उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

सरस्वती की वासंतिक पूजा और काम दहन


saraswatiवसंत पंचमी के दो महात्म्य है | विद्या की देवी सरस्वती का यह जन्मदिन है | सरस्वती के जन्म के जो पौराणिक आख्यान है, उसके अनुसार वे सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी की मानसपुत्री है | ब्रह्माजी सृष्टि का सृजन करनेवाली शक्ति के देवता है | जगत के अस्तित्व का भी यही कारण है | विश्व के अन्य धर्ममतावलंबियों की मान्यता के विपरीत हिन्दू धर्म सतत सृजन, पालन व संहार को प्रतिपादित करता है | जहाँ इसाई या इस्लाम मतावलंबी किसी एक सर्वशक्तिमान ईश्वर द्वारा निश्चित समयावधि में सृष्टि की रचना पर अपने अनुयायियों को विश्वास करने के लिये बाध्य करते हैं | वही सनातन हिन्दू धर्म शास्त्रीय तरीके से सृष्टि के अस्तित्व का सूक्ष्मतम विचार करता है | जगत या संसार इन दोनों शब्दों में सतत घटित होनेवाली प्रक्रिया का संकेत है | जगत याने जो लगातार प्रगट हो रहा है, जग रहा है, प्रकाशित हो रहा है | संसार का अर्थ है जो सदैव परिवर्तित हो रहा है | किसी एक समय अस्तित्व की रचना हुई है और किसी एक समय विनष्ट हो जायेगा, ऐसी अवैज्ञानिक संकल्पना हिन्दुओं के विचार में नहीं है | सृष्टि के विभिन्न रुप सतत प्रकाशित हो रहे हैं | कुछ अंतराल तक उनके अस्तित्व की धारणा हो रही है और साथ ही साथ विसर्जन भी हो रहा है | अतः निर्माण, पालन तथा संहार की तीनों शक्तियां सतत क्रियावान है | इन्हींको सनातन पौराणिक अभिव्यक्ति ने ब्रह्मा, विष्णु, महेश की संज्ञा दी है | निर्माण करने वाली शक्ति ब्रह्मा, पालन करने वाली शक्ति विष्णु, संहार करने वाली शक्ति शिव |

ब्रह्मा याने जिसे सम्पूर्ण ज्ञान है, जगत के अभिव्यक्त रुप से यह ज्ञान बाधित नहीं होता क्योंकि उसके परे की अपरिवर्तनीय चेतना को ब्रह्माजी सतत अनुभव करते हैं | इसीलिए उनके चार मुख है और हाथों में चार वेद है | सृष्टि की विविधता को चहूँ ओर से देखने की शक्ति तथा उसके पीछे के एकत्व का ज्ञान वेद यह ब्रह्मा का स्वरुप है | ब्रह्मा का दूसरा नाम प्रजापति भी है | प्रजा का अर्थ है ठीक से जन्म – ‘प्रकर्षेण जायते इति प्रजा’ | प्रजापिता होने के कारण अपने पुत्रों के प्रति उनके मन में करुणा है| वे जानते हैं कि मानव में समस्त दुखों का मूल अज्ञान है | इस अज्ञान को दूर कर सृष्टि की विविधता के विश्लेषण को सम्यक ज्ञान के संश्लेषण तक पहुँचाने हेतु माँ सरस्वती को उन्होंने जन्म दिया | सरस्वती विद्या की देवी है | संसार की विविधता का ज्ञान वे प्रदान करती है | अतः उन्हें अपरा विद्या का देवता कहा गया है | परा विद्या अर्थात शुद्ध आध्यात्मिक ज्ञान उनके पिता का अधिकार क्षेत्र है | सरस्वती रस की देवी है | इसीलिए ६४ कलाओं और १६ विद्याओं की अधिष्ठात्री है | विद्याप्राप्ति का साधन आनंदमयी होना अपेक्षित है | विद्या से जुड़े हुए सभी को पढ़ने-पढाने में रस प्राप्त हो, तब माँ सरस्वती की उपासना होती है | क्योंकि वह सरस भी है अर्थात रस के साथ है और रसवती भी है अर्थात रस से परिपूर्ण है | ‘स’ उपसर्ग तथा ‘वती’ प्रत्यय यह बताता है कि शिक्षा की प्रक्रिया तथा परिणाम दोनों ही आनंदमय हो | सरस्वती की सच्ची उपासना ऐसी आनंदमय शिक्षा प्रक्रिया के विकास द्वारा ही संभव है | ऐसा होने से हमारे विद्यालय सच्चे अर्थ में सरस्वती के मंदिर हो जायेंगे |

वसंत पंचमी माँ सरस्वती का जन्मदिन है | सरस्वती का जन्म मानस क्रिया से हुआ है | यह शारीरिक, जैविक प्रजनन नहीं है | ब्रह्माजी के संकल्प मात्र से भगवती सरस्वती का प्राकट्य हुआ है | इसीलिए वह मन की भी देवता है | शिक्षा की प्रक्रिया में मन की एकाग्रता का केंद्रीय स्थान है अतः वसंत पंचमी पर मन की एकाग्रता के लिए माँ सरस्वती की वंदना होनी चाहिए |

kamadahanamवसंतपंचमी के साथ जुड़ी दूसरी आख्यायिका भी इतनी ही अद्भुत है | असुरों के वध के लिये कुमार कार्तिकेय का जन्म होना आवश्यक है | धर्म संस्थापना के लिये यह विवाह है | किन्तु सती के बलिदान के बाद भोले भंडारी पूरी तरह से विरक्त होकर महासमाधि में लीन है | पार्वती की उग्र तपस्या भी उनके ध्यान को भग्न नहीं कर पाती | अतः चिंतित देवता शिवजी के मन में पार्वती के प्रति अनुराग उत्पन्न करने के लिये योजना रचते हैं | कामदेव मदन को इस कार्य हेतु नियुक्त किया जाता है | जिस समय पार्वती शिवजी के चरणों पर पुष्प अर्पित कर रही है, उसी समय मदन ने कामबाण शिवजी पर छोड़ा | बैरागियों के देवता होते हुए भी शिवजी के मन में पार्वती के प्रति अनुराग उत्पन्न हुआ किन्तु आखिर वे हैं तो महादेव – कालों के काल महाकाल, अतः एक ही क्षण में संभल गए | पेड़ के पीछे छिपे काम को पहचान लिया | क्रोध से तीसरा नेत्र खुल गया और क्षणार्ध में कामदेव मदन को भस्म कर दिया | सारे देवता अवाक है | शिवजी के क्रोध से काम अनंग हो गया | अतः काम का नाम अनंग [जिसका शरीर नहीं है] भी है | पौराणिक कथा में बाद में काम पत्नी रति के विलाप से क्षणार्ध में संतुष्ट होने वाले भगवान आशुतोष पिघल गए और मदन को पुनः जीवित कर दिया | असुरनाश के लिये पार्वती का वरण कर लिया | किन्तु वसंतपंचमी का उत्सव काम के अनंग होने का उत्सव है | काम को शरीर के साथ जोड़ कर देखने की संस्कृति में काम को अनंग होने का उत्सव मनाना यह विवाह के अलौकिक उद्देश्य की ओर संकेत करता है | शरीर से जुड़ा हुआ काम ईश्वरीय नहीं है | अतः वह धर्म का हेतु नहीं बन सकता | जब धर्मार्थ जीवन होगा तब गृहस्थ में भी वैराग्य होगा और ऐसे समागम से ही कुमार का जन्म संभव होगा जो देवताओं के सेनापति बन असुरों का नाश करेंगे |

वसंत पंचमी की दोनों कथाओं में अशरीरी अनुभूतियाँ है | माँ सरस्वती का जन्म अशरीरी मनोसंकल्प से है और कामदहन के प्रसंग में वासना के अशरीरी होने का सन्देश है | वसंत पंचमी हमें शरीर से परे जाने की प्रेरणा देती है | उत्सव का अर्थ ही है जहाँ उत्स हो अर्थात मन परिपूर्ण तृप्ति से छलकने लगे और ऊपर की ओर गति करे | अपूर्णता का भ्रम ही समस्त कामनाओं का मूल है और तृप्ति ही वैराग्य की प्रेरणा | तृप्त हुए बिना काम अनंग हो नहीं सकता और मन सरस्वती की उपासना नहीं कर सकता | अतः आइये इस वसंत पंचमी के अवसर पर अपने मन को उदात्त ध्येय की ओर अग्रसर करे और फूलों में खिलते, बालक की हंसी में महकते अनंग काम का पान कर, महादेव की भांति तृप्त हो धर्मकार्य में संलग्न हो जाएँ |

जनवरी 26, 2015 - Posted by | सामायिक टिपण्णी

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