उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

नियमित गुरुदक्षिणा से अपनी आय को शुद्ध करें


यज्ञ, दान और तप इन तीन कर्मों को भगवद्गीता में बड़ा महत्व दिया गया है। भगवद्गीता के अठारहवें अध्याय में जहाँ पर कर्मों का त्याग करने की बात की है, वहाँ पर भी भगवान श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि ये तीन कर्म त्याज्य नहीं हैं। इनको करने से किसी भी प्रकार का किल्मिश, कलंक या पाप प्राप्त नहीं होता। इन तीन प्रकार के कर्मों को मनुष्य की साधना का महत्वपूर्ण अंग माना गया है।

 

यज्ञ का अर्थ है अपने ऋण से ऊऋण होने के लिए किया गया कार्य। हमारे जीवन में अनेक स्तरों पर अनेकों का योगदान है। उन सब का अलग-अलग स्मरण कर उनके ऋण से उऋण होना सदैव संभव नहीं होता। इसलिए भारतीय संस्कृति में पंच महायज्ञों की संकल्पना है। हमारे अस्तित्व में योगदान देने वाले सभी प्रकार, सभी वर्गों के लिए किया गया समर्पण यज्ञ कहलाता है। अनेक मनुष्यों का योगदान हमारे जीवन में होता है, इसलिए ‘नरयज्ञ’ प्रतिदिन करना है। नरयज्ञ अर्थात अतिथि भोजन। यहाँ अतिथि का अर्थ है जो बिना बताए आए। अपरिचित व्यक्ति को भोजन कराना नरयज्ञ में आता है। भूतयज्ञ – प्राणिमात्र के योगदान के बिना भी हमारा जीवन नहीं चल सकता। उनके लिए प्रतिदिन कुछ न कुछ करना – गाय, कुत्तों को रोटी खिलाना ऐसे अनेक नित्यक्रम भूतयज्ञ से जुड़े हुए हैं। हमारे जीवन में योगदान करने वाली तीसरी श्रेणी हैं पितृ। इस पितृऋण से मुक्त होने के लिए है पितृयज्ञ। हमारे माता-पिता, दादा-दादी एवं पूरी पीढ़ी ने ही हमें ऐसे संस्कार, जीवन यहाँ तक कि शरीर भी प्रदान किया है। उनके प्रति अपनी श्रद्धा और समर्पण करने के लिए हैं पितृयज्ञ। प्रकृति के प्रति समर्पण का यज्ञ देवयज्ञ है। प्रकृति की शक्तियों को देवता कहते हैं। उनके योगदान के बिना हमारा जीवन चल नहीं सकता। अत: उनके लिए प्रतिदिन कुछ न कुछ समर्पण करना यह देवयज्ञ है। ऐसे ही ऋषियज्ञ अथवा ब्रह्मयज्ञ है। यहाँ आध्यात्मिक एवं लौकिक ज्ञान की परंपरा निरंतर है। अनेक ऋषियों के ब्रह्मवेत्ताओं के तप से ही यह अखंड चल रही है। उनके प्रति अपने ऋण व आभार को व्यक्त करने के लिए जो समर्पण किया जाता है अर्थात ज्ञान के क्षेत्र में प्रतिदिन स्वाध्याय के द्वारा स्वयं का मौलिक योगदान दिया जाता है उसे ऋषियज्ञ अथवा ब्रह्मयज्ञ कहते हैं। इस प्रकार अस्तित्व के पांचों स्तरों पर जिसके कारण हमें बहुत कुछ मिला है, जिसके बारे में हम जानते नहीं कि किसने क्या दिया है उन सबके लिए कुछ न कुछ करना, यही यज्ञ की संकल्पना है।

यह मनुष्य में दायित्वबोध का निर्माण करता है कि मैं अकेला नहीं हूँ, समस्त सृष्टि से जुड़ा हूँ और मेरे जीवन के भरण पोषण में सृष्टि, समाज, अनेक लोगों का योगदान है।

इस दायित्वबोध का जागरण व्यक्ति के मन में करना यज्ञ का उद्देश है। परंतु साथ ही साथ उसमें एक स्वावलंबी समाज की व्यवस्था का निर्माण भी होता है। जैसे भूतयज्ञ की ‘अतिथि देवो भव’ परंपरा गृहस्थाश्रम को अन्य तीनों आश्रमों के केंद्र में लाकर खड़ा कर देती है। एक अद्भुत सामाजिक व्यवस्था भारत में थी जिसमें ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास जिन्हें उपार्जन करना नहीं है, ये तीनों आर्थिक उत्पादन का दायित्व जिस आश्रम पर है उस गृहस्थ आश्रम पर आश्रित थे। माधुकरी माँगने के लिए जाने वाले विद्यार्थी गुरुकुल से निकलकर पाँच गृहस्थों के घर जाकर जब “ॐ भवति भिक्षां देहि” का घोष करते थे तब उस घर की गृहिणी अत्यंत समर्पण से, मातृवत् भाव से उन बालकों को भोजन कराती थी। यह सामाजिक संबंधों का भी अद्भुत उदाहरण था। उनको भोजन कराते समय उस माँ के मन में यह विचार रहता था कि मेरा भी पुत्र ऐसे ही किसी और माता के घर में भिक्षा ग्रहण कर रहा है। पूरे समाज को आत्मीयता से जोड़ने का काम अतिथि यज्ञ करता था। यही बात वानप्रस्थ और संन्यास में भी है। यज्ञ आज भी भारतीय संस्कृति का आधार है। समाज में जब तक यज्ञ जीवंत रहेगा तब तक समाज स्वयंपूर्ण, स्वावलंबी और पुष्ट होता रहेगा और बिना किसी बाह्य सहायता के विकास हो सकेगा।

दान की ओर जाने से पहले तप के बारे में भी थोड़ा सा समझ लेते हैं। तप हमारी व्यक्तिगत साधना का मार्ग है। मनुष्य अनंत, असीम संभावनाओं को लेकर जन्म लेता है किंतु अपनी इस असीमता, अखंडता, अनंत संभावनाओं को भूल जाता है। शरीर,मन और बुद्धि की मर्यादाओं में स्वयं को जकड़ लेता है और सीमित समझने लगता है। अतः व्यक्तित्व का समग्र, सर्वांगीण विकास अर्थात जीवन की पूर्ण संभावनाओं को संभव बनाने हेतु इन मर्यादाओं को तोड़ना आवश्यक होता है। अहंकार, अभिनिवेश अर्थात मन के कारण ही यह मर्यादा होती है। मन के द्वारा इसे तोड़ने में शरीर, मन और बुद्धि तीनों स्तरों पर हमारी मानी हुई मर्यादा के परे जाकर शरीर को कष्ट देते हुए कार्य करना यह अपेक्षित होता है। अतः तप का शाब्दिक अर्थ होता है तपाना, स्वयं को कष्ट देना। यह कार्य हम अपने जीवन में प्रतिदिन करें ऐसी अपेक्षा है।

यज्ञ और तप के अलावा तीसरा कर्म जो निषिद्ध कर्मों में नहीं आता, जो अवश्य किया जाना चाहिए और नैष्कर्म्य में कर्म का त्याग करते समय भी जिसका त्याग नहीं करना चाहिए वह है दान। दान का सामान्य अर्थ है देना। आर्थिक रूप से दान देने को ही सामान्यत: दान मानते हैं। हम किसे दान दे रहे हैं, वह पात्र है या अपात्र इस प्रकार के विचार मन में आते हैं। क्या भिखारी को भिक्षा देना दान है? किसे दान देना चाहिए? दो प्रकार की व्यवस्थाएं समाज में बहुत अधिक प्रचलित थी। देने की व्यवस्था में दो भेद पूर्वापार से चला आ रहा है। एक है दान और दूसरा है दक्षिणा। पहले दान को समझ लेते हैं। दान अर्थात कुछ देने का भाव। मनुष्य के विकास का एकमात्र माध्यम त्याग है। वेद मंत्र कहता है —

‘त्यागेन एकेन अमृतत्व मानषुः। न धनेन, न दानेन, न प्रजया।’

और किसी से भी मनुष्य को अमृत की प्राप्ति नहीं हो सकती। अपने अमर सच्चिदानंदघन रुप से एकाकार होने का एकमात्र माध्यम है त्याग। त्याग अर्थात छोड़ना। ममत्व को छोड़ना, ‘यह मेरा है’ इस भाव को छोड़ना। अतः जिसे हम अपना मानते हैं, उसे देने को दान कहते हैं। वास्तविकता में दान लेने वाले व्यक्ति की मनस्थिति अथवा परिस्थिति का विचार दान में नहीं होता। सत्पात्र दान की संकल्पना है। देने का भाव पुष्ट हो सके इसलिए वह संकल्पना है। हमारे मन में दातृत्व अर्थात देने की भावना का विकास करने के लिए दान एक अभ्यास है। देने की आदत बचपन से ही यदि बन जाए तो मनुष्य के मन का विस्तार होता है। ममत्व में रोक लगकर उसका विस्तार होता है। ‘मैं’ से ‘हम’ की ओर प्रगति होती है। अतः देने का भाव मन में रखने के जागरण को दान कहते हैं। सामान्यतः भौतिक वस्तुओं का दान किया जाता है जैसे अन्नदान, वस्त्रदान। किन्तु भागवत में इससे अधिक दान की बात कही गई है – ज्ञानदान, विद्या का दान। मनुष्य को अपने पैरों पर खड़े होने वाले ज्ञान को प्रदान करने वाला दान, मेरे पास जो कौशल, प्राविण्य हैं जो मैंने अपने गुरू से प्राप्त किया है उसको अघिकाधिक लोगों को देना ज्ञानदान है। जैसे अन्नदान, वस्त्रदान भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। इनके प्रति ममत्व को समाप्त करने के कारण दाता के मन में अपरिग्रह का भाव जगाता है। वैसे ही अपने कौशल को देने से अपने ज्ञान का विस्तार होता है। साथ ही अधिक से अधिक लोगों तक उस विद्या के पहुँचने से विद्या भी मोक्षदायिनी होती है, अधिक दीक्षित होती है। श्रीमद्भागवत में तीसरे स्तर के दान को कहा है आध्यात्मिक बोध का दान । लौकिक विद्या से बड़ी विद्या है परा विद्या अथवा आध्यात्मिक चेतना का दान। मैं कौन हूँ, किसलिए आया, मेरे जीवन का लक्ष्य क्या है, आदि मौलिक प्रश्नों का मनुष्य के मन में सदैव विचार उत्पन्न होता है। उनका उत्तर प्रदान करने के लिए सही साधना की आवश्यकता होती है। अपनी साधना की  अनुभूतियों के आधार पर अन्य को मार्गदर्शन करना आध्यात्मिक ज्ञान की श्रेणी में आता है। स्वामी विवेकानंद ने इन तीनों दान का वर्णन करते हुए कहा कि यह एक से बढ़कर एक दान है और मनुष्य को अपने जीवन में मूल रूप से इन तीनों स्तरों पर दान देना चाहिए।

औशस्तिपाद ऋषि का आख्यान छाँदोग्य उपनिषद में आता है। इसमें वे वैश्वानर साधना की बात करते हुए समाज, सृष्टि, प्रकृति में व्याप्त ईश्वर के प्रति तीनों से भी बढ़कर साधना के दान की बात करते हैं। वह है सेवा की साधना। इस प्रकार की सेवा करना जिससे केवल मनुष्यों की भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति, लौकिक ज्ञान प्रदान करके और आध्यात्मिक उन्नति के लिए मार्गदर्शन करने तक ही सीमित नहीं रहता अपितु ऐसा ज्ञान जो स्वावलंबी, स्वयंपूर्ण समाज का निर्माण करे। ऐसा समाज जिसमें किसी भी प्रकार की सेवा की आवश्यकताएं ही न हो। यह सेवा की साधना जिसे महात्मा गांधी ने ‘दरिद्र देवो भव’ व दरिद्र नारायण की सेवा के रूप में वर्णित किया, स्वामी विवेकानंद ने ‘मानव सेवा ही माधव सेवा’ आदि वचनों में व्यक्त किया, वह सेवा की साधना स्वावलंबी समाज के निर्माण की साधना है। इस दान हेतु जो शास्त्रीय परंपरा है उसे दक्षिणा कहते हैं।

दान और दक्षिणा में एक छोटा सा भेद है। दान यह देने के भाव को जगाने के लिए, त्याग के लिए किया जाता है। उसमें से जिसको हम दान दे रहे हैं उससे उऋण होने की अथवा कुछ पाने की बात नहीं होती। कुछ नहीं पाया है, कुछ संबंध नहीं है फिर भी निष्काम भाव से देना है। अतः सड़क पर भिखारी दिखने से यदि मन में देने का भाव आता है तो फिर यह विचार करने की आवश्यकता नहीं है कि वह कितना निकम्मा है, काम नहीं करता, मैं दान देकर उसे परजीवी तो नहीं बना रहा। ये सभी विषय नहीं हैं। मूल विषय हैं आपके मन का विस्तार। उसको देखकर आपके मन में आत्मीयता, करुणा, अनुकंपा जगी। ‘इसके स्थान पर मैं होता तो क्या होता? इसलिए मेरी क्षमता के अनुसार उसके कष्ट को दूर करने के लिए कुछ करना है’ यह भाव यदि मन में आ गया तो वह दान है। दक्षिणा एक व्यवस्था है। समाज में हम अन्यों से कुछ लिए बिना जी नहीं सकते। हम जो वस्त्र पहनते हैं वे भी अनेकों के परिश्रम से हम तक पहुँचे हैं। भरी दोपहरी में हल चलाकर, पसीना बहाकर किसी किसान ने वह कपास उगाया। फिर वह किसी और श्रमिक के श्रम से धागे में परिवर्तित किया गया। उस धागे को किसी बुनकर ने तानेबाने में बुनकर हमारे लिए वस्त्र बनाया। अंत में उस वस्त्र को किसी सूचक (दर्ज़ी) ने हम तक पहुंचाया। इन बातों का ध्यान रखना हमारा कर्तव्य है। इस हेतु पायी हुई सेवा के प्रतिफल के रूप में जो प्रदान करता हूँ, उसे दक्षिणा कहते हैं। यह सभी स्तरों पर है। उपासना के लिए कोई पुरोहित मुझे सहयोग करता है क्योंकि मैं मंत्रहीन हूँ, आचार को नहीं जानता, उसने अध्ययन किया हुआ है इसलिए वह उस पूजन, यजन, भजन में हमें सहयोग करता है। उसे दक्षिणा देनी है।

हमारे यहाँ पूरे ग्राम को स्वावलंबी बनाने के लिए यह व्यवस्था थी। यह वाणिज्य की व्यापारिक व्यवस्था नहीं थी। एक स्वावलंबी अर्थशास्त्र, ग्राम स्वराज्य दक्षिणा के आधार पर भारत में विकसित हुआ। दक्ष रहकर जो दी जाती है वह दक्षिणा। कुंभकार मटका बनाता है, मेरे लिए कुंभ बनाता है तो उसका घर चलना चाहिए इस दक्षता से जो दी जाती है वह दक्षिणा। यह उस कुम्भ का मूल्य नहीं है। क्योंकि कुंभ, मटका बनाने के परिश्रम का मूल्य मैं दे ही नहीं सकता। इसलिए किसान का काम हर घर में अनाज पहुँचाना है। वह अन्नदाता है। उस किसान का घर चलना चाहिए यह बाक़ी सबका काम है। यह दक्षिणा की व्यवस्था थी। यह व्यापार अथवा वस्तु विनिमय भी नहीं था। Barter System नहीं था। वस्तु विनिमय या व्यापार में वस्तुओं के मूल्य की दूसरी वस्तु देने की बात थी। यहाँ देने वाले की दक्षता के अनुसार दक्षिणा दी जाती है। यानी उसी कुंभ को किसी जमींदार के घर पर पहुंचाया जाएगा तो जमींदार अपनी क्षमता के अनुसार दक्षिणा देगा। वहीं कुंभ किसी ग़रीब के घर में जाएगा तो और उसकी क्षमता नहीं होगी तो वह कुछ छोटा-मोटा जो भी दे सकता है उतनी दक्षिणा देगा। इसलिए दक्षिणा कितनी होगी यह वस्तु के मूल्य पर आधारित नहीं होगा और देने वाले की क्षमता और श्रद्धा पर निर्धारित होगा। ऐसी यह दक्षिणा की अद्भुत व्यवस्था भारत में थी। बाद में वह 12 बलुतेदार (व्यवसाय) वाली व्यवस्था नहीं रही। इतिहास में भी इसके बारे में ज़्यादा विवरण नहीं मिलता। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में थोड़ा बहुत मिलता है। विदेश में व्यापारी समुद्र पार करके व्यापार करने लगे। यह सब शुरू हुआ और ऐसे व्यापार के कारण मुद्राएँ और मुद्राओं का चलन हुआ। मुद्राओं का चलन होने से संभावित और दक्षिणा की व्यवस्था इन सब में से चली गई। किन्तु पुरोहित में दक्षिणा बनी रही।

19वीं शताब्दी में शिक्षा का सरकारीकरण होने से पूर्व तक भारत में गुरुदक्षिणा के रूप में शिक्षा व्यवस्था पूर्णतः दक्षिणा पर आधारित चलती रही। आज भी देश में 10 हज़ार से अधिक गुरुकुल ऐसे चल रहे हैं जो दक्षिणा के भाव से आर्थिक विनिमय के द्वारा चलाए जाते हैं। गुरूदक्षिणा शिक्षा व्यवस्था में अनादि काल से आज भी जीवित है। यह व्यवस्था भी देने वाले की श्रद्धा पर निर्भर थी। गुरुकुल का सारा व्यय दक्षिणा से चलता था। लेकिन गुरुकुल में सभी स्तर के छात्र आते थे। राजा का बेटा श्रीकृष्ण भी गुरुकुल में आता था और सुदामा भी। तो श्रीकृष्ण की गुरुदक्षिणा अलग होगी और सुदामा की गुरुदक्षिणा अलग।

कोई श्रम से गुरुदक्षिणा देता था, कोई पराक्रम से। फिर महाभारत आदि इतिहास ग्रंथों में हमें मिलता है कि एक बार गुरुदक्षिणा दे दी, जैसे एकलव्य ने अंगूठा दिया। यह तो प्रक्रिया थी। दीक्षांत के समय गुरुदक्षिणा दी जाती थी, दीक्षा का अंत हो रहा है तो दक्षिणा देनी है। प्रत्येक अपनी क्षमता के अनुसार देता था।  कौत्स की गुरुदक्षिणा का प्रसंग बहुत प्रसिद्ध है। कौत्स को गुरुदक्षिणा देने के लिए व्यवस्था नहीं थी तो वह रघु के पास गया और रघु ने कुबेर से धन लेकर स्वर्ण वर्षा कर गुरूदक्षिणा दी। राजा व प्रजापालक होने के नाते गुरुदक्षिणा की पूर्ति वह करता था। अर्थात आज जैसे स्कॉलरशिप मिलती है ऐसी व्यवस्था उस समय भी होगी। किंतु मूलतः दक्षिणा की व्यवस्था देनेवाले की श्रद्धा और क्षमता के अनुसार थी। वह विद्या का मूल्य, शुल्क नहीं था। इस बात को हमें ध्यान रखना चाहिए, विद्या निःशुल्क थी। इसका अर्थ है आपके पास शुल्क देने के लिए, दक्षिणा देने के लिए कुछ भी नहीं हो तब भी शिक्षा पर आपका अधिकार था। चाहे आवासीय गुरुकुल हो, अनावासीय पाठशाला या कार्यशाला हो, वहाँ जाकर अपने जीवन के लिए आवश्यक क्षमता, रुचि और स्थिति के अनुसार आप शिक्षा प्राप्त कर सकते थे। शिक्षा का अर्थायाम (अर्थशास्त्र) पूरा दक्षिणा पर चलता था। दक्ष हो कर दी गई दक्षिणा की दो विधियाँ थी। एक शिक्षा के तुरंत बाद, मध्य में, प्रतिवर्ष व प्रारंभ में प्रवेश के समय अपनी क्षमता के अनुसार दी जाने वाली दक्षिणा। इससे बृहत् गुरुदक्षिणा की आजीवन व्यवस्था थी। गृहस्थ जीवन में जब तक है, वानप्रस्थ लेने तक कमा रहे हैं तब तक दी जाने वाली दक्षिणा। गृहस्थ का कर्तव्य अन्य तीनों आश्रमों का पालन पोषण तो करना ही है, साथ-साथ पूरे समाज का योगक्षेम भी वहन करना है। आय का एक भाग राजा को कर के रूप में, एक धर्मकार्य के लिए, एक देव-पितृ कार्य हेतु दिया जाएगा। इसी प्रकार कुल आय का दशांश (10%), दसवाँ हिस्सा यह अपने गुरु को देना है। जिस गुरू से बचपन में जीवन की शिक्षा पाई है उस शिक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए अपने उपार्जन का दशांश देने की पद्धति भारत में चलती रही।

यह पद्धति 19वीं शताब्दी तब जीवंत रही। पूरे देश में सात लाख से अधिक गुरुकुल 1823 में अंग्रेजों के सर्वेक्षण में पाए गए। बड़े बड़े शिक्षा के संस्थानों में उच्च शिक्षा, अनुसंधान की व्यवस्था थी। यह सारी व्यवस्था गुरुदक्षिणा पर चलती थी। शासकीय अनुदान और शासन का हस्तक्षेप नहीं था। शासन का अनुदान तो कभी नहीं था। पूर्व में शासन दान अवश्य देता था। भवन आदि निर्माण कर देता था। भूमि देता था। कुछ गांवों की लगान गुरुकुल के साथ जोड़ देता था। गुरुकुल को भूमि दे देते थे जिसमें उपज कर लेते थे। यह सब शासन का कर्तव्य था, किन्तु प्रतिवर्ष व्यय के लिए अनुदान देना, उसके लिए कुछ शर्तें रखना और नियमों में बाँधना, ये प्रक्रिया अंग्रेजों के आने तक भारत में नहीं थी। अंग्रेजों ने 1835 में शिक्षा का सरकारीकरण किया। इस प्रकार शासन शिक्षा में पैसा भी व्यय करता है और हस्तक्षेप भी करता है। ये दोनों पद्धतियां भारत में नहीं थी। शासन-निरपेक्ष, समाजपोषित शिक्षा व्यवस्था थी। यह समाज पोषण दशांश दक्षिणा से होता था।

व्यक्ति के जीवन में यह अत्यंत महत्वपूर्ण बात थी कि वह अपने गुरु एवं अपने ज्ञान के, जिस ज्ञान के कारण उसकी आजीविका चल रही है उसके प्रति ऋण से उऋण होने के लिए अपनी आमदनी का दसवाँ भाग प्रतिमाह, प्रतिसप्ताह या प्रतिवर्ष नियमित अंतराल से अपने गुरु को भेजे। जहाँ-जहाँ उसने शिक्षा पाई वहाँ पर यह दशांश आवश्यकता के अनुसार वितरित करें यह प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य था। यह ब्रह्मयज्ञ के साथ जुड़ा है। प्रत्येक व्यक्ति की मुक्ति के साथ जुड़ा है। यह व्यक्ति के जीवन का कर्तव्य है। हमारा जीवन सारे जगत से जुड़ा हुआ है यह हम जानते हैं। इसलिए हम जो लेते हैं वह यदि वापस नहीं दिया है तो कर्म के सिद्धान्त के अनुसार वह विवशतापूर्वक देना पड़ता है। आप यदि अधिकार से अधिक भोग करोगे, त्याग के बिना भोग करोगे तो प्रकृति के वशीभूत होकर उसका प्रतिफल देना पड़ेगा यह कर्म का सिद्धांत है। आप धर्म से प्रामाणिक व्यवहार के बिना उत्कोच (ऊपर की कमाई) के नाम से कमाओगे तो वह वैद्यकीय चिकित्सा उपचार के लिए या चोर के पास या किसी अन्य रूप में वह धन व्यर्थ जाएगा। आपको पचेगा नहीं, आपके पास रहेगा नहीं। आपका अधिकार जिसके लिए आपने श्रम किया है केवल उसी धन पर आपका अधिकार है। केवल वही आप अपने पास रख सकते हैं। यह कर्म का सिद्धांत है। यदि आप ने फिर भी इस बात पर ध्यान नहीं दिया तो वह आपके धन को अशुद्ध कर देगा। और धन अशुद्ध होने से घर के संस्कार अशुद्ध होते हैं और उससे क्रय किया जाने वाला अन्न जो प्राण की शक्ति प्रदान करता है वह तामसिक होगा। वह घर के वातावरण को बदल देगा, घर में क्लेश रहेगा, पुत्र पिता की आज्ञा का पालन नहीं करेंगे, पुत्री परंपरा का पालन नहीं करेगी, बच्चे संस्कार हीन हो जाएंगे और पूरा घर ही नरक बन जाएगा। अतः अपने धन और आय की शुद्धि के लिए गुरुदक्षिणा बहुत आवश्यक है।

आपने किसी न किसी विद्यालय, महाविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की। उस विद्यालय महाविद्यालय के भवन, शिक्षकों आदि का वेतन आदि आपने नहीं दिया। इसलिए आपके ऊपर वह ऋण है। आज उस विद्या के माध्यम से आप आजीविका कमा रहे हैं। उस आजीविका में से यदि आप उस गुरु के ऋण को नहीं चुका पाएंगे तो आपका धन शुद्ध नहीं होगा। अशुद्ध धन आपके परिवार को क्षति पहुँचाएगा। यह भाव भारत में बहुत अच्छी तरह से समझा गया। एक सामान्य, गरीब व्यक्ति भी इस बात को जानता है और अधर्म से कमाई नहीं करता। धर्म से की गयी कमाई में से कुछ न कुछ पूजा-पाठ, देव-पितृकार्य के लिए निकालता है। परिवार के लिए बचत करता है। यह भारतीय संस्कृति है। शिक्षित लोग इसे भूल गए हैं इसलिए शिक्षित लोग अपने गुरु को दक्षिणा देना भूल जाते हैं।

आज यहाँ तक स्थिति हो गई कि आज शिक्षकों को अच्छा वेतन मिलता है। उच्च शिक्षा में तो लाखों रुपये प्राध्यापकों को मिलते हैं। स्कूल शिक्षा में भी सरकारी शिक्षकों का वेतन काफ़ी अच्छा है। किंतु फिर भी छोटी-छोटी बातों के लिए हम और अधिक सरकारी धन लेने के पीछे लगे रहते हैं। क्या यह अधर्म का धन नहीं है? आप 12 महीने का पूरा वेतन प्राप्त करते हैं। उसके बाद उसी कालखंड में प्रश्नपत्र लेखन (paper setting), पर्यवेक्षण (invigilation) का अलग से पैसा प्राप्त करते हैं, यह कहाँ तक उचित है? यह अधर्म का धन नहीं है? आप उस 12 महीने के अलावा और किसी समय में यह कार्य करते हैं? उच्च शिक्षा के सारे शिक्षक यह करते हैं। इतना ही नहीं कुछ ऐसी परिपाटियाँ पड़ गई है कि विवाह आदि में जाने के लिए भी वहाँ मित्र को कहते हैं, “भाई कोई viva रख लें, सेमिनार रख लें ताकि आने-जाने का हवाई जहाज़ का टिकट मिल जाए।” आप अपने लाख, सवा लाख, डेढ़ लाख के वेतन में से ये दो-चार, पाँच हज़ार रुपये का ख़र्चा भी नहीं करना चाहते, वह भी विश्वविद्यालय से प्राप्त करना चाहते हैं। यह वृत्ति जो शिक्षकों में देखी जाती है यह अत्यंत घृणात्मक एवं निंदनीय तो है ही, अनैतिक भी है।

हम यहाँ बात कर रहे हैं दशांश गुरुदक्षिणा देने की। आपकी आय में से 10वाँ अंश शिक्षा के कार्य के लिए देना। वर्तमान संदर्भ में या तो अपने विद्यालय, विश्वविद्यालय या महाविद्यालय को आवश्यकता हो तो वहाँ, अन्यथा शिक्षाक्षेत्र में काम करनेवाले किसी ऐसे संस्थान जिसको आवश्यकता है उसे दक्षिणा देना। भारतीय शिक्षण मंडल से जुड़े हुए कार्यकर्ताओं से आह्वान होगा कि भारतीय शिक्षण मंडल को ही आप दक्षिणा दीजिए। प्रतिमाह अपने वेतन में से 10वाँ भाग मासिक दानकारी योजना के अंतर्गत दिया जा सकता है। यदि प्रतिमाह नहीं देते तो वर्ष में एक बार दे सकते हैं।

आयकर अधिनियम के 80G धारा के अंतर्गत दानदाता को 50 प्रतिशत छूट मिलती है। अधिक वेतन होने के कारण  आयकर भरना पड़ता है तो 80G की रसीद से आप कुछ आयकर बचा सकते है। किंतु यह एक सह उत्पाद (by product) हो सकता है, मूल लोभ नहीं। प्रमुख भाव यह होना चाहिए कि आज मैं जो कुछ भी कमा रहा हूँ शिक्षक, व्यापारी, निजी उद्योग में नौकरी कर या जिस भी प्रकार से वह मेरी विद्या के कारण है। वह विद्या जिनके कारण मुझे प्राप्त हुई उस शिक्षा व्यवस्था के लिए यदि मैं दक्षिणा के रूप में श्रद्धाभाव से अपना कर्तव्य मानकर नहीं दूँगा तो मेरी पूरी कमाई अशुद्ध होगी। 10% दक्षिणा देने से 90% राशि शुद्ध हो जाएगी। उसका आप अपने जीवन में जो भी प्रयोग करोगे वह प्रयोग आपके लिए अत्यंत लाभदायी होगा। आपके परिवार के शुभ काम में आएगा। यह वास्तविकता में शुभ लाभ होगा। हमारे यहाँ पर केवल लाभ की बात नहीं की है। हम लक्ष्मी को केवल लक्ष्मी नहीं श्री मानते हैं, महालक्ष्मी मानते हैं। लक्ष्मी महालक्ष्मी तभी बनती है जब धर्म के द्वारा अर्जित होती है। धर्म द्वारा अर्जित करने के लिए यह आवश्यक प्रक्रिया है कि हम 10% अपनी राशि में से गुरूदक्षिणा के रूप में दें।

अभी तुरंत 10% नहीं कर सकते तो अधिकाधिक जो भी नियमित समर्पण कर सकते हैं वह राशि दक्षिणा के रूप में देना प्रारम्भ करें। 3-4% से प्रारम्भ कर क्रमशः बढ़ाते हुए 10% तक पहुँचे। कुछ जागरूक धर्मप्रेमी वर्ष में एक माह का वेतन शिक्षा के लिए दान देते हैं। यदि नियमितता और उऋण होने के दायित्वबोध का भाव हो तो यह गुरुदक्षिणा ही होगी। धार्मिक और देव-देवताओं के लिए किया गया दान इस श्रेणी में नहीं आता। उसके पुण्य संग्रह जैसे अन्य लाभ हैं जो मृत्यु के बाद की गति में काम आते हैं ऐसा कहा है। किंतु इस जीवन में धनशुद्धि का दक्षिणा के सिवा और कोई माध्यम नहीं है। आइए, अपने निकट के शिक्षण मंडल कार्यकर्ता को सम्पर्क करें और अपनी दक्षिणा का संकल्प सूचित करें।

नवम्बर 19, 2019 - Posted by | Uncategorized

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