उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

पुरस्कार वापसी का राजनैतिक अरण्य रुदन


sahity akadamiप्रश्न यह है कि साहित्यकारों ने माहौल बनाना है या माहौल के अनुसार चलना है | कहते है कि साहित्य समाज का दर्पण है | फिर यदि समाज में किसी विषय पर आक्रोश है तो वह कवि की लेखनी या लेखक के आलेख को विषय देगा | जब लेखनी कमजोर पड़ जाये तब साहित्यकारों को अपना आक्रोश व्यक्त करने के लिए अन्य माध्यम ढूँढने पड़ते है | एक कविता, एक उपन्यास अथवा एक लेख ही क्रान्ति को दिशा देने में समर्थ होता है | अंग्रेजों की नौकरी में बाबूगिरी करते हुए बंकिमचन्द्र की लेखनी से जन्मा एक गीत पूरे भारत को जगानेवाला जागरणमन्त्र बन गया | भारत के अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतंत्रता आन्दोलन के इतिहास में एकमात्र सफल आन्दोलन ‘वंग-भंग’ का प्रेरणागीत ‘वंदे मातरम’ ही था | 1857 से लेकर 1942 तक के अन्य सभी आन्दोलन अंग्रेजों द्वारा निर्ममता से कुचल दिए गए | जिन सीमित उद्देशों के लिए वे आंदोलन चलाये गए थे उनमें भी आंशिक सफलता किसी आंदोलन में नहीं मिली |

1905 में अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन किया और सारा देश एकमुख से मातृभूमि केsaptakoti kanth इस विभाजन का विरोध करने खड़ा हुआ | बंगाल से लेकर महाराष्ट्र तक, पंजाब-उत्तराँचल से लेकर मदुरै तक इस राष्ट्रीय उठाव में क्रान्तिगान बना बंकिम के उपन्यास ‘आनंदमठ’ का वह मात्रुगान ‘बोंदे मातरम’ | मूलतः 1882 में बंगला में लिखे उपन्यास आनंदमठ का सन्यासियों द्वारा गाया गया भक्तिगीत 1896 में गुरुदेव रविन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में जब गाया गया तब भारत का निर्विवाद राष्ट्रगीत बन गया | इसको गाते-गाते क्रान्तिकारी हँसते-हँसते फांसी पर झूल गए | नंदलाल बोस जैसे राष्ट्रीय चित्रकारों ने इस गीत से प्रेरणा पाकर भारत माँ के चित्रों की मालिका बनायी | राष्ट्रकवि सुब्रमण्यम भारती ने भारतभक्ति स्तोत्र लिखा | वंग-भंग का आंदोलन तब सफल हुआ जब 1911 में अंग्रेजों को बंगाल का विभाजन वापस लेना पड़ा | देश पुनः अखंड हुआ | यह वंदे मातरम की ही शक्ति थी जिसने पूरे भारत को एक सूत्र में पिरोया | बंगला साहित्यकारों और उनसे प्रेरित क्रांतिकारियों से अंग्रेज ऐसे भयभीत हुए कि उन्हें अपनी राजधानी कलकत्ता से बदलकर दिल्ली लानी पड़ी | यह है साहित्य की शक्ति |

1905 में भी बंकिमचंद्र सरकारी नौकरी में ही थे | अंग्रेजों के निर्णय का विरोध करने के लिए उन्हें नौकरी से त्यागपत्र नहीं देना पड़ा | साहित्यकार की ताकत उसकी लेखनी होती है | उसे राजनीती की आवश्यकता नहीं पड़ती |

ramprasad bismilराष्ट्र के लिए कार्य करनेवाले देशभक्तों में यदि साहित्य की शक्ति हो तो वह उनकी प्रेरणा को धार देती है और कार्य को गति | रामप्रसाद बिस्मिल जैसा क्रांतिकारी राष्ट्रहित में क्रान्ति के कार्य करने के साथ ही उन्होंने ऐसी सुन्दर कविताओं की निर्मिती की है कि अनेक युवाओं को राष्ट्रकार्य में भाग लेने हेतु प्रेरित किया | भागा-दौड़ी के जीवन में भी उन्होंने इतनी रचनाएं की कि उनका समग्र साहित्य 5 खण्डों में प्रकाशित है | ‘तेरा वैभव सदा रहे माँ, हम दिन चार रहे ना रहे’, ‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले’ ऐसी अनेक सुप्रसिद्ध रचनाएँ इस महान क्रान्तिकारी ने की है | हर क्रांतिकारी भले ही कवि ना हो पर हर कवि क्रांतिकारी जरुर होता है |

इस पार्श्वभूमी पर वर्तमान में साहित्यकारों द्वारा पुरस्कार लौटाने की घटना का विश्लेषण करें तो हम इसे प्रामाणिक आक्रोश के स्थान पर राजनीती से प्रेरित छद्मविलाप ही जानेंगे | यदि वास्तविकता में आक्रोश होता तो वह लेखनी को धार देता और कोई क्रान्ति की रचना निकल पड़ती | जब साहित्यकारों को अपने सृजन के अलावा और किसी धरने, आन्दोलन, प्रदर्शन आदि साधन का उपयोग विरोध करने के लिए प्रयोग करना पड़ता है तब वह साहित्य के नपुंसक होने की स्थिति है |

Akadami boardजो साहित्यकार टीवी चैनलों पर आ-आकर पुरस्कार लौटाने का समर्थन कर रहे है उनके तर्क भी अधूरे है | उन्हें अचानक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कुठाराघात होते हुए दिखाई दे रहा है, असहिष्णुता बढ़ी दिखाई दे रही है, भय का वातावरण समाज में व्याप्त होता दिखाई दे रहा है | इस सबका कोई यथार्थ आधार उनके पास नहीं है | विशेषज्ञ बताते हैं कि साम्प्रदायिक तनाव तथा जातिगत, पन्थगत विभेदों से उपजी हिंसा के मामलों में बड़े स्तर पर कटौती हुई है | गत 10 वर्षों में लगभग 700 ऐसे मामले प्रतिवर्ष हुए है जबकि 2015 के 9 महीनों में मात्र 215 ऐसी घटनाएं हुई है | यह विडम्बना है कि घटनाएं कम होते हुए भी चर्चा अधिक है | तथाकथित विद्वानों द्वारा जानबूझकर इस प्रकार का वातावरण बनाया जा रहा है | माननीय प्रधानमंत्री के चमत्कारिक नेतृत्व में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को मिली प्रचंड लोकतान्त्रिक सफलता कुछ लोगों को हजम नहीं हो रही | इसके पीछे उनके व्यक्तिगत हितों का भी प्रश्न है | गत कई वर्षों से अनेक सरकारी, अर्ध-सरकारी संस्थाओं पर आपसी साठ-गाँठ से निरंकुश शासन चलानेवाले इन ‘ख्यातनाम’ ‘विद्वानों’ की ठेकेदारी समाप्त होती दिखाई दे रही है | एक मजेदार तथ्य यह है कि पुरस्कार लौटानेवाले महानुभावों में वे सारे लोग सम्मिलित है जिन्होंने एक-दूसरे को पुरस्कार बांटे हैं | एक के पुरस्कार में बाकी दो जूरी रहे | जिसे पुरस्कार मिला उसने भी लौटाया और जिसने दिया उसने भी अपना पुरस्कार लौटाया | अब उसके जूरियों में से भी किसी ने पुरस्कार लौटाया | 3-4 चरण बाद पहला पुरस्कारकर्ता आपको जूरी में मिल जायेगा | ऊपर के 2-3 वाक्यों से पाठक संभ्रमित हो तो उसमें आश्चर्य नहीं क्योंकि गत 60 वर्षों से पुरस्कारों की दुनिया में यही हेरा-फेरी चल रही है | ये लगभग वही लोग है जो 15 वर्षों से बिना किसी तथ्य के गुजरात दंगों को लेकर देश-विदेश में बवाल मचाते रहे है | संजीव भट और तीस्ता सेतलवाड जैसे लोगों की पोल सर्वोच्च न्यायलय में खुलने के बाद भी इस कबीले का मगरमच्छी साम्प्रदायिक विलाप बदस्तूर जारी है |

पुरस्कार लौटाने की इस राजनीती के पीछे विदेशी षडयंत्रों को भी नकारा नहीं जा सकता | रूसी जासूसी संस्था केजीबी की फाइलों तथा विकिलीक्स के IYD Logoदस्तावेजों से यह स्पष्ट है कि हमारे यहाँ के कई विद्वान विदेशी पैसों के बूते पर देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त रहे हैं | वर्तमान में वैश्विक परिदृश्य कुछ ऐसा दिखाई देता है जो इस शंका को और अधिक बलवती करता है | गत डेढ़ वर्ष में अंतर्राष्ट्रीय जगत में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ी है | अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस को संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा एकमत से स्वीकार करना भारत की नई मान्यता का परिचायक है | गत कुछ महीनों में हमारे विदेश विभाग में संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषदों में स्थायी सदस्यता हेतु भारत के दावे को अत्यंत बलपूर्वक रखा है | विश्व के बहुसंख्य देशों का इस बात को प्रत्यक्ष व परोक्ष समर्थन मिल रहा है | स्वाभाविक रूप से ही हमारे दोनों पड़ोसियों के पेट में प्रचंड शूल उठा है | गत सप्ताह संयुक्त राष्ट्र संघ के संयुक्त सचिव की भ्रष्टाचार के मामले में हुई गिरफ़्तारी में यह तथ्य सामने आया कि भारत को सुरक्षा परिषद् में स्थान न मिल पाए इस हेतु चीन ने उसे अरबों डॉलर्स की घूस दी थी | हमारे देश में अचानक उठे विद्वत आक्रोश के पीछे भी ऐसा कोई घोर सांसारिक कारण सामने आये तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए | काश कि इन सबके बैंक खातों की निष्पक्ष पूछताछ की जाती |

youthइन सब विद्वानों की प्रेरणा का मुख्य स्त्रोत प्रचार है | यदि प्रसार माध्यम संभल जाये और पुरस्कार लौटाने की खबर दिखाना बंद कर दे तो पुरस्कार लौटाने अपनेआप बंद हो जायेंगे | पर इतनी देशभक्ति प्रसार माध्यमों में कहाँ ? दादरी की निंदनीय घटना को महीनों तक प्रतिदिन घंटों दिखानेवाले ये समाचार माध्यम गणेश पंडाल में पढ़ी जानेवाली नमाज को अथवा संघ के पथसञ्चलन पर पुष्पवृष्टि करते मुस्लिम बांधवों की तस्वीरों को एक बार भी नहीं दिखाते | अतः समाज को जोड़नेवाले तथा राष्ट्र को एकता के सूत्र में बांधनेवाले विषयों को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने का जिम्मा हम जैसे जागृत भारतवासियों का ही है | आन्तरताने ने विश्व खोल दिया है | सामाजिक माध्यम हर हाथ में पहुंचे मोबाईल के माध्यम से बहुत प्रभावी हो चुका है | उत्तरापथ के सुधि पाठकों से निवेदन है कि इस लेख में दिए गए विषयों को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाए | काटकर अपने-अपने माध्यमों पर चिपकाने की पूर्ण स्वतंत्रता आपको है | आपकी चर्चा और टिप्पणी विषय की गंभीरता को समाज में प्रसारित करेगी | अतः टिप्पणी अवश्य दें |

अक्टूबर 27, 2015 - Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , ,

3 टिप्पणियाँ »

  1. विरोध के लिए घटनाएं मत चुनिए

    “घटनाओं को नंगी आंखों से देखिए
    हरा, नीला, पीला चश्मा उतार फैंकिए
    आपके लिए यह उचित नहीं
    आपके निरपेक्ष भाव में ही
    इस देश की उन्नती है।”

    युवा कवि आनंद की ये खूबसूरत पंक्तियां हमारे बुद्धिजीवियों, लेखकों और साहित्यकारों के लिए सबक साबित हो सकती हैं। लेकिन निरपेक्षता का भाव पांच दशक पहले ही खत्म कर दिया गया था।
    चलिए बहुत ज्यादा पीछे नहीं जाते। आपातकाल से शुरू करते हैं। देश में घोर आपातकाल का समय था। लोकतंत्र का गला घोंटा जा रहा था। लगभग इक्कीस महीने तक देश में घटाघोंप अंधेरा रहा। लोगों को लोकतांत्रिक अधिकारों को छीन लिया गया। पूरा इंटरनेट खंगाल लिया। उस समय के सर्वाधिक चर्चित लेखकों में से किसी ने भी उस वक्त अपना सम्मान लौटाना उचित नहीं समझा। इससे भी आगे आज जो ख्यातनाम साहित्यकार अपने सम्मानों का पूरा भोग कर लौटा रहे हैं, उनका भी कोई बयान या विरोध उस समय किसी अखबार, पत्र-पत्रिका में दर्ज नजर नहीं आता। आगे बढ़ते हैं। साल 1984, सिखों के खिलाफ अभियान चलाया गया। सैकड़ों की संख्या में सिखों को मार दिया गया। कितने अफसोस की बात है कि आज सम्मान लौटा कर अखबारों और टीवी चैनलों की सुर्खियां बन रहे इन लेखकों, साहित्यकारों की आत्मा पर तब क्या पत्थर पड़ चुके थे। वे सोए रहे और बौद्धिक जुगाली में मस्त रहे। साहित्य अकादमी तो तब भी थी। सम्मान तब भी दिए जा रहे थे। लेकिन शायद तब इन साहित्यकारों तत्कालीन सत्ता प्रतिष्ठान का यह फैसला उचित लगा होगा। चलिए फिर आगे बढ़ते हैं।
    भोपाल में युनियन कार्बाइड प्लांट के गैस रिसाव की घटना तो याद होगी। यह भी याद होगा कि इस घटना में भोपाल में लाखों की संख्या में सोते-सोते बेकसूर मारे गए। हमारे प्रिय लेखक थोड़ा दिमाग पर जोर डालेंगे तो उन्हें इस घटना के शिकार मृत बच्चे की वह चर्चित तस्वीर जरूर याद होगी जिसमें उसकी देह कंकर-मिट्टी में दबी है और सूनी आंखें न्याय की ओर देख रही हैं। फिर तो यह भी याद होगा कि इस घटना के प्रमुख जिम्मेदार वारेन एंडरसन थे। तब तो हमारे प्यारे साहित्यकारों को यह जरूर याद होगा कि किस तरह एंडरसन को सजा दिलाने की बजाय उसे सत्ता प्रतिष्ठान ने हमारे प्रिय साहित्यकारों, लेखकों और बुद्धिजीवियों की आंखों के सामने से चोरी छिपे रातों-रात भगा दिया गया। साल-डेढ़ साल पहले उस एंडरसन ने अपने देश में दीर्घायु जीवन के बाद चैन की मौत पाई। दुर्भाग्यवश उस वक्त भी हमारे प्रिय साहित्यकारों में से किसी को भी यह याद ही नहीं रहा कि इसके विरोध में सम्मान भी लौटाए जा सकते हैं। संयोग देखिए कि उसी वक्त भोपाल में आयोजित विश्व कविता सम्मेलन में इन दिनों अपना सम्मान लौटा कर मुक्त हो चुके एक महान कवि और साहित्यकार ने कहा था- मुर्दों के साथ मरा नहीं जाता। ऐसी महान सोच के साहित्यकार सामूहिक रूप से देश के सम्मान का अपमान करें, तो उसे क्या कहा जाएं।
    हमारे देश के इन महान साहित्यकारों को जम्मू, पंजाब, दिल्ली और देश के कोने-कोने में रोजी रोटी के लिए बसे कश्मीरी पंडितों की पीड़ा नजर नहीं आती। उनकी नई पीढ़ियां अपने घरों का रास्ता भूल चुकी है। उन मनों पर क्या गुजरती होगी, जिन्हें बंदूक की नोक पर यह कहकर अपने घरों से भगा दिया गया हो कि अपनी बीबी और जवान लड़कियों को छोड़कर यहां से दफा हो जाओ। पूरे पच्चीस साल हो गए उन्हें अपना घर, मोहल्ला, बस्ती छोड़े हुए। उनकी चार-पांच मंजिले घर खंडहर हो आज भी अपने मालिकों का इंजतार कर रहे हैं। लेकिन यहां बसे मलिक उन्हें आने देंगे, मुमकिन नहीं है। लेकिन यह तो मुमकिन था कि इस घटना के विरोध दो-पांच साहित्यकार, लेखक अपना सम्मान ही लौटा देते। और इन मलिकों का विरोध करते। विरोध तो छोड़िए। इन्हें मौका मिले तो ये अब भी उनकी तारीफ कर देते हैं। देश के बत्तीस हजार से ज्यादा परिवार रातों रात अपने घर से बेदखल कर दिए गए। और इन साहित्यकारों के सम्मानों पर जूं तक नहीं रेंगी। शायद इसलिए कि इसमें कोई मजेदार सेकुलरिज्म नहीं था। जिस घटना में थोड़ा बहुत भी सेकुलरिज्म नहीं, सम्मान लौटाने में वो आनंद कहा। देश के मीडिया की सुर्खियों में आने का कोई चांस नहीं। चलिए और आगे बढ़ते हैं। धारा विशेष के साहित्यकारों का प्रसिद्ध शगल। बाबरी मस्जिद। गुजरात दंगे।
    गोधरा की घटना के बाद गुजरात दंगे हुए। इन दंगों में हजारों की संख्या में लोग मारे गए। दोनों समुदायों के लोग मारे गए। इस बड़ी घटना को भी बुद्धीजीवी जज्ब कर गए। उन्हें अपना सम्मान लौटाने का ख्याल उस वक्त भी नहीं आया। और तो और बाबरी मस्जिद ढहाने के वक्त भी इन्हें सम्मान लौटाने की फुर्सत नहीं मिली।
    जो जीवन भर दूसरे पक्ष के लेखन को लेकर असहिष्णु रहे वे आज असहिष्णुता को लेकर सवाल खड़ा कर रहे हैं। लोकतंत्र के पक्ष में इनकी भावना भी संदेह के घेरे में हैं। वर्तमान प्रधानमंत्री को लेकर बुद्धीजीवियों, जिसमें आज सम्मान लौटाने वाले भी कुछ साहित्यकार शामिल है, ने बाकायदा एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर उन्हें वोट नहीं देने की अपील की। जिसे एक खास समाचार पत्र में पहले पृष्ठ पर छापा गया। लोकतंत्र में उनकी आस्था को इससे समझा जा सकता है।
    साहित्यकारों के सम्मान वापसी की एक के बाद एक घटनाओं से इनके पीछे क्या मकसद हो सकता है? किसी के लिए समझना मुश्किल नहीं है। सोचिए जो घटनाएं राज्य के दायरे में हैं, जिन पर राज्य सरकारों की कार्यवाही करनी है, उनके लिए बुद्धीजीवी केंद्र को सिर्फ इसलिए जिम्मेदार ठहरा रहे है, कि उन्हें सरकार के एक खास व्यक्ति से बेइंतहा असहिष्णुता है। क्या लोकतंत्र का यही तकाजा है। घोर आश्चर्य है कि जिस घटना को लेकर इतना हो हल्ला हुआ, उसके सूबे के मुखिया के खिलाफ बुद्धीजिवियों के मुंह से उफ तक नहीं निकला। जैसे देश की हर सांप्रदायिक घटना के पीछे सिर्फ केंद्र की मौजूदा सरकार जिम्मेदार है।
    हर सांप्रदायिक घटना का विरोध कीजिए। जमकर कीजिए। लेकिन घटनाओं को चुन चुन कर विरोध मत कीजिए। इससे आम जन के ह्रदय में आपकी जो अनुपम छवि है, वह धूमिल होती है। आपकी मौलिक लेखनी में फिर बू आने लगती है। आपकी कविताएं फिर वो जज्बात पैदा नहीं कर पाती। वे कृत्रिम लगने लगती हैं। आपकी कहानियों के चरित्र संदेश के घेरे में आने लगते हैं।
    ………………………………….

    टिप्पणी द्वारा Murari Gupta | अक्टूबर 28, 2015 | प्रतिक्रिया

  2. I’m waiting for the day when Congress resigns itself from the national politics to protest ‘rising intolerance’.

    टिप्पणी द्वारा naveensavita | अक्टूबर 30, 2015 | प्रतिक्रिया

  3. ese padkr bahut sara confusion dur ho gaya

    टिप्पणी द्वारा manoj singh | नवम्बर 7, 2015 | प्रतिक्रिया


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