उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

फिर फूंको पांचजन्य ! फिर सुनाओ गीता !!


Bhagawad Gitaआज भ्रमित अर्जुन
विषादग्रस्त नहीं
आक्रोशित है।

तमस नहीं आज
रजस का प्रकोप है।
अपने में सिमटा
सकुचा, परास्त नहीं
आज का अर्जुन,
संख्याबल की शक्ति में मदमस्त,
व्यवस्था के हर स्तम्भ में
अनास्था के प्रचार से
अभिशप्त आज का अर्जुन
सबसे आक्रोशित है।

या तो कुटील कपट से
अपनी झोली भरने में व्यस्त
या फिर क्रांति के
खोखले नारों में मस्त !

हे पार्थ के सारथी
आओ फिर आज
जीवन का यथार्थ
समझाने
ज्ञान से तपे हुए
कर्म का रहस्य
बतलाने।

जब जब दुःशासन ने
द्रौपदी के चीर पर
ड़ाला हाथ
तुमने शासन से
नहीं मांगी सुरक्षा
अपने बल पर
दिये वस्त्र अपरिमित !
आज पुनः द्रौपदी पुकारे
आओ मधुसूदन . . .
अबके पार्थ को
जगा दो
दुःशासन का करने अंत |

जितना फाड़ो
जर्जर व्यवस्था के
जरासंध को बार बार . . .
इस भ्रष्टाचारी का
होता नहीं अंत |
अबके फिर
सुझाओ भीम को
कोई युक्ति
ताकि भारती हो
कंस के श्यालकों
से सदा के लिये मुक्त।

विदेशी पुंजी का
दुर्वासा है फिर
चिरभुभुक्षित
दल बल सह
आतिथ्य के लिये
चला आया
अबकी बार आमंत्रित !
आओ हे पार्थ सारथी
याज्ञसेनी के
अक्षयपात्र की राखों लाज
हर किसान की
थाली के अंतिम शाग पात
को करो ग्रहण
और करदो सारी सृष्टि
को फिर तृप्त
दो ऐसी अक्षय विकास रचना
हो जन जीवन सुमंगल !

द्वारिका की स्वर्णीम
रचना फिर करनी ही है
पर अबके कुरूओंकी
अधर्मसेवी महासेना को
पहले करना है भस्म

है सन्नध
हर अभिमन्यु आज
आधा ना रहे
अबके व्यूहभेद|
केवल पार्थ नहीं
सारी की सारी
भारती है उत्सुक
बताओ शुभ मार्ग

हे कृष्ण मुरारी
इस मोक्षदा एकादशी को
तुम हमको
फिर सुना दो गीता
मुक्त कर दो अपने
ही रचें बन्धनों से
और दो आत्मबल
आसन्न अरि के दमन हेतु
निर्णायक युद्ध का

पार्थ के चिर सारथी
आओ आज
फिर फूंकों पांचजन्य!
फिर सुनाओ गीता !!

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दिसम्बर 24, 2012 Posted by | कविता, सामायिक टिपण्णी | , , , , | टिप्पणी करे

मात्रा भेद


कल तक 
अनन्त के दर्शन से
थे जो विस्मित !
अब आत्मबल विहीन
क्यों हो गये
शंकित?

विस्मयादि बोध ‘!’
के स्थान पर
प्रश्नचिह्न ‘?’
लग गये।

जड़ का चेतन से
देखो कैसा
कार्य-कारण सम्बन्ध . . .
मात्र एक मात्रा के
बदलने से
सारे ‘गुण’
बदल गये !!!

जनवरी 6, 2012 Posted by | कविता | 1 टिप्पणी

ललकार


It was beginning of Monsoon in 1989 when we went to Ratnagiri in western coast of Maharashtra. My younger brother Makarand had completed his Diploma in Metallurgy and was to join an industry their on his first job. I had gone with him to settle him down. He was just 17 then, he is 3 years younger. After making arrangement for his monthly lodging in food etc and visiting the factory we went to visit the Birth place of Lokamanya Bal Gangadhar Tilak and also the house in which Veer Vinayak Damodar Savarkar was kept in house arrest. From there we went to the seashore. It was almost the sunset time. The atmosphere was very heavy. Everything was gray. Sand also black with lot of iron in it. The sea was rough with waves roaring high. There was a cloud cover and it was very bleak and intimidating experience. Sun was as if fighting to shine through the gray clouds.

 

It was as if the nature was challenging one’s core of being.  Unexpectedly some words exploded. I still remember shouting at the waves to overcome the roar and challenging. I think at that time the words were in Marathi. I feel I had written them down somewhere but… even though the poem was not always available to be read but the sense remained always alive and whenever there were tough times it surfaced. The nature challenging and the inner core responding. Its the rebel expressing itself. This time when the feelings manifested the words were in Hindi. . . . .

हे सागर तू क्या अपनी
उद्दाम लहरों से
मुझे  ललकारे?

याद नहीं मैंने अगस्ति बन
तेरे जुड़वाँ गंगासागर को
पी लिया  था . . . .
अबके रत्नाकर तुझे
तेरे अनुपम भंडार
सहित
पूरा ही पचा जाऊंगा
छेड़ना मत!

ओ मदमस्त सह्याद्री
भूल गया शिवा के घोड़े की तापों को
मत ललकार अपनी गर्वोन्नत ऊंचाई से
बौना कर दूंगा
सदा के लिए
जैसे किया था कभी विन्ध्याद्री को
है आज भी वही तपोबल
कायम

और हे तेजोमणि दिनकर
काली बदली फाड़ झांक रहा
मत ललकार अपनी आग से
अबकी बार छलांग लगा
फल के सामान खाने नहीं आऊंगा
कर लूँगा तेरे तेज को प्राशन
और लगा दूंगा
आग अपने ही हृदय में
वासुदेव, बाल और विनायक
के सामान . . . . .

नवम्बर 6, 2011 Posted by | कविता, English Posts | , , , | टिप्पणी करे

नाभि का संधान !!


एकादशी की सुबह
दशहरा मैदान में
जले रावण की राख समेटते
बूढ़ा वाल्मीकी पोते से बोला
सदियों से हर बार रावण जलता है
और अगले साल फिर
पहले से विशाल चुनौती बन
राम के धर्म के लिए..
इतनी बार जलने के बाद
बचा कहाँ से है रावण आज भी???

आज के रावण अपने अहंकार से
नहीं ललकारते शिव के कैलास को
ना ही है इतना तप
कि अपने हृत्तंत्री  की वीणा से
जटाकटाह  का करे गान
पर हाँ
अपने ऋषितुल्य पिता को
कैद कर वृद्धाश्रम की सलाखों में
जकड़ते अवश्य है!!

भ्रष्ट लूट की नीव पर
सोने की अट्टालिकाओं को
भी उभारते है|
स्वर्ग  तक सीढ़ी लगाने
का स्वप्न भी संजोते है|

आज के रावण
हर सीता की ओर
दुष्ट वासना से देखते हैं
छद्म वेश धारण कर अपहरण के बाद
मंदोदरी के अभाव में
ना जाने आज की अशोक वाटिका
में सत्व और शील की कैसे हो रक्षा??

हर बार जलने के बाद
और अधिक विशाल बन कैसे
आ जाते है फिर
रावण
अपने फैलते साम्राज्य
के दसों मुखों के साथ
आलसी कुम्भकर्ण और
मदमस्त इन्द्रजीत के साथ

राम कहाँ हो??
वानरों की आबादी तो
हर गणना में कोटि कोटि बढ़ती
पर
कौन इन्हें सेना में बाँधेगा?
अनुशासन और संगठन का पाठ
पढ़ायेगा??
यहाँ तो जाम्बवान प्रेरणा के स्थान
पर स्वयं ही सदा
रथ पर सवार

मस्तक तो कई बार गिरे
रावण के
पर फिर वही उन्मत्त अट्टाहास
राम फिर हताश!

भरत पादुका लिए
युग युग से राम के राज्य
की स्थापना कर
कर रहा प्रतीक्षा
रावण है कि हर विजया पर
जलकर भी मरता ही नहीं
दिवाली की जगमग युद्धमय
अ- योध्या चिर प्रतीक्षा में ..

हुश्श
भर एक हताश उछ्श्वास
बोला वाल्मिकी
हे बिभीषण ! कहते है
तुम तो हो चिरंजीव
फिर आओ!
मातली के रथ पर चढ़ जाओ
कहो राम से

राम !! काम नहीं सर काटते
चंद्रमुखी बाणों का
सीधे  साधे  नुकीले
लक्ष्यवेधी शर का करो संधान
प्राणों का केंद्र जहाँ
राक्षस के
उस नाभि को छेदों!

छोटे बड़े कानूनों से नहीं होगा पार
सीधे संविधान पर ही करो अब वार

हे राम!
अब के नाभि का ही हो संधान !!

अक्टूबर 8, 2011 Posted by | कविता, सामायिक टिपण्णी | , , , , , , | 1 टिप्पणी

आक्रोश


भय अथवा
भयंकर वेदना से
जब उठती है
मन के गहरे तल से
चित्कार !!

तो उस स्वर में
कोई तारतम्य
कैसे हो सकता है?

बेसुर, कर्कश ही होगी
वह पुकार
जो अपने या
अपनों की वेदना से
फूटी हो|

ऐसे में
२४ घंटे टूटी, बिखरी
खबरें सुनाते माध्यमों पर
तुम करते रहो
अर्थहीन, अंतहीन
तर्क, आकलन,
अवलोकन और विश्लेषण…..
उछालते रहो
आरोप-प्रत्यारोप
यहाँ से वहां

क्योंकि तुम
कट चुके हो
उन सबसे
जो पड़े है
लथपथ
मृत या जीवित
स्वयं के या
किसी अजनबी के
रक्त से रंजित …..

पर
जो है सच्चा
भारती का लाल
उसे हर
शव में
हर भंग अंग में
व्यर्थ बहे
लहू के कतरों में
अपनी माँ की लूटती
आबरू दीखती है|
अट्टहास करता
अपवित्र पडौसी
और दया दिखाता
विश्व दीखता है|

प्रतिशत के आंकड़ों में
देश की प्रगति को
तौलते विद्वानों पर
तरस आता है कि
विश्व में अग्रणी
बनते राष्ट्र में
मंदिरों,
न्यायालयों,
और संसद को भी
है सुरक्षा की प्रतीक्षा
पाठ पढ़ने को
सन्नद्ध नेतृत्व की
प्रतीक्षा….

नेता इतने आतंकित
कि सदा रहते
अंतिम अक्षरों के
सुरक्षा घेरे में
तब
जनता के आद्याक्षरों
से लेकर पूरी वर्णमाला में
लावा गरजता है|
गगनभेदी चित्कार
उठती है!!
वह ना तो होती है
भय या आतंक की
और ना ही
वेदना या संवेदना की

वो तो होता है
केवल
लाचार, हताश
अगतिक
नपुंसक क्रोध का
वीभत्स अविष्कार

परिवर्तन की
अनहद पुकार
या
एक सामूहिक
आक्रोश!!!

सितम्बर 8, 2011 Posted by | कविता, सामायिक टिपण्णी | , , , | 3 टिप्पणियाँ

सत्य पथ


सत्य का पथ
कहते है कि बडा
कन्ट्काकीर्ण होता है
सत्य का पथ !

पर
अनुभव तो है ये कि
सत्यपथ सदाही
मनोहर होता है।

हां बाधायें तो निश्चित
अधिक आयेंगी।
पर हौसला भी तो
औरों से अधिक होगा।
साथी भी भले
संख्या में कम लगे
पर होंगे सच्चे और पक्के।
सत्यपथ के
सहपथिक ही
साथी कहलाते है।

तो साथी कभी
अकेला
ना अनुभव करना।
चाहे देनी पडे
सैंकडों बार
अग्निपरीक्षा !

या किसी  धोबी के
भौंकने से
करना पडे बार बार
वनगमन!

हे मेरे सत्यपथी
छोडना न साथ
सत्य का
तोड़ना न व्रत
धर्म का …

जून 25, 2011 Posted by | कविता | 3 टिप्पणियाँ

   

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