उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

लाडले से करते है प्रेम तो भूल जाए जन्मदिन 


भारतीय संस्कृति शास्त्रीय है । हर परम्परा के पीछे का प्राकृतिक नियम सहज आचरण में लाने से ही समझ में आता है । हमारे सभी उत्सव सामूहिक हैं । परिवार ही समाज की इकाई है । अतः कम से कम परिवार का सहभाग तो आवश्यक ही होता है । कोई भी भारतीय पारम्परिक उत्सव एक व्यक्ति को केंद्र में रखकर नहीं होता । एकसठ वर्ष आयु में होनेवाले शट्यब्दपूर्ति अथवा अस्सी वर्ष के बाद होनेवाले सहस्रचंद्र दर्शन समारोह में भी पूरे विस्तृत कूटुंब का सहभाग अनिवार्य होता है । दूसरी ओर पश्चिम का पूरा विचार ही व्यक्तिकेंद्रित होती है । इसी के परिणामस्वरूप पश्चिम में पूरा समाज बिखर गया और परिवार भी टूट रहे है ।

पश्चिम के प्रभाव से आज हम भारतीय भी व्यक्तिकेंद्रित सोच को बढ़ावा देने लगे है । २० वर्ष पूर्व तक छोटे बालकों के जन्मदिन मनाने की भी कोई परम्परा नहीं थी । शरीर को धर्म का साधन माननेवाली भारतीय संस्कृति में उसके जन्म का कोई उत्सव नहीं मनाया जाता ।

यह अत्यंत वैज्ञानिक प्रक्रिया है। शरीर हमारे व्यक्तित्व का सबसे स्थूल अर्थात सबसे कम महत्व का अंग है। इस कारण से इसके प्रति अधिक आस्था बनाने से मनुष्य के जीवन का लक्ष्य की शरीर का सुख अर्थात भोग बन जाता है। भारतीय संस्कृति में भोग गौण है, त्याग को महत्व दिया है। अतः, व्यक्तित्व विकास में शरीर से अधिक सूक्ष्म आयामों का विकास अधिक महत्वपूर्ण माना गया। मन, भावना, बुद्धि यह व्यक्तित्व के सूक्ष्म रूप हैं। इनका विकास करना मनुष्य जीवन का लक्ष्य है। जीवन की उपलब्धि में भी शरीर के सुख से अधिक मन एवं बुद्धि के सुख को महत्व देना भारतीय संस्कृति है।

इसीलिए शरीर के जन्म का हमारे लिए बहुत अधिक महत्व नहीं है। शरीर के जन्म का महत्व बढ़ाने से मनुष्य प्राथमिकताएं बदल जाती हैं। शरीर अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। आज कम आयु में बड़े-बड़े रोग होने की जो स्थिति बनी है उसका एक कारण शरीर के प्रति बढ़ता मोह भी है। हम सब जानते हैं कि शारीरिक स्तर पर भी मांसपेशियों का विकास करना हो तो हमें उन्हें कष्ट देना होता है। व्यायाम करना पड़ता है। सूर्य नमस्कार, दंड, बैठक आदि व्यायाम करने से ही हमारे शरीर का स्नायुतंत्र और मांसपेशियां बलवान होती है। यदि हम शरीर का आवश्यकता से अधिक लाड करेंगे तो वह दुर्बल होगा। शरीर को तपाने से ही व्यक्तित्व का विकास होता है।

इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए भारत में जीवंत व्यक्तियों के जन्मदिवस मनाने की परंपरा नहीं है । केवल मृत व्यक्तियों के, वह भी महापुरुषों के जन्मदिवस को जयंती के रूप में मनाया जाता है। जिसने अपने जीवन में ईश्वरीय शक्तियों का अद्वितीय प्रगटीकरण किया उसे अवतार माना जाता है। ऐसे अवतारों के जन्मदिवस पर अन्य लोग उन्हीं के समान चारित्रिक विकास की प्रेरणा प्राप्त करें इस दृष्टि से जयंतिया मनाने की परंपरा है। वह भी उस महापुरुष के जीवन काल में नहीं होता उसके मृत्यु के उपरांत अर्थात उसके शरीर के न रहने पर ही जयंती मनाई जाती है। हमारे पारिवारिक पूर्वजों के स्मरण के लिए उनके शरीर शांत होने का अर्थात मृत्यु का दिनांक अधिक महत्वपूर्ण होता है। उस तिथि पर श्राद्ध कर हम उनके प्रति अपनी श्रद्धा को प्रगट करते हैं। अपने दादाजी प्रपितामह आदि के जन्म दिवस मनाने की परंपरा भारत में नहीं है । उनके मृत्यु की तिथि अर्थात पुण्यतिथि पर उनका स्मरण करने की परंपरा है।

शरीर को अधिक महत्व देने की सभ्यता पश्चिम में विकसित हुई। अतः वहां पर भौतिकता, उपभोग वाद आदि को बहुत बड़े प्रमाण पर बल मिला। आज वे भी इस विकृत विकास के दुष्प्रभाव को समझ रहे हैं किंतु उपाय अभी भी दृष्टिगोचर नहीं हो पा रहा। भारत में हमारे ऋषियों ने हजारों वर्ष पूर्व एक अद्भुत पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन शैली का विकास किया। जिसके अंतर्गत मनुष्य जीवन के सूक्ष्मतम आयामों को वरीयता प्रदान करते हुए प्रत्येक के मन में उन्नत जीवन के प्रति उत्कट इच्छा को उत्पन्न करने का सहज कार्य किया। यह एक अद्भुत सामाजिक तकनीक है । समाज में जिसे प्रतिष्ठा प्राप्त होती है अन्य लोग स्वाभाविक उसका अनुसरण करते हैं। महाजनों येन गत: स पंथ:। इस सुभाषित हमें इस बात की ओर इंगित करता है। समाज के वरिष्ठ जिस जिस पथ पर चलते हैं वहीं अन्य के लिए अनुकरणीय हो जाता है।

भारतीय परंपरा में जीवंत मनुष्यों की छवि उतारने की भी परंपरा नहीं है। आजकल हर घर में अपने छोटे बच्चों से लेकर सभी के चित्रों को बड़े-बड़े आकार में मुद्रित कर भित्तियों पर सुशोभित करने का चलन हो गया है। यह शोभाचार व्यक्ति की आयु का नाश करता है। दो दशक पूर्व भी हिंदी फिल्मों में इस प्रकार के संवाद सुनाई देते थे जब धमकी देते हुए कहा जाता था कि तेरी फोटो टंगा देंगे। इसका अर्थ होता था मार डालेंगे क्योंकि मरने के बाद ही फोटो टांगी जाती थी। आज हम अपने ही लाडलों की जीवित होते हुए फोटो पर टांग रहे हैं । यह उनकी आयु का क्षरण करने का कारण बनता है। बढ़ती हुई बीमारियों का भी यही कारण है।

वैसे ही सबके हाथ में भ्रमणध्वनी में ही छवि को बंदी बनाने की सुविधा- कैमरा आ जाने से हर बात पर फोटो खींचने की आदत सी पड़ गई है। किसी और छायाचित्रकार की भी आवश्यकता नहीं रही। सभी आजकल खुद खेंचू हो गए हैं। छोटी-छोटी बात पर स्वयं की छवि उतारने की आदत सी लग गई है। अज्ञान वश हम यह नहीं जानते ऐसा करने से हम अपने शरीर की हानि कर रहे हैं। मन में शरीर को आवश्यकता से अधिक महत्व देने के कारण मानसिक विकास में भी बाधा पड़ रही है। अनुशासन समाप्त हो रहा है। स्मरण शक्ति कम हो रही है । क्रोध बढ़ रहा है । छोटे छोटे बालक भी विषाद के शिकार हो रहे हैं। उबना (बोर होना) यह बालपन में कभी नहीं सुना था किंतु आज जीवन के अत्यंत सृजनशील पड़ाव में भी मनुष्य उब का शिकार हो गया है। इसका भी एक कारण अत्यधिक छवि उतारना है। मां की कोख से बाहर निकलते ही हर मिलने आने वाला उस छोटे बालक की अपने अपने भ्रमणध्वनी में छवि उतारता हैl वहां से प्रारंभ कर इतनी छवियां उस बालक की उतारी जाती है कि उसकी प्राणशक्ति का हरण हो जाता है। इच्छाशक्ति भी प्राणशक्ति पर ही निर्भर करती है। शरीर को महत्व देने से इच्छाशक्ति में भी कमी आती है। ब्रह्मचर्य के कायम न रहने का भी कारण शरीर का बढ़ा हुआ महत्व है।

इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए समझदार माता पिता अपने बच्चों के अंग्रेजी तिथि से जन्मदिन ना मनाएं। किसी भी प्रकार से ना मनाएं। पश्चिमी पद्धति तो अत्यंत विकृत है ही। दीप बुझाना, केक काटना यह तो मन को नकारात्मक संस्कार देते ही हैं, किंतु इसके पर्याय के रूप में कुछ संगठनों ने जन्मदिन के अवसर पर यज्ञ करना, आरती उतारना ऐसी भारतीय पद्धतियों का विकास किया है। वे समझते हैं कि इस प्रकार से उन्होंने पश्चिमी सभ्यता को मात दे दी है। किंतु यह तो और भी घातक है। हमारे यहां औक्षण अर्थात आरती उतारने की परंपरा विशिष्ट उत्सवो में है। जैसे रक्षाबंधन पर आरती उतारी जाती है। अक्षय तृतीया पर घर के बड़े भाई की आरती उतारते हैं। यह सारे अवसर शरीर के उत्सव से नहीं जुड़े हैं संबंधों के उत्सव से जुड़े हुए हैं। अतः आरती संबंधों की महत्ता को बालक के मन पर संस्कारित करती है। शरीर के जन्म का उत्सव मनाते समय शरीर की आरती उतारने से शरीर ही जीवन का सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य है यह संस्कार बालक में जाता है। ऐसा शरीर केंद्रित बालक अपने जीवन में संबंधों को भी केवल शारीरिक स्तर पर ही समझता है। ऐसे में बहुत कम आयु में ब्रह्मचर्य का खंडित होना स्वाभाविक ही है । समाज करता है, कक्षा में पढ़ने वाले सभी बच्चों का होता है, विद्यालय में यह परंपरा है, हमारे सभी संबंधियों के घरों में भी बालकों के जन्मदिन मनाए जाते हैं इसलिए विवशता से हमें भी करना पड़ेगा इस प्रकार के बहाने दे करके अपने बच्चों के जीवन को गलत दिशा में ले जाने से बचे।

स्वयं का भी जन्मदिन ना मनाएं, बच्चों का भी जन्मदिन ना मनाएं। जन्मदिन का महत्व ही समाप्त कर दें। सामाजिक माध्यमों में फेसबुक, टि्वटर आदि पर अपने जन्मदिन को लिखना ही बंद कर दे। ताकि हर कोई देख कर आपको शुभेच्छा देने के नाम पर शरीर के जन्म की याद न दिला सके। अपने जीवन के उदात्त लक्ष्य को खोजने इससे बड़ी कोई बाधा नहीं है। पशु और मनुष्य में सबसे बड़ा अंतर यही है कि पशु शरीर से परे नहीं सोचता और मनुष्य शरीर से परे ही जीवन के लक्ष्य को खोजता है।
मानवता के रूप में भी शरीर के जन्मदिन को मनाना अनुचित ही है। यह हमारे भीतर सुप्त पाशविकता को जगाने का ही कार्य करेगा।

मनुष्य का जीवन सूर्य की गति के साथ जुड़ा हुआ है क्योंकि इस जगत में सूर्य ही महाप्राण का मूल स्रोत है। सूर्य से ही प्राणशक्ति प्राप्त होती है। यह प्राणशक्ति ही हमारे जीवन को लक्ष्य केंद्रित बनाती है। अतः सात्विक प्राणों को बढ़ाना और उनके क्षरण को रोकना ये दोनों मनुष्य के जीवनचर्या के महत्वपूर्ण आधार है। इस दिशा में शरीर केंद्रित गतिविधि जैसे जन्मदिन मनाना, खुद खेंचूअथवा दूसरे द्वारा खींची हुई छवि को रक्षित करना यह सब बड़ी बाधाएं हैं। अतः जिन्हें अपने जीवन में कुछ भी सार्थक, प्रभावशाली, परिणामकारी, उदात्त, महान कार्य करने की इच्छा है वे स्वयं और अपने परिवार जनों को इन विनाशकारी प्रचालनों से बचाएं।

जून 5, 2019 Posted by | आलेख, सामायिक टिपण्णी | , | 1 टिप्पणी

शिक्षा का अर्थायाम


प्रतिवर्ष शासन द्वारा अपने वार्षिक व्यय का अनुमान (Budget) प्रस्तुत करने पर शिक्षा पर किए जानेवाले व्यय की चर्चा होती है। केंद्र सरकार द्वारा शिक्षा पर सकल राष्ट्रीय उत्पाद (G.D.P.) के लगभग 4% व्यय किया जाता है। विभिन्न आयोगों द्वारा समय-समय पर यह अनुशंसा की गयी है कि एक संवेदनशील राष्ट्र में शिक्षा व्यय सकल उत्पाद के कम से कम 6% होना चाहिए। भिन्न-भिन्न शैक्षिक संगठनों ने भी समय-समय पर यह मांग की है। भारतीय शिक्षण मंडल ने सकल राष्ट्रीय उत्पाद के अनुपात के स्थान पर शासकीय व्यय के 10% का प्रावधान शिक्षा क्षेत्र में करने की मांग रखी है। यह केंद्रीय व्यय का योगदान है। सभी राज्य शासन तो अपने व्यय का लगभग 20% शिक्षा पर लगाते ही है। दिल्ली, कर्नाटक, महाराष्ट्र जैसे कुछ राज्यों का शिक्षा व्यय तो 23% से अधिक है। इस सबके बाद भी शिक्षा में मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ती भी अभी तक नहीं हो पा रही। 20-25 वर्ष पूर्व सरकार ने अपनी असमर्थता को स्वीकार कर नीजी क्षेत्र को शिक्षा में निवेश के लिए आमंत्रित किया। वैधानिक रूप से शिक्षा धर्मार्थ सेवा के रूप में ही दी जा सकती है। शैक्षिक संस्थान लाभकारी उपक्रम (Profit Making Enterprise) नहीं हो सकते। किंतु वास्तव में भारत जैसे देशों में शिक्षा एक आकर्षक उद्योग बनता जा रहा है। जमीन, वस्त्र आदि उद्योगों में चुनौतियाँ बढ़ने के बाद अनेक उद्योजकों ने अपने कारखानों तथा व्यापारी संस्थानों को अभियांत्रिकी महाविद्यालयों जैसे व्यावसायिक शिक्षा संस्थानों में परिवर्तित कर दिया। इसे शीघ्र लाभ का साधन माना जाने लगा। वैधानिक लाभप्राप्ति की व्यवस्था न होने के कारण शिक्षा के व्यापारीकरण हेतु अनेक अनैतिक कुरीतियों का जन्म हुआ।

शासन के शिक्षा व्यय का एक बहुत बड़ा हिस्सा, कुछ-कुछ राज्यों में तो 90% से अधिक हिस्सा शिक्षकों के वेतन पर लगाना पड़ता है। विभिन्न वेतन आयोगों ने सरकारी शिक्षकों की आमदनी में अच्छी वृद्धि की है। किंतु सरकारें इस बोझ के कारण शैक्षिक विकास की अन्य सभी गतिविधियों में कटौती करने पर विवश है। नए भवनों का निर्माण, ग्रंथालय, प्रयोगशाला, अत्याधुनिक शिक्षा साधन आदि के लिए अनुदान लगभग बंद हो गया है। सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत माध्यान्ह भोजन, गरीब छात्रों के लिए निःशुल्क गणवेश, पाठ्यसामग्री तथा बालिकाओं के लिए साइकिल आदि का प्रावधान किया गया। गत दो दशकों से हुए इन प्रयासों का सुखद परिणाम शालेय शिक्षा में पंजीयन बढ़ने में हुआ। सरकारी आंकड़ों के अनुसार प्राथमिक शिक्षा का सकल प्रवेश अनुपात [Gross Enrollment Ratio (G.E.R.)] 95% हो गया है। कुछ राज्यों में तो यह 100% हो गया है। इसका अर्थ है कि भारत में जन्म लेनेवाले 6 वर्ष तक की आयु के 100 में से 95 बालक शाला में प्रवेश ले रहे हैं। सर्वशिक्षा अभियान की योजनाओं का 70% अनुदान केंद्र सरकार देती है। बाकि 30% की व्यवस्था राज्य शासन को करनी होती है। पूर्वोत्तर तथा जम्मू कश्मीर के अविकसित राज्यों हेतु 90% अनुदान केंद्र शासन का होता है। इन सब बातों से भी शिक्षा व्यय में वृद्धि हुई है। किंतु शिक्षा की गुणवत्ता पर इसका बहुत अधिक प्रभाव नहीं दिखाई देता है। उच्च शिक्षा में होनेवाला व्यय भी बढ़ाया गया है।

इस सबके बाद भी शालेय शिक्षा में नीजी संस्थाओं की भागीदारी बढ़ रही है। एक अनुमान के अनुसार 46% शालेय विद्यार्थी नीजी संस्थानों में अध्ययनरत है। उच्च शिक्षा में छात्र संख्या में नीजी संस्थाओं की भागीदारी 30% से कम है। किंतु महाविद्यालयों की संख्या में यह अनुपात 50% के लगभग हो गया है। नीतिनिर्धारकों एवं अधिकारियों में कुछ का मानना है कि नीजी क्षेत्र के बढ़ने से ही ‘सबको शिक्षा’ का लक्ष्य प्राप्त हो सकेगा। अतः योजनाओं में उसी प्रकार के प्रावधान गत दस वर्षों से किए जा रहे हैं। अनुभवी शिक्षाविदों एवं शिक्षा जगत में कार्यरत कार्यकर्ताओं का अनुभव है कि नीजी क्षेत्र के बढ़ने से व्यापारीकरण बढ़ेगा और समाज के बड़े वर्ग की पहुँच से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा बाहर हो जाएगी।

शिक्षा के अर्थायाम पर विचार करते समय शैक्षिक दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है। हम शिक्षा के उद्देश्य को किस दृष्टि से देखते हैं इस बात पर निर्भर करेगा कि शिक्षा का दायित्व किसपर है। शासकीय शिक्षा में शिक्षा के व्यय का भार शासन वहन करता है जबकि नीजी क्षेत्र में यह बोझ छात्रों अर्थात उनके अभिभावकों पर डाला जाता है। यदि शिक्षा को हम व्यक्ति के विकास के माध्यम से ही देखते हैं, और वह विकास भी केवल भौतिक स्तर पर ही समझा जाता है तब तो यह तर्क ठीक बैठता है कि सभी को अपनी-अपनी शिक्षा पर होने वाले व्यय का भार उठाना चाहिए। यदि अभिभावक सक्षम हो तो वे अपनी क्षमता के अनुसार महँगी से महँगी शिक्षा अपने बालकों को उपलब्ध कराएं। शिक्षा ऋण (Education loan) के पीछे भी यही दृष्टि है। जहाँ अभिभावक आर्थिक रूप से सक्षम नहीं है वहां स्वयं छात्रों को शिक्षा ऋण उपलब्ध करा दिया जाएं ताकि वे अपने मन के अनुसार शिक्षा खरीद सकें। ऐसी शिक्षा प्राप्त कर रोजगार मिलने के बाद छात्र अपने ऋण का भुगतान करें। गत दो दशकों से यह विचार प्रभावी होता जा रहा है। विलासितापूर्ण नीजी शिक्षा संस्थानों में लाखों रुपये शुल्क का भुगतान करने के लिए तैयार अभिभावक बढ़ रहे हैं। दूसरी ओर शिक्षा ऋण की संख्या एवं राशि में भी प्रतिवर्ष कई गुना वृद्धि हो रही है। इन दोनों पद्धतियों में छात्र और अभिभावक ग्राहक अथवा उपभोगता की भूमिका में आ जाते हैं और शिक्षा संस्थान व्यापारी अथवा सेवा प्रदाता (Service Provider) बन जाते हैं। ऐसे विद्यालयों में अभिभावक शिक्षक बैठक (PTM) ग्राहक-नौकर संवाद में बदलती जा रही है। ‘जब हम इतना शुल्क दे रहे हैं तो क्या इतनी भी अपेक्षा नहीं कर सकते?’, ‘हम इतने सारे पैसे देकर बच्चों को स्कूल भेज रहे हैं, अब उन्हें पढ़ाना आपकी जिम्मेदारी है।’ जैसे वाक्य बच्चों की माताओं द्वारा शिक्षकों को कहा जाना सामान्य बात हो गयी है।

भारत में शिक्षा की यही दृष्टि नहीं है। केवल परंपरागत भारतीय शिक्षण की ही बात नहीं है अपितु भारत के संविधान में भी शिक्षा को व्यापार की वस्तु मानने का विरोध है। अनिवार्य तथा निःशुल्क मूलभूत (Elementary) शिक्षा को प्रारंभ में संविधान निर्माताओं ने राज्यों के निदेशक तत्वों में रखा और अपेक्षा की कि शीघ्रातिशीघ्र इसे वैधानिक रूप प्रदान किया जाएं। 86वे संविधान संशोधन इ. स. 2002 द्वारा शिक्षा को मौलिक अधिकार का स्थान दिया गया और तत्पश्चात इ. स. 2009 में ‘शिक्षा के अधिकार अधिनियम’ (RTE) द्वारा 6 से 14 वर्ष के प्रत्येक बालक की मूलभूत शिक्षा (8वी तक) अनिवार्य कर दी गयी। अब ये माता-पिता का विकल्प नहीं रहा कि वे बच्चों को पढ़ाएं या न पढ़ाएं। अनिवार्यता के साथ निःशुल्क शिक्षा का प्रावधान भी आवश्यक था। यदि शिक्षा व्यापारिक सेवा मानी जाये तो उसे अनिवार्य नहीं किया जा सकता। यदि शिक्षा का उद्देश व्यक्तिगत विकास एवं रोजगार तक सीमित हो और इस कारण उसे व्यक्ति अथवा परिवार की जिम्मेवारी माना जाएं तो फिर शिक्षा ग्रहण न करने का विकल्प भी खुला रखना पड़ेगा। मूलभूत शिक्षा की अनिवार्यता यह सिद्ध करती है कि भारत का संविधान शिक्षा को व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक दायित्व मानता है। विधान की विवशता है कि वह समाज को अपने दायित्व के लिए बाध्य नहीं कर सकता। अतः निःशुल्क शिक्षा का भार राज्य पर डाला गया है। भारत के संविधान में मौलिक अधिकार तो विधि द्वारा संरक्षित है। अतः राज्य का दायित्व बनता है कि इनकी रक्षा का उचित प्रबंध करें। किंतु दूसरी ओर संविधान में सूचीबद्ध किये गए मौलिक कर्तव्य निदेशक तत्वों (directive principles) के रूप में है, अतः बाध्यकारी नहीं हैं। शिक्षा के अधिकार अधिनियम ने मूलभूत शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाकर अभिभावकों को बाध्य कर दिया है और आर्थिक क्षमता के प्रश्न को निःशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए राज्य को बाध्य कर सुलझाया गया है।

परंपरागत रूप से भारत में शिक्षा को व्यक्तिगत अधिकार, आवश्यकता अथवा विकास का साधन नहीं माना गया। अपनी अगली पीढ़ी को स्वयं से सवाई (125% विकसित) बनाने हेतु समाज के सामूहिक दायित्व के रूप में शिक्षा को देखा गया है। समाज की आवश्यकता है कि उसका प्रत्येक घटक केवल सुशिक्षित ही नहीं अपितु सुसंस्कारित बनें। अतः यह समाज का कर्तव्य बनता है कि वह इसकी समुचित व्यवस्था करें। ज्ञात प्राचीनतम इतिहास से ही भारत में शिक्षा निःशुल्क रही है। शिक्षा को न तो व्यापार बनाया गया और न ही सरकार के अनुदान पर आश्रित रखा गया। भारत में शिक्षा सच्चे अर्थों में स्वायत्त एवं समाजपोषित रही है। आर्थिक स्वावलंबन के बिना शैक्षिक व प्रशासकीय स्वायत्तता का कोई अर्थ नहीं रह जाता। अतः भारत में शिक्षा की समाजपोषित व्यवस्था प्रयत्नपूर्वक विकसित की गयी। सब कालखंडों में सर्वत्र एक सी व्यवस्था नहीं थी किंतु जो भी विविध प्रकार की व्यवस्था विकसित की गयी उसमें स्वावलंबन समाज का आधार तथा शासन एवं समाज निरपेक्षता को ध्यान में रखा गया। वैसे ही गुरुकुल शिक्षा में आवश्यकताएं कम करने का प्रशिक्षण दिया जाता है। अतः गुरुकुल की अपनी आवश्यकताएं भी न्यूनतम हुआ करती थी।

साधारणतः तीन प्रकार के शिक्षा संस्थान भारत में कार्यरत रहे हैं। आवासीय गुरुकुल नगर, गांव से दूर वन में हुआ करते थे। इनमें बड़ी संख्या में छात्रों एवं आचार्यों के निवास, अन्य शैक्षिक गतिविधियों के लिए अध्ययनशाला, गोशाला, यज्ञशाला, पाकशाला, प्रयोगशालाएं भी हुआ करती थी। छात्रों के अनुपात में इन सभी छात्रावासों एवं शालाओं की भी आवश्यकता पड़ती थी। इस सबके साथ ही कृषि भूमि भी गुरुकुलों से जुड़ी हुई थी। छात्र एवं आचार्य कृषि और गोपालन का कार्य साथ मिलकर करते थे। अतः भोजनादि की व्यवस्था इन्हीं में से हो जाती थी। वस्त्र निर्माण का कार्य भी अध्ययन का अंग होता था। अतः छात्रों की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ती व्यावहारिक अध्ययन के लिए किए गए कार्यों से हो जाती थी। भूमि एवं गायें समाज से दान में प्राप्त होती थी। अधिकतर निर्माण सामग्री प्राकृतिक ही होने के कारण वन से ही उनकी आपूर्ति हो जाती थी। मध्यकाल में बड़े-बड़े भवनों का निर्माण नालंदा, तक्षशिला आदि गुरुकुलों में हुआ था। उसमें समाज के धनिक वर्ग का दान लगा हुआ होगा। राजा भी इन बड़े गुरुकुलों के निर्माण में योगदान करते थे। किंतु वह दान दक्षिणा के रूप में होता था। राज्य द्वारा थोपी गयी विविध बाध्यताओं से बंधा अनुदान गुरुकुल स्वीकार नहीं करते थे। देश के कुछ भागों में बड़े-बड़े गुरुकुलों के संचालन हेतु राजाओं द्वारा गुरुकुलों को कुछ ग्रामों के अभिलेख (पट्टे) प्रदान किए जाने के प्रमाण उपलब्ध हैं। इन गांवों से प्राप्त कर राजा के पास नहीं, गुरुकुलों के पास जमा होता था। इस व्यवस्था में भी राजा का हस्तक्षेप नहीं होता था। एक बार अभिलेख प्रदान हो जाने के बाद गांवों की पंचायत व्यवस्था का दायित्व होता था कि सुव्यवस्थित कर-संग्रहण कर गुरुकुलों को उपलब्ध कराया जाएं। इस प्रकार स्वायत्तता से गुरुकुलों की आर्थिक व्यवस्था हो जाती थी। अध्ययनकाल के कुछ निश्चित समय में भिक्षा-भोजन अथवा माधुकरी अनिवार्य थी। पाँच घरों में भिक्षा मांगने से न केवल छात्रों के अहंकार का विसर्जन होकर उनके व्यक्तित्व का विकास होता था अपितु साथ ही सारे गुरुकुल का भोजन भी समाज के आधार पर हो जाता था।

भारतीय शिक्षा व्यवस्था की आर्थिक स्वायत्तता का सबसे बड़ा माध्यम गुरुदक्षिणा थी, जो छात्र अपने गुरुओं के प्रति स्वेच्छा से अर्पण करते थे। हम पुराणों में और अन्य इतिहास ग्रंथों में विलक्षण गुरुदक्षिणा के अनेक प्रसंग पाते हैं। किंतु, यह तो अपवादात्मक घटनाएं हैं। सब गुरूदक्षिणा इस प्रकार की नहीं थी।

गुरु पूर्णिमा के दिन प्रवेश करते समय छात्र अपने हाथ में केवल समिधा लेकर – समित्पाणि हो गुरु को स्वयं अर्पित हो जाता था। हाथ में धारण की गई समिधा उसके मन का प्रतीक थी कि ‘जिस प्रकार यह समिधा यज्ञ में अर्पित होकर स्वाहा हो जाएगी, उसी प्रकार मैं आपके चरणों में न-मन करते हुए अपने मन को आप को सौंप रहा हूं। अब आप इसे जीवन योग्य बनाइए।’ न्यूनतम 12 वर्ष की शिक्षा के बाद छात्र स्नातक होता था। यह समय सबके लिए निर्धारित नहीं था किंतु सामान्यतः इतना समय लगता था। कोई अलौकिक छात्र हो तो कम समय में भी योग्य हो जाता था। जैसा कहते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण ने मात्र 2 वर्ष गुरु सांदीपनि के आश्रम में रहकर 64 कलाओं और 14 विद्याओं का अध्ययन कर लिया। दूसरी ओर उत्तंक का उदाहरण है जिन्हें आयु के 40 वर्ष तक यानी लगभग 30-32 वर्ष गुरुकुल में रहना पड़ा। यह अपवाद हैं। सामान्यतः 12 वर्ष में शिक्षा पूर्ण हो जाती थी।

इसके पश्चात छात्र समाज में अपना योगदान करने के लिए तैयार होता था और गृहस्थ जीवन में प्रवेश करता था। गुरु को दी जाने वाली दक्षिणा जीवनपर्यंत देनी है क्योंकि गुरु ने जीवन की शिक्षा दी है। अतः अपनी कमाई में से दशांश गुरु को भेजने की परंपरा भारत में थी। सभी छात्र इस परंपरा का कर्तव्य मानकर पालन करते थे। चाहे राजा का पुत्र हो अथवा कोई गरीब किसान, अपनी आजीविका चलाने के लिए कष्ट से प्राप्त किए धन में से दसवां हिस्सा अपने गुरुकुल, पाठशाला अथवा गुरु को भेजता था। सभी शिष्यों से प्राप्त यह राशि गुरुकुल संचालन हेतु पर्याप्त होती थी। अतः किसी भी नए गुरुकुल को प्रथम 12 वर्ष ही अपने आर्थिक भार हेतु व्यवस्था करनी पड़ती थी। समाज में दान भिक्षा मांगनी पड़ती थी। 12 वर्ष बाद तो पूर्व छात्र ही गुरुकुल को संभाल लेते थे। यह अत्यंत स्वावलंबी व्यवस्था थी। इसके कारण आक्रमण काल में सत्ता विदेशी विधर्मियों के हाथ में चले जाने के बावजूद भारत में गुरुकुल जीवंत रहे।

आज जब हम गुरुकुल शिक्षा की पुनःप्रतिष्ठा की बात करते हैं तो केवल फिर एक बार अधिकाधिक गुरुकुलों से भारत में सभी को शिक्षा प्रदान करना इतना ही उसका अर्थ नहीं है। साथ ही वर्तमान व्यवस्था में भी गुरुकुल के कुछ तत्वों का समावेश अत्यावश्यक है। इन तत्वों में से गुरुकुल का अर्थायाम सबसे पहले लागू किया जा सकता है। यदि हमारी शिक्षा व्यवस्था से निकले हुए छात्र अपना कर्तव्य समझकर अपनी आय का कुछ निश्चित हिस्सा अपने शिक्षा संस्थानों को भेजना प्रारंभ कर दें तो सारे विद्यालय, महाविद्यालय यहां तक कि भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान IIT जैसे बड़े-बड़े शैक्षिक संस्थान भी स्वावलंबी बन सकते हैं। पूरी तरह से इस व्यवस्था का अभी परीक्षण किया जाना बाकी है किंतु कुछ अंशों में इसका प्रयोग सेवाभावी संस्थाओं में हो रहा है। अभी यह स्वैच्छिक है। विद्या भारती, रामकृष्ण मिशन, चिन्मय मिशन जैसे संगठनों में पढ़े हुए छात्र अपनी श्रद्धा से अपने पूर्व विद्यालय को दान देते रहते हैं। राजस्थान में भामाशाह योजना के अंतर्गत शासकीय विद्यालयों में भी समाज के योगदान को प्रारंभ किया गया। इसके चमत्कारिक परिणाम सामने आए। पाली जिले में विद्यालयों, महाविद्यालयों के भवन तक समाज ने निर्माण किए।

यदि इसे परंपरा का रूप दे दिया जाए और सभी पूर्व छात्र एक निश्चित राशि प्रतिमाह भेजने लगे तो और किसी संसाधन की आवश्यकता ही नहीं रहेगी। सारी शिक्षा निःशुल्क दी जा सकेगी। जो छात्र निःशुल्क शिक्षा प्राप्त करेगा वह इस कर्तव्य का पालन और अधिक श्रद्धा से करेगा। वर्तमान में चल रहे व्यापारिक शिक्षा संस्थानों से निकले हुए छात्रों में यह श्रद्धा नहीं दिखाई देती क्योंकि उनके मन में ग्राहक बोध है। उन्हें लगता है कि हमारी शिक्षा का पूरा व्यय हमारे माता-पिता ने ही वहन किया। अब हमें इसे वापस कमाना है। इस भाव के कारण वह अपने व्यवसाय में भी येन केन प्रकारेण कमाने में ही विश्वास रखता है। यदि सभी प्रकार की शिक्षा निःशुल्क हो जाए तो अपने विद्यालय, महाविद्यालय के प्रति ऋण से उऋण होने का भाव छात्रों में रहेगा। पूर्व छात्र श्रद्धा से अपने शिक्षा संस्थानों का योगक्षेम वहन करेंगे। केवल इतना ही नहीं, सेवाभाव से प्राप्त शिक्षा के कारण उनके व्यावसायिक जीवन में भी वही सेवाभाव प्रधान होगा। कहते हैं ना, जो बीज बोएंगे फसल उसी की काटी जाएगी। शिक्षा में यदि हम व्यापार का बीज बोएंगे तो हमारे छात्र बड़े होकर उसी प्रकार की व्यावसायिकता का आचरण करेंगे। यदि शिक्षा सेवाभाव से प्रदान की जाएगी तो उससे तैयार छात्र भी अपने जीवन के प्रत्येक कार्य को सेवाभाव से ही करेंगे। अतः शिक्षा का अर्थायाम केवल आर्थिक विषय ना होकर शिक्षा में नैतिकता का भी विषय बन जाता है। सरकार-निरपेक्ष और व्यापार-निरपेक्ष शिक्षा व्यवस्था ही वास्तविकता में स्वावलंबी, नैतिक, धर्मानुसारी शिक्षा है।

भारत माता को पुनः एक बार विश्वगुरु के पद पर आसीन करने के लिए आइए हम इस अर्थायाम को स्वयं से प्रारंभ करें। हम चाहे जिस शिक्षा संस्थान में पढ़े हो सरकारी, निजी अथवा सेवाभावी, अपने जीवन में कमाई का निश्चित अंश देना प्रारंभ करें। यह निश्चित है कि आज की व्यवस्था में तुरंत दशांश प्रदान करना प्रारंभ नहीं होगा। किंतु 2% से प्रारंभ किया जा सकता है। धीरे धीरे बढ़ते हुए 5% तक भी ले गए तो शासन को किसी प्रकार की आर्थिक व्यवस्था नहीं करनी पड़ेगी और ना ही शिक्षा संस्थानों को व्यापार करना पड़ेगा।

‘जीवन में हमने जो पाया है उससे अधिक हम प्रदान कर सकें’ यही मनुष्य होने का लक्षण है। अतः, बिना किसी तर्क-कुतर्क हम अपने विद्यालय को, जिसके कारण आज हम बने हैं, उसे आंशिक गुरु दक्षिणा देना प्रारंभ करें। यही गुरुकुल की पुनः स्थापना का स्थायी मार्ग है।

दिसम्बर 8, 2018 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , | टिप्पणी करे

दायित्वबोध की देवी हम करे आराधन


दायित्व:
देवी भागवत में शुम्भ-निशुम्भ की कथा आती है। ये दोनों मधु-कैटभ के ही वंशज है। उनके वध का प्रतिशोध लेना चाहते है। अपना सशक्त साम्राज्य बना लिया है। ब्रह्माजी से तपस्या कर  वरदान पा लिया कि कोई नर चाहे मानव हो या पशु के हाथों मृत्यु नहीं होगी। उनको दम्भ है कि कोई मादा, नारी से क्या ड़र। वे माता की शक्ति से अपरिचित है क्योंकि स्त्री को मादा के रूप में ही देखते है। यह असुर विचार का एक लक्षण है। नारी को मादा के रूप में भोग का साधन समझना। भारतीय संस्कृति में हर बाला को माँ के रूप में ही देखा जाता है। आज सप्तमी है। कुमारी पूजा का दिन है। स्वामी विवेकानन्द स्वयं कुमारी के अन्दर दिव्यता के दर्शन कर कुमारी पूजा करते थे। कश्मिर में क्षीरभवानि में आसपास जब कोई हिन्दू बालिका नहीं थी तो नाववाले मुसलमान की बेटी की स्वामीजी ने कुमारी पूजा की। वो नाववाला भी गद् गद् हुआ। आज भी कश्मिर के मुसलमान अपने आप को पंडीतों के वंशज मानते है। राजनीति और पाकीस्तान के हस्तक्षेप से मामला बिगड़ा हुआ है।
तो शुम्भ-निशुम्भ के आतंक से पीड़ित देवताओं ने माता दूर्गा की प्रार्थना की। पार्वती ने देवताओं पर दया कर कौशिकी का रूप लिया। उसे काली या कालरात्री भी कहते है। कहीं कही काली को उनकी सहायक के रूप में भी बताया गया है। वैसे इस युद्ध में सभी देवताओं की शक्तियाँ देवी के साथ लड़ी थी। कुल सात देवियों ने मिलकर धुम्रलोचन, चण्ड-मुण्ड, रक्तबीज सहित लाखों असुर सेना का नाश कर दिया। चमूत्व (Team) की शक्ति का यह चमत्कार था। धुम्रलोचन के साथ सबसे पहले युद्ध हुआ। उस समय कौशिकी माता ने अकेले ही अपने वाहन सिंह के साथ 60000 असुरों का वध कर दिया। फिर चण्ड मुण्ड अनेक मायावी दानवों की सेना लेकर आये। तब सातों देवियों ने मिलकर उनका निःपात किया। इसी से देवी का एक नाम चामुण्डा पड़ा। रक्तबीज का वरदान विचित्र था। उसके रक्त की बून्द जमीन पर गिरने से उसमें से और दानव उत्पन्न हो जाते। क्लोनिंग की कितनी उन्नत विधि? तो देवी ने काली को दायित्व दिया कि अपने खप्पर में रक्तबीज के रक्त के हर बून्द को धरती पर गिरने पहले ही पकड़ लो। और देवी ने उसके मस्तक का छेद कर दिया।
यह चमुत्व संगठन की शक्ति को कई गुणा बढ़ा देता है। कम कार्यकर्ता भी बड़े बड़े चमत्कार कर देते है। शिवाजी की सेना की सफलता का यही रहस्य था। चमु में सबका दायित्व स्पष्ट होना आवश्यक होता है। संगठन में प्रत्येक कार्यकर्ता का तय दायित्व हो ताकि कोई भ्रम अथवा कार्य का दोहराव ना हो। सब अपना अपना दायित्व निभाते हुए एक-दूसरे के पूरक बनें। दायित्व ही कार्यकर्ता का परिचय हो जाता है। इससे कार्य में व्यक्तिगतता नहीं आती। कार्य व्यक्ति निरपेक्ष हो जाता है। अपने दायित्व से कार्यकर्ता का आत्मबल, क्षमता और प्रभाव बढ़ता है। अन्यथा सामान्य गुणोंवाला कार्यकर्ता भी असामान्य परिणाम देता है।
कालरात्री का वाहन गर्दभ है। कार्यकर्ता भी चाहे जिस श्रेणी का हो दायित्व रूपी देवी की सवारी बनते ही वह भी पूजनीय हो जाता है। दायित्ववान कार्यकर्ता संगठन को अपने लक्ष्य कीओर अग्रेसर करता है। आदर्श चमु में हर दायित्व के लिये कार्य कर्ता और हर कार्यकर्ता के लिये दायित्व होता है। हम अपने दायितव का पूर्ण निर्वाह करते हुए कालरात्री की पूजा करें। यही हमारा कुमारी पूजन है। इसीसे वर्तमान असुर सेना का नाश होगा। खप्परवाली का खप्पर खाली ना रहे। कोई कार्यकर्ता दायित्व बिना न रहे!

अक्टूबर 17, 2018 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , | टिप्पणी करे

कात्यायनी : कार्यकर्ता निर्माण की कथा


कार्यकर्ताः
बड़ी प्रचलित कहावत है, ‘‘भगतसिंह पैदा तो हो पर पड़ौसी के घर में।’’ देशभक्तों की सब प्रशंसा तो करते है पर उनके बनने की प्रक्रिया की प्रसव पीड़ा को कोई नहीं सहना चाहता। महान त्याग से ही महान कार्य सम्पन्न होते है। पर आज परिवार त्याग के स्थान पर अपने बच्चों को सुरक्षित मार्ग से सहज, सफल जीवन जीने का ही प्रशिक्षण दे रहा है। अपने तक रहो, दुसरों के बीच में मत पड़ना। सामने अन्याय होता दिखे तब भी लफड़े में मत पड़ना यह आज की माता का अपने लाड़ले लल्लू को सतत परामर्श होता है। वीरप्रसवा भारत भूमि में जीजाबाई जैसी मातायें कहाँ चली गई?

नवरात्री के छठे दिन की देवी कात्यायनी है। ऋषि कात्यायन का साहस देखो। देवी से इसी आग्रह के साथ तप किया कि मेरे घर जन्म लो। देवी को परिवार में धारण करने की तैयारी। घोर तपस से प्रसन्न हो देवी ने ऋषि कात्यायन के घर जन्म लिया इसी से नाम पड़ा कात्यायनि।

संगठन में दिव्यता को अपने में जन्म देने की तैयारी वाले कार्यकर्ताओं की आवश्यकता होती है। वास्तव में ऐसे समर्पित कार्यकर्ता ही संगठन बनाते है। वे ही संगठन का आधार होते है। जितनी अधिक मात्रा में ऐसे कार्यकर्ता संगठन के पास होंगे उतना ही संगठन का विस्तार होगा। कुछ संगठनों में अपना पूर्ण जीवन संगठन को अर्पित करनेवाले पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं की व्यवस्था होती है। उन संगठनों में ये पूर्ण समर्पित कार्यकर्ता संगठन की रीढ़ बनते है। फिर अगले चक्र में ऐसे कार्यकर्ता होते है जो पूरा समय तो नहीं दे पाते किन्तु समर्पण पूर्ण होता है। अपने व्यवसाय व परिवार के साथ बराबर की वरीयता व महत्व ये कार्यकर्ता संगठन को देते है। समय भी नियमित रूप से निकालते है संगठन के कार्य के लिये। संसाधनों को एकत्रित करने में भी ऐसे कार्यकर्ताओं का बड़ा योगदान होता है। पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं की संख्या कितनी भी अधिक हो जाये सीमित ही होगी। अतः दूसरे चक्र के कार्यकर्ता कार्य को स्थायित्व प्रदान करते है। संगठन की समाज में प्रतिष्ठा भी ऐसे कार्यकर्ताओं के आचरण पर निर्भर होती है। समाज में प्रतिष्ठित व्यक्ति यदि किसी संगठन के साथ जुड़ जाते है तो अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा से संगठन की साख में वृद्धि करते है।

तीसरी श्रेणी में ऐसे कार्यकर्ता आते है जो नियमित समयदान अथवा वैचारिक योगदान भी नहीं करते किन्तु पूरी श्रद्धा से मूख्य कार्यकर्ताओं का नैतिक समर्थन करते है और समय पड़ने पर आवश्यकता के अनुसार समय, श्रम और अन्य संसाधनों का योगदान भी करते है। एक चौथी परत भी होती है संगठन से जुड़ने वालों की। इन्हें कार्यकर्ता तो नहीं कहा जा सकता किन्तु होते ये भी महत्वपूर्ण हैं। इन्हें आप संगठन के शुभचिंतक कह सकते है। ये संगठन के विचार, लक्ष्य व कार्य को समझते है और इससे सहमत भी होते है। किन्तु भिन्न वरीयताओं के कारण प्रत्यक्ष योगदान नहीं देते। किन्तु समाज में संगठन का अच्छा प्रभाव बनें इसमें सहायक होते है। सहज चर्चा में संगठन के प्रति सहानुभुति के शब्दों से समाज का सकारात्मक अभिमत बनाने का कार्य करते है। इनकी भी संगठन की प्रगति में अपनी भूमिका है।

कात्यायन सी तपस्या सभी संगठकों को करनी पड़ती है। अच्छा कार्य करते है तो विघ्नसंतोषी लोग विरोध भी करेंगे। संगठक को ऐसे लोगों से भी व्यवहार कुशलता से बरतना होता है। विरोध की धार बोथी हो ऐसा प्रयास करना होता है। जो दूरस्थ है वो निकट आये, सहानुभुति रखनेवाले सक्रीय हो, जो सक्रीय है वो नियमित हो यह तपस्या है। इसी के द्वारा संगठन में अधिक कार्यकर्ता पैदा होते है। अर्थात कात्यायनी माता की कृपा होती है।

अक्टूबर 16, 2018 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , | टिप्पणी करे

या देवी सर्व संघेशु कार्यपद्धति रूपेण संस्थिता …


पंचमी नवरात्रों की स्कन्द माता की पूजा

उत्तरापथ

संगठन की कार्यपद्धतिः
नवरात्री में आज की देवी स्कंदमाता है। तिथिक्षय के कारण आज पाँचवा दिन है। तिथिक्षय का भी विज्ञान होता है, पर वो फिर कभी| स्कंदमाता कुमार कार्तिकेय की माता के रूप में पार्वती जी का ही नाम है। तारकासुर के वध के लिये स्कंद सेनापति का जन्म हुआ था। इनको षण्मुखनाथ और कार्तिकेय के नाम से भी जाना जाता है। जन्म की कथा भी बड़ी रोचक है। महाकवि कालिदास ने ‘कुमारसम्भव’ में इसका अद्भुत वर्णन किया है। तारकासुर का आतंक बढ़ रहा था। भगवान विष्णु ने देवताओं को बताया कि शिवजी के पुत्र को सेनापति बनाओ तो विजय निश्चित है। पर शिवजी तो माता सति के देहान्त के बाद से अविवाहित है, अब कैसे होगा? हिमालय कन्या गिरीजा उनकी सेवा में रत है। उनको पति के रूप में वरण कर चुकी है। अब तप चल रहा है। पर कैलासपति तो ध्यान में रत बैरागी उनको कौन राजी…

View original post 694 और  शब्द

अक्टूबर 15, 2018 Posted by | Uncategorized | टिप्पणी करे

या देवी सर्वभूतेषु माया रूपेण संस्थिता . . .


नवरात्री पर जय माता दी

उत्तरापथ

संगठन की कार्य प्रणाली:
दूर्गा सप्तशति में मधु-कैटभ वध की कथा आती है। ये अत्यन्त रोचक रुपक है। दो असुर ब्रह्माजी के कान से निकले मैल से उत्पन्न हुए है। उग्र तपस्या से देवी का वरदान पा लेते है। वरदान पाकर उन्मत्त हो जाते है। फिर महाविष्णु उनका वध करते है। देवी की भूमिका असुरों को वर देने पर समाप्त नहीं होती। वे ही क्षीरसागर में शेषशैया पर लेटे विष्णु को सुलानेवाली योग निद्रा भी हैं। ब्रह्माजी के प्रयासों से जब विष्णु नहीं जगते तब वे देवी की प्रार्थना करते है। तब देवी महाविष्णु को जगाती है और असुर संहार के लिये प्रेरित करती है, असुरों की शक्ति तथा कमजोरी का परिचय दे कर मंत्रणा भी देती है।
कथा के रुपक में छिपे प्रतिकों को समझने से ही पुराणों का मर्म खुलकर सामने आता है। ब्रह्मा जी सृष्टिकर्ता है। वे सृजन में रत रहते है। विद्या की देवी सरस्वति के…

View original post 588 और  शब्द

अक्टूबर 15, 2018 Posted by | Uncategorized | टिप्पणी करे

या देवी सर्वभूतेषु धर्मरूपेण संस्थिता . . .


नवरात्री के लिए विशेष

उत्तरापथ

संगठन का कार्य: माता दूर्गा का जीवनकार्य महिषासुर का वध था। सारी रचना इसी बात को ध्यान में रखकर थी। यदि इस पुराण कथा के प्रतिक को समझने का प्रयत्न करते है तो संस्कारों का शास्त्र हमारे सम्मुख आता है। माता का वाहन सिंह है और शत्रु महिष अर्थात भैंसा। दोनों शक्ति के प्रतिक है। एक संयमित पराक्रम का उदाहरण है तो दूसरा विवेकहीन पाशविकता का। मनुष में ये दोनों बीज रुप में उपस्थित होते है। उसे अपने अंदर के सिंहत्व का पालन करना है और उसे अपने लक्ष्य की ओर जाने का वाहन, साधन बनाना है| अनियन्त्रित कामनाओं का भैंसा भी मन में समय समय पर कुलांचे भरता है। उसका मर्दन करना है।
समाज में भी संस्कारों की सिंहशक्ति और असामाजिक महिषशक्ति दोनों पर्याप्त मात्रा में होती है। संगठन को सज्जन-शक्ति को एकत्रित कर उसके पराक्रम का आह्वान करना है। मानवता के विरुद्ध कार्य करने…

View original post 328 और  शब्द

अक्टूबर 15, 2018 Posted by | Uncategorized | टिप्पणी करे

एक मन, विचार, संकल्प और स्वप्न


Navaratri day 2

उत्तरापथ

brahmacharini mataकेवल ध्येय और विचार ही उदात्त होने से काम नहीं चलता संगठन के साने दृष्टि भी उदार होना आवश्यक है। बड़े लक्ष्य लेकर चलने ही बड़े कार्य सम्भव होते है। यदि संग्ठन अपने सम्मूख लक्ष्य ही छोटा रख ले तो फिर उसका दायरा भी सीमित हो जायेगा। शक्तिपूजा हमें उदात्तता की ही प्रेरणा देती है। 1897 में जब भारत की स्वतंत्रता का भी को चिन्ह नहीं दिखाई दे रहा था तब स्वामी विवेकानन्द ने भारत के सम्मूख विश्वविजय का ध्येय रखा। 12 संन्यासी भाइयों से प्रारम्भ कर रामकृष्ण मठ को विश्व को हिन्दू संस्कृति व वेदान्त के संदेश का कार्य दिया। डा हेड़गेवार ने जब 1925 की विजयादशमी को कुछ मुठ्ठीभर बालकों के साथ संघ शाखा का प्रारम्भ किया था तभी उनके सम्मूख पूरे हिन्दू समाज के संगठन का लक्ष्य था। इन उदात्त विचारों ने ही चमत्कार किये है।

महान विचार के साथ लोग जुड़ते है तभी संगठन का स्वरूप…

View original post 809 और  शब्द

अक्टूबर 14, 2018 Posted by | Uncategorized | टिप्पणी करे

संगठन की घटस्थापना


कुछ वर्ष पूर्व नवरात्री पर लेखमाला लिखी थी| सबके अवलोकनार्थ पुनः प्रेषित …

उत्तरापथ

maa-shailputri1नवरात्री का शुभारम्भ! शक्तिपूजा का उत्सव! यह केवल शक्ति के आध्यात्मिक स्वरूप का पूजन नहीं है। वास्तव में हर स्तर पर ही शक्ति का ही असविष्कार जीवन के रूप में हो रहा है। अतः शक्तिपूजा तो जीवन का ही उत्सव है। उत्स से बनता है उत्सव। मन को जो उपर उठाये वह उत्सव। उपर उठने को ही उत्स कहते है। इसी से उत्साह शब्द भी बना है। जब मन उदात्तता का अनुभव करता है तब उत्साह होता है। उत्साह से ही मानव पराक्रम करने में सक्षम होता है। जीवन में जितना अधिक उत्साह होगा उतना ही महान कार्य हो सकेगा। उत्साह का निमित्त यदि भौतिक, शारीरिक या कि स्पष्ट कहे तो केवल ऐन्द्रिक होने से उत्साह क्षणिक और विध्वंसक हो सकता है। यही कुछ उधार के लिये आधुनिक उत्सवों में देखने को मिलता है। गणेशोत्सव व दूर्गापूजा जैसे पारम्पारिक त्योहारों पर भी इस उथली उफन का परिणाम गत कुछ वर्षों…

View original post 855 और  शब्द

अक्टूबर 10, 2018 Posted by | Uncategorized | टिप्पणी करे

हताश स्वार्थों का असफल बंद


जातियों के नाम पर आंदोलनों की बाढ़ आ गयी है। राजनीति में हारे हुए दलों की हताशा का यह परिणाम है कि समाज को तोड़ने के लिए विभिन्न बहानों का आधार लेकर जातीय अस्मिता का उपयोग करने का प्रयत्न किया जा रहा है। आरक्षण जैसे स्वार्थी मांगों के लिए पटेल, गुर्जर, जाट, मराठा आदि जातियों को भड़काने का प्रयत्न किया। प्रायोजित नेतृत्व के पीछे करोड़ों रूपया खर्च किया गया। इन आंदोलनों में समाज के कुछ लोग भ्रमित होकर सम्मिलित हो गए। किंतु शीघ्र ही सत्य सामने आ गया और समाज के बड़े वर्ग का इस प्रायोजित नेतृत्व से मोहभंग हो गया। जिन चुनावी समीकरणों को ध्यान में रखकर ये सारे षडयंत्र किए गए वे भी असफल हो गए। महाराष्ट्र, राजस्थान और गुजरात में देश के सबसे पुराने दल को इन समस्त हथकंडों के बाद भी करारी हार झेलनी पड़ी। इन सभी स्वार्थी तत्वों का अब लक्ष्य दलित वर्ग बना है। भीमा-कोरेगांव हो अथवा 2 अप्रैल इ.स. 2018 का भारतबंद, दोनों ही झूठी कहानियों पर दलितों को भड़काने का प्रयत्न था। दोनों प्रयत्न पूर्णतः असफल हुए। दलित समाज के बड़े वर्ग का समर्थन इन झूठे आंदोलनों को नहीं मिला।

बसें जलाना, गाड़ियों को तोड़ना और अन्य प्रकार की हिंसा में पुलिस को लक्ष्य करना आदि के द्वारा प्रसार माध्यमों में दर्शनीय प्रचार होने के कारण यह बात फैलाने का प्रयत्न हुआ कि आंदोलन सफल हुए। किंतु थोड़ा भी निष्पक्ष सूक्ष्मता से अवलोकन किया जाए तो दोनों ही घटनाओं में भाड़े के प्रदर्शनकारी ही प्रमुखता से दिखाई देंगे। दलित समाज इन राजनैतिक दलों के स्वार्थी सत्य को समझ गया है। अतः प्रायोजित नेताओं के पीछे अपनी आजीविका को छोड़कर समय नहीं व्यर्थ गंवाते। यदि भीमा-कोरेगांव में थोड़ा भी सत्य होता तो केवल 2-3 दिन में आंदोलन शांत होना संभव नहीं था। गांवों में सौहार्द बना रहा और मुंबई में किराये के गुंडों से उत्पात मचाया गया। जालीदार टोपी पहने ‘दलितों’ को अशोकचक्र सहित नीले झंडे लेकर तोड़फोड़ करता हुआ देखा गया। दलित अत्याचार अधिनियम के कथित परिवर्तन की झूठी कहानी को लेकर किए भारतबंद में भी यही दृश्य पुनः दिखाई दिया। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश आदि राज्यों में हुए किसान आंदोलन भी इसी प्रकार के प्रायोजित राजनैतिक प्रयत्न थे। कर्नाटक और पंजाब जहां किसान सर्वाधिक पीड़ित हैं वहां कोई आंदोलन नहीं हुए। भारतबंद में भी 32% दलित जनसंख्या होते हुए भी पंजाब में कोई हिंसा की घटना नहीं हुई। संभवतः आंदोलन को प्रायोजित करने वाले दल ही सत्ताधारी होने के कारण ऐसा हुआ होगा।

सभी आंदोलनों में राज्य एवं केंद्र सरकार के धैर्य की सराहना करनी होगी। इस धैर्य के कारण ही पूरी तैयारी होने के बाद भी आंदोलनों को हिंसक स्वरुप नहीं दिया जा सकता। इस बात के लिए केवल प्रशासनिक सूझबूझ ही नहीं अपितु राजनैतिक दूरदृष्टि की भी आवश्यकता होती है। अस्थायी चुनावी हितों के लिए देश की सुरक्षा व समाज की एकात्मता को दांव पर लगानेवाली राजनीति का उत्तर अपनी ओर से उसी प्रकार के तुष्टिकरण से उत्तर देने के स्थान पर जाती, पंथ, लिंगभेद के परे जाकर सबको समर्थ बनाने का कार्यक्रम लागू करना वर्तमान केंद्र सरकार की सफलता का रहस्य है। जनसामान्य को सक्षम बनानेवाली योजना में अप्रत्याशित गति गत तीन वर्षों में आई है। अनेक योजनाएं तो पूर्व सरकार द्वारा प्रारंभ की गयी थी किंतु प्रशासनिक अक्षमता के कारण उनका कोई परिणाम जमीन पर नहीं दिखाई दे रहा था। मोदी सरकार ने पूरी शासकीय यंत्रणा को संकल्पबद्ध (mission-mode) गति प्रदान की। हजार दिनों में 5 करोड़ जनधन खाते खोलने का लक्ष्य सरकारी बैंकों को दिया गया। केवल 15 माह में लक्ष्य पूरा हुआ। हजार दिनों में तो दस करोड़ खाते खुल जाएंगे। इन खातों के माध्यम से सरकारी योजनाओं की सहायता सीधे हितकारी तक पहुंचाने का कार्य प्रारंभ हुआ जिससे बिचौलियों द्वारा भ्रष्टाचार को बड़ी मात्रा में कम किया।

पंजाब में कोई प्रदर्शन अथवा हिंसा भारत बंद के मध्य नहीं हुई। इन बातों से यह स्पष्ट है कि पूरा का पूरा आंदोलन किसी विशेष दल द्वारा चलाया गया है। भारत बंद की पूर्ण असफलता का कारण यह है कि समाज से जुड़ा हुआ यह विषय नहीं है। कोई बड़ा आक्रोश दलित समाज में इस विषय को लेकर नहीं हैं। राजनीतिक दलों द्वारा अपने स्वार्थ के लिए मुद्दों को उठाया गया है जिनका समाज से कोई संबंध नहीं है। हिंसा की घटनाएं, बसों का जलाना आदि माध्यमों में प्रमुखता से दिखाया गया। इस कारण यह भ्रम फैला कि जातिगत विषमता समाज में बढ़ी है। वास्तविकता इसके विपरीत दिखाई देती है। नई पीढ़ी पुराने दकियानूसी विचारों से मुक्त हुई है। समाज के सभी वर्गों के युवा देश को एक नई दिशा दिखाना चाहते हैं इसलिए जातिगत समीकरण अब और अधिक समय तक राजनीतिक लाभ नहीं देंगे। सारे दल इस बात को समझे तो समाज का भी भला होगा और उनका भी जिन दलों ने गत 5 वर्षों में भी अपने जातिगत विभाजनकारी विचार को नहीं बदला वे आज समाप्ति के कगार पर हैं। पूर्वोत्तर में इन दलों की सोच थी कि वनवासी और ईसाई बहुल राज्यों में केवल तुष्टीकरण से सत्ता बनाई जा सकती है। किंतु भारत की लोकतांत्रिक जनता ने ऐसे दलों को उनका स्थान दिखा दिया। आज देश की जनता सबके सर्वांगीण विकास का विचार करते हुए एक स्थिर सरकार बनाने के लिए मतदान करती है। सभी राज्यों में यही दृश्य दिखाई दिया कि जिस दल का पूर्ण बहुमत आने की संभावना है उसे जनता ने सभी मतभेदों से ऊपर उठकर आशिर्वाद प्रदान किया। अतः विभाजनकारी राजनीति के दिन अब लद चुके हैं। 2019 के चुनाव के लिए जो लोग विभाजन की रणनीति बना रहे हैं वे जनता के भाव से पूरी तरह कटे हुए हैं। वे नहीं जानते कि समाज किस प्रकार सोच रहा है।

जो लोग सामाजिक माध्यमों में भारत बंद का विरोध कर रहे थे वे भी परोक्ष रूप में इन्हीं विभाजनकारी शक्तियों का साथ दे रहे थे। प्रमुख माध्यमों ने भारतबंद की हिंसा को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया। उन्होंने यह नहीं दिखाया कि लगभग पूरे देश में सभी बाजार खुले हुए थे, संचार व्यवस्था सुचारू चल रही थी क्योंकि समाज का साथ भारतबंद करने वाले तथाकथित नेताओं को नहीं था। इस बात को समाज के सम्मुख रखने का दायित्व हम जैसे कार्यकर्ताओं का है। हम सकारात्मक पहलुओं को समाज के सम्मुख उजागर करें ताकि 2019 का चुनाव सच्चे अर्थ में भारतीय लोकतंत्र के प्रौढ़ होने का प्रमाण बनें। इस बात से अधिक अंतर नहीं पड़ता कि कौन चुनाव में विजयी होता है। राष्ट्र के लिए अधिक आवश्यक है कि किन मुद्दों पर चुनाव लड़ा जाता है। राजनीतिक दल किस विमर्श का प्रयोग करते हैं और उसकी दिशा तय करने के लिए सकारात्मक बातों को प्रचारित करना आवश्यक है।

अप्रैल 4, 2018 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , | 4 टिप्पणियाँ

%d bloggers like this: