उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

बहुआयामी धर्म की एकात्म संकल्पना


BG2किसी भी राष्ट्र में सामाजिक, राजनैतिक समस्याओके मूल में वैचारिक अस्पष्टता की बहुत बडी भूमिका रहती है। भारत में ब्रिटिष राज के अवषेष आज भी वैचारिक विभ्रम के रूप में बने हुए है। सदियों से ऐतिहासिक सांस्कृतिक अनुभूति के आधार पर जिन संकल्पनाओं का विकास हुआ उनकी अवधारणाओं एंव मर्म को अनुवाद की अपर्याप्तता के कारण भ्रमित कर दिया गया है। समाज एवं लोक जीवन में प्रचंड विविधता के बाद भी अनेक संकल्पनायें देश के सभी भाग में समान रूप से समझी जाती है। आपको उस प्रांत की प्रादेशिक भाषा का ज्ञान हो न हो अनेक आध्यात्मिक गूढ संकल्पनाओं को भी आप सहजता से समझ सकते है। कैलास से लेकर कन्याकुमारी व द्वारका से लेकर परषुराम कुंड तक कही पर भी आप जाइए-माया, लीला, श्रद्धा आदि अत्यंत गंभीर आध्यात्मिक संकल्पनाओं को सामान्य से सामान्य व्यक्ति भी सहजता से समझता है। अतिविषिष्ट भाषाई विविधता के होते हुए भी इन संकल्पनाओं का एक समान अर्थ पूरे देश में प्रचलित है। लीला को समझाने के लिए महर्षि वेदव्यास को भागवत महापुराण की रचना करनी पडी, जयदेव को गीत गोविंद लिखना पडा और तुलसी को मानस। संभवतः इन्ही सबके सदियो तक किए हुए अनुष्ठान का ही परिणाम है कि आज हमारा पूरा समाज इन गूढ मान्यताओं को सामान्य बोलचाल की भाषा मे अचूक प्रयोग करता है । ऐसे अनेक पद ऐतिहासिक अनुभूतियों से विकसित होते हैं । वे केवल इस भाषा के शब्द नही होते अपितु एक जीवंत व्यावहारिक संकल्पना होते हैं । इन शब्दों का न तो किसी भाषा मे अनुवाद किया जा सकता है और न ही ऐसा प्रयास करने की कोई आवश्यकता है । जैसे लड्डू को विश्व की सभी भाषाओं मे लड्डू ही कहना चाहिए और पिझ्झा को पिझ्झा ही । वैसे ही इन संकल्पनाओं को अनुवाद के बिना जस का तस व्यक्त किया जाना वैचारिक प्रामाणिकता के लिए अनिवार्य है । ब्रिटिश राज के काल में विद्वानो द्वारा इस महत्वपूर्ण तथ्य की अनदेखी की गई । जिस कारण संकल्पनाओं का विकृत, संकुचित और सीमित अर्थ समाज मे प्रचलित हुआ । जिसके फलस्वरूप सामूहिक संभ्रम की स्थिति देश की मेधा में छा गई । राज प्रतिष्ठित विद्वानों द्वारा इन भ्रमित संकल्पनाओं पर आधारित नीतियों पर आधारित कार्य्रक्रमों का चलन हुआ । देश में व्याप्त मानसिक गुलामी का यह सबसे बडा कारण हैं । जिस एक संकल्पना के संकीर्ण व भ्रमित होने के कारण स्वतंत्र भारत मे सर्वाधिक परिणाम हुए हैं, वह है ‘धर्म’ की अवधारणा । धर्म को रिलीजन के पर्यायवाची मान लिए जाने के कारण, सर्वपंथ समभाव को पंथ निरपेक्षता के रूप मे परिभाषित किया जाना, और इस विकृत शब्दरचना के कारण राजकीय व्यवस्थाओं तथा सभी सामुदायिक गतिविधियों से धर्म को प्रयत्नपूर्वक अलग कर दिया गया । शिक्षा में से भी धर्म को अलग करने के प्रयास में सभी संस्कार, सदाचार, नैतिकता आदि अनिवार्य बातें भी हटा दी गई । अब इन सब बातों को लागू करने के लिए मूल्य शिक्षा जैसे अधूरे प्रयास किए जा रहे है । आवश्यकता तो यह है कि धर्म की सही अवधारणा को पुनःप्रस्थापित कर धर्मानुसारी शिक्षा की पुनर्रचना की जाए ।

भारत में धर्म यह एक बहुआयामी संकल्पना है । वास्तव में यह एक जीवन जीने का मार्ग है । पाशविक वासनाओं से उपर उठकर मानवीय संवेदनाओं के अनुरूप जीवन जीना तथा क्रमश: विकसित होते हुए महामानव, देवमानव, दिव्यमानव व अंततः प्रत्यक्ष दिव्यता की अनुभूति यह विकास का मार्ग धर्म है । धर्म केवल व्यक्तिगत आत्मोन्akmनति ही नही अपितु पूरे समाज के ही दिव्यत्व की ओर गति करने का माध्यम बनता है । धर्माधिष्ठित समाज में प्रत्येक व्यक्ति अपने -अपने स्वभाव के अनुसार जहाॅ हैं उस स्थिती से क्रमशः इस प्रगति की ओर अग्रेसर होता है । समाज जीवन मे धर्म प्रतिष्ठित होने पर प्रत्येक में यह उच्च आकांक्षा स्वतः जन्म लेती है । साथ ही समाज में इस प्रकार के अवसर और मार्गदर्षक दोनो ही उपलब्ध होते हैं । समाज जीवन के सभी अंग धर्मप्राण होते हैं । अतः जो प्रजा को धारण करता है वह ‘धर्म’, ऐसी धर्म की व्याख्या की जाती है । स्वभाव को भी धर्म कहा है । अतः उस स्वभाव के अनुरूप ही मार्ग का चयन करना होता हैं । स्वभाव भी धर्म है और उन्नतिगामी समाज में आपसी संबंध व सामुदायिक जीवन की परंपरायें भी धर्म है । मानव का मानव से, परिवार से, समाज से, सृष्टी से तथा अंत मे परमेष्ठी मे एकात्म संबंध है । इस संबंध को समझकर उसका निर्वाह करना धर्म है । अतः भारत में सामान्य बोलचाल की भाषा मे पुत्रधर्म, पितृधर्म, पत्नीधर्म, पतिधर्म ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जाता हैं । आपसी संबंधो का निर्वहन कर्म के द्वारा किया जाता हैं । अतः क्या करणीय है ? और क्या अकरणीय है? यह जो बताया है, उसे भी धर्म कहते हैं । उस अर्थ मे धर्म कर्तव्य का परिचायक हैं । ‘राजधर्म’ आदि शब्दों मे ‘राजा के कर्तव्य’ यही भाव प्रकट होता हैं । स्वयं के व सृष्टी के प्रति मनुष्य के कर्तव्य का बोध होने पर धर्म संयम का रूप धारण करता हैं । अतः इसे मर्यादा भी कहा गया है । कर्तव्य, अकर्तव्य के साथ ही भोगने की मर्यादा भी धर्म निर्धारित करता हैं । इन्द्रियों के द्वारा कितना भोग करेंगे? क्या भोगें? व कैसे भोगे? यह बात जिस अलिखित नियम से, संस्कारो के रूप मे सामूहिक मन मेे सुप्रतिष्ठित की जाती हैं उस नियम को भी धर्म कहते हैं । समाज जीवन के नियम धर्माधारित होते हैं । अपेक्षा यह है कि राज सत्ता भी धर्म विधान से ही परिचालित हो । अतः भारत मे न्याय करने हेतु रचित विधिविधान के नियमों को भी धर्म कहा गया । जब इसमें किसी व्याख्या का निर्धारण करना हो तो ‘धर्मसभा’ का आयोजन किया जाता था । अब आधुनिक युग मे कानून, विधि विधान तथा नैतिक अपेक्षा व धर्म विहित कर्तव्य दोनो अलग-अलग हो गये हैं । वास्तव में राजव्यवस्था धर्माधिष्ठित हो तब इन दोनो का भी तादात्म्य ही होता हैं ।

चर अचर सभी वस्तुओं के स्वभाव को धर्म ही कहा जाता हैं । आधुनिक विज्ञान शिक्षा मे भी वस्तुओं के गुणधर्म सिखायें जाते हैं । किसी भी सजीव भूतमात्र अथवा निर्जीव वस्तु का स्वभाव ‘धर्म’ कहलाता है जैसे अग्नि का धर्म है दाहकता, जल का धर्म है प्रवाहित होना । कितने भी छोटे स्थान पर जल को बांध भी दे वह लहरों के रूप प्रवाहित होता हैं । प्रत्येक वस्तु अपने स्वभावधर्म को धारण किए हुए अस्तित्व मे रहती हैं । प्रत्येक मनुष्य भी अपने आप में विशिष्ट स्वभाव का होता है । वह स्वभाव ही उसका स्वधर्म हैं । उसी के अनुसार उसे स्वयं से व अन्यों से संबंधों का निर्वाह करना हैं । यह संबंध भी धर्म द्वारा परिभाषित हैं । सारी सृष्टि ही एक ईश्वर की एकात्म अभिव्यक्ति हैं । अतः उसके प्रत्येक अंग का विशिष्ट स्थान होने के साथ अन्य अंगो के साथ अंगांगी संबंध हैं| जिस प्रकार शरीर के विभिन्न अंग परस्पर पूरकता के साथ स्वयं के कार्य को करते हुए औरों के सहयोगी बनते हैं उसी प्रकार मनुष्य को परिवार, समाज, सृष्टि व परमेष्टि के साथ समन्वयात्मक संबंध का निर्वाह करना होता है । सृष्टि के इन ईश्वरीय नियमों को ‘धर्म’ कहते हैं । मानव को अपने स्वधर्म का प्रगटीकरण कर्म रूप मे करना होता हैं । उद्देष्यपूर्ण कर्म स्वधर्म होता हैं । स्वधर्माधिष्टित कर्म मानव जीवन को परिपूर्ण बनाता हैं । धर्म केवल तत्व न हो करके प्रत्यक्ष व्यवहार में उतारना पडता है । अतः कहा गया है कि ‘आचार प्रभवो धर्म’ इन इतनी सारी विविध छॅटाओ का एक साथ धारण किए हुए धर्म की संकल्पना इस यज्ञ भूमि मे विकसित हुयी । समय-समय पर लोगों ने इसे अपने जीवन मे उतारकर आदर्श प्रस्तुत किए । विद्वानों ने इसके गुण तत्वों की मीमांसा की । जीवन के विभिन्न आयामों मे धर्म को सुव्यवस्थित रूप से परिभाषित करने का काम शास्त्रों ने किया । सार्वकालिक, शाश्वत तत्वों के रूप मे मनुष्यों ने इसकी पहचान की । मनुमहाराज ने धर्म के दस लक्षण बताए हैं । एक दो भेंदो के साथ यही पंतजली के योगसूत्रों मे परिलक्षित हुए हैं । भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद गीता के सोलहवे अध्याय मे दैवी गुण सम्पद के सोलह गुणों के रूप मे धर्माचरण को स्पष्ट किया हैं ।

समाज जीवन में व्यक्ति को भिन्न-भिन्न भूमिकाओं का निर्वाह करना पडता है । अनेक बार इन विभिन्न भूमिकाओं मे आचरण किए जाने वाले धर्म का आपसी टकराव हो जाता है । ऐसे धर्म संकट में से बाहर निकलने का मार्ग भी शास्त्र बताते हैं । जहाॅ व्यष्टि धर्म समष्टि धर्म के साथ टकराता है, वहाॅ बडी इकाई को महत्व देना साधारण सा नियम है| जब व्यक्ति के ही दो व्यक्तिगत धर्मो के बीच टकराव हो तब शास्त्र कहते हैं कि समाज के अधिकतम हित का ध्यान रखते हुए ज्यादा से ज्यादा लोगों का जिसमे हित हो उस बात को वरीयता दी जाए । इसी प्रकार से एक और वर्गीकरण धर्मपालन की कठोर नियमितता को लेकर शास्त्रों में मिलता है। वह है सामान्य धर्म, विशेष धर्म व आपदधर्म । सामान्य जीवन यापन करते हुए नित्यनियम के रूप मे कुछ कर्तव्यो का समावेष होता है, उसे सामान्य धर्म कहते हैं । यात्रा, बीमारी आदि विशेष परिस्थितियों मे इन नियमों की कठोरता में कुछ मात्रा मे रियायत बरती जाती है उसे विषेष धर्म कहते है । जब प्राणों पर ही संकट आ पडें, उस समय सामान्य रूप से अकरणीय कार्य को करने की अनुमती होती है इसे आपदधर्म कहते है | धर्मपालन के लिए जब देह ही न बचे ऐसी आशंका की परिस्थिती में ही आपदधर्म का अवलंब किया जा सकता है अन्यथा नही ।
इस प्रकार धर्म का अत्यंत व्यावहारिक एवं सूक्ष्म विवेचन भारत मे शास्त्र ग्रंथो में और साथ ही लोक जीवन में भी दिखाई देता है । आज भी हिंदू समाज के अधिकतकम लोग सहज सुलभ परंपरा के रूप मे धर्म का अवलंबन करते हैं । धर्म पालन में त्रुटि के परिणाम स्वरूप जीवन में जो संकट आयेंगे उनका स्पष्ट भान सामान्य भारतीय को परंपरा से प्राप्त हुआ है । अतः धर्म भीरूता के चलते सामान्य व्यक्ति शुद्ध सात्विक एवं प्रामाणिक जीवनयापन करने का प्रयत्न करता है । विदेशी शासन के चले जाने के बाद भी विदेशी तंत्र को ही अपनाए रखने के कारण व्यवस्था में से धर्म लुप्त हो गया हैं । उस कारण चरित्र का संकट शासन तंत्र और उससे जुडी सामूहिक गतिविधियों में दिखाई दे रहा हैं । यह अत्यावश्यक है कि हम अपनी समस्त व्यवस्थाओं को शाश्वत, सनातन धर्मानुसार पुनर्गठित करें । चिरस्थायी सार्वजनिक सुख का यह एकमात्र मार्ग हैं । धर्मराज्य की स्थापना ही सर्वे भवन्तु सुखिनः की वैश्विक प्रार्थना को साकार कर सकती हैं ।

दिसम्बर 23, 2015 Posted by | आलेख | , , , , , , , | 2 टिप्पणियाँ

जगत् हो विनम्र ऐसा शील हमको दें!


गढ़े जीवन अपना अपना -20
panchajanyaभागवत महापुराण के दशम स्कंध में एक कथा आती है पौण्ड्रक वासुदेव की। ये कुराह प्रदेश के राजा है। जरासंध के साथ है और इस कारण भगवान् कृष्ण से मत्सर करते है। ये अपने आप को कृष्ण से श्रेष्ठ बताने के लिये कृष्ण के समान ही वेशभूषा करने लगते है। वैसे ही पीताम्बर, मोरमुकुट, सारंग धनुष्य, नकली कौस्तुभ मणि, छातीपर श्रीवत्स का चिह्न भी सब कुछ कृष्ण के ही समान। यहाँ तक की एक नकली सुदर्शन चक्र भी बना लिया और उसे भी धारण करने लगे। हर बात पर कृष्ण का अपमान भी करते है और कहते है, ‘‘मै ही साक्षात् वासुदेव हूँ। ये नन्द का लला तो ढ़ोंगी है। भगवान कृष्ण इस नौटंकी को महत्व नहीं देते और जब भी यह विषय उनके सामने आता तो महत्वहीन कहकर टाल देते। एक बार अपने स्वयं के प्रलाप से ही भ्रमित पौण्ड्रक वास्तव में स्वयं को कृष्ण से अधिक शक्तिशाली मान बैठते है। कृष्ण को युद्धभूमि में ललकारते है।  पौण्ड्रक अपनी 2 अक्षोहिणी सेना और साथ काशी नरेश की 3 अक्षोहिणी सेना। फिर भी युद्ध तो कितना चलना था? नकली सुदर्शन से सज्ज नकली वासुदेव को साक्षात भगवान् से वारगती प्राप्त होती है। कृष्ण भगवान् उसे अपने नकली पाखण्ड से सदा के लिये मुक्त कर देते है। साथ में काशी नरेश को भी मुक्ति मिलती है।

पौण्ड्रक वासुदेव ने भगवान की नकल की तो कम से कम मृत्यु तो भगवान के हाथों मिली। आज हमारे युवा अपनी वेशभूषा और केशभूषा में ना जाने किस किस की नकल कर रहे है? इनका और इनके साथियों का क्या होगा भगवान ही जाने। पंचतन्त्र की कथा में नील के पानी में गिर कर रंगे सियार की भांती अपने बालों को रंगाकर ना जाने किसे प्रभावित करना चाह रहे है? बारीश के पानी में रंग धुल जाने के बाद जो दूर्गती सियार की हुई वही स्थिति जीवन संग्राम में उतरने के बाद इन नकली युवाओं की हो रही है।

वास्त्विक सौंदर्यबोध को समझकर अपने आप को आकर्षक बनाया जा सकता है। सही तरिके से सुदर्शन होना भी सदाचार का अंग है। सौन्दर्य बोध का जीवनमूल्य जब आचरण में आता है तब हर काम में सुव्यवस्था आ जाती है। अपने कपड़े अपने मन की स्थिति प्रगट करते है। केवल नकल और प्रचलित शोभाचार (Fashion) के नाम पर उटपटांग परिवेष कर लेना आकर्षक भले ही लगता हो पर दूरगामी प्रभाव तो सादे किन्तु साफसुथरे, सुव्यस्थित परिधान से ही होता है। अपना परिधान अपने भाव का परिचायक होना अपेक्षित है परिवार की आर्थिक स्थिति का नहीं। दूसरे के प्रति भी बाहरी बातों के कारण उपेक्षा, परिहास या व्यंग का आचरण नहीं हो। हम स्वयं बात को समझ गये है अतः शोभाचार के चक्कर में नहीं फँसेंगे पर कोई दूसरा कर रहा है तो उसपर हसेंगे भी नहीं।

कपड़े शरीर के अंगों को ढ़ककर उनकी रक्षा के लिये होते है उन्हें उघाड़ने के लिये नहीं यह याद रखना आवश्यक है। हमारे कपड़ों में हमारी परम्परा भी झलकती है। भारत में तो इसमें भी वैज्ञानिकता को सहजता से अपनाया गया है। हमारे यहाँ स्थान एवं ऋतु के अनुसार वेशभूषा का प्रयोग होता है। कश्मिर से लेकर कन्याकुमारी तक सारी विविधता के मध्य भी हम पायेंगे कि बालिकाओं के परिधान सदैव कमर के नीचे ढ़ीले और फैले हुए होते है। इसके पीछे वैज्ञानिक तथ्य है। बाल्यावस्था और किशोरावस्था में शरीर का विकास होता है। ऐसे में कसे (Tight) वस्त्रों से मांसपेशियों की ताकद नहीं बन पाती। ये भाई-बहनों दोनों के लिये सत्य है। बहनों को मातृत्व के लिये तत्पर होना है इसलिये जंघाओं को विकास का पूर्ण अवसर भारतीय पारम्पारिक परिधान देते है। ब्रह्मचर्य की रक्षा के लिये भाइयों को लंगोट कसना चाहिये किन्तु हमारी परम्परा में उनके भी बाकि वस्त्र शरीर से कस कर सटे नहीं होते। शरीर के रक्ताभिसरण, पेशियों के विकास एवं वायु के समुचित संचरण को ध्यान में रखकर विकसित ये परिधान रंग और आकर (Design) की सुन्दरता के साथ ही शील के भी परिचायक हैं। आनन्द का विषय है कि धीरे धीरे ये प्रचलित शोभाचार केा भी अंग बन रहे हैं।

केवल परिधान की ही बात नहीं है, सौन्दर्यबोध के अन्तर्गत हमारे हावभाव, उठना, बैठना सब आता है। इन सब में ही शील झलकना चाहिये। दूसरे के साथ व्यवहार में, बोलने, देखने में भी शरीर का महत्व न्यून हो उसके पूर्ण व्यक्तित्व को हम संबोधित करें। जहाँ तक सम्भव हो चिकित्सक ओर दर्जी को छोड़ किसी और के साथ शरीर हमारी चर्चा का विषय ही ना बनें। एक प्रोफेसर की कक्षा में छात्र ने उनकी तारिफ करने के लिये कहा कि आपकी टी-शर्ट बड़ी सुंदर है। प्राध्यापक ने छात्र को यह कहकर कक्षा से बाहर किया कि मेरे पढ़ाने में कोई कमी है जो तुम्हारा ध्यान मेरे कपड़ों की ओर गया। आजकल एक-दूसरे को परिधान के लिये बधाई (Complements) देने का रिवाज़ है। पर वास्तविकता में सुशील व्यक्ति को यह शोभा नहीं देता। न तो ऐसी क्षुद्र बातों पर किसी को बधाई देनी चाहिये ना ही बधाई को स्वीकार करना चाहिये। परस्पर सद्गुणों का सत्कार कर बधाई देना ही अपना अभ्यास बन जाये।

इससे ठोस बातों पर आधारित होने के कारण सम्बन्धों में भी प्रगाढ़ता आ जायेगी। सम्बन्ध हमें शक्ति और सत्व प्रदान करते है अतः सदाचार में सम्बन्धों का सम्मान सबसे अग्रणी है। माता-पिता और गुरु हमारे सर्वस्व के निर्माता होने के कारण हमारे स्वामी है। अतः इस सम्बन्ध का सम्मान तो चरणस्पर्श के द्वारा ही हो सकता है। प्रांत विशेष में परम्परा की भिन्नता के अनुसार इसका परिपालन अवश्य किया जाना चाहिये। उत्तरी भारत के कुछ प्रांतों में परम्परा है कि कन्या को देवी का रुप मानते है और उसका पूजन करते है। अतः, अविवाहित पुत्री अपने पिता के चरण नहीं छूती उलटे पिता ही उसका आशिर्वाद लेता है। इस परम्परा के पीछे के दिव्य तत्व का आचरण तो सबको ही करना चाहिये। छोटी से छोटी बालिका में भी माँ का देवी का शक्ति का दर्शन करना चाहिये। दक्षिण भारत में बालिका को भी अम्बा, अम्मा ही कहते है। सम्बन्धों की सफलता विस्तार में है। प्रत्येक अजनबी से भी सम्बन्ध बनाने की क्षमता शीलवान व्यक्ति में होती है। उसके लिये सब केवल ‘अंकल’ ‘आंटी’ नहीं है। कोई मामा है कोई मौसी है, दीदी है, भैया है, ताऊ है। आयु, परिचय और व्यवहार के अनुसार सम्बन्ध प्रस्थापित कर निभाना भी सदाचार का अंग है।

विविधता का सम्मान हमारी संस्कृति है। अतः हम सबके मतों का आदर करते है। शास्त्रार्थ होगा, चर्चा भी होगी, एक दूसरे के मतों के खण्डन-मण्डन से वाद विवाद भी होगा। पर सब विनम्रता से। एक नियम सर्वोपरी होगा ‘मत भिन्नता हो सकती है इस बात पर हमारा मतैक्य है।’ (We agree to disagree) तर्क तो करना ही चाहिये उससे मतों में स्पष्टता आती है। किन्तु संवाद होना चाहिये विवाद भी विनम्रता से हो तो चलेगा पर वितण्डा कभी नहीं होगा। विनम्रता कायरता या कमजोरी की निशानी नहीं है। विनम्रता तो ध्यैर्य, शक्ति और साहस की अभिव्यक्ति होती है। जिसकी बात में दम होता है और अपने सत्य पर आत्मविश्वास होता है उसे आवाज़ नहीं बढ़ानी पड़ती। चिल्लाते या तो असत्य भाषण करनेवाले या आत्मबलहीन व्यक्ति या फिर कपटी धुरन्धर। अपने वचन में तथ्यों की कमी को वे आवाज की मात्रा से पूरा करना चाहते है।

भारत में हम मानते है कि एक ही सत्य को समझने, कहने और प्रगट करने के भिन्न भिन्न मार्ग हो सकते हे अतः हम सभी मार्गोंका सम्मान करेंगे। किन्तु इसका अर्थ ये भी नहीं कि हम सबके आगे झुकेंगे और मूह देखी शालीनता के लिये असत्य या आसुरी तत्वों का साथ देंगे। जो मत यह कहे कि मेरी ही बात सत्य है बाकि सब झूठ अर्थात जो विविधता को नकारे ऐसी नाकारा भेदबुद्धि विचारधारा का विरोध हम निर्भयतासे करेंगे। अन्याय, अत्याचार और भ्रष्ट व्यवहार को सहन करना भी अपराध में सहभागिता है। अतः सुशील व्यक्ति निड़रता से ऐसे आचरण के विरोध में खड़ा हो जाता है। सहज भी अपने नित्य व्यवहार में यह निर्भयता झलकनी चाहिये। विनम्रता के साथ ही दृढ़ता भी हमारे चाल-ढाल, अंग-काठी (Posture) और संवाद में स्पष्टता से प्रगट होनी चाहिये। खड़े हो, बैठे हो या चल रहे हो गर्दन और मेरुदण्ड सीधा हो, सीना आगे और मस्तक उंचा हो। जब बोले तो स्पष्ट बिना झिझक और उचित गति से हो। अधिक जल्दी से बोलना भ्रम और न्यूनगण्ड (Inferiority Complex) का लक्षण है। बोलने में स्पष्टता हो और जितने लोगों तक बात पहुँचानी है उसके अनुसार स्वर (Pitch) एवं आवाज (Volume) हो। अभ्यास से शब्दों का चयन भी सही होने लगता है और फिर अनावश्यक स्पष्टीकरण या क्ष्मायाचना की आवश्यकता नहीं पड़ती। मृदु, मधुर व दृढ़ वाणी विचारों, भावों का ही नहीं पूरे व्यक्तित्व का ही सम्प्रेषण करती है। और फिर केवल पाँच शब्दों में सारे श्रोता अभिभूत हो जाते है। करतल ध्वनि ही नहीं पूर्ण आत्मीयता से सम्मान करने लगते है। केवल ढ़ाइ मिनट के वक्तव्य में शील की प्रतिमूर्ति, योद्धा हिन्दू सन्यासी विश्वविजय कर लेता है। उसी वीर विवेकानन्द से आओ हम प्रार्थना करें।
‘जगत् हो विनम्र ऐसा शील हमको दें!’

दिसम्बर 4, 2012 Posted by | आलेख | , , , , | 1 टिप्पणी

सदाचार अर्थात सेवा में पहले मै और सुविधा में पहले आप!


गढ़े जीवन अपना अपना -19

राजा की सवारी निकली थी। आगे आगे सेना की एक टुकड़ी मार्ग में आनेवाले लोगों को रोककर मार्ग खाली करने के काम पर लगी थी। एक महात्मा बीच रास्ते में बैठे थे। अपनी ही मस्ती में थे। एक सैनिक उनके पास जाकर चिल्लाया, ‘‘उठो! रास्ता खाली करो!! राजा की सवारी आ रही है।’’ महात्मा हटे नहीं और उस सैनिक से पूछा, ‘‘तूम कौन हो?’’ अपना गणवेष दिखाकर बोला, ‘‘मूझे नहीं जानते? मै राजा की विशेष रक्षा वाहिनी का सिपाही हूँ। हटो!    नहीं तो. . .’’ महात्मा ने मुस्कुराकर कहा, ‘‘तभी’’। सिपाही कुछ समझा नहीं, अपने सुभेदार को ले आया। सुभेदार अकड़कर बोला, ‘‘ना जाने कहाँ कहाँ से आ जाते है भीखमंगे? अरे इतनी सी बात नहीं समझते, राजा की सवारी आ रही है। फूटों यहाँ से! दीखना मत कही आसपास भी।’’ महात्मा ने फिर पुछा, ‘‘तुम कौन?’’ सुभेदारी का परिचय पाकर फिर वही टिप्पणी की, ‘‘तभी!’’ जब महात्मा फिर ध्यानमग्न हो गये और राह से ड़िगे नहीं तो सेनापति आया। ठसन तो थी पर भाषा सभ्य थी, ‘‘महात्माजी हमारी विवशता को समझे, आप नहीं हटेंगे तो राजा की सवारी में विघ्न आयेगा। कृपया राह दें।’’ महात्मा ने फिर परिचय मांगा और परिचय पाने पर फिर वही, ‘‘तभी!’’ अब मंत्री की बारी थी मन्त्री ने प्रणाम कर बड़ी विनम्रता से राह छोड़ने की प्रार्थना की। राजा के गन्तव्य का महत्व भी बताया और राष्ट्रीय आवश्यकता की भी दूहाई दी। महात्मा ने मुस्कुराकर परिचय पूछा। पता चलने पर फिर, ‘‘तभी!’’ अब बात राजा तक पहुँची। महात्मा है कि हटता नहीं और केवल ‘तभी’ ‘तभी’ कहता है। राजा ने रथ से उतरकर साष्टांग दण्डवत किया और महात्मा का आशिर्वाद मांगा। कहा, ‘‘मै राह बदलकर चला जाउंगा पर जिस कार्य पर जा रहा हूँ उसकी सफलता का आशिष दें।’’ महात्मा केवल मुस्कुराये और परिचय पुछा। राजा ने उत्तर दिया, ‘‘महाराज प्रजा का सेवक हूँ। धर्म के अनुसार राज्यपालन का दायित्व है।’’ महात्मा मुस्कुराये और आशिर्वाद का हाथ उठाकर बोले, ‘‘तभी!’’

राजा मार्ग बदलकर आगे बढ़ा। रथ में साथ विराजमान राजगुरु से बोला, ‘‘इस ‘तभी’ का क्या रहस्य है?’’ राजगुरु ने समझाया, ‘‘अपने आप में तो ‘तभी’ कुछ नहीं कहता पर उसके पूर्व के विधान के साथ जोड़कर देखे तो पता चलेगा। सिपाही हो ‘तभी’। सुभेदार हो ‘तभी’। सबके स्तर के अनुसार उनके व्यवहार पर यह टिप्पणी थी। राजन् महात्मा ने अपने ‘तभी’ से सदाचार पर भाष्य किया है। व्यक्ति का शील ही उसका वास्तविक परिचय है। यह शील उसके व्यवहार में झलकता है। आप राजन् है, विनम्रता और सेवाभाव आपका शील है। ‘तभी’ ! इसको उलटा देखने से भी बड़ी शिक्षा मिलती है। उद्दण्ड व्यवहार है तभी केवल सिपाही हो। ठसन है तभी सुभेदार हो। विनम्रता है पर पूर्ण अधिकार नहीं तभी मंत्री हो।’’ राजा मन ही मन गुनगुनाता रहा ‘तभी’।

हमको भी अपने जीवन का ‘तभी’ समझना होगा। अपने व्यवहार का सदा अवलोकन करते रहना होगा। महात्मा जैसे स्पष्ट बोलनेवाले लोग तो मिलेंगे नहीं पर मन ही मन सभी कहेंगे ‘तभी’। और नियती तो कहेगी ही। हमारे शील से ही हमारे मार्ग प्रशस्त होंगे। हमारा आचरण ही हमारा परिचय है। शास्त्र कहते है, ‘‘आचार प्रभवो धर्मः’’। आचरण से ही धर्म जीवित रहता है। अतः हमारे शील को बनानेवाले हमारे राष्ट्रीय जीवनमूल्य हमारे व्यवहार में उतरेंगे तभी धर्म जागृत रहेगा। हम इस सदाचार के कुछ सूत्रो की चर्चा ही कर सकते है। पूरी सूचि बनाना ना तो व्यावहारिक है ओर ना ही आवश्यक। भारत में जन्मा हर व्यक्ति सुशील होने का मर्म तो जानता ही है। प्रयत्न भी करता है। संगती और तथाकथित आधुनिकता के चक्कर में भूल गया होगा तब भी कुछ संकेत मात्र संचित स्मृति को चलित कर शील को आचरण में लाने के लिये पर्याप्त होंगे।

सदाचार मनसा, वाचा, कर्मणा होता है। अपने विचार, वचन और व्यवहार तीनों में जीवनमूल्य परिलक्षित होने चाहिये। केवल दिखावे का सदाचार (Manners & Etiquette) अपेक्षित नहीं है। प्रशिक्षण से अपनाया बनावटी, दिखावे का व्यवहार तात्कालिक प्रभाव तो ड़ाल सकता है पर हृदय को जीतने की क्षमता तो अंतरमन से सुशील होने पर ही आयेगी।

मानव की एकात्मता का जीवनमूल्य सदाचार में परिलक्षित होता है बड़ों के सम्मान और आदर से, पशु-पक्षी पेड़-पौधों के प्रति अनुकम्पा से। जब हम उनमें भी अपने ही अंग होने की आत्मीयता का अनुभव करते है तब सबके साथ उसी आत्मभाव से व्यवहार भी करते है। राह चलते, बस-रेल में कहीं भी दुसरों की सुविधा का ध्यान रखनेवाला व्यवहार हो जाता है। अनावश्यक फूलों को तोड़ना, सहज ही मसल देना, राह चलते आवारा कुत्ते या बकरी को पीड़ा पहुँचाना ये सब स्वतः ही बन्द हो जाता है। पौधे के पत्ते तोड़ने के लिये बढ़ा हाथ किसी के द्वारा अपने कान उमेठने की वेदना को याद कर स्वतः ही रुक जाता है। अति की भी अपेक्षा नहीं है कि आवारा कुत्ते को ही घर ले आये और माँ को नाराज कर दिया। माँ से भी तो आत्मीयता है ना? उसके भाव को भी तो समझना है। फिर हमारे मन में उठी अनुकम्पा का क्या करें? सभी शहरों में आवारा पशुओं की देखभाल के लिये शासकीय और स्वयंसेवी दोनों प्रकार की व्यवस्था होती है। उसकी जानकारी प्राप्त करें और वहाँ तक सूचना पहुँचाये। पीछे पड़कर व्यवस्था होने तक अनुवर्तन करें। अब इतनी बात पर्याप्त है बाकि जब अपने पांव में ठोकर लगती है तो हम उपचार का मार्ग ढूँढ ही लेते है ना? तो जब यही आत्मीयता का भाव होगा तो उसे व्यवहार में उतारने के नव नवीन रास्ते स्वतः सर्जकता से खोज लेंगे।

आधुनिक जीवन में पर्यावरण से लेकर मनुष्यमात्र को जो सर्वाधिक हानी हो रही है वह ऊर्जा एवं अन्य संसाधनों के व्यर्थ जाया करने से हो रही है। हमारी पूरी जीवनशैली ही बिजली पर निर्भर हो गई है। अब हम इस जीवनचर्या को वापिस पूर्णतः प्राकृतिक मार्ग पर तो नहीं लौटा सकते। किन्तु, अस्तीत्व की एकात्मता के जीवनमूल्य को सदाचार में उतारते हुए इतना तो कर ही सकते है कि ऊर्जा की बचत के लिये हर सम्भव उपाय करें। छोटी छोटी आदतों से यह सम्भव है जैसे कमरा छोड़ते समय लाइट, पंखा बन्द करना, पानी का संयम से उपयोग करना आदि।

त्याग का जीवनमूल्य तो पग पग पर प्रगट होता है। हमने देखा था कि त्याग का कर्मरुप सेवा है। सेवा स्वतःस्फूर्त होनी चाहिये। शील प्रगट होता है पहल में। सामने कार्य देखकर स्वतः ही, बिना किसी के कहे, फुर्ति से हम उठ पड़े। आज्ञापालन तो करना ही चाहिये किन्तु घर आये अतिथि को पानी पिलाने के लिये हर बार माँ या पिताजी को आज्ञा देनी पड़े तो समझना होगा कि कुछ गड़बड़ है। ये तो सेवा के छोटे छोटे अवसर हैं इन्हें तो उत्साहपूर्वक हथियाना चाहिये। इससे पहले की अपने भाई या बहन में से कोई और काम करें, हमें कर लेना चाहिये। सच्चा सेवक तो वही होता है जो दरी बिछाने और उठाने में सहजस्फूर्त उत्साही हो। सेवामें सबसे आगे रहना तो ठीक है पर सुशील व्यक्ति सुविधा में ऐसी प्रतिस्पद्र्धा नहीं करता। वहाँ तो उसका मन्त्र होता ‘मै नहीं तू ही।’ विद्यालय में एकसाथ अवकाश होने पर पानी पीने के लिये झुम्बड़ लगती है। बस में से उतरते समय पता है सब उतरेंगे फिर भी धक्का देते है। सदाचारी छात्र तो पहले दूसरे को अवसर देंगे। स्वतः अनुशासन आ जायेगा।

सेवा में पहले मै और सुविधा में पहले आप।

नवम्बर 25, 2012 Posted by | आलेख | , , , , , , | 3 टिप्पणियाँ

हमारे राष्ट्रीय जीवनमूल्य


गढ़े जीवन अपना अपना -18
एक माँ अपनी युवा बच्ची की शिकायत करती है कि मेरी बेटी मुझसे प्रेम नहीं करती। कारण उपर से बड़ा ही मूर्खतापूर्ण दिखता है, — मदर्स डे पर बेटी ने माँ को कार्ड दिया “I Love You !” पर माँ का कहना है जो कार्ड से बताना पड़े वो प्यार नहीं हो सकता। दूसरी ओर कालेज मे पढ़ने जा रही एक युवती कहती है मेरे पिताजी मुझसे प्रेम नहीं करते। कैसे पता चला– होण्डा की एक्टीवा मांगी थी। पिताजी ने सस्ती छोटी गाड़ी खरीदी। दोनों बातों में तत्व एक ही है। क्या भावों को वस्तुओं से तौला जा सकता है? यह समाज के बदलते सांस्कृतिक मूल्यों का अनिवार्य संघर्ष है जिसे हम पीढ़ियों के भेद (Generation Gap) के रुप में देखते है। माँ सोचती है कि प्रेम जैसे सूक्ष्म भावों की अभिव्यक्ति भौतिक वस्तू के रूप में नहीं हो सकती। ऐसा करने का प्रयास उन भावों का अपमान है। सस्ती गाड़ी से अपने पिता का प्रेम तौलनेवाली बेटी भौतिकवाद की शिकार है। उसके लिये सम्बन्धों की अभिव्यक्ति वस्तुओं से ही होती है। इसमें उसका दोष नहीं है। बचपन से ही जन्मदिन के अवसर पर मिलनेवाले उपहारों से उसने मित्रता को तौलना सीखा। अपने व्यवसाय की व्यस्तता के कारण समय ना दे पाने वाले अभिभावकों को उपहारों से भरपाई करते हुऐ पाया। तो उसको यही समझ आया कि प्यार का अर्थ है मेरे लिये जो अधिक खर्च कर सकें।

समाज का व्यवहार उसके द्वारा पोषित मूल्यों से निर्धारित होता है और मूल्यों का पोषण व्यवहार से ही होता है। भारतीय संस्कृति का विकास सहस्राब्दियों की विकट यात्रा से हुआ है। अनेक आक्रमणों के मध्य भी हमने अपने मूल्यों का पोषण किया है। इन मूल्यों ने ही हमारी रक्षा की है। हमने इन मूल्यों को धर्म के अधिष्ठान में सहजता से प्रवाहित किया। धर्म का अर्थ सामान्यतः उपासना से लिया जाता है। किन्तु भारत मे धर्म प्रत्येक के विकास का सामान्य मार्ग है। हमारी विकास की अवधारणा समुत्कर्ष की है। समुत्कर्ष अर्थात सम्यक, संतुलित उत्कर्ष। भौतिक विकास को अभ्युदय तथा आध्यात्मिक विकास को निःश्रेयस कहा जाता है। अभ्युदय तथा निःश्रेयस के संतुलित विकास को समुत्कर्ष कहते है। इसका मार्ग है -धर्म।

धर्म का पालन कर विकास करने पर मूल्यों का हास सम्भव नहीं है। हमने भौतिक उन्नति को कभी नहीं रोका। हम तो महालक्ष्मी के पूजारी है। आज भी हमारे मंदिरों में धन के भाण्डार भरे हैं। हमारा आग्रह केवल इतना था कि यह धन, सम्पदा धर्म से अर्जित हो। किसी एक की कीमत पर दूसरे कि कमाई तो सच्चे अर्थ में कमाई कहाँ होगी। वह तो एक जेब से पैसा दूसरे जेब में ड़ालने जैसी बात है। आज विश्व के सम्मूख यही समस्या है। हमने पर्यावरण की, मानवीय सम्बन्धों की कीमत पर ऐश्वर्य तो बना लिया पर मानव सुखी नहीं हो पाया। अतः आज विश्व की मानवता की रक्षा के लिये भारतीय जीवनमूल्यों की रक्षा अत्यावश्यक है। ये मूल्य कालाबाधित नहीं है। समय के साथ इनको युगानुकुल व्यवस्था में ढ़ाला जा सकता है और इसी अर्थ में ये सार्वकालीक हैं। आईये इनमें से कुछ राष्ट्रीय जीवनमूल्यों को सूचिबद्ध करने का प्रयास करते है।

एकात्म मानव :- समाज में व्यवहार करते समय यह द्वंद्व सदैव रहा है -व्यक्ति का स्वातन्त्र्य अधिक महत्वपूर्ण होगा या समाज का हित। भारतीय संस्कृति व्यक्ति को एकात्म स्वरूप में देखती है अतः व्यक्ति-परिवार-समाज इन सब को पृथक पृथक ना देखते हुए मावन का ही विस्तारित रुप देखा जाता है। जब परिवार मेरी ही विकसित अभिव्यक्ति है तब उसके लिये किया गया त्याग मुझे हर्ष देगा। ऐसे ही समाज-राष्ट्र-मानवता-सृष्टि इन विकसित रुपों का भी मुझसे जो एकात्म है वह मेरे देनिक व्यवहार का अंग बनना चाहिये। इसी में से प्राणियों को प्रतिदिन ग्रास देना, वनस्पति को जल ऐसी परम्पराओं का निर्माण हुआ। अतिथि को भोजन कराना गुहस्थ का धर्म माना गया। यह सब एकात्म मावन के जीवनादर्श के व्यावहारिक प्रगटन से उपजे जीवनमूल्य है। सरस्वती सभ्यता के पुरातत्व अवशेषों से प्रारम्भ कर आजतक इन परम्पराओं का सातत्य देखा जा सकता है। इसी क्रम का अंतीम चरण परमेष्टि भी मेरा ही विकसित स्वरुप है और उसका साक्षत्कार भी इसी जीवन का आदर्श है। अतः प्रतिदिन ध्यान पूजा का भी महत्व है।

त्याग :- स्वामी विवेकानन्द त्याग और सेवा को भारत के राष्ट्रीय आदर्श मानते थे। उनके अनुसार जब जब हमने इन आदर्शों को दुर्लक्षित किया तब तब हमारी संस्कृति का पतन हुआ। आज भी हम समाज में त्याग को ही प्रतिष्ठा प्रदान करते है। भोग का अधिकार ही त्याग द्वारा प्राप्त होता है यह हमारा आदर्श है। जिसका त्याग जितना बड़ा होगा समाज में उसका सम्मान उतना ही अधिक होगा। त्याग का प्रगटीकरण जब धन के रूप में होता है तो वह दान होता है। शास्त्रों के अनुसार दान से ही आय का अर्जन शुद्ध होता है। अतः आय का छठा हिस्सा दान करने की आज्ञा शास्त्र देते है। त्याग का कर्म रुप में प्रगटीकरण है सेवा। प्रत्यक्ष सेवा से प्राप्त निर्मलता का वर्णन नहीं किया जा सकता। यह तो अनुभव करने से ही सम्भव है। एक छोटे से प्रत्यक्ष सेवा कार्य से जो आनन्द अनुभव होता है वह करोड़ों की प्राप्ति अथवा विश्वविजय से भी नहीं हो सकता।

सौन्दर्य बोध :- शरीर को भोग का आधार माननेवाले समाज में शारीरिक सौन्दर्य के बाह्य स्वरुप को अधिक महत्व दिया जाता है। प्रसाधन जीवन में अनावश्यक वर्चस्व पा जाते हैं। जैसा वर्तमान में पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव में हमारे शहरों में हो रहा है। अपने शरीर को निर्मल रखने के स्थान पर पसीने की बदबु को छिपाने के लिये बदबुनाशकों (Deodorant)  का प्रचार हो रहा है। और विज्ञापनों में उनके प्रयोग का उद्देश्य भी केवल यौनाकर्षण को ही दर्शाया जा रहा है। भारत में हम सौन्दर्य के आंतरिक रुप को महत्व देते है। शरीर भी धर्म का साधन माना जाता है इस कारण उसके अन्दर से निर्मल होने को महत्व दिया जाता है। सौन्दर्य का बोध भी इसी निर्मलता से जुड़ा होता है अतः प्रसाधन शास्त्र भी आंतरिक शुद्धता के उपाय को बताते है। यह उपाय अधिक स्थायी सौन्दर्य प्रदान करते है। दिखावे को महत्व ना होने के कारण वेषभूषा भी अंगप्रदर्शन करनेवाली ना होकर अंगों के प्रमाणबद्ध होने को ठीक से प्रदर्शित करनेवाली होती है। सम्बन्धों का भी प्रगटतः दिखावा नहीं किया जाता। प्रेम जेसे नाजुक भावों को एकान्त में ही प्रगट किया जाता है। सार्वजनीक दिखावे से सम्बन्ध भी प्रदर्शन की वस्तु बन जाते है और छोटे से झटके से ही टूट जाते है।

सम्बन्ध :- भारतीय संस्कृति सम्बन्धों की संस्कृति है। हम अजनबी से भी सम्बन्ध स्थापित कर लेते है। सड़क चलते हुए भी किसी को संबोधित करने में भैया, मौसी, ताउ ऐसे सम्बन्धो का ही प्रयोग करते है। पूरा गाँव सम्बन्धों से जुड़ा होता है। प्रकृति से भी हम सम्बन्ध जोड़ लेते है और गंगा मैया बन जाती है तो चन्दा मामा। यह सम्बन्ध ही मानवीय एकात्मता की कूँजी है। सम्बन्धों का निर्वाह यदि समाज में होता रहे तो धर्म सदा जीवित रहेगा।

विविधता :- भारत ही एकमात्र देश है जहाँ विविधता का केवल सम्मान ही नहीं होता समारोह होता है। एक अन्दरुनी तत्व का प्रगटीकरण विविधता से ही होता है इस नैसर्गिक नियम को भारत में ठीक से समझा गया। अतः हमने वेषभूषा, भोजन जैसे सामान्य व्यवहार से लेकर उपासना की पद्धति जैसे धार्मिक विषयों में भी विविधता को प्रोत्साहित किया है। हमने कही भी एकरुपता का आग्रह नहीं किया। योग जैसी वैज्ञानिक विधा में भी यह अभिव्यक्ति स्वातन्त्र्य भारत में दिया गया है। आज सूर्यनमस्कार के 6 प्रकार भारत में प्रचलित हैं। कला में भी हमने एकरुपता का आग्रह नही किया। श्रेष्ठता का मापदण्ड सामान्यीकरण (Generalization) ना होकर मौलिकता रहा। अतः चंदेरी, बनारसी अथवा कांजिवरम् की साडियों को बनाने वाले कारीगरों को नकल की जगह मौलिक नाविन्य का प्रशिक्षण दिया जाता है। उस कलाकार को श्रेष्ठ माना जायेगा जो नया प्रारुप (Design) तैयार करें। जिसमें कला अधिक ना हो उसको पूराने प्रारुप दोहराने की मजदूरी पर लगाया जाता है। आज भी यह परम्परा जीवित है। उपासना पद्धति में विविधता के सम्मान ने इस देश में सहजीवन व सर्वपंथसमभाव का अनुकरणीय आदर्श प्रस्तुत किया है। कट्टरता के कारण फैले आतंकवाद के स्थायी समाधान हेतु विश्व को यह जीवनमूल्य अपनाना अनिवार्य है।

निर्भयता :- स्वामी विवेकानन्द कहते है हमारे उपनिषदों में एक शब्द बार बार आता है अभिः अभिः – ड़रो मत। माताये बच्चों को निर्भयता से जीने की शिक्षा दे तब समाज वीर होगा। सबसे बड़ा भय तो मृत्यु का ही होता है ना, हम तो बचपन से जानते है कि आत्मा अमर है। केवल इसे व्यवहार में उतारने की आवश्यकता है। यह अन्य सभी जीवमूल्यों की नीव है। हम अपने जीवन में मूल्यों से समझौता भय के कारण ही करते है। असफलता का भय, पिछड़ने का भय, अस्तीत्व का भय, प्रतिष्ठा का भय इन्हीं के कारण हम जीवन में मूल्यों को छोड़ने की भूल करते है। यदि भय को जीत ले तो फिर मूल्याधारित जीवन जीना सहज ही हो जाता है।

इन जीवनमूल्यों ने काल के कठीन प्रवाह में भारतीय संस्कृति को जीवित रखने का कार्य किया। हमारे पूर्वजों ने प्राणों पर खेलकर इन जीवनमूल्यों की रक्षा की। बड़े बड़े साम्राज्य तहस नहस हो गये पर भारत केवल जीवित ही नहीं विजय पथ पर अग्रेसर हो रहा है। आज सारा विश्व इन जीवनमूल्यों को अपनाने को लालायित है। केवल हमें अपने सामूहिक प्रयास से इनकी पूनस्र्थापना कर प्रतिष्ठा प्रदान करनी है।

अगस्त 31, 2012 Posted by | आलेख | टिप्पणी करे

जीवनमूल्य – जो हमें मूल्यवान बनायें।


गढ़े जीवन अपना अपना -18
किसी भी नोट पर उसका मूल्य लिखा होता है। किन्तु वह मूल्य रिजर्व बैंक के गवर्नर के आश्वासन का मूल्य होता है ना कि नोट के कागज और छपाई आदि का। अर्थात जिस देश का नोट है उसमें तो उसका वहीं मूल्य होगा पर उस देश के बाहर जाते ही उस कागज का मूल्य कुछ भी नहीं रहेगा क्योंकि उस नोट का मूल्य उसका अपना नहीं है, राज्य की सत्ता द्वारा प्रदत्त मूल्य ही वह कागज का टुकड़ा धारण करता है। उसी प्रकार मनुष्य भी अपने स्थान, परिवार, व्यवसाय, पद आदि के कारण जो महत्व पाता है वह भी उसका स्वयं का मूल्य नहीं होता अपितु उस उस उपाधि के द्वारा मनुष्य पर भावित मूल्य होता है। ऐसे उपाधि मूल्य (Face Value) की अवधि (Expiry) उपाधि के साथ ही समाप्त होती है। जैसे जिले के जिलाधीश (Collector) को मिलने वाला मान-सम्मान पद के होने तक ही होता है। पद के छूट जाने के बाद वह सम्मान नहीं मिलेगा। हृदयरोगियों के बारे में किये आधुनिक अनुसंधानों में पाया गया है कि सेवानिवृत्ति के प्रश्चात के 1-2 सप्ताह में हृदयाघात के प्रकरण अधिक होते है। कारणों की मिमांसा में दो प्रमुख कारण पाये गये – 1. अचानक कार्यनिवृत्ति के कारण आये खालीपन से उत्पन्न निरर्थकता का भाव तथा 2. पदविहीन होने से लोगों के व्यवहार में आये परिवर्तन का झटका (Shock)  जो अधिकारी प्रतिदिन सम्मान का आदी हो जाता है उसे अचानक खाली हो जाने से सम्मान मिलना बन्द हो जाता है जिसको सहन करना कठीन हो जाता है। यह स्थिति उपाधि मूल्य के नष्ट हो जाने से इस कारण होती है क्योंकि हम अपने वास्तविक मूल्य का ध्यान नहीं देते।

हमारा वास्तविक मूल्य हमारा आंतरिक मूल्य (Intrinsic Value) होता है जो हमारे चरित्र का प्रभाव होता है। जिस प्रकार सिक्के में धातु का मूल्य होता है वह उसका आंतरिक मूल्य होता है। वर्तमान में जो एक रूपये का सिक्का है उसके धातु का मूल्य 1 रूपये से अधिक है इस कारण कई शहरों में ऐसे गिरोह कार्य कर रहे हैं जो इन सिक्कों को गलाकर इनमें से प्राप्त होने वाली मूल्यवान धातु को बेंचने का धंदा करते हैं। यह ऐसा उदाहरण है जहाँ उपाधि मूल्य से आंतरिक मूल्य अधिक है। मनुष्य का भी आंतरिक मूल्य ही महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि वह परिस्थिति, पद, सम्बंद्ध ऐसे परिवर्तनीय कारकों पर निर्भर नहीं होता। चाहे बाह्य कारक पूर्णतः बदल जाय फिर भी जो आंतरिक चरित्र है उसका मूल्य वैसे ही बना रहेगा। इसी आधार पर कठीन परिस्थितियों में भी वीर अपने लक्ष्य की प्राप्ति कर ही लेते है। स्वामी विवेकानन्द जब अमेरिका में गये तब उनका परिचय पत्र, सामान सब चोरी हो गया। पराये देश में कोई एक भी परिचित व्यक्ति नहीं जहाँ जाना है वहाँ का पता नहीं। अर्थात उपाधि मूल्य कुछ भी नहीं। ऐसे समय उनका साथ दिया उनके आंतरिक मूल्य नें उनके चरित्र ने, ज्ञान ने। इस असम्भव स्थिति में भी पूर्ण श्रद्धा के साथ उन्होंने अपने लक्ष्य को प्राप्त किया।

बोस्टन में, शिकागो में जिन लोगों से उनका परिचय हुआ वे सब उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रहें। जिस घर में वे रहते थे, वहाँ की गृहस्वामीनी अपनी सहेलियों की चाय पार्टी में स्वामीजी को एक अजूबे के रूप में, मसखरे के रूप में प्रस्तुत करती थी। पर उनकी बातों में भरा जीवन का ज्ञान इस विडम्बना और अपमान को पार कर फैलता गया। फिर उन महिलाओं के परिवारों के प्रबुद्ध सदस्य आकर्षित हेाते गये और स्वामी विवेकानन्द की ख्याति सुरभी की भाँति सर्वत्र फैल गई। विद्वानों ने उन्हे परिचय और सन्दर्भ देकर शिकागो भेजा। प्रोफेसर राइट ने धर्मसभा के आयोजक फादर बैरोज को पत्र लिखा। यह सब आंतरिक मूल्य का परिणाम थे।

हम अपने जीवन में सतत अपने आंतरिक मूल्य को बढ़ाते रहे ताकि उपाधि मूल्य पर हमारे जीवनलक्ष्य की प्राप्ति निर्भर ना हो। अभितक इस श्रृंखला में हमने जो भी जीवननिर्माणकारी बातों की चर्चा की हे वे सारी ही आंतरिक मूल्यवृद्धि में सहायक है। हमारा मूल्य कैसे निर्धारित होगा? दूसरों के मूल्यांकन से ना तो हमारा मूल्य घटता है ना बढ़ता है। सारी बात हमारे अपने जीवन में हम किन बातों को वरीयता देते है इस पर निर्भर हैं। हम जीवन में जिन बातों को मूल्य देंगे वे तय करेंगी की हमारा आंतरिक मूल्य क्या है? अतः हमारे जीवनमूल्य हमारा मूल्य निर्धारित करते है। कोई व्यक्ति पैसे को इतना मूल्यवान समझता हे कि उसके लिये सबकुछ कर सकता है। अब उसके जीवनमूल्य इस बात से प्रभावित होंगे। उसका व्यवहार व दिनचर्या, आदते, मित्र, सम्बन्ध सब इसी से निर्धारित होंगे। कोई अपनी कलासाधना को सर्वाधिक मूल्य प्रदान करता है और उसके लिये कुछ भी त्यागने को तैयार हो सकता है और ऐसे भी उदाहरण है जिन्होंने देशकार्य में समर्पित होने के लिये अपनेकला जीवन को तिलांजली दी। हम जीवन में जिन बातों को मूल्यवान समझते है उनके लिये त्याग करते है। कुछ चीजों को धारण करते हे कुछ को छोड़ देते है। इस प्रकार की छटनी से हमारे जीवन की अपनी शैली विकसित होती है। यह शैली ही हमारे जीवनमूल्य तय करती है। अर्थात ये प्रक्रिया परस्पर पूरक है।

यह केवल व्यक्तिगत स्तर पर ही नहीं होता अपितु सामूहिक भी होता है। समाज अपनी जीवन दृष्टि के अनुसार वरीयतायें निश्चित करता है और इस आधार पर ही उन बातों का भी निर्धारण होता है जिनको सर्वाधिक मूल्य प्रदान करना है। जैसे विश्वविद्यालय के शिक्षकों के समूह में ज्ञान व अनुसंधान को अधिक मूल्य होगा तो सेना के अधिकारियों के क्लब में मान वीरता को दिया जायेगा फिर ज्ञान कुछ कम ही क्यों ना हो। पर कई बार यह इतना स्पष्टरुपेण विभाजित नहीं होता। जैसे जब समाज में सब ओर पैसे का ही बोलबाला हो और संपदा के आधार पर ही प्रतिष्ठा भी मिलती हो ता फिर शिक्षको की चर्चा में भी पगार और बैंकों के ब्याजदरों की बाते प्रमुख स्थान लेने लगती है। पूरे देश की जीवनशैली उसके द्वारा विकसित एवं प्रचलित जीवनमूल्यों पर निर्भर होती है।

स्वामी विवेकानन्द कहते है प्रत्येक देश का अपना स्वभाव होता है। उसी के अनुसार जीवन जीने से उसका पूर्ण विकास सम्भव है। भारत का प्राणतत्व है-धर्म! उसी के अनुरूप जीवनमूल्यों को प्रतिष्ठित करने से ही भारत अपने जीवनध्येय को प्राप्त कर सकेगा। क्या है हमारे राष्ट्रीय जीवनादर्श और उनपर आधारित जीवनमूल्य? देखते है अगली बार!

जुलाई 21, 2012 Posted by | आलेख | , , , , , | 4 टिप्पणियाँ

गढ़े जीवन अब तक . . .


पिछले 17 लेखों में हम जीवन गठन की प्रक्रिया को देख रहे है। आगे बढ़ने से पहले एक बार अब तक की बातों की एक झलक देख ले।
प्रत्येक का जीवन उसका अपना है, अद्वितीय है फिर भी सब आपस में जुड़े है, एक ही जीवनरस से पोषित है। अतः सबका आपसी सम्बन्ध, अवलम्बन व निर्भरता को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक को अपना कार्य, भुमिका व ध्येय चुनना होता है। प्रकृति के इन नियमों के अनुसार ही जीवन जीना वैज्ञानिक विधि है। जीवनध्येय अपने जीवन के उद्देश्य के अनुरूप तो होना ही चाहिये साथ ही समष्टि में अपनी भुमिका के लिये भी उपयुक्त हो। यह जीवन ध्येय ही अपनी आजीविका ;ब्ंतममतद्ध अर्थात भौतिक जीवन लक्ष्य को तय करने में मुख्य कारक होता है। जब जीवन ध्येय तय होता है वही जीवन की दिशा भी तय करता है।
इस ध्येय को पाने के लिये अपने चरित्र का गठन करना अगला कार्य है। चरित्र गठन के आंतरिक व बाह्य आयाम होते है। आंतरिक आयाम अंतःकरण से जुड़े होते है तो बाह्य आयाम शारीरिक क्षमता से। चरित्र गठन के आंतरिक साधन हैं – प्रेरणा, वीरता, धैर्य व विवेक। प्रेरणा में असम्भव को सम्भव बनाने की क्षमता होती है। चुनौति को स्वीकार करने की ताकद ही वीरता है। प्रतिकूल परिस्थिति में भी मन को स्थिर रखने की अत्यन्त कठीन साधना धैर्य से ही सम्भव है। निर्णय लेते समय उपलब्ध विकल्पों में से सही चुनाव करना विवेक का काम है। इन चारों आंतरिक आयामों का संतुलित विकास चरित्र गठन का महत्वपूर्ण अंग है। प्रेरणा, वीरता, धैर्य व विवेक को एकत्रित रूप से श्रद्धा कहा जा सकता है। स्वामी विवेकानन्द युवाओं में नचिकेता सी श्रद्धा का आहवान करते है। हमने नचिकेता के जीवन के उदाहरणों से ही समझा कि श्रद्धा का विकास कैसे कर सकते है? नियमित आत्मावलोकन, सभी प्रकार की परिस्थिति में उत्साह तथा मन को विस्तारित करनेवाला वैराग्य श्रद्धा को दृढ़ करने के साधन हैं।
चरित्र गठन के बाह्य आयाम शारीरिक लगते हे किन्तु वास्तव में ये पूर्ण व्यक्तित्व की ही अभिव्यक्ति करते हैं। बल में केवल शक्ति ही नहीं तो साथ में तितिक्षा व चापल्य भी आवश्यक है। बल के साथ ही बाह्य आयामों में रूप भी महत्वपूर्ण है। शुद्धि के साथ अनुशासन से ही व्यक्तित्व में आकर्षण उत्पन्न होता है। यह आकर्षण ही रूप का निखार है। स्वास्थ्य को केवल बिमारी से बचाव नहीं माना जाना चाहिये। स्वस्थ होने के लिये सकारात्मक चिंतन भी आवश्यक है। चरित्र का चैथा बाह्य आयाम है कौशल। स्वावलम्बन, यन्त्र तथा कला का कौशल विकसित करना एक सुगठित चरित्र के लिये अनवार्य है। बल, रूप, स्वास्थ्य व कौशल इन चारों के विकास के लिये अभ्यास ही एकमात्र साधन है। योगाचार्य पतंजली दीर्घकाल तक निरन्तरता से सेवाभाव से किये कार्य को अभ्यास कहते है। हमने अपनी लेखमाला में देखा कि अभ्यास एकाग्रता का करना है और पूर्ण अनुशासन व अखण्ड सातत्य के साथ करना है।
जीवन गठन की साधना में ओर भी पाड़ाव बाकि है किन्तु चरित्र गठन के इन आंतरिक व बाह्य आयामों को एक प्रवाह चित्र के रूप में एकत्र देख लेते है।

अप्रैल 18, 2012 Posted by | आलेख | , , , | 3 टिप्पणियाँ

रीसेट मत कर देना!


गढ़े जीवन अपना अपना -17

जर्मन साधक बड़ी श्रद्धा से जप कर रहा था। गंगाजी का किनारा, सामने विशाल हिमालय के उत्तुंग शिखर! उत्तरकाशी में गंगाजी मुड़कर उत्तरवाहिनी हो जाती है। कहते है उसके किनारे जप करने से त्वरित सिद्धि हो जाती है। अपने जर्मन साधक का विश्वास तो और भी अधिक दृढ़ था। उसके गुरू ने उसको बताया था कि यदि वो मन्त्र का सवा लाख जप कर देगा तो रामजी उसे अवश्य दर्शन देंगे। उसके हाथमें अणु गणक (Electronic Counter) था। एक छोटासा यन्त्र जिसपर दो खटके (Buttons) थे। एक गणना के लिये। एक बार मन्त्र का पाठ करने पर इस बटन को दबाने से गणना आगे बढ़ती थी। दूसरा बटन था- पुनरारम्भ (Reset) का जिसको दबाने से गणक फिर शून्य पर आ जाता था। अर्थात सारी गणना फिर प्रारम्भ होगी। वो अपने देश जर्मनी से भारत कई बार आया था, शांति की खोज में। गत वर्ष गुरूजी मिले और फिर यही रह गया। एक दिन बड़ी हिम्मत करके उसने गुरूजी से पूछा, ‘‘क्या मै रामजी के दर्शन कर सकता हूँ?’’ गुरूजी ने तुरन्त उत्तर नहीं दिया। कहा रामजी से पूछकर बताता हूँ। फिर एक दिन बाद बताया कि सवा लाख जप करोगे तो रामजी दर्शन दे देंगे। तो श्रद्धा से साधक बैठ गया जप करने। सामने एक परदा लगा दिया ताकि रामजी उसपर प्रगट हो सके। जप बड़ी श्रद्धा से चल रहा था। बीच बीच में गणक देख लेता।

जप 1 लाख के पार हुआ। पर रामजी का कोई चिह्न नहीं- ना पैर ना मुगुट। थोड़ा सा विचलित हुआ। सोचा कही कुछ गड़बड़ तो नहीं हो गयी? फिर भी एकदम श्रद्धा तो नहीं टूटी इसलिये लगा रहा। पर जब केवल 1000 ही मन्त्र बाकि रहे तब तो लगा मामला निश्चित ही गड़बड़ है और उठ गया। गुरुजी के पास जाकर आवेश में कहने लगा, ‘‘आप गलत कहते है। आपने कहा था जप करने से रामजी दर्शन देंगे पर ऐसा नहीं हुआ। मैने श्रद्धा से जप किया पर दर्शन नहीं हुए।’’ गुरुजी ने आश्चर्य से कहा, ‘‘ऐसा नहीं हो सकता। स्वयं रामजी ने कहा था यदि सवा लाख जप कर लिया तो वे दर्शन अवश्य देंगे। तुमको विश्वास है तुम्हारी मालाओं की गिनती ठीक थी कहीं जप अधुरा तो नहीं रह गया।’’ शिष्य ने कहा, ‘‘त्रुटी की कोई सम्भावना ही नहीं है, अणु गणक है, श्रेष्ठतम (Perfect) है।’’ गुरुजी ने कहा, ‘‘दिखाओ!’’ उसने देते हुए ही स्पष्ट किया, ‘‘अभी 1 लाख 24 हजार हुए है। 1 हजार बाकि ही है पर रामजी का तो एक भी अंग प्रगट नहीं हुआ। मेरा परदा कोरा (Blank) ही है।’’ गुरुजी जोर जोर से हँसने लगे, ‘‘वाकई तुम्हारा परदा तो कोरा ही है। अरे पगले! रामजी प्रत्यक्ष दर्शन देंगे जैसे हम तुम्हे दिख रहे है। इससे भी अधिक प्राणवान। कोई परदा नहीं चाहिये और सवा लाख पूरा होने पर ही दर्शन होंगे। 1 लाख 24 हजार 9 सौ 99 से भी नहीं होगा।’’ जर्मन साधक ने कहा, ‘‘ठीक है! 1000 ही बचे है अभी घण्टे भर में कर लूँगा।’’ गुरुजी ने मुस्कुराते हुए रीसेट का बटन दबा दिया और कहा, ‘‘ऐसे नहीं होता। एक भी व्यवधान का अर्थ है गणना का शून्य होना। अब फिर सवालाख पूरा करना होगा।’’

अभ्यास में सातत्य का यही महत्व है। निरन्तर अभ्यास ही प्रभावी होता है। हम सब अपने जीवन में कुछ पाने की आकांक्षा से संकल्प लेकर बड़ी श्रद्धा से प्रयास करते है पर गड़बड़ यही हो जाती है सातत्य नहीं बना पाते। कुछ ना कुछ बहाना बन जाता है और हम नियम तोड़ देते है। गणना शून्य हो जाती है साधना रीसेट हो जाती है। अतः सातत्य का बड़ा महत्व है। लगातार करने से ही अभ्यास सिद्ध होता है। हम अपने घर में ही देख सकते है, हमारी माँ प्रतिदिन नियम से कुछ काम करती ही है। साधारण से कार्य है जैसे तुलसी को पानी ड़ालना, श्याम को दियाबाती करना, ज्यादा समय या श्रम नहीं लगता। पर हाँ! ध्यान रखना तो पड़ता ही है। और इसी से एकाग्रता और अनुशासन आता है। सातत्य से करने से अभ्यास सिद्ध हो जाता है। इसिलिये हम पाते है साधारण गृहिणी में भी अद्भूत ईच्छाशक्ति होती है। पन्नाधाय और इमरता देवी जैसे असाधारण त्याग को भी वो सहजता से कर लेती है।

राजस्थान में जोधपुर के पास स्थान है खेजड़ी। वहाँ की एक साधारण ग्रामीण महिला ने पर्यावरण की रक्षा के लिये बलिदान कर दिया। जब राजा के सैनिक पेड़ काटने आये तो इमरता देवी एक पेड़ से चिपक गई। ‘सिर कटे तो कटै पर रूख ना कटै।’’ वृक्ष की कीमत हमारी जान से भी बढ़कर है। 300 महिलाये इमरता देवी के बलिदान से प्ररित होकर खेजड़ी के वृक्षों से चिपक गई। राजा को हारना पड़ा वृक्ष बच गयें। आज वहाँ इमरता देवी के सम्मान में उद्यान बना है। विष्नोइयों के 29 नियमों का सातत्य से पालन करने से एक सामान्य अनपढ़ महिला में पर्यावरण की रक्षा के लिये आत्मबलिदान करने का साहस पैदा हो गया।

हम अपने जीवन में प्रतिदिन करने के लिये छोटे छोटे कुछ नियम बना लें। और फिर पूर्ण श्रद्धासे उनका पालन करें। हमारा साहस ही हमारा सम्बल बनेगा। जब आलस से नियम टूटने लगे तो अपने आप को याद दिलाये कि कितने दिनों, महिनों या वर्षोंसे बिना एक दिन का भी विराम लिये हम इस कार्य को कर रहे है। तो फिर मन कहेगा आज एक दिन ना करने से इतनी बड़ी गणना शून्य हो जायेगी। और यह बात हमे नियम तोड़ने से परावृत्त करेगी। जब कांचिकामकोटी पीठ के शंकराचार्य को झूठे आरोपों में बंदी बना लिया तो वहाँ के चन्द्रमौलीश्वर की संध्यापूजा में खण्ड पडा। 1200 वर्षोंसे निरन्तर चल रही पूजा में विराम आ गया। अब आज फिर से प्रारम्भ परम्परा तो मात्र 6 साल पूरानी है।

कहते है कि 12 साल लगातार बिना एक भी खण्ड के अभ्यास करने पर एक तप सिद्ध होता है। एक मनुष्य को अपने जीवन में कम से कम 12 तप करने अपेक्षित है। अब प्रश्न आयेगा 144 वर्ष तो आयु ही नहीं है फिर ये कैसे सम्भव है? सरल सी बात है एक बार में एक तप ही करना थोड़े ही आवश्यक है। एकसाथ छोटे- छाटे 6-7 नियम बना सकते है। आचार्य तुलसी इसे अणुव्रत साधना कहते थे। पर याद रहे अभ्यास रीसेट ना हो जाय!

अप्रैल 11, 2012 Posted by | आलेख | , , , , | 11 टिप्पणियाँ

अभ्यास भैया अभ्यास!


गढ़े जीवन अपना अपना -16
आधी रात का समय था। हस्तिनापुर के प्रासाद में सब ओर शांति थी। अर्जुन को लघुशंका के लिये जाना पड़ा। हाथ में मशाल लिये अर्जुन जब मैदान से लौट रहा था तो उसे भोजनालय में से कुछ खटपट की आवाज आई। जब जाकर के देखा तो भीम महाराज थाली में चावल का पहाड़ रचकर खा रहे थे। अर्जुन को देखकर सहम गये और अपनी सफाई देने लगे, ‘‘क्या है ना आप सब भाई थोड़ा थोड़ा खाकर अपना भोजन समाप्त कर देते हो। तो आपके साथ मुझे भी रुकना पड़ता है। पर पेट तो खाली ही रहता है। लज्जा के मारे मै भी उठ जाता हूँ। पर रात को इतनी भूख लगती है कि यहाँ आकर जो मिलता है वो खा लेता हूँ। अब माता कुंति को पता है तो वो मेरे लिये कुछ ज्यादा ही बचाकर रखती है। देखो बाकी लोगों को मत बताना। सब हसेंगे।’’ अर्जुन ने कहा, ‘‘मै आपकी समस्या समझ सकता हूँ। मै किसी को नहीं बताउंगा। पर मुझे एक प्रश्न है अंधेरे में आप खा कैसे लेते हो? हाथ सीधा मूह तक कैसे पहूँच जाता है? इधर उधर क्यों नहीं जाता?’’ भीम खिलखिलाकर हँस पड़े, ‘‘अभ्यास भैया अभ्यास! आचार्य बताते है ना सब कुशलता अभ्यास से ही आयेगी। तुम धनुर्विद्या का अभ्यास करते हो मै खादविद्या का।’’ अर्जुन को मन्त्र मिल गया – ‘अभ्यास भैया अभ्यास!’ और उसने रात को धनुर्विद्या का अभ्यास करना प्रारम्भ किया और अन्धेरे में भी निशाना लगाने में निष्णात हो गया।

केवल कुशलता ही नहीं व्यक्तित्व के सारे बाह्य आयाम बल, रुप, स्वास्थ व कौशल सभी अभ्यास के द्वारा ही विकसित किये जा सकते है। अभ्यास को योग में भी वैराग्य के साथ सबसे अधिक महत्व का साधन माना गया है। महर्षि पतंजलि अभ्यास की व्याख्या करते है ‘‘स तु दीर्घकाल नैरन्तर्य सत्कारसेवितो दृढ़भुमि।’’ हम बहुत अधिक तकनिकी चर्चा नहीं करेंगे। हमारे व्यावहारिक प्रयोग के लिये अभ्यास के तीन अंगों का समझना पर्याप्त है। अभ्यास किसका करना है – एकाग्रता का। कैसे करना है अनुशासन से करना है। और कब करना है सातत्य से करना है दीर्घकाल तक। स्वामी विवेकानन्द के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के पास असीम शक्ति है। किन्तु कौन व्यक्ति कितनी शक्ति का अपने जीवन में लक्ष्य प्राप्ति की ओर प्रयोग कर पाता है ये इस बात पर निर्भर करता है कि किसके पास कितनी एकाग्र होने की क्षमता है। एकाग्रता की क्षमता प्रत्येक में होती है। अभ्यास से उसको बढ़ाया भी जा सकता है और अधिक प्रभावी भी बनाया सकता है। मन में प्रचण्ड ताकद है पर वह बिखरी हुई होने के कारण चरित्र के विकास में साधक नहीं हो सकती। यदि हम इस मन को एकाग्र होने का प्रशिक्षण प्रदान करते है तो यह मन की शक्ति दृढ़भूमि बनकर ईच्छाशक्ति बन जाती है।

आसन, प्राणायाम या सूर्यनमस्कार योग के इन सभी अभ्यासों में मूलतः मन को एकाग्र करने का ही अभ्यास होता है। त्राटक जैसे विशेष शुद्धिक्रिया भी सीख सकते है जो सीधे मन की एकाग्रता को बढ़ाती है। इन सब को सूयोग्य प्रशिक्षित शिक्षकों के मार्गदर्शन में सीखकर बाद में ही किया जा सकता है। धारणा-ध्यान आदि आंतरिक योग के साधन एकाग्रता में प्रशिक्षित होने के बाद ही सम्भव हो पाते है। पर एकाग्रता को अपने व्यक्तित्व का अंग बनाने का सबसे सरल मार्ग है खेल। मैदानी खेलों में मन की एकाग्रता का सहज और आनन्द के साथ विकास होता है। इसलिये पढ़ाई में भी यदि सबसे आगे बढ़ना हे तो खेल का अभ्यास प्रारम्भ कर दो। हाँ नियमितता से अभ्यास।

ये नियमितता भी तो अभ्यास से ही आती है। अनुशासन के अभ्यास से। अनुशासन अर्थात स्वयं का स्वयं पर शासन। जो व्यक्ति किसी और के अधीन नहीं रहना चाहता है उसे अनुशासित होना होगा। अनुशासन स्वयं के प्रति सम्मान का प्रगटीकरण है। जो खुद से प्यार करता है वह अपने जीवन को सहज ही अनुशासित कर लेता है। अनुशासित व्यक्ति अपने आप में बड़ा ही स्वतन्त्र हो जाता है। युवाओं के मन में ये बहुत बड़ी गलतफहमी होती है कि अनुशासनहीन होने में आनन्द है। वास्तव में यदि आप समय और शरीर को अनुशासित कर सकें तो आप पायेंगे की आपके पास जो चाहे वो करने के लिये पर्याप्त समय भी होता है, सामथ्र्य भी और विकल्प चूनने की स्वतन्त्रता भी। अनुशासित छात्र पढ़ाई नियमित करता है तो बकाया (Pending) काम कुछ भी ना रहने से कम समय में ही मुक्त हो जाता है और फिर परीक्षा के मध्य भी अपनी रूचि के अनुसार खेल अथवा मनोरंजन के लिये समय निकाल लेता है।

समयपालन, आज्ञापालन और सुव्यवस्था ये अनुशासन के अभ्यास के तीन मार्ग हैं। हम स्वयं तय करके समयपालन करें यह अपने जीवन का सम्मान है। यदि हम किसी से समय तय करें तो उसका कड़ाई से पालन करें स्वयं के गठन के लिये। कहते है नेपोलियन ने महत्वपूर्ण मन्त्रणा के लिये रखे भोज में सेनापति को देरी होने पर अकेले ही भोजन कर लिया और बादमें भूखे पेट ही मन्त्रणा प्रारम्भ कर दी। किसी के यह कहने पर कि 20 सेकण्ड ही तो देरी हुई थी उत्तर दिया कि ‘‘रणभूमि में 20 सेकण्ड का अन्तर जीवन और मृत्यु के मध्य का अन्तर होगा। और इससे भी अधिक महत्व की बात है कि यह विजय और पराजय के बीच का भी अन्तर होगा।मै विजय की आदत डालना चाहता हूँ। उसका प्रारम्भ समयपालन की आदत से होता है।’’

आज्ञापालन मन को अनुशासित करता है और बल, रूप स्वास्थ्य और कुशलता में यह अनिवार्य है। आज्ञा के रुप में मन के विरूद्ध बात को भी किया जाता है तब उसे आज्ञापालन कहते है। यदि पहलवान मन की माने और शरीर को कष्ट देनेवाले व्यायाम से कतराये ते कैसे बलवान् होगा। पर यदि वह प्रशिक्षक की आज्ञा का पालन कर मन की कमजोरी को जीत ले तो अवश्य अपराजेय हो जायेगा। इसलिये जीवन में विजयी व्यक्तित्व को गढ़ना है तो मनमानी नहीं चलेगी, आज्ञामानी ही दौड़ेगी। तो हर बार कार्य करते समय स्वयं को पूछे मनमानी या आज्ञामानी?

सुन्दरता के लिये शारीरिक अनुशासन अर्थात सुव्यवस्था अत्यावश्यक है। आकर्षक चुम्बकत्व आयनों के अनुशासित होने से आता है यह हमने देखा था। इसका अभ्यास हमें अपने स्वामीत्व की हर वस्तु को सुव्यवस्थित करने से करना होगा। जिस चीज को हम अपना कह देते है उसके साथ अपने अहं के माध्यम से हम अपने चरित्र को जोड़ देते है। अर्थात हमारे कपड़े, पुस्तके, जूते-चप्पल, गाडी, खेल के उपकरण, गुड्डा-गुड्डी जिसे भी हम हमारा कहते है सब हमारे व्यक्तित्व को ना केवल दर्शाते है अपितु गढ़ते भी है। अतः शारीरिक अनुशासन का प्रारम्भ इन चीजों को व्यवस्थित करने से होता है। पुस्तके, कपड़े साफ-स्वच्छ, सुन्दर रखने में जो प्रयास लगेगा वो हमारे मन को भी सुन्दर कर देगा। अव्यवस्था से व्यवस्था और व्यवस्था से सुव्यवस्था का प्रवास जीवन को सुन्दरता और सहज निर्मलता की ओर ले जाता है।

एकाग्रता और अनुशासन के साथ ही अभ्यास का सबसे श्रेष्ठ अंग है -सातत्य। महर्षि पतंजलि ने जिसे नैरन्तर्य कहा है- निरन्तरता। इसकी चर्चा को अभी निरन्तर रखते है अगले सप्ताह के लिये। तब तक पहले दो अंगों का तो अभ्यास प्रारम्भ कर ले। भीम सा बल, अर्जुन सा रूप और दोनों का स्वास्थ्य और कौशल पाने का एक ही तो मन्त्र है ‘‘अभ्यास भैया अभ्यास!’’

मार्च 19, 2012 Posted by | आलेख | , , , , , , , , , , , | 3 टिप्पणियाँ

कुशल मंगल है।


गढ़े जीवन अपना अपना -15

चरित्र निर्माण के बाहरी आयामों में चौथा व अंतिम है – कौशल। शारीरिक बल, रूप ओर स्वास्थ्य के साथ ही विभिन्न प्रकार के कौशल भी जीवन में वांछित सफलता पाने के लिये आवश्यक है। जीवन के लक्ष्य की ओर बढ़ने में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है अन्यथा भी अनेक प्रकार की परिस्थितियों में जीवन को अपने निश्चित लक्ष्य की ओर अग्रेसर करने की चुनौति आ सकती है। आचार्य चाणक्य अपने शिष्यों को शिक्षा देते है कि यदि मार्ग में बाधा नहीं है तो समझना चाहिये कि मार्ग सही दिशा में नहीं है। इसलिये जब हम अपने जीवन में लक्ष्यप्राप्ती का मार्ग चुनते है तो हमें सभी प्रकार की स्थितियों के लिये स्वयं को तैयार करना चाहिये। अतः व्यक्तित्व विकास में कौशल प्राप्ति का असाधारण महत्व है। पांडवों के जीवन में आई प्रत्येक बाधा को उन्होंने कौशल प्राप्ति का साधन बनाया। अर्जुन ने सारे जीवन भर नये नये अस्त्रों को प्राप्त करने के लिये अलग अलग खतरों का सामना किया। किरात रूप में स्वयं शंकर भगवान का सामना कर पाशुपतास्त्र प्राप्त करना हो या नारायणास्त्र की उग्र तपस्या हो, इन सब ने ही अन्ततः धर्मयुद्ध में पाण्डवों को विजयश्री प्रदान की।

वर्तमान युग में तीन प्रकार के कौशल में प्रशिक्षित होना विकसित व्यक्तित्व के लिये आवश्यक है। पहली श्रेणी में जीवनोपयोगी कौशल आते है जो व्यक्ति को स्वावलम्बी बनाते है। स्वयं के लिये हम नियम सा बना ले जो मुझे चाहिये वो मै बना सकूं। खाना खाते है ना तो भोजन पकाना आना चाहिये। आधुनिक घरों के बच्चों को तो भोजन परोसना और थाली धोना भी नहीं आता। कपड़े पहनते है तो कपड़े धोना, प्रेस करना या कुछ थोड़ी बहुत सिलाई करना सीख लेना चाहिये। कुछ सम्पन्न घरों के बालकों को तो कपड़ों की घड़ी करना भी नहीं आता। विकसित व्यक्तित्व का ध्येय हो कि किसी भी परिस्थिति में दूसरे पर निर्भर ना रहना पड़ें। ये उपर से सरल लगने वाली बाते कभी कभी बड़ी बाधा बन जाती है। कपड़े धोने का अभ्यास ना हो तो अचानक साफ कपड़े नहीं धो सकेंगे। स्वावलम्बन की आदत बाल्यकाल में ही पड़ जानी चाहिये। समझदार अभिभावक सामथ्र्य के बावजूद 10 से 16 वर्ष के आयु में बालकों को नौकरों पर निर्भर नहीं होने देते।

दूसरी श्रेणी में अभिव्यक्ति का कौशल आता है। अपने व्यक्तित्व को प्रगट करने के लिये अभिव्यक्ति-कौशल अत्यावश्यक है। जीवनलक्ष्य की प्राप्ति में यह महत्वपूर्ण है। वर्तमान समय में व्यावसायिक सफलता में भी यह अनिवार्य हो गया है। इस श्रेणी के कौशल में भाषा का ज्ञान आता है। व्यक्ति को अधिक से अधिक भाषाओं को सीखना चाहिये। वर्तमान में केवल अंग्रेजी पर बल दिया जाता है पर भाषा कौशल का सर्वोत्तम विकास मातृभाषा में ही होता है। यदि एक बार मातृभाषा में प्रवीणता हासिल कर ले तो फिर अन्य किसी भी भाषा को सीखना सरल हो जाता है। हमारे मस्तिष्क में जो भाषा सम्बंधी केन्द्र है उनका विकास होना आवश्यक है यदि ये केन्द्र ठीक से विकसित हो जाये तो कोई भी नई भाषा सीखना सहज सुलभ हाता है। यन्त्र मानव (रोबोट) के विकास के लिये अनिवार्य कृत्रिम बुद्धि (Artificial Intelligence) के बारे में जो अत्याधुनिक अनुसंधान हुए है वे हमें बताते हैं कि संस्कृत एक ऐसी परिष्कृत भाषा है कि जिसके अध्ययन से मस्तिष्क का पूर्ण विकास होता है। यह भाषा गणितीय होने के कारण बिना किसी विसंगति के भाषीय तर्क का विकास होता है जो मस्तिष्क के भाषा केन्द्रों के स्नायविक उतकों (Neurons) के विकास में गति प्रदान करता है। इसी शास्त्रीयता के चलते इंग्लैण्ड के कुछ विद्यालयों में वैदिक मंत्रो तथा संस्कृत के अध्यापन को प्रारम्भ किया गया है। यदि संस्कृत व अपनी मातृभाषा पर प्रभुत्व प्राप्त कर लिया जाये तो फिर अंग्रेजी में भी सहज प्राविण्य मिल जायेगा। हाँ प्रयास तो करना ही पड़ेगा। मातृभाषा फिर संस्कृत और उसके बाद अंग्रेजी यदि यह क्रम रखा जाये तो भाषा सीखने में आनन्द आयेगा और प्रयास कठीन होने से भी खेल के समान आनन्ददायी होंगे।

अभिव्यक्ति कौशल का दूसरा अंग है कला। प्रत्येक व्यक्ति में अपनी भावनाओं के प्रेषित करने की आकांक्षा भी होती है और उसकी अपनी एक विधा भी। यही विधा कला के रूप में प्रगट होती है। सारी कलायें भावों की अभिव्यक्ति के लिये ही होती है। प्रत्येक के स्वभाव के अनुरूप व्यक्ति अपने भाव शब्द या रूप के द्वारा अभिव्यक्त करता है। शब्द या ध्वनि के द्वारा सम्प्रेषण काव्य, लेखन, संगीत आदि कलाओं में विकसित होता है। रूप अथवा आकार के द्वारा सम्प्रेषण शिल्प, चित्रकला, नृत्य नाट्य आदि कलाओं में विकसित होता है। संसार में प्रत्येक व्यक्ति कलोपासक होता है अर्थात कलाभिव्यक्ति को करनेवाला अथवा उसका आस्वादन करनेवाला होता है। अपने अन्दर की कला का विकास भी व्यक्तित्व के विकास के लिये अत्यावश्यक है। व्यावसायिक लक्ष्य को महत्व देते समय कला को अतिरिक्त एवं अनावश्यक मानते हुए दुर्लक्षित किया जाता है पर यह आत्मघाती है। कलाविहीन व्यक्ति में जो अधुरापन रहता है वह उसे किसी भी क्षेत्र में अपनी पूरी क्षमता से कार्य नहीं करने देता। अतः अपनी अपनी रूचि के अनुसार कलाविधा का चयन कर उसके प्रशिक्षण, अभ्यास व आस्वादन के लिये नियमितता से समय देना चाहिये। जीवन के लक्ष्यप्राप्ति में सहायक होने के साथ ही कलोपासना जीवन को रसमय बनाकर परिपूर्ण कर देती है।

तीसरी श्रेणी के कौशल में यन्त्रविद्या (Technology) का अन्तर्भाव होता है। मानव की शारीरिक क्षमताओं को विस्तारित करने का काम यन्त्र करते है। यन्त्रों के सुविधाजनक प्रयोग से कार्य को सुचारू, सक्षम एवं कम समय में किया जा सकता है। आधुनिक जीवन में संचार के साधन बढ़ जाने के साथ ही जीवन में उपकरणों की संख्या एवं भुमिका दोनों में प्रचण्ड वृद्धि हुई है। संगणक (Computer) और चल-दूरभाष (Mobile) तो प्रत्येक के अनिवार्य उपांग हो गये है। इनके प्रयोग एवं उपयोग में असीम सम्भावनायें है और शायद ही कोई ऐसा दम्भ भर सकें कि इनको पूरी तरहा से जान लिया। इन उपकरणों का प्रयोग तो सभी करते है पर अनेक सुक्ष्म पहलुओं की ओर ध्यान नहीं देते। हममें से कितने लोग जानते है कि केवल कुछ नम्बर डायल करके ही अपने मोबाईल की पूर्णतः समाप्त (Discharged) बैटरी को कुछ और देर तक चलाया जा सकता है। ऐसी अनेक बातें है जिनकी बारीकियों के बारे में हम लोग नहीं जानते। दिल्ली के छतरपूर मंदिर की घटना है। एक अमेरिकी पर्यटक ने अपना अत्याधुनिक कॅमेरा देकर एक भारतीय छात्र को फोटो लेने को कहा। दो-तीन फोटो लेने के बाद कॅमेरा लौटाते हुए छात्र ने पर्यटक को कॅमेरे के बारे में कुछ तकनिकी प्रश्न पूछे। अमेरिकी ने जबाब दिया मै इसकी तकनिक के बारे में कुछ नहीं जानता केवल उपयोग जानता हूँ। जापानी चीजे बनाते हैं हम प्रयोग करके खराब होने पर फैंक देते है। हम भारतीय ही है जो खराब चीजों को भी सुधारकर प्रयोग में लेते है। ये जुगाड़ हमारी कंजुसी या कमी नहीं यन्त्र ज्ञान के प्रति हमारी स्वाभाविक जिज्ञासा है। आधुनिक पीढ़ि में भी ये जिज्ञासा है पर प्रतिस्पद्र्धा की आपाधापी में हम इस कौशल को भूल ना जाये, प्रयत्नपूर्वक विकसित करें।

स्वावलम्बन, कला और यन्त्रविद्या तीनों श्रेणियों के कौशल विकसित करने के लिये नित्य अभ्यास ही एकमात्र उपाय है। कौशल के नैपुण्य में ही हमारा कुशल है और सार्वजनिक उद्देश्य के प्रति समर्पित कुशल ही मानवता के लिये मंगल होता है।

मार्च 14, 2012 Posted by | आलेख | , , , , , , , , , , , | 8 टिप्पणियाँ

प्राणवान ही पूर्ण स्वस्थ


गढ़े जीवन अपना अपना -14
आद्य क्रांतिकारी वासुदेव बलवन्त फडके को जेल में बंद रखना भी सम्भव नहीं था। जेल से भागने के लिये उन्होंने कोई बहुत बड़ी योजना नहीं बनाई। उनका अपनी शक्ति पर विश्वास था। उन्होंने अपनी कोटरी के आगे लगे सलाखों के जाल को दोनों हाथों से पकड़कर उखाड़ लिया और फिर उसे उठाकर ही दौड़ पड़े। उसी फाटक को जेल की दिवार से सटाकर खड़ा किया और उसी की सीढ़ी बनाकर दिवार फांद गये। जंगल में फिर भीलों की सेना बनाई और क्रांति का कार्य जारी रखा। कोई उन्हें कभी पकड़ ही नहीं पाता यदि वे बुखार से पीड़ित नहीं हो जाते। ज्वर ने ऐसा घेरा कि मंदिर में नींद में ही बेहोश हो गये। तब अंगरेज सेनापति सोते वासुदेव की छाती पर सवार हो गया। फिर भी होश आते ही उसे धक्का देकर गीरा दिया। पर शस्त्र निकाल लिये गये थे और कमजोरी भी इतनी थी कि भागना सम्भव नहीं था इसलिये पकड़े गये।

बाघा जतीन भी बालासोर के जंगलों में 9 सितम्बर 1915 को अंगेजों से लड़ते हुए मरणांतक घायल हुए और दूसरे दिन अस्पताल में उन्होंने अंतिम श्वास ली। उससे पहले 4 दिन से बारीश के बीच जंगल में भागते भागते उन्हें भी बुखार चढ़ गया था और इस ज्वर में लड़ने के कारण ही वे अंग्रेजों के शिकार हो गये। यदि स्वास्थ्य साथ देता तो शायद इन दोनों क्रांतिकारियों का कार्य और अधिक आगे बढ़ता। इसी महत्व को ध्यान में रखते हुए लोकमान्य बाल गंगाधर टिळक ने 11 वी कक्षा के बाद अपनी पढ़ाई में से एक वर्ष का विराम लेकर योग व्यायाम आदि के द्वारा पूर्ण स्वास्थ्य को प्राप्त किया। इसी के चलते मण्डाले में घोर शारीरिक यातनाओं के बाद भी वो पूरे बल के साथ राष्ट्र का नेतृत्व करने लौट सके।

जीवन को गढ़ने की प्रक्रिया में व्यक्तित्व विकास के बाहरी आयामों में बल और रुप के बाद तीसरा है – स्वास्थ्य। यह केवल शरीर के स्तर पर ही नहीं है। पूरे व्यक्तित्व का ही स्वस्थ होना अत्यन्त आवश्यक है। व्यक्तित्व के पांचों स्तर – शरीर, मन, भाव, बुद्धि तथा आध्यात्मिक स्तर पर स्वस्थ होना चरित्र के सम्यक विकास के लिये अनिवार्य है। सामान्यतः निरोगी होने अर्थात रोग ना होने को ही स्वास्थ्य समझा जाता है। पर वास्तव में स्वस्थ होना एक सकारात्मक विधा है। स्वामी विवेकानन्द ने लण्डन में दिये एक व्याख्यान में कहा कि ‘हम भारतीय इतने आध्यात्मिक हैं कि जब एक-दूसरे से मिलते है तब अभिवादन में भी गहरा प्रश्न पूछते है।’ उन्होंने अंग्रेजी में वह प्रश्न बताया – Are you upon yourself? अर्थात क्या आप अपने आप में स्थित है? भिन्न भिन्न भाषाओं में अभिवादनों को देखने पर इस अर्थ का कोई सीधा अभिवादन ध्यान में नहीं आता है। पर अभिवादन के साथ सामान्यतः हम स्वास्थ्य की पृच्छा करते है। ‘क्या आप स्वस्थ है?’ यदि संस्कृत में संधि तोड़कर देखे तो ‘क्या आप स्व में, -अपने आप में स्थित है?’  भारत में ‘स्व में स्थित होने’ को ही स्वस्थ होना मानते है।

स्व में स्थित होना केवल आध्यात्मिक ही नहीं व्यक्तित्व के सभी स्तरों पर होता है और इन स्तरों के आपसी संबन्ध में भी। जैसे मन और शरीर का सीधा सम्बन्ध है। मन प्रसन्न हो तो शरीर भी स्वस्थ होता है। भावों के असंतुलित होने से श्वसन, पाचन, रक्तदाब जैसी सामान्य शारीरिक प्रक्रियाएँ भी बाधित होती है। अतः पूर्ण रुप से स्वस्थ रहने के लिये इन सब स्तरों को जोड़नेवाले तत्व को समझना पड़ेगा। छान्दोग्य उपनिषद् में रेक्व महामूनि की कथा आती है। केवल 15 वर्ष की आयु में विश्व में व्याप्त शक्ति को समझने के लिये तप किया और तत्व का साक्षात्कार भी किया – ‘यथा ब्रह्माण्डे वायु तथा पिण्डे प्राणः’। जैसे सारे जगत में वायु व्याप्त है उसी प्रकार व्यक्तित्व में प्राण सर्वव्यापी है। बिना वायु के कोई स्थान नहीं रह सकता वैसे ही प्राण का भी निर्बाध प्रवाह चलना अनिवार्य है। मन और शरीर को जोड़ने वाला भी प्राण ही है। अतः स्वस्थ होने का अर्थ है प्राणवान होना। प्राण अर्थात जीवनी उर्जा। इस उर्जा की मात्रा (Quantity) तथा गुण (Quality) दोनों स्वास्थ्य के प्रमुख कारक हैं।

प्राण का एकमात्र स्रोत सूर्य है। सूर्य से ही हमें प्राणउर्जा प्राप्त होता है। भोजन में भी जो शक्ति हम पाते है वह भी सूर्य की ही उर्जा होती है। वनस्पति सूर्य की उर्जा को अन्न में परिवर्तित करती है। शाकाहारी भोजन में हमे यह प्राण सीधे प्राप्त होता है। मांसाहारी भोजन में यह परोक्ष रुप से ही प्राप्त होती है क्योंकि अधिकतर जिन प्राणियों का मांस खाया जाता है वे स्वयं शाकाहारी होते है अतः उनके द्वारा वनस्पति से प्राप्त सूर्य के प्राणों को द्वितीय चरण में मनुष्य उनके मांस से प्राप्त करते है। अतः मांसाहार में मात्रा एवं गुण दोनों स्तरों पर प्राण का ह्रास होता है। भोजन से अधिकतम प्राण की उर्जा प्राप्त करने के लिये ताजा भोजन सर्वाधिक उपयोगी होता है।

पारम्पारिक ज्ञान की दृष्टि से प्राण 3 गुणों से भावित होता है। सात्विक, राजसिक व तामसिक। किन्तु आधुनिक समय में इन सब तकनिकी बातों में उलझने के स्थान पर शुद्धि एवं ताजगी का ध्यान रखना ही पर्याप्त होगा। प्राण की पर्याप्त प्राप्ति के साथ ही उसके समुचित प्रयोग एवं अपव्यय को रोकना भी आवश्यक है। प्राण के सम्यक प्रयोग के लिये हमारी प्रणालियों, खासकर श्वसन तथा पाचन की प्रणालियों का सुदृढ़ होना जरूरी होगा। इन सब के लिये अपनी क्षमता के अनुसार नियमित व्यायाम करना चाहिये। प्राण का अपव्यय मन के स्तर पर सर्वाधिक होता है अतः अपनी आदतों को संयमित करने से ही हम अधिक प्राणवान हो सकते है। अपव्यय को रोकने का दूसरा प्रभावी माध्याम है सही विश्राम। हम सोते भले ही 8 घण्टे हो पर विश्राम पूरा नहीं पाते है। इसीलिये तो पूरे रात की नीन्द के बाद भी सुबह उठने पर ताजगी के अनुभव की जगह और कुछ समय सोने की ईच्छा बनी रहती है। सब बच्चे माँ से यही कहते है ‘पांच मिनट और . . .’ सोने से पूर्ण आराम पाने के लिये गहरी नीन्द होना आवश्यक है। इसके लिये सरल उपाय है सोने से पूर्व हाथ पांव धोना। मन को शांत करने के लिये जप, प्राणायाम अथवा किसी भावात्मक पुस्तक का स्वाध्याय। योग में प्रशिक्षित लोग शवासन तथा योगनिद्रा का भी प्रयोग समयक विश्राम द्वारा प्राण संरक्षण के लिये कर सकते है।

प्राण की प्रचुरता से ही व्यक्तित्व के सभी स्तर निरामय होते है और पूर्ण स्वास्थ्य का लाभ मिलता है। प्रतिरोधी प्रणाली के समर्थ होने के कारण रोग पास ही नही फटकेंगे अतः निरोगी होने का सह उत्पाद (By-Product) भी प्राप्त होगा। पर ये ध्यान रखना चाहिये की योग एवं अन्य साधनाओं का उद्देश्य पूर्ण स्वास्थ्यलाभ से चरित्र का विकास है ना कि रोगों से छुटकारा। अन्यथा स्थिति उस साधक की तरहा होगी जो शिवरात्रि के दिन पूरी रात जागकर चारो याम पूजन करता है। सुबह शिवजी प्रसन्न होकर दर्शन देते है और कहते है ‘मांगो जो वरदान मांगना हो।’ कुछ देर पहले ही साधक के पीठ पर एक कीड़ा काटा है और ऐसी जगह खुजली हो रही है जहाँ हाथ भी नहीं पहुँच पा रहा। तो जब शिवजी प्रगट हुए तब सबसे बड़ी समस्या पीठ की खुजली है। अतः शिवजी से वर भी मांगा तो यही कि खुजली मिटा दो। जो सर्वकल्याणकारी शंकर सबकुछ दे सकता है उनके वर को केवल खुजली मिटाने में व्यर्थ गवांने के समान ही मूर्खता है रोगमुक्ति के लिये योग करना।

याद रहे! प्राणवान होना ही पूर्ण स्वास्थ है केवल निरोगी होना नहीं।

फ़रवरी 11, 2012 Posted by | आलेख | , , , , | 4 टिप्पणियाँ

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