उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

प्राणवान ही पूर्ण स्वस्थ


गढ़े जीवन अपना अपना -14
आद्य क्रांतिकारी वासुदेव बलवन्त फडके को जेल में बंद रखना भी सम्भव नहीं था। जेल से भागने के लिये उन्होंने कोई बहुत बड़ी योजना नहीं बनाई। उनका अपनी शक्ति पर विश्वास था। उन्होंने अपनी कोटरी के आगे लगे सलाखों के जाल को दोनों हाथों से पकड़कर उखाड़ लिया और फिर उसे उठाकर ही दौड़ पड़े। उसी फाटक को जेल की दिवार से सटाकर खड़ा किया और उसी की सीढ़ी बनाकर दिवार फांद गये। जंगल में फिर भीलों की सेना बनाई और क्रांति का कार्य जारी रखा। कोई उन्हें कभी पकड़ ही नहीं पाता यदि वे बुखार से पीड़ित नहीं हो जाते। ज्वर ने ऐसा घेरा कि मंदिर में नींद में ही बेहोश हो गये। तब अंगरेज सेनापति सोते वासुदेव की छाती पर सवार हो गया। फिर भी होश आते ही उसे धक्का देकर गीरा दिया। पर शस्त्र निकाल लिये गये थे और कमजोरी भी इतनी थी कि भागना सम्भव नहीं था इसलिये पकड़े गये।

बाघा जतीन भी बालासोर के जंगलों में 9 सितम्बर 1915 को अंगेजों से लड़ते हुए मरणांतक घायल हुए और दूसरे दिन अस्पताल में उन्होंने अंतिम श्वास ली। उससे पहले 4 दिन से बारीश के बीच जंगल में भागते भागते उन्हें भी बुखार चढ़ गया था और इस ज्वर में लड़ने के कारण ही वे अंग्रेजों के शिकार हो गये। यदि स्वास्थ्य साथ देता तो शायद इन दोनों क्रांतिकारियों का कार्य और अधिक आगे बढ़ता। इसी महत्व को ध्यान में रखते हुए लोकमान्य बाल गंगाधर टिळक ने 11 वी कक्षा के बाद अपनी पढ़ाई में से एक वर्ष का विराम लेकर योग व्यायाम आदि के द्वारा पूर्ण स्वास्थ्य को प्राप्त किया। इसी के चलते मण्डाले में घोर शारीरिक यातनाओं के बाद भी वो पूरे बल के साथ राष्ट्र का नेतृत्व करने लौट सके।

जीवन को गढ़ने की प्रक्रिया में व्यक्तित्व विकास के बाहरी आयामों में बल और रुप के बाद तीसरा है – स्वास्थ्य। यह केवल शरीर के स्तर पर ही नहीं है। पूरे व्यक्तित्व का ही स्वस्थ होना अत्यन्त आवश्यक है। व्यक्तित्व के पांचों स्तर – शरीर, मन, भाव, बुद्धि तथा आध्यात्मिक स्तर पर स्वस्थ होना चरित्र के सम्यक विकास के लिये अनिवार्य है। सामान्यतः निरोगी होने अर्थात रोग ना होने को ही स्वास्थ्य समझा जाता है। पर वास्तव में स्वस्थ होना एक सकारात्मक विधा है। स्वामी विवेकानन्द ने लण्डन में दिये एक व्याख्यान में कहा कि ‘हम भारतीय इतने आध्यात्मिक हैं कि जब एक-दूसरे से मिलते है तब अभिवादन में भी गहरा प्रश्न पूछते है।’ उन्होंने अंग्रेजी में वह प्रश्न बताया – Are you upon yourself? अर्थात क्या आप अपने आप में स्थित है? भिन्न भिन्न भाषाओं में अभिवादनों को देखने पर इस अर्थ का कोई सीधा अभिवादन ध्यान में नहीं आता है। पर अभिवादन के साथ सामान्यतः हम स्वास्थ्य की पृच्छा करते है। ‘क्या आप स्वस्थ है?’ यदि संस्कृत में संधि तोड़कर देखे तो ‘क्या आप स्व में, -अपने आप में स्थित है?’  भारत में ‘स्व में स्थित होने’ को ही स्वस्थ होना मानते है।

स्व में स्थित होना केवल आध्यात्मिक ही नहीं व्यक्तित्व के सभी स्तरों पर होता है और इन स्तरों के आपसी संबन्ध में भी। जैसे मन और शरीर का सीधा सम्बन्ध है। मन प्रसन्न हो तो शरीर भी स्वस्थ होता है। भावों के असंतुलित होने से श्वसन, पाचन, रक्तदाब जैसी सामान्य शारीरिक प्रक्रियाएँ भी बाधित होती है। अतः पूर्ण रुप से स्वस्थ रहने के लिये इन सब स्तरों को जोड़नेवाले तत्व को समझना पड़ेगा। छान्दोग्य उपनिषद् में रेक्व महामूनि की कथा आती है। केवल 15 वर्ष की आयु में विश्व में व्याप्त शक्ति को समझने के लिये तप किया और तत्व का साक्षात्कार भी किया – ‘यथा ब्रह्माण्डे वायु तथा पिण्डे प्राणः’। जैसे सारे जगत में वायु व्याप्त है उसी प्रकार व्यक्तित्व में प्राण सर्वव्यापी है। बिना वायु के कोई स्थान नहीं रह सकता वैसे ही प्राण का भी निर्बाध प्रवाह चलना अनिवार्य है। मन और शरीर को जोड़ने वाला भी प्राण ही है। अतः स्वस्थ होने का अर्थ है प्राणवान होना। प्राण अर्थात जीवनी उर्जा। इस उर्जा की मात्रा (Quantity) तथा गुण (Quality) दोनों स्वास्थ्य के प्रमुख कारक हैं।

प्राण का एकमात्र स्रोत सूर्य है। सूर्य से ही हमें प्राणउर्जा प्राप्त होता है। भोजन में भी जो शक्ति हम पाते है वह भी सूर्य की ही उर्जा होती है। वनस्पति सूर्य की उर्जा को अन्न में परिवर्तित करती है। शाकाहारी भोजन में हमे यह प्राण सीधे प्राप्त होता है। मांसाहारी भोजन में यह परोक्ष रुप से ही प्राप्त होती है क्योंकि अधिकतर जिन प्राणियों का मांस खाया जाता है वे स्वयं शाकाहारी होते है अतः उनके द्वारा वनस्पति से प्राप्त सूर्य के प्राणों को द्वितीय चरण में मनुष्य उनके मांस से प्राप्त करते है। अतः मांसाहार में मात्रा एवं गुण दोनों स्तरों पर प्राण का ह्रास होता है। भोजन से अधिकतम प्राण की उर्जा प्राप्त करने के लिये ताजा भोजन सर्वाधिक उपयोगी होता है।

पारम्पारिक ज्ञान की दृष्टि से प्राण 3 गुणों से भावित होता है। सात्विक, राजसिक व तामसिक। किन्तु आधुनिक समय में इन सब तकनिकी बातों में उलझने के स्थान पर शुद्धि एवं ताजगी का ध्यान रखना ही पर्याप्त होगा। प्राण की पर्याप्त प्राप्ति के साथ ही उसके समुचित प्रयोग एवं अपव्यय को रोकना भी आवश्यक है। प्राण के सम्यक प्रयोग के लिये हमारी प्रणालियों, खासकर श्वसन तथा पाचन की प्रणालियों का सुदृढ़ होना जरूरी होगा। इन सब के लिये अपनी क्षमता के अनुसार नियमित व्यायाम करना चाहिये। प्राण का अपव्यय मन के स्तर पर सर्वाधिक होता है अतः अपनी आदतों को संयमित करने से ही हम अधिक प्राणवान हो सकते है। अपव्यय को रोकने का दूसरा प्रभावी माध्याम है सही विश्राम। हम सोते भले ही 8 घण्टे हो पर विश्राम पूरा नहीं पाते है। इसीलिये तो पूरे रात की नीन्द के बाद भी सुबह उठने पर ताजगी के अनुभव की जगह और कुछ समय सोने की ईच्छा बनी रहती है। सब बच्चे माँ से यही कहते है ‘पांच मिनट और . . .’ सोने से पूर्ण आराम पाने के लिये गहरी नीन्द होना आवश्यक है। इसके लिये सरल उपाय है सोने से पूर्व हाथ पांव धोना। मन को शांत करने के लिये जप, प्राणायाम अथवा किसी भावात्मक पुस्तक का स्वाध्याय। योग में प्रशिक्षित लोग शवासन तथा योगनिद्रा का भी प्रयोग समयक विश्राम द्वारा प्राण संरक्षण के लिये कर सकते है।

प्राण की प्रचुरता से ही व्यक्तित्व के सभी स्तर निरामय होते है और पूर्ण स्वास्थ्य का लाभ मिलता है। प्रतिरोधी प्रणाली के समर्थ होने के कारण रोग पास ही नही फटकेंगे अतः निरोगी होने का सह उत्पाद (By-Product) भी प्राप्त होगा। पर ये ध्यान रखना चाहिये की योग एवं अन्य साधनाओं का उद्देश्य पूर्ण स्वास्थ्यलाभ से चरित्र का विकास है ना कि रोगों से छुटकारा। अन्यथा स्थिति उस साधक की तरहा होगी जो शिवरात्रि के दिन पूरी रात जागकर चारो याम पूजन करता है। सुबह शिवजी प्रसन्न होकर दर्शन देते है और कहते है ‘मांगो जो वरदान मांगना हो।’ कुछ देर पहले ही साधक के पीठ पर एक कीड़ा काटा है और ऐसी जगह खुजली हो रही है जहाँ हाथ भी नहीं पहुँच पा रहा। तो जब शिवजी प्रगट हुए तब सबसे बड़ी समस्या पीठ की खुजली है। अतः शिवजी से वर भी मांगा तो यही कि खुजली मिटा दो। जो सर्वकल्याणकारी शंकर सबकुछ दे सकता है उनके वर को केवल खुजली मिटाने में व्यर्थ गवांने के समान ही मूर्खता है रोगमुक्ति के लिये योग करना।

याद रहे! प्राणवान होना ही पूर्ण स्वास्थ है केवल निरोगी होना नहीं।

फ़रवरी 11, 2012 Posted by | आलेख | , , , , | 4 टिप्पणियाँ

मै हूँ सबसे सुन्दर !


गढ़े जीवन अपना अपना -13

“बताओ! गुलाब क्यों सुन्दर होता है?” कुलकर्णी सर थे तो अंग्रजी के शिक्षक पर उनकी आदत थी कि कक्षा का प्रारम्भ किसी ना किसी प्रश्न से किया जाये। और लगभग हर बार प्रश्न ऐसा ही कुछ उटपटांग हुआ करता था। अब इसी को ले लो। गुलाब क्यों सुन्दर होता है? 7 वी कक्षा की बुद्धि के अनुसार छात्र उत्तर देते रहे, ‘गुलाब का रंग सुन्दर होता है इसलिये!’ किसी ने कहा उसकी पंखुड़ियों की रचना के कारण। कोई भी जबाब कुलकर्णी सर को संतुष्ट नहीं कर सका। वैसे भी उनके प्रश्नों का उत्तर उनके स्वयं के पास जो होता था वही उनको मान्य होता था। दो दिन का समय दिया गया छात्रों को ताकि घर में भी सब को पूछ सकें और फिर ये सिद्ध हो जाय कि कोई भी सही जबाब नहीं जानता। वैसे भी इस प्रश्न का माता -पिता भी क्या जबाब दें। ‘‘ये भी कोई बात हुई भला! गुलाब सुन्दर होता ही है अब इसमें क्यों क्या बताये। भगवान ने ही उसे सुन्दर बनाया है।’’

पढ़ते समय आप भी सोचने लगे ना कि गुलाब क्यों सुन्दर होता है? अब आपको कुलकर्णी सर का उत्तर बता ही देते है। सारे उत्तरों को खारीज कर देने के बाद ही शिक्षक वो उत्तर बताता है जो उसके अनुसार सही होता है और अक्सर छात्र इस बात से सहमत नहीं होते कि वो सही उत्तर है। पर कुलकर्णी सर का प्रश्न पूछने के पीछे हेतु ही अलग होता था। उन्होंने उत्तर दिया, ‘‘गुलाब इसलिये सुन्दर होता है क्योंकि सब कहते है कि वो सुन्दर होता है। हर कवि कहता है, हर फिल्म में कहा जाता है कि तुम गुलाब सी सुन्दर हो। इसलिये हम भी मान लेते है।’’ देखा सर ने भी नहीं बताया कि क्यों गुलाब सुन्दर होता है? जब छात्रों ने ये बोला तो सर ने कहा, ‘‘मै तो बता दूँगा। पर मेरा पूछने का आशय ये था कि अधिकतर बाते हम जीवन में ऐसे ही मान लेते है क्योंकि सब कहते है। सोचते कहाँ है कि इसका वास्तविक अर्थ क्या है?’’

हम सब सुन्दर बनना चाहते है या सुन्दर दिखना चाहते है? शायद केवल दिखना चाहते है क्योंकि हम सोचते है सौन्दर्य तो ईश्वरीय देन है। अब हम जैसे पैदा हुए है वैसे ही तो नाक नक्श रहेंगे ना? हाँ! आजकल लोग प्रसाधन शल्य चिकित्सा (Cosmetic Surgery ) से अपने अंगो की रचना भी बदलने लगे है। सब के बस का ये भले ही ना हो पर कम से कम कुछ क्रीम पाउडर लगाकर सुन्दर दिखने का प्रयास तो सब करते ही है। एक सर्वेक्षण के अनुसार अब इस मामले में पुरुषों ने महिलाओं को पीछे छोड़ दिया है। पुरुषों के लिये विशेष प्रसाधनों की बिक्री अब अधिक होने लगी है। हर कोई क्रीम लगाकर गोरा होना चाहता है। बाल बढ़ाकर या भिन्न भिन्न तरह से कटवाकर अपने आप को सुन्दर दिखाने की होड़ लगी है। वैसे इस प्रयास में गलत कुछ नहीं है। केवल ये सारे प्रसाधनों के विज्ञापन मात्र उल्लु बनाओ प्रोग्राम है। इससे सुन्दर व्यक्तित्व का कोई लेना देना नहीं।

किसी कवि ने कहा ही है ना कि सौन्दर्य तो देखनेवाले की दृष्टि में होता है। इसका अर्थ हुआ सुन्दरता का अर्थ है आकर्षित करने की क्षमता। तो गुलाब भी इसीलिये सुन्दर है क्योंकि वह सबको आकर्षित करता है। मन मोह लेता है। यह आकर्षण विशेषता से आता है। दिखने की विशेषता या सुगन्ध की या फिर रचना की। कुछ अलग हटके होगा तो आकर्षण होगा। शायद इसीलिये शोभाचार (Fashion) के नाम पर कुछ ना कुछ विचित्र ही किया जाता है। चित्र विचित्र केशभूषा व वेषभूषा के द्वारा अलग दिखने से लोग आकर्षित होंगे ऐसा विचार होता होगा। पर विड़म्बना देखो। कोई शोभाचार चल जाये, लोकप्रिय हो जाये तो सब वैसे ही बाल कटवाने लगते है और फिर आप अलग दिखने की जगह सभी बन्दरों की तरहा ही लालमुहें दिखने लगते है। सब एक जैसे हो जाये तो फिर आकर्षण कहाँ रहा?

व्यक्तित्व के बाहरी पहलुओं में बल के बाद रूप दूसरा महत्वपूर्ण पहलु है। आकर्षक रूप का विकास भी व्यक्तित्व के विकास का अंग है। कृष्ण के नाम का ही अर्थ है आकर्षित करने वाला। कर्षयति इति कृष्णः। उसकी बांसुरी के पीछे मनुष्य ही क्या पशु पक्षी सब खींचें चले आते थें। रंग काला है गोरा नहीं। कपड़े भी सामान्य पीले रंग के वस्त्र, आभूषण के नाम पर पत्तों की माला और मोर मुकुट। फिर भी विश्व इतिहास का सबसे आकर्षक व्यक्तित्व। तो मानना ही पड़ेगा ये कुछ और बात है। इस सौंदर्य के तत्व को समझना होगा। बाहरी नकल से काम नहीं चलेगा, हमारे अन्दर के कृष्ण को जगाना होगा तभी वास्तविक सुन्दरता का जागरण होगा। सुन्दर दिखने की कोशिश के स्थान पर सुन्दर बनने की कोशिश करनी होगी तो आकर्षण अपने आप आ ही जायेगा।

सुन्दरता का प्रगटीकरण भले ही बाहरी हो पर उसका उद्गम तो भीतर से होता है। सुन्दरता की पहली आवश्यकता है पवित्रता। शरीर, मन और वाणी की पवित्रता। शौच अर्थात शुद्धि को योग में बड़ा महत्व दिया गया है। शरीर शुद्ध ही नहीं होगा तो उपर से कितना भी सजा लो आकर्षण कैसे आयेगा? हमको स्नान के तुरन्त बाद अनुभव होनेवाली ताजगी में कितना सौन्दर्य छिपा है। स्नान के बाद हमारा रूप सर्वोत्तम होता है। फिर हम उपर से प्रसाधन चुपड़कर उसे अपवित्र बना लेते है। नियमित पूर्ण स्नान भी सुन्दर बनने का सहज साधन है। शरीर को शुद्ध रखने की और भी कई विधियाँ योग में बताई गई है। ज्ञाता प्रशिक्षक से सीखकर करने से लाभ होगा। इसीलिये यहाँ उनका वर्णन नहीं कर रहे। बिना प्रशिक्षक के मार्गदर्शन के केवल पढ़कर करने से दुष्परिणाम हो सकते है। वैसे संकल्प के साथ रोज स्नान भी पर्याप्त है। मन की शुद्धि भी अत्यावश्यक है। विचार में शुद्धता का अर्थ है उपर उठाने वाले विचार, विस्तार देनेवाले विचार, बिना छल कपट के विचार। नाक नक्श अच्छे होने के बाद भी विचार दुष्ट या कपटी होने से आकर्षण चला जाता है। वाणी की शुद्धता भी सौन्दर्य को निखरने में अनिवार्य है। सदाचार पर विचार करते समय इसपर विस्तार से चर्चा करेंगे।

सुन्दर रूप का दूसरा घटक है प्रसन्नता। कितने भी संतुलित अंग हो, रुप सुहाना हो पर क्या रोते हुए कोई आकर्षक लग सकता है? अतः सतत प्रसन्न रहने का स्वयं को प्रशिक्षण देना होगा। जरा सोचिये बिना किसी बाहरी प्रेरणा के हमारा भाव क्या होता है? प्रसन्नता का या चिंता का या कष्ट का? जब कोई नहीं है, कोई देख नहीं रहा क्या तब हम प्रसन्न होते है? जो अपने आप से प्रसन्न रहता है वो मदमस्त ही सबसे आकर्षक होता है। मुस्कुराने के लिये कोई कारण नहीं चाहिये। वो हमारा सहज स्वभाव बन जाये। कारण तो दुखी होने के लिये आवश्यक हो।

आकर्षण का तीसरा अनिवार्य अंग है प्रमाणबद्धता या सुव्यवस्था। आकर्षण का सबसे बड़ा उदाहरण है चुम्बक। लोहे और चुम्बक की रासायनिक रचना एक ही है फिर भी चुम्बक में आकर्षण है और लोहे में नहीं है। पर उसी सादे लोहे के टुकड़े को चुम्बक पर लगातार घिसने से वो भी चुम्बक बन जाता है। दोनों के आयनों की संरचना में भेद है। लोहे के आयन अस्त व्यस्त है तो चुम्बक के आयन दक्षिण और उत्तर धृवों के बीच पंक्तिबद्ध हो गये है। लगातार घिसने से लोहे के आयन भी प्रमाणबद्ध हो जाते है और वो भी चुम्बक बन जाता है। अच्छी संगत का यह सुपरिणाम है। अपनी वस्तुओं को व्यवस्थित करना व्यक्तित्व को आकर्षक बनाने का प्रारम्भ है। तो अपना कमरा सुव्यवस्थित कर लो, कपड़ें, किताबें ठीक से रखने लगो। इससे हमारे व्यक्तित्व के आयन भी सुव्यवस्थित होने लगेंगे और हम आकर्षक बन जायेंगे।

प्रत्येक व्यक्ति ही स्वभावतः सुन्दर होता है। केवल लम्बे होने में ही सौन्दर्य नहीं है या किसी का शरीर स्थूल है तो उसका अर्थ ये नहीं कि वो आकर्षक नहीं हो सकता। हम अपने शरीर रचना के अनुसार अपने परिधान आदि का चयन करना सीखेंगे तो रुप निखरेगा। मुख्य बात तो ये है कि पवित्रता, प्रसन्नता और प्रमाणबद्धता ये हमें सुन्दर बनाते है, प्रसाधन नहीं। इसका अभ्यास करें और फिर आपका रोम रोम कह उठेगा,
मै हूँ सबसे सुन्दर!

फ़रवरी 3, 2012 Posted by | आलेख | , , , , , , , , , , , , , | 5 टिप्पणियाँ

विड़ियो गेम्स छोड़ों ओर मैदान में चलों !


गढ़े जीवन अपना अपना -12

वसुदेव सुतं देवं कंस चाणूर मर्दनं।
देवकी परमानन्दम् कृष्णं वन्दे जगदगुरुम्।।

हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता। कृष्ण की सारी कथायें ही रसमय है और वीरता से परिपूर्ण भी। शिशु अवस्था से ही पुतना मौसी और शकटासुर के षड़यन्त्रों को समझकर यशोदा के लाला ने उनका मर्दन कर दिया। वहीं से उनकी बाललीलाओं में अनेक राक्षसों के निःपात के अध्याय जुड़े है। आगे सारे जीवन भर ही वे दुष्टों का संहार करते रहे। पर जब जगद्गुरु के रुप में उनका बखान करना है तब उनके जीवन के सबसे महत्वपूर्ण अध्याय का ही उल्लेख होता है। कंस चाणूर मर्दनं।

कृष्ण स्वयं मात्र 12 वर्ष के हैं और बलराम दाऊ 14 के। नन्दग्राम की लीलाओं का समापन और मथुरा प्रयाण का ये समय है। कंस ने जानबूझकर महोत्सव निमन्त्रण दिया है। अपने काल को मारने के अनेक प्रयास असफल होने के बाद अब वो अपने समक्ष मथुरा में ही कृष्ण को समाप्त कर दैवी आकाशवाणी से उपजे भय को समाप्त करना चाहता है। अतः नन्दग्राम के गोप समूह के स्वागत की विशेष व्यवस्था है। जैसे ही यह दल मथुरा के महाद्वार पहुँचा एक मदमस्त हाथी महावत के नियन्त्रण से बाहर हो गया और सीधा कृष्ण के दल पर चढ़ आया। आसपास के राहियों में हाहाकार मच गया। कुवलीयापीड़ नाम का यह विशाल हाथी मथुरा में कुख्यात था। अपराधियों को पैरों तले कुचलकर मृत्युदण्ड देने का इसे प्रशिक्षण प्राप्त था। आज कंस ने उसका नियोजन अपने भानजों को मारने के लिये किया था। योजना के अनुसार ही उसे खुब दारू पिलाकर ठीक कृष्ण के आगमन के समय वहाँ अंधादुंध तबाही मचाने के लिये छोड़ दिया गया था।

वीर के बल की परिक्षा थी यह। केवल साहस या युक्ति से काम नहीं चलने वाला। यहाँ तो शारीरिक बल की परिक्षा थी। कुवलीयापीड़ ने कृष्ण भगवान् को अपनी सूँड़ में में पकड़ने का प्रयास किया। ताकि दूर उछालकर फेंक दे। पर कान्हा तो चपलता से उसकी सूँड पर ही चढ़ गये। अब कृष्ण उपर थे। हाथी जोर जोर से हिलाकर उन्हे गिराने का प्रयास कर रहा था। पर अब आक्रमण नन्दलाला के पास था। शक्ति देखों कितनी प्रचण्ड, उन्होंने एक ही झटके में कुवलीयापीड़ के दांत को उखाड़ फेंका और अपने शक्तिशाली मुष्टिकाप्रहारों से उसके मस्तक पर आघात किया। मर्म पर किये घातक प्रहारों से वह बलवान हाथी भी मुर्छित हो गया। कहते है कि कृष्ण ने सूँड पकडकर उस हाथी को उठाया और गोल गोल घुमाकर दूर फेंक दिया। कुवलीयापीड़ की मुक्ति हो गई। गोपकुमारों ने नन्दलाल के जयघोषों से मथुरा को गुंजा दिया। कंस के आतंक से भयभीत मथुरावासियों के मन में अपने उद्धार की आशा जगी।

उत्सव में अनेक आयोजन थे। पर मुख्य आयोजन जहाँ स्वयं मथुराधीश कंस विराजमान थे वो था मल्लयुद्ध का आखाड़ा। कुश्ति भी मरणांतक। एक मल्ल के मरने पर ही दूसरा विजयी होगा। कंस के सबसे भयानक मल्ल थे चाणूर और मुष्टिक। दोनों राक्षसों समान की महाकाय तो थे ही अति क्रूर भी जाने जाते थें। अत्यन्त विभत्स तरिके से विरोधी पहलवानों को मारते थें। वे कंस की आतंकी योजना का दूसरा चरण थे। कंस ने उन दोनों से कहा था, ‘‘वो मायावी वसुदेव पुत्र यदि किसी प्रकार कुवलीयापीड़ के पैरों से बच भी निकला तो आप दोनों उन दोनों भाइयों को मल्लयुद्ध के लिये ललकारना। आखाड़े की लाल माटी में ही उनके सुकोमल शरीर कुचल देना।’’

योजना के अनुसार चाणूर और मुष्टिक ने कान्हा और दाऊ को ललकारा। साथी गोप भी उन अतिकाय दैत्यों को देखकर चुनौति स्वीकार करने को मना कर रहे थे। मथुरावासी भी इन बालकों के सुकोमल शरीरयष्टि को देखकर चिंतित थे। पर दोनों भाई तत्पर थे। एकदूसरे की ओर देखकर मुस्कुराये और आखाड़ें में उतर गये। सबको लग रहा था कि ये तो एक तरफा युद्ध होगा। पर इन बालकों को अपनी क्षमता की सीमा का भान था। अतः उन्होंने क्रमशः चाणूर व मुष्टिक की ही शक्ति का प्रयोग करना प्रारम्भ किया। दोनों में चपलता अद्भूत थी। अपनी चपलता से कम से कम शक्ति का प्रयोग करते हुए बलवान विराधी के वारों से वे बचते रहे। अपने सारे दाँव निष्फल होते देख चाणूर-मुष्टिक खीजते गये। और जोर से वार करते गये। कान्हा-दाऊ बचते जाते और खिखिलाकर हँसते जाते। उनके हँसने से कंस के दैत्य और गुस्सा कर और जोर से आक्रमण करते। कान्हा की योजना थी अपने सामर्थ्य का समुचित प्रयोग। कृष्ण और बलराम के पास पाश्विक बल भले ही चाणूर मुष्टिक जैसा ना हो पर युवा होने के कारण चपलता और तितिक्षा (Stamina) निश्चित ही अधिक थे। उन्होंने उसी का प्रयोग किया। चपलता से बचाव करते हुए चाणूर मुष्टिक को थका दिया। और जब तितिक्षा के अंतिम पड़ाव पर दोनों थककर हाँफने लगे तब अपने दाँव लगाये। ओर कुछ ही क्षणों मे दोनों को अपनी दुर्गति से मुक्त कर दिया।

सारी मथुरा कृष्ण के जयघोष से गूँज उठी। कंस ने कान्हा को कैद करने का आदेश दिया। पर उससे पूर्व ही कृष्ण ने दौड़कर सिंहासन से कंस को नीचे खींच लिया। अवाक् कंस सम्हले उससे पूर्व ही अपनी शक्तिशाली मुष्टिका से मर्माघात कर मथुरा को और अपने माता -पिता वसुदेव देवकी को आतंक की कैद से मुक्त कर दिया।

हमारे व्यक्तित्व विकास के आंतरिक आयामों प्रेरणा, वीरता, धैर्य और विवेक का आत्मावलोकन, उत्साह और वैराग्य से कैसे विकास किया जाता है यह हमने महावीर हनुमान तथा नचिकेता के उदाहरणों से देखा था। अब हम अपने व्यक्तित्व के बाहरी आयामों के विकास की ओर मुड़ रहे है। हमारा व्यक्तित्व प्रगट तो शरीर के माध्यम से ही होता है। इसीलिये कहा है शरीरमाद्यम् खलुधर्म साधनं। शरीर धर्म पालन का प्रथम साधन है। सबसे पहला आयाम है-यह शारीरिक बल। बलवान् शरीर का अर्थ केवल पशुवत् शक्ति से नहीं है। वजन उठाने की क्षमता होना तो ठीक ही है। उसे शक्ति (Power) कहते है। पर केवल इससे ही काम नहीं चलता। इसके साथ ही चपलता (Dexterity) और तितिक्षा (Stamina) भी चाहिए। चपलता के लिये अंगो में लचीलापन भी चाहिये और सहजता से उनके संचालन का कौशल भी। तितिक्षा वास्तव में फेफड़ों की क्षमता है। श्वास को अधिक समय तक धारण करने की क्षमता है तितिक्षा।

तीनों के विकास के लिये नियमित व्यायाम आवश्यक है। तितिक्षा के लिये दौड़ लगाना सर्वौत्तम है। सभी अंगों के लचीले और संतुलित विकास के लिये सूर्यनमस्कार सबसे उत्तम है। पर केवल 12 से काम नहीं चलेगा, कम से कम 50 तो करने ही चाहिये। 108 करना सर्वोत्तम। समर्थ रामदास प्रतिदिन 1200 सूर्यनमस्कार लगाते थे। आजकल आधुनिक युवा यन्त्रों की सहायता से व्यायाम करने Gym जाते है। सही निर्देशन में उससे तात्कालिक लाभ तो होता ही है पर देखा गया है कि कालांतर में मांसपेशियों के शिथिल होने की समस्या आती है। वैसे भी अधिकतर जिम जाने वालों का उद्देश्य वास्तविक बल प्राप्त करने के स्थान पर केवल दिखाउ सौष्ठव प्राप्त करना होता है। उसी हेतु अनेक यूवा घातक दवाइयाँ भी लेने लगे है। इन सबके दुष्परिणाम बड़े ही दुखद होते है। अतः इनसे बचना ही ठीक है। यदि सही तरिके से शारीरिक बल अर्थात शक्ति, चपलता, तितिक्षा (PDS- Power, Dextirity, Stamina) तीनों प्राप्त करने है तो नियमित मैदानी खेल खेलना आवश्यक है। यही कान्हा की विधि है। गाय चराते चराते खेल खेल में वीरो की टोली बना ड़ाली। हमारे देसी खेलों में शरीर की पूर्ण क्षमता के विकास की विधि है। क्रिकेट, फुटबोल जैसे आधुनिक खेलों में मनोरंजन तो होगा पर बलवर्द्धन निश्चित नहीं है। इसीलिये इसके खिलाड़ियों को तैयारी के लिये अलग से व्यायाम करना पड़ता है। गांव के खलिहानों में या संघ की शाखा में या विवेकानन्द केन्द्र के संस्कार वर्गों में खेले जाने वाले शेर-बकरी, किसान-लोमड़ी, कुक्कुट युद्ध, कबड्डी, दूग्र विजय जैसे मैदानी खेलों में ये सब विकास सहजता से हो जाता है।

तो आधुनिक नन्दलालों विड़ियो गेम्स छोड़ों ओर मैदान में चलों।

जनवरी 16, 2012 Posted by | आलेख | , , , , , , , , , | 8 टिप्पणियाँ

उत्तिष्ठत! जाग्रत!! – नचिकेता की श्रद्धा


गढ़े जीवन अपना अपना -11
मृत्यु का सामना करने के लिये बड़ा उत्साह चाहिये। साधारणतः मृत्यु को तो भय के साथ ही जोड़कर देखा जाता है और यहाँ उत्साह की बात कही जा रही है। श्रद्धा ऐसे ही चमत्कार करने में सक्षम होती है। आत्मावलोकन के समान ही उत्साह श्रद्धा का ही परिणाम भी है और अंग भी। नचिकेता तो यम के स्थानपर जाने के लिये उत्सुक है। उसका उत्साह बालक की जिज्ञासा की तरह है जो हर नये अनुभव से ज्ञान प्राप्त करना चाहता है बिना किसी भय अथवा गणित के। नचिकेता के लिये मृत्यु के द्वार जाना नई अनुभूति के ज्ञान का अवसर था। अतः उत्तेजना भी है, उमंग भी और जिज्ञासा भी।
हमारे क्रांतिकारियों के बारे में भी ऐसा ही बताते है। चाहे कांकोरी काण्ड के आरोपी रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला, राजेन्द्र लाहीडी, शचिन्द्रनाथ सान्याल हो या बाद में भगतसिंह, बटुकेश्वर दत्त और सुखदेव, राजगुरु सदैव उत्साह में ही रहते थे। मृत्यु की चिंता उन्हें कभी नहीं सताती थी। यह मन मस्त फकीरी अपने कार्य और भारतमाता के प्रति उनकी श्रद्धा का परिणाम ही थे। किसी भी शारीरिक यातना से अंग्रेज उनके मन को नहीं तोड़ सकें। बेड़ियाँ तालवाद्य बन गई और कोठरी की सलाखें मृदंग। ‘रंग दे बसंती चोला’ और ‘वन्दे मातरम्’ के तराने जेलों में अन्य अपराधियों को भी देशभक्त बनाने लगे। यमराज को चुनौती देता यह उत्साह फांसी के फंदे पर भी नहीं थमा।
अण्डमान के काले पानी की काल कोठरी भी सावरकर के उत्साह को न ड़िगा सकी। वहाँ उस भीषण यमनर्तन में जहाँ उनकी कोठरी के सामने रोज कोई ना कोई मारा जाता, कोई आत्महत्या कर देता, कोई रोग का बलि पड़ता; वह वीर काव्य की रचना करता। जेलर बारी यातना देते देते थक गया। सावरकर ने बेड़ियों की संकेतभाषा का निर्माण कर दिया। सारे सूल्यूलर जेल में संदेशवहन होने लगा। एकसाथ हड़ताल हुई। श्रद्धा से सराबोर उत्साह मृतप्राय लाशों में भी जान फूँक देता है। सावरकर ने कागज कलम की व्यवस्था जुटाई और अण्डमान से लंडन पत्राचार किया। क्रूरकर्मा बारी पर कारवाही हुई उसका तबादला हुआ। श्रद्धा की विजय हुई। ये सारे नचिकेता ही तो थे।
उत्साह किसी भी परिस्थिति में निराशा को नहीं पास फटकने देता। जब नचिकेता यम के द्वार पहुँचा तो यमराज नहीं थे कही गये हुए थे। नचिकेता ना तो निराश हुआ ना ही लौट आया। तीन दिन और रात यम की प्रतिक्षा करता रहा। ना थका ना ही उसका मन ऊबा। वैसे भी जिनके मन श्रद्धा से भरे हो वो हताश कैसे होंगे। ऊबने का तो नाम ही नहीं। आजकल हम छोटे छोटे बच्चों के मुखसे बोर होने की बात सुनते है। ये ऊबना मानसिक रिक्तता का लक्षण है। उत्साही ना तो स्वयं ही ऊबता है ना अपने परिवेश में किसी को ऊबने देता है। यमराज जब लौटे तो नचिकेता की श्रद्धा और लगन से प्रसन्न हुए और तीन दिन के लिये उसे तीन वर प्रदान किये।
नचिकेता ने वरदान में जो मांगा है वह हमे श्रद्धा के तीसरे आयाम पर ले आता है –वैराग्य! वैराग्य से ही श्रद्धा का जन्म होता है। वैराग्य का अर्थ है विस्तार। छोटे स्वार्थ का त्याग। नचिकेता के तीनों वर देखिये। पहला वर मांगा अपने पिता के लिये, ‘पिता के पाप नष्ट हो और उनका क्रोध शांत हो।’ परिवार के कुशल एवं धर्म की रक्षा की ईच्छा से मांगा वरदान। दूसरा वर सारी मानवता के कल्याण के लिये, ‘ऐसा यज्ञ बताये जिसको करने से पृथ्वि पर ही स्वर्ग का अलौकिक सुख सब प्राप्त कर सके।’ यमराज ने दोनों वर प्रदान किये। दूसरे वर में जो यज्ञ का वर्णन है वह आज की समस्त पर्यावरण की समस्याओं का समाधान प्रदान कर सकता है।
तीसरे वर के रुप में नचिकेता ने सर्वोच्च ज्ञान की आकांक्षा की। मृत्यु के रहस्य का ज्ञान-आत्मज्ञान। मरने के बाद व्यक्ति का क्या होता है? मृत्यु से अधिक अच्छा यह कौन बता सकता है। यह है वैराग्य की चरम सीमा। यमराज ने अनेक प्रलोभन दिये। और कुछ मांग लो धन, राज्य, दीर्घायु, दास दासी, आरोग्य सब देने को तैयार थे यमराज पर नचिकेता तो अपनी मांग पर अडे थे। आत्मज्ञान ही चाहिये। यह दृढ़ता वैराग्य से उत्पन्न श्रद्धा से ही सम्भव है। वैसे सामान्यतः हम लोग वैराग्य का अर्थ सन्यास से लगाते है। और जीवन में जिसे सब पाना है उसे वैराग्य की बात बताने से असम्भव भी लगता है और भय भी लगता है। मै तो जीवन का आनन्द लेना चाहता हूँ। सब सुख भोगना चाहता हूँ। ख्याति पाना चाहता हूँ। ये वैरागी थोड़े ही बनना है। पर मजेदार बात यह है कि ये सब तो वैराग्य के ही फल है।
वैराग्य का अर्थ है मन का विस्तार। छोटा संकुचित मन छोटी ही आकांक्षा कर पाता है। मन जब अपने बड़े विस्तारित अस्तित्व के साथ जुड़ जाता है तब उसका स्वार्थ भी विस्तारित होता है। परिवार मेरा ही विस्तारित रुप है। मन जब बड़ा होता है तो समझता है ‘मै ही परिवार हूँ।’ और विस्तार होने पर समझता है कि ‘मै ही समाज हूँ।’ वैराग्य की दुढ़ता के साथ ही यही विस्तार राष्ट्र के स्तर पर पहुँच जाता है। फिर स्वामी रामतीर्थ कह उठते है, ‘मै ही भारत हूँ।’ भारत की संस्कृति अपनी संवेदना में समूची मानवता, प्राणीमात्र, प्रकृति, ब्रह्माण्ड और परमात्मा को समेटे हुए है। इसिलिये हम सब के सुख की प्रार्थना करते है। सर्वे भवन्तु सुखिनः। इसलिये भारत तक जिसका विस्तार हो गया उसे परम वैराग्य प्राप्त हो गया। यही हमारे क्रांतिकारियों के निर्भय मृत्युगान का रहस्य है। वैराग्य तो महास्वार्थ है। या कहे परम स्वार्थ।
एक और बात जब हम अपने महास्वार्थ का ध्यान देते है तो छोटे मोटे स्वार्थ तो अपने आप ही पूर्ण हो जाते है। भारत के लिये काम करनेवाले का स्वयं का सम्मान तो बढ़ता ही है ना? भारत की जीत में ही हम सब की विजय है।
नचिकेता को भी अपनी श्रद्धा का फल मिला। यमराज ने मृत्यु के परे का ज्ञान तो दिया ही साथ ही प्रलोभन के रुप में दिये सभी आश्वासन भी ‘तथास्तु’ कर दिये। आत्मावलोकन, उत्साह और वैराग्य से उपजती है श्रद्धा और इस श्रद्धा से प्रेरणा, वीरता, ध्यैर्य और विवेक इन आंतरिक उपकरणों का विकास होता है और प्राप्त होती है निश्चित सफलता और जीवन की सार्थकता।
यमराज ने नचिकेता को कहा ‘शूरस्य धारा निषिधा दूरत्यया। दूर्गम पथस्तत कवयो वदन्ति’ तलवार की धार पर चलने जैसा दूर्गम यह पथ है ऐसा ज्ञानी बताते है। पर पहले मन्त्र में वे उपाय बता चुके हैं। जो स्वामी विवेकानन्द का महामन्त्र बना, ‘उत्तिष्ठत! जाग्रत!! प्राप्य वरान् निबोधत!’ यमराज ने कहा उठो जागो वरीष्ठ जनोंसे मार्गदर्शन प्राप्त करों। स्वामीजी ने सिंहनाद किया, उठो ! जागो! लक्ष्यप्राप्ति तक रूको नहीं।’

जनवरी 4, 2012 Posted by | आलेख | 2 टिप्पणियाँ

क्या हम तत्पर है?


गढ़े जीवन अपना अपना -10
एक गुरुकुल में दो शिष्य थे सुहृत और सुकृत। सुकृत बड़ा विद्वान था। जो भी पाठ पढ़ाया जाता तुरन्त याद कर लेता। अतिरिक्त भी बहुत पढ़ता रहता। आचार्योंसे चर्चा में भी आगे ही रहता था। सुहृत पढ़ने में तो साधारण था पर कुलगुरु का बड़ा प्रिय था। वे अक्सर कहा करते थे कि ये तो धर्म का मर्म जानता है। दोनों गहरे मित्र थे। फिर भी सुकृत के मन में बार बार आता था कि ऐसा क्या है जो सुहृत को गुरुजी का प्रिय बनाये हुए है। मैने सारे धर्मशास्त्र पढ़ लिये है मित्र से अधिक सुत्र मुझे याद है पर फिर भी सम्भवतः मर्म को मै नहीं जान पाया। ये मर्म क्या है? एक बार किसी अत्यावश्यक कार्य से सुकृत को पास के किसी नगर भेजा गया। जाने से पहले उसने सुहृत को कहा कि वो भी साथ चले ताकि साधन भजन में सहायता हो जायेगी। सुहृत ने जो उत्तर दिया उससे स्पष्ट हो गया कि वो क्यों सबका प्रिय है। उसने कहा, ‘मै साथ तो चल सकता हूँ। भजन जप भी साथ में कर सकता हूँ किन्तु सहायता कि कोई सम्भावना नहीं है। इस मामले में कोई किसी की सहायता नहीं कर सकता। ना गुरु ना शास्त्र ना मित्र। ये सब अधिक से अधिक साधना का पथ बता सकते है पर चलना तो स्वयं को ही पड़ेगा। स्वयं के चलने से ही लक्ष्य तक पहुँचेंगे।’ यही है धर्म का मर्म – ‘हम स्वयं ही अपने सहायक है।’ और हाँ गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते है अपने शत्रु भी हम आप ही है। आत्मैव आत्मनो बन्धुः आत्मैव रिपुरात्मनः।
चरित्र गठन की प्रक्रिया को समझने में हमने भी अभी तक के अध्यायों में ये देखा की जीवन का निश्चित उद्देश्य है, लक्ष्य है। यह प्रत्येक का अपना अलग अलग है, अद्वितीय है। एक दिव्य तत्व से ही उपजे ओर जुड़े इस संसार में प्रत्येक की भुमिका अपने आप में विशिष्ट है ओर उसे पहचान कर निभाने में ही जीवन की सार्थकता है। ये भी कि हमारा जीवन अपनी ही बड़ी इकाईयों से जुड़ा होने के कारण हमें अपना जीवनध्येय और कार्य अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के ध्येय व कार्य के अनुरूप रखना होगा। इससे चरित्र गठन में सहजता भी होगी और हमारी उपलब्धियों की पूरे विश्व में सार्थकता भी होगी। पर इस सबको करने के लिये हमारा एकमात्र साधन है हमारा अपना व्यक्तित्व। यही हमारा वाहन है जो हमें गन्तव्य तक पहुँचायेगा। यही हमारा अस्त्र है जिससे हमें लक्ष्यवेध करना है।
हमारे व्यक्तित्व के विकास के बारे में विचार करते समय हमने सबसे पहले आंतरिक उपकरणों पर विचार किया था। हनुमानजी की जलधि लांघती छलांग से हमने देखा था कि प्रेरणा, वीरता, ध्यैर्य और विवेक इनके बल पर हम भी अपने जीवन सागर को और उसमें आने वाली समस्त बाधाओं को लीलया-खेल खेल में पार कर सकते है। आप जैसे आधुनिक साथी पूछना चाहेंगे कि ये सब तो ठीक है किन्तु इन आंतरिक उपकरणों का विकास कैसे किया जाये? तो हनुमानजी को ही पूछते है कि इतना कठिन कार्य उन्होंने कैसे कर लिया? जब वानरदल माता सीता के खोज का शुभसमाचार लेकर किष्किंधा पहुँचां तो महाराज सुग्रीव के साथ सब रामजी के पास पहुँचे। सारा समाचार सुनकर भगवान का हृदय बजरंग बली के प्रति प्रेम से भर आया और वो उनसे सारा वृत्त विस्तार से समझना चाहते थे। कैसे महाबली रावण की लंका को भस्मसात् कर आये। हनुमानजी सारा श्रेय श्रीराम को ही देते है। प्रभु इसमें मेरी कोई बढ़ाई नहीं है यह सब आपका ही प्रभाव है। मै तो क्या कर सकता हूँ जन्म का बन्दर हूँ शाखा से शाखा जाते रहता हूँ वैसे ही छलांग वहाँ भी लगा दी। इस उत्तर में व्यक्तित्व के आंतरिक विकास का रहस्य छिपा है।
स्वामी विवेकानन्द जी कहते है, ‘‘अन्तःकरण में सारे चमत्कारों की सम्भावना है और इस चमत्कारी शक्ति का रहस्य है श्रद्धा! श्रद्धावान् मनुष्य बाधाओं के हिमालय सहज पार कर लेता है। समुद्र को पी जाने की शक्ति रखता है। नचिकेता के समान हँसते हँसते मृत्यु का सामना कर लेता है।’’ महावीर हुनमान के अलावा कठोपनिषद् का वीर हिरो नचिकेता स्वामीजी का प्रिय आदर्श था। वे कहा करते थे, ‘मुझे 100 नचिकेता दे दो और मै विश्व का कायापालट कर दूंगा।’
इस 10 वर्षीय बालक नचिकेता के जीवन को समझने से हम श्रद्धा के जागरण का तन्त्र समझ सकते है। बालक के पिता वाजश्रवा माने हुवे ऋषि है और समय समय पर बड़े बड़े सर्वस्व त्यागी महायज्ञ करते रहते है। और इसी के लिये ख्यातिप्राप्त है। एक समय के यज्ञ में बालक नचिकेता पिता का भ्रष्टाचार देख कर विचलित होता है। वो देखता है कि अपने पूज्य पिता ब्राह्मणों को मृतप्राय गायें दान में दे रहे है। पीतोदका, जितना पानी पीना था पी लिया, दग्धतृणा, अब घास भी खाने की शक्ति जिनमें नहीं बची और वन्ध्या, जो बांझ है; ऐसी पूर्णतः निरुपयागी गायों का दान तो याचक का बोझ बढ़ाना है। ममता के कारण तटस्थ रहने के स्थान पर बालक नचिकेता श्रद्धा से भर गया। श्रद्धा से प्रेरणा पा कर वह पिता से प्रश्न पूछने का साहस कर पाता है। पर अपना ध्यैर्य और विवेक नहीं खोता। पिता पर आरोप नहीं लगाता केवल उनसे विनम्रता से प्रश्न पूछता है।
महायोगी अरविन्द कहते है, ‘श्रद्धा प्रश्नहीन विश्वास नहीं है। अन्ध अनुकरण नहीं है। श्रद्धा तो प्रश्न पूछने का साहस प्रदान करती है। अपने आप से और अपनों से ‘समाधान अवश्य मिलेगा’ इस विश्वास के साथ प्रश्न पूछना श्रद्धा है।’ तो श्रद्धा का पहला अंग है ‘आत्मावलोकन’। श्रद्धावान् स्वयं का यथातथ्य आकलन करता है। श्रद्धा से आविष्ट नचिकेता भी पिता से संवाद यहाँ से ही प्रारम्भ करता है- मै बहुतों से बढ़कर हूँ और बहुतों से कम भी हूँ। मै ना तो सर्वप्रथम हूँ पर नाही अंतिम। अर्थात मै कुछ तो योग्य हूँ। आप मूझे किसे दान देंगे? यह आत्मावलोकन है। वृथा अभिमान नहीं कि मै धर्म जानता हूँ, आप गलत है। कोई अभिमान नहीं। पर झूठी विनम्रता के नाम पर स्वयं का अवमूल्यन भी नहीं। नियमित आत्मावलोकन से आत्मविश्वास जगता है जो श्रद्धा के जागरण का माध्यम बनता है।
नचिकेता ने पिता को पूछा तो ऐसे अपने प्रिय सुयोग्य पुत्र को आप किसे दान दोगे। पिता ने सम्भवतः झल्लाकर या टालने के लिये कह दिया, ‘मृत्यवे ते ददामि।’ जैसे गुस्से से कभी माँ कह देती है ना ‘जा मर!’ नचिकेता के पिता ने कह दिया मै तुझे मृत्यु को दान देता हूँ। सुननेवाले सब अवाक् रह जाते है पर श्रद्धावान् नचिकेता अविचल मुस्कुराता सम्मूख आयी चुनौती को स्वीकार करता है और यमनगरी को जाने को तत्पर होता है। श्रद्धा के विकास की वैज्ञानिक तकनिक को समझने के लिये हमें भी नचिकेता के साथ यमराज जिनका दूसरा नाम धर्मराज भी है उनके पास जाना होगा। पर पहले अपनी क्षमता का अवलोकन तो कर लें। निमर्मता से अपना नित्य आत्मावलोकन करना प्रारम्भ कर दे। रोज सोन से पहले अपनी क्षमता का आकलन करें। अपनी दिनचर्या का अवलोकन कर पूछे स्वयं से श्रद्धा के जागरण के लिये ‘क्या हम तत्पर है?’

दिसम्बर 20, 2011 Posted by | आलेख | , , | 8 टिप्पणियाँ

छलांग तो लगानी पड़ेगी!


गढ़े जीवन अपना अपना -9
छलांग तो लगानी ही पड़ती है। साधारणतः जीवन में किसी बड़े निर्णय को कर लेने के बाद भी जब व्यक्ति उस दिशा में पहला कदम उठाने से ड़रता है तो उसे ऐसे ही समझाइश दी जाती है। तैरना सीखने के लिये भी तो पहले पानी में उतरना ही पड़ेगा ना? कहते है कि धक्का दे के पानी में डाल दो तो बच्चा भी अपने आप तैरना सीख ही लेता है। कितनी भी सोच समझ या प्रेरणा से जीवन में कार्य करने की दिशा और क्षेत्र चुन भी लिया तब भी सारी बात तो इसी पर निर्भर होगी कि पहला कदम डाला जाय। कहते ही है ना कि कितनी भी लम्बी यात्रा हो प्रारम्भ तो एक कदम से ही होता है। यही सबसे महत्वपूर्ण होता है। यही वो छलांग हे जो सफलता की संगिनी है।
जटायु के बड़े भाई संपाति ने अपनी दूरदृष्टि से सागरपार देख कर बता तो दिया की श्रीलंका में अशोक वाटिका में माता सीता बैठी है। तो लक्ष्य निश्चित हो गया। कार्य भी स्पष्ट है। प्रभु का संदेश सीतामैया को पहुँचाना है और उनका कुशलक्षेम जानकर प्रभु को बताना है। लक्ष्य भी स्पष्ट और कार्य भी स्पष्ट। जांबवंत के वचनों से अंतःप्रेरणा का जागरण भी हो गया – ‘रामकाज लगी तव अवतारा। सुनतहि भयहु पर्वताकारा।’ रामकार्य के लिये तुम्हारा जन्म है इसका स्मरण होते ही हनुमानजी की शक्ति का जागरण हुआ। पर केवल इतने से ही काम नहीं बनता। हनुमान जी को महावीर ऐसे ही नहीं कहते। वीरता के सभी आवश्यक गुण उनमें विद्यमान है। साहस, धैर्य, बल, और विवेक चारों का अद्भूत मिश्रण ही इस कपिश्रेष्ठ को ‘महावीर’ बनाता है।
पर्वताकार हो जाने के बाद वे अपनी पुनर्जागृत शक्ति को प्रगट करने लगे। जांबवंत को कहने लगे बताइये अब मै क्या करू? आप कहो तो पूरी लंका को ही उखाड़ लाउ? या रावण के सभी सहायकों के साथ उसका विनाश कर दूँ? पर वीरता तो कार्य को उचित मात्रा में करने में ही होती है। इसलिये जांबवंत जी ने कहा कि अभी तो तुमको केवल इतना ही कार्य करना है कि माता सीता को ढ़ाढ़स बंधाना हे और उनकी स्थिति के बारे में रामजी को वापिस आकर सूचना देनी है। साहस का अर्थ ये नहीं कि मनमानी करें। दल के नेता की आज्ञा के अनुसार पराक्रम करने के लिये साहस के साथ ही धैर्य भी चाहिये। फिर इसका अर्थ ये भी नहीं कि अपनी बुद्धि का प्रयोग ही नहीं करना है। दो काम बताये थे पर जब लंका आ ही गये तो लगे हाथ शत्रु की सेना का आकलन भी कर लिया।
हनुमानचालिसा में हम गाते है, ‘‘प्रभुमुद्रिका मेली मुख माहि। जलधी लांघि गये अचरज नाहि।।’’ यदि इस समुद्र लांघने वाली छलांग को ध्यान से समझे तो हम अपने चरित्र निर्माण के लिये महत्वपूर्ण संकेत प्राप्त कर सकते है। सबसे पहले तो पिता के मित्र मैनाक पर्वत ने मित्रतापूर्ण विघ्न ड़ाला। ‘आओ कुछ क्षण विश्राम करों!’ पर कार्य में विघ्न ड़ालते सुख को ठीक से समझ कर वीर उससे बच निकलता है। पवनपुत्र ने पिता के मित्र को विनम्रता से उत्तर दिया, ‘राम काजु किन्हें बिनु मोहि कहा विश्राम!’ यह कार्य के प्रति लगन वीरता का लक्षण है। सुरसा और छाया के विघ्नों को विवेकपूर्ण बुद्धि से जहाँ आवश्यक वहाँ छोटा बनकर पार किया और लंकीनी के लिये ऐसे बल का प्रयोग किया की एक ही मुठ्ठी के प्रहार में उसे चित कर दिया। जैसा विघ्न वैसा ही उपाय। यह वीरता है। सब समय आवेश और शक्ति का ही प्रयोग नहीं तो जहाँ जो उचित हो उस प्रकार से समस्या का समाधान करना।
हमारे भी जीवन में रोज अनेक ऐसे प्रसंग आते हे जहाँ हमें छलांग लगानी होती है। पर वीरता अपने आप नहीं आती है। अपने आप तो कुछ भी नया करने में संकोच और कुछ कुछ भय भी लगता है। जिस कमरे में अंधेरा हो उसमें प्रवेश करने में भी तो हिचकिचाहट होती है। पता नहीं क्या होगा अंधेरे में। और मन सहज ही विपरित से विपरित ही कल्पनायें करता है और भय को बढ़ाता है। एक तो अज्ञात का भय और दूसरा आलस ये हमें छलांग लगाने से रोकते है। आलस केवल शारीरिक ही नहीं होता। मन का आलस बड़ा होता है। पर यदि नये प्रयोग नहीं करेंगे तो हमें हमारी क्षमताओं का परिचय कैसे होगा? यदि पानी में ही नहीं उतरेंगे तो तैरेंगे कैसे? अतः मन को संस्कार देना होता है कि नये काम करें। प्रयत्नपूर्वक कुछ ना कुछ नया करते रहना। ताकि जब कार्य के लिये कुछ नया करना पड़ें तो मन हिचकिचाये नहीं। साहस का संस्कार जितना बचपन में हो उतना सहज और पक्का होता है। क्योंकि एक बार मन में तरह तरह के भय भर गये तो फिर उनको हटाना ही बड़ा काम हो जाता है।
धैर्य तो बाद में आ जायेगा पर पहले साहस और पराक्रम विकसित होना चाहिये। बिना साहस के धैर्य तो भीरुता है और शौर्य के साथ धैर्य है वीरता। हम सब जीवन में स्थायित्व लाना चाहते है। Settle होना चाहते है। सारे व्यावसायिक लक्ष्य बंततपमत की योजना जीवन को स्थिर करने के लिये है। ये तो होना ही है समय के साथ हो भी जायेगा। पर बचपन में या युवावस्था में ही यह मानसिकता बना लेने से वीरता का विकास नहीं होता। व्यवसाय में भी विशिष्ठ सफलता तो वीरों को ही मिलती है जो साहस करते है। जिसे आधुनिक भाषा में Risk कहते है। चुनौती के बिना प्रगति की कल्पना ही नहीं कर सकते। धैर्य का अर्थ है परिस्थिति को भाँपकर प्रतीक्षा करने की क्षमता। समय के अनुरूप ही साहस विजय देता है। कई बार सही समय की प्रतीक्षा करने का धैर्य नहीं होने के कारण सामर्थ्य और पूर्ण योजना के बाद भी अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते।
14 साल की आयु के शिवाजी तोरणगढ़ के किले पर हमले की योजना बनाते है और सफलता पूर्वक स्वराज्य की पहली विजय प्राप्त करते है। सोचिये, आज 14 साल का बालक 10 वी कक्षा में होता है। अपनी पढ़ाई में आगे क्या विषय लेने है इसका निर्णय लेने का साहस भी हम 10 वी तक विकसित नहीं कर पाते है। जिस विधि से शिवाजी जैसे वीरों का निर्माण होता है वही है यह साहस और धैर्य के उचित सदुपयोग की विधि। कब, कहाँ किसका प्रयोग करना है इसके निर्णय के लिये विवेक। यह सब सिद्धान्त जानने से ही विकसित नहीं हो जाते उसके लिये व्यवहार में अभ्यास करना होता है। गलतियाँ भी होंगी। कुछ नुकसान भी हो सकता है पर निराश होने कि आवश्यकता नहीं यदि सही सबक सीख लिये तो ये छोटे मोटे नुकसान तो उस सीख की ट्यूशन फीज मात्र है। जीवन में प्रयोग करने के लिये तत्पर होना चाहिये। जिस बात का भय लगता हो उसे करके देख लेने से ही भय दूर होगा। वीरों की जीवनियां पढ़ने से भी मन तैयार होता है।
महावीर हनुमान को अपने जीवन का आदर्श बना ले ओर सोचें इस स्थिति में मेरे स्थान पर पवनसुत होते तो क्या करते? राह मिल ही जायेगी। वीरतापूर्ण सार्थक जीवन का मन्त्र तो यही है ‘छलांग तो लगानी ही पड़ेगी।’

दिसम्बर 14, 2011 Posted by | आलेख | , , , , , , , , , , | 10 टिप्पणियाँ

लक्ष्यवेध का प्रथम आंतरिक साधन – प्रेरणा!


गढ़े जीवन अपना अपना -8

‘असम्भव! ये हमसे नहीं होगा!’ युवाओं के सामने चुनौति रखने पर पहली बार ऐसी प्रतिक्रिया पाने की उनको आदत थी। और फिर बात भी ऐसी ही हो रही थी। अंग्रेजी साम्राज्य की राजधानी लण्डन में बैठकर उनके ही बड़े अफसर से उसकी भारत में की गई ज्यादतियों का हिसाब मांगना? अपनी माँ बहनों के अपमान का प्रतिशोध लेना। बात से तो सब सहमत थे, पर क्या लण्डन में ये सम्भव है? सभी अनुभवी क्रांतिकारियों का मत था की अभी उनके दल की ऐसी स्थिति नहीं थी कि ऐसा कोई बड़ा कार्य सीधे हाथ में लिया जाये। बैठक में तर्कपूर्ण बातों पर ही निर्णय होता है। सावरकर को भी सबकी बात मानकर योजना को स्थगित करना पड़ा। पर उनकी भाव-भंगिमा से साथियों को पता चल ही गया कि वे इस निर्णय से प्रसन्न नहीं हैं। सब धीरे धीरे खिसक गये। केवल मदन बैठा रहा। सबसे छोटा तो था ही पूरे दल में नया भी था। इसलिये बैठक मे कुछ नहीं बोला था।
उसे याद आ रहा था सावरकर से प्रथम भेट का प्रसंग। युवा मदनलाल अपने पिता की अमीरी के मद में चूर लण्डन में पढ़ाई के बहाने रह रहा था और नाच-गाने, मस्ती में लगा रहता था। तब यह भोग ही उसे जीवन का सबसे बड़ा सुख अनुभव होता था। एक दिन उसने अपने देशी विदेशी युवा-युवतियों के दल के साथ इण्डिया हाउस के नीचे महफिल जमा ली। ग्रामोफोन की धुन पर सब थिरक रहे थे। उपर क्रांतिकारी दल की बैठक चल रही थी। एक भारतीय युवा इस अय्याश दल का नेता है ये सुनकर स्वयं सावरकर नीचे उतर आये। अचानक ग्रामोफोन के बन्द होने से मदन भड़क उठा। जोर से चिल्लाया भी, ‘‘कौन है?’’ पर उसे आज भी याद है लड़ने के लिये जैसे ही वह ग्रामोफोन की ओर मुड़ा इस दुबले-पतले शरीर के महामानव से आंखे भिड़ गई। क्या आंखें थी वो! आज भी कई बार सपने में दिखाई देतीं हैं। उस तेज के सामने धष्ट-पुष्ट पहलवानी काया का मदन भी स्तब्ध हो गया। और फिर वह कलेजे को चीरता प्रश्न, ‘क्या इसी के लिये तुम्हारी मां ने तुम्हें जन्म दिया? तुम्हारी भारतमाता परतन्त्र है और तुम मस्ती में ड़ुबे हो क्या यही तुम्हारे जीवन का उद्देश्य है?’ उस समय तो गर्दन झुकाकर उन तेजस्वी आंखों के अंगारों से दूर चला गया मदन पर प्रश्न मन में कौंधता रहा। और फिर उसी में से जीवन का उद्देश्य भी मिला और प्रेरणा भी। मदन क्रांतिगंगा में सम्मिलित हो गया। अनेक परीक्षाओं के बाद आज उसे अंतरंग मंत्रणा में बैठने का पहला अवसर मिला था। बैठक के तर्क तो उसे कुछ कुछ समझ आये थे। पर उससे अधिक समझ में आयी थी कार्य की अनिवार्यता। मन में तो ठान ही लिया।
‘सावरकर, व्यक्ति बलिदान के लिये कब तैयार होता है?’ प्रगटतः तो मदनने केवल यही प्रश्न पूछा।
सावरकरने कहा, ‘मदन ये जोश का काम नहीं है। इसके लिये आंतरिक प्रेरणा चाहिये। नारे लगाने की वीरता नहीं है यह इसमें योगेश्वर कृष्ण सा गाभ्भीर्य चाहिये।’
‘मैने कब कहा कि मै कुछ करने वाला हूँ। समिति के निर्णय से मै सहमत हूँ कि अभी ऐसी किसी योजना की आंच समिति पर नहीं आनी चाहिये। ये क्रांतिकारियों की बड़ी योजना में बाधक होगा। मै तो केवल सैद्धांतिक प्रश्न पूछ रहा हूँ कि व्यक्ति बलिदान के लिये कब तैयार होता है?’
‘जब वह स्वयं प्रेरणा से ठान ले तब!’ सावरकर ने भी संक्षिप्त सा उत्तर दिया। मदन ने कैसे समिति से अपना सम्पर्क तोड़ दिया, कैसे अकेले तैयारी की और कैसे दुष्ट कर्जन वायली को मृत्युदण्ड की सजा दी। ये तो सब आज नहीं बतायेंगे। आपको मदनलाल धींगरा की जीवनी में ये सब स्वयं पढ़ना पड़ेगा। आज तो ये प्रसंग इसलिये चल पड़ा क्योंकि चरित्र निर्माण की कड़ी में आज का विषय है, लक्ष्यवेध का प्रथम आंतरिक साधन – प्रेरणा।
प्रेरणा ही जीवन बदल देती है। इसी प्रेरणा के द्वारा मस्ती में ड़ूबा युवा योगेश्वर का सामथ्र्य प्राप्त कर मातृभूमि पर बलिदान होने का सौभाग्य प्राप्त करता है। गंगा के तट पर एअर फोर्स में प्रवेश परीक्षा में असफलता के कारण निराशा में आत्मघाती विचारों में बैठै अब्दुल को कोई स्वामी शिवानन्द मिल जाता है। गीता की प्ररणा दे जाता है और भारत को मिसाइल मैन मिल जाता है। 1965 के युद्ध में अपने सब साथियों के बलिदान के बाद स्वयं को ही जीवित बचा देख जीवन से हताश सेना के सीधे-साधे ड्राइवर को अहमदनगर के स्टेशन पर चने की भुंगळी में स्वामी विवेकानन्द के कर्मयोग का कागज पढ़ने को मिलता है और जीने की प्रेरणा मिल जाती है। भारत के निराश यौवन को नया गांधी मिल जाता है। अन्ना हजारे स्वयं लाखों की प्रेरणा बन जाते है।
प्रत्येक सफलता का कारण प्रेरणा ही होती है। तुलसी और कालिदास के जीवन में पत्नि से मिली झिड़क का अपमान कवित्व की प्रेरणा बन रसधारा में बह उठता है। तो माता से पिता की गोद छिन जाने का अपमान धृव की अड़ीग साधना की प्रेरणा बन जाती है।
सतर्क मन में ही अधिक कुतर्क आते है। आजके आधुनिक विज्ञाननिष्ठ युवा के मन में कुलबुला रहे प्रश्न को हम जानते है। आप पूछे इससे पहले हम ही पूछ लेते है, ‘क्या प्रेरणा के लिये हमे भी किसी घटना की प्रतीक्षा करनी होगी? मदनलाल, ए पी जे या अन्ना के समान सकारात्मक या तुलसी या धृव के समान अपमानकारक?’
निश्चित ही यह नहीं हो सकता कि प्रत्येक के जीवन में किसी हादसे से ही प्रेरणा का जागरण हो। वास्तव में हम सबके जीवन में प्रेरणा तो कार्य कर ही रही होती है। बिना प्रेरणा के कोई भी कार्य सम्भव नहीं किन्तु जब जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर सके ऐसी तगड़ी प्रेरणा की बात करनी हे तो उसका वैज्ञानिक विधि से विकास किया जा सकता है। शिवाजी, स्वामी विवेकानन्द जैसे महापुरूषों के जीवन में यह संस्कारों से विकसित स्थायी प्रेरणा कार्य करती हुई दिखाई देती है। माता जिजाउ तथा गुरु श्रीरामकृष्ण परमहंस की शिक्षा पद्धति आज भी सभी अभिभावकों व शिक्षकों के लिये आदर्श है। उस शिक्षा-विज्ञान पर फिर किसी और प्रयोजन में बात होगी। आज तो प्रेरणा के विकास का विज्ञान देखते है।
प्रेरणा भाव से उत्पन्न होती है विचार से नहीं। किन्तु आज के युग में हम इतने तार्किक हो गये है कि कई बार विचार ही भाव का ट्रीगर बन जाते है। प्रेरणा कुछ पाने की भी हो सकती है और कुछ देने की भी। पद, पैसा, प्रतिष्ठा पाने की प्रेरणा जीवन की प्रतिस्पद्र्धा में इन्धन का काम करती है। व्यावसायिक लक्ष्यसिद्धि में यह सहायक भी होती है। पर देखा गया है कि यह स्थायी नहीं होती और असफलता में घोर हताशा का कारण बनती है। अनेक सम्पन्न लोगों के जीवन में रिक्तता के कारण पैदा हुए विषाद (Depression) में हम इसे देख सकते है। अनेक रोगों को भी ये जन्म देती है।
देने की पे्ररणा अधिक स्थायी और प्रभावी होती है। परिवार को आधार अथवा सम्मान प्रदान करना, समाज में कुछ योगदान देना, ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में नये अविष्कार करना, देश की रक्षा, सेवा व सम्मान में अपनी आहुति देना ये प्रेरणा के तत्व बड़ें जीवनलक्ष्य के वेध में सहायक हो सकते है। एक व्यक्ति के जीवन में ये दोनों पे्ररक तत्व कार्य कर रहे हो सकते है। जैसे एक खिलाड़ी पैसे और प्रतिष्ठा के लिये तो खेलता ही है पर उसका सर्वोत्तम तो तब प्रगट होता है जब वह अपने देश के सम्मान के लिये खेलता है। विम्बल्डन व अमेरिकन ओपन जैसी प्रतियोगिताओं में प्रचण्ड पुरस्कार राशि की प्रेरणा के होते हुए भी दूसरे राउण्ड से आगे ना जा पाने वाले भारतीय टेनिस खिलाड़ी देश के लिये खेलते हुए डेविस कप में विश्व के उंचे से उंचे खिलाडियों को मात दे देते है। इसके पीछे के रहस्य के बारे में पूछने पर, ‘कुर्सी पर बैठा रेफरी हर अंक में भारत का नाम लेता है, तो मेरा हर अंक भारत को समर्पित है ये बात खेल को अलग ही स्तर पर ले जाती है’ ऐसा बताते है।
हम भी भाव के उचित संस्कार से अपनी प्रेरणा को राष्ट्रार्पित कर सकते है। इसी से हमारा सर्वोत्तम प्रगट होगा। इसके लिये देशभक्ति गीत, देशभक्तों की जीवनियों का पठन, संकल्पपूर्वक देश के लिये प्रतिदिन कुछ करना यह उपाय है।
एक और बात पोषक वातावरण में ही प्रेरणा का विकास होता है। इसलिये सही संगत भी अत्यावश्यक है। हमारी प्रेरणा का विस्तार देश के स्तर तक होने के लिये आवश्यक है कि हम ऐसे भाव वाली टोली का हिस्सा बनें। अथवा ऐसी टोली बनायें। प्रेरणा के स्रोत माता-पिता, गुरु, मित्र, सम्बन्धी कोई भी बन सकते हैं पर इसका सुनिश्चित स्रोत तो हम स्वयं ही है। अतः प्रेरणा तो वही स्थायी है जो स्वयंप्रेरणा हो। इस के विकास के लिये नित्य आत्मावलोकन आवश्यक है। रोज सोने से पूर्व 5 मिनट भारतमाता का ध्यान करे और फिर स्वयं के दिन की समिक्षा करें।

दिसम्बर 3, 2011 Posted by | आलेख, चरित्र | , , , , , , | 1 टिप्पणी

नियम तो नियम ही है ………


गढ़े जीवन अपना अपना -7

‘घास का तिनका कैसे उगता है?’
केन्द्र के आवासीय व्यक्तित्व विकास शिविर में आये जिज्ञासु बालक ने कार्यकर्ता को प्रश्न पूछा कि ‘हम ये भोजन से पहले मंत्र क्यों करतें हैं?’ उत्तर का प्रारम्भ भी प्रश्न से करने से जिज्ञासु अधिक ध्यान से सुनता भी है और समझता भी है। संस्कारों के इस विज्ञान का अनुसरण करते हुए कार्यकर्ता ने प्रति प्रश्न किया था ‘घास का तिनका कैसे उगता है?’
उत्तर जितना लगता है उतना सरल नहीं था। जब कुछ क्षण बालक सोचता रहा तब कार्यकर्ता ने स्वामी विवेकानन्द के ‘ज्ञानयोग’ पुस्तक में पढ़े विचार को बताना शुरु किया, ‘घास के एक तिनके के लिए भी पूरी सृष्टि कार्य कर रही है। सूर्य तपता है, तब सागर, ताल, नदियों का जल बाफ बन बादल बनता है। वायु इन बादलों को अपने साथ सब जगह ले जाता है। पहाड़, पेड़ जब इन बादलों को रोकतें हैं तब वर्षा होती है। बारिश के पानी से धरती के पेट में पड़े सूखे बीज में अंकुर फूटते हैं। धरतीमाता पोषक रसायनों के भंडार से उस अंकुर का पोषण करतीं है तो घास का तिनका उगता है|’
जगत का एक परमाणु भी अपने संग सारी सृष्टि को लेकर ही गति करता है। आधुनिक विज्ञान के नए-नए प्रयोग सिद्ध कर रहें रहे हैं कि सारा जगत आपस में जुड़ा है। पर्यावरण में दीखाई देते परिणाम बताते हैं कि सारा जगत एक दुसरे से सम्बन्ध में बंधा है। जापान में सुनामी से परमाणु सयंत्र में खराबी आती है, प्रशांत महासागर के दुसरे तट पर अमेरिका में दुष्परिणाम देखें जा सकतें हैं। तो ये जगत केवल भौतिक रूप से जुड़ा ही नहीं है इसका आपस में सम्बन्ध भी है। जैविक सम्बन्ध, जैसा शरीर के अंगों का आपस में होता है और इस जगत में सब आपस में एक दूसरे पर निर्भर भी है। जीवन, पोषण और मरण के लिए पूर्णतः निर्भर है।
हमने अपने आप को समझने के प्रयास में सृष्टि के तीन मूलभूत शाश्वत सिद्धान्तों को समझा है –
१.    सारी सृष्टि ‘एक’ ही है। ऊपर दिखने वाली समस्त विविधता उस एक पूर्ण की ही अभिव्यक्ति है।
२.    विविध रूप में प्रगट एक पूर्ण के सब ‘अंग’ अपने आप में अद्वितीय है। कोई भी दो एकसमान नहीं है। हम मनुष्य भी उसी ‘एक’ की अद्वितीय अभिव्यक्ति हैं। हमारी रचना, कार्य व भूमिका तीनों विशिष्ट हैं। हमारे अपने ‘स्व’भाव के अनुसार है। कितना भी प्रयास करें हम किसी की नकल नहीं कर सकते।
३.    यह पूर्ण और सभी अंग- अर्थात सृष्टी में जो भी है वह सब परस्पर, आपस में जुड़े हैं। केवल भौतिक रूप से ही नहीं, जैविक सम्बन्ध में बंधे हैं और अपने अस्तित्व के लिए परस्पर निर्भर भी हैं। औरर एक बात पूर्णत्व से कट कर अंग का कोई अस्तित्व नहीं है| कटते ही वह मर जायेगा| अतः हम पूर्ण से जुड़े बिना नहीं रह सकते|
अस्तित्व के इन नियमों को समझकर उसके अनुरप अपने जीवन के लक्ष्य, दिशा व कार्य को ढालने से जीवन में सफलता एवं सार्थकता दोनों मिल सकते हैं। हमने बात भोजनमंत्र से प्रारम्भ की थी। हमारी थाली में प्राप्त भोजन के पीछे कितने लोगों का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष श्रम लगा है। तपते सूरज, बादल, वायु और पहाड़ के साथ ही हम कहाँ जानतें हैं कि किस किसान के पसीने की बूंदों ने धरती से यह अनाज पैदा किया? और कितने मजदूरों की पीठ पर लदकर हमारे घर तक पहुंचा? माँ ने और उसकी सहायता करने वाले लोगों ने उसे पकाया। सुस्वादु, सुपाच्य, रुचिकर बनाकर हमारी थाली तक पहुचांया। इन सब के प्रति अपना आभार व्यक्त करने का प्रयास है-भोजन मंत्र। सबको तो हम जानते नहीं अतः उनके अंदर के सबको जोड़ने वाले तत्त्व ब्रह्म की प्रार्थना करते हैं:-
ॐ ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविः ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणाहुतम् ।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्म समाधिना ।।
यह जो भोजन के रूप में हमारा जीवन यज्ञ चल रहा है उसमे सबकुछ ब्रह्म ही है। अर्पण करने वाला, आहुति में डाली समिधा-हवि, यज्ञ की अग्नि सबकुछ वही एक ब्रह्म है और इस यज्ञ से प्राप्त उर्जा भी उसी के कर्म में लगें।
प्रत्येक कर्म में जीवन के नियम उतर जाए ऐसा प्रयास है यह भोजन-मन्त्र। अब हममें से कोई कहेगा-हमको ये नियम पता नहीं फिर हम पर तो इसका बंधन नहीं ना है? ये तो ऐसी ही बात हुई कि किसी पथिक को पूछा की सूर्य किधर से उगता है? तो उसने कहा -‘मुझे नहीं पता, मै इस गाँव में नया हूँ।’ हमारे अज्ञान से सृष्टि के नियम तो नहीं बदल जायेंगे? अब कोई कहे मुझे गुरुत्वाकर्षण का नियम नहीं पता। मै नहीं जानता कि उपर से हर वस्तु नीचे ही क्यों गिरती है? ऐसे व्यक्ति को कहे ‘कोई बात नहीं, थोड़ा छत से छलांग लगा कर देखो। टूटी टांग गुरुत्वाकर्षण का नियम सिखा देगी।’ न्यूटन के सिद्धांत को जाने या ना जाने दोनों स्थितियों में नियम तो प्रभावित करेगा ही।
उसी प्रकार अस्तित्व के शाश्वत नियम हमारे जीवन में कार्य कर रहें है। हमारे जाने या अनजाने। यदि हम समझकर इन्हें अपने जीवन में ढाल लेते हैं तो अपना चरित्र गढ़ने लगते हैं।
नियम तो नियम ही है। हम उन्हें जाने। उनका पालन करें इसी में हमारा हित है।

नवम्बर 25, 2011 Posted by | आलेख | 5 टिप्पणियाँ

अद्वितीय! फिर भी सब एक ही है . . .


गढ़े जीवन अपना अपना -6
एक कविहृदय व्यक्ति एक घने जंगल में गया। देखा तो चारों ओर विविधता से नटा संसार। कहीं गगनचुम्बी वृक्ष जिनकी उंचाई को नापना भी असंभव, तो दूसरी और छोटे-छोटे पौधे। वटवृक्ष से विशाल पेड़ जिनके तने को नापना तो छोड़ो पूरा एक साथ देखना भी असंभव। उन्हीं शक्तिशाली बून्धों पर लहराती नाजुक सी बेलें। रंग भी कितने सारे-हल्के हरे से लेकर देवदार के गहरे हरे तक केवल हरे रंग की ही अगणित छटाएं। फूलों के रंग तो इन्द्रधनुष को भी लजा दे। शायद ऐसे ही किसी कवि ने लिखा होगा, ‘ये कौन चित्रकार है?’ सहसा मन इस रचना के रहस्यमय रचनाकार की ओर भी चला जाता है और कोई कवि कह उठता है, ‘जिसकी रचना इतनी सुन्दर वो कितना सुन्दर होगा?’
‘वेब ऑफ़ लाइफ’  के लेखक फ्रिट्जोफ काप्रा इस अद्वितीय विविधता के रहस्य को जानने का अनोखा मार्ग दर्शाते है। ऊपर इतनी विविधता से सजा यह जंगल- प्रत्येक पेड़, पौधा, वल्ली, पत्ता, फूल, फल सब स्वयं में अद्वितीय, कोई भी दो एक समान नहीं। पर कल्पना करें इस जंगल को हम जमीन के अन्दर से देख रहे है, बीस फिट नीचे से। सोचों वहां से कैसा दिखेगा यह जंगल? ठीक कहा! वहां से तो केवल जड़ें ही जड़ें दिखेंगी। मोटी-पतली, लम्बी-छोटी जड़ें ही जड़ें और वह सब भी एक दुसरे में गुथी हुई। एक विशाल जड़ों का जाल एक ही जीवनतत्व का रसपान कर पोषण पाता – एक जीवनजाल। ऊपर जंगल की समस्त विविधता को पोषित करता एक ही तत्व।
एक अंग्रेजी लेखक जिसने बाद में अपना नाम लोबसांग राम्पा रख लिया, अपनी लगन से तिब्बत के बौद्ध मठ में लामा बन गया। ल्हात्सा से ऊपर हिमालय की गहन कन्दराओं में उसने अपने गुरू से दीक्षा प्राप्त की। जीवन की सामान्यसी घटनाओं से गूढ़तम तत्व को समझाने की गुरू की विधि उसे बड़ी रास आती थी। एक दिन गुफा के बाहर हिमालय की एक चोटी पर बैठे थे। शिष्य आकाश में असंख्य तारों को देख आश्र्चयचकित हो रहा था। हिमालय में तो तारे कुछ ज्यादा ही दिखाई देते है। वह अनगिन तारका समुह, उनके चारों ओर भ्रमण करती ग्रहमाला, ऐसे अनेक तारकामण्डलों से प्रचंड निहारिकाओं में विस्तारित होता अंनत आकाश। गुरू ने पूछा, ‘क्या देख रहे हो?’
शिष्य बोला, ‘तारांगण देख रहा हुँ।’
‘अरे उस खाली जगह (रिक्तता) (Space) आकाश को क्या देखते हो?’
शिष्य बोला, ‘आकाश (रिक्तता) कहां है?’
गुरू ने कहा, ‘सर्वत्र वही तो है। दो तारों के बीच क्या है? आकाश! इस आकाश में ही तो ये सब आकाशगंगायें बिखरी हैं। कुल मिलाकर तारों के आकार से कई गुना बड़ा यह भकास, रिक्त आकाश ही तो है।’ शिष्य  आश्चर्यवत देखता रहा। आकाश के अवकाश को निहारता रहा।
गुरू ने उसकी भाव समाधी तोड़ी। बोलें, ‘अरे ऐसे क्या आश्र्चय से देख रहे हो? सर्वत्र यह खाली आकाश ही भरा पड़ा है।’
‘यह क्या है?’ गुरू ने कपड़े की और इशारा करके पूछा।
‘वस्त्र है’।
‘अच्छा ध्यान से देखा और करीब से देखो।’
थोड़ी देर देखकर विचारमग्न हो उसने कहा ‘हां अब समझा यह तो धागे हैं। एक दूसरे में बुने हुए।’
‘बिलकुल ठीक। अब धागों के ताने-बाने को देखो ध्यान से।’
शिष्य ने ध्यान से देखना शुरू किया। आड़े धागे को ताना कहते है और उसमें बुने खड़े धागे को बाना। ताने-बाने के जाल के मध्य खाली स्थान-आकाश। बिना गुरू के कहे ही वह समझ गया यदि सुक्ष्मदर्शी से देखे तो पाएंगे कि कुलमिलाकर धागों के आकार से कई गुना बड़े आकाश (रिक्तता) को इस ताने-बाने के जाल ने जकड़ रखा है और हमें पूर्णतः भरे, पूर्ण अपारदर्शी कपड़े का आभास हो रहा है।
यही हाल ठोस दिखते शरीर का है। आंखें बन्दकर ध्यान से अनुभव करें तो हम देखेंगे कि शरीर विभिन्न प्रणालियों से बना है। श्वसन प्रणाली, पाचन प्रणाली आदि। ये प्रणलियाँ बनीं हैं अवयवों से, अवयव कोशिकाओं से, कोशिकायें भिन्न भिन्न रसायनों से। फिर और सुक्ष्मता से देखें तो ये रसायन बने है अणुओं से, अणु परमाणुओं से। परमाणुओं की रचना तो हम जानते ही है। प्रोटोन व न्युट्रोन से बनें केन्द्र के चारों ओर भ्रमण करते असंख्य इलेक्ट्रोन । देखा हमारे शरीर में भी हम उसी आकाशगंगा के दर्शन कर सकते है जो आसमान में दिखाई दे रही है। तो ठोस दिखते शरीर में भी कितना बड़ा आकाश व्याप्त है।
‘तो क्या हम भी रिक्तता से भरे है? क्या सारा अस्तित्व अधिकांशतः रिक्त है?’ शिष्य ने डरकर पूछा।
गुरू ने मन्द-मन्द मुस्काते उत्तर दिया, ‘पगले! आकाश भी कहां रिक्त है। जिसको तुम ठोस मानते थे वो आकाश से भरा मिला। अब यह समझ लो कि वो सब एक ही चैतन्य से पूर्ण है। जो खाली दिखता है वो भी और जो भरा दिखता है वो भी। सब एक ही चैतन्य है। एक ही ऊर्जा। दिव्य, आलोकित चेतन्य!’
‘ओह। तो यही (God) ईश्वर है। सब कुछ उसी से निकला है।’ शिष्य  ने समझने के आवेश में कहा।
गुरू जोर से हंसे, ‘अब तुम नाम चाहे जो लो, ईश्वर कहो या और कुछ, सब है एक। सब पूर्ण, अंनत, अखण्ड एक! ना खाली, ना भरा, ना विविध, ना भिन्न! जड़ में जाकर देखो सब एक ही है।’
यही सृष्टि का नियम है। प्रत्येक अद्वितीय रचना जड़ में उसी एक पूर्ण का अंग है। अर्थात् हम अद्वितीय तो है पर विलग नहीं। अंनत, अखण्ड, पूर्ण के विविध अद्वितीय अंग है।
जीवन की दिशा तय करते समय इन दोनों बातों का भान रखना होगा। और एक तीसरी बात का भी इस अद्वितीय अंग का अखण्ड एक पूर्ण से संबंध क्या है? देखते है अगली बार…….

नवम्बर 14, 2011 Posted by | आलेख | , , , | 4 टिप्पणियाँ

तुम सा नहीं देखा ….


गढ़े जीवन अपना अपना -5

चार्ल्स  की उर्जा को दिशा देना उसकी माँ के बस का नहीं था। 10 साल का बालक और इतने प्रश्न। माँ ने अपने भाई के पास चार्ल्स को भेज दिया। मामा एक चर्च में पादरी थे। बच्चों को काम देना, अनुशसित करना इसका उन्हें बड़ा अनुभव था। वे समझ गये चार्ल्स उस भूत की तरह है जिसे काम में न लगा पाये तो लगातार प्रश्न ही पूछता रहेगा। उन्होंने चर्च के ग्रंथालय में बकाया कामो में चार्ल्स को लगा दिया। कपाटों की सफाई, ग्रंथों का रखरखाव ऐसे अनेक काम थे उनके पास। पर चार्ल्स तो चार-चार मजदूरों का काम अकेले कर जाता। मामा ने जिस काम के लिए महीने भर की छुट्टियों का समय तय किया था, चार्ल्स ने उसे एक सप्ताह में ही पूरा कर दिया।

अब मामा के सामने समस्या थी। भांजा खाली था और खाली दिमाग तो शैतान का घर होता है। इस शैतान के पास तो प्रश्नों की  खदान थी। पादरी मामा जहाँ जाते वहीं उनके पीछे पहुँच जाता और तरह तरह के प्रश्न पूछता रहता। मामा ने चार्ल्स को व्यस्त रखने के लिए अनूठा काम दे दिया। ‘जाओ बगीचे में से किसी भी पेड़ के दो पत्ते ले  आओ। हाँ! दोनों बिल्कुल एक जैसे होने चाहिए। कोई  भी अंतर नहीं।’ चाल्र्स को लगा ये तो बड़ा सरल काम है। दौड़ कर बगीचे में गया और एक जैसे दिखने वाले दो पत्ते ले आया। मामा ने गौर से देखा और अंतर ढूँढ लिया। सिलसिला चल पड़ा। चार्ल्स पत्ते ले आता और मामा कोई न कोई अंतर दिखा ही देते। किसी की डंठल में भेद था तो किसी का आकार, किसी का रंग गहरा होता तो कभी शिराओं की रचना भिन्न निकल आती।

अब चार्ल्स सुबह से शाम तक बाग में अटका रहता। उसने मामा के पास भी जाना बंद कर दिया। अब वो स्वयं ही कोई न कोई अंतर पकड़ लेता। अब तो ये खेल हो गया कि एक समान लगने वाले पत्तों में अंतर ढूँढों। खेल-खेल में चार्ल्स को सृष्टि के अद्भुत नियम का साक्षात्कार हुआ। विश्व में लाखों पत्तें हैं। लाखों पेड़ पर कोई भी दो एक से नहीं हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपने आप में अद्वितीय है। ईश्वर की ईस अनुपम सर्जनात्मकता का आनंद लेते लेते चार्ल्स सोचने लगा इसके रहस्य के बारे में। इस सृष्टि की अद्वितीय रचना के बारे में। उसके चिंतन में उसे तो विशेष बना ही दिया। यही चार्ल्स बड़ा होकर -‘विकासक्रम के सिद्धांत’  –  Theory of Evolution का जनक चार्ल्स डार्विन बना। हाँ! वही डार्विन जिसने बंदरों को हमारा पूर्वज बताया।

हमारी रूचि डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत में नहीं है पर उसके बचपन के अनुभव ने सिखाए सृष्टि के शाश्वत सिद्धांत में अवश्य है। जब पेड़ के दो पत्ते एक जैसे नहीं होते, विश्व की 6 अरब आबादी में से किन्ही भी दो लोगों की उंगलियों के निशान भी एक दुसरे से नहीं मिलते; केवल अभी जीवित है उनके ही नहीं जो मर गये उनके भी। तो इन सब तथ्यों से ये तो स्पष्ट हुआ कि हम में से प्रत्येक अपने आप में अद्वितीय हैं। अतः जीवन का ध्येय व लक्ष्य निर्धारित करते समय किसी और जैसा बनाने का विचार तो बेमानी ही है। जब हम अद्वितीय ही हैं तो हमें अपने स्वयं के ही वैशिष्ठ्य को खोजना होगा ना?

यह अद्वितीय होना नाक नक्श या उंगुलियों के निशान जैसी शारीरिक बनावट तक सिमित नहीं है, तो हमारे जीवन का उद्देश्य अद्वितीय है। इस विशिष्ट उद्देश्य के लिए केवल हमारा ही जन्म हुआ है। पर इतराने की कोई बात नहीं क्योंकि जितने अद्वितीय हम है उतने ही अन्य सभी है। हाँ इसी कारण जीवन की इस अद्भुत लीला में हमारी भूमिका अद्वितीय है। जिस प्रकार शरीर के प्रत्येक अंग का अपना कार्य है उसी प्रकार हमारा भी कार्य अद्वितीय है।

हमारा जीवन ध्येय व कर्मक्षेत्र इस अद्वितीय उद्देश्य की प्राप्ति के लिए, अद्वितीय भूमिका को निभाने अपने अद्वितीय कार्य को करने का माध्यम होगा। अतः आत्मविश्वास से ये जान ले कि कोई हमें कुछ भी कहे पर सृष्टि का सिद्धांत तो ये ही कह रहा है – ‘तुम सा नहीं देखा’।
        

नवम्बर 3, 2011 Posted by | आलेख | , | 10 टिप्पणियाँ

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