उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

एकात्म स्वावलंबी ग्राम विकास


sgv1अनेक विद्यालयों के द्वार पर लिखा होता है ‘ज्ञानार्थ प्रवेश-सेवार्थ प्रस्थान’ | यह शिक्षा के समग्र उद्दिष्ट का नित्य स्मरण है | केवल ज्ञानप्राप्ति अथवा व्यक्तिगत कौशल का विकास शिक्षा का पूर्ण उद्देश नहीं प्रकट करता | यह ज्ञानप्राप्ति अथवा कौशल विकास किस उद्देश से है यह भी स्पष्ट होना आवश्यक है | विद्यालय से निकला बालक परिवार, समाज, राष्ट्र व विश्व में योगदान करने के लिए सुयोग्य बने ऐसी अपेक्षा है | यह योगदान कितना भी अर्थकारक हो किंतु उसके पीछे का भाव सेवा का ही रहे ऐसा संस्कार विद्यालयों में नई पीढ़ी को प्राप्त हो यह शिक्षा के परिपूर्ण उद्देश की व्याख्या है | अतः शिक्षा के विषय में चिंतन करते समय व्यक्तित्व विकास के साथ ही सामाजिक विकास के विभिन्न आयामों पर चिंतन करना भी आवश्यक है | जब तक समाज की भिन्न-भिन्न इकाइयाँ यथा परिवार, ग्राम, संगठन, नगर आदि के विकास की सम्यक अवधारणा सुस्पष्ट न हो तब तक शिक्षित पीढ़ी के सम्यक उपाययोजन की योजना शिक्षाविद नहीं बना सकते | समग्र ग्राम विकास, नगर विकास, संगठनशास्त्र, व्यापार प्रबंधन आदि पर स्पष्ट प्रारूप तयार करना भी शिक्षा के भारतीय स्वरुप के विकास हेतु आवश्यक है |

आजकल स्मार्ट सिटी, स्मार्ट विलेज आदि की चर्चा चलती है | स्मार्ट विलेज की बात करते हीsgv2 योजनाकारों के मन में आधुनिक शहरी सुविधाओं से संपन्न, संचार के सभी साधनों से परिपूर्ण गांव का ही विचार मन में आता है | चिकनी-चुपड़ी पक्की सड़कें हो, बिजली की अखंड आपूर्ति, मोबाइल इंटरनेट आदि सभी संचार के साधन हर गांव में उपलब्ध करा दिए जाएँ | सरकार ने इस दिशा में कार्य प्रारंभ भी कर दिया है | पंडित दीनदयाल उपाध्याय के नाम से ग्रामीण फीडरों को अलग करने की देशव्यापी महत्त्वाकांक्षी योजना केन्द्र सरकार ने सितंबर 2015 में प्रारंभ की | इसके माध्यम से गांव-गांव में 24 घंटे बिजली की आपूर्ति होगी | सिंचाई के लिए आवश्यक 3 चरण (three phase) विद्युत आपूर्ति भले ही कुछ समय के लिए प्राप्त हो किंतु घरेलू एवं अन्य व्यापारी उपयोग के लिए आवश्यक एकल चरण (single phase) बिजली 24 घंटे गांव-गांव में उपलब्ध होगी | इस आधार पर इंटरनेट आदि संचार के साधन गांव में पूरे समय उपलब्ध रह सकेंगे | सभी गांवों को पक्की सड़क से जोड़ने की योजना भी इसी दिशा में एक प्रयास है कि गांवों का यातायात तथा मालवाहक संपर्क द्रुत गति से हो सके | किंतु प्रश्न यह है कि क्या इस सबसे गांव का समग्र विकास हो पायेगा? केवल व्यापार और संचार के अवसर उपलब्ध हो जाने से नई पीढ़ी का नगरों की ओर पलायन रुक जायेगा?

शहरों की ओर स्थानांतरण के अन्य दो महत्वपूर्ण कारक योजनाकारों ने खोजे है – स्वाथ्य एवं शिक्षा | प्राथमिक एवं माध्यमिक के आगे की शिक्षा तथा इस स्तर पर भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा गांवों में उपलब्ध न होने के कारण जिन्हें भी संभव है वो अपने बच्चों को शिक्षा हेतु शहर में भेजना पसंद करते है | एकबार पढ़ाई के लिए शहर गया बालक पढ़-लिख कर जवान होने पर गांव क्यों लौटेंगे ? अतः गांव के गांव ही युवाओं से रिक्त होते जा रहे है | अनेक राज्यों में आने वाले दिनों में यह एक बहुत बड़ी चुनौती होगी | नई पीढ़ी जब गांव में रहेगी ही नहीं तो ये संचार साधन, ये बिजली किस काम आयेगी ?

ग्रामीण स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए स्थिति बड़ी विकट है | अनेक स्थानों पर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र उपलब्ध ही नहीं है | जहाँ भवन उपलब्ध है वहां भी चिकित्सकों का अभाव है | कोई चिकित्सक गांव जाना ही नहीं चाहता है | सरकार ने अनेक प्रयास कर लिए, कुछ वर्षों की अनिवार्यता कर दी, अतिरिक्त भत्ता देना प्रारंभ कर दिया फिर भी चिकित्सक शहर छोड़ना नहीं चाहता है | निजी व्यवसाय में इतनी अधिक कमाई है कि महाराष्ट्र जैसे राज्यों के शहरों के सरकारी अस्पतालों में भी चिकित्सक नहीं जाना चाहते है | अतः स्वास्थ्य सुविधाओं का गांवों में उन्नयन असंभव के बराबर है | इस हेतु नए सिरे से सोचना होगा |

शहरीकरण की नकल के रूप में ग्रामविकास का विचार किया जा रहा है | इस सोच में ही मूलभूत परिवर्तन आवश्यक हैsgv | वर्तमान में विकास के वैश्विक परिमाणों में शहरीकरण एक प्रमुख मापदंड है | जिस देश में जितना अधिक शहरीकरण होगा उसे उतना ही अधिक विकसित माना जाता है | समूची जनसंख्या के कितने प्रतिशत जनसंख्या शहरी है यह विकास का मापदंड है | इसी जीवनदृष्टि के कारण गांवों का शहरीकरण ही गांव का विकास माना जा रहा है | ग्राम विकास के नाम पर सारा सरकारी चिंतन व योजनायें इसी दिशा में है | यह पूर्णतया अभारतीय विचार है | भारत में गांव एक परिपूर्ण जैविक इकाई है | पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने ग्रामोदय के एकात्मिक प्रारूप में इस बात का विचार किया है | सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक स्तर पर पूर्णतः स्वावलंबी ग्रामों अथवा ग्रामसमूहों का विकास किया जाना भारत में ग्रामविकास का माध्यम हो सकता है | गांवों की जीवनशैली में कृषि व गोरक्ष यह केवल आर्थिक उत्पादन के साधन न होकर उनका सांस्कृतिक व सामाजिक मूल्य भी है | जब तक हम इन दोनों को लाभ का व्यवसाय नहीं बनाते तब तक ग्रामोदय के सारे प्रयास अधूरे ही होंगे | वर्तमान समय के अनुरूप कृषि एवं गोरक्षा के साथ-साथ ग्रामीण उद्योग और कृषि उत्पादों के व्यापार को भी जोड़ा जा सकता है | इन सबके आधार पर संपूर्णरूपेण स्वावलंबी ग्रामों का विकास किया जा सकता है |

इस विकास की प्रक्रिया का भी जैविक होना आवश्यक है | स्वावलंबी समाज निर्माण सरकारी बैसाखियों से नहीं हो सकता | सरकारी योजनाओं के माध्यम से सरकारी पैसा सरकारी अधिकारियों द्वारा ही खर्च किया जाता रहा तो सारे विश्व की पूंजी एक गाँव में लगाने पर भी ग्रामविकास कतई संभव नहीं है | योजना के स्तर से ही ग्रामीणों का न केवल सहभाग अपितु नेतृत्व सच्चे ग्रामविकास में अनिवार्य है | सारा गांव पूर्ण जागरूकता के साथ संगठित होकर एक मन से विकास का संकल्प ले तब वह ग्रामविकास का प्रथम चरण होगा | भौगोलिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक आधार पर कुछ गांवों के समूह बनाये जा सकते है | समूह में कितने और कौनसे गांव हो इसका निर्णय भी ग्रामवासी ही आपस में मिल कर करें | नैसर्गिक संसाधन, मानव बल, आर्थिक उपलब्धता तथा भौगोलिक दूरी के आधार पर पूर्ण स्वावलंबी ग्रामसमूह विकसित करने हेतु आवश्यक गांवों की संख्या ग्रामवासी निर्धारित करेंगे | यह एकत्रिकरण बहुत अधिक कठोर नहीं होना चाहिए | और अधिक ग्रामों को जोड़ने अथवा कुछ गांवों को समूह बदलने की लचीली सुविधा इस व्यवस्था में उपलब्ध हो | कुछ गांव धीरे-धीरे अपनेआप में ही स्वावलंबी बनने का प्रयत्न कर सकते है | इस स्थिति में उन्हें किसी समूह का हिस्सा बने रहने की आवश्यकता नहीं रहेगी |

यह ग्रामसमूह अपने स्तर पर नियोजन करे कि किस प्रकार वे पाँच-सात वर्षों की अवधि में पूर्णतः आत्मनिर्भर हो सकते है | शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, गौरक्षा, व्यापार के साथ ही ऊर्जा के उत्पादन आदि में भी यह ग्रामसमूह पूर्णरूपेण आत्मनिर्भर बने | इस हेतु ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों का उपयोग करना आवश्यक होगा | तेलंगाना के लगभग 40 गांव जैव-इंधन (bio-diesel) के माध्यम से बिजली के उत्पादन में आत्मनिर्भर हो गए है | ऐसे ही सौर, पवन, छोटे नालों पर बने चक बाँध आदि को मिलाकर विकेन्द्रित विद्युत् आत्मनिर्भरता को प्राप्त किया जा सकता है | सिंचाई एवं पेयजल हेतु भी इसी प्रकार का चिंतन एवं नियोजन किया जाये कि कुछ अवधि में यह ग्रामसमूह उस मामले में भी आत्मनिर्भर बन सके | कृषि का नियोजन भी ‘स्वपोषण’ व ‘व्यापार’ इन दो रूपों में किया जाये | गांवों की अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ ही गांव शहरों के भी अन्नदाता है | आसपास की नगरीय आवश्यकताओं का ध्यान रखते हुए कृषि का व्यापारिक नियोजन किया जाये | फल, सब्जी और अनाज की आपूर्ति के अलावा अनेक ऐसे कृषिउत्पाद है जिनकी औद्योगिक उपयोगिता है | इन सभी का अपनी स्थानीय विशेषताओं के अनुरूप नियोजन किया जाये तो कृषि न केवल भरण-पोषण का अपितु अच्छे लाभ का माध्यम भी बन सकती है | किंतु यह एकल चिंतन अथवा प्रयोग से संभव नहीं है | सामूहिक चिंतन, संगठित प्रयास इस हेतु अनिवार्य है | कुछ कृषिउत्पाद सीधे बाजार में बेचने के स्थान पर थोड़ी सी प्रक्रिया करने से उनमें बहुत बड़ी मूल्य वृद्धि हो सकती है | अतः ऐसे कृषि के सहयोगी ग्रामोद्योगों की योजना भी ग्राम्य विकास का महत्वपूर्ण अंग है |

इस sgv3सब हेतु, शिक्षा में भी स्वावलंबी विचार इन ग्रामसमूहों को करना होगा | अपने नए पीढ़ी की शैक्षिक आवश्यकताओं की पूर्ति अपने ही ग्रामसमूह में हो सके ऐसी आत्मनिर्भरता को लक्ष्य किया जाये | हर बालक को 8वी तक जीवनोपयोगी सामान्य शिक्षा सहज, सुलभ, जहा तक हो सके निःशुल्क प्राप्त हो | उसके आगे की शिक्षा का नियोजन बालकों के स्वभाव एवं रूचि के अनुरूप तथा ग्रामसमूह की आवश्यकता के अनुसार किया जाये | इस हेतु विशेष रूप से ग्रामीण शिक्षा संस्थानों का निर्माण करना पड़ेगा जिसमें कृषि एवं कृषि सहायक उद्योगों में कार्य करने का प्रशिक्षण ग्रामीणों को दिया जाये | सामान्य उच्च विद्यालयीन शिक्षा (9वी से 12वी) तथा स्नातक तक महाविद्यालयीन शिक्षा ग्रामसमूह में उपलब्ध हो | केवल परास्नातक अथवा व्यावसायिक शिक्षा हेतु छात्रों को किसी अन्य ग्रामसमूह अथवा शहर में जाने की आवश्यकता रहे | इस प्रकार ग्रामसमूह शैक्षिक आवश्यकताओं हेतु पूर्णतः आत्मनिर्भर बन सकेंगे | स्वास्थ्य सुविधाओं में भी इसी प्रकार की आत्मनिर्भरता पाई जा सकती है | प्रत्येक गांव के एक या दो युवा-युवती को परा-चिकित्सकीय (para-medical) प्रशिक्षण दिलाकर आरोग्य मित्र के रूप में तैयार किया जाये | सामान्य छोटे-मोटे हादसों से होनेवाली छोटी-मोटी चोटें, सामान्य संक्रमण, बुखार, जुकाम, पेट की बिमारियाँ आदि के उपचार का ज्ञान व दवाई आरोग्य मित्र के माध्यम से हर गांव में उपलब्ध हो | थोड़े प्रगत उपचार तथा कुछ दिन के निवासी उपचार हेतु प्राथमिक स्वाथ्य केंद्र हर ग्रामसमूह में हो | ग्रामीणों के हाथ इस सबका प्रबंधन/संचालन दिया जाये ताकि चिकित्सकों की साप्ताहिक उपस्थिति व परिचारक कर्मचारियों (nursing staff) की नित्य उपलब्धता सुनिश्चित हो |

इस प्रकार का स्वावलंबी ग्रामविकास तभी संभव है जब शिक्षित, समरस, संगठित, शोषणमुक्त समाज स्थापित किया जाये | यह काम धार्मिक आयोजनों के माध्यम से सदियों से होता रहा है | यज्ञ, कथा, कीर्तन, जत्रा, उत्सव आदि के पारंपारिक आयोजन समाज को सुसंगठित करने के माध्यम रहे हैं | स्वावलंबी ग्रामविकास में इनकी महती भूमिका है | मठों, मंदिरों, धर्माचार्यों तथा सामाजिक संगठनों ने एकात्म स्वावलंबी ग्रामविकास के इस व्रत को अपनाया तो यह स्वप्न साकार होने में बहुत अधिक समय नहीं लगेगा | सरकार की भूमिका केवल उत्प्रेरक (catalyst) की रह जाएगी | रास्तें, भवन, तालाब, कैनाल, उर्जा संयंत्र, शिक्षा जैसी आवश्यक अधोसंरचनाओं (infrastructures) का निर्माण ग्रामीणों के माध्यम से सरकारी अनुदान के उपयोग से हो | बाकि आवश्यक संसाधन समाज के संबल से ही खडे किये जाये |

स्वावलंबी ग्रामविकास की प्रक्रिया भी शासनमुक्त, समाज पोषित व ग्रामीणों पर पूर्ण विश्वास रखनेवाली होगी तभी उचित परिणाम भी प्राप्त होंगे |

अक्टूबर 24, 2015 - Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , ,

3 टिप्पणियाँ »

  1. उत्साह वर्धक लेख के लिये धन्यवाद भाईसाब ! ग्रामविकास व स्वाभलम्बन के परिपेक्ष मे बिभिन्न सामाजिक संघठन , समाज सेवको को भी अपनी स्वेछिक , निस्वार्थ भूमिका भी सुनसचित करनी होगी …इन्द्रजीत

    टिप्पणी द्वारा indrajeet sharma | अक्टूबर 24, 2015 | प्रतिक्रिया

  2. ग्राम विकास को दिशा देने वाला आलेख है। सरकार की भूमिका उत्प्रेरक तक ही रहे तो ही ठीक है। दरअसल अब तंत्र ऐसा विकसित हो गया है लोग सरकार पर निर्भर नजर आते हैं। इस तंत्र को तोड़ने की दरकार है।

    टिप्पणी द्वारा Murari Gupta | अक्टूबर 25, 2015 | प्रतिक्रिया

  3. ग्राम विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण आलेख। ग्राम विकास में सरकार की भूमिक उत्प्रेरक के रूप में ही ठीक। लेकिन अभी हालात ऐसे बना दिए गए हैं कि लोग हर छोटी मोटी जरूरत के लिए सरकारी की ओर मुंह ताकते हैं। इन हालातों को बदलने के लिए कड़े फैसले लेने की जरूरत है।

    टिप्पणी द्वारा Murari Gupta | अक्टूबर 25, 2015 | प्रतिक्रिया


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