराम अर्थात मूर्तिमान धर्म। वाल्मिकी रामायण में कहा है – रामो विग्रहवान धर्म! जीवन के प्रत्येक समय में श्रीराम ने धर्म का पालन किया। यह माता कौसल्या की शिक्षा का ही परिणाम था कि कठीन से कठिन परिस्थिति में में रामजी ने धर्ममार्ग को चुना। विश्वामित्र के मांगने पर असुर नाश के लिये वन में भेजने में पिता दशरथ को हिचकिचाहट थी। पर बाल राम कर्तव्यपालन के लिये तत्पर थे। पूरी सभा में वे ही ऐसे थे जो इस कार्य के लिये पूर्ण उत्सुक थे। आयु भी कम थी, प्रशिक्षण भी नहीं था, विश्वामित्र से भी प्रथम भेंट ही थी फिर भी राम ने एक क्षण भी विचलन नहीं दिखाया। अपने कर्तव्य पालन के लिये सदैव तत्पर रहना धर्म का प्रथम लक्षण है।
आवश्यकता पड़ने पर समाज की तात्कालीन मान्यताओं के विरूद्ध जाकर भी न्याय के पथ का अनुसरण राम ने किया। अहिल्या का उद्धार इसी का परिचायक है। समाजद्वारा पूर्णतः दुर्लक्षित शिला के समान जड़वत जीवन जीने को विवश अहिल्या को रामजी ने अपनाकर सामाजिक मान्यता प्रदान की। यही शिला को पुनः जीवन प्रदान करने के रूपक का वैज्ञानिक सन्दर्भ है। धर्म की सामाजिक धारणा समय समय पर विकृत हो सकती है किंतु रामजी धर्म के वैज्ञानिक स्वरूप को जानते है और समाज में उसे पुनस्र्थापित करने का साहस भी रखते है। आधुनिक युवा के मन में प्रश्न आना स्वाभाविक है कि जो राम गौतम द्वारा त्यागी अहिल्या का उद्धारक है वही राम सीता की अग्निपरिक्षा क्यों लेते हैं? यदि समाज के सम्मूख सीता के शील को प्रतिष्ठित करने का यह मार्ग है ऐसा मान भी लिया जाय तो प्रश्न उठता है कि अग्निपरिक्षा में पार पाने के उपरान्त भी एक धोबी के अनर्गल प्रलाप के कारण सीतामाता का त्याग कहाँ तक उचित है? ऐसे प्रश्नों पर विचार करते समय ध्यान आता है कि धर्म का रहस्य कितना गुढ़ है। हिन्दुओं में अवतार के आचरण का भी मुल्यांकन करने की छूट है। कोई यह नही कहेगा कि रामजी ने किया इसलिये वो ठीक ही है। किन्तु अपने जीवन में धर्म को उतारने के उद्देश्य से राम के जीवन को समझने का जब प्रयत्न करते है तब उनके स्वभाव व पूरे जीवन में किये आचरण के आधार पर ही विवेचन किया जाना चाहिये। वर्तमान सामाजिक मूल्यों के आधार पर विचार करने से अश्रद्धा ही होगी। और लाभ कुछ नहीं होगा।
रामजी के जीवन में धर्म पर आचरण का एक सबसे बड़ा मापदण्ड है अपने व्यक्तिगत लाभसे अधिक महत्व समष्टि के हित को देना। इसका वे चरम पराकाष्ठा तक पालन करते है। भरत के लिये राज्यत्याग के पीछे भी यही सोच है। यदि स्वयं को वनवास का कष्ट देने से पिता के वचनपूर्ति का धर्मपालन होता है तो वे इसके लिये सहर्ष तत्पर हैं। त्याग से ही धर्मपालन सम्भव है यह राम का आदर्श है। इसी कारण चित्रकुट पर भरत कैकेयी आदि सभी के कहने पर भी वे वनवास को नहीं छोड़ते। पूरी अयोध्या आग्रह कर रही है कि वे लौटे और राज्य ग्रहण करें। पूरे नगर का आग्रह उन्हें त्याग से परावृत्त नहीं कर सकता। समाज के कहने में वे नहीं आते है यह बात तो इससे सिद्ध होती है। फिर एक धोबी का कथन कैसे सीता त्याग का कारण बनता है? रामजी की दृष्टि में सीता का त्याग उनके स्वयं को कष्ट देने का पर्याय है। समाज में आदर्श प्रस्थापित करने के लिये अपने व्यक्तिगत सुख का त्याग करने को धर्म कहा ही जाता है। राजाराम के लिये गर्भवति सीता का त्याग इसी श्रेणी में आता है। सीता मात को वे अपने से अलग नहीं समझते है। अतः उनका त्याग स्वयं के किसी अंग के त्याग के समान है। कबुतर को बचाने के लिये अपना मांस देनेवाले शिबि के समान ही रामजी का सीता त्याग है। समाज के आग्रह के कारण नहीं स्वयं के आदर्श के कारण। सीतामाता का त्याग करके वे स्वयं सुखी नहीं है। माताओं, गुरूजनों, अमात्यो वा समाज के श्रेष्ठियों के बार बार कहने पर भी वे दूसरा विवाह नहीं करते है। सीता के प्रति उनका समर्पण उनके व्यक्तिगत धर्म का भाग है और समाजहित में उसका त्याग उनका सामाजिक धर्मपालन का परम आदर्श है। वर्तमान समय की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की मान्यताओं से यह सीतामाता पर अन्याय लगता है। नितांत वैयक्तिक चिंतन पर ऐसा है भी किन्तु रामने कभी भी व्यक्तिगत चिंतन किया ही नहीं है। अतः वे स्वयं को कष्ट देकर समाज में शुचिता का आदर्श प्रस्थापित करना चाहते है। राजा के रूप में वे कोई भी विशेषाधिकार नहीं लेना चाहते। सीता के उदाहरण को अपवाद भी नहीं बनाना चाहते।
अतः धर्म को सीखते समय केवल अन्धानुकरण से काम नहीं चलेगा। उसके लिये धर्म के मर्म को समझना पड़ेगा। त्याग धर्म है किन्तु त्याग का कारण समष्टि का हित होना चाहिये किसी धोबी का अनर्गल प्रलाप नहीं। वर्तमान समय में कोई सीता यदि रावण से प्रताड़ित होती है तो उसपर आक्षेप लेने की किसी धोबी की हिम्मत ही ना हो और किसी राम को उसका त्याग ना करना पड़े। धोबी भले ही बकते रहे रामको अब नया आदर्श प्रस्थापित करना होगा। हर स्थिति में सीता को अपनाना होगा। यही युगधर्म है। यही सनातन धर्म की समयानुकूल प्रासंगिक व्याख्या है।
कर्तव्य का पालन, त्याग व समष्टि का हित ये धर्म के तीन सिद्धांत राम के जीवन से हम सीख सकत है। समष्टि के हित के लिये अपने प्रेम, प्रेमास्पद के साथ ही अपने व्यक्तिगत सुख, आदर्श व प्रतिष्ठा को भी वे त्याग करने को तत्पर है। वाली वध के समय उनके द्वारा अपनाया तरिका उनके व्यक्तिगत आदर्श व प्रतिष्ठा के विपरित है। किन्तु बड़े हित व समष्टि की आवश्यकता को जानकर वे उसे अपनाते है। शूर्पणखा के साथ किया कठोर व्यवहार भी इसी श्रेणी में आता है। सामान्यतः स्त्री के प्रति आदर का भाव रखनेवाले श्रीराम सीता के सम्मान के लिये शूर्पणखा की नाक कटवा देते है। संदेश स्पष्ट है कि राम स्वयं के लिये नहीं जीते समाजधर्म के लिये जीते है।
समरसता व संगठन ये दो धर्म व्यवहार भी रामचरित्र में स्पष्ट परिलक्षित होते है। गुहक, निषाद, शबरी अन्य वनवासी तथा वानरों को उन्होंने सहज अपनेपन सेbibhishan स्नेही बना लिया। कोई भेद है ही नहीं मन में। उनके लिये सब अपने है। समाज के वंचित, दुर्लक्षित वर्ग को वे केवल अपनाते ही नहीं संगठित भी करते है। संगठन के द्वारा आत्मबल प्रदान करते है। और प्रशिक्षण के द्वारा कौशल प्रदान कर एक शक्ति के रूप में विकसित करते है। उसी के माध्यम से आसुरी शक्ति का विनाश करते है और धर्मराज्य की स्थापना करते है।
रामनवमी को भारतीय शिक्षण मण्डल का स्थापना दिवस है। विक्रम संवत् 2026 युगाब्द 5067 में इसी दिन शिक्षा में भारतीय मूल्यों की संस्थापना का राष्ट्रीय अभियान प्रारम्भ हुआ। धर्म की संस्थापना के लिये कर्तव्य, त्याग, समष्टि का हित समरसता व संगठन के मूल्यों पर आधारित शिक्षा व्यवस्था पुनः प्रस्थापित करना मण्डल का कार्य है।
जब समाज में रावण, शुर्पणखा, मारीच और ताड़का के साथ ही मंथरा व धोबी के वंशज ही प्रतिष्ठा पा रहे तब आइये इस रामनवमी पर अपने जीवन में राम को जगाने का प्रण करें। वन में जाते समय माता कौसल्या ने रामजी को आशिर्वाद दिया कि आजतक तुने जो धर्मपालन किया है वही धर्म कवच बन तेरी रक्षा करें। धर्म की रक्षा करने पर धर्म सबकी रक्षा करता है। अतः धर्म की शिक्षा द्वारा का धर्मराज्य की स्थापना के लिये कार्य करने का संकल्प लें।

अप्रैल 19, 2013 Posted by | चरित्र, सामायिक टिपण्णी | , , , , | 4 टिप्पणियाँ

   

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