उत्तरापथ

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राष्ट्रीय शिक्षा नीति में परिवर्तन के बीज बिंदु


राष्ट्रीय शिक्षा नीति का प्रारूप शिक्षा विभाग ने चर्चा के लिए प्रस्तुत किया है । इस प्रारूप में अनेक ऐसे बिंदु है जो आमूलचूल परिवर्तन के कारक बन सकते हैं। इन बीज बिंदुओं की सूची प्रस्तुत है । हम सब इस पर कार्य योजना बनाएँ ।

१. नाम परिवर्तन – केन्द्रीय मंत्रालय का नाम पुनः एक बार शिक्षा मंत्रालय करने का प्रस्ताव इस प्रारूप में हैं। भारतीयता के भाव को ध्यान में रखते हुए इस परिवर्तन का स्वागत  करते है । आगे सुझाव यह है कि संस्कृति भी जोड़ा जाय। स्वतंत्रता के समय शिक्षा-संस्कृति मंत्रालय ही था। वर्तमान में संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत लगभग 150 ऐसे संस्थान है जो कला शिक्षा के कार्य में संलग्न हैं । दोनों मंत्रालय साथ जुड़ने से शिक्षा एवं संस्कार का कार्य अधिक परिणामकारी और परिपूर्ण हो जाएगा ।

२. राष्ट्रीय शिक्षा आयोग – अनेक वर्षों से शिक्षा क्षेत्र की माँग रही है कि शिक्षा का प्रबंधन और संचालन शिक्षकों तथा शिक्षाविदों के हाथ में होना चाहिए । इस प्रारूप में आयोग की अनुशंसा की गई है । आयोग का स्वरूप अधिक स्वायत्त, शक्तिशाली हो इस हेतु शिक्षविदों का सहभाग बढ़ाया जाय। वर्तमान स्वरूप में कुल 20-30 सदस्यों में 50% शिक्षाविद होंगे । शिक्षण मंडल द्वारा प्रस्तुत रूपरेखा में 65-70% शिक्षाविद रखने का सुझाव है । अध्यक्ष प्रधानमंत्री होंगे ही,  प्रस्तावित प्रारूप में उपाध्यक्ष शिक्षा मंत्री को रखा है उसके स्थान पर राष्ट्रीय ख्याति के विद्वान उपाध्यक्ष होने से आयोग अधिक स्वायत्त होगा । आयोग का कार्य केवल सुझाव देनेवाला ना होकर कार्यपालिका(Executive) के रूप में हो। सभी नियंत्रक इसके अधीन हो ।

वर्तमान प्रारूप (draft) में ये दोनों विषय अंत में अन्य विषय के रूप में आए है जबकि इनका संदर्भ पूर्व के अध्यायों में भी है। शिक्षा नीति के अंतिम स्वरूप में इन दोनों क्रांतिकारी परिवर्तनों को प्रारम्भ में ही स्थान दिया जाय ।

३. लचिलापन – शिक्षा की संरचना में लचिलापन अत्यंत महत्वपूर्ण है। शिक्षा नीति के प्रारूप में  5+3+3+4 की रचना प्रस्तुत की है । पूर्व प्राथमिक शिक्षा को भी जोड़ा गया है । 9-12 को एकत्र सोचा गया है । इस स्तर पर विषय चुनाव में लचिले विकल्प प्रदान किए गए है। विज्ञान, वाणिज्य, कला शाखाओं के भेद को मिटा कर मिश्रित विषय चयन का विकल्प भी रखा गया है । 4 वर्षों में 40 विषय के गुणांक (Credit) प्राप्त करने होंगे । इसमें 15 व्यावसायिक विषय होने अनिवार्य हैं । इस प्रावधान के लागू होने से शिक्षा का स्वरूप ही बदल जाएगा। उच्च शिक्षा में भी स्नातक पूर्व और स्नातक शिक्षा का प्रावधान रखा है। Multiple exit का प्रावधान भी हो| जैसे प्रथम वर्ष की शिक्षा पूरी करने पर यदि किसी को अध्ययन छोड़ना पड़ेगा तो उसे प्रमाणपत्र मिल सके| द्वितीय वर्ष की शिक्षा पूर्ण करने पर पदविका अर्थात डिप्लोमा तथा 3 वर्ष पूर्ण करने पर पदवी (डिग्री) प्राप्त हो| 4 वर्ष के अध्ययन के बाद सम्मान पदवी (ऑनर्स डिग्री)| जिसने सामान्य पदवी प्राप्त की हो उसे 2 वर्ष का परास्नातक और जिसने 4 वर्ष की ऑनर्स डिग्री प्राप्त की हो उसे 1 वर्ष का परास्नातक (पोस्ट ग्रेजुएशन) पाठ्यक्रम करना पड़े।

४. राष्ट्रीय शिक्षा नीति – प्रारंभ में 2015 जनवरी में जब शिक्षा नीति पर कार्य प्रारंभ हुआ तब इसे नई शिक्षा नीति कहा गया था| भारतीय शिक्षण मंडल ने लगातार यह बात समाज और सरकार के सामने रखी कि हर 10-15 वर्ष बाद नई शिक्षा नीति आ ही जाती है किंतु यदि वास्तविक अर्थ में हम शिक्षा में दूरगामी परिवर्तन करना चाहते हैं तो इस बार शिक्षा की नीति को ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति’ कहा जाना अधिक उचित है| कस्तूरीरंगन समिति को शिक्षा नीति के प्रारूप लेखन का दायित्व देते समय सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति शब्द प्रयोग किया| इस समिति ने भी सही अर्थ में राष्ट्रीय प्रारूप समाज के सम्मुख रखा है| यह प्रारूप कई आयामों में सच्चे अर्थों में राष्ट्रीय प्रारूप है| पहली बार इतनी बड़ी संख्या में व्यापक रूप से लोगों का सहभाग प्राप्त कर शिक्षा नीति का प्रारूप बनाया गया| एक लाख से अधिक गांवों में शिक्षा नीति पर चर्चा की गई। सांस्कृतिक अर्थ में भी यह शिक्षा नीति का प्रारूप राष्ट्रीय है| भारत की मौलिक विचारधारा के अनुरूप अनेक बातें शिक्षा नीति के प्रारूप में हमें दिखाई देती है। पुरानी विदेशी शिक्षा नीति को पूर्णतः परिवर्तित कर भारत केंद्रित, राष्ट्र निर्माणकारी शिक्षा व्यवस्था के निर्माण की नींव इस प्रारूप में हम स्पष्ट देख सकते हैं| उस अर्थ में भी यह शिक्षा नीति राष्ट्रीय है|

५. भारतीय भाषा – शिक्षा नीति के प्रारूप में भारतीय भाषाओं के महत्व को अधोरेखित अवश्य किया है| उच्च शिक्षा भी भारतीय भाषाओं में उपलब्ध हो ऐसी अनुशंसा नीति करती है| यह क्रांतिकारी सुधार हो सकता है| अभियांत्रिकी, चिकित्सा जैसे व्यावसायिक पाठ्यक्रमों सहित सभी पाठ्यक्रमों में भारतीय भाषाओं का विकल्प उपलब्ध कराना आवश्यक है| इससे प्राथमिक कक्षाओं में भारतीय भाषाओं का महत्व बढ़ जाएगा| यह बिंदु भाषा नीति के अध्याय में तो आया है किन्तु इसे उच्च शिक्षा के अध्याय में भी सम्मिलित करना आवश्यक है| पूर्व प्राथमिक एवं प्राथमिक स्तर पर प्रथम भाषा अथवा मातृभाषा भी शिक्षा का माध्यम हो यह बात भी शालेय शिक्षा के अध्याय में भी आ जाए। भाषा नीति में शास्त्रीय भाषा का उल्लेख तो है किन्तु उसकी परिभाषा स्पष्ट नहीं है| संस्कृत केवल अनेक भाषाओं में से एक न होकर सभी भाषाओं के शुद्ध अध्ययन में उसका महत्व सर्वविदित है| इस बिंदु को शिक्षा नीति की प्रस्तावना एवं भाषा वाले अध्याय में तो लिखा है किन्तु त्रिभाषा सूत्र को लागू करने से सर्वाधिक अन्याय संस्कृत के साथ ही होता है| प्रादेशिक भाषा और अंग्रेजी अनिवार्य हो जाती है तथा अहिंदी भाषी क्षेत्र में हिन्दी का आग्रह करने पर संस्कृत बाहर हो जाती है| अतः त्रिभाषा सूत्र के अलावा संस्कृत को भाषा विज्ञान की नींव मानकर योग के समान पूर्व प्राथमिक से आठवी कक्षा तक अनिवार्य रूप से पढ़ाया जाएँ|

६. National Research Foundation (NRF) – राष्ट्रीय अनुसंधान न्यास एक क्रांतिकारी संकल्पना है जिसके अंतर्गत उच्च शिक्षा में अनुसंधान को नई गति मिलेगी| इससे समाजोपयोगी, उद्देश्यपूर्ण और परिणामकारी अनुसंधान होगा| इसी हेतु से भारतीय शिक्षण मंडल प्रेरित रिसर्च फॉर रिसर्जनस फाउंडेशन भी प्रभावी कार्य कर रहा है| हमारा सरकार से सुझाव है कि NRF का दायित्व RFRF को दे दिया जाएँ| 

७. शिक्षक – शिक्षक के पद का महत्व भारत में हमेशा से रहा है जो गत कुछ वर्षों में कुछ प्रमाण में कम होता प्रतीत हो रहा है| शिक्षकत्व समाज में पुनः प्रतिष्ठित होगा तो समाज समर्थ बनेगा| इस हेतु शिक्षा नीति में दो उपाय सुझाए हैं – अध्यापक शिक्षा का व्यावसायिक स्वरूप तथा अनुबंध नियुक्ति पूर्ण प्रतिबंध| वर्तमान में अध्यापक बनना सबसे अंतिम विकल्प के रूप में देखा जाता है| शिक्षा नीति में कहा है कि दो वर्ष के पाठ्यक्रम को त्वरित बंद किया जाएँ और केवल चार वर्ष का एकीकृत पाठ्यक्रम चलाया जाएँ जिससे बारहवी के बाद संकल्पबद्ध छात्र ही अध्यापन शिक्षा में प्रवेश लें| वर्तमान में शिक्षकर्मी, गुरुजी के नाम से जो देहाड़ी पर शिक्षक हैं वे काम तो शिक्षक का करते हैं किन्तु वेतन बहुत कम मिलता है| अतः इस प्रावधान को बंद करना भी स्वागत योग्य प्रस्ताव है| शिक्षक की प्रतिष्ठा बढ़ाने में प्रभावी उपाय है|

८. व्यावसायिक शिक्षा – कौशल शिक्षा के नाम पर पूरे देश में बहुत बाद प्रपंच खाद्य हुआ है किन्तु औपचारिक शिक्षा में उसे पर्याप्त स्थान नहीं है| शिक्षा नीति के प्रारूप में शालेय शिक्षा में ही व्यावसायिक शिक्षा भी जोड़ा गया है| 9वी से 12वी के स्तर पर 40 विषयों में गुणांक (credit) में से 15 व्यावसायिक शिक्षा के है| इस प्रकार व्यावसायिक शिक्षा को मुख्य शिक्षा का भाग बनाया गया है|

९. पूर्ण स्वायत्तता – राष्ट्रीय शिक्षा आयोग से प्रारंभ स्वायत्तता का विषय शिक्षा संस्थानों तक बढ़ाया गया है| उच्च शिक्षा में सभी महाविद्यालयों को पूर्ण स्वायत्तता प्रदान करने की अनुशंसा प्रारूप में है| शालेय शिक्षा में भी नीजी विद्यालयों तक को अपने शुल्क निर्धारण का अधिकार देने जैसा क्रांतिकारी विचार शिक्षा नीति के प्रारूप में है| केवल एक अनिवार्यता रखी गई है कि शिक्षा सेवा भाव से दी जाएँ| महाविद्यालयों को तो शैक्षिक, प्रशासनिक और आर्थिक स्वायत्तता दी गई है। स्वयं के पाठ्यक्रमों का निर्धारण भी करने का अधिकार महाविद्यालयों को दिया गया है| भारतीय शिक्षण मंडल इस स्वायत्तता का स्वागत करता है किन्तु शिक्षा के व्यापारीकरण का निदान इससे नहीं होगा| अतः उस हेतु क्रांतिकारी उपाय करने की आवशयकता है| केवल सेवार्थ शिक्षा संस्थान चलाने की बात करना ही पर्याप्त नहीं है, व्यापारिक रूप से चलनेवाले शिक्षा संस्थानों के नियंत्रण की भी सुचारु व्यवस्था करना आवश्यक है| शिक्षण मंडल का सुझाव है कि व्यापारिक संस्थान खोलने की अनुमति प्रदान की जाएँ और उसे समाज में सही ढंग से प्रगट किया जाएँ ताकि अभिभावक निर्णय कर सकें कि उन्हें सेवाभावी संस्थान में प्रवेश लेना है या व्यापारिक संस्थान में|

१०. शिक्षण विधि – वर्तमान में अध्येता केंद्रित (learner centric) बालक केंद्रित (Child centric) शिक्षा की चर्चा होती है। इस हेतु अनेक उपाय किए गए है। उनमें से कई तो ऐसे है को शिक्षकों को विवश करने वाले है। अनेक शिक्षक इन उपायों से स्वयं को बंधा अनुभव करते है। भारत का आदर्श अध्ययन केंद्रित (Learning Centric) तथा शिक्षक आधा रित (teacher based) शिक्षा है। इस राष्ट्रीय शिक्षा प्रारूप में इन दोनों बातों को महत्व दिया गया है। अध्ययन का दायित्व विद्यार्थी का है। शिक्षक तो मार्गदर्शक और सहयोग की भूमिका में होता है। 9 वी कक्षा से गुणांक व्यवस्था लगाने से अध्ययन का दायित्व छात्रों पर होगा । दूसरी ओर पाठ्यक्रम निर्धारण की जिम्मेवारी शिक्षकों पर दी गई है। यदि दोनों अपनी भूमिकाओं का सही निर्वाह करेंगे तो गुरुकुल जैसी आदर्श शिक्षा के निर्माण की संभावना इस बीज में है।

११. समाज पोषण – भारत में सदैव शासन मुक्त शिक्षा व्यवस्था की बात की गई है किंतु इसका अर्थ वर्तमान के निजीकरण से नहीं रहा है। शिक्षा सदा ही समाज का दायित्व रहा है। अतः शिक्षा व्यवस्था समाज पोषित हो ऐसी अपेक्षा की जाती रही है। शिक्षा नीति के प्रारूप में प्रशासन में समाज के सहभाग की व्यवस्था तो है। किंतु निजी के स्थान पर सामाजिक संस्थान की  बात होना भी आवश्यक है। व्यापारी निजी शिक्षा संस्थानों साथ सेवाभावी सामाजिक संस्थानों को भी गैर सरकारी होने के कारण निजी कहना और उनके नियंत्रण केनलिए भी उसी मापदंड का प्रयोग उचित नहीं है। इस विसंगति को दूर करने से हर स्तर पर समाज के सहभाग को बढ़ाया जा सकेगा।

१२. वित्त विपुलता – अनेक वर्षों से सभी शैक्षिक संगठन यह मांग करते रहे है कि शिक्षा मद में सरकार के व्यय को GDP के ६% तक बढ़ाया जाए । इस बात का संज्ञान लेते हुए नीति के प्रारूप में पूरे व्यय के ३०% की बात की है। व्यापारिक संस्थानों को भी सी एस आर कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी के माध्यम से शिक्षा में योगदान करने का प्रावधान विधि में सुधार द्वारा करने की बात नीति के प्रारूप में की गई है। यदि उचित राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ सुझाव को क्रियान्वित किया जाता है तो शिक्षा के क्षेत्र में विपुल मात्रा में वित्त की उपलब्धि हो सकेगी और सभी शिक्षकों को नियमित करने जैसे क्रांतिकारी उपायों को लागू किया जा सकेगा।

१३. वैश्विकता – भारत भारत में ज्ञान के क्षेत्र में कभी सीमाओं का निर्धारण नहीं किया गया हमारे शिक्षक सारे विश्व में शिक्षा प्रदान करते रहे हैं और सारे विश्व के जिज्ञासु भारतीय विश्वविद्यालयों में आकर ज्ञान प्राप्त करते रहे हैं विदेशी शासन के बाद इस स्थिति में परिवर्तन हुआ और हम अपने राजनैतिक सीमाओं में सिमट गए वर्तमान में भारतीय विश्वविद्यालयों को विदेशों में शिक्षा देने का अधिकार नहीं है विदेशी छात्रों के प्रवेश की भी अत्यंत सीमित संभावना अभी भारत के विश्वविद्यालय में है शिक्षा नीति का प्रारूप सीमाओं को खोलता है। विदेशी विश्वविद्यालयों का भारत में स्वागत करने के साथ ही भारतीय विश्वविद्यालयों के विदेशों में प्रांगण (Campus) खोलने की बात शिक्षा नीति ने की है। भारतीय शिक्षण मंडल इस अनुशंसा का स्वागत करता है विदेशी विश्वविद्यालयों के भारत में आने पर कोई आपत्ति नहीं है केवल यह बात स्पष्ट होनी चाहिए कि भारत में उन्हें कोई विशेष सुविधाएं प्रदान नहीं की जाएगी जो विधि अथवा कानून भारतीय विश्वविद्यालयों पर लागू होते हैं उन्हीं के द्वारा यह विदेशी संस्थान संचालित किए जाएंगे। वर्तमान प्रारूप में यह बात इतनी स्पष्ट रूप से नहीं कही गई है अतः शिक्षण मंडल का सुझाव है कि नीति के अंतिम संहिता में इस बात पर ध्यान दिया जाए।

१४. आधार पाठ्यक्रम – उच्च शालेय स्तर से प्रारम्भ कर उच्च शिक्षा तक सभी वर्ष विशेष विषयों के साथ ही अधे अंकों का आधार पाठयक्रम (फ़ाउंडेशन कोर्स) अनिवार्य  किया गया है। यह शिक्षा की समग्रता के लिए आवश्यक है। चाहे जिस भी विषय के विशेषज्ञ हमें बनाने हो कुछ मूलभूत बातें हैं सभी के लिए अनिवार्य होती है।  देश का इतिहास, भूगोल, उसकी परंपराओं का ज्ञान, साथ ही सामान्य नागरिक नियम – जैसे राह पर कैसे चला जाए, स्वच्छता के नियम आदि का भी शिक्षा के औपचारिक रूप में प्रावधान होना आवश्यक है।  समय का मूल्य, समय का नियोजन, कठोर समय पालन जैसे विषय भी इस आधार पाठ्यक्रम का अंग बनने चाहिए। पर्यावरण के प्रति सजगता, सामान्य वित्तीय अनुशासन, बैंक आदि के व्यवहार के बारे में भी जानकारी क्रमशः अधिक प्रगत रूप में आधार पाठ्यक्रम में सम्मिलित की जा सकती है।

१५. भारत बोध पाठ्यक्रम – इसी के अंतर्गत देश के सांस्कृतिक आध्यात्मिक ज्ञान के बारे में पाठ्यक्रम की बात भी शिक्षा नीति के प्रारूप में की गई है। वर्तमान में उत्तर प्रदेश में राष्ट्र गौरव नाम से इस प्रकार की पुस्तक शालेय स्तर पर पाठ्यक्रम का अंग है। शिक्षा नीति के प्रारूप में भारत की ज्ञान परम्परा, गौरव बिंदु, ज्ञानिक परंपरा आदि को सम्मिलित कर एक भारत बोध पाठ्यक्रम हर स्तर पर समाविष्ट करने का सुझाव दिया गया है। आवश्यकता है कि इस बीज बिंदु पर तुरंत कार्य करें। ऐसा क्रमिक पाठ्यक्रम तैयार किया जाए ताकि प्राथमिक शिक्षा से ही अर्थात कक्षा एक से ही परास्नातक पोस्ट ग्रेजुएशन तक भारत के बारे में पूरी जानकारी विद्यार्थियों को प्रदान की जा सके।

१६. पारदर्शी गुणवत्ता पूर्ण व्यवस्थापन- व्यावसायिक पाठ्यक्रमों (Professional courses) के नियमन हेतु बने – MCI, ICAR, BCI जैसी संस्थाएं वर्तमान शिक्षा क्षेत्र के व्यापार और भ्रष्टाचार का केंद्र बन गई है । शिक्षा नीति के प्रारूप में इन संस्थाओं की भूमिका में पूर्ण परिवर्तन सुझाया है। ये संस्थाएं व्यावसायिक मानक नियंत्रण नहीं । PSSB – professional standards setting body। अध्ययन पूर्ण होने के बाद गुणवत्ता निर्धारण हेतु  CA association के समान एक सामान्य उत्तीर्ण परीक्षा (Comon Exit Exam) लें ।

१७. उद्योग का सहभाग – वित्त विपुलता हेतु आर्थिक योगदान के साथ ही शैक्षिक रूप से भी उद्योग जगत का सहभाग शिक्षा में हो ऐसी अनुशंसा इस प्रारूप में है। पाठ्यक्रम निर्धारण, अनुसंधान तथा शिक्षकों को कार्यानुभव जैसे उपायों से उद्योग जगत को शैक्षिक गतिविधि में भागीदार बनाकर उच्च शिक्षा को अधिक व्यवहारिक बनाया जा सकता है।  उच्च शिक्षा में अध्यापकों की नियुक्ति में भी उद्योग अनुभव को शैक्षिक अनुभव के बराबर का स्थान दिया गया है। इससे उद्योग का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त लोग भी अध्यापक बन सकेंगे। ऐसे अध्यापक अधिक परिणामकारी सिद्ध होंगे।

१८. कला और सामाजिक विषय के राष्ट्रीय महत्व के संस्थान – कला, साहित्य में रुचि होते हुए भी केवल सामाजिक प्रतिष्ठा के कारण अनेक छात्र IIT में प्रवेश लेते है। मौलिक विज्ञान के प्रति छात्रों का रुझान बढ़ाने हेतु 10-15 वर्ष पूर्व ISER, NISER जैसी संस्थाओं का प्रारम्भ किया गया। इस शिक्षा नीति में कला क्षेत्र माइस प्रकार के राष्ट्रीय महत्व के संस्थान स्थापित करने का निर्णय लिया गया है। Indian Institute of Liberal Arts – IILA तथा अनुवाद के लिए Indian Institute of Translation & Interpretation- IITI का सुझाव प्रारूप में है। इसी प्रकार सामाजिक शास्त्र के लिए Indian Institute of Social Sciences -IISS तथा भाषा के लिए Indian Institute of Languages & Linguistics – IILL का भी विचार किया जाना चाहिए। खेल तथा युद्ध विद्या के लिए भी राष्ट्रीय महत्व के स्न्स्थान खोले जाने चाहिए ताकि प्रतिभा के अनुसार प्रतिष्ठित उच्च शिक्षा का चयन विकल्प हर मेधावी छात्र के पास हो।

१९. भारत केंद्रित – इस शिक्षा नीति के प्रारूप की विशेषता है कि इसमें सभी स्तरों पर भारत को केंद्र में रखा गया है। भारत की परिस्थितियों के अनुसार नीतियों का सुझाव दिया गया है। वैश्विक स्तर तथा प्रतिस्पर्धा की चर्चा तो है किंतु विश्व में स्थान प्राप्त करने के लिए अंधानुकरण की बात नहीं की है। वैश्विक बातों को देशानुकूल कर स्वीकार करने की सम्भावना इस प्रारूप में है। क्रियान्वयन के समय इन बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए। सभी विद्या शाखाओं के संदर्भीकरण की आज नितांत आवश्यकता है। इस प्रारूप में चिकित्सा शिक्षा के बारे में विस्तृत योजना दी है, जो भारत की परिस्थिति के अनुरूप है। जैसे ज़िला स्तर के प्रत्येक चिकित्सालय को शिक्षा केंद्र बनाने की बात है जिससे पर्याप्त संख्या में आवश्यक चिकित्सकों का निर्माण किया जा सके। ग्रामीण शिक्षकों की चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए उस हेतु विशेष प्रावधान की चर्चा प्रारूप करता है। ऐसी अनेक भारत के लिए विशिष्ट बातें इस शिक्षा नीति में दी गई है। यदि सही पद्धति से क्रियान्वयन किया जय तो यह क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकती है। 

जुलाई 6, 2019 - Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , ,

1 टिप्पणी »

  1. Wastav me videshi shiksha niti ne bharat ki aatma tak ko ghayal kar diya hai.esse hum baudhik roop se sampann hote hue bhi pangu ho gaye. Galat nitiyon se hum v8deso ka muh dekhne lag.ye pariwartan aavasyak hai.

    टिप्पणी द्वारा arjun dan | जुलाई 9, 2019 | प्रतिक्रिया


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