उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

या देवी सर्व संघेशु कार्यपद्धति रूपेण संस्थिता …


पंचमी नवरात्रों की स्कन्द माता की पूजा

उत्तरापथ

संगठन की कार्यपद्धतिः
नवरात्री में आज की देवी स्कंदमाता है। तिथिक्षय के कारण आज पाँचवा दिन है। तिथिक्षय का भी विज्ञान होता है, पर वो फिर कभी| स्कंदमाता कुमार कार्तिकेय की माता के रूप में पार्वती जी का ही नाम है। तारकासुर के वध के लिये स्कंद सेनापति का जन्म हुआ था। इनको षण्मुखनाथ और कार्तिकेय के नाम से भी जाना जाता है। जन्म की कथा भी बड़ी रोचक है। महाकवि कालिदास ने ‘कुमारसम्भव’ में इसका अद्भुत वर्णन किया है। तारकासुर का आतंक बढ़ रहा था। भगवान विष्णु ने देवताओं को बताया कि शिवजी के पुत्र को सेनापति बनाओ तो विजय निश्चित है। पर शिवजी तो माता सति के देहान्त के बाद से अविवाहित है, अब कैसे होगा? हिमालय कन्या गिरीजा उनकी सेवा में रत है। उनको पति के रूप में वरण कर चुकी है। अब तप चल रहा है। पर कैलासपति तो ध्यान में रत बैरागी उनको कौन राजी…

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अक्टूबर 15, 2018 Posted by | Uncategorized | टिप्पणी करे

या देवी सर्वभूतेषु माया रूपेण संस्थिता . . .


नवरात्री पर जय माता दी

उत्तरापथ

संगठन की कार्य प्रणाली:
दूर्गा सप्तशति में मधु-कैटभ वध की कथा आती है। ये अत्यन्त रोचक रुपक है। दो असुर ब्रह्माजी के कान से निकले मैल से उत्पन्न हुए है। उग्र तपस्या से देवी का वरदान पा लेते है। वरदान पाकर उन्मत्त हो जाते है। फिर महाविष्णु उनका वध करते है। देवी की भूमिका असुरों को वर देने पर समाप्त नहीं होती। वे ही क्षीरसागर में शेषशैया पर लेटे विष्णु को सुलानेवाली योग निद्रा भी हैं। ब्रह्माजी के प्रयासों से जब विष्णु नहीं जगते तब वे देवी की प्रार्थना करते है। तब देवी महाविष्णु को जगाती है और असुर संहार के लिये प्रेरित करती है, असुरों की शक्ति तथा कमजोरी का परिचय दे कर मंत्रणा भी देती है।
कथा के रुपक में छिपे प्रतिकों को समझने से ही पुराणों का मर्म खुलकर सामने आता है। ब्रह्मा जी सृष्टिकर्ता है। वे सृजन में रत रहते है। विद्या की देवी सरस्वति के…

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अक्टूबर 15, 2018 Posted by | Uncategorized | टिप्पणी करे

या देवी सर्वभूतेषु धर्मरूपेण संस्थिता . . .


नवरात्री के लिए विशेष

उत्तरापथ

संगठन का कार्य: माता दूर्गा का जीवनकार्य महिषासुर का वध था। सारी रचना इसी बात को ध्यान में रखकर थी। यदि इस पुराण कथा के प्रतिक को समझने का प्रयत्न करते है तो संस्कारों का शास्त्र हमारे सम्मुख आता है। माता का वाहन सिंह है और शत्रु महिष अर्थात भैंसा। दोनों शक्ति के प्रतिक है। एक संयमित पराक्रम का उदाहरण है तो दूसरा विवेकहीन पाशविकता का। मनुष में ये दोनों बीज रुप में उपस्थित होते है। उसे अपने अंदर के सिंहत्व का पालन करना है और उसे अपने लक्ष्य की ओर जाने का वाहन, साधन बनाना है| अनियन्त्रित कामनाओं का भैंसा भी मन में समय समय पर कुलांचे भरता है। उसका मर्दन करना है।
समाज में भी संस्कारों की सिंहशक्ति और असामाजिक महिषशक्ति दोनों पर्याप्त मात्रा में होती है। संगठन को सज्जन-शक्ति को एकत्रित कर उसके पराक्रम का आह्वान करना है। मानवता के विरुद्ध कार्य करने…

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अक्टूबर 15, 2018 Posted by | Uncategorized | टिप्पणी करे

   

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