उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

स्वामी विवेकानन्द की विज्ञान दृष्टि


CHICAGO_1893_20x30_21_RGB_FINAL_00आज विज्ञान भी किसी सम्प्रदाय से कम नहीं रहा है। वैज्ञानिक अपनी अधूरी मान्यताओं को भी किसी साम्प्रदायिक विश्वास के समान ही सब पर थोपते रहते है। सभी प्रकार के अतीन्द्रिय अनुभव को पूर्णतः नकारनेवाले भौतिक विज्ञान को अपने सूक्ष्मतम सिध्दान्तों में ‘निरीक्षक पूर्वाग्रह’ (Observer Bias) जैसे विचारों को आज स्थान देना पड़ा है। जब परमाणू से भी सूक्ष्म कणों की स्थिति व गति को लेकर प्रयोग करना प्रारम्भ हुआ तब वैज्ञानिकों को एक अलौकिक अनुभूति हुई। निरीक्षण करनेवाले व्यक्ति के मन के विचार प्रयोग को प्रभावित करते दिखाई दिए। इसे निरीक्षक पूर्वाग्रह का सिद्धान्त कहा गया। वस्तुनिष्ठ कहलानेवाले भौतिक विज्ञान को मानवीय विषयनिष्ठा का आश्रय लेना पड़ा फिर भी आधुनिक विज्ञान अपनी उद्दण्डता को नहीं छोड़ पाया है।

स्वामी विवेकानन्द ने 1895 में अमेरिका में बोलते हुए इस बात पर टिप्पणी की थी। स्वामीजी के अनुसार विज्ञान का उद्देश बाहय दृश्यमान विविधता के मध्य विद्यमान एकत्व की खोज ही है। रसायनशास्त्र का अंतिम लक्ष्य ऐसे एक मूलतत्व की खोज है जिससे सभी पदार्थों के रहस्य का पता चल सके। भौतिक विज्ञान एकत्व ऊर्जा की खोज में रत है। यह आध्यात्मिक लगनेवाली बात पूर्णतः वैज्ञानिक है। यह भारतीय वैज्ञानिक जीवनदृष्टि है। इसी का प्रयोग जितना भौतिक विज्ञान में हुआ उतना ही धर्म में हुआ। अतः भारत का धर्म वैज्ञानिक है और विज्ञान धार्मिक। इनमें आपस में कोई विरोधाभास नहीं है। इसी कारण 19 वी शताब्दी के प्रारम्भ तक भारत में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी केवल उन्नत ही नहीं सर्वव्यापक थी। अंग्रेजों की नीतिओं इस समृध्द वैज्ञानिक परम्परा को नष्ट किया।

tatasvस्वामीजी ने भारत में पुनः विज्ञान अनुसंधान की नीव ड़ालने की प्रेरणा दी। मुम्बई से शिकागो जाते समय पहला पाड़ाव जापान था। इस यात्रा में जहाज पर जमशेदजी टाटा स्वामीजी के साथ थे। प्रतिदिन कई घण्टो दोनों के मध्य चर्चा होती थी। टाटा का जापान दौरा इस्पात निर्माण की तकनिक प्राप्त करने के लिए था। स्वामीजी ने टाटा कों जानकारी दी कि मिश्र धातु को ढालने की सर्वोत्तम तकनिक भारत में ही विकसित की गई थी। लौह असस्क से फौलाद निर्माण की अनेक भट्टियाँ भारत में थी। इस चर्चा में से टाटा को दो प्रेरणायें मिली। एक उन्होंने अपने ईस्पात उद्योग को जापान में ले जाने की जगह भारत में ही रखा। दूसरा कार्य था भारत में विज्ञान अनुसंधान हेतु प्रगत संस्थान का निर्माण। स्वामीजी के शिकागो लौटने के बाद टाटा ने स्वामीजी को पत्र लिखा। उस पत्र में उन्होंने भारतीय विज्ञान संस्थान, बंगलुरू की स्थापना की जानकारी प्रदान की तथा निवेदन किया कि स्वामीजी निदेशक का दायित्व ग्रहण करें। आज भी संस्थान के स्वागत कक्ष में इस पत्र की प्रतिलिपी सुशोभित है।

सन् 1900 में शताब्दी परिवर्तन के अवसर पर फ्रान्स में ‘विश्व विज्ञान परिषद’ (World Science Conference) का आयोजन हुआ। स्वामी विवेकानन्द ने इस परिषद में सूत्र वक्तव्य दिया। विज्ञान परिषद में सन्यासी के वक्तव्य की चर्चा हुई। फ्रेंच में भाषण होना यह चर्चा का बिन्दू था ही साथ में उनकी विज्ञानदृष्टि भी चर्चा का विषय था। परिषद में सहभाग के समय स्वामीजी का पेरीस में 15 दिन प्रवास रहा। इस प्रवास के समय प्रतिदिन जगदीश चन्द्र बसु भी वहाँ आया करते थे। उस चर्चा के कारण ही जगदीश चन्द्र बसु विषाद से बाहर आये। आज भारत के गौरव के रूप में हम जगदीश चन्द्र बसु को जानते है इसका श्रेय स्वामी विवेकानन्द को है। स्वामीजी के आग्रह पर भगिनी निवेदिता ने रायल सोसायटि लन्दन में बसु के रेडिओ लहरियों से संबंधित प्रबन्ध को खोजने का प्रयास किया। बाद में स्वयं उनके साथ बैठकर उस प्रबन्ध का पुनर्लेखन किया। वनस्पति में जीवन का परीक्षण, धातुओं पर विष का प्रभाव आदि प्रयोगों को जगदीश चन्द्र बसु ने सफलतापूर्वक किया। इन सबका मूल स्वामी विवेकानन्द से हुई चर्चा में था। यह एकत्वदृष्टि से प्रेरित वैज्ञानिक परम्परा आज भारत में लुप्त हो चुकी है उसका पुनर्जागरण अत्यावश्यक है।

आइनस्टाईन द्वारा E = mc2 के सिध्दान्त का प्रतिपादन करने से लगभग दो दशक पूर्व स्वामीजी ने जड़-चेतन सम्बन्ध पर व्याख्यान einsteinदेते समय प्रतिपादित किया था कि जड़ को उर्जा में परिवर्तित किया जा सकता है। उपनिषदों के सन्दर्भ देते हुए स्वामीजी ने बताया कि किसी भी भौतिक वस्तु को प्रकाश की गति से प्रक्षेपित किया जाए तो वह उर्जा में परिवर्तित हो जाती है। जब स्वामीजी ने रामकृष्ण मठ की स्थापना की तब सन्यासियों का आहवान किया कि ‘एक हाथ में पृथ्वि का गोल व दूसरे हाथ में टार्च लेकर गाँव गाँव में जाओ और हमारे भोले जनसामान्य को शिक्षा दो कि ग्रहण कैसे होता है।’

स्वामीजी कि यह विज्ञानदृष्टि आज भी भारत को प्रेरणा दे रही है। अंतरीक्ष विज्ञान में भारत को विश्व में उच्च स्थान प्रदान करनेवाले डा माधवन् नायर, डा ए.पी.जे अब्दुल कलाम, डा ब्रह्मभट जैसे वैज्ञानिकों ने विभिन्न अवसरों पर स्वामी विवेकानन्द को अपना प्रेरणास्त्रोत बताया है। परम महासंगणक प्रकल्प के द्रष्टा संयोजक डा विजय भटकर की प्रेरणा भी स्वामीजी ही है।

जून 1, 2013 - Posted by | चरित्र | , , , , , , ,

1 टिप्पणी »

  1. Swami vivekananda very well guided Sri J N Tata to setup a Iron research centre again in India as a step to revive the flourished science of india which was demolished by britishers, on his trip to Chicago via japan. Further it is also very well known that on his this trip Swamijee advised Sri J.N tata to setup his Steel plant in such a place where he could easily find Iron ore, Coal and water all at one place which is Singhbhum later named as Jamshedpur.

    टिप्पणी द्वारा Shrawan goel | फ़रवरी 25, 2015 | प्रतिक्रिया


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