उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

मातृ देवो भव ! पितृ देवो भव !!


एक अद्भुत अनुभूति उज्जैन में एक अत्यंत उच्च शिक्षा विभूषित गृहस्थ के घर पर हुई। जिनके घर हम प्रातराश के लिए गए थे वे स्वयं वेद, वेदांग, ज्योतिष के बहुत बड़े विद्वान पंडित हैं तथा एक विश्वविद्यालय में विभागाध्यक्ष हैं। उनके स्वयं के अनेक शिष्य PhD,  बड़े-बड़े विद्वान, पंडित, कर्मकांडी हैं। इनके स्वयं के भी ज्योतिष आदि के प्रयोगों में भी अनेकों को लाभ मिला है। इनके पिताजी भी बहुत बड़े महामहोपाध्याय काशी से विभूषित संस्कृत के विद्वान पद्मश्री से सम्मानित हैं। पिता  की आयु 95 वर्ष, माता की 93 वर्ष, इनके घर जब हम 7-8 कार्यकर्ता कालभैरव आदि के दर्शन करके लगभग 10 बजे पहुँचे, तो पंडित जी ने स्वयं अपने हाथ से परोस कर सबको प्रातराश करवाया। अत्यंत आदर और प्रेम से, अतिथि देवो भव की भारत की संकल्पना को साक्षात् साकार किया। यह अत्यंत आनंददायी अनुभव था।

सबसे बड़ी बात थी अपने वयोवृद्ध माता-पिता के प्रति उनकी श्रद्धा और सम्मान। आज वर्तमान में फिल्मों, नाटकों में दिखाते है कि बड़े-बड़े उच्च पदों पर बैठे पुत्र अपने माता-पिता को अपने घर में इसलिए नहीं रखते हैं कि उनके व्यवहार से वे लज्जास्पद अनुभव करते हैं। माता-पिता घर में आने वाले बड़े अतिथियों के सामने कुछ भी बोल देंगे, कैसे भी आचरण करेंगे, कुछ भी व्यवहार करेंगे, इस कारण उन्हें घर में नहीं रखते हैं। रखते भी हैं तो उनका परिचय देने में कठिनाई अनुभव होती है। ऐसे समय जब केवल नकारात्मक समाचार ही प्रसारित किये जाते है, तब  यह अत्यंत सुखद अनुभूति जिसमें भारतीयता का एक अद्भुत उदाहरण हमें साक्षात् देखने को मिला, को समाज में फैलाना आनंद का विषय है।

स्वयं महापंडित अपने माता-पिता से अत्यंत विनम्रता से बातचीत कर रहे थे। पिताजी को सुनाई नहीं देता है तो वे पास जाकर उनके कान में परिचय दे रहे थे। उनके किसी भी बात को बार-बार पूछने पर बिलकुल बिना झल्लाए, विना कोई चिड़चिड़ाहट दिखाए, अत्यंत संयम के साथ, धैर्य से, प्रेम, स्नेह और आ

दर के साथ अपने माता-पिता के हर प्रश्न का उत्तर उन्होंने दिया। माता जी को सुनाई भी देता है और बोलती भी बहुत अच्छा है, गाती भी अच्छा है। माता जी हम सबसे परिचय ले रही थी, हम सब से बात भी कर रही थी। कुछ हिन्दीभाषी थे, उनसे भी त्रुटिवश वह कभी-कभी मराठी में बात कर रही थी। लेकिन पंडित जी ने कभी भी माँ को नहीं टोका कि अरे उन्हें मराठी नहीं आती। उन्होंने माँ को कुछ नहीं कहा। माँ जो मराठी में बोलती थी, वे हिन्दी में अनुवाद कर बताते थे।

मैंने बिना यह सोचे कि इस आयु में उन्हें सुपाच्य होगा के नहीं, चलेगा की नहीं, माँ से पूछ लिया, “आप लेंगी पोहा?”
माँ ने कहा, “हाँ ले लूँगी।”
पर बाद में जब थाली आयी, पंडित जी ने रोक दिया कि अभी-अभी उनका प्रातराश हो चुका है, यह जानकर ही उन्होंने माँ को नहीं दिया था।
माँ ने पुत्र को 4 बार टोका, “अरे मुझे भी तो दे!”
पुत्र ने कहा, “माँ, आपको अभी नहीं देना है, बाद में दूँगा। आवश्यकता नहीं है अभी।”
मॉं ने कहा भी, “देखो अब तो इ

सके ऊपर ही निर्भर है, ये नहीं देगा तो मैं कैसे खाऊँगी!”

फिर थोड़ी देर बाद माँ ने और ज़ोर देकर कहा, “चलो मुझे भी नहीं दे रहे हो, पिताजी को भी नहीं दे रहे हो, तो तुम ही खा लो सबके साथ!”
7-8 लोग घर में आए हुए हैं, पंडित जी परोस रहे थे इस कारण वे हमारे साथ नहीं ले सकते थे । पर उन्होंने माँ को एक बार भी मना नहीं किया।

माँ ने फिर दो बार, तीन बार कहा तो माँ को कहते, “हाँ माँ, बस अभी लेता हूँ।”, “मैं बाद में इनके जाने के बाद लूंगा।”, “मुझे बहुत ज़्यादा खाना है, आप तो जानती ही हो, मेरी डाइट बहुत ज़्यादा है, ज़्यादा खाता हूँ। इसलिए इनके सामने नहीं खा रहा हूँ।” आदि आदि।
एक बार भी माँ को नहीं कहा, “क्यों आप बार-बार कह रही हो?” झल्लाए नहीं, कुछ नहीं। बहुत प्रेम से, स्नेह से माँ की बातों का उत्तर दिया। माँ का इस आयु में यह बाल हठ – एक श्लोक सुनाऊँ? तुम्हें एक संस्कृत का गीत सुनाऊँ? स्रोत्र सुनाऊँ?
तो पुत्र ने यह नहीं कहा

कि अरे रहने दो माँ, बल्कि पुत्र ने कहा, “हाँ हाँ माँ सुनाओ, वह वाला सुनाओ।

कैसा अद्भुत दृश्य था वह!!
मेरी आँखों में अश्रु आ गए। मुझे स्वयं का अनुभव स्मरण हुआ, मैंने कैसे अपनी माँ से व्यवहार किया। वैसे तो प्रचारक होने के नाते 30 वर्ष से घर में हूँ नहीं। किन्तु जब घर आता-जाता हूँ (नागपुर केंद्र हो जाने से घर में माता-पिता का हालचाल जानने हेतु आना-जाना थोड़ा बढ़ भी गया है), भले ही रात को ना रुकूँ लेकिन आना-जाना तो होता ही है। तो मेरा माँ पर छोटी-छोटी बात पर झल्लाना, अपने मन में तसल्ली देना कि मैं उनके स्वास्थ्य के लिए, उनके भले के लिए ही कह रहा हूँ। लेकिन ज़ोर से बोल देना, अधिकार से बोलना, वह सब वहाँ बैठे-बैठे स्मरण हो रहा था। मैं मन ही मन सोच रहा था की यह आदर्श है, प्रयत्न करना होगा ऐसे बनाने का।

मैंने पूछा, “माँ की आयु क्या है?”
उन्होंने बताया, “93”
माँ ने सुना तो टोक दिया, “नहीं नहीं, अभी अभी 90 पूरा हुआ है, 91 शुरू हुआ है।”
पुत्र ने मॉं को नहीं कहा कि अरे माँ आपको याद नहीं है, पुत्र ने मुस्कुराकर “हाँ हाँ, ठीक है” ऐसा बोलकर, मुस्कुराकर बात को टाल दिया।
जब हम में से एक कार्यकर्ता ने कहा, “अरे आप तो लगती नहीं 90 की भी, आप तो 70-75 की लगती हैं!”
मॉं इस आयु में भी एकदम ऐसी प्रसन्न हुई कि उनका आनंद देखते ही बनता था। ऐसी स्त्री-सुलभ प्रसन्नता हुई उन्हें आयु कम बताने से कि बस पूछो नहीं!
बेटे को कहती, “राजू देख देख, क्या कह रहा है, तू तो बुड्ढी कहता है।”

सारा प्रसंग इतना अद्भुत था, प्रेम में, आदर में, सम्मान में, भारतीय संस्कृति का साक्षात अनुभव किया। मुझे लगता है आज भी सभी घरों में ऐसे ही माता-पिता हैं, सभी घरों में ऐसा ही पुत्र है और ऐसे ही संस्कार हैं। केवल प्रेम से आदर व्यक्त करने की पद्धति सबकी पद्धति कुछ कुछ निराली है। कोई थोड़ा कम झल्लाता है, कोई थोड़ा ज़्यादा झल्लाता है। मैं डॉ. राजराजेश्वर शास्त्री मूसलगांवकर को दंडवत प्रणाम करता हूँ कि वे धैर्य की साक्षात् प्रतिमूर्ति थे, पूरे समय वे एक बार भी नहीं झल्लाए। वैसे उनके सभी शिष्य और साथी जानते हैं कि उनका स्वभाव इतना धैर्यवान नहीं है। उनके रुद्र रूप को बहुत लोगों ने देखा है और ऐसा नहीं है कि वे क्रोधित नहीं होते।

माता-पिता तथा गुरु दोनों हमें मूल्य प्रदान करते हैं, उनका न तो मूल्यांकन किया जाता है, न ही उनके प्रति कोई भी मन में निर्णायक विचार लाया जाता है और न ही उन पर कभी क्रोधित हुआ जाता है अथवा झल्लाया जाता है। यह जो भारतीय संस्कृति की सीख है, यह साक्षात् आचरण में देखने को मिली और मन बड़ा प्रसन्न हुआ, आश्वस्त हुआ कि सनातन संस्कृति शाश्वत है, सनातन है। नित्य नूतन, चिर पुरातन है।

दिसम्बर 5, 2019 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , | 1 टिप्पणी

नियमित गुरुदक्षिणा से अपनी आय को शुद्ध करें


यज्ञ, दान और तप इन तीन कर्मों को भगवद्गीता में बड़ा महत्व दिया गया है। भगवद्गीता के अठारहवें अध्याय में जहाँ पर कर्मों का त्याग करने की बात की है, वहाँ पर भी भगवान श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि ये तीन कर्म त्याज्य नहीं हैं। इनको करने से किसी भी प्रकार का किल्मिश, कलंक या पाप प्राप्त नहीं होता। इन तीन प्रकार के कर्मों को मनुष्य की साधना का महत्वपूर्ण अंग माना गया है।

 

यज्ञ का अर्थ है अपने ऋण से ऊऋण होने के लिए किया गया कार्य। हमारे जीवन में अनेक स्तरों पर अनेकों का योगदान है। उन सब का अलग-अलग स्मरण कर उनके ऋण से उऋण होना सदैव संभव नहीं होता। इसलिए भारतीय संस्कृति में पंच महायज्ञों की संकल्पना है। हमारे अस्तित्व में योगदान देने वाले सभी प्रकार, सभी वर्गों के लिए किया गया समर्पण यज्ञ कहलाता है। अनेक मनुष्यों का योगदान हमारे जीवन में होता है, इसलिए ‘नरयज्ञ’ प्रतिदिन करना है। नरयज्ञ अर्थात अतिथि भोजन। यहाँ अतिथि का अर्थ है जो बिना बताए आए। अपरिचित व्यक्ति को भोजन कराना नरयज्ञ में आता है। भूतयज्ञ – प्राणिमात्र के योगदान के बिना भी हमारा जीवन नहीं चल सकता। उनके लिए प्रतिदिन कुछ न कुछ करना – गाय, कुत्तों को रोटी खिलाना ऐसे अनेक नित्यक्रम भूतयज्ञ से जुड़े हुए हैं। हमारे जीवन में योगदान करने वाली तीसरी श्रेणी हैं पितृ। इस पितृऋण से मुक्त होने के लिए है पितृयज्ञ। हमारे माता-पिता, दादा-दादी एवं पूरी पीढ़ी ने ही हमें ऐसे संस्कार, जीवन यहाँ तक कि शरीर भी प्रदान किया है। उनके प्रति अपनी श्रद्धा और समर्पण करने के लिए हैं पितृयज्ञ। प्रकृति के प्रति समर्पण का यज्ञ देवयज्ञ है। प्रकृति की शक्तियों को देवता कहते हैं। उनके योगदान के बिना हमारा जीवन चल नहीं सकता। अत: उनके लिए प्रतिदिन कुछ न कुछ समर्पण करना यह देवयज्ञ है। ऐसे ही ऋषियज्ञ अथवा ब्रह्मयज्ञ है। यहाँ आध्यात्मिक एवं लौकिक ज्ञान की परंपरा निरंतर है। अनेक ऋषियों के ब्रह्मवेत्ताओं के तप से ही यह अखंड चल रही है। उनके प्रति अपने ऋण व आभार को व्यक्त करने के लिए जो समर्पण किया जाता है अर्थात ज्ञान के क्षेत्र में प्रतिदिन स्वाध्याय के द्वारा स्वयं का मौलिक योगदान दिया जाता है उसे ऋषियज्ञ अथवा ब्रह्मयज्ञ कहते हैं। इस प्रकार अस्तित्व के पांचों स्तरों पर जिसके कारण हमें बहुत कुछ मिला है, जिसके बारे में हम जानते नहीं कि किसने क्या दिया है उन सबके लिए कुछ न कुछ करना, यही यज्ञ की संकल्पना है।

यह मनुष्य में दायित्वबोध का निर्माण करता है कि मैं अकेला नहीं हूँ, समस्त सृष्टि से जुड़ा हूँ और मेरे जीवन के भरण पोषण में सृष्टि, समाज, अनेक लोगों का योगदान है।

इस दायित्वबोध का जागरण व्यक्ति के मन में करना यज्ञ का उद्देश है। परंतु साथ ही साथ उसमें एक स्वावलंबी समाज की व्यवस्था का निर्माण भी होता है। जैसे भूतयज्ञ की ‘अतिथि देवो भव’ परंपरा गृहस्थाश्रम को अन्य तीनों आश्रमों के केंद्र में लाकर खड़ा कर देती है। एक अद्भुत सामाजिक व्यवस्था भारत में थी जिसमें ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास जिन्हें उपार्जन करना नहीं है, ये तीनों आर्थिक उत्पादन का दायित्व जिस आश्रम पर है उस गृहस्थ आश्रम पर आश्रित थे। माधुकरी माँगने के लिए जाने वाले विद्यार्थी गुरुकुल से निकलकर पाँच गृहस्थों के घर जाकर जब “ॐ भवति भिक्षां देहि” का घोष करते थे तब उस घर की गृहिणी अत्यंत समर्पण से, मातृवत् भाव से उन बालकों को भोजन कराती थी। यह सामाजिक संबंधों का भी अद्भुत उदाहरण था। उनको भोजन कराते समय उस माँ के मन में यह विचार रहता था कि मेरा भी पुत्र ऐसे ही किसी और माता के घर में भिक्षा ग्रहण कर रहा है। पूरे समाज को आत्मीयता से जोड़ने का काम अतिथि यज्ञ करता था। यही बात वानप्रस्थ और संन्यास में भी है। यज्ञ आज भी भारतीय संस्कृति का आधार है। समाज में जब तक यज्ञ जीवंत रहेगा तब तक समाज स्वयंपूर्ण, स्वावलंबी और पुष्ट होता रहेगा और बिना किसी बाह्य सहायता के विकास हो सकेगा।

दान की ओर जाने से पहले तप के बारे में भी थोड़ा सा समझ लेते हैं। तप हमारी व्यक्तिगत साधना का मार्ग है। मनुष्य अनंत, असीम संभावनाओं को लेकर जन्म लेता है किंतु अपनी इस असीमता, अखंडता, अनंत संभावनाओं को भूल जाता है। शरीर,मन और बुद्धि की मर्यादाओं में स्वयं को जकड़ लेता है और सीमित समझने लगता है। अतः व्यक्तित्व का समग्र, सर्वांगीण विकास अर्थात जीवन की पूर्ण संभावनाओं को संभव बनाने हेतु इन मर्यादाओं को तोड़ना आवश्यक होता है। अहंकार, अभिनिवेश अर्थात मन के कारण ही यह मर्यादा होती है। मन के द्वारा इसे तोड़ने में शरीर, मन और बुद्धि तीनों स्तरों पर हमारी मानी हुई मर्यादा के परे जाकर शरीर को कष्ट देते हुए कार्य करना यह अपेक्षित होता है। अतः तप का शाब्दिक अर्थ होता है तपाना, स्वयं को कष्ट देना। यह कार्य हम अपने जीवन में प्रतिदिन करें ऐसी अपेक्षा है।

यज्ञ और तप के अलावा तीसरा कर्म जो निषिद्ध कर्मों में नहीं आता, जो अवश्य किया जाना चाहिए और नैष्कर्म्य में कर्म का त्याग करते समय भी जिसका त्याग नहीं करना चाहिए वह है दान। दान का सामान्य अर्थ है देना। आर्थिक रूप से दान देने को ही सामान्यत: दान मानते हैं। हम किसे दान दे रहे हैं, वह पात्र है या अपात्र इस प्रकार के विचार मन में आते हैं। क्या भिखारी को भिक्षा देना दान है? किसे दान देना चाहिए? दो प्रकार की व्यवस्थाएं समाज में बहुत अधिक प्रचलित थी। देने की व्यवस्था में दो भेद पूर्वापार से चला आ रहा है। एक है दान और दूसरा है दक्षिणा। पहले दान को समझ लेते हैं। दान अर्थात कुछ देने का भाव। मनुष्य के विकास का एकमात्र माध्यम त्याग है। वेद मंत्र कहता है —

‘त्यागेन एकेन अमृतत्व मानषुः। न धनेन, न दानेन, न प्रजया।’

और किसी से भी मनुष्य को अमृत की प्राप्ति नहीं हो सकती। अपने अमर सच्चिदानंदघन रुप से एकाकार होने का एकमात्र माध्यम है त्याग। त्याग अर्थात छोड़ना। ममत्व को छोड़ना, ‘यह मेरा है’ इस भाव को छोड़ना। अतः जिसे हम अपना मानते हैं, उसे देने को दान कहते हैं। वास्तविकता में दान लेने वाले व्यक्ति की मनस्थिति अथवा परिस्थिति का विचार दान में नहीं होता। सत्पात्र दान की संकल्पना है। देने का भाव पुष्ट हो सके इसलिए वह संकल्पना है। हमारे मन में दातृत्व अर्थात देने की भावना का विकास करने के लिए दान एक अभ्यास है। देने की आदत बचपन से ही यदि बन जाए तो मनुष्य के मन का विस्तार होता है। ममत्व में रोक लगकर उसका विस्तार होता है। ‘मैं’ से ‘हम’ की ओर प्रगति होती है। अतः देने का भाव मन में रखने के जागरण को दान कहते हैं। सामान्यतः भौतिक वस्तुओं का दान किया जाता है जैसे अन्नदान, वस्त्रदान। किन्तु भागवत में इससे अधिक दान की बात कही गई है – ज्ञानदान, विद्या का दान। मनुष्य को अपने पैरों पर खड़े होने वाले ज्ञान को प्रदान करने वाला दान, मेरे पास जो कौशल, प्राविण्य हैं जो मैंने अपने गुरू से प्राप्त किया है उसको अघिकाधिक लोगों को देना ज्ञानदान है। जैसे अन्नदान, वस्त्रदान भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। इनके प्रति ममत्व को समाप्त करने के कारण दाता के मन में अपरिग्रह का भाव जगाता है। वैसे ही अपने कौशल को देने से अपने ज्ञान का विस्तार होता है। साथ ही अधिक से अधिक लोगों तक उस विद्या के पहुँचने से विद्या भी मोक्षदायिनी होती है, अधिक दीक्षित होती है। श्रीमद्भागवत में तीसरे स्तर के दान को कहा है आध्यात्मिक बोध का दान । लौकिक विद्या से बड़ी विद्या है परा विद्या अथवा आध्यात्मिक चेतना का दान। मैं कौन हूँ, किसलिए आया, मेरे जीवन का लक्ष्य क्या है, आदि मौलिक प्रश्नों का मनुष्य के मन में सदैव विचार उत्पन्न होता है। उनका उत्तर प्रदान करने के लिए सही साधना की आवश्यकता होती है। अपनी साधना की  अनुभूतियों के आधार पर अन्य को मार्गदर्शन करना आध्यात्मिक ज्ञान की श्रेणी में आता है। स्वामी विवेकानंद ने इन तीनों दान का वर्णन करते हुए कहा कि यह एक से बढ़कर एक दान है और मनुष्य को अपने जीवन में मूल रूप से इन तीनों स्तरों पर दान देना चाहिए।

औशस्तिपाद ऋषि का आख्यान छाँदोग्य उपनिषद में आता है। इसमें वे वैश्वानर साधना की बात करते हुए समाज, सृष्टि, प्रकृति में व्याप्त ईश्वर के प्रति तीनों से भी बढ़कर साधना के दान की बात करते हैं। वह है सेवा की साधना। इस प्रकार की सेवा करना जिससे केवल मनुष्यों की भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति, लौकिक ज्ञान प्रदान करके और आध्यात्मिक उन्नति के लिए मार्गदर्शन करने तक ही सीमित नहीं रहता अपितु ऐसा ज्ञान जो स्वावलंबी, स्वयंपूर्ण समाज का निर्माण करे। ऐसा समाज जिसमें किसी भी प्रकार की सेवा की आवश्यकताएं ही न हो। यह सेवा की साधना जिसे महात्मा गांधी ने ‘दरिद्र देवो भव’ व दरिद्र नारायण की सेवा के रूप में वर्णित किया, स्वामी विवेकानंद ने ‘मानव सेवा ही माधव सेवा’ आदि वचनों में व्यक्त किया, वह सेवा की साधना स्वावलंबी समाज के निर्माण की साधना है। इस दान हेतु जो शास्त्रीय परंपरा है उसे दक्षिणा कहते हैं।

दान और दक्षिणा में एक छोटा सा भेद है। दान यह देने के भाव को जगाने के लिए, त्याग के लिए किया जाता है। उसमें से जिसको हम दान दे रहे हैं उससे उऋण होने की अथवा कुछ पाने की बात नहीं होती। कुछ नहीं पाया है, कुछ संबंध नहीं है फिर भी निष्काम भाव से देना है। अतः सड़क पर भिखारी दिखने से यदि मन में देने का भाव आता है तो फिर यह विचार करने की आवश्यकता नहीं है कि वह कितना निकम्मा है, काम नहीं करता, मैं दान देकर उसे परजीवी तो नहीं बना रहा। ये सभी विषय नहीं हैं। मूल विषय हैं आपके मन का विस्तार। उसको देखकर आपके मन में आत्मीयता, करुणा, अनुकंपा जगी। ‘इसके स्थान पर मैं होता तो क्या होता? इसलिए मेरी क्षमता के अनुसार उसके कष्ट को दूर करने के लिए कुछ करना है’ यह भाव यदि मन में आ गया तो वह दान है। दक्षिणा एक व्यवस्था है। समाज में हम अन्यों से कुछ लिए बिना जी नहीं सकते। हम जो वस्त्र पहनते हैं वे भी अनेकों के परिश्रम से हम तक पहुँचे हैं। भरी दोपहरी में हल चलाकर, पसीना बहाकर किसी किसान ने वह कपास उगाया। फिर वह किसी और श्रमिक के श्रम से धागे में परिवर्तित किया गया। उस धागे को किसी बुनकर ने तानेबाने में बुनकर हमारे लिए वस्त्र बनाया। अंत में उस वस्त्र को किसी सूचक (दर्ज़ी) ने हम तक पहुंचाया। इन बातों का ध्यान रखना हमारा कर्तव्य है। इस हेतु पायी हुई सेवा के प्रतिफल के रूप में जो प्रदान करता हूँ, उसे दक्षिणा कहते हैं। यह सभी स्तरों पर है। उपासना के लिए कोई पुरोहित मुझे सहयोग करता है क्योंकि मैं मंत्रहीन हूँ, आचार को नहीं जानता, उसने अध्ययन किया हुआ है इसलिए वह उस पूजन, यजन, भजन में हमें सहयोग करता है। उसे दक्षिणा देनी है।

हमारे यहाँ पूरे ग्राम को स्वावलंबी बनाने के लिए यह व्यवस्था थी। यह वाणिज्य की व्यापारिक व्यवस्था नहीं थी। एक स्वावलंबी अर्थशास्त्र, ग्राम स्वराज्य दक्षिणा के आधार पर भारत में विकसित हुआ। दक्ष रहकर जो दी जाती है वह दक्षिणा। कुंभकार मटका बनाता है, मेरे लिए कुंभ बनाता है तो उसका घर चलना चाहिए इस दक्षता से जो दी जाती है वह दक्षिणा। यह उस कुम्भ का मूल्य नहीं है। क्योंकि कुंभ, मटका बनाने के परिश्रम का मूल्य मैं दे ही नहीं सकता। इसलिए किसान का काम हर घर में अनाज पहुँचाना है। वह अन्नदाता है। उस किसान का घर चलना चाहिए यह बाक़ी सबका काम है। यह दक्षिणा की व्यवस्था थी। यह व्यापार अथवा वस्तु विनिमय भी नहीं था। Barter System नहीं था। वस्तु विनिमय या व्यापार में वस्तुओं के मूल्य की दूसरी वस्तु देने की बात थी। यहाँ देने वाले की दक्षता के अनुसार दक्षिणा दी जाती है। यानी उसी कुंभ को किसी जमींदार के घर पर पहुंचाया जाएगा तो जमींदार अपनी क्षमता के अनुसार दक्षिणा देगा। वहीं कुंभ किसी ग़रीब के घर में जाएगा तो और उसकी क्षमता नहीं होगी तो वह कुछ छोटा-मोटा जो भी दे सकता है उतनी दक्षिणा देगा। इसलिए दक्षिणा कितनी होगी यह वस्तु के मूल्य पर आधारित नहीं होगा और देने वाले की क्षमता और श्रद्धा पर निर्धारित होगा। ऐसी यह दक्षिणा की अद्भुत व्यवस्था भारत में थी। बाद में वह 12 बलुतेदार (व्यवसाय) वाली व्यवस्था नहीं रही। इतिहास में भी इसके बारे में ज़्यादा विवरण नहीं मिलता। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में थोड़ा बहुत मिलता है। विदेश में व्यापारी समुद्र पार करके व्यापार करने लगे। यह सब शुरू हुआ और ऐसे व्यापार के कारण मुद्राएँ और मुद्राओं का चलन हुआ। मुद्राओं का चलन होने से संभावित और दक्षिणा की व्यवस्था इन सब में से चली गई। किन्तु पुरोहित में दक्षिणा बनी रही।

19वीं शताब्दी में शिक्षा का सरकारीकरण होने से पूर्व तक भारत में गुरुदक्षिणा के रूप में शिक्षा व्यवस्था पूर्णतः दक्षिणा पर आधारित चलती रही। आज भी देश में 10 हज़ार से अधिक गुरुकुल ऐसे चल रहे हैं जो दक्षिणा के भाव से आर्थिक विनिमय के द्वारा चलाए जाते हैं। गुरूदक्षिणा शिक्षा व्यवस्था में अनादि काल से आज भी जीवित है। यह व्यवस्था भी देने वाले की श्रद्धा पर निर्भर थी। गुरुकुल का सारा व्यय दक्षिणा से चलता था। लेकिन गुरुकुल में सभी स्तर के छात्र आते थे। राजा का बेटा श्रीकृष्ण भी गुरुकुल में आता था और सुदामा भी। तो श्रीकृष्ण की गुरुदक्षिणा अलग होगी और सुदामा की गुरुदक्षिणा अलग।

कोई श्रम से गुरुदक्षिणा देता था, कोई पराक्रम से। फिर महाभारत आदि इतिहास ग्रंथों में हमें मिलता है कि एक बार गुरुदक्षिणा दे दी, जैसे एकलव्य ने अंगूठा दिया। यह तो प्रक्रिया थी। दीक्षांत के समय गुरुदक्षिणा दी जाती थी, दीक्षा का अंत हो रहा है तो दक्षिणा देनी है। प्रत्येक अपनी क्षमता के अनुसार देता था।  कौत्स की गुरुदक्षिणा का प्रसंग बहुत प्रसिद्ध है। कौत्स को गुरुदक्षिणा देने के लिए व्यवस्था नहीं थी तो वह रघु के पास गया और रघु ने कुबेर से धन लेकर स्वर्ण वर्षा कर गुरूदक्षिणा दी। राजा व प्रजापालक होने के नाते गुरुदक्षिणा की पूर्ति वह करता था। अर्थात आज जैसे स्कॉलरशिप मिलती है ऐसी व्यवस्था उस समय भी होगी। किंतु मूलतः दक्षिणा की व्यवस्था देनेवाले की श्रद्धा और क्षमता के अनुसार थी। वह विद्या का मूल्य, शुल्क नहीं था। इस बात को हमें ध्यान रखना चाहिए, विद्या निःशुल्क थी। इसका अर्थ है आपके पास शुल्क देने के लिए, दक्षिणा देने के लिए कुछ भी नहीं हो तब भी शिक्षा पर आपका अधिकार था। चाहे आवासीय गुरुकुल हो, अनावासीय पाठशाला या कार्यशाला हो, वहाँ जाकर अपने जीवन के लिए आवश्यक क्षमता, रुचि और स्थिति के अनुसार आप शिक्षा प्राप्त कर सकते थे। शिक्षा का अर्थायाम (अर्थशास्त्र) पूरा दक्षिणा पर चलता था। दक्ष हो कर दी गई दक्षिणा की दो विधियाँ थी। एक शिक्षा के तुरंत बाद, मध्य में, प्रतिवर्ष व प्रारंभ में प्रवेश के समय अपनी क्षमता के अनुसार दी जाने वाली दक्षिणा। इससे बृहत् गुरुदक्षिणा की आजीवन व्यवस्था थी। गृहस्थ जीवन में जब तक है, वानप्रस्थ लेने तक कमा रहे हैं तब तक दी जाने वाली दक्षिणा। गृहस्थ का कर्तव्य अन्य तीनों आश्रमों का पालन पोषण तो करना ही है, साथ-साथ पूरे समाज का योगक्षेम भी वहन करना है। आय का एक भाग राजा को कर के रूप में, एक धर्मकार्य के लिए, एक देव-पितृ कार्य हेतु दिया जाएगा। इसी प्रकार कुल आय का दशांश (10%), दसवाँ हिस्सा यह अपने गुरु को देना है। जिस गुरू से बचपन में जीवन की शिक्षा पाई है उस शिक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए अपने उपार्जन का दशांश देने की पद्धति भारत में चलती रही।

यह पद्धति 19वीं शताब्दी तब जीवंत रही। पूरे देश में सात लाख से अधिक गुरुकुल 1823 में अंग्रेजों के सर्वेक्षण में पाए गए। बड़े बड़े शिक्षा के संस्थानों में उच्च शिक्षा, अनुसंधान की व्यवस्था थी। यह सारी व्यवस्था गुरुदक्षिणा पर चलती थी। शासकीय अनुदान और शासन का हस्तक्षेप नहीं था। शासन का अनुदान तो कभी नहीं था। पूर्व में शासन दान अवश्य देता था। भवन आदि निर्माण कर देता था। भूमि देता था। कुछ गांवों की लगान गुरुकुल के साथ जोड़ देता था। गुरुकुल को भूमि दे देते थे जिसमें उपज कर लेते थे। यह सब शासन का कर्तव्य था, किन्तु प्रतिवर्ष व्यय के लिए अनुदान देना, उसके लिए कुछ शर्तें रखना और नियमों में बाँधना, ये प्रक्रिया अंग्रेजों के आने तक भारत में नहीं थी। अंग्रेजों ने 1835 में शिक्षा का सरकारीकरण किया। इस प्रकार शासन शिक्षा में पैसा भी व्यय करता है और हस्तक्षेप भी करता है। ये दोनों पद्धतियां भारत में नहीं थी। शासन-निरपेक्ष, समाजपोषित शिक्षा व्यवस्था थी। यह समाज पोषण दशांश दक्षिणा से होता था।

व्यक्ति के जीवन में यह अत्यंत महत्वपूर्ण बात थी कि वह अपने गुरु एवं अपने ज्ञान के, जिस ज्ञान के कारण उसकी आजीविका चल रही है उसके प्रति ऋण से उऋण होने के लिए अपनी आमदनी का दसवाँ भाग प्रतिमाह, प्रतिसप्ताह या प्रतिवर्ष नियमित अंतराल से अपने गुरु को भेजे। जहाँ-जहाँ उसने शिक्षा पाई वहाँ पर यह दशांश आवश्यकता के अनुसार वितरित करें यह प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य था। यह ब्रह्मयज्ञ के साथ जुड़ा है। प्रत्येक व्यक्ति की मुक्ति के साथ जुड़ा है। यह व्यक्ति के जीवन का कर्तव्य है। हमारा जीवन सारे जगत से जुड़ा हुआ है यह हम जानते हैं। इसलिए हम जो लेते हैं वह यदि वापस नहीं दिया है तो कर्म के सिद्धान्त के अनुसार वह विवशतापूर्वक देना पड़ता है। आप यदि अधिकार से अधिक भोग करोगे, त्याग के बिना भोग करोगे तो प्रकृति के वशीभूत होकर उसका प्रतिफल देना पड़ेगा यह कर्म का सिद्धांत है। आप धर्म से प्रामाणिक व्यवहार के बिना उत्कोच (ऊपर की कमाई) के नाम से कमाओगे तो वह वैद्यकीय चिकित्सा उपचार के लिए या चोर के पास या किसी अन्य रूप में वह धन व्यर्थ जाएगा। आपको पचेगा नहीं, आपके पास रहेगा नहीं। आपका अधिकार जिसके लिए आपने श्रम किया है केवल उसी धन पर आपका अधिकार है। केवल वही आप अपने पास रख सकते हैं। यह कर्म का सिद्धांत है। यदि आप ने फिर भी इस बात पर ध्यान नहीं दिया तो वह आपके धन को अशुद्ध कर देगा। और धन अशुद्ध होने से घर के संस्कार अशुद्ध होते हैं और उससे क्रय किया जाने वाला अन्न जो प्राण की शक्ति प्रदान करता है वह तामसिक होगा। वह घर के वातावरण को बदल देगा, घर में क्लेश रहेगा, पुत्र पिता की आज्ञा का पालन नहीं करेंगे, पुत्री परंपरा का पालन नहीं करेगी, बच्चे संस्कार हीन हो जाएंगे और पूरा घर ही नरक बन जाएगा। अतः अपने धन और आय की शुद्धि के लिए गुरुदक्षिणा बहुत आवश्यक है।

आपने किसी न किसी विद्यालय, महाविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की। उस विद्यालय महाविद्यालय के भवन, शिक्षकों आदि का वेतन आदि आपने नहीं दिया। इसलिए आपके ऊपर वह ऋण है। आज उस विद्या के माध्यम से आप आजीविका कमा रहे हैं। उस आजीविका में से यदि आप उस गुरु के ऋण को नहीं चुका पाएंगे तो आपका धन शुद्ध नहीं होगा। अशुद्ध धन आपके परिवार को क्षति पहुँचाएगा। यह भाव भारत में बहुत अच्छी तरह से समझा गया। एक सामान्य, गरीब व्यक्ति भी इस बात को जानता है और अधर्म से कमाई नहीं करता। धर्म से की गयी कमाई में से कुछ न कुछ पूजा-पाठ, देव-पितृकार्य के लिए निकालता है। परिवार के लिए बचत करता है। यह भारतीय संस्कृति है। शिक्षित लोग इसे भूल गए हैं इसलिए शिक्षित लोग अपने गुरु को दक्षिणा देना भूल जाते हैं।

आज यहाँ तक स्थिति हो गई कि आज शिक्षकों को अच्छा वेतन मिलता है। उच्च शिक्षा में तो लाखों रुपये प्राध्यापकों को मिलते हैं। स्कूल शिक्षा में भी सरकारी शिक्षकों का वेतन काफ़ी अच्छा है। किंतु फिर भी छोटी-छोटी बातों के लिए हम और अधिक सरकारी धन लेने के पीछे लगे रहते हैं। क्या यह अधर्म का धन नहीं है? आप 12 महीने का पूरा वेतन प्राप्त करते हैं। उसके बाद उसी कालखंड में प्रश्नपत्र लेखन (paper setting), पर्यवेक्षण (invigilation) का अलग से पैसा प्राप्त करते हैं, यह कहाँ तक उचित है? यह अधर्म का धन नहीं है? आप उस 12 महीने के अलावा और किसी समय में यह कार्य करते हैं? उच्च शिक्षा के सारे शिक्षक यह करते हैं। इतना ही नहीं कुछ ऐसी परिपाटियाँ पड़ गई है कि विवाह आदि में जाने के लिए भी वहाँ मित्र को कहते हैं, “भाई कोई viva रख लें, सेमिनार रख लें ताकि आने-जाने का हवाई जहाज़ का टिकट मिल जाए।” आप अपने लाख, सवा लाख, डेढ़ लाख के वेतन में से ये दो-चार, पाँच हज़ार रुपये का ख़र्चा भी नहीं करना चाहते, वह भी विश्वविद्यालय से प्राप्त करना चाहते हैं। यह वृत्ति जो शिक्षकों में देखी जाती है यह अत्यंत घृणात्मक एवं निंदनीय तो है ही, अनैतिक भी है।

हम यहाँ बात कर रहे हैं दशांश गुरुदक्षिणा देने की। आपकी आय में से 10वाँ अंश शिक्षा के कार्य के लिए देना। वर्तमान संदर्भ में या तो अपने विद्यालय, विश्वविद्यालय या महाविद्यालय को आवश्यकता हो तो वहाँ, अन्यथा शिक्षाक्षेत्र में काम करनेवाले किसी ऐसे संस्थान जिसको आवश्यकता है उसे दक्षिणा देना। भारतीय शिक्षण मंडल से जुड़े हुए कार्यकर्ताओं से आह्वान होगा कि भारतीय शिक्षण मंडल को ही आप दक्षिणा दीजिए। प्रतिमाह अपने वेतन में से 10वाँ भाग मासिक दानकारी योजना के अंतर्गत दिया जा सकता है। यदि प्रतिमाह नहीं देते तो वर्ष में एक बार दे सकते हैं।

आयकर अधिनियम के 80G धारा के अंतर्गत दानदाता को 50 प्रतिशत छूट मिलती है। अधिक वेतन होने के कारण  आयकर भरना पड़ता है तो 80G की रसीद से आप कुछ आयकर बचा सकते है। किंतु यह एक सह उत्पाद (by product) हो सकता है, मूल लोभ नहीं। प्रमुख भाव यह होना चाहिए कि आज मैं जो कुछ भी कमा रहा हूँ शिक्षक, व्यापारी, निजी उद्योग में नौकरी कर या जिस भी प्रकार से वह मेरी विद्या के कारण है। वह विद्या जिनके कारण मुझे प्राप्त हुई उस शिक्षा व्यवस्था के लिए यदि मैं दक्षिणा के रूप में श्रद्धाभाव से अपना कर्तव्य मानकर नहीं दूँगा तो मेरी पूरी कमाई अशुद्ध होगी। 10% दक्षिणा देने से 90% राशि शुद्ध हो जाएगी। उसका आप अपने जीवन में जो भी प्रयोग करोगे वह प्रयोग आपके लिए अत्यंत लाभदायी होगा। आपके परिवार के शुभ काम में आएगा। यह वास्तविकता में शुभ लाभ होगा। हमारे यहाँ पर केवल लाभ की बात नहीं की है। हम लक्ष्मी को केवल लक्ष्मी नहीं श्री मानते हैं, महालक्ष्मी मानते हैं। लक्ष्मी महालक्ष्मी तभी बनती है जब धर्म के द्वारा अर्जित होती है। धर्म द्वारा अर्जित करने के लिए यह आवश्यक प्रक्रिया है कि हम 10% अपनी राशि में से गुरूदक्षिणा के रूप में दें।

अभी तुरंत 10% नहीं कर सकते तो अधिकाधिक जो भी नियमित समर्पण कर सकते हैं वह राशि दक्षिणा के रूप में देना प्रारम्भ करें। 3-4% से प्रारम्भ कर क्रमशः बढ़ाते हुए 10% तक पहुँचे। कुछ जागरूक धर्मप्रेमी वर्ष में एक माह का वेतन शिक्षा के लिए दान देते हैं। यदि नियमितता और उऋण होने के दायित्वबोध का भाव हो तो यह गुरुदक्षिणा ही होगी। धार्मिक और देव-देवताओं के लिए किया गया दान इस श्रेणी में नहीं आता। उसके पुण्य संग्रह जैसे अन्य लाभ हैं जो मृत्यु के बाद की गति में काम आते हैं ऐसा कहा है। किंतु इस जीवन में धनशुद्धि का दक्षिणा के सिवा और कोई माध्यम नहीं है। आइए, अपने निकट के शिक्षण मंडल कार्यकर्ता को सम्पर्क करें और अपनी दक्षिणा का संकल्प सूचित करें।

नवम्बर 19, 2019 Posted by | Uncategorized | टिप्पणी करे

नोबेल की राजनीति या अर्थशास्त्र का भ्रम


भारत में तो अर्थशास्त्र में ही राजशास्त्र भी सम्मिलित है। कौटिल्य का अर्थशास्त्र यह केवल आज अंग्रेजी में जिसे Economics कहते हैं, उसका ग्रंथ नहीं है, वह प्रशासन (governance), राजतन्त्र (constitution), राजनीतिशास्त्र (Political Science) के साथ-साथ कर-निर्धारण, विकास की अवधारणा, समाज का हित आदि आर्थिक मुद्दों पर भी विचार रखता है। इसलिए भारत में अर्थशास्त्र का पर्याय था राजव्यवहार – राजा का क्या व्यवहार होगा। सामान्यतः अर्थशास्त्र विषय में नोबेल पुरस्कार के रूप में प्रचलित पुरस्कार आधिकारिक रूप से आर्थिक शास्त्रों (Economic Sciences) में नोबेल पुरस्कार कहा जाता है। गत कुछ वर्षों से दिए जानेवाले पुरस्कारों का विश्लेषण करने पर इन पुरस्कारों में भी राजनीति की गंध आने लगी है। केवल अर्थशास्त्र ही नहीं, शांति के नोबेल पुरस्कारों में भी राजनीति दिखाई देती है। बाकी विषय पर बहुत अधिक चर्चा नहीं होती है अतः उनमें किस प्रकार का दबावतंत्र (lobbying) प्रयुक्त होता है वह चर्चा में नहीं आता। वैसे तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाली सभी गतिविधियों में कुछ न कुछ तो राजनैतिक दबाव होता ही है। अन्यथा अफगानिस्तान पर महाविनाशक युद्ध थोपने वाले ओबामा को शांति पुरस्कार कैसे मिलता? अथवा केवल आतंक-पीड़ित होने के नाते बिना किसी सक्रिय शांति प्रक्रिया में सम्मिलित हुए मलाला को शांति का नोबेल पुरस्कार भी कैसे मिलता? ऐसे तो एक दिन हाफिज सईद को भी शांति पुरस्कार मिले तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए। किन्तु आज का लेख नोबेल पुरस्कारों की समीक्षा के लिए नहीं है।

अर्थशास्त्र किधर जा रहा है इस विषय पर विचार करने की आवश्यकता है। 1998 में अमर्त्य सेन को अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ। अमर्त्य सेन का काम ब्रिटिशकालीन अकाल के अर्थशास्त्र पर था। अमर्त्य सेन ने बंगाल के विकराल अकाल (The Great Bengal Famine) में अंग्रेजों द्वारा किए गए नीतिगत निर्णयों (policy decisions) पर गरीबी निर्माण और गरीबी निर्मूलन के बारे में कुछ सिद्धांत दिए थे जिसपर नोबेल पुरस्कार दिया गया। बांग्लादेश में ग्रामीण सहकारी बैंकों का जाल बिछानेवाले मोहम्मद यूनुस ने स्व-रोजगार के लिए वास्तविक काम किया। उन्होंने बैंक की स्थापना के द्वारा हजारों कारीगरों को प्रतिदिन सौ-पाँच सौ रुपये का सूक्ष्म ऋण (micro finance) प्राप्त कराने में सहयोग किया| अनेकों के जीवन में परिवर्तन किया तब मोहम्मद यूनुस स्व-रोजगार की योजना को सफलतापूर्वक लागू कर वर्ष 2006 में नोबेल पुरस्कार के अधिकारी हुए। प्रत्यक्ष वास्तविक घटनाओं पर आर्थिक शास्त्र का नोबेल पुरस्कार प्रदान करने के ये दो उदाहरण हैं। इसके विपरीत वर्ष 2013 में कम्प्युटर में कुछ प्रोग्राम बनाकर भाग बाजार (share market) और जमीन के भावों (real estate) के उतारचढ़ाव के बारे में भविष्यवाणी (predictions) करने वाले तीन ‘विद्वानों’ को नोबेल पुरस्कार दिया गया।

इस वर्ष अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार जिन तीन विद्वानों को मिला है उनमें से एक अभिजीत बैनर्जी भारत के हैं। इसलिए हम सबके लिए वह गर्व का विषय है। किन्तु विचारणीय यह है कि पुरस्कार किस कार्य पर मिला? उनकी यूरोपीय पत्नी Esther Duflo और उसके साथी विद्वान Michael Kramer के साथ ‘उनके वैश्विक गरीबी निर्मूलन हेतु प्रायोगिक दृष्टिकोण’ (For their experimental approach to alleviating global poverty) के लिए मिला। पूरा सिद्धांत अभी अध्ययन के लिए उपलब्ध नहीं है किन्तु नोबेल देते समय जो बातें लिखी गई उस आधार पर दो बातें स्पष्ट हैं कि उन सिद्धांतों पर अभी तक कोई प्रत्यक्ष कार्य नहीं हुआ है। कहीं पर भी प्रयोग नहीं किया गया। वह अभी केवल परिकल्पना है। पति-पत्नी के शिक्षा प्रसार के किसी जुगाड़ को अफ्रिका में प्रयुक्त किया गया। किन्तु नोबेल पुरस्कार प्राप्त अभिजीत बैनर्जी के सिद्धांत को कहाँ अपनाया गया, क्या प्रयोग किए गए? केवल परिकल्पना के आधार पर नोबेल पुरस्कार देना कहाँ तक साइन्टिफिक है?

बताते हैं कि इन जुगाड़ों में से एक काँग्रेस द्वारा चुनाव पूर्व चर्चा में लाई गई ‘न्याय’ योजना भी है। अत्यंत आशा के साथ यह घोषणा की गई थी कि प्रत्येक गरीब नागरिक को प्रतिवर्ष 72000 रुपये प्रदान किए जाएंगे। उस समय किसी प्रसार माध्यम द्वारा पूछे जाने पर अभिजीत बैनर्जी ने स्पष्ट उत्तर दिया था कि बिना कर बढ़ाए यह योजना संभव नहीं है। भारत की जनता ने भिक्षा के आश्वासन की इस चुनावी घूस को स्पष्ट नकार दिया। गरीबी दूर करने के लिए रोजगार के अवसर तथा स्वावलंबन की शिक्षा यह स्थायी मार्ग वर्तमान केंद्र सरकार ने अपनाएँ हैं जिनकी भर्त्सना अभिजीत बैनर्जी अपनी विचारधारा के कारण करते हैं। एक ओर बिना परिश्रम सीधे शासन द्वारा भत्ते के रूप में नगदी प्रदान करना उचित तो दूसरी ओर स्वयं परिश्रम द्वारा अपनी गरीबी का निवारण करने हेतु शासन द्वारा प्रोत्साहन तथा सुविधा प्रदान करना अनुचित, इस प्रकार के विरोधाभासी वैचारिक दृष्टिकोण के कारण ही उन्हें दिए गए नोबेल पुरस्कार के पीछे राजनैतिक दबाव की आशंका व्यक्त की जा रही है।

राजनीति और वैचारिक दबाव तंत्र पर बहुत अधिक चर्चा करने में कोई लाभ नहीं है| नोबेल पुरस्कारों की साख गत कुछ वर्षों में इतनी विवादित हो गई है कि अब विज्ञान की दिशा ते करने की क्षमता उनमें नहीं रह गई| एक शताब्दी पूर्व या तो उन विषयों में मौलिक योगदान करनेवालों को नोबेल पुरस्कार मिलता था या नोबेल पुरस्कृत विद्वानों की प्रतिष्ठा के कारण उन विषयों नए आयाम विकसित होते थे| आज भी सामान्य लोगों में अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों की प्रतिष्ठा तो है ही| पुरस्कृत व्यक्ति अपने आप प्रतिष्ठित हो जाता है| महाजनों (icon) का अनुसरण समाज करता ही है| जैसे क्रिकेट अथवा अभिनय में प्राविण्य के कारण विख्यात और प्रतिष्ठित व्यक्ति के राजनैतिक, धार्मिक विचारों को भी समाज गंभीरता से लेता है भले ही उसमें उनका विशेष अध्ययन अथवा विशेषज्ञता ना हो| पुरस्कारों की राजनीति इसी से वैचारिक विज्ञापन (intellectual branding) का साधन बनी है| अभिजीत बैनर्जी की विचारधारागत पृष्ठभूमि देखते हुए वे इस प्रकार की अंतरराष्ट्रीय षडयंत्र का मोहरा प्रयुक्त होने के लिए सही व्यक्ति है| साउथ पॉइंट कोलकाता में माध्यमिक शिक्षा, JNU दिल्ली में उच्च शिक्षा, MIT अमेरिका में अनुसंधान भारतीय पत्नी को छोड़ विदेशी छात्रा से विवाह यह सारी बातें पूर्ण नियंत्रित महाजन बनाने के लिए अत्यंत उपयुक्त हैं| अतः नोबेल पुरस्कार की घोषणा के बाद अधिक चर्चा हो रही है| अमर्त्य सेन, अरुंधती रॉय, रविश कुमार जैसे पुरस्कृतों को झेल रहे देश में इस प्रकार की आशंका सत्य हो या असत्य, उठना निश्चित है|

2013 के पुरस्कारों में तो कोई भारतीय नहीं था| अतः मामला और अधिक गंभीर लगता है| अर्थशास्त्र की दिशा पर ही विचार करने की आवश्यकता है| ‘शून्य से संपत्ति’ का सिद्धांत पश्चिम में लगभग 40 वर्षों पूर्व रूढ हुआ| भाग बाजार (share market) में बिना किसी वास्तविक उत्पादन अथवा प्रगति के वित्तवृद्धि को संपदा मानना प्रारंभ हुआ| भारत में नब्बे के दशक में हर्षद मेहता कांड में यह बात सामने आयी कि केवल थोड़े से खेल से बंद कंपनी के भागों (shares) को भी छद्म मूल्यवृद्धि द्वारा हजारों रुपयों में बेचा जा सकता है| निवेशकों को भी करोड़ों रुपयों का चूना लगाया गया| जमीन के लेनदेन जिसे अंग्रेजी में वास्तविक संपदा (real estate) जैसा लुभावना नाम दिया गया, उसमें भी खोखली मूल्यवृद्धि द्वारा बड़े स्तर पर ठगी की गई| काले धन के निर्माण के ये रास्ते थे| इन सब में सबसे कष्टदायी वायदा कारोबार (commodities market) है| खेती की उपज से पूर्व ही उसके भाव पर दांव लगाने वाला यह जुआ भारत में लाखों किसानों की आत्महत्या का मूल कारण है| इसमें भी सामान्य निवेशकों की अपरिमित हानी हो रही है| यह हाथ की सफाई अर्थशास्त्र का मान्य सिद्धांत बन गया और सरकारों ने भी नोटों की छपाई से धन कमाने का साधन अपनाया| अमेरिका तो गत दो दशकों से इसी आधार पर दिवालिया बनने से बचा हुआ है| यदि दुनिया के 180 देश डॉलर नहीं खरीदें तो अमेरिका की अर्थव्यवस्था एक दिन में ध्वस्त हो जाएगी| चीन, भारत सहित अन्य देशों ने घरेलू अर्थनीति में इसका प्रयोग किया| 2014 से पूर्व इतना अतिरिक्त चलन भारत के बाजार में संचलित हो गया कि नोटबंदी जैसी शल्यक्रिया करनी पड़ी| अन्यथा मुद्रास्फीति (inflation) को नियंत्रित करना असंभव हो जाता| नोबेल पुरस्कृत विद्वान अभिजीत बैनर्जी ने पुरस्कारप्राप्ति के बाद दिए गए साक्षात्कार में कहा कि मुद्रास्फीति का बढ़ना विकास के लिए आवश्यक है तथा वर्तमान सरकार ने मुद्रास्फीति को नियंत्रित कर देश की हानी की|

इसी प्रकार 1990 के दशक में तत्कालीन सोवीएट रशिया के विखंडन के बाद विश्व में एक विचित्र विसंगति दिखाई दे रही है| इसे विचारधारा का शीर्षासन भी कह सकते हैं| रशिया और चीन जैसे साम्यवादी (communist) देश पूरे पूंजीवादी (capitalist) बन गए हैं| और दूसरी ओर पूंजीवाद और मुक्त बाजार (free market) का पुरस्कार करने वाले यूरोप, अमेरिका के देश कल्याणकारी राज्य (welfare state) के सिद्धांत अतिरेक करते हुए सामाजिक सुरक्षा व्यय (social security expenditure) के भार में धराशायी होते जा रहे हैं| यह मुफ्तखोरी की मानसिकता समाज को भी खोखला करती है| यूनान (Greece), इटली जैसे देश बजट का 40-50% भाग बेरोजगार और वृद्धों को मुफ़्त भोजन (food tickets) और बेरोजगारी भत्ता प्रदान कराने में खर्च करते हैं| यूनान तो दिवालिया हो गया, इटली अभी कगार पर खड़ा है| यह निर्धनता निर्मूलन के स्थायी उपाय नहीं हो सकते| यदि ‘न्याय’ जैसी योजनाएँ ही इस वर्ष के नोबेल पुरस्कृत अर्थशास्त्रियों की गरीबी निर्मूलन का आधार है तो यह अर्थशास्त्र की नहीं, अनर्थशास्त्र की दिशा है| जैसे बिना उत्पादन के संपदा निर्माण केवल बुलबुला विकास (bubble growth) है, उसी प्रकार बिना श्रम के धन व्यक्ति, समाज और शासन तीनों के पतन का मार्ग है, उन्नति का नहीं|

फिर भी भारतीय मूल के अर्थशास्त्री अभिजीत बैनर्जी और उनके पश्चिमी साथियों को पुनः एक बार पुरस्कार पाने के लिए बधाई। आशा है कि अब तो ‘न्याय’ जैसे काल्पनिक जुगाड़ को कहीं न कहीं प्रयोग में लाया जाएगा ताकि उसकी संभावना पर स्पष्ट परिणाम प्राप्त होंगे। देश में पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में काँग्रेस का शासन है। यदि उन्हें अपनी सोच और नोबेल विजेता मार्गदर्शक पर थोड़ा भी विश्वास है तो वे इन राज्यों में इन जुगाड़ों को अपनाकर देखेंगे।

 

अक्टूबर 22, 2019 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , | 2 टिप्पणियाँ

कलियुग के राम


सतयुग में ना राम थे ना रावण
दोनों अवतरित हुए त्रेता में!

कलियुग में भी दोनों नहीं हैं।
ना राम जैसा सत्व है घनीभूत
किसी एक मानव में
ना रावण सा सामर्थ्य
किसी एक दानव में!

अनेकों स्वार्थी गिरोह बना
थोड़ा-थोड़ा कर जमा कर लेते हैं
पर्याप्त रावणत्व!!
मन-मन में बिखरे रामत्व को भी
करना होगा एक
संगठन के द्वारा!!

 

उठो जाम्बवन्त
फिर जगाओ हनुमत स्वाभिमान
उड़ो मारुति फिर गगन मेंसागर लांघ
करो दाह सोने में लिपटा
निपट अभिमान!

और करो आश्वस्त
भयभीत माता को
लेंगे प्रतिशोध
ना व्यर्थ होगा एक भी अपमान!!

 

जागो नल-नील
फिर रचो सेतु
जन्मगत गुटों में उलझे
मानव मन के
भाव सागर में गहराई
पाट दो भेद की खाई

जागो सुग्रीव भेजो अंगद
फिर अड़ा दे जो
संकल्प चरण
हर ले हर दानव की
भ्रष्ट संपदा का वृथा मान

आत्मबल हीन
स्वयं के स्वत्व को भूले
वानरों
चलो फिर रचो व्यूह
गढ़ों धर्म रक्षा चमु
अब के राघव नहीं आएँगे
ना ही लखन
तुम्हें ही बनना होगा
सब कुछ
करना होगा
नाभी का संधान

भोगमय सोने की
लंका का आकर्षण त्याग
फिर देना होगा
सम्मान
जननी जन्मभूमि को

 

करें अपने शीश में
गहरे चुभे मेकौले के
दशशिरों को ध्वंस
और भेदें दानव के
नाभी में छिपे प्राण को …

करें संकल्प
माता को फिर
विश्वगुरु पद पर
प्रतिष्ठित करने का !!!

अक्टूबर 8, 2019 Posted by | कविता, सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , | 9 टिप्पणियाँ

राष्ट्रीय शिक्षा नीति में परिवर्तन के बीज बिंदु


राष्ट्रीय शिक्षा नीति का प्रारूप शिक्षा विभाग ने चर्चा के लिए प्रस्तुत किया है । इस प्रारूप में अनेक ऐसे बिंदु है जो आमूलचूल परिवर्तन के कारक बन सकते हैं। इन बीज बिंदुओं की सूची प्रस्तुत है । हम सब इस पर कार्य योजना बनाएँ ।

१. नाम परिवर्तन – केन्द्रीय मंत्रालय का नाम पुनः एक बार शिक्षा मंत्रालय करने का प्रस्ताव इस प्रारूप में हैं। भारतीयता के भाव को ध्यान में रखते हुए इस परिवर्तन का स्वागत  करते है । आगे सुझाव यह है कि संस्कृति भी जोड़ा जाय। स्वतंत्रता के समय शिक्षा-संस्कृति मंत्रालय ही था। वर्तमान में संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत लगभग 150 ऐसे संस्थान है जो कला शिक्षा के कार्य में संलग्न हैं । दोनों मंत्रालय साथ जुड़ने से शिक्षा एवं संस्कार का कार्य अधिक परिणामकारी और परिपूर्ण हो जाएगा ।

२. राष्ट्रीय शिक्षा आयोग – अनेक वर्षों से शिक्षा क्षेत्र की माँग रही है कि शिक्षा का प्रबंधन और संचालन शिक्षकों तथा शिक्षाविदों के हाथ में होना चाहिए । इस प्रारूप में आयोग की अनुशंसा की गई है । आयोग का स्वरूप अधिक स्वायत्त, शक्तिशाली हो इस हेतु शिक्षविदों का सहभाग बढ़ाया जाय। वर्तमान स्वरूप में कुल 20-30 सदस्यों में 50% शिक्षाविद होंगे । शिक्षण मंडल द्वारा प्रस्तुत रूपरेखा में 65-70% शिक्षाविद रखने का सुझाव है । अध्यक्ष प्रधानमंत्री होंगे ही,  प्रस्तावित प्रारूप में उपाध्यक्ष शिक्षा मंत्री को रखा है उसके स्थान पर राष्ट्रीय ख्याति के विद्वान उपाध्यक्ष होने से आयोग अधिक स्वायत्त होगा । आयोग का कार्य केवल सुझाव देनेवाला ना होकर कार्यपालिका(Executive) के रूप में हो। सभी नियंत्रक इसके अधीन हो ।

वर्तमान प्रारूप (draft) में ये दोनों विषय अंत में अन्य विषय के रूप में आए है जबकि इनका संदर्भ पूर्व के अध्यायों में भी है। शिक्षा नीति के अंतिम स्वरूप में इन दोनों क्रांतिकारी परिवर्तनों को प्रारम्भ में ही स्थान दिया जाय ।

३. लचिलापन – शिक्षा की संरचना में लचिलापन अत्यंत महत्वपूर्ण है। शिक्षा नीति के प्रारूप में  5+3+3+4 की रचना प्रस्तुत की है । पूर्व प्राथमिक शिक्षा को भी जोड़ा गया है । 9-12 को एकत्र सोचा गया है । इस स्तर पर विषय चुनाव में लचिले विकल्प प्रदान किए गए है। विज्ञान, वाणिज्य, कला शाखाओं के भेद को मिटा कर मिश्रित विषय चयन का विकल्प भी रखा गया है । 4 वर्षों में 40 विषय के गुणांक (Credit) प्राप्त करने होंगे । इसमें 15 व्यावसायिक विषय होने अनिवार्य हैं । इस प्रावधान के लागू होने से शिक्षा का स्वरूप ही बदल जाएगा। उच्च शिक्षा में भी स्नातक पूर्व और स्नातक शिक्षा का प्रावधान रखा है। Multiple exit का प्रावधान भी हो| जैसे प्रथम वर्ष की शिक्षा पूरी करने पर यदि किसी को अध्ययन छोड़ना पड़ेगा तो उसे प्रमाणपत्र मिल सके| द्वितीय वर्ष की शिक्षा पूर्ण करने पर पदविका अर्थात डिप्लोमा तथा 3 वर्ष पूर्ण करने पर पदवी (डिग्री) प्राप्त हो| 4 वर्ष के अध्ययन के बाद सम्मान पदवी (ऑनर्स डिग्री)| जिसने सामान्य पदवी प्राप्त की हो उसे 2 वर्ष का परास्नातक और जिसने 4 वर्ष की ऑनर्स डिग्री प्राप्त की हो उसे 1 वर्ष का परास्नातक (पोस्ट ग्रेजुएशन) पाठ्यक्रम करना पड़े।

४. राष्ट्रीय शिक्षा नीति – प्रारंभ में 2015 जनवरी में जब शिक्षा नीति पर कार्य प्रारंभ हुआ तब इसे नई शिक्षा नीति कहा गया था| भारतीय शिक्षण मंडल ने लगातार यह बात समाज और सरकार के सामने रखी कि हर 10-15 वर्ष बाद नई शिक्षा नीति आ ही जाती है किंतु यदि वास्तविक अर्थ में हम शिक्षा में दूरगामी परिवर्तन करना चाहते हैं तो इस बार शिक्षा की नीति को ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति’ कहा जाना अधिक उचित है| कस्तूरीरंगन समिति को शिक्षा नीति के प्रारूप लेखन का दायित्व देते समय सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति शब्द प्रयोग किया| इस समिति ने भी सही अर्थ में राष्ट्रीय प्रारूप समाज के सम्मुख रखा है| यह प्रारूप कई आयामों में सच्चे अर्थों में राष्ट्रीय प्रारूप है| पहली बार इतनी बड़ी संख्या में व्यापक रूप से लोगों का सहभाग प्राप्त कर शिक्षा नीति का प्रारूप बनाया गया| एक लाख से अधिक गांवों में शिक्षा नीति पर चर्चा की गई। सांस्कृतिक अर्थ में भी यह शिक्षा नीति का प्रारूप राष्ट्रीय है| भारत की मौलिक विचारधारा के अनुरूप अनेक बातें शिक्षा नीति के प्रारूप में हमें दिखाई देती है। पुरानी विदेशी शिक्षा नीति को पूर्णतः परिवर्तित कर भारत केंद्रित, राष्ट्र निर्माणकारी शिक्षा व्यवस्था के निर्माण की नींव इस प्रारूप में हम स्पष्ट देख सकते हैं| उस अर्थ में भी यह शिक्षा नीति राष्ट्रीय है|

५. भारतीय भाषा – शिक्षा नीति के प्रारूप में भारतीय भाषाओं के महत्व को अधोरेखित अवश्य किया है| उच्च शिक्षा भी भारतीय भाषाओं में उपलब्ध हो ऐसी अनुशंसा नीति करती है| यह क्रांतिकारी सुधार हो सकता है| अभियांत्रिकी, चिकित्सा जैसे व्यावसायिक पाठ्यक्रमों सहित सभी पाठ्यक्रमों में भारतीय भाषाओं का विकल्प उपलब्ध कराना आवश्यक है| इससे प्राथमिक कक्षाओं में भारतीय भाषाओं का महत्व बढ़ जाएगा| यह बिंदु भाषा नीति के अध्याय में तो आया है किन्तु इसे उच्च शिक्षा के अध्याय में भी सम्मिलित करना आवश्यक है| पूर्व प्राथमिक एवं प्राथमिक स्तर पर प्रथम भाषा अथवा मातृभाषा भी शिक्षा का माध्यम हो यह बात भी शालेय शिक्षा के अध्याय में भी आ जाए। भाषा नीति में शास्त्रीय भाषा का उल्लेख तो है किन्तु उसकी परिभाषा स्पष्ट नहीं है| संस्कृत केवल अनेक भाषाओं में से एक न होकर सभी भाषाओं के शुद्ध अध्ययन में उसका महत्व सर्वविदित है| इस बिंदु को शिक्षा नीति की प्रस्तावना एवं भाषा वाले अध्याय में तो लिखा है किन्तु त्रिभाषा सूत्र को लागू करने से सर्वाधिक अन्याय संस्कृत के साथ ही होता है| प्रादेशिक भाषा और अंग्रेजी अनिवार्य हो जाती है तथा अहिंदी भाषी क्षेत्र में हिन्दी का आग्रह करने पर संस्कृत बाहर हो जाती है| अतः त्रिभाषा सूत्र के अलावा संस्कृत को भाषा विज्ञान की नींव मानकर योग के समान पूर्व प्राथमिक से आठवी कक्षा तक अनिवार्य रूप से पढ़ाया जाएँ|

६. National Research Foundation (NRF) – राष्ट्रीय अनुसंधान न्यास एक क्रांतिकारी संकल्पना है जिसके अंतर्गत उच्च शिक्षा में अनुसंधान को नई गति मिलेगी| इससे समाजोपयोगी, उद्देश्यपूर्ण और परिणामकारी अनुसंधान होगा| इसी हेतु से भारतीय शिक्षण मंडल प्रेरित रिसर्च फॉर रिसर्जनस फाउंडेशन भी प्रभावी कार्य कर रहा है| हमारा सरकार से सुझाव है कि NRF का दायित्व RFRF को दे दिया जाएँ| 

७. शिक्षक – शिक्षक के पद का महत्व भारत में हमेशा से रहा है जो गत कुछ वर्षों में कुछ प्रमाण में कम होता प्रतीत हो रहा है| शिक्षकत्व समाज में पुनः प्रतिष्ठित होगा तो समाज समर्थ बनेगा| इस हेतु शिक्षा नीति में दो उपाय सुझाए हैं – अध्यापक शिक्षा का व्यावसायिक स्वरूप तथा अनुबंध नियुक्ति पूर्ण प्रतिबंध| वर्तमान में अध्यापक बनना सबसे अंतिम विकल्प के रूप में देखा जाता है| शिक्षा नीति में कहा है कि दो वर्ष के पाठ्यक्रम को त्वरित बंद किया जाएँ और केवल चार वर्ष का एकीकृत पाठ्यक्रम चलाया जाएँ जिससे बारहवी के बाद संकल्पबद्ध छात्र ही अध्यापन शिक्षा में प्रवेश लें| वर्तमान में शिक्षकर्मी, गुरुजी के नाम से जो देहाड़ी पर शिक्षक हैं वे काम तो शिक्षक का करते हैं किन्तु वेतन बहुत कम मिलता है| अतः इस प्रावधान को बंद करना भी स्वागत योग्य प्रस्ताव है| शिक्षक की प्रतिष्ठा बढ़ाने में प्रभावी उपाय है|

८. व्यावसायिक शिक्षा – कौशल शिक्षा के नाम पर पूरे देश में बहुत बाद प्रपंच खाद्य हुआ है किन्तु औपचारिक शिक्षा में उसे पर्याप्त स्थान नहीं है| शिक्षा नीति के प्रारूप में शालेय शिक्षा में ही व्यावसायिक शिक्षा भी जोड़ा गया है| 9वी से 12वी के स्तर पर 40 विषयों में गुणांक (credit) में से 15 व्यावसायिक शिक्षा के है| इस प्रकार व्यावसायिक शिक्षा को मुख्य शिक्षा का भाग बनाया गया है|

९. पूर्ण स्वायत्तता – राष्ट्रीय शिक्षा आयोग से प्रारंभ स्वायत्तता का विषय शिक्षा संस्थानों तक बढ़ाया गया है| उच्च शिक्षा में सभी महाविद्यालयों को पूर्ण स्वायत्तता प्रदान करने की अनुशंसा प्रारूप में है| शालेय शिक्षा में भी नीजी विद्यालयों तक को अपने शुल्क निर्धारण का अधिकार देने जैसा क्रांतिकारी विचार शिक्षा नीति के प्रारूप में है| केवल एक अनिवार्यता रखी गई है कि शिक्षा सेवा भाव से दी जाएँ| महाविद्यालयों को तो शैक्षिक, प्रशासनिक और आर्थिक स्वायत्तता दी गई है। स्वयं के पाठ्यक्रमों का निर्धारण भी करने का अधिकार महाविद्यालयों को दिया गया है| भारतीय शिक्षण मंडल इस स्वायत्तता का स्वागत करता है किन्तु शिक्षा के व्यापारीकरण का निदान इससे नहीं होगा| अतः उस हेतु क्रांतिकारी उपाय करने की आवशयकता है| केवल सेवार्थ शिक्षा संस्थान चलाने की बात करना ही पर्याप्त नहीं है, व्यापारिक रूप से चलनेवाले शिक्षा संस्थानों के नियंत्रण की भी सुचारु व्यवस्था करना आवश्यक है| शिक्षण मंडल का सुझाव है कि व्यापारिक संस्थान खोलने की अनुमति प्रदान की जाएँ और उसे समाज में सही ढंग से प्रगट किया जाएँ ताकि अभिभावक निर्णय कर सकें कि उन्हें सेवाभावी संस्थान में प्रवेश लेना है या व्यापारिक संस्थान में|

१०. शिक्षण विधि – वर्तमान में अध्येता केंद्रित (learner centric) बालक केंद्रित (Child centric) शिक्षा की चर्चा होती है। इस हेतु अनेक उपाय किए गए है। उनमें से कई तो ऐसे है को शिक्षकों को विवश करने वाले है। अनेक शिक्षक इन उपायों से स्वयं को बंधा अनुभव करते है। भारत का आदर्श अध्ययन केंद्रित (Learning Centric) तथा शिक्षक आधा रित (teacher based) शिक्षा है। इस राष्ट्रीय शिक्षा प्रारूप में इन दोनों बातों को महत्व दिया गया है। अध्ययन का दायित्व विद्यार्थी का है। शिक्षक तो मार्गदर्शक और सहयोग की भूमिका में होता है। 9 वी कक्षा से गुणांक व्यवस्था लगाने से अध्ययन का दायित्व छात्रों पर होगा । दूसरी ओर पाठ्यक्रम निर्धारण की जिम्मेवारी शिक्षकों पर दी गई है। यदि दोनों अपनी भूमिकाओं का सही निर्वाह करेंगे तो गुरुकुल जैसी आदर्श शिक्षा के निर्माण की संभावना इस बीज में है।

११. समाज पोषण – भारत में सदैव शासन मुक्त शिक्षा व्यवस्था की बात की गई है किंतु इसका अर्थ वर्तमान के निजीकरण से नहीं रहा है। शिक्षा सदा ही समाज का दायित्व रहा है। अतः शिक्षा व्यवस्था समाज पोषित हो ऐसी अपेक्षा की जाती रही है। शिक्षा नीति के प्रारूप में प्रशासन में समाज के सहभाग की व्यवस्था तो है। किंतु निजी के स्थान पर सामाजिक संस्थान की  बात होना भी आवश्यक है। व्यापारी निजी शिक्षा संस्थानों साथ सेवाभावी सामाजिक संस्थानों को भी गैर सरकारी होने के कारण निजी कहना और उनके नियंत्रण केनलिए भी उसी मापदंड का प्रयोग उचित नहीं है। इस विसंगति को दूर करने से हर स्तर पर समाज के सहभाग को बढ़ाया जा सकेगा।

१२. वित्त विपुलता – अनेक वर्षों से सभी शैक्षिक संगठन यह मांग करते रहे है कि शिक्षा मद में सरकार के व्यय को GDP के ६% तक बढ़ाया जाए । इस बात का संज्ञान लेते हुए नीति के प्रारूप में पूरे व्यय के ३०% की बात की है। व्यापारिक संस्थानों को भी सी एस आर कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी के माध्यम से शिक्षा में योगदान करने का प्रावधान विधि में सुधार द्वारा करने की बात नीति के प्रारूप में की गई है। यदि उचित राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ सुझाव को क्रियान्वित किया जाता है तो शिक्षा के क्षेत्र में विपुल मात्रा में वित्त की उपलब्धि हो सकेगी और सभी शिक्षकों को नियमित करने जैसे क्रांतिकारी उपायों को लागू किया जा सकेगा।

१३. वैश्विकता – भारत भारत में ज्ञान के क्षेत्र में कभी सीमाओं का निर्धारण नहीं किया गया हमारे शिक्षक सारे विश्व में शिक्षा प्रदान करते रहे हैं और सारे विश्व के जिज्ञासु भारतीय विश्वविद्यालयों में आकर ज्ञान प्राप्त करते रहे हैं विदेशी शासन के बाद इस स्थिति में परिवर्तन हुआ और हम अपने राजनैतिक सीमाओं में सिमट गए वर्तमान में भारतीय विश्वविद्यालयों को विदेशों में शिक्षा देने का अधिकार नहीं है विदेशी छात्रों के प्रवेश की भी अत्यंत सीमित संभावना अभी भारत के विश्वविद्यालय में है शिक्षा नीति का प्रारूप सीमाओं को खोलता है। विदेशी विश्वविद्यालयों का भारत में स्वागत करने के साथ ही भारतीय विश्वविद्यालयों के विदेशों में प्रांगण (Campus) खोलने की बात शिक्षा नीति ने की है। भारतीय शिक्षण मंडल इस अनुशंसा का स्वागत करता है विदेशी विश्वविद्यालयों के भारत में आने पर कोई आपत्ति नहीं है केवल यह बात स्पष्ट होनी चाहिए कि भारत में उन्हें कोई विशेष सुविधाएं प्रदान नहीं की जाएगी जो विधि अथवा कानून भारतीय विश्वविद्यालयों पर लागू होते हैं उन्हीं के द्वारा यह विदेशी संस्थान संचालित किए जाएंगे। वर्तमान प्रारूप में यह बात इतनी स्पष्ट रूप से नहीं कही गई है अतः शिक्षण मंडल का सुझाव है कि नीति के अंतिम संहिता में इस बात पर ध्यान दिया जाए।

१४. आधार पाठ्यक्रम – उच्च शालेय स्तर से प्रारम्भ कर उच्च शिक्षा तक सभी वर्ष विशेष विषयों के साथ ही अधे अंकों का आधार पाठयक्रम (फ़ाउंडेशन कोर्स) अनिवार्य  किया गया है। यह शिक्षा की समग्रता के लिए आवश्यक है। चाहे जिस भी विषय के विशेषज्ञ हमें बनाने हो कुछ मूलभूत बातें हैं सभी के लिए अनिवार्य होती है।  देश का इतिहास, भूगोल, उसकी परंपराओं का ज्ञान, साथ ही सामान्य नागरिक नियम – जैसे राह पर कैसे चला जाए, स्वच्छता के नियम आदि का भी शिक्षा के औपचारिक रूप में प्रावधान होना आवश्यक है।  समय का मूल्य, समय का नियोजन, कठोर समय पालन जैसे विषय भी इस आधार पाठ्यक्रम का अंग बनने चाहिए। पर्यावरण के प्रति सजगता, सामान्य वित्तीय अनुशासन, बैंक आदि के व्यवहार के बारे में भी जानकारी क्रमशः अधिक प्रगत रूप में आधार पाठ्यक्रम में सम्मिलित की जा सकती है।

१५. भारत बोध पाठ्यक्रम – इसी के अंतर्गत देश के सांस्कृतिक आध्यात्मिक ज्ञान के बारे में पाठ्यक्रम की बात भी शिक्षा नीति के प्रारूप में की गई है। वर्तमान में उत्तर प्रदेश में राष्ट्र गौरव नाम से इस प्रकार की पुस्तक शालेय स्तर पर पाठ्यक्रम का अंग है। शिक्षा नीति के प्रारूप में भारत की ज्ञान परम्परा, गौरव बिंदु, ज्ञानिक परंपरा आदि को सम्मिलित कर एक भारत बोध पाठ्यक्रम हर स्तर पर समाविष्ट करने का सुझाव दिया गया है। आवश्यकता है कि इस बीज बिंदु पर तुरंत कार्य करें। ऐसा क्रमिक पाठ्यक्रम तैयार किया जाए ताकि प्राथमिक शिक्षा से ही अर्थात कक्षा एक से ही परास्नातक पोस्ट ग्रेजुएशन तक भारत के बारे में पूरी जानकारी विद्यार्थियों को प्रदान की जा सके।

१६. पारदर्शी गुणवत्ता पूर्ण व्यवस्थापन- व्यावसायिक पाठ्यक्रमों (Professional courses) के नियमन हेतु बने – MCI, ICAR, BCI जैसी संस्थाएं वर्तमान शिक्षा क्षेत्र के व्यापार और भ्रष्टाचार का केंद्र बन गई है । शिक्षा नीति के प्रारूप में इन संस्थाओं की भूमिका में पूर्ण परिवर्तन सुझाया है। ये संस्थाएं व्यावसायिक मानक नियंत्रण नहीं । PSSB – professional standards setting body। अध्ययन पूर्ण होने के बाद गुणवत्ता निर्धारण हेतु  CA association के समान एक सामान्य उत्तीर्ण परीक्षा (Comon Exit Exam) लें ।

१७. उद्योग का सहभाग – वित्त विपुलता हेतु आर्थिक योगदान के साथ ही शैक्षिक रूप से भी उद्योग जगत का सहभाग शिक्षा में हो ऐसी अनुशंसा इस प्रारूप में है। पाठ्यक्रम निर्धारण, अनुसंधान तथा शिक्षकों को कार्यानुभव जैसे उपायों से उद्योग जगत को शैक्षिक गतिविधि में भागीदार बनाकर उच्च शिक्षा को अधिक व्यवहारिक बनाया जा सकता है।  उच्च शिक्षा में अध्यापकों की नियुक्ति में भी उद्योग अनुभव को शैक्षिक अनुभव के बराबर का स्थान दिया गया है। इससे उद्योग का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त लोग भी अध्यापक बन सकेंगे। ऐसे अध्यापक अधिक परिणामकारी सिद्ध होंगे।

१८. कला और सामाजिक विषय के राष्ट्रीय महत्व के संस्थान – कला, साहित्य में रुचि होते हुए भी केवल सामाजिक प्रतिष्ठा के कारण अनेक छात्र IIT में प्रवेश लेते है। मौलिक विज्ञान के प्रति छात्रों का रुझान बढ़ाने हेतु 10-15 वर्ष पूर्व ISER, NISER जैसी संस्थाओं का प्रारम्भ किया गया। इस शिक्षा नीति में कला क्षेत्र माइस प्रकार के राष्ट्रीय महत्व के संस्थान स्थापित करने का निर्णय लिया गया है। Indian Institute of Liberal Arts – IILA तथा अनुवाद के लिए Indian Institute of Translation & Interpretation- IITI का सुझाव प्रारूप में है। इसी प्रकार सामाजिक शास्त्र के लिए Indian Institute of Social Sciences -IISS तथा भाषा के लिए Indian Institute of Languages & Linguistics – IILL का भी विचार किया जाना चाहिए। खेल तथा युद्ध विद्या के लिए भी राष्ट्रीय महत्व के स्न्स्थान खोले जाने चाहिए ताकि प्रतिभा के अनुसार प्रतिष्ठित उच्च शिक्षा का चयन विकल्प हर मेधावी छात्र के पास हो।

१९. भारत केंद्रित – इस शिक्षा नीति के प्रारूप की विशेषता है कि इसमें सभी स्तरों पर भारत को केंद्र में रखा गया है। भारत की परिस्थितियों के अनुसार नीतियों का सुझाव दिया गया है। वैश्विक स्तर तथा प्रतिस्पर्धा की चर्चा तो है किंतु विश्व में स्थान प्राप्त करने के लिए अंधानुकरण की बात नहीं की है। वैश्विक बातों को देशानुकूल कर स्वीकार करने की सम्भावना इस प्रारूप में है। क्रियान्वयन के समय इन बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए। सभी विद्या शाखाओं के संदर्भीकरण की आज नितांत आवश्यकता है। इस प्रारूप में चिकित्सा शिक्षा के बारे में विस्तृत योजना दी है, जो भारत की परिस्थिति के अनुरूप है। जैसे ज़िला स्तर के प्रत्येक चिकित्सालय को शिक्षा केंद्र बनाने की बात है जिससे पर्याप्त संख्या में आवश्यक चिकित्सकों का निर्माण किया जा सके। ग्रामीण शिक्षकों की चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए उस हेतु विशेष प्रावधान की चर्चा प्रारूप करता है। ऐसी अनेक भारत के लिए विशिष्ट बातें इस शिक्षा नीति में दी गई है। यदि सही पद्धति से क्रियान्वयन किया जय तो यह क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकती है। 

जुलाई 6, 2019 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , | 1 टिप्पणी

लाडले से करते है प्रेम तो भूल जाए जन्मदिन 


भारतीय संस्कृति शास्त्रीय है । हर परम्परा के पीछे का प्राकृतिक नियम सहज आचरण में लाने से ही समझ में आता है । हमारे सभी उत्सव सामूहिक हैं । परिवार ही समाज की इकाई है । अतः कम से कम परिवार का सहभाग तो आवश्यक ही होता है । कोई भी भारतीय पारम्परिक उत्सव एक व्यक्ति को केंद्र में रखकर नहीं होता । एकसठ वर्ष आयु में होनेवाले शट्यब्दपूर्ति अथवा अस्सी वर्ष के बाद होनेवाले सहस्रचंद्र दर्शन समारोह में भी पूरे विस्तृत कूटुंब का सहभाग अनिवार्य होता है । दूसरी ओर पश्चिम का पूरा विचार ही व्यक्तिकेंद्रित होती है । इसी के परिणामस्वरूप पश्चिम में पूरा समाज बिखर गया और परिवार भी टूट रहे है ।

पश्चिम के प्रभाव से आज हम भारतीय भी व्यक्तिकेंद्रित सोच को बढ़ावा देने लगे है । २० वर्ष पूर्व तक छोटे बालकों के जन्मदिन मनाने की भी कोई परम्परा नहीं थी । शरीर को धर्म का साधन माननेवाली भारतीय संस्कृति में उसके जन्म का कोई उत्सव नहीं मनाया जाता ।

यह अत्यंत वैज्ञानिक प्रक्रिया है। शरीर हमारे व्यक्तित्व का सबसे स्थूल अर्थात सबसे कम महत्व का अंग है। इस कारण से इसके प्रति अधिक आस्था बनाने से मनुष्य के जीवन का लक्ष्य की शरीर का सुख अर्थात भोग बन जाता है। भारतीय संस्कृति में भोग गौण है, त्याग को महत्व दिया है। अतः, व्यक्तित्व विकास में शरीर से अधिक सूक्ष्म आयामों का विकास अधिक महत्वपूर्ण माना गया। मन, भावना, बुद्धि यह व्यक्तित्व के सूक्ष्म रूप हैं। इनका विकास करना मनुष्य जीवन का लक्ष्य है। जीवन की उपलब्धि में भी शरीर के सुख से अधिक मन एवं बुद्धि के सुख को महत्व देना भारतीय संस्कृति है।

इसीलिए शरीर के जन्म का हमारे लिए बहुत अधिक महत्व नहीं है। शरीर के जन्म का महत्व बढ़ाने से मनुष्य प्राथमिकताएं बदल जाती हैं। शरीर अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। आज कम आयु में बड़े-बड़े रोग होने की जो स्थिति बनी है उसका एक कारण शरीर के प्रति बढ़ता मोह भी है। हम सब जानते हैं कि शारीरिक स्तर पर भी मांसपेशियों का विकास करना हो तो हमें उन्हें कष्ट देना होता है। व्यायाम करना पड़ता है। सूर्य नमस्कार, दंड, बैठक आदि व्यायाम करने से ही हमारे शरीर का स्नायुतंत्र और मांसपेशियां बलवान होती है। यदि हम शरीर का आवश्यकता से अधिक लाड करेंगे तो वह दुर्बल होगा। शरीर को तपाने से ही व्यक्तित्व का विकास होता है।

इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए भारत में जीवंत व्यक्तियों के जन्मदिवस मनाने की परंपरा नहीं है । केवल मृत व्यक्तियों के, वह भी महापुरुषों के जन्मदिवस को जयंती के रूप में मनाया जाता है। जिसने अपने जीवन में ईश्वरीय शक्तियों का अद्वितीय प्रगटीकरण किया उसे अवतार माना जाता है। ऐसे अवतारों के जन्मदिवस पर अन्य लोग उन्हीं के समान चारित्रिक विकास की प्रेरणा प्राप्त करें इस दृष्टि से जयंतिया मनाने की परंपरा है। वह भी उस महापुरुष के जीवन काल में नहीं होता उसके मृत्यु के उपरांत अर्थात उसके शरीर के न रहने पर ही जयंती मनाई जाती है। हमारे पारिवारिक पूर्वजों के स्मरण के लिए उनके शरीर शांत होने का अर्थात मृत्यु का दिनांक अधिक महत्वपूर्ण होता है। उस तिथि पर श्राद्ध कर हम उनके प्रति अपनी श्रद्धा को प्रगट करते हैं। अपने दादाजी प्रपितामह आदि के जन्म दिवस मनाने की परंपरा भारत में नहीं है । उनके मृत्यु की तिथि अर्थात पुण्यतिथि पर उनका स्मरण करने की परंपरा है।

शरीर को अधिक महत्व देने की सभ्यता पश्चिम में विकसित हुई। अतः वहां पर भौतिकता, उपभोग वाद आदि को बहुत बड़े प्रमाण पर बल मिला। आज वे भी इस विकृत विकास के दुष्प्रभाव को समझ रहे हैं किंतु उपाय अभी भी दृष्टिगोचर नहीं हो पा रहा। भारत में हमारे ऋषियों ने हजारों वर्ष पूर्व एक अद्भुत पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन शैली का विकास किया। जिसके अंतर्गत मनुष्य जीवन के सूक्ष्मतम आयामों को वरीयता प्रदान करते हुए प्रत्येक के मन में उन्नत जीवन के प्रति उत्कट इच्छा को उत्पन्न करने का सहज कार्य किया। यह एक अद्भुत सामाजिक तकनीक है । समाज में जिसे प्रतिष्ठा प्राप्त होती है अन्य लोग स्वाभाविक उसका अनुसरण करते हैं। महाजनों येन गत: स पंथ:। इस सुभाषित हमें इस बात की ओर इंगित करता है। समाज के वरिष्ठ जिस जिस पथ पर चलते हैं वहीं अन्य के लिए अनुकरणीय हो जाता है।

भारतीय परंपरा में जीवंत मनुष्यों की छवि उतारने की भी परंपरा नहीं है। आजकल हर घर में अपने छोटे बच्चों से लेकर सभी के चित्रों को बड़े-बड़े आकार में मुद्रित कर भित्तियों पर सुशोभित करने का चलन हो गया है। यह शोभाचार व्यक्ति की आयु का नाश करता है। दो दशक पूर्व भी हिंदी फिल्मों में इस प्रकार के संवाद सुनाई देते थे जब धमकी देते हुए कहा जाता था कि तेरी फोटो टंगा देंगे। इसका अर्थ होता था मार डालेंगे क्योंकि मरने के बाद ही फोटो टांगी जाती थी। आज हम अपने ही लाडलों की जीवित होते हुए फोटो पर टांग रहे हैं । यह उनकी आयु का क्षरण करने का कारण बनता है। बढ़ती हुई बीमारियों का भी यही कारण है।

वैसे ही सबके हाथ में भ्रमणध्वनी में ही छवि को बंदी बनाने की सुविधा- कैमरा आ जाने से हर बात पर फोटो खींचने की आदत सी पड़ गई है। किसी और छायाचित्रकार की भी आवश्यकता नहीं रही। सभी आजकल खुद खेंचू हो गए हैं। छोटी-छोटी बात पर स्वयं की छवि उतारने की आदत सी लग गई है। अज्ञान वश हम यह नहीं जानते ऐसा करने से हम अपने शरीर की हानि कर रहे हैं। मन में शरीर को आवश्यकता से अधिक महत्व देने के कारण मानसिक विकास में भी बाधा पड़ रही है। अनुशासन समाप्त हो रहा है। स्मरण शक्ति कम हो रही है । क्रोध बढ़ रहा है । छोटे छोटे बालक भी विषाद के शिकार हो रहे हैं। उबना (बोर होना) यह बालपन में कभी नहीं सुना था किंतु आज जीवन के अत्यंत सृजनशील पड़ाव में भी मनुष्य उब का शिकार हो गया है। इसका भी एक कारण अत्यधिक छवि उतारना है। मां की कोख से बाहर निकलते ही हर मिलने आने वाला उस छोटे बालक की अपने अपने भ्रमणध्वनी में छवि उतारता हैl वहां से प्रारंभ कर इतनी छवियां उस बालक की उतारी जाती है कि उसकी प्राणशक्ति का हरण हो जाता है। इच्छाशक्ति भी प्राणशक्ति पर ही निर्भर करती है। शरीर को महत्व देने से इच्छाशक्ति में भी कमी आती है। ब्रह्मचर्य के कायम न रहने का भी कारण शरीर का बढ़ा हुआ महत्व है।

इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए समझदार माता पिता अपने बच्चों के अंग्रेजी तिथि से जन्मदिन ना मनाएं। किसी भी प्रकार से ना मनाएं। पश्चिमी पद्धति तो अत्यंत विकृत है ही। दीप बुझाना, केक काटना यह तो मन को नकारात्मक संस्कार देते ही हैं, किंतु इसके पर्याय के रूप में कुछ संगठनों ने जन्मदिन के अवसर पर यज्ञ करना, आरती उतारना ऐसी भारतीय पद्धतियों का विकास किया है। वे समझते हैं कि इस प्रकार से उन्होंने पश्चिमी सभ्यता को मात दे दी है। किंतु यह तो और भी घातक है। हमारे यहां औक्षण अर्थात आरती उतारने की परंपरा विशिष्ट उत्सवो में है। जैसे रक्षाबंधन पर आरती उतारी जाती है। अक्षय तृतीया पर घर के बड़े भाई की आरती उतारते हैं। यह सारे अवसर शरीर के उत्सव से नहीं जुड़े हैं संबंधों के उत्सव से जुड़े हुए हैं। अतः आरती संबंधों की महत्ता को बालक के मन पर संस्कारित करती है। शरीर के जन्म का उत्सव मनाते समय शरीर की आरती उतारने से शरीर ही जीवन का सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य है यह संस्कार बालक में जाता है। ऐसा शरीर केंद्रित बालक अपने जीवन में संबंधों को भी केवल शारीरिक स्तर पर ही समझता है। ऐसे में बहुत कम आयु में ब्रह्मचर्य का खंडित होना स्वाभाविक ही है । समाज करता है, कक्षा में पढ़ने वाले सभी बच्चों का होता है, विद्यालय में यह परंपरा है, हमारे सभी संबंधियों के घरों में भी बालकों के जन्मदिन मनाए जाते हैं इसलिए विवशता से हमें भी करना पड़ेगा इस प्रकार के बहाने दे करके अपने बच्चों के जीवन को गलत दिशा में ले जाने से बचे।

स्वयं का भी जन्मदिन ना मनाएं, बच्चों का भी जन्मदिन ना मनाएं। जन्मदिन का महत्व ही समाप्त कर दें। सामाजिक माध्यमों में फेसबुक, टि्वटर आदि पर अपने जन्मदिन को लिखना ही बंद कर दे। ताकि हर कोई देख कर आपको शुभेच्छा देने के नाम पर शरीर के जन्म की याद न दिला सके। अपने जीवन के उदात्त लक्ष्य को खोजने इससे बड़ी कोई बाधा नहीं है। पशु और मनुष्य में सबसे बड़ा अंतर यही है कि पशु शरीर से परे नहीं सोचता और मनुष्य शरीर से परे ही जीवन के लक्ष्य को खोजता है।
मानवता के रूप में भी शरीर के जन्मदिन को मनाना अनुचित ही है। यह हमारे भीतर सुप्त पाशविकता को जगाने का ही कार्य करेगा।

मनुष्य का जीवन सूर्य की गति के साथ जुड़ा हुआ है क्योंकि इस जगत में सूर्य ही महाप्राण का मूल स्रोत है। सूर्य से ही प्राणशक्ति प्राप्त होती है। यह प्राणशक्ति ही हमारे जीवन को लक्ष्य केंद्रित बनाती है। अतः सात्विक प्राणों को बढ़ाना और उनके क्षरण को रोकना ये दोनों मनुष्य के जीवनचर्या के महत्वपूर्ण आधार है। इस दिशा में शरीर केंद्रित गतिविधि जैसे जन्मदिन मनाना, खुद खेंचूअथवा दूसरे द्वारा खींची हुई छवि को रक्षित करना यह सब बड़ी बाधाएं हैं। अतः जिन्हें अपने जीवन में कुछ भी सार्थक, प्रभावशाली, परिणामकारी, उदात्त, महान कार्य करने की इच्छा है वे स्वयं और अपने परिवार जनों को इन विनाशकारी प्रचालनों से बचाएं।

जून 5, 2019 Posted by | आलेख, सामायिक टिपण्णी | , | 1 टिप्पणी

शिक्षा का अर्थायाम


प्रतिवर्ष शासन द्वारा अपने वार्षिक व्यय का अनुमान (Budget) प्रस्तुत करने पर शिक्षा पर किए जानेवाले व्यय की चर्चा होती है। केंद्र सरकार द्वारा शिक्षा पर सकल राष्ट्रीय उत्पाद (G.D.P.) के लगभग 4% व्यय किया जाता है। विभिन्न आयोगों द्वारा समय-समय पर यह अनुशंसा की गयी है कि एक संवेदनशील राष्ट्र में शिक्षा व्यय सकल उत्पाद के कम से कम 6% होना चाहिए। भिन्न-भिन्न शैक्षिक संगठनों ने भी समय-समय पर यह मांग की है। भारतीय शिक्षण मंडल ने सकल राष्ट्रीय उत्पाद के अनुपात के स्थान पर शासकीय व्यय के 10% का प्रावधान शिक्षा क्षेत्र में करने की मांग रखी है। यह केंद्रीय व्यय का योगदान है। सभी राज्य शासन तो अपने व्यय का लगभग 20% शिक्षा पर लगाते ही है। दिल्ली, कर्नाटक, महाराष्ट्र जैसे कुछ राज्यों का शिक्षा व्यय तो 23% से अधिक है। इस सबके बाद भी शिक्षा में मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ती भी अभी तक नहीं हो पा रही। 20-25 वर्ष पूर्व सरकार ने अपनी असमर्थता को स्वीकार कर नीजी क्षेत्र को शिक्षा में निवेश के लिए आमंत्रित किया। वैधानिक रूप से शिक्षा धर्मार्थ सेवा के रूप में ही दी जा सकती है। शैक्षिक संस्थान लाभकारी उपक्रम (Profit Making Enterprise) नहीं हो सकते। किंतु वास्तव में भारत जैसे देशों में शिक्षा एक आकर्षक उद्योग बनता जा रहा है। जमीन, वस्त्र आदि उद्योगों में चुनौतियाँ बढ़ने के बाद अनेक उद्योजकों ने अपने कारखानों तथा व्यापारी संस्थानों को अभियांत्रिकी महाविद्यालयों जैसे व्यावसायिक शिक्षा संस्थानों में परिवर्तित कर दिया। इसे शीघ्र लाभ का साधन माना जाने लगा। वैधानिक लाभप्राप्ति की व्यवस्था न होने के कारण शिक्षा के व्यापारीकरण हेतु अनेक अनैतिक कुरीतियों का जन्म हुआ।

शासन के शिक्षा व्यय का एक बहुत बड़ा हिस्सा, कुछ-कुछ राज्यों में तो 90% से अधिक हिस्सा शिक्षकों के वेतन पर लगाना पड़ता है। विभिन्न वेतन आयोगों ने सरकारी शिक्षकों की आमदनी में अच्छी वृद्धि की है। किंतु सरकारें इस बोझ के कारण शैक्षिक विकास की अन्य सभी गतिविधियों में कटौती करने पर विवश है। नए भवनों का निर्माण, ग्रंथालय, प्रयोगशाला, अत्याधुनिक शिक्षा साधन आदि के लिए अनुदान लगभग बंद हो गया है। सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत माध्यान्ह भोजन, गरीब छात्रों के लिए निःशुल्क गणवेश, पाठ्यसामग्री तथा बालिकाओं के लिए साइकिल आदि का प्रावधान किया गया। गत दो दशकों से हुए इन प्रयासों का सुखद परिणाम शालेय शिक्षा में पंजीयन बढ़ने में हुआ। सरकारी आंकड़ों के अनुसार प्राथमिक शिक्षा का सकल प्रवेश अनुपात [Gross Enrollment Ratio (G.E.R.)] 95% हो गया है। कुछ राज्यों में तो यह 100% हो गया है। इसका अर्थ है कि भारत में जन्म लेनेवाले 6 वर्ष तक की आयु के 100 में से 95 बालक शाला में प्रवेश ले रहे हैं। सर्वशिक्षा अभियान की योजनाओं का 70% अनुदान केंद्र सरकार देती है। बाकि 30% की व्यवस्था राज्य शासन को करनी होती है। पूर्वोत्तर तथा जम्मू कश्मीर के अविकसित राज्यों हेतु 90% अनुदान केंद्र शासन का होता है। इन सब बातों से भी शिक्षा व्यय में वृद्धि हुई है। किंतु शिक्षा की गुणवत्ता पर इसका बहुत अधिक प्रभाव नहीं दिखाई देता है। उच्च शिक्षा में होनेवाला व्यय भी बढ़ाया गया है।

इस सबके बाद भी शालेय शिक्षा में नीजी संस्थाओं की भागीदारी बढ़ रही है। एक अनुमान के अनुसार 46% शालेय विद्यार्थी नीजी संस्थानों में अध्ययनरत है। उच्च शिक्षा में छात्र संख्या में नीजी संस्थाओं की भागीदारी 30% से कम है। किंतु महाविद्यालयों की संख्या में यह अनुपात 50% के लगभग हो गया है। नीतिनिर्धारकों एवं अधिकारियों में कुछ का मानना है कि नीजी क्षेत्र के बढ़ने से ही ‘सबको शिक्षा’ का लक्ष्य प्राप्त हो सकेगा। अतः योजनाओं में उसी प्रकार के प्रावधान गत दस वर्षों से किए जा रहे हैं। अनुभवी शिक्षाविदों एवं शिक्षा जगत में कार्यरत कार्यकर्ताओं का अनुभव है कि नीजी क्षेत्र के बढ़ने से व्यापारीकरण बढ़ेगा और समाज के बड़े वर्ग की पहुँच से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा बाहर हो जाएगी।

शिक्षा के अर्थायाम पर विचार करते समय शैक्षिक दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है। हम शिक्षा के उद्देश्य को किस दृष्टि से देखते हैं इस बात पर निर्भर करेगा कि शिक्षा का दायित्व किसपर है। शासकीय शिक्षा में शिक्षा के व्यय का भार शासन वहन करता है जबकि नीजी क्षेत्र में यह बोझ छात्रों अर्थात उनके अभिभावकों पर डाला जाता है। यदि शिक्षा को हम व्यक्ति के विकास के माध्यम से ही देखते हैं, और वह विकास भी केवल भौतिक स्तर पर ही समझा जाता है तब तो यह तर्क ठीक बैठता है कि सभी को अपनी-अपनी शिक्षा पर होने वाले व्यय का भार उठाना चाहिए। यदि अभिभावक सक्षम हो तो वे अपनी क्षमता के अनुसार महँगी से महँगी शिक्षा अपने बालकों को उपलब्ध कराएं। शिक्षा ऋण (Education loan) के पीछे भी यही दृष्टि है। जहाँ अभिभावक आर्थिक रूप से सक्षम नहीं है वहां स्वयं छात्रों को शिक्षा ऋण उपलब्ध करा दिया जाएं ताकि वे अपने मन के अनुसार शिक्षा खरीद सकें। ऐसी शिक्षा प्राप्त कर रोजगार मिलने के बाद छात्र अपने ऋण का भुगतान करें। गत दो दशकों से यह विचार प्रभावी होता जा रहा है। विलासितापूर्ण नीजी शिक्षा संस्थानों में लाखों रुपये शुल्क का भुगतान करने के लिए तैयार अभिभावक बढ़ रहे हैं। दूसरी ओर शिक्षा ऋण की संख्या एवं राशि में भी प्रतिवर्ष कई गुना वृद्धि हो रही है। इन दोनों पद्धतियों में छात्र और अभिभावक ग्राहक अथवा उपभोगता की भूमिका में आ जाते हैं और शिक्षा संस्थान व्यापारी अथवा सेवा प्रदाता (Service Provider) बन जाते हैं। ऐसे विद्यालयों में अभिभावक शिक्षक बैठक (PTM) ग्राहक-नौकर संवाद में बदलती जा रही है। ‘जब हम इतना शुल्क दे रहे हैं तो क्या इतनी भी अपेक्षा नहीं कर सकते?’, ‘हम इतने सारे पैसे देकर बच्चों को स्कूल भेज रहे हैं, अब उन्हें पढ़ाना आपकी जिम्मेदारी है।’ जैसे वाक्य बच्चों की माताओं द्वारा शिक्षकों को कहा जाना सामान्य बात हो गयी है।

भारत में शिक्षा की यही दृष्टि नहीं है। केवल परंपरागत भारतीय शिक्षण की ही बात नहीं है अपितु भारत के संविधान में भी शिक्षा को व्यापार की वस्तु मानने का विरोध है। अनिवार्य तथा निःशुल्क मूलभूत (Elementary) शिक्षा को प्रारंभ में संविधान निर्माताओं ने राज्यों के निदेशक तत्वों में रखा और अपेक्षा की कि शीघ्रातिशीघ्र इसे वैधानिक रूप प्रदान किया जाएं। 86वे संविधान संशोधन इ. स. 2002 द्वारा शिक्षा को मौलिक अधिकार का स्थान दिया गया और तत्पश्चात इ. स. 2009 में ‘शिक्षा के अधिकार अधिनियम’ (RTE) द्वारा 6 से 14 वर्ष के प्रत्येक बालक की मूलभूत शिक्षा (8वी तक) अनिवार्य कर दी गयी। अब ये माता-पिता का विकल्प नहीं रहा कि वे बच्चों को पढ़ाएं या न पढ़ाएं। अनिवार्यता के साथ निःशुल्क शिक्षा का प्रावधान भी आवश्यक था। यदि शिक्षा व्यापारिक सेवा मानी जाये तो उसे अनिवार्य नहीं किया जा सकता। यदि शिक्षा का उद्देश व्यक्तिगत विकास एवं रोजगार तक सीमित हो और इस कारण उसे व्यक्ति अथवा परिवार की जिम्मेवारी माना जाएं तो फिर शिक्षा ग्रहण न करने का विकल्प भी खुला रखना पड़ेगा। मूलभूत शिक्षा की अनिवार्यता यह सिद्ध करती है कि भारत का संविधान शिक्षा को व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक दायित्व मानता है। विधान की विवशता है कि वह समाज को अपने दायित्व के लिए बाध्य नहीं कर सकता। अतः निःशुल्क शिक्षा का भार राज्य पर डाला गया है। भारत के संविधान में मौलिक अधिकार तो विधि द्वारा संरक्षित है। अतः राज्य का दायित्व बनता है कि इनकी रक्षा का उचित प्रबंध करें। किंतु दूसरी ओर संविधान में सूचीबद्ध किये गए मौलिक कर्तव्य निदेशक तत्वों (directive principles) के रूप में है, अतः बाध्यकारी नहीं हैं। शिक्षा के अधिकार अधिनियम ने मूलभूत शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाकर अभिभावकों को बाध्य कर दिया है और आर्थिक क्षमता के प्रश्न को निःशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए राज्य को बाध्य कर सुलझाया गया है।

परंपरागत रूप से भारत में शिक्षा को व्यक्तिगत अधिकार, आवश्यकता अथवा विकास का साधन नहीं माना गया। अपनी अगली पीढ़ी को स्वयं से सवाई (125% विकसित) बनाने हेतु समाज के सामूहिक दायित्व के रूप में शिक्षा को देखा गया है। समाज की आवश्यकता है कि उसका प्रत्येक घटक केवल सुशिक्षित ही नहीं अपितु सुसंस्कारित बनें। अतः यह समाज का कर्तव्य बनता है कि वह इसकी समुचित व्यवस्था करें। ज्ञात प्राचीनतम इतिहास से ही भारत में शिक्षा निःशुल्क रही है। शिक्षा को न तो व्यापार बनाया गया और न ही सरकार के अनुदान पर आश्रित रखा गया। भारत में शिक्षा सच्चे अर्थों में स्वायत्त एवं समाजपोषित रही है। आर्थिक स्वावलंबन के बिना शैक्षिक व प्रशासकीय स्वायत्तता का कोई अर्थ नहीं रह जाता। अतः भारत में शिक्षा की समाजपोषित व्यवस्था प्रयत्नपूर्वक विकसित की गयी। सब कालखंडों में सर्वत्र एक सी व्यवस्था नहीं थी किंतु जो भी विविध प्रकार की व्यवस्था विकसित की गयी उसमें स्वावलंबन समाज का आधार तथा शासन एवं समाज निरपेक्षता को ध्यान में रखा गया। वैसे ही गुरुकुल शिक्षा में आवश्यकताएं कम करने का प्रशिक्षण दिया जाता है। अतः गुरुकुल की अपनी आवश्यकताएं भी न्यूनतम हुआ करती थी।

साधारणतः तीन प्रकार के शिक्षा संस्थान भारत में कार्यरत रहे हैं। आवासीय गुरुकुल नगर, गांव से दूर वन में हुआ करते थे। इनमें बड़ी संख्या में छात्रों एवं आचार्यों के निवास, अन्य शैक्षिक गतिविधियों के लिए अध्ययनशाला, गोशाला, यज्ञशाला, पाकशाला, प्रयोगशालाएं भी हुआ करती थी। छात्रों के अनुपात में इन सभी छात्रावासों एवं शालाओं की भी आवश्यकता पड़ती थी। इस सबके साथ ही कृषि भूमि भी गुरुकुलों से जुड़ी हुई थी। छात्र एवं आचार्य कृषि और गोपालन का कार्य साथ मिलकर करते थे। अतः भोजनादि की व्यवस्था इन्हीं में से हो जाती थी। वस्त्र निर्माण का कार्य भी अध्ययन का अंग होता था। अतः छात्रों की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ती व्यावहारिक अध्ययन के लिए किए गए कार्यों से हो जाती थी। भूमि एवं गायें समाज से दान में प्राप्त होती थी। अधिकतर निर्माण सामग्री प्राकृतिक ही होने के कारण वन से ही उनकी आपूर्ति हो जाती थी। मध्यकाल में बड़े-बड़े भवनों का निर्माण नालंदा, तक्षशिला आदि गुरुकुलों में हुआ था। उसमें समाज के धनिक वर्ग का दान लगा हुआ होगा। राजा भी इन बड़े गुरुकुलों के निर्माण में योगदान करते थे। किंतु वह दान दक्षिणा के रूप में होता था। राज्य द्वारा थोपी गयी विविध बाध्यताओं से बंधा अनुदान गुरुकुल स्वीकार नहीं करते थे। देश के कुछ भागों में बड़े-बड़े गुरुकुलों के संचालन हेतु राजाओं द्वारा गुरुकुलों को कुछ ग्रामों के अभिलेख (पट्टे) प्रदान किए जाने के प्रमाण उपलब्ध हैं। इन गांवों से प्राप्त कर राजा के पास नहीं, गुरुकुलों के पास जमा होता था। इस व्यवस्था में भी राजा का हस्तक्षेप नहीं होता था। एक बार अभिलेख प्रदान हो जाने के बाद गांवों की पंचायत व्यवस्था का दायित्व होता था कि सुव्यवस्थित कर-संग्रहण कर गुरुकुलों को उपलब्ध कराया जाएं। इस प्रकार स्वायत्तता से गुरुकुलों की आर्थिक व्यवस्था हो जाती थी। अध्ययनकाल के कुछ निश्चित समय में भिक्षा-भोजन अथवा माधुकरी अनिवार्य थी। पाँच घरों में भिक्षा मांगने से न केवल छात्रों के अहंकार का विसर्जन होकर उनके व्यक्तित्व का विकास होता था अपितु साथ ही सारे गुरुकुल का भोजन भी समाज के आधार पर हो जाता था।

भारतीय शिक्षा व्यवस्था की आर्थिक स्वायत्तता का सबसे बड़ा माध्यम गुरुदक्षिणा थी, जो छात्र अपने गुरुओं के प्रति स्वेच्छा से अर्पण करते थे। हम पुराणों में और अन्य इतिहास ग्रंथों में विलक्षण गुरुदक्षिणा के अनेक प्रसंग पाते हैं। किंतु, यह तो अपवादात्मक घटनाएं हैं। सब गुरूदक्षिणा इस प्रकार की नहीं थी।

गुरु पूर्णिमा के दिन प्रवेश करते समय छात्र अपने हाथ में केवल समिधा लेकर – समित्पाणि हो गुरु को स्वयं अर्पित हो जाता था। हाथ में धारण की गई समिधा उसके मन का प्रतीक थी कि ‘जिस प्रकार यह समिधा यज्ञ में अर्पित होकर स्वाहा हो जाएगी, उसी प्रकार मैं आपके चरणों में न-मन करते हुए अपने मन को आप को सौंप रहा हूं। अब आप इसे जीवन योग्य बनाइए।’ न्यूनतम 12 वर्ष की शिक्षा के बाद छात्र स्नातक होता था। यह समय सबके लिए निर्धारित नहीं था किंतु सामान्यतः इतना समय लगता था। कोई अलौकिक छात्र हो तो कम समय में भी योग्य हो जाता था। जैसा कहते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण ने मात्र 2 वर्ष गुरु सांदीपनि के आश्रम में रहकर 64 कलाओं और 14 विद्याओं का अध्ययन कर लिया। दूसरी ओर उत्तंक का उदाहरण है जिन्हें आयु के 40 वर्ष तक यानी लगभग 30-32 वर्ष गुरुकुल में रहना पड़ा। यह अपवाद हैं। सामान्यतः 12 वर्ष में शिक्षा पूर्ण हो जाती थी।

इसके पश्चात छात्र समाज में अपना योगदान करने के लिए तैयार होता था और गृहस्थ जीवन में प्रवेश करता था। गुरु को दी जाने वाली दक्षिणा जीवनपर्यंत देनी है क्योंकि गुरु ने जीवन की शिक्षा दी है। अतः अपनी कमाई में से दशांश गुरु को भेजने की परंपरा भारत में थी। सभी छात्र इस परंपरा का कर्तव्य मानकर पालन करते थे। चाहे राजा का पुत्र हो अथवा कोई गरीब किसान, अपनी आजीविका चलाने के लिए कष्ट से प्राप्त किए धन में से दसवां हिस्सा अपने गुरुकुल, पाठशाला अथवा गुरु को भेजता था। सभी शिष्यों से प्राप्त यह राशि गुरुकुल संचालन हेतु पर्याप्त होती थी। अतः किसी भी नए गुरुकुल को प्रथम 12 वर्ष ही अपने आर्थिक भार हेतु व्यवस्था करनी पड़ती थी। समाज में दान भिक्षा मांगनी पड़ती थी। 12 वर्ष बाद तो पूर्व छात्र ही गुरुकुल को संभाल लेते थे। यह अत्यंत स्वावलंबी व्यवस्था थी। इसके कारण आक्रमण काल में सत्ता विदेशी विधर्मियों के हाथ में चले जाने के बावजूद भारत में गुरुकुल जीवंत रहे।

आज जब हम गुरुकुल शिक्षा की पुनःप्रतिष्ठा की बात करते हैं तो केवल फिर एक बार अधिकाधिक गुरुकुलों से भारत में सभी को शिक्षा प्रदान करना इतना ही उसका अर्थ नहीं है। साथ ही वर्तमान व्यवस्था में भी गुरुकुल के कुछ तत्वों का समावेश अत्यावश्यक है। इन तत्वों में से गुरुकुल का अर्थायाम सबसे पहले लागू किया जा सकता है। यदि हमारी शिक्षा व्यवस्था से निकले हुए छात्र अपना कर्तव्य समझकर अपनी आय का कुछ निश्चित हिस्सा अपने शिक्षा संस्थानों को भेजना प्रारंभ कर दें तो सारे विद्यालय, महाविद्यालय यहां तक कि भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान IIT जैसे बड़े-बड़े शैक्षिक संस्थान भी स्वावलंबी बन सकते हैं। पूरी तरह से इस व्यवस्था का अभी परीक्षण किया जाना बाकी है किंतु कुछ अंशों में इसका प्रयोग सेवाभावी संस्थाओं में हो रहा है। अभी यह स्वैच्छिक है। विद्या भारती, रामकृष्ण मिशन, चिन्मय मिशन जैसे संगठनों में पढ़े हुए छात्र अपनी श्रद्धा से अपने पूर्व विद्यालय को दान देते रहते हैं। राजस्थान में भामाशाह योजना के अंतर्गत शासकीय विद्यालयों में भी समाज के योगदान को प्रारंभ किया गया। इसके चमत्कारिक परिणाम सामने आए। पाली जिले में विद्यालयों, महाविद्यालयों के भवन तक समाज ने निर्माण किए।

यदि इसे परंपरा का रूप दे दिया जाए और सभी पूर्व छात्र एक निश्चित राशि प्रतिमाह भेजने लगे तो और किसी संसाधन की आवश्यकता ही नहीं रहेगी। सारी शिक्षा निःशुल्क दी जा सकेगी। जो छात्र निःशुल्क शिक्षा प्राप्त करेगा वह इस कर्तव्य का पालन और अधिक श्रद्धा से करेगा। वर्तमान में चल रहे व्यापारिक शिक्षा संस्थानों से निकले हुए छात्रों में यह श्रद्धा नहीं दिखाई देती क्योंकि उनके मन में ग्राहक बोध है। उन्हें लगता है कि हमारी शिक्षा का पूरा व्यय हमारे माता-पिता ने ही वहन किया। अब हमें इसे वापस कमाना है। इस भाव के कारण वह अपने व्यवसाय में भी येन केन प्रकारेण कमाने में ही विश्वास रखता है। यदि सभी प्रकार की शिक्षा निःशुल्क हो जाए तो अपने विद्यालय, महाविद्यालय के प्रति ऋण से उऋण होने का भाव छात्रों में रहेगा। पूर्व छात्र श्रद्धा से अपने शिक्षा संस्थानों का योगक्षेम वहन करेंगे। केवल इतना ही नहीं, सेवाभाव से प्राप्त शिक्षा के कारण उनके व्यावसायिक जीवन में भी वही सेवाभाव प्रधान होगा। कहते हैं ना, जो बीज बोएंगे फसल उसी की काटी जाएगी। शिक्षा में यदि हम व्यापार का बीज बोएंगे तो हमारे छात्र बड़े होकर उसी प्रकार की व्यावसायिकता का आचरण करेंगे। यदि शिक्षा सेवाभाव से प्रदान की जाएगी तो उससे तैयार छात्र भी अपने जीवन के प्रत्येक कार्य को सेवाभाव से ही करेंगे। अतः शिक्षा का अर्थायाम केवल आर्थिक विषय ना होकर शिक्षा में नैतिकता का भी विषय बन जाता है। सरकार-निरपेक्ष और व्यापार-निरपेक्ष शिक्षा व्यवस्था ही वास्तविकता में स्वावलंबी, नैतिक, धर्मानुसारी शिक्षा है।

भारत माता को पुनः एक बार विश्वगुरु के पद पर आसीन करने के लिए आइए हम इस अर्थायाम को स्वयं से प्रारंभ करें। हम चाहे जिस शिक्षा संस्थान में पढ़े हो सरकारी, निजी अथवा सेवाभावी, अपने जीवन में कमाई का निश्चित अंश देना प्रारंभ करें। यह निश्चित है कि आज की व्यवस्था में तुरंत दशांश प्रदान करना प्रारंभ नहीं होगा। किंतु 2% से प्रारंभ किया जा सकता है। धीरे धीरे बढ़ते हुए 5% तक भी ले गए तो शासन को किसी प्रकार की आर्थिक व्यवस्था नहीं करनी पड़ेगी और ना ही शिक्षा संस्थानों को व्यापार करना पड़ेगा।

‘जीवन में हमने जो पाया है उससे अधिक हम प्रदान कर सकें’ यही मनुष्य होने का लक्षण है। अतः, बिना किसी तर्क-कुतर्क हम अपने विद्यालय को, जिसके कारण आज हम बने हैं, उसे आंशिक गुरु दक्षिणा देना प्रारंभ करें। यही गुरुकुल की पुनः स्थापना का स्थायी मार्ग है।

दिसम्बर 8, 2018 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , | टिप्पणी करे

दायित्वबोध की देवी हम करे आराधन


दायित्व:
देवी भागवत में शुम्भ-निशुम्भ की कथा आती है। ये दोनों मधु-कैटभ के ही वंशज है। उनके वध का प्रतिशोध लेना चाहते है। अपना सशक्त साम्राज्य बना लिया है। ब्रह्माजी से तपस्या कर  वरदान पा लिया कि कोई नर चाहे मानव हो या पशु के हाथों मृत्यु नहीं होगी। उनको दम्भ है कि कोई मादा, नारी से क्या ड़र। वे माता की शक्ति से अपरिचित है क्योंकि स्त्री को मादा के रूप में ही देखते है। यह असुर विचार का एक लक्षण है। नारी को मादा के रूप में भोग का साधन समझना। भारतीय संस्कृति में हर बाला को माँ के रूप में ही देखा जाता है। आज सप्तमी है। कुमारी पूजा का दिन है। स्वामी विवेकानन्द स्वयं कुमारी के अन्दर दिव्यता के दर्शन कर कुमारी पूजा करते थे। कश्मिर में क्षीरभवानि में आसपास जब कोई हिन्दू बालिका नहीं थी तो नाववाले मुसलमान की बेटी की स्वामीजी ने कुमारी पूजा की। वो नाववाला भी गद् गद् हुआ। आज भी कश्मिर के मुसलमान अपने आप को पंडीतों के वंशज मानते है। राजनीति और पाकीस्तान के हस्तक्षेप से मामला बिगड़ा हुआ है।
तो शुम्भ-निशुम्भ के आतंक से पीड़ित देवताओं ने माता दूर्गा की प्रार्थना की। पार्वती ने देवताओं पर दया कर कौशिकी का रूप लिया। उसे काली या कालरात्री भी कहते है। कहीं कही काली को उनकी सहायक के रूप में भी बताया गया है। वैसे इस युद्ध में सभी देवताओं की शक्तियाँ देवी के साथ लड़ी थी। कुल सात देवियों ने मिलकर धुम्रलोचन, चण्ड-मुण्ड, रक्तबीज सहित लाखों असुर सेना का नाश कर दिया। चमूत्व (Team) की शक्ति का यह चमत्कार था। धुम्रलोचन के साथ सबसे पहले युद्ध हुआ। उस समय कौशिकी माता ने अकेले ही अपने वाहन सिंह के साथ 60000 असुरों का वध कर दिया। फिर चण्ड मुण्ड अनेक मायावी दानवों की सेना लेकर आये। तब सातों देवियों ने मिलकर उनका निःपात किया। इसी से देवी का एक नाम चामुण्डा पड़ा। रक्तबीज का वरदान विचित्र था। उसके रक्त की बून्द जमीन पर गिरने से उसमें से और दानव उत्पन्न हो जाते। क्लोनिंग की कितनी उन्नत विधि? तो देवी ने काली को दायित्व दिया कि अपने खप्पर में रक्तबीज के रक्त के हर बून्द को धरती पर गिरने पहले ही पकड़ लो। और देवी ने उसके मस्तक का छेद कर दिया।
यह चमुत्व संगठन की शक्ति को कई गुणा बढ़ा देता है। कम कार्यकर्ता भी बड़े बड़े चमत्कार कर देते है। शिवाजी की सेना की सफलता का यही रहस्य था। चमु में सबका दायित्व स्पष्ट होना आवश्यक होता है। संगठन में प्रत्येक कार्यकर्ता का तय दायित्व हो ताकि कोई भ्रम अथवा कार्य का दोहराव ना हो। सब अपना अपना दायित्व निभाते हुए एक-दूसरे के पूरक बनें। दायित्व ही कार्यकर्ता का परिचय हो जाता है। इससे कार्य में व्यक्तिगतता नहीं आती। कार्य व्यक्ति निरपेक्ष हो जाता है। अपने दायित्व से कार्यकर्ता का आत्मबल, क्षमता और प्रभाव बढ़ता है। अन्यथा सामान्य गुणोंवाला कार्यकर्ता भी असामान्य परिणाम देता है।
कालरात्री का वाहन गर्दभ है। कार्यकर्ता भी चाहे जिस श्रेणी का हो दायित्व रूपी देवी की सवारी बनते ही वह भी पूजनीय हो जाता है। दायित्ववान कार्यकर्ता संगठन को अपने लक्ष्य कीओर अग्रेसर करता है। आदर्श चमु में हर दायित्व के लिये कार्य कर्ता और हर कार्यकर्ता के लिये दायित्व होता है। हम अपने दायितव का पूर्ण निर्वाह करते हुए कालरात्री की पूजा करें। यही हमारा कुमारी पूजन है। इसीसे वर्तमान असुर सेना का नाश होगा। खप्परवाली का खप्पर खाली ना रहे। कोई कार्यकर्ता दायित्व बिना न रहे!

अक्टूबर 17, 2018 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , | टिप्पणी करे

कात्यायनी : कार्यकर्ता निर्माण की कथा


कार्यकर्ताः
बड़ी प्रचलित कहावत है, ‘‘भगतसिंह पैदा तो हो पर पड़ौसी के घर में।’’ देशभक्तों की सब प्रशंसा तो करते है पर उनके बनने की प्रक्रिया की प्रसव पीड़ा को कोई नहीं सहना चाहता। महान त्याग से ही महान कार्य सम्पन्न होते है। पर आज परिवार त्याग के स्थान पर अपने बच्चों को सुरक्षित मार्ग से सहज, सफल जीवन जीने का ही प्रशिक्षण दे रहा है। अपने तक रहो, दुसरों के बीच में मत पड़ना। सामने अन्याय होता दिखे तब भी लफड़े में मत पड़ना यह आज की माता का अपने लाड़ले लल्लू को सतत परामर्श होता है। वीरप्रसवा भारत भूमि में जीजाबाई जैसी मातायें कहाँ चली गई?

नवरात्री के छठे दिन की देवी कात्यायनी है। ऋषि कात्यायन का साहस देखो। देवी से इसी आग्रह के साथ तप किया कि मेरे घर जन्म लो। देवी को परिवार में धारण करने की तैयारी। घोर तपस से प्रसन्न हो देवी ने ऋषि कात्यायन के घर जन्म लिया इसी से नाम पड़ा कात्यायनि।

संगठन में दिव्यता को अपने में जन्म देने की तैयारी वाले कार्यकर्ताओं की आवश्यकता होती है। वास्तव में ऐसे समर्पित कार्यकर्ता ही संगठन बनाते है। वे ही संगठन का आधार होते है। जितनी अधिक मात्रा में ऐसे कार्यकर्ता संगठन के पास होंगे उतना ही संगठन का विस्तार होगा। कुछ संगठनों में अपना पूर्ण जीवन संगठन को अर्पित करनेवाले पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं की व्यवस्था होती है। उन संगठनों में ये पूर्ण समर्पित कार्यकर्ता संगठन की रीढ़ बनते है। फिर अगले चक्र में ऐसे कार्यकर्ता होते है जो पूरा समय तो नहीं दे पाते किन्तु समर्पण पूर्ण होता है। अपने व्यवसाय व परिवार के साथ बराबर की वरीयता व महत्व ये कार्यकर्ता संगठन को देते है। समय भी नियमित रूप से निकालते है संगठन के कार्य के लिये। संसाधनों को एकत्रित करने में भी ऐसे कार्यकर्ताओं का बड़ा योगदान होता है। पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं की संख्या कितनी भी अधिक हो जाये सीमित ही होगी। अतः दूसरे चक्र के कार्यकर्ता कार्य को स्थायित्व प्रदान करते है। संगठन की समाज में प्रतिष्ठा भी ऐसे कार्यकर्ताओं के आचरण पर निर्भर होती है। समाज में प्रतिष्ठित व्यक्ति यदि किसी संगठन के साथ जुड़ जाते है तो अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा से संगठन की साख में वृद्धि करते है।

तीसरी श्रेणी में ऐसे कार्यकर्ता आते है जो नियमित समयदान अथवा वैचारिक योगदान भी नहीं करते किन्तु पूरी श्रद्धा से मूख्य कार्यकर्ताओं का नैतिक समर्थन करते है और समय पड़ने पर आवश्यकता के अनुसार समय, श्रम और अन्य संसाधनों का योगदान भी करते है। एक चौथी परत भी होती है संगठन से जुड़ने वालों की। इन्हें कार्यकर्ता तो नहीं कहा जा सकता किन्तु होते ये भी महत्वपूर्ण हैं। इन्हें आप संगठन के शुभचिंतक कह सकते है। ये संगठन के विचार, लक्ष्य व कार्य को समझते है और इससे सहमत भी होते है। किन्तु भिन्न वरीयताओं के कारण प्रत्यक्ष योगदान नहीं देते। किन्तु समाज में संगठन का अच्छा प्रभाव बनें इसमें सहायक होते है। सहज चर्चा में संगठन के प्रति सहानुभुति के शब्दों से समाज का सकारात्मक अभिमत बनाने का कार्य करते है। इनकी भी संगठन की प्रगति में अपनी भूमिका है।

कात्यायन सी तपस्या सभी संगठकों को करनी पड़ती है। अच्छा कार्य करते है तो विघ्नसंतोषी लोग विरोध भी करेंगे। संगठक को ऐसे लोगों से भी व्यवहार कुशलता से बरतना होता है। विरोध की धार बोथी हो ऐसा प्रयास करना होता है। जो दूरस्थ है वो निकट आये, सहानुभुति रखनेवाले सक्रीय हो, जो सक्रीय है वो नियमित हो यह तपस्या है। इसी के द्वारा संगठन में अधिक कार्यकर्ता पैदा होते है। अर्थात कात्यायनी माता की कृपा होती है।

अक्टूबर 16, 2018 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , | टिप्पणी करे

या देवी सर्व संघेशु कार्यपद्धति रूपेण संस्थिता …


पंचमी नवरात्रों की स्कन्द माता की पूजा

उत्तरापथ

संगठन की कार्यपद्धतिः
नवरात्री में आज की देवी स्कंदमाता है। तिथिक्षय के कारण आज पाँचवा दिन है। तिथिक्षय का भी विज्ञान होता है, पर वो फिर कभी| स्कंदमाता कुमार कार्तिकेय की माता के रूप में पार्वती जी का ही नाम है। तारकासुर के वध के लिये स्कंद सेनापति का जन्म हुआ था। इनको षण्मुखनाथ और कार्तिकेय के नाम से भी जाना जाता है। जन्म की कथा भी बड़ी रोचक है। महाकवि कालिदास ने ‘कुमारसम्भव’ में इसका अद्भुत वर्णन किया है। तारकासुर का आतंक बढ़ रहा था। भगवान विष्णु ने देवताओं को बताया कि शिवजी के पुत्र को सेनापति बनाओ तो विजय निश्चित है। पर शिवजी तो माता सति के देहान्त के बाद से अविवाहित है, अब कैसे होगा? हिमालय कन्या गिरीजा उनकी सेवा में रत है। उनको पति के रूप में वरण कर चुकी है। अब तप चल रहा है। पर कैलासपति तो ध्यान में रत बैरागी उनको कौन राजी…

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अक्टूबर 15, 2018 Posted by | Uncategorized | टिप्पणी करे

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