उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

नोबेल की राजनीति या अर्थशास्त्र का भ्रम


भारत में तो अर्थशास्त्र में ही राजशास्त्र भी सम्मिलित है। कौटिल्य का अर्थशास्त्र यह केवल आज अंग्रेजी में जिसे Economics कहते हैं, उसका ग्रंथ नहीं है, वह प्रशासन (governance), राजतन्त्र (constitution), राजनीतिशास्त्र (Political Science) के साथ-साथ कर-निर्धारण, विकास की अवधारणा, समाज का हित आदि आर्थिक मुद्दों पर भी विचार रखता है। इसलिए भारत में अर्थशास्त्र का पर्याय था राजव्यवहार – राजा का क्या व्यवहार होगा। सामान्यतः अर्थशास्त्र विषय में नोबेल पुरस्कार के रूप में प्रचलित पुरस्कार आधिकारिक रूप से आर्थिक शास्त्रों (Economic Sciences) में नोबेल पुरस्कार कहा जाता है। गत कुछ वर्षों से दिए जानेवाले पुरस्कारों का विश्लेषण करने पर इन पुरस्कारों में भी राजनीति की गंध आने लगी है। केवल अर्थशास्त्र ही नहीं, शांति के नोबेल पुरस्कारों में भी राजनीति दिखाई देती है। बाकी विषय पर बहुत अधिक चर्चा नहीं होती है अतः उनमें किस प्रकार का दबावतंत्र (lobbying) प्रयुक्त होता है वह चर्चा में नहीं आता। वैसे तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाली सभी गतिविधियों में कुछ न कुछ तो राजनैतिक दबाव होता ही है। अन्यथा अफगानिस्तान पर महाविनाशक युद्ध थोपने वाले ओबामा को शांति पुरस्कार कैसे मिलता? अथवा केवल आतंक-पीड़ित होने के नाते बिना किसी सक्रिय शांति प्रक्रिया में सम्मिलित हुए मलाला को शांति का नोबेल पुरस्कार भी कैसे मिलता? ऐसे तो एक दिन हाफिज सईद को भी शांति पुरस्कार मिले तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए। किन्तु आज का लेख नोबेल पुरस्कारों की समीक्षा के लिए नहीं है।

अर्थशास्त्र किधर जा रहा है इस विषय पर विचार करने की आवश्यकता है। 1998 में अमर्त्य सेन को अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ। अमर्त्य सेन का काम ब्रिटिशकालीन अकाल के अर्थशास्त्र पर था। अमर्त्य सेन ने बंगाल के विकराल अकाल (The Great Bengal Famine) में अंग्रेजों द्वारा किए गए नीतिगत निर्णयों (policy decisions) पर गरीबी निर्माण और गरीबी निर्मूलन के बारे में कुछ सिद्धांत दिए थे जिसपर नोबेल पुरस्कार दिया गया। बांग्लादेश में ग्रामीण सहकारी बैंकों का जाल बिछानेवाले मोहम्मद यूनुस ने स्व-रोजगार के लिए वास्तविक काम किया। उन्होंने बैंक की स्थापना के द्वारा हजारों कारीगरों को प्रतिदिन सौ-पाँच सौ रुपये का सूक्ष्म ऋण (micro finance) प्राप्त कराने में सहयोग किया| अनेकों के जीवन में परिवर्तन किया तब मोहम्मद यूनुस स्व-रोजगार की योजना को सफलतापूर्वक लागू कर वर्ष 2006 में नोबेल पुरस्कार के अधिकारी हुए। प्रत्यक्ष वास्तविक घटनाओं पर आर्थिक शास्त्र का नोबेल पुरस्कार प्रदान करने के ये दो उदाहरण हैं। इसके विपरीत वर्ष 2013 में कम्प्युटर में कुछ प्रोग्राम बनाकर भाग बाजार (share market) और जमीन के भावों (real estate) के उतारचढ़ाव के बारे में भविष्यवाणी (predictions) करने वाले तीन ‘विद्वानों’ को नोबेल पुरस्कार दिया गया।

इस वर्ष अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार जिन तीन विद्वानों को मिला है उनमें से एक अभिजीत बैनर्जी भारत के हैं। इसलिए हम सबके लिए वह गर्व का विषय है। किन्तु विचारणीय यह है कि पुरस्कार किस कार्य पर मिला? उनकी यूरोपीय पत्नी Esther Duflo और उसके साथी विद्वान Michael Kramer के साथ ‘उनके वैश्विक गरीबी निर्मूलन हेतु प्रायोगिक दृष्टिकोण’ (For their experimental approach to alleviating global poverty) के लिए मिला। पूरा सिद्धांत अभी अध्ययन के लिए उपलब्ध नहीं है किन्तु नोबेल देते समय जो बातें लिखी गई उस आधार पर दो बातें स्पष्ट हैं कि उन सिद्धांतों पर अभी तक कोई प्रत्यक्ष कार्य नहीं हुआ है। कहीं पर भी प्रयोग नहीं किया गया। वह अभी केवल परिकल्पना है। पति-पत्नी के शिक्षा प्रसार के किसी जुगाड़ को अफ्रिका में प्रयुक्त किया गया। किन्तु नोबेल पुरस्कार प्राप्त अभिजीत बैनर्जी के सिद्धांत को कहाँ अपनाया गया, क्या प्रयोग किए गए? केवल परिकल्पना के आधार पर नोबेल पुरस्कार देना कहाँ तक साइन्टिफिक है?

बताते हैं कि इन जुगाड़ों में से एक काँग्रेस द्वारा चुनाव पूर्व चर्चा में लाई गई ‘न्याय’ योजना भी है। अत्यंत आशा के साथ यह घोषणा की गई थी कि प्रत्येक गरीब नागरिक को प्रतिवर्ष 72000 रुपये प्रदान किए जाएंगे। उस समय किसी प्रसार माध्यम द्वारा पूछे जाने पर अभिजीत बैनर्जी ने स्पष्ट उत्तर दिया था कि बिना कर बढ़ाए यह योजना संभव नहीं है। भारत की जनता ने भिक्षा के आश्वासन की इस चुनावी घूस को स्पष्ट नकार दिया। गरीबी दूर करने के लिए रोजगार के अवसर तथा स्वावलंबन की शिक्षा यह स्थायी मार्ग वर्तमान केंद्र सरकार ने अपनाएँ हैं जिनकी भर्त्सना अभिजीत बैनर्जी अपनी विचारधारा के कारण करते हैं। एक ओर बिना परिश्रम सीधे शासन द्वारा भत्ते के रूप में नगदी प्रदान करना उचित तो दूसरी ओर स्वयं परिश्रम द्वारा अपनी गरीबी का निवारण करने हेतु शासन द्वारा प्रोत्साहन तथा सुविधा प्रदान करना अनुचित, इस प्रकार के विरोधाभासी वैचारिक दृष्टिकोण के कारण ही उन्हें दिए गए नोबेल पुरस्कार के पीछे राजनैतिक दबाव की आशंका व्यक्त की जा रही है।

राजनीति और वैचारिक दबाव तंत्र पर बहुत अधिक चर्चा करने में कोई लाभ नहीं है| नोबेल पुरस्कारों की साख गत कुछ वर्षों में इतनी विवादित हो गई है कि अब विज्ञान की दिशा ते करने की क्षमता उनमें नहीं रह गई| एक शताब्दी पूर्व या तो उन विषयों में मौलिक योगदान करनेवालों को नोबेल पुरस्कार मिलता था या नोबेल पुरस्कृत विद्वानों की प्रतिष्ठा के कारण उन विषयों नए आयाम विकसित होते थे| आज भी सामान्य लोगों में अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों की प्रतिष्ठा तो है ही| पुरस्कृत व्यक्ति अपने आप प्रतिष्ठित हो जाता है| महाजनों (icon) का अनुसरण समाज करता ही है| जैसे क्रिकेट अथवा अभिनय में प्राविण्य के कारण विख्यात और प्रतिष्ठित व्यक्ति के राजनैतिक, धार्मिक विचारों को भी समाज गंभीरता से लेता है भले ही उसमें उनका विशेष अध्ययन अथवा विशेषज्ञता ना हो| पुरस्कारों की राजनीति इसी से वैचारिक विज्ञापन (intellectual branding) का साधन बनी है| अभिजीत बैनर्जी की विचारधारागत पृष्ठभूमि देखते हुए वे इस प्रकार की अंतरराष्ट्रीय षडयंत्र का मोहरा प्रयुक्त होने के लिए सही व्यक्ति है| साउथ पॉइंट कोलकाता में माध्यमिक शिक्षा, JNU दिल्ली में उच्च शिक्षा, MIT अमेरिका में अनुसंधान भारतीय पत्नी को छोड़ विदेशी छात्रा से विवाह यह सारी बातें पूर्ण नियंत्रित महाजन बनाने के लिए अत्यंत उपयुक्त हैं| अतः नोबेल पुरस्कार की घोषणा के बाद अधिक चर्चा हो रही है| अमर्त्य सेन, अरुंधती रॉय, रविश कुमार जैसे पुरस्कृतों को झेल रहे देश में इस प्रकार की आशंका सत्य हो या असत्य, उठना निश्चित है|

2013 के पुरस्कारों में तो कोई भारतीय नहीं था| अतः मामला और अधिक गंभीर लगता है| अर्थशास्त्र की दिशा पर ही विचार करने की आवश्यकता है| ‘शून्य से संपत्ति’ का सिद्धांत पश्चिम में लगभग 40 वर्षों पूर्व रूढ हुआ| भाग बाजार (share market) में बिना किसी वास्तविक उत्पादन अथवा प्रगति के वित्तवृद्धि को संपदा मानना प्रारंभ हुआ| भारत में नब्बे के दशक में हर्षद मेहता कांड में यह बात सामने आयी कि केवल थोड़े से खेल से बंद कंपनी के भागों (shares) को भी छद्म मूल्यवृद्धि द्वारा हजारों रुपयों में बेचा जा सकता है| निवेशकों को भी करोड़ों रुपयों का चूना लगाया गया| जमीन के लेनदेन जिसे अंग्रेजी में वास्तविक संपदा (real estate) जैसा लुभावना नाम दिया गया, उसमें भी खोखली मूल्यवृद्धि द्वारा बड़े स्तर पर ठगी की गई| काले धन के निर्माण के ये रास्ते थे| इन सब में सबसे कष्टदायी वायदा कारोबार (commodities market) है| खेती की उपज से पूर्व ही उसके भाव पर दांव लगाने वाला यह जुआ भारत में लाखों किसानों की आत्महत्या का मूल कारण है| इसमें भी सामान्य निवेशकों की अपरिमित हानी हो रही है| यह हाथ की सफाई अर्थशास्त्र का मान्य सिद्धांत बन गया और सरकारों ने भी नोटों की छपाई से धन कमाने का साधन अपनाया| अमेरिका तो गत दो दशकों से इसी आधार पर दिवालिया बनने से बचा हुआ है| यदि दुनिया के 180 देश डॉलर नहीं खरीदें तो अमेरिका की अर्थव्यवस्था एक दिन में ध्वस्त हो जाएगी| चीन, भारत सहित अन्य देशों ने घरेलू अर्थनीति में इसका प्रयोग किया| 2014 से पूर्व इतना अतिरिक्त चलन भारत के बाजार में संचलित हो गया कि नोटबंदी जैसी शल्यक्रिया करनी पड़ी| अन्यथा मुद्रास्फीति (inflation) को नियंत्रित करना असंभव हो जाता| नोबेल पुरस्कृत विद्वान अभिजीत बैनर्जी ने पुरस्कारप्राप्ति के बाद दिए गए साक्षात्कार में कहा कि मुद्रास्फीति का बढ़ना विकास के लिए आवश्यक है तथा वर्तमान सरकार ने मुद्रास्फीति को नियंत्रित कर देश की हानी की|

इसी प्रकार 1990 के दशक में तत्कालीन सोवीएट रशिया के विखंडन के बाद विश्व में एक विचित्र विसंगति दिखाई दे रही है| इसे विचारधारा का शीर्षासन भी कह सकते हैं| रशिया और चीन जैसे साम्यवादी (communist) देश पूरे पूंजीवादी (capitalist) बन गए हैं| और दूसरी ओर पूंजीवाद और मुक्त बाजार (free market) का पुरस्कार करने वाले यूरोप, अमेरिका के देश कल्याणकारी राज्य (welfare state) के सिद्धांत अतिरेक करते हुए सामाजिक सुरक्षा व्यय (social security expenditure) के भार में धराशायी होते जा रहे हैं| यह मुफ्तखोरी की मानसिकता समाज को भी खोखला करती है| यूनान (Greece), इटली जैसे देश बजट का 40-50% भाग बेरोजगार और वृद्धों को मुफ़्त भोजन (food tickets) और बेरोजगारी भत्ता प्रदान कराने में खर्च करते हैं| यूनान तो दिवालिया हो गया, इटली अभी कगार पर खड़ा है| यह निर्धनता निर्मूलन के स्थायी उपाय नहीं हो सकते| यदि ‘न्याय’ जैसी योजनाएँ ही इस वर्ष के नोबेल पुरस्कृत अर्थशास्त्रियों की गरीबी निर्मूलन का आधार है तो यह अर्थशास्त्र की नहीं, अनर्थशास्त्र की दिशा है| जैसे बिना उत्पादन के संपदा निर्माण केवल बुलबुला विकास (bubble growth) है, उसी प्रकार बिना श्रम के धन व्यक्ति, समाज और शासन तीनों के पतन का मार्ग है, उन्नति का नहीं|

फिर भी भारतीय मूल के अर्थशास्त्री अभिजीत बैनर्जी और उनके पश्चिमी साथियों को पुनः एक बार पुरस्कार पाने के लिए बधाई। आशा है कि अब तो ‘न्याय’ जैसे काल्पनिक जुगाड़ को कहीं न कहीं प्रयोग में लाया जाएगा ताकि उसकी संभावना पर स्पष्ट परिणाम प्राप्त होंगे। देश में पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में काँग्रेस का शासन है। यदि उन्हें अपनी सोच और नोबेल विजेता मार्गदर्शक पर थोड़ा भी विश्वास है तो वे इन राज्यों में इन जुगाड़ों को अपनाकर देखेंगे।

 

अक्टूबर 22, 2019 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , | 2 टिप्पणियाँ

कलियुग के राम


सतयुग में ना राम थे ना रावण
दोनों अवतरित हुए त्रेता में!

कलियुग में भी दोनों नहीं हैं।
ना राम जैसा सत्व है घनीभूत
किसी एक मानव में
ना रावण सा सामर्थ्य
किसी एक दानव में!

अनेकों स्वार्थी गिरोह बना
थोड़ा-थोड़ा कर जमा कर लेते हैं
पर्याप्त रावणत्व!!
मन-मन में बिखरे रामत्व को भी
करना होगा एक
संगठन के द्वारा!!

 

उठो जाम्बवन्त
फिर जगाओ हनुमत स्वाभिमान
उड़ो मारुति फिर गगन मेंसागर लांघ
करो दाह सोने में लिपटा
निपट अभिमान!

और करो आश्वस्त
भयभीत माता को
लेंगे प्रतिशोध
ना व्यर्थ होगा एक भी अपमान!!

 

जागो नल-नील
फिर रचो सेतु
जन्मगत गुटों में उलझे
मानव मन के
भाव सागर में गहराई
पाट दो भेद की खाई

जागो सुग्रीव भेजो अंगद
फिर अड़ा दे जो
संकल्प चरण
हर ले हर दानव की
भ्रष्ट संपदा का वृथा मान

आत्मबल हीन
स्वयं के स्वत्व को भूले
वानरों
चलो फिर रचो व्यूह
गढ़ों धर्म रक्षा चमु
अब के राघव नहीं आएँगे
ना ही लखन
तुम्हें ही बनना होगा
सब कुछ
करना होगा
नाभी का संधान

भोगमय सोने की
लंका का आकर्षण त्याग
फिर देना होगा
सम्मान
जननी जन्मभूमि को

 

करें अपने शीश में
गहरे चुभे मेकौले के
दशशिरों को ध्वंस
और भेदें दानव के
नाभी में छिपे प्राण को …

करें संकल्प
माता को फिर
विश्वगुरु पद पर
प्रतिष्ठित करने का !!!

अक्टूबर 8, 2019 Posted by | कविता, सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , | 9 टिप्पणियाँ

   

%d bloggers like this: