उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

पुरस्कार वापसी का राजनैतिक अरण्य रुदन


sahity akadamiप्रश्न यह है कि साहित्यकारों ने माहौल बनाना है या माहौल के अनुसार चलना है | कहते है कि साहित्य समाज का दर्पण है | फिर यदि समाज में किसी विषय पर आक्रोश है तो वह कवि की लेखनी या लेखक के आलेख को विषय देगा | जब लेखनी कमजोर पड़ जाये तब साहित्यकारों को अपना आक्रोश व्यक्त करने के लिए अन्य माध्यम ढूँढने पड़ते है | एक कविता, एक उपन्यास अथवा एक लेख ही क्रान्ति को दिशा देने में समर्थ होता है | अंग्रेजों की नौकरी में बाबूगिरी करते हुए बंकिमचन्द्र की लेखनी से जन्मा एक गीत पूरे भारत को जगानेवाला जागरणमन्त्र बन गया | भारत के अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतंत्रता आन्दोलन के इतिहास में एकमात्र सफल आन्दोलन ‘वंग-भंग’ का प्रेरणागीत ‘वंदे मातरम’ ही था | 1857 से लेकर 1942 तक के अन्य सभी आन्दोलन अंग्रेजों द्वारा निर्ममता से कुचल दिए गए | जिन सीमित उद्देशों के लिए वे आंदोलन चलाये गए थे उनमें भी आंशिक सफलता किसी आंदोलन में नहीं मिली |

1905 में अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन किया और सारा देश एकमुख से मातृभूमि केsaptakoti kanth इस विभाजन का विरोध करने खड़ा हुआ | बंगाल से लेकर महाराष्ट्र तक, पंजाब-उत्तराँचल से लेकर मदुरै तक इस राष्ट्रीय उठाव में क्रान्तिगान बना बंकिम के उपन्यास ‘आनंदमठ’ का वह मात्रुगान ‘बोंदे मातरम’ | मूलतः 1882 में बंगला में लिखे उपन्यास आनंदमठ का सन्यासियों द्वारा गाया गया भक्तिगीत 1896 में गुरुदेव रविन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में जब गाया गया तब भारत का निर्विवाद राष्ट्रगीत बन गया | इसको गाते-गाते क्रान्तिकारी हँसते-हँसते फांसी पर झूल गए | नंदलाल बोस जैसे राष्ट्रीय चित्रकारों ने इस गीत से प्रेरणा पाकर भारत माँ के चित्रों की मालिका बनायी | राष्ट्रकवि सुब्रमण्यम भारती ने भारतभक्ति स्तोत्र लिखा | वंग-भंग का आंदोलन तब सफल हुआ जब 1911 में अंग्रेजों को बंगाल का विभाजन वापस लेना पड़ा | देश पुनः अखंड हुआ | यह वंदे मातरम की ही शक्ति थी जिसने पूरे भारत को एक सूत्र में पिरोया | बंगला साहित्यकारों और उनसे प्रेरित क्रांतिकारियों से अंग्रेज ऐसे भयभीत हुए कि उन्हें अपनी राजधानी कलकत्ता से बदलकर दिल्ली लानी पड़ी | यह है साहित्य की शक्ति |

1905 में भी बंकिमचंद्र सरकारी नौकरी में ही थे | अंग्रेजों के निर्णय का विरोध करने के लिए उन्हें नौकरी से त्यागपत्र नहीं देना पड़ा | साहित्यकार की ताकत उसकी लेखनी होती है | उसे राजनीती की आवश्यकता नहीं पड़ती |

ramprasad bismilराष्ट्र के लिए कार्य करनेवाले देशभक्तों में यदि साहित्य की शक्ति हो तो वह उनकी प्रेरणा को धार देती है और कार्य को गति | रामप्रसाद बिस्मिल जैसा क्रांतिकारी राष्ट्रहित में क्रान्ति के कार्य करने के साथ ही उन्होंने ऐसी सुन्दर कविताओं की निर्मिती की है कि अनेक युवाओं को राष्ट्रकार्य में भाग लेने हेतु प्रेरित किया | भागा-दौड़ी के जीवन में भी उन्होंने इतनी रचनाएं की कि उनका समग्र साहित्य 5 खण्डों में प्रकाशित है | ‘तेरा वैभव सदा रहे माँ, हम दिन चार रहे ना रहे’, ‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले’ ऐसी अनेक सुप्रसिद्ध रचनाएँ इस महान क्रान्तिकारी ने की है | हर क्रांतिकारी भले ही कवि ना हो पर हर कवि क्रांतिकारी जरुर होता है |

इस पार्श्वभूमी पर वर्तमान में साहित्यकारों द्वारा पुरस्कार लौटाने की घटना का विश्लेषण करें तो हम इसे प्रामाणिक आक्रोश के स्थान पर राजनीती से प्रेरित छद्मविलाप ही जानेंगे | यदि वास्तविकता में आक्रोश होता तो वह लेखनी को धार देता और कोई क्रान्ति की रचना निकल पड़ती | जब साहित्यकारों को अपने सृजन के अलावा और किसी धरने, आन्दोलन, प्रदर्शन आदि साधन का उपयोग विरोध करने के लिए प्रयोग करना पड़ता है तब वह साहित्य के नपुंसक होने की स्थिति है |

Akadami boardजो साहित्यकार टीवी चैनलों पर आ-आकर पुरस्कार लौटाने का समर्थन कर रहे है उनके तर्क भी अधूरे है | उन्हें अचानक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कुठाराघात होते हुए दिखाई दे रहा है, असहिष्णुता बढ़ी दिखाई दे रही है, भय का वातावरण समाज में व्याप्त होता दिखाई दे रहा है | इस सबका कोई यथार्थ आधार उनके पास नहीं है | विशेषज्ञ बताते हैं कि साम्प्रदायिक तनाव तथा जातिगत, पन्थगत विभेदों से उपजी हिंसा के मामलों में बड़े स्तर पर कटौती हुई है | गत 10 वर्षों में लगभग 700 ऐसे मामले प्रतिवर्ष हुए है जबकि 2015 के 9 महीनों में मात्र 215 ऐसी घटनाएं हुई है | यह विडम्बना है कि घटनाएं कम होते हुए भी चर्चा अधिक है | तथाकथित विद्वानों द्वारा जानबूझकर इस प्रकार का वातावरण बनाया जा रहा है | माननीय प्रधानमंत्री के चमत्कारिक नेतृत्व में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को मिली प्रचंड लोकतान्त्रिक सफलता कुछ लोगों को हजम नहीं हो रही | इसके पीछे उनके व्यक्तिगत हितों का भी प्रश्न है | गत कई वर्षों से अनेक सरकारी, अर्ध-सरकारी संस्थाओं पर आपसी साठ-गाँठ से निरंकुश शासन चलानेवाले इन ‘ख्यातनाम’ ‘विद्वानों’ की ठेकेदारी समाप्त होती दिखाई दे रही है | एक मजेदार तथ्य यह है कि पुरस्कार लौटानेवाले महानुभावों में वे सारे लोग सम्मिलित है जिन्होंने एक-दूसरे को पुरस्कार बांटे हैं | एक के पुरस्कार में बाकी दो जूरी रहे | जिसे पुरस्कार मिला उसने भी लौटाया और जिसने दिया उसने भी अपना पुरस्कार लौटाया | अब उसके जूरियों में से भी किसी ने पुरस्कार लौटाया | 3-4 चरण बाद पहला पुरस्कारकर्ता आपको जूरी में मिल जायेगा | ऊपर के 2-3 वाक्यों से पाठक संभ्रमित हो तो उसमें आश्चर्य नहीं क्योंकि गत 60 वर्षों से पुरस्कारों की दुनिया में यही हेरा-फेरी चल रही है | ये लगभग वही लोग है जो 15 वर्षों से बिना किसी तथ्य के गुजरात दंगों को लेकर देश-विदेश में बवाल मचाते रहे है | संजीव भट और तीस्ता सेतलवाड जैसे लोगों की पोल सर्वोच्च न्यायलय में खुलने के बाद भी इस कबीले का मगरमच्छी साम्प्रदायिक विलाप बदस्तूर जारी है |

पुरस्कार लौटाने की इस राजनीती के पीछे विदेशी षडयंत्रों को भी नकारा नहीं जा सकता | रूसी जासूसी संस्था केजीबी की फाइलों तथा विकिलीक्स के IYD Logoदस्तावेजों से यह स्पष्ट है कि हमारे यहाँ के कई विद्वान विदेशी पैसों के बूते पर देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त रहे हैं | वर्तमान में वैश्विक परिदृश्य कुछ ऐसा दिखाई देता है जो इस शंका को और अधिक बलवती करता है | गत डेढ़ वर्ष में अंतर्राष्ट्रीय जगत में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ी है | अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस को संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा एकमत से स्वीकार करना भारत की नई मान्यता का परिचायक है | गत कुछ महीनों में हमारे विदेश विभाग में संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषदों में स्थायी सदस्यता हेतु भारत के दावे को अत्यंत बलपूर्वक रखा है | विश्व के बहुसंख्य देशों का इस बात को प्रत्यक्ष व परोक्ष समर्थन मिल रहा है | स्वाभाविक रूप से ही हमारे दोनों पड़ोसियों के पेट में प्रचंड शूल उठा है | गत सप्ताह संयुक्त राष्ट्र संघ के संयुक्त सचिव की भ्रष्टाचार के मामले में हुई गिरफ़्तारी में यह तथ्य सामने आया कि भारत को सुरक्षा परिषद् में स्थान न मिल पाए इस हेतु चीन ने उसे अरबों डॉलर्स की घूस दी थी | हमारे देश में अचानक उठे विद्वत आक्रोश के पीछे भी ऐसा कोई घोर सांसारिक कारण सामने आये तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए | काश कि इन सबके बैंक खातों की निष्पक्ष पूछताछ की जाती |

youthइन सब विद्वानों की प्रेरणा का मुख्य स्त्रोत प्रचार है | यदि प्रसार माध्यम संभल जाये और पुरस्कार लौटाने की खबर दिखाना बंद कर दे तो पुरस्कार लौटाने अपनेआप बंद हो जायेंगे | पर इतनी देशभक्ति प्रसार माध्यमों में कहाँ ? दादरी की निंदनीय घटना को महीनों तक प्रतिदिन घंटों दिखानेवाले ये समाचार माध्यम गणेश पंडाल में पढ़ी जानेवाली नमाज को अथवा संघ के पथसञ्चलन पर पुष्पवृष्टि करते मुस्लिम बांधवों की तस्वीरों को एक बार भी नहीं दिखाते | अतः समाज को जोड़नेवाले तथा राष्ट्र को एकता के सूत्र में बांधनेवाले विषयों को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने का जिम्मा हम जैसे जागृत भारतवासियों का ही है | आन्तरताने ने विश्व खोल दिया है | सामाजिक माध्यम हर हाथ में पहुंचे मोबाईल के माध्यम से बहुत प्रभावी हो चुका है | उत्तरापथ के सुधि पाठकों से निवेदन है कि इस लेख में दिए गए विषयों को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाए | काटकर अपने-अपने माध्यमों पर चिपकाने की पूर्ण स्वतंत्रता आपको है | आपकी चर्चा और टिप्पणी विषय की गंभीरता को समाज में प्रसारित करेगी | अतः टिप्पणी अवश्य दें |

अक्टूबर 27, 2015 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , | 3 टिप्पणियाँ

एकात्म स्वावलंबी ग्राम विकास


sgv1अनेक विद्यालयों के द्वार पर लिखा होता है ‘ज्ञानार्थ प्रवेश-सेवार्थ प्रस्थान’ | यह शिक्षा के समग्र उद्दिष्ट का नित्य स्मरण है | केवल ज्ञानप्राप्ति अथवा व्यक्तिगत कौशल का विकास शिक्षा का पूर्ण उद्देश नहीं प्रकट करता | यह ज्ञानप्राप्ति अथवा कौशल विकास किस उद्देश से है यह भी स्पष्ट होना आवश्यक है | विद्यालय से निकला बालक परिवार, समाज, राष्ट्र व विश्व में योगदान करने के लिए सुयोग्य बने ऐसी अपेक्षा है | यह योगदान कितना भी अर्थकारक हो किंतु उसके पीछे का भाव सेवा का ही रहे ऐसा संस्कार विद्यालयों में नई पीढ़ी को प्राप्त हो यह शिक्षा के परिपूर्ण उद्देश की व्याख्या है | अतः शिक्षा के विषय में चिंतन करते समय व्यक्तित्व विकास के साथ ही सामाजिक विकास के विभिन्न आयामों पर चिंतन करना भी आवश्यक है | जब तक समाज की भिन्न-भिन्न इकाइयाँ यथा परिवार, ग्राम, संगठन, नगर आदि के विकास की सम्यक अवधारणा सुस्पष्ट न हो तब तक शिक्षित पीढ़ी के सम्यक उपाययोजन की योजना शिक्षाविद नहीं बना सकते | समग्र ग्राम विकास, नगर विकास, संगठनशास्त्र, व्यापार प्रबंधन आदि पर स्पष्ट प्रारूप तयार करना भी शिक्षा के भारतीय स्वरुप के विकास हेतु आवश्यक है |

आजकल स्मार्ट सिटी, स्मार्ट विलेज आदि की चर्चा चलती है | स्मार्ट विलेज की बात करते हीsgv2 योजनाकारों के मन में आधुनिक शहरी सुविधाओं से संपन्न, संचार के सभी साधनों से परिपूर्ण गांव का ही विचार मन में आता है | चिकनी-चुपड़ी पक्की सड़कें हो, बिजली की अखंड आपूर्ति, मोबाइल इंटरनेट आदि सभी संचार के साधन हर गांव में उपलब्ध करा दिए जाएँ | सरकार ने इस दिशा में कार्य प्रारंभ भी कर दिया है | पंडित दीनदयाल उपाध्याय के नाम से ग्रामीण फीडरों को अलग करने की देशव्यापी महत्त्वाकांक्षी योजना केन्द्र सरकार ने सितंबर 2015 में प्रारंभ की | इसके माध्यम से गांव-गांव में 24 घंटे बिजली की आपूर्ति होगी | सिंचाई के लिए आवश्यक 3 चरण (three phase) विद्युत आपूर्ति भले ही कुछ समय के लिए प्राप्त हो किंतु घरेलू एवं अन्य व्यापारी उपयोग के लिए आवश्यक एकल चरण (single phase) बिजली 24 घंटे गांव-गांव में उपलब्ध होगी | इस आधार पर इंटरनेट आदि संचार के साधन गांव में पूरे समय उपलब्ध रह सकेंगे | सभी गांवों को पक्की सड़क से जोड़ने की योजना भी इसी दिशा में एक प्रयास है कि गांवों का यातायात तथा मालवाहक संपर्क द्रुत गति से हो सके | किंतु प्रश्न यह है कि क्या इस सबसे गांव का समग्र विकास हो पायेगा? केवल व्यापार और संचार के अवसर उपलब्ध हो जाने से नई पीढ़ी का नगरों की ओर पलायन रुक जायेगा?

शहरों की ओर स्थानांतरण के अन्य दो महत्वपूर्ण कारक योजनाकारों ने खोजे है – स्वाथ्य एवं शिक्षा | प्राथमिक एवं माध्यमिक के आगे की शिक्षा तथा इस स्तर पर भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा गांवों में उपलब्ध न होने के कारण जिन्हें भी संभव है वो अपने बच्चों को शिक्षा हेतु शहर में भेजना पसंद करते है | एकबार पढ़ाई के लिए शहर गया बालक पढ़-लिख कर जवान होने पर गांव क्यों लौटेंगे ? अतः गांव के गांव ही युवाओं से रिक्त होते जा रहे है | अनेक राज्यों में आने वाले दिनों में यह एक बहुत बड़ी चुनौती होगी | नई पीढ़ी जब गांव में रहेगी ही नहीं तो ये संचार साधन, ये बिजली किस काम आयेगी ?

ग्रामीण स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए स्थिति बड़ी विकट है | अनेक स्थानों पर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र उपलब्ध ही नहीं है | जहाँ भवन उपलब्ध है वहां भी चिकित्सकों का अभाव है | कोई चिकित्सक गांव जाना ही नहीं चाहता है | सरकार ने अनेक प्रयास कर लिए, कुछ वर्षों की अनिवार्यता कर दी, अतिरिक्त भत्ता देना प्रारंभ कर दिया फिर भी चिकित्सक शहर छोड़ना नहीं चाहता है | निजी व्यवसाय में इतनी अधिक कमाई है कि महाराष्ट्र जैसे राज्यों के शहरों के सरकारी अस्पतालों में भी चिकित्सक नहीं जाना चाहते है | अतः स्वास्थ्य सुविधाओं का गांवों में उन्नयन असंभव के बराबर है | इस हेतु नए सिरे से सोचना होगा |

शहरीकरण की नकल के रूप में ग्रामविकास का विचार किया जा रहा है | इस सोच में ही मूलभूत परिवर्तन आवश्यक हैsgv | वर्तमान में विकास के वैश्विक परिमाणों में शहरीकरण एक प्रमुख मापदंड है | जिस देश में जितना अधिक शहरीकरण होगा उसे उतना ही अधिक विकसित माना जाता है | समूची जनसंख्या के कितने प्रतिशत जनसंख्या शहरी है यह विकास का मापदंड है | इसी जीवनदृष्टि के कारण गांवों का शहरीकरण ही गांव का विकास माना जा रहा है | ग्राम विकास के नाम पर सारा सरकारी चिंतन व योजनायें इसी दिशा में है | यह पूर्णतया अभारतीय विचार है | भारत में गांव एक परिपूर्ण जैविक इकाई है | पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने ग्रामोदय के एकात्मिक प्रारूप में इस बात का विचार किया है | सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक स्तर पर पूर्णतः स्वावलंबी ग्रामों अथवा ग्रामसमूहों का विकास किया जाना भारत में ग्रामविकास का माध्यम हो सकता है | गांवों की जीवनशैली में कृषि व गोरक्ष यह केवल आर्थिक उत्पादन के साधन न होकर उनका सांस्कृतिक व सामाजिक मूल्य भी है | जब तक हम इन दोनों को लाभ का व्यवसाय नहीं बनाते तब तक ग्रामोदय के सारे प्रयास अधूरे ही होंगे | वर्तमान समय के अनुरूप कृषि एवं गोरक्षा के साथ-साथ ग्रामीण उद्योग और कृषि उत्पादों के व्यापार को भी जोड़ा जा सकता है | इन सबके आधार पर संपूर्णरूपेण स्वावलंबी ग्रामों का विकास किया जा सकता है |

इस विकास की प्रक्रिया का भी जैविक होना आवश्यक है | स्वावलंबी समाज निर्माण सरकारी बैसाखियों से नहीं हो सकता | सरकारी योजनाओं के माध्यम से सरकारी पैसा सरकारी अधिकारियों द्वारा ही खर्च किया जाता रहा तो सारे विश्व की पूंजी एक गाँव में लगाने पर भी ग्रामविकास कतई संभव नहीं है | योजना के स्तर से ही ग्रामीणों का न केवल सहभाग अपितु नेतृत्व सच्चे ग्रामविकास में अनिवार्य है | सारा गांव पूर्ण जागरूकता के साथ संगठित होकर एक मन से विकास का संकल्प ले तब वह ग्रामविकास का प्रथम चरण होगा | भौगोलिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक आधार पर कुछ गांवों के समूह बनाये जा सकते है | समूह में कितने और कौनसे गांव हो इसका निर्णय भी ग्रामवासी ही आपस में मिल कर करें | नैसर्गिक संसाधन, मानव बल, आर्थिक उपलब्धता तथा भौगोलिक दूरी के आधार पर पूर्ण स्वावलंबी ग्रामसमूह विकसित करने हेतु आवश्यक गांवों की संख्या ग्रामवासी निर्धारित करेंगे | यह एकत्रिकरण बहुत अधिक कठोर नहीं होना चाहिए | और अधिक ग्रामों को जोड़ने अथवा कुछ गांवों को समूह बदलने की लचीली सुविधा इस व्यवस्था में उपलब्ध हो | कुछ गांव धीरे-धीरे अपनेआप में ही स्वावलंबी बनने का प्रयत्न कर सकते है | इस स्थिति में उन्हें किसी समूह का हिस्सा बने रहने की आवश्यकता नहीं रहेगी |

यह ग्रामसमूह अपने स्तर पर नियोजन करे कि किस प्रकार वे पाँच-सात वर्षों की अवधि में पूर्णतः आत्मनिर्भर हो सकते है | शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, गौरक्षा, व्यापार के साथ ही ऊर्जा के उत्पादन आदि में भी यह ग्रामसमूह पूर्णरूपेण आत्मनिर्भर बने | इस हेतु ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों का उपयोग करना आवश्यक होगा | तेलंगाना के लगभग 40 गांव जैव-इंधन (bio-diesel) के माध्यम से बिजली के उत्पादन में आत्मनिर्भर हो गए है | ऐसे ही सौर, पवन, छोटे नालों पर बने चक बाँध आदि को मिलाकर विकेन्द्रित विद्युत् आत्मनिर्भरता को प्राप्त किया जा सकता है | सिंचाई एवं पेयजल हेतु भी इसी प्रकार का चिंतन एवं नियोजन किया जाये कि कुछ अवधि में यह ग्रामसमूह उस मामले में भी आत्मनिर्भर बन सके | कृषि का नियोजन भी ‘स्वपोषण’ व ‘व्यापार’ इन दो रूपों में किया जाये | गांवों की अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ ही गांव शहरों के भी अन्नदाता है | आसपास की नगरीय आवश्यकताओं का ध्यान रखते हुए कृषि का व्यापारिक नियोजन किया जाये | फल, सब्जी और अनाज की आपूर्ति के अलावा अनेक ऐसे कृषिउत्पाद है जिनकी औद्योगिक उपयोगिता है | इन सभी का अपनी स्थानीय विशेषताओं के अनुरूप नियोजन किया जाये तो कृषि न केवल भरण-पोषण का अपितु अच्छे लाभ का माध्यम भी बन सकती है | किंतु यह एकल चिंतन अथवा प्रयोग से संभव नहीं है | सामूहिक चिंतन, संगठित प्रयास इस हेतु अनिवार्य है | कुछ कृषिउत्पाद सीधे बाजार में बेचने के स्थान पर थोड़ी सी प्रक्रिया करने से उनमें बहुत बड़ी मूल्य वृद्धि हो सकती है | अतः ऐसे कृषि के सहयोगी ग्रामोद्योगों की योजना भी ग्राम्य विकास का महत्वपूर्ण अंग है |

इस sgv3सब हेतु, शिक्षा में भी स्वावलंबी विचार इन ग्रामसमूहों को करना होगा | अपने नए पीढ़ी की शैक्षिक आवश्यकताओं की पूर्ति अपने ही ग्रामसमूह में हो सके ऐसी आत्मनिर्भरता को लक्ष्य किया जाये | हर बालक को 8वी तक जीवनोपयोगी सामान्य शिक्षा सहज, सुलभ, जहा तक हो सके निःशुल्क प्राप्त हो | उसके आगे की शिक्षा का नियोजन बालकों के स्वभाव एवं रूचि के अनुरूप तथा ग्रामसमूह की आवश्यकता के अनुसार किया जाये | इस हेतु विशेष रूप से ग्रामीण शिक्षा संस्थानों का निर्माण करना पड़ेगा जिसमें कृषि एवं कृषि सहायक उद्योगों में कार्य करने का प्रशिक्षण ग्रामीणों को दिया जाये | सामान्य उच्च विद्यालयीन शिक्षा (9वी से 12वी) तथा स्नातक तक महाविद्यालयीन शिक्षा ग्रामसमूह में उपलब्ध हो | केवल परास्नातक अथवा व्यावसायिक शिक्षा हेतु छात्रों को किसी अन्य ग्रामसमूह अथवा शहर में जाने की आवश्यकता रहे | इस प्रकार ग्रामसमूह शैक्षिक आवश्यकताओं हेतु पूर्णतः आत्मनिर्भर बन सकेंगे | स्वास्थ्य सुविधाओं में भी इसी प्रकार की आत्मनिर्भरता पाई जा सकती है | प्रत्येक गांव के एक या दो युवा-युवती को परा-चिकित्सकीय (para-medical) प्रशिक्षण दिलाकर आरोग्य मित्र के रूप में तैयार किया जाये | सामान्य छोटे-मोटे हादसों से होनेवाली छोटी-मोटी चोटें, सामान्य संक्रमण, बुखार, जुकाम, पेट की बिमारियाँ आदि के उपचार का ज्ञान व दवाई आरोग्य मित्र के माध्यम से हर गांव में उपलब्ध हो | थोड़े प्रगत उपचार तथा कुछ दिन के निवासी उपचार हेतु प्राथमिक स्वाथ्य केंद्र हर ग्रामसमूह में हो | ग्रामीणों के हाथ इस सबका प्रबंधन/संचालन दिया जाये ताकि चिकित्सकों की साप्ताहिक उपस्थिति व परिचारक कर्मचारियों (nursing staff) की नित्य उपलब्धता सुनिश्चित हो |

इस प्रकार का स्वावलंबी ग्रामविकास तभी संभव है जब शिक्षित, समरस, संगठित, शोषणमुक्त समाज स्थापित किया जाये | यह काम धार्मिक आयोजनों के माध्यम से सदियों से होता रहा है | यज्ञ, कथा, कीर्तन, जत्रा, उत्सव आदि के पारंपारिक आयोजन समाज को सुसंगठित करने के माध्यम रहे हैं | स्वावलंबी ग्रामविकास में इनकी महती भूमिका है | मठों, मंदिरों, धर्माचार्यों तथा सामाजिक संगठनों ने एकात्म स्वावलंबी ग्रामविकास के इस व्रत को अपनाया तो यह स्वप्न साकार होने में बहुत अधिक समय नहीं लगेगा | सरकार की भूमिका केवल उत्प्रेरक (catalyst) की रह जाएगी | रास्तें, भवन, तालाब, कैनाल, उर्जा संयंत्र, शिक्षा जैसी आवश्यक अधोसंरचनाओं (infrastructures) का निर्माण ग्रामीणों के माध्यम से सरकारी अनुदान के उपयोग से हो | बाकि आवश्यक संसाधन समाज के संबल से ही खडे किये जाये |

स्वावलंबी ग्रामविकास की प्रक्रिया भी शासनमुक्त, समाज पोषित व ग्रामीणों पर पूर्ण विश्वास रखनेवाली होगी तभी उचित परिणाम भी प्राप्त होंगे |

अक्टूबर 24, 2015 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , | 3 टिप्पणियाँ

   

%d bloggers like this: