उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

दिग्विजय से पाएं विश्वविजय की प्रेरणा


sVworldजब समूचा राष्ट्र ही अपनी निहित शक्तियों के प्रति अनभिज्ञ होने के कारण आत्मग्लानि से ग्रस्त हो जाता है तब कोई अद्वितीय विजय ही उसे मानसिक लकवे से बाहर ला सकती है।

‘मन के हारे हार है मन के जीते जीत’, ये कहावत जितनी व्यक्ति पर लागू होती है उतनी ही समाज पर भी लागू होती है। विजय की आकांक्षा व विजय की अनुभूति समाजमन का शक्तिवर्धन करते हैं। जब समूचा राष्ट्र ही अपनी निहित शक्तियों के प्रति अनभिज्ञ होने के कारण आत्मग्लानि से ग्रस्त हो जाता है तब कोई अद्वितीय विजय ही उसे मानसिक लकवे से बाहर ला सकती है। आत्म-विस्मृति की मानसिकता पराभव की मानसिकता होती है, अकर्मण्यता की मानसिकता होती है। ऐसे में स्वप्न भी संकुचित हो जाते हैं। असाधारण पराक्रम तो छोड़िये सामान्य जीवनयापन की क्रियाओं के प्रति भी आत्मविश्वास शिथिल हो जाता है। ऐसे में समाज में परावलंबिता तथा बुद्धिजीवियों में परांगमुखता (उदासीनता) आ जाती है। व्यापार व्यवहार में दूसरों पर निर्भरता ही एकमात्र उपाय दिखाई पड़ता है। सोच विचार में भी हर बात के लिए दूसरों का मुख ताकने की प्रवृत्ति होती है। अपना सब कुछ क्षुद्र, त्याज्य लगने लगता है और पराई परम्पराएं, विचार व संस्कार केवल अनुकरणीय ही नहीं सम्माननीय भी बन जाते हैं।26

19वीं शताब्दी के अंत में भारत की यही स्थिति थी कहीं से कोई आशा नहीं दिखाई देती थी। पराधीनता तो थी ही, स्वाधीनता के लिए प्रयत्न करने का आत्मविश्वास भी नष्टप्राय सा हो गया था। उधार के विचार तथा शिक्षाओं पर अपना सार्वजनिक जीवन रचने की होड़ सी लगी हुई थी।  अंग्रेजों के अंधानुकरण का यह चरम काल था। विदेशी शिक्षा में शिक्षित उच्चभू वर्ग अंग्रेज-भक्ति में ही अपनी धन्यता समझने लगा था। यहां तक कि स्वाधीनता के लिए राजनीतिक संगठन की निर्मिती के लिए भी हम विदेशियों पर निर्भर हो गए थे। एल.ओ. ह्यूम द्वारा स्थापित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस हर शिक्षित भारतीय के लिए देशभक्ति का साधन बन गई थी। सामाजिक सांस्कृतिक और धार्मिक सुधारों हेतु भी आयातित विचारों पर उपजे संगठनों यथा थियोसॉफिकल सोसायटी, ब्रह्म समाज, प्रार्थना समाज आदि का ही बोलबाला था। स्वयं के पूर्वजों, परंपराओं यहां तक कि आराध्यों को भी प्रताड़ित करना, मनोरंजन एवं प्रतिष्ठा का साधन बन गया था।

sv chicago stageइस बौद्धिक, मानसिक व आर्थिक दासता की पृष्ठभूमि में 11 सितम्बर, 1893 को शिकागो के सर्वपंथ सभा में हुए दिग्विजयी चमत्कार को समझा जाना चाहिए। सनातन हिन्दू धर्म का गर्वोन्नत प्रतिनिधित्व करते हुए योद्धा युवा संन्यासी स्वामी विवेकानन्द ने प्राचीन ऋषियों के दिव्य सम्बोधन से जब समूचे विश्व को सम्बोधित किया, तब केवल सभागार में बैठे 7000 श्रोता ही नहीं अपितु पूरा अमेरिका बंधुत्वभाव से अनुप्राणित हो गया। उपस्थितों को लगभग आध्यात्मिक सी अनुभूतियां होने लगीं। किसी ने कहा कि – “अमेरिका निवासी मेरे प्यारे भगिनी और बंधुवर”, इन पांच शब्दों को सुनकर हमारे शरीर में विद्युत तरंग सी दौड़ने लगी थी। किसी ने अपनी दैनंदिनी में लिखा कि मुझे मेरा खोया भाई मिल गया। जैसे सामान्यत: प्रचारित किया गया है कि श्रोताओं ने ‘बहनों और भाइयों’ के संबोधन को पहले सुना नहीं था, इस कारण कई मिनिटों तक तालियां बजती रहीं। इसके विपरीत तथ्य यह है कि बंधुत्व के संबोधन का प्रयोग करनेवाले स्वामी विवेकानन्द उस दिन की सभा के पहले वक्ता नहीं थे। उनसे पूर्व महाबोधि सोसायटी के प्रतिनिधि श्रीलंका से पधारे धम्मपाल अंगिकारा, भारत से ही थियोसॉफिकल सोसायटी का प्रतिनिधित्व कर रहे प्रतापचंद्र मजुमदार तथा जापान के एक बौद्ध भिक्खु ने लगभग ऐसे ही संबोधन से सभा को संबोधित किया था। उसी समय लगभग ½ घंटे के उपरांत चौथी बार यह संबोधन सुनने के बाद श्रोताओं ने ऐसी अनूठी प्रतिक्रिया दी। इसके पीछे का कारण केवल नावीन्य नहीं था, अपितु वैदिक ऋषियों की परंपरा से उत्पन्न भारतीय संस्कृति के एकात्म जीवन दर्शन की प्रत्यक्षानुभूति थी। इसलिए यह केवल एक व्यक्ति का जागतिक मंच पर प्रतिष्ठित होना नहीं था, अपितु चिरपुरातन नित्यनूतन हिन्दू जीवन पद्धति का विश्वविजय था।

वर्तमान संचार व्यवस्था के समान अतिजलद संवाद के साधन उपलब्ध न होते हुए भी यह समाचार किसी वडवानल की भांति प्रथम अमेरिका तत्पश्चात यूरोप व अंतत: भारत में प्रसारित हुआ। इस अद्भुत घटना के मात्र 1 वर्ष के अंदर ही देश का सामान्य किसान भी इसके बारे में चर्चा करने लगा था। इस दिग्विजय की घटना ने भारत के मानस को झकझोर दिया और यह सुप्त देश जागृत हुआ। हम भी कुछ कर सकते हैं, हमारे अपने धर्म, संस्कृति, परंपरा में विश्वविजय की क्षमता है इसका भान आत्मग्लानि से ग्रसित राष्ट्रदेवता को अपनी घोर निद्रा से बाहर लाने के लिए पर्याप्त था। अत: शिकागो की परिषद में हुए आध्यात्मिक दिग्विजय को हम भारत के सर्वतोमुखी विश्वविजय का शुभारंभ कह सकते हैं। इतिहास इस घटना के गाम्भीर्य को भले ही अभी पूर्णता से न समझा पाया हो और संभवत: आनेवाले निकट भविष्य में भारत के विजय के पश्चात इस जान सके, किंतु स्वामी विवेकानन्द स्वयं अपने पराक्रम को पहचानते थे। अत: 2 जनवरी, 1897 को रामनाड में बोलते हुए उन्होंने अपने अभूतपूर्व स्वागत के प्रत्युत्तर का प्रारंभ इन शब्दों से किया, – “सुदीर्घ रजनी अब प्राय: समाप्त सी जान पड़ती है; यह काली घनी लम्बी रात अब टल गयी;  पूर्वांचल नभ में उष:काल की लाली ने समूचे विश्व के समुख यह उद्घोष कर दिया है कि यह सोया भारत अब जाग उठा है।”

1897 में अंग्रेजों की पराधीनता से ग्रस्त भारत के प्रति स्वामी विवेकानन्द का अदभुत आत्मविश्वास तो देखिए कि वे आगे कहते हैं, – ‘केवल अंधे देख नहीं सकते और विक्षिप्त बुद्धि समझ नहीं सकते कि यह सोया हुआ अतिकाय अब जाग उठा है। अब यह नहीं सोयेगा। विश्व की कोई शक्ति इसे तबतक परास्त नहीं कर सकती जबतक यह अपने दायित्व को न भूला दे।’ स्वामी विवेकानन्द ने मृतप्राय: हिन्दू समाज के सम्मुख विश्व विजय का उदात्त लक्ष्य रखा।

एक स्थान पर बोलते हुए उन्होंने स्पष्टता से कहा है,- कोई अन्य नहीं व इससे तनिक भी कम नहीं, केवल विश्वविजय ही मेरा लक्ष्य है। जब हम स्वामी विवेकानन्दजी की 150वीं जयंती को पूरे विश्व में तथा भारत के गांव-गांव में मना रहे हैं, तब हमें भारत के इस आध्यात्मिक विश्वविजय के जीवनलक्ष्य का पुन:स्मरण करना अत्यावश्यक है। स्वतंत्रता के पश्चात हमारी शिथिलता ने हमारी नयी पीढ़ी को राष्ट्रध्येय के प्रति विस्मृत कर दिया है। भारत के स्वातंत्र्य का अर्थ ही वर्तमान पीढ़ी भूल गई है। इस कारण जब थोड़े से देशाभिमान से आज का युवा प्रेरित भी हो जाएं तो वह भारत को विश्व का सबसे अमीर देश बनाने का स्वप्न देखता है। वैश्विक महाशक्ति का स्वप्न वर्तमान पीढ़ी आर्थिक महास्वप्न के रूप में ही देखती है। यह भारत के स्वभावानुरूप नहीं है और इसलिए स्वामी विवेकानन्द को अभिप्रेत विश्वविजय भी नहीं है।

स्वामी विवेकानन्द ने स्पष्ट कहा है, भारत विश्वविजय करेगा यह निश्चित है, किन्तु यह विजय राजनीतिक, सामाजिक अथवा आर्थिक बल से नहीं होगी अपितु आत्मा की शक्ति से ही होगी। स्वामीजी ने सिंहगर्जना की थी, “उठो भारत! अपनी आध्यात्मिक शक्ति से सम्पूर्ण विश्व पर विजय प्राप्त करो।”

आर्थिक सम्पन्नता, कूटनीतिक सम्प्रभुता इस आध्यात्मिक जगदगुरु पद के प्रतिबिम्ब मात्र होंगे। अत: प्रयत्न राष्ट्र की संस्कृति के आध्यात्मिक जागरण के लिए होने चाहिए। आर्थिक व राजनीतिक समृद्धि तो इस सांस्कृतिक पुनर्जागरण के सहज सहउत्पाद होंगे। स्वामी विवेकानन्द की सार्ध शती पर हमारी सम्यक श्रद्धांजलि यह होगी कि हम चिरविजय की अक्षय आकांक्षा को राष्ट्रजीवन में पुन: जागृत कर दें। भारत का स्वधर्म ज्ञान प्रवण अध्यात्म है, और इसका व्यावहारिक आचरण जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में धर्म संस्थापना है। अत: 17वीं शताब्दी के प्रारंभ तक विश्व की सकल सम्पदा के 66 प्रतिशत हिस्से का उत्पादन करनेवाला समृद्ध राष्ट्र विश्व व्यापार का आकांक्षी नहीं रहा। हर्षवर्धन, चंद्रगुप्त, समुद्रगुप्त, विक्रमादित्य आदि की बलाढ्य पराक्रमी सेनाओं ने राजनीतिक विजय के लिए कभी राष्ट्र की सीमाओं का उल्लंघन नहीं किया। भारत न तो अपने सामरिक सामर्थ्य से जगत को पादाक्रांत करने की अभिलाषा रखता है, न ही अपनी आर्थिक सम्पत्ति से अन्य राष्ट्रों को बाजार बनाकर उनका शोषण करना चाहता है। भारत की तो सहस्त्राब्दियों से एक ही आकांक्षा रही है कि विश्व की मानवता को ऋषियों की वैज्ञानिक जीवनपद्धति की सीख दे। भारत की महानतम उपलब्धि जगतगुरु बनने में है।

हमारा स्वप्न है कि पुन: आत्मसाक्षात्कारी ज्ञानियों से विश्व के समस्त देशों को प्लावित कर दिया जाए और सभी सभ्यताओं के प्रतिनिधि इस भूमि की दिव्य आध्यात्मिक अनुभूति का स्वाद चखने के लिए पुन: यहां के विश्वविद्यालयों में प्रवेश प्राप्त करें। यह ज्ञानभूमि सच्चे अर्थ में सहिष्णुता, सर्वसमावेशक एकात्म जीवन दृष्टि का ज्ञान सारे विश्व की मानवता को पुन: देने लगे, यही हमारा चरम लक्ष्य है।

स्वामी विवेकानन्द ने यही दृश्य अपनी आँखों से जीवन्त स्पष्ट देखा था और उन्होंने आह्वान किया था हम अपने जीवन पुष्प अर्पित कर अपनी मातृभूमि को अपने विश्वमान्य गुरुपद पर आसीन करें। आइए, उनकी 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में संकल्प करें कि अपने जीते जी इस दृष्टि को जीवन्त करने का प्राणपण से पराक्रम करेंगे।

सितम्बर 11, 2013 - Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , , , , ,

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