उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

लाडले से करते है प्रेम तो भूल जाए जन्मदिन 


भारतीय संस्कृति शास्त्रीय है । हर परम्परा के पीछे का प्राकृतिक नियम सहज आचरण में लाने से ही समझ में आता है । हमारे सभी उत्सव सामूहिक हैं । परिवार ही समाज की इकाई है । अतः कम से कम परिवार का सहभाग तो आवश्यक ही होता है । कोई भी भारतीय पारम्परिक उत्सव एक व्यक्ति को केंद्र में रखकर नहीं होता । एकसठ वर्ष आयु में होनेवाले शट्यब्दपूर्ति अथवा अस्सी वर्ष के बाद होनेवाले सहस्रचंद्र दर्शन समारोह में भी पूरे विस्तृत कूटुंब का सहभाग अनिवार्य होता है । दूसरी ओर पश्चिम का पूरा विचार ही व्यक्तिकेंद्रित होती है । इसी के परिणामस्वरूप पश्चिम में पूरा समाज बिखर गया और परिवार भी टूट रहे है ।

पश्चिम के प्रभाव से आज हम भारतीय भी व्यक्तिकेंद्रित सोच को बढ़ावा देने लगे है । २० वर्ष पूर्व तक छोटे बालकों के जन्मदिन मनाने की भी कोई परम्परा नहीं थी । शरीर को धर्म का साधन माननेवाली भारतीय संस्कृति में उसके जन्म का कोई उत्सव नहीं मनाया जाता ।

यह अत्यंत वैज्ञानिक प्रक्रिया है। शरीर हमारे व्यक्तित्व का सबसे स्थूल अर्थात सबसे कम महत्व का अंग है। इस कारण से इसके प्रति अधिक आस्था बनाने से मनुष्य के जीवन का लक्ष्य की शरीर का सुख अर्थात भोग बन जाता है। भारतीय संस्कृति में भोग गौण है, त्याग को महत्व दिया है। अतः, व्यक्तित्व विकास में शरीर से अधिक सूक्ष्म आयामों का विकास अधिक महत्वपूर्ण माना गया। मन, भावना, बुद्धि यह व्यक्तित्व के सूक्ष्म रूप हैं। इनका विकास करना मनुष्य जीवन का लक्ष्य है। जीवन की उपलब्धि में भी शरीर के सुख से अधिक मन एवं बुद्धि के सुख को महत्व देना भारतीय संस्कृति है।

इसीलिए शरीर के जन्म का हमारे लिए बहुत अधिक महत्व नहीं है। शरीर के जन्म का महत्व बढ़ाने से मनुष्य प्राथमिकताएं बदल जाती हैं। शरीर अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। आज कम आयु में बड़े-बड़े रोग होने की जो स्थिति बनी है उसका एक कारण शरीर के प्रति बढ़ता मोह भी है। हम सब जानते हैं कि शारीरिक स्तर पर भी मांसपेशियों का विकास करना हो तो हमें उन्हें कष्ट देना होता है। व्यायाम करना पड़ता है। सूर्य नमस्कार, दंड, बैठक आदि व्यायाम करने से ही हमारे शरीर का स्नायुतंत्र और मांसपेशियां बलवान होती है। यदि हम शरीर का आवश्यकता से अधिक लाड करेंगे तो वह दुर्बल होगा। शरीर को तपाने से ही व्यक्तित्व का विकास होता है।

इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए भारत में जीवंत व्यक्तियों के जन्मदिवस मनाने की परंपरा नहीं है । केवल मृत व्यक्तियों के, वह भी महापुरुषों के जन्मदिवस को जयंती के रूप में मनाया जाता है। जिसने अपने जीवन में ईश्वरीय शक्तियों का अद्वितीय प्रगटीकरण किया उसे अवतार माना जाता है। ऐसे अवतारों के जन्मदिवस पर अन्य लोग उन्हीं के समान चारित्रिक विकास की प्रेरणा प्राप्त करें इस दृष्टि से जयंतिया मनाने की परंपरा है। वह भी उस महापुरुष के जीवन काल में नहीं होता उसके मृत्यु के उपरांत अर्थात उसके शरीर के न रहने पर ही जयंती मनाई जाती है। हमारे पारिवारिक पूर्वजों के स्मरण के लिए उनके शरीर शांत होने का अर्थात मृत्यु का दिनांक अधिक महत्वपूर्ण होता है। उस तिथि पर श्राद्ध कर हम उनके प्रति अपनी श्रद्धा को प्रगट करते हैं। अपने दादाजी प्रपितामह आदि के जन्म दिवस मनाने की परंपरा भारत में नहीं है । उनके मृत्यु की तिथि अर्थात पुण्यतिथि पर उनका स्मरण करने की परंपरा है।

शरीर को अधिक महत्व देने की सभ्यता पश्चिम में विकसित हुई। अतः वहां पर भौतिकता, उपभोग वाद आदि को बहुत बड़े प्रमाण पर बल मिला। आज वे भी इस विकृत विकास के दुष्प्रभाव को समझ रहे हैं किंतु उपाय अभी भी दृष्टिगोचर नहीं हो पा रहा। भारत में हमारे ऋषियों ने हजारों वर्ष पूर्व एक अद्भुत पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन शैली का विकास किया। जिसके अंतर्गत मनुष्य जीवन के सूक्ष्मतम आयामों को वरीयता प्रदान करते हुए प्रत्येक के मन में उन्नत जीवन के प्रति उत्कट इच्छा को उत्पन्न करने का सहज कार्य किया। यह एक अद्भुत सामाजिक तकनीक है । समाज में जिसे प्रतिष्ठा प्राप्त होती है अन्य लोग स्वाभाविक उसका अनुसरण करते हैं। महाजनों येन गत: स पंथ:। इस सुभाषित हमें इस बात की ओर इंगित करता है। समाज के वरिष्ठ जिस जिस पथ पर चलते हैं वहीं अन्य के लिए अनुकरणीय हो जाता है।

भारतीय परंपरा में जीवंत मनुष्यों की छवि उतारने की भी परंपरा नहीं है। आजकल हर घर में अपने छोटे बच्चों से लेकर सभी के चित्रों को बड़े-बड़े आकार में मुद्रित कर भित्तियों पर सुशोभित करने का चलन हो गया है। यह शोभाचार व्यक्ति की आयु का नाश करता है। दो दशक पूर्व भी हिंदी फिल्मों में इस प्रकार के संवाद सुनाई देते थे जब धमकी देते हुए कहा जाता था कि तेरी फोटो टंगा देंगे। इसका अर्थ होता था मार डालेंगे क्योंकि मरने के बाद ही फोटो टांगी जाती थी। आज हम अपने ही लाडलों की जीवित होते हुए फोटो पर टांग रहे हैं । यह उनकी आयु का क्षरण करने का कारण बनता है। बढ़ती हुई बीमारियों का भी यही कारण है।

वैसे ही सबके हाथ में भ्रमणध्वनी में ही छवि को बंदी बनाने की सुविधा- कैमरा आ जाने से हर बात पर फोटो खींचने की आदत सी पड़ गई है। किसी और छायाचित्रकार की भी आवश्यकता नहीं रही। सभी आजकल खुद खेंचू हो गए हैं। छोटी-छोटी बात पर स्वयं की छवि उतारने की आदत सी लग गई है। अज्ञान वश हम यह नहीं जानते ऐसा करने से हम अपने शरीर की हानि कर रहे हैं। मन में शरीर को आवश्यकता से अधिक महत्व देने के कारण मानसिक विकास में भी बाधा पड़ रही है। अनुशासन समाप्त हो रहा है। स्मरण शक्ति कम हो रही है । क्रोध बढ़ रहा है । छोटे छोटे बालक भी विषाद के शिकार हो रहे हैं। उबना (बोर होना) यह बालपन में कभी नहीं सुना था किंतु आज जीवन के अत्यंत सृजनशील पड़ाव में भी मनुष्य उब का शिकार हो गया है। इसका भी एक कारण अत्यधिक छवि उतारना है। मां की कोख से बाहर निकलते ही हर मिलने आने वाला उस छोटे बालक की अपने अपने भ्रमणध्वनी में छवि उतारता हैl वहां से प्रारंभ कर इतनी छवियां उस बालक की उतारी जाती है कि उसकी प्राणशक्ति का हरण हो जाता है। इच्छाशक्ति भी प्राणशक्ति पर ही निर्भर करती है। शरीर को महत्व देने से इच्छाशक्ति में भी कमी आती है। ब्रह्मचर्य के कायम न रहने का भी कारण शरीर का बढ़ा हुआ महत्व है।

इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए समझदार माता पिता अपने बच्चों के अंग्रेजी तिथि से जन्मदिन ना मनाएं। किसी भी प्रकार से ना मनाएं। पश्चिमी पद्धति तो अत्यंत विकृत है ही। दीप बुझाना, केक काटना यह तो मन को नकारात्मक संस्कार देते ही हैं, किंतु इसके पर्याय के रूप में कुछ संगठनों ने जन्मदिन के अवसर पर यज्ञ करना, आरती उतारना ऐसी भारतीय पद्धतियों का विकास किया है। वे समझते हैं कि इस प्रकार से उन्होंने पश्चिमी सभ्यता को मात दे दी है। किंतु यह तो और भी घातक है। हमारे यहां औक्षण अर्थात आरती उतारने की परंपरा विशिष्ट उत्सवो में है। जैसे रक्षाबंधन पर आरती उतारी जाती है। अक्षय तृतीया पर घर के बड़े भाई की आरती उतारते हैं। यह सारे अवसर शरीर के उत्सव से नहीं जुड़े हैं संबंधों के उत्सव से जुड़े हुए हैं। अतः आरती संबंधों की महत्ता को बालक के मन पर संस्कारित करती है। शरीर के जन्म का उत्सव मनाते समय शरीर की आरती उतारने से शरीर ही जीवन का सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य है यह संस्कार बालक में जाता है। ऐसा शरीर केंद्रित बालक अपने जीवन में संबंधों को भी केवल शारीरिक स्तर पर ही समझता है। ऐसे में बहुत कम आयु में ब्रह्मचर्य का खंडित होना स्वाभाविक ही है । समाज करता है, कक्षा में पढ़ने वाले सभी बच्चों का होता है, विद्यालय में यह परंपरा है, हमारे सभी संबंधियों के घरों में भी बालकों के जन्मदिन मनाए जाते हैं इसलिए विवशता से हमें भी करना पड़ेगा इस प्रकार के बहाने दे करके अपने बच्चों के जीवन को गलत दिशा में ले जाने से बचे।

स्वयं का भी जन्मदिन ना मनाएं, बच्चों का भी जन्मदिन ना मनाएं। जन्मदिन का महत्व ही समाप्त कर दें। सामाजिक माध्यमों में फेसबुक, टि्वटर आदि पर अपने जन्मदिन को लिखना ही बंद कर दे। ताकि हर कोई देख कर आपको शुभेच्छा देने के नाम पर शरीर के जन्म की याद न दिला सके। अपने जीवन के उदात्त लक्ष्य को खोजने इससे बड़ी कोई बाधा नहीं है। पशु और मनुष्य में सबसे बड़ा अंतर यही है कि पशु शरीर से परे नहीं सोचता और मनुष्य शरीर से परे ही जीवन के लक्ष्य को खोजता है।
मानवता के रूप में भी शरीर के जन्मदिन को मनाना अनुचित ही है। यह हमारे भीतर सुप्त पाशविकता को जगाने का ही कार्य करेगा।

मनुष्य का जीवन सूर्य की गति के साथ जुड़ा हुआ है क्योंकि इस जगत में सूर्य ही महाप्राण का मूल स्रोत है। सूर्य से ही प्राणशक्ति प्राप्त होती है। यह प्राणशक्ति ही हमारे जीवन को लक्ष्य केंद्रित बनाती है। अतः सात्विक प्राणों को बढ़ाना और उनके क्षरण को रोकना ये दोनों मनुष्य के जीवनचर्या के महत्वपूर्ण आधार है। इस दिशा में शरीर केंद्रित गतिविधि जैसे जन्मदिन मनाना, खुद खेंचूअथवा दूसरे द्वारा खींची हुई छवि को रक्षित करना यह सब बड़ी बाधाएं हैं। अतः जिन्हें अपने जीवन में कुछ भी सार्थक, प्रभावशाली, परिणामकारी, उदात्त, महान कार्य करने की इच्छा है वे स्वयं और अपने परिवार जनों को इन विनाशकारी प्रचालनों से बचाएं।

जून 5, 2019 - Posted by | आलेख, सामायिक टिपण्णी | ,

1 टिप्पणी »

  1. उत्तम। अत्यंत सुंदर और सरल विचार । हार्दिक धन्यवाद

    टिप्पणी द्वारा अपर्णा वशिष्ठ | जून 5, 2019 | प्रतिक्रिया


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