उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

समुत्कर्ष का साधन – धर्म


कर्मयोग 13:
जिस देश में प्रतिदिन पूजा के समय 192 करोड़ वर्ष की गणना के साथ संकल्प किया जाता हो, उसके लिये 2000 वर्ष कोई बहुत बड़ा काल नहीं है। पर जिनका इतिहास ही उनके ईश्वरदूत के जन्म से प्रारम्भ होता है उनके लिये ये बहुत ही बड़ी अवधि है। दूसरा उनकी कालगणना भी एकरेखीय होने के कारण उसमें परिवर्तन की एक ही दिशा देखी जा सकती है। हम हिन्दू अधिक वैज्ञानिक कालगणना के आदि है अतः हम कालचक्र की बात करते हैं और जानते हैं कि समय तो चक्रीय गति में चलता है अतः इसमें परिवर्तन भी किसी चक्र की भाँति होता है। सत्ययुग के बाद क्रमशः पतन होते हुए कलियुग आता है उसी प्रकार फिर उन्नति की सम्भावना भी बनी रहती है और पुनः सत्ययुग का आगमन निश्चित है। इसी अनादि अनन्त जीवन को जानकर हम अपने कर्म को धर्म के अनुसार करने का प्रयास करते है। सब परिस्थितियों में लागू करने योग्य शाश्वत अपरिवर्तनीय सिद्धान्तों पर आधारित सनातन धर्म को समझकर युग के अनुसार उसे लागू करने युगधर्म की व्याख्या भी समय समय पर होती रहती है। यही कारण है कि चिर पुरातन होते हुए भी यह संस्कृति नित्य नूतन भी है। सतत प्रवाहित नदी के समान ही इसमें मैल इकट्ठा नहीं होता और यह अपनी निर्मलता को पुनः स्थापित कर लेती है। गत कुछ शताब्दियों के संघर्ष काल के कारण यह युगानुकुल नवनिर्माण की प्रक्रिया कुछ शिथिल हो गयी है और हमारा कर्तव्य है कि सनातन धर्म को पुनः युगधर्म के रूप में व्यवस्था में स्थापित कर लें।

युनानी विद्वान मेगेस्थेनिस सम्राट चन्द्रगुप्त के समय भारत में आया था। निश्चित तो कहा नहीं जा सकता किन्तु ईसापूर्व 228 अर्थात लगभग 2200 वर्ष पूर्व का काल इतिहासकार बताते है। उसने अपने अनुभवों को शब्दबद्ध किया ‘इण्डिका’ नामक दैनन्दिनी में। वह भारत के वैभव, समाजरचना,  कृषि सभी से अभिभूत था। किसी परिकथा के समान भारत का वर्णन उसके शब्दों में मिलता है। सबसे आश्चर्य उसे यहाँ की शांति को देखकर हुआ। कहीं कोई झगड़ा टंटा नहीं। कानूनी विवाद भी यदा कदा ही होते थे। कोई आपसी विवाद हो भी गया तो सहजता से उसका निपटारा हो जाता था। वैभवशाली स्वर्णयुग की हम बात कर रहे है। सब सम्पन्न थे, प्रसन्न थे। उसे जो पहला वादविवाद मिला वो था दो किसानों के बीच, पाटलीपुत्र, आज के पटना के पास। गाँव के सब लोग जमा थे। एक किसान ने कुछ दिन पूर्व ही अपनी खेती दूसरे को बेची थी। क्रेता ने जब जुताई प्रारम्भ की तो उसे उस जमीन में एक सोने का बरतन मिला जिसमें सोने के गहने भरे थें। वह किसान विक्रेता के पास उस सोने को ले आया और कहने लगा कि ये आपके पूर्वजों की सम्पत्ति है आप ले ले। विक्रेता किसान उसे लेने को तैयार नहीं था। उसका तर्क था कि जब मैने भूमि का सौदा किया तो उसके साथ उसमें जो भी था वह भी क्रेता का हो गया। दोनों अपने अपने तर्कों के अनुसार उस सोने पर दूसरे का ही अधिकार बता रहे थे। विवाद सम्पत्ति को रखने का नहीं, ना रखने का था। दोनों धर्म का वास्ता दें रहे थे। धर्म के अनुसार उस सम्पत्ति पर अपना अधिकार ना होने के कारण उसे अपने घर में रखना विषवत् मान रहे थे। बात तो न्यायालय तक भी गयी। न्यायालय ने क्रेता का अधिकार बताया किन्तु फिर भी वह किसान तैयार नहीं था उस धन को स्वीकार करने के लिये। उसका कथन था कि उसके सौदे के समय यह नियम नही था अतः धर्म को पूर्ववर्ती समय से लागू नहीं किया जा सकता। धन को राजा को सौंप दिया गया इस चेतावनी के साथ कि केवल धर्मकार्य अर्थात जनता के कल्याण के कार्य में ही इसका प्रयोग हो। यदि राजा ने भी अपने नीजी अथवा राजकार्य में इस अनधिकार धन का प्रयोग किया तो राज्य का भी अहित होगा। ऐसी धर्म की व्यवस्था इस देश में थी।
धर्म का ये व्यवस्थागत अर्थ समझना सबसे अधिक आवश्यक है। धर्म केवल व्यक्तिगत जीवन को सुव्यवस्थित करने का ही उपाय नहीं है वास्तविकता में यह ऐसी सामाजिक व्यवस्था को स्थापित करने का नाम है जिसमे सबका हित हो। सबका साथ साथ विकास हो। विनोबा भावे ने इसे सर्वोदय का नाम दिया था। गांधी पंक्ति में खड़े अंतिम व्यक्ति के विकास को राज्य की व्यवस्था का लक्ष्य मानते थे। इसी को पंड़ित दीनदयाल उपाध्याय ने नाम दिया ‘अन्त्योदय’। धर्म केवल सबके विकास की बात नहीं करता, सर्वांगीण विकास की बात करता है। सबका सर्वांगीण विकास। धर्म के अनुसार मानव के एकात्मिक विकास के दो अंग है – अभ्युदय तथा निःश्रेयस। यह दोनों मिलकर धर्म को परिभाषित करते है- अभ्युदय निःश्रेयसानि धर्मः।

अभ्युदय का अर्थ है पूर्ण उदय। अभि उपसर्ग लगाने से उदय के बाहरी व सर्वतोमूखी होने का अर्थ निकलता है। अभि उदय, अभ्युदय अर्थात पूर्ण भौतिक विकास। पूर्ण में संवेदना भी आती है। अतः, यह बाहरी विकास भी जैसा कि आधुनिक जीवन में हम देखते है, केवल मानव का एकांगी विकास नहीं है। ना ही यह केवल आर्थिक विकास है। अभ्युदय में विज्ञान और तकनिक के साथ ही पर्यावरण का भी ध्यान रखा जायेगा। अतः अक्षय विकास को लक्ष्य करती तकनिक का ही विकास किया जायेगा। प्रकृति का दोहन होगा शोषण नहीं। दोहन दूध निकालने की प्रक्रिया को कहते है। भारतीय परम्परा में उतना ही दूध निकाला जाता है जितना आवश्यक है। बछड़े के लिये पर्याप्त मात्रा में दूध छोड़ दिया जाता है। क्योंकि संवेदना है। गाय केवल आर्थिक उत्पादन का साधन नहीं तो माँ के स्थान पर है। ऐसी प्रक्रिया से भी विश्व का सर्वाधिक दूध उत्पादन करनेवाला देश भारत सदैव रहा है। गोवंश की संख्या मानव जनसंख्या से कई गुना अधिक रही है। यह सम्पन्नता का मापदण्ड भी है।

आज हम अभ्युदय के सर्वांगीण अर्थ को भूल गये हैं इसी कारण केवल पैसे को ही सर्वस्व मानती इस व्यवस्था में गायों के साथ कृत्रिम गर्भाधान से लेकर अधिक दूध पाने के लिये हारमोन इन्जेक्शन जैसे अत्याचार किये जाते है। यह शोषण है, दोहन नहीं। साथ ही बूचड़खानों में गोवंश के कटने का अनुपात भी कई गुना होता जा रहा है। इस कारण गोवंश का मानव जनसंख्या की तुलना में कम होना पर्यावरण संतुलन के साथ ही अभ्युदय में भी गिरावट लाता है। ब्रिटेन में कुछ वर्ष पूर्व इस लोभ में गाय को मांस खिलाने का अघोरी उपाय किया गया। कहा गया कि इससे गोमांस अधिक वजनदार होता है और अधिक लाभ होगा। इस राक्षसी विचार का परिणाम यह हुआ कि विक्षिप्त गो विकार (Mad Cow Decease)  से हजारों लोगों की मृत्यु हुई। वर्तमान में फैल रही पक्षीजन्य ज्वर (Bird Flue) के पीछे भी ऐसी कोई आसुरी वासना काम कर रही है। यह केवल उपासना की बात नहीं है। गाय के साथ मानव के विकास का सीधा वैज्ञानिक सम्बन्ध है। इस बात को समझना धर्म है।

केवल अर्थोत्पादन को ही विकास मानने के कारण पर्यावरण का विनाश हर स्तर पर देखा जा रहा है। रासायनिक खाद, कीटनाशक तथा संकरित व अब तो जैव-विकृत (Genetically Modified) बीजों के कारण कृषि उत्पादन में भले ही वृद्धि दिखाई दे रही हो पर साथ में भूमि की उत्पादकता, खाद्यान्न की शुचिता व किसान के शुद्ध लाभ में दिनोंदिन हो रही गिरावट कुल मिलाकर गणित को नुकसान में ही ले जा रही है। इन सब अप्राकृतिक माध्यमों से आर्थिक लाभ को बढ़ाने के कृत्रिम प्रयासों ने विकास का बड़ा सा बुलबुला बना दिया है। किसानों की बढ़ती आत्महत्याओं से यह स्पष्ट होता है। बात केवल इन प्राकृतिक संसाधनों तक ही सीमित नहीं है। मानव के लोभ ने प्रकृति, समाज तथा देशों तक का शोषण स्वयं के लाभ के लिये किया है। इस अंधादुंध स्पर्धा के बाद भी सारे तथाकथित विकसित देश आज खोखलापन उजागर होने से दिवालियापन के कगार पर है। इन देशों का ऋण इनकी सम्पदा के कई गुना हो गया है। यह आसुरी वृत्ति का परिणाम है। गीता के 16 वे अध्याय में इसका वर्णन हमें मिलता है। आशपाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः। ईहर्थेकामभोगार्थम् अन्यायेनार्थ संचयान्।। गी 16.12।। बिना धर्म के नियन्त्रण के अर्थ व काम पुरुषार्थ के पीछे पागल होनेवाले आसुरी वृत्ति के लोग सैंकड़ों ईच्छारुपी आशा के पाश में बन्धें काम और क्रोध में फँस जाते है। और लौकिक जीवन के भोगों की इच्छा से अन्याय पूर्वक अर्थात शोषण से अर्थ का संचय करते है। ऋण लेकर घी पीने की वकालत करने वाले चार्वाक की तरह ये आसुरी लोभी व्यवस्था धर्महीन अर्थ के दुश्चक्र में फँस जाती है। गतवर्ष जो वैश्विक वित्तीय संकट आया था उसके मूल में यही बिना उत्पादन के केवल मुद्रा के चलन के द्वारा लाभ का भ्रम पैदा करने की माया ही कारण थी। एक ही सम्पदा पर कई बार ऋण दिया गया और फिर जब उसके वापसी ना होने की स्थिति बनीं तो देशों ने झूठीं हुंण्डियों (Bonds) के सहारे विश्व में ही उथल पुथल मचा दी। यह अभ्युदय को ना समझने का परिणाम है, अधर्म है। गीता इस दुश्चक्र का स्पष्ट वर्णन करती है- इदम् अद्य मया लब्धं, इमं प्राप्स्ये मनोरथं। इदम् अस्ति इदम् अपि मे भविष्यति पुनर्धनं।। गी 16.13।।  यह अभी मुझे मिल गया पर जो नहीं मिला वो भी पाने की मन में इच्छा है बिना उसके लिये कष्ट किये। फिर ये मेरा है, ये और मेरा होगा ऐसे धन को फिर फिर कैसे बनाया जाय। ऋण पत्र (Credit Cards), वायदा कारोबार (Speculative Commodity Market) तथा पुंजी बाजार (Share Market) यह सब जुए के ही  वैधानिक रुप है।

अभ्युदय वास्तविक विकास का नाम है। दिखावे का नहीं। इसमें केवल आंकड़ेबाजी नहीं है। इसमें यर्थाथ में वीरता से पृथ्वि का दोहन कर धन, सम्पदा और इससे भी अधिक गहन ‘श्री’ का उत्पादन किया जाता है। केवल अपने लिये नहीं सब के लिये। सब में केवल मानव मात्र नहीं पूरी सृष्टि के संगोपन की बात है। अतः अभ्युदय के लिये निःश्रेयस का आधार अनिवार्य है। सामान्यतः निःश्रेयस को आध्यात्मिक विकास कह दिया जाता है। इससे बात स्पष्ट नहीं होती वास्तव में धुंधली होती है। यदि आध्यात्मिक विकास की ही बात करनी थी तो सीधे आत्मोदय ही कह देते। अभ्युदय और आत्मोदय। पर यहाँ पद है निःश्रेयस। अतः इस पद के प्रत्यय को, वैज्ञानिक अर्थ को समझना होगा। तभी धर्म को ठीक से समझ पायेंगे। आध्यात्मिक विकास यह अर्थ गलत नहीं है अपूर्ण है। निः श्रेयस्, हम सबको श्री की ओर ले जाने वाला। श्रेय को हमने पिछले प्रकरणों में विस्तार से समझा है। यहाँ व्यक्तिगत श्रेय की बात नहीं यह अंतिम कल्याण की बात है। इसीलिये इसको आध्यात्म से जोड़कर भी देख जाता है। किन्तु धर्म के अंग के रुप में इसको समझने में हमे ठीक से इसकी व्याख्या करनी होगी। श्रेयस् अर्थात श्री की ओर ले जाने वाला। पर इसका परिपूर्ण रुप, अंतिम स्वरुप निःश्रेयस इसको कैसे समझेंगे। यहाँ हमे अपने स्व की संकल्पना को ठीक से समझना होगा। स्व के सतत् विस्तारित होनवाले अखण्डमण्डल स्वरूप का साक्षत्कार ही निःश्रेयस है। यह अनुभूति हमें मानव के एकात्म स्वरुप का दर्शन कराती है। जिसे गीता में अविभक्त कहा है। सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते। अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्विकं।।गी 18.20।। जो कुछ भी अस्तीत्व में है, बना है उसे भूत कहते है। भू- भवति इस संस्कृत धातु का यह रुप है। इस सब में एक, अव्यय अर्थात अखण्ड, बिना किसी भी क्षति के एक भाव को ईक्षते- अर्थात देखना ही सच्चा, सात्विक ज्ञान है। बाहर से विभक्त अर्थात बिखरे, असम्बद्ध दिखाई देनेवाले जगत को अविभक्त अर्थात एक अखण्ड देखना ही ज्ञान है। इस ज्ञान की अनुभूति ही निःश्रेयस है। इस मानव के तथा जगत के एकात्म स्वरुप को देखे बिना अभ्युदय की परिकल्पना ही नहीं की जा सकती।

साथ में दिये चित्र में यह स्पष्ट होता है। मेरा ही विस्तारित रुप परिवार, समाज, राष्ट्र, सृष्टि व अन्ततः परमेष्टि है। यह समझने से सब का एकात्म विकास ही सच्चा विकास हो सकता हे यह भी समझ में आता है। एक के शोषण से दूसरे का किया विकास यथार्थ में विनाश को ही निमन्त्रण देता है। अपनी गहन अन्तर्दृष्टि से ऋषियों ने जिस सत्य को देख लिया था और उसपर आधारित आदर्श व्यवस्था धर्म का मार्ग भी समय समय पर प्रशस्त किया था। भारत में इसे धर्म कहा। अभ्युदय व निःश्रेयस का समन्वित, संतुलित तथा समुचित अनुपालन इसे एक शब्द में समुत्कर्ष कहा गया। सम्यक उत्कर्ष अर्थात भौतिक, आर्थिक, बाह्य विकास के साथ ही सबके कल्याण का भी उचित ध्यान यह धर्म की व्यवस्थागत परिभाषा है। जब धर्मराज्य की बात होती है तो धर्म के इस अर्थ की बात हो रही होती है। आज आधुनिक मानव विकास के नाम पर हर स्तर पर भयावह, विनाशकारी परिणामों के कारण इसकी आवश्यकता को अनुभव कर रहा है। फिर भी अभी भी वह इस समझ के निकट नहीं पहुँचा है। वर्तमान समय में अक्षय विकास (Sustainable Development), समग्र विकास (Holistic Development) तथा जैव विकास (Organic Development) जैसी शब्दावली का तो चलन हो गया है किन्तु इसके वास्तविक स्वरुप सनातन धर्म के वर्तमान में समुचित युगधर्म का विकास होना अभी बाकी है। यह भारत का वैश्विक कर्तव्य है – धर्माधारित व्यवस्था की स्थापना कर जगत का मार्गदर्शन करना।

किन्तु इसका प्रारम्भ अपने देश में ऐसी धर्माधारित व्यवस्था का निर्माण करने से ही होगा। अतः हमें अपने ऐतिहासिक, सांस्कृतिक अनुभव पर आधारित राजनयिक, सामाजिक तथा आर्थिक व्यवस्था का निर्माण करना होगा। राष्ट्रकार्य के लिये बौद्धिक वीरों की आज अत्यधिक आवश्यकता है। ऋषियों की भूमि में गहन, मौलिक अनुसंधान का साहस आज युवाओं में कम ही देखने को मिल रहा है। आज पुनः यह वीरव्रत धारण करने की आवश्यकता है। अविश्वास व व्यक्तिगत अधिकार के स्थान पर विश्वास व कर्तव्य पर आधृत संविधान से प्रारम्भ कर सभी न्यायिक, प्रशासनिक व्यवस्थाओं में वर्तमान युगानुकूल धर्म को स्थापित करने हेतु सम्यक अनुसंधान करने आधुनिक ऋषि चाहिये। व्यक्तिगत लोभ, लाभ व प्रतिस्पर्द्धा के स्थान पर मौलिक, उत्पादक सच्ची ‘श्री’मन्त अर्थव्यवस्था का पुनर्गवेषण कौटिल्य सा अध्ययन मांगता है। आज माँ भारती पुनः न्याय, सांख्य तथा मिमांसा दर्शनों के दृष्टा गौतम, कपिल, जैमिनी, विश्व के प्रथम विधिदाता मनु, विदेह के मार्गदर्शक याज्ञवल्क्य, रामराज्य के रचनाकार व योगवाशिष्ठ के पुरोहित महर्षि वशिष्ठ, चणकपुत्र विष्णुगुप्त, विजयनगर के अधिष्ठाता विद्यारण्य स्वामी, शिवाजी के आज्ञापत्र के रचयिता रामचन्द्र अमात्य और भीमराव आम्बेड़कर के समान ही आधुनिक स्मृतिकर्ताओं की चमू की प्रतिक्षा कर रही है। ताकि पुनः गीताकार के कर्मयोग की विजय हो और कृष्णं वन्दं जगद्गुरुं को भारत फिर साक्षात् कर दिखायें।

फ़रवरी 29, 2012 Posted by | योग | , , , | 4 टिप्पणियाँ

धर्म का मर्म


कर्मयोग 11:
धर्म के आचरण को मानव का सबसे बड़ा रक्षक और साथी माना जाता रहा है। रामायण में जब राम वनवास में जाने से पूर्व माता कौसल्या का आशिर्वाद ग्रहण करने जाते है तो माता यही आशिर्वाद देती है। यदि आज तक तूमने जीवन में धर्म का पालन किया है, तो वह निर्वाह किया हुआ धर्म सभी संकटों में तुम्हारी रक्षा करेगा। धर्मो रक्षति रक्षितः। जो धर्म की रक्षा करता है धर्म उसकी रक्षा करता है। महाभारत युद्ध से पूर्व जब दूर्योधन अपनी माता गांधारी का आशिर्वाद लेने जाता है तब वह भी यही तत्व बताती है। माँ द्वारा युद्धोत्सुक पूत्र को दीर्घ जीवन का आशिर्वाद दिये जाने पर दूर्योधन आश्चर्य से पूछता है। आपने मुझे विजय का आशिर्वाद नहीं दिया? तब माता उत्तर में धर्म का मर्म बताती है – श्रृणु मुढ़ः। यतो धर्मः ततो जयः। यतो कृष्णः ततो धर्मः। हे मूर्ख सुन, जिस पक्ष में धर्म होगा उसी की विजय होगी। और जहाँ स्वयं कृष्ण है वही धर्म होगा। जब मानव धर्म के मर्म को स्वयं के जीवन में उतार लेता है तब उसका कर्म ही धर्म का मापदण्ड़ बन जाता है। वह स्वयं धर्म का मूर्तिमंत रुप बन जाता है। वाल्मिकी रामायण में कहा है – रामो विग्रहवान धर्मः। राम मूर्तिमन्त धर्म है।

गीता का प्रारम्भ ही धर्म शब्द से होता है। धर्मक्षेत्रे कुरूक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।गी 1.1। धर्म का क्षेत्र, और उसका नाम है कुरूक्षेत्र। कुरू का अर्थ है ‘करो’। अर्थात जो कर्म का क्षेत्र है वही धर्म का क्षेत्र है। संस्कृत में शब्दों का क्रम बदल कर भी अर्थ समान रहता है। अतः इसी पंक्ति को एसे भी समझ सकते हैं। क्षेत्रे क्षेत्रे धर्मं कुरू। अर्थात जीवन के हर क्षेत्र में धर्म का आचरण करों। यह तो पूरी गीता का ही सार हुआ। गीता में क्षेत्र का भी अर्थ विस्तार से समझाया है। पूरा 13 वा अध्याय ही क्षेत्र व क्षेत्रज्ञ के बीच में भेद व सम्बन्ध के बारे में है। क्षेत्र का एक अर्थ है खेत। खेत शब्द की उत्पत्ती ही क्षेत्र से हुई है। उच्चारभेद में क्ष का ख होना सामान्यसा भाषाशास्त्रीय नियम है। गीता पूरे जगत को ही खेत कहती है और ईश्वरीय आत्मतत्व है जो इस खेत में खेती करने वाला किसान है। गीता में इसे क्षेत्रज्ञ कहा है- खेत को जानने वाला। कर्म की खेती में धर्म के नियम लागू करने से ही जीवन में आनन्द व मुक्ति की फसल पा सकेंगे।

आधुनिक समय में धर्म का अर्थ सीमित कर दिया है इसी कारण जब गीता में धर्म की बात होती है तो उसे समझने में कई बार भूल हो जाती है। यह नहीं कहा जा सकता कि इतिहास में कब से धर्म को मत, सम्प्रदाय अथवा पंथ के पर्यायी के रुप में देख जाने लगा, किन्तु गीता में इस पद का प्रयोग इस अर्थ में एक बार भी नहीं हुआ है। भारतीय संकृति में जीवन के शाश्वत अर्थात समयातीत, सभी युगों तथा देशों में लागू होने वाले नियमों को सनातन धर्म कहा गया। इसमें व्यक्ति का व्यक्ति से, व्यक्ति का समष्टि अर्थात सब प्रकार की सामूहिक रचना यथा जनजाति, समाज या राष्ट्र से, व्यक्ति व समष्टि का सृष्टि अर्थात सम्पूर्ण प्राणी व वनस्पति जगत के साथ ही समस्त पर्यावरण के साथ सम्बंधों के बारे में शाश्वत नियमों को जानकर उनपर आधारित जीवनरचना को साकार किया गया। यह पूरी समझ वैज्ञानिक होने के कारण ही सबके लिये समान थी केवल इसकी बाह्य अभिव्यक्ति देश काल के अनुसार विविध हो सकती है। इस सत्य को समझने के कारण ही भारत में विविधता के कारण संघर्ष के स्थान पर समारोह होता है। विविधता का केवल सम्मान ही नही पूजन किया जाता है। इन्ही नियमों में व्यक्ति तथा समष्टि के परमेष्टि अर्थात सर्वव्यापी परमसत्ता से सम्बन्ध को भी परिभाषित किया गया। सम्भवतः इसी अंग के कारण जब संकुचित उपासना पद्धति आधारित सम्प्रदायों से सामना हुआ तब उनकी पंथानुभूति को भी इसी विविधता में से एक समझा गया। पर यह तो भारतीय मूल के सम्प्रदायों की समझ थी जिसे अन्य कट्टर तत्वधारी संकीर्ण मत नहीं मानते थे। हमारे इतिहास में इन मतों के आक्रमणों को ना समझ पाने के कारण बड़ा नुकसान हुआ है। अतः धर्म का अर्थ ठीक से समझना आवश्यक है। सबसे पहले तो यह स्पष्ट कर लेना आवश्यक है कि अंगरेजी के शब्द Religion का अनुवाद धर्म नहीं हो सकता। उन्हें पंथ अथवा मत कह सकते है। भगिनी निवेदिता ने इस भेद को स्ष्ट करने के लिये अंगरेजी में पुस्तक लिखी – Religion and Dharma जिसका हिन्दी अनुवाद कार्यकर्ताओं के लिये ध्येयमार्ग में अत्यंत उपयागी है इसीलिये हिन्दी में इस पुस्तक का शीर्षक है -‘पथ और पाथेय’

जीवन के सनातन नियमों को धर्म कहते हैं। इस विशाल समझ को हम कुछ वैज्ञानिक भागों में विश्लेषित कर ठीक से जान सकते है। इससे यह भी स्पष्ट होगा कि किस प्रकार भिन्न भिन्न सन्दर्भ में धर्म का लाक्षणिक अर्थ अलग अलग छटा के साथ प्रयोग में आता है। जीवन को समझने में जगत की अभिव्यक्ति के सभी अंगों को उनके वास्तविक स्वरूप में जानना होता है। जब वस्तु के वास्तविक रुप अर्थात स्वभाव की समझ को बताना होता है तो उसे उस वस्तु का धर्म कहते है। जैसे अग्नि का धर्म है दाहकता। अब यहाँ आग की जलाने की क्षमता व स्वभाव को दर्शाने के लिये धर्म पद प्रयुक्त हुआ। इसी अर्थ में हम रसायनशास्त्र में जब भिन्न भिन्न रसायनों का वर्णन करते है तो कहते है ये प्राणवायु के गुणधर्म है। यहाँ धर्म गुण अथवा स्वभाव के रुप में प्रयोग हुआ है। जीवनमें उस वस्तु, व्यक्ति अथवा समूह के सम्बन्ध को परिभाषित करने के लिये उसके सनातन गुण या स्वभाव को समझना आवश्यक है इसिलिये यहा धर्म पद का प्रयोग उचित ही है।

केवल वस्तु के स्वभाव को ही नहीं मानव के विशिष्ट स्वभाव को भी धर्म ही कहा गया है। गीता इसी को स्वधर्म कहती है। स्वधर्म ही मानव कोअपने पशुवत् वृत्तियों को नियन्त्रित करने की क्षमता प्रदान करता है और अपने जीवन का समग्र विकास करने का मार्ग प्रदान करता है। इस अर्थ में धर्म आत्मविकास का मार्ग है। पशुमानव से मानव, मानव से महामानव व महामानव से दिव्य मानव और अन्ततः साक्षात दिव्यता को ही प्राप्त करने का मार्ग धर्म है। इसी सन्दर्भ में स्वामी विवेकानन्द कहते है, ‘‘आत्मसाक्षत्कार ही धर्म है।’’ और विस्तार से इसका विवरण भी वे देते है, ‘‘प्रत्येक जीव में अन्तर्निहित दिव्यत्व है। इस दिव्यता को जीवन मे प्रगट करना ही जीवन का लक्ष्य है। प्रकृति के अन्तर्बाह्य नियमन से ही यह सम्भव है। ज्ञानयोग वा भक्तियोग, राजयोग वा कर्मयोग इन चारों में से एक अथवा अनेक या कि सभी के आचरण द्वारा मुक्त हेाना ही धर्म का मर्म है। बाकि सारी बाते जैसे पुस्तकें, परम्परा, उपासना के नियम, मंदिर, मठ यह सब तो गौण उपचार मात्र है।’’ धर्म के इसी अर्थ का विपर्याय होकर इसे केवल उपासना पद्धति के रूप में उसे संकुचित कर देख गया। एक ईश्वर, एक दूत व एक ग्रंथ पर आधारित मत अपने को ही समग्र मान कर अंतिम सत्य के रूप में प्रचारित करने लगते है। इसी एक मार्ग से मुक्ति सम्भव है इस विश्वास को लेकर पूरे विश्व को ज्ञान अथवा शस्त्र बल के आधार पर अपने मत में मतांतरित करने का प्रयास करते है। इससे ही पूरे विश्व में संर्घष व आतंक का प्रादुर्भाव हुआ है। ऐसे मतों के समकक्ष वैज्ञानिक विचार पर आधारित सदा गतिमान सनातन धर्म अथवा वर्तमान में प्रचलित इसके नामाभिधान हिन्दूत्व को नहीं रखा जा सकता। जो थोथी पंथनिरपेक्षता के चक्कर में इस्लाम, इसाई, यहुदी, पारसी आदि पंथों के साथ ही हिन्दू धर्म की तुलना करते हुए सबको समान बताते है वह सत्य से कोसों दूर है। दिखवटी समानता के प्रचार के स्थान पर इनके तुलनात्मक अध्ययन से इनके भेद को समझकर स्वीकार करना ही शांति का स्थायी मार्ग है। हमारे ऋषियों ने इसीका प्रतिपादन किया था – ‘एकं सत् विप्राः बहुदा वदन्ति।’ सत्य एक है, ज्ञानीजन उसका अनेक प्रकार से वर्णन करते हैं। इसे स्वीकार करने पर ही पंथ धर्म का रुप ले सकते है। अन्यथा उनको समान कहना उचित नहीं है।

व्यक्ति व समूह के द्वारा कर्म के माध्यम से ही सम्बन्धों का निर्वाह किया जाता है। इस निबाहने वाले व्यवहार से कुछ अपेक्षायें होती है। उस आधार पर नियमावली विकसित होती है। उसे भी धर्म कहते है। हमारा किसी के साथ कैसा व्यवहार हो इसे अभिव्यक्त करते समय भी धर्म शब्द का प्रयोग होता है। अतः हर सम्बन्ध का अपना धर्म है। पति धर्म, पुत्र धर्म, पड़ौसी का धर्म, राजधर्म यह सब सम्बन्धों को निभाने की विधियाँ हे जिसे धर्म कहा गया है। यह धर्म का एक और अर्थ हुआ। इसमें यह कर्तव्य का रुप धारण करता है। जब हम पतिधर्म या पत्निधर्म की बात करते हे तो पति के पत्नि के प्रति या पत्नि के पति के प्रति कर्तव्य की बात कर रहे होते है। कर्तव्य का ही कर्म में निर्वाह हो सकता है। वर्तमान समय में कर्तव्य को महत्व देने के स्थान पर उसके परिणाम स्वरुप सम्बन्धी को प्राप्त होनवाले लाभ को महत्व दिया गया है। इसे ‘अधिकार’ कहा जाने लगा। अब सारी बात ही उलटी हो गई। अधिकार परिणाम होने के स्थान पर अपेक्षित कर्म बन गये। जब व्यक्ति अपने कर्तव्य के स्थान पर दूसरे के कर्तव्य के फलस्वरूप हमें प्राप्य परिणाम की अपेक्षा को ही जीवन का आधार बना लेता है तो स्वाभाविक ही जीवन परावलम्बी हो जाता है। हम इन अपेक्षाओं को लेकर संघर्ष में पड़ जाते हैं। इसके विपरित यदि प्रत्येक अपने धर्म अर्थात कर्तव्य का पालन करने लगे तो परिणाम स्वरुप सहज ही दूसरों के अधिकारों की पूर्तता हो जायेगी। यह अधिक वैज्ञानिक भी है। कर्तव्य कर्मप्रधान होने के कारण हमारे अधिकार में, नियन्त्रण में है। अधिकार का वास्तविक अर्थ यही है- जिस पर हमारा स्वामीत्व है। दूसरी ओर जिसे आजकल अंगरेजी के Right शब्द के पर्याय अधिकार के रुप में समझा जाता है वह अपेक्षा पर आधारित होने के कारण केवल सम्भावना के अधीन है अतः हमारे नियन्त्रण में नहीं है। कितनी मजेदार बात हुई जिसे हम अधिकार मान रहे है वो वैज्ञानिक तथ्य के अनुसार हमारे अधिकार में ही नहीं है। धर्म का कर्तव्य यह अर्थ भी उसके बृहत् प्रत्यय सृष्टि के सनातन नियम का ही एक अंग है।

यह कर्तव्य धर्म सम्बन्धों के संजाल के द्वारा समाज को धारण करता है। यह धारण करने का कर्म ही उसे धर्म यह नाम प्रदान करता है। अतः समाज को धारण करने की प्रक्रिया को धर्म कहा गया। इसके लिये आध्यात्मिक, औपासनिक व न्यायिक इन तीनों व्यवस्थाओं का निर्माण होता है। अतः धर्म ही विधि अर्थात कानून का रुप लेता है। यदि समाज की प्रगल्भता पर्याप्त रुप से विकसित ना हो ता इसे राजकीय मान्यता की आवश्यकता पड़ती है अतः विधि की रचना करनी पड़ती है। बिना राजनैतिक हस्तक्षेप के सनातन नियमों की युगानुकुल व्याख्या के समाज में रुढ़ होकर उसके द्वारा समाज की सहज धारणा ही आदर्श समाज रचना है। इसीको धर्मराज्य कहा गया। भारत में धर्मराज्य का अर्थ अंगरेजी के Theocracy से नहीं होकर, समाज में धर्म के प्रस्थापित होने से राज्य के विसर्जित हो जाने व मानवीय मूल्यों द्वारा ही प्रत्येक व्यक्ति द्वारा स्वतः एकल व सामूहिक कर्तव्य का पालन किया जाना है। महाभारत के शांतिपर्व में शरशैयापर लेटे भीष्म द्वारा युधिष्ठिर को इसी धर्मराज्य की स्थापना के सुत्रों का मार्गदर्शन किया गया है। उस समय वे पूर्व में साकार धर्मराज्यों का विवरण करते है। न राज्यो न च राजा आसीत, न दण्डों न दण्डितः। न तो कोई राजा आवश्यक था ना ही कोई शासन व्यवस्था। न किसी को सजा देने की आवश्यकता पड़ती थी। धर्मेनैव प्रजा सर्वा रक्षन्ति स्म परस्परं। वर्तन्ति स्म परस्परं।। धर्म के द्वारा ही सारी प्रजा एकदुसरे का परस्पर रक्षण करती थी। एक दूसरे से निर्वाह करती थी।

यह धर्म स्थापित करना ही मानवमात्र का व्यक्तिगत व सामूहिक जीवनध्येय है। इसिलिये इसे चतुविर्ध पुरुषार्थ का सबसे महत्वपूर्ण आधार माना गया है। यह चार पूरूषार्थों में से केवल एक नही हैं। अर्थ व काम को भी धर्म के ही आधार पर करना है। मोक्ष अपने आप में इससे उपर सर्वोच्च लक्ष्य है। जब तक जगत के नियमों से मुक्त नहीं हो जाते तब तक बाकि तीनों पुरूषार्थ ही जीवन का लक्ष्य है और वे तीनों ही धर्म के ही अंग है। मोक्ष की आकांक्षा भी धर्म का ही परिणाम है। जीवन में सब स्तरों पर धर्म का निर्वाह करने से चित्त की शुद्धि के कारण ही मुमुक्षा- मोक्ष की ईच्छा जागृत होती हैं। यह मुमुक्षा ही मोक्ष की ओर अग्रेसर करती है। अतः इसका भी मूल भी धर्म में ही है। यह धर्म का व्यवस्थागत रुप है। इसीकी संस्थापना के लिये बार बार अवतार होते है। इस धर्माधारित विश्वव्यवस्था को अगली बार विस्तार से देखेंगे। तब तक धर्म पद के इन पाँच प्रत्ययों, अर्थछटाओं को हृदयंगम करना आवश्यक है। 1. स्वभाव या गुणधर्म, 2. आत्म विकास का मार्ग, 3. व्यक्ति, समाज, सृष्टि तथा परमेष्टि के आपसी सम्बन्धों के निर्वहन में प्रयुक्त कर्तव्य, 4. विधि अथवा कानून तथा 5. समस्त जगत को धारण करने वाला आधार तत्व यह धर्म के पाँच आयाम हमने देखें। यह समझने के लिये भले ही अलग अलग विश्लेषित किये गये हो इनका अन्तर्निहित मर्म एक ही है। उसका साक्षात्कार ही अपने जीवन में धर्मस्थापना है। धर्म के मर्म को समझे और अपने जीवन में उतारे यही सच्चा योग है।

फ़रवरी 15, 2012 Posted by | योग | , , , , , , , , , | 3 टिप्पणियाँ

गण संस्कृति यज्ञ संस्कृति


‘‘हम भारतवासी, पूरी गंभीरता से भारत को एक सार्वभौम, लोकतान्त्रिक गणराज्य के रुप में संगठित करने का संकल्प करते है।’’ भारत के संविधान की मूल प्रस्तावना की यह प्रारम्भिक पंक्तियाँ  हैं। 1975 में पूरे देश में आपात्काल थोपकर संविधान की हत्या करनेवाले 42 वे संविधान संशोधन में इसमें सार्वभौम के बाद पंथनिरपेक्ष तथा समाजवादी ये दो विशेषण और जोड़े गये। संविधान की मूल प्रकृति तथा प्रावधान में किसी भी प्रकार के संशोधन के बिना ही उसके उद्देश्य में दो अनावश्यक संकल्पनाओं की पूछ जोड़ दी गई। चुनावी मजबुरियों के नाम पर इन को पुनः संशोधित करने का साहस कोई भी राजनैतिक दल आजतक नही दिखा पा रहा है। आपात्काल के बाद स्थापित जनता सरकार ने 44 वें संविधान संशोधन से 42 वें संशोधन द्वारा जनता मौलिक अधिकारों को स्थगित करनेवाले सभी प्रावधानों को तो निरस्त कर पूर्ववत् कर दिया किन्तु प्रस्तावना में की गई छेड़छाड़ को वैसे ही रखा। इन विशेषणों के जुड़ने के कारण ही आज हम राजनैतिक दलों को तुष्टिकरण की नित नई सीमाओं को लांघते हुए देखते है। सहिष्णुता का दायरा सीमटता जा रहा है और कट्टरता बढ़ती ही जा रही है।

इन विषयों पर चिंतन करना इसलिये आवश्यक है क्योंकि इन बातों से गणतन्त्र की नीव पर ही आघात हो रहे है। गणराज्य का आधार हे गण। गण अर्थात एकमन से कार्य करने वाला समूह। प्रबन्धन के क्षेत्र में आजकल अत्यधिक प्रचलित अंगरेजी शब्द है टीम। इसकी परिभाषा की जाती है, ‘‘एक कार्य के लिये गठित, एकलक्ष्यगामी दल’’। यह तात्कालिक होता है कार्य की अवधि तक के लिये कार्य की पूर्णता का लक्ष्य लेकर यह कार्य करता है। ‘गण’ की संकल्पना अधिक गहरी है। अंगरेजी में उपयुक्त Republic शब्द से भी बहुत गहरी। गण एक पारम्पारिक पारिभाषिक शब्द है। इसके राजनीति शास्त्र के उपयोग से भी पूर्व इसका आध्यात्मिक प्रयोग है। हमारी परम्परा में पूजा का पहला अधिकार गणेश जी का हैं जो गणों के ईश, गणनायक हैं। केवल शिवजी के गणों का नायक होने के कारण ही वे गण पति नहीं है। मानव का मानव से सम्बन्ध स्थापित करने की वैज्ञानिक आध्यात्मिक प्रक्रिया ‘गण’ के वे अधिपति है। मै से हम की ओर जाने की प्रक्रिया है गण।  और इस प्रक्रिया के लिए लिए आवश्यक साधना के अधिपति गणपति|
भारतीय आध्यात्म विद्या में आगम व निगम की दोनों विधियो की मान्यता है। निगम विधि में जहाँ  स्वयं को नकारकर शुन्य बना दिया जाता है|  नेति नेति की विधि से अहंकार को शुन्य कर शिवत्व से एकत्व की प्रक्रिया बतायी गई है। वही आगम विधि में अपने क्षुद्र अहं को विस्तारित कर सर्वव्यापि करने की प्रक्रिया द्वारा विराट से एकाकार होने की प्रक्रिया भी आध्यात्मिक साधना है। इस विधि में अपने व्यक्तिगत मै को सामूहिक मै के साथ क्रमशः एकाकार करते हुए स्वयं के स्वत्वबोध का विकास किया जाता है। यही अखण्डमण्डल की साधना है जो चराचर में व्याप्त ईश्वर का साक्षत्कार करवाती है। यह गण साधना है। मै को समूह में विसर्जित करने की साधना। गण के अंग का कोई व्यक्तिगत अस्तीत्व ही नहीं रह जाता है वह अपने गण परिचय से एकाकार हो बड़ी इकाई के रक्षार्थ अपने आप को समर्पित कर देता है।

‘गण’ गठन की प्रक्रिया व्यक्ति की साधना के साथ ही समूह की भी साधना है। भारत में सामूहिक साधना का ही विशेष महत्व रहा है। हमारे सारे वेद मन्त्र बहुवचन में प्रार्थना करते है। अहं का नहीं वयं का प्रयोग किया जाता है। मन, वचन, कर्म में सामूहिकता की प्रार्थना बार बार की गई है। हम एक मन से एक संकल्प के साथ एक दिशा में अग्रेसर होते हुये साथसाथ उत्कर्ष व कल्याण को प्राप्त करें। यह हिन्दूओं की सनातन वैश्विक प्रार्थना है। इस बात को हमने केवल दर्शन के सिद्धान्तों तक ही सीमित नहीं रखा अपितु कर्म, अथवा आचार की परम्परा में ढ़ालकर उसे जीवन का नियमित अंग बना दिया। यह भारतीय जीवन दर्शन की विशेषता है। प्रत्येक तत्व का कर्मकाण्ड के रुप में सघनीकृत संस्थापन (Concrete  Institutionalization ) किया गया। यही अनेक आक्रमणों के बाद भी हमारे जीवित रहने का महत्वपूर्ण रहस्य है। जीवन के प्रत्येक अंग में इस ‘गण’ संकल्पना को साकार किया गया। परिवार, वर्ण, ग्राम, नगर, जनपद तथा राष्ट्र इन सभी स्तरोंपर गणों के गठन की विधि को हमने सदियों से विकसित किया है। धार्मिक, औपासनिक परम्पराओं के साथ ही सामाजिक, आर्थिक व राजनयिक व्यवस्थाओं में गणों का विकास हिन्दूओं ने प्राचीनतम काल से किया है।

यह देश का दुभाग्य ही है कि स्वतन्त्रता के बाद हमारे इन प्रचण्ड ऐतिहासिक अनुभूतियों को पूर्णतः दुर्लक्षित कर हमने विदेशी विचारों पर आधरित व्यवस्था को अपनाया। इतना ही नहीं सेक्यूलर के नाम पर अपनी सभी प्राचीन परम्पराओं को प्रभावी रुप से नकारने का काम किया। परिणामतः परिभाषा में गणराज्य होते हुए भी सामूहिक चेतना के विकास के स्थान पर हमने विखण्डित गुटों की राजनैतिक चेतना का विकास किया। पंथ, प्रांत, भाषा तथा जाति जैसी सामूहिक चेतना व्यक्ति के विस्तार का माध्यम बनने के स्थान पर हमारी प्रचलित राजनैतिक व्यवस्था में यह सभी परिचय विघटन का कारण बनते जा रहे है। समाज में धार्मिक स्तर पर आज भी जीवित ‘गण’ संकल्पना को ठीक से समझकर उसे व्यवस्थागत रुप प्रदान करना वर्तमान भारत की सबसे बड़ी चुनोति है।

गण के गठन के शास्त्र को हम समझने का प्रयत्न करते है तो हम पाते है कि इसका भावात्मक आधार ‘त्याग’ में है। त्याग से ही व्यक्ति से परिवार, परिवार से समाज व समाज से राष्ट्र के स्तर पर स्वत्वबोध का विस्तार सम्भव है। त्याग का संस्थागत स्वरुप हे यज्ञ। यज्ञ के द्वारा हम सहजता से त्याग को परम्परा के रुप में ढ़ाल पाये है। आज भी हमारे घरों में गाय के लिये गोग्रास, तुलसी को पानी देने जैसी परम्पराओं का प्रयत्नपूर्वक पालन किया जाता है। अतिथि भोजन जैसे भूतयज्ञ द्वारा समाज को आपस में बांध रखा था। अतः यज्ञ को समझने से ही गण के गठन का कार्य किया जा सकता है।

गीता में भगवान कृष्ण कहते है कि यज्ञ के द्वारा ही प्रजा का सृजन कर प्रजापति ने लोगों को कहा कि यह यज्ञ ही आपकी कामधेनु है जिसके द्वारा आप अपनी सभी ईच्छाओं की पूर्ति कर सकते हो। सहयज्ञाः प्रजा सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः। अनेन प्रसविष्यध्वम् एष्वोSस्विष्टकामधुक्।।गी 3.10।। अगले दो श्लोंकों में यज्ञ के द्वारा त्याग से कैसे परस्पर सामंजस्य बनाकर समुत्कर्ष की प्राप्ति हो सकती है इसका वर्णन है। देवान्भवयतानेन ते देवा भवयन्तु वः। परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्सथ।। गी 3.11।। यह भी कहा है कि बिना यज्ञ में हवि दिये अर्थात समाज, सृष्टि में अपने योगदान की श्रद्धापूर्वक आहुति दिये बिना जो भोग करता है वह तो चोर है। इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभावितः। तैर्दत्तान प्रदायेभ्यो यो भुन्क्ते स्तेन एव सः।। गी 3.12।। आजके समस्त भ्रष्टाचारी इसी श्रेणी में आते है। यह श्लोक तो इन पापियों के लिये और भी कठोर शब्दावली का प्रयोग करता है। यज्ञ के प्रसाद के रुप में भोग करनेवाले लोग सर्व पापों से मुक्त हो जाते है वहीँ जो केवल अपने स्वार्थ के लिये ही भोग करते है वे तो पाप को ही खा रहे होते है।

यज्ञ अपने निर्माण में सबके योगदान को अधोरेखित कर अपने कर्म में उसके प्रति कृतज्ञता का व्यवहार लाने का संस्कार देता है। अतः यज्ञ के द्वारा ही गण का गठन सम्भव है। आज हमें पुनः यज्ञ संस्कारों के जागरण के द्वारा गण संस्कृति की पुनस्थार्पना करने की आवश्यकता है। इसीसे वास्तव में हमारे संविधान का ध्येय गणतन्त्र साकार हो सकेगा। संविधान में मौलिक अधिकारों के साथ मौलिक कर्तव्यों की भी बात की है| भारतीय संस्कृति में सदा कर्त्तव्य को ही महत्त्व दिया गया है| अधिकार को उसके अप्रिनाम के रूप में ही देखा गया| यज्ञ का व्यवहारिक रूप कर्त्तव्य में ही प्रगट होता है| स्वाहः का मंत्र अपने कर्तव्यों की आहुति का परिचायक है| किन्तु भारतीय संस्कृति के स्थान पर विदेशी राज के प्रभाव में बने होने के कारण हमारे संविधान में मौलिक अधिकार तो न्यायलय में कार्यान्वित किये गए है किन्तु मौलिक कर्तव्यों का स्वरुप मात्र सुझावात्मक रखा गया है| इनकी अवहेलना को किसी न्यायलय में चुनौती नहीं दी जा सकती| यह हमारी विडम्बना है|

गण संकल्पना पर आधारित व्यवस्थाओ के निर्माण के लिये यज्ञ को और अधिक विस्तार से समझने की आवश्यकता है। इस गणतन्त्र दिवस के अवसर पर हम गणत्व को जीवन में उतारने के लिये यज्ञ को समझाने व जीवन में उतारने का संकल्प ग्रहण करें।

जनवरी 26, 2012 Posted by | योग, सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , , | 4 टिप्पणियाँ

सफलता की चाह नहीं! चिरविजय का पराक्रम !!


कर्मयोग 10:
‘‘हर कोई सफल होना चाहता है। पर क्या यह सम्भव है? आपकी गीता क्या कहती है?’’ युवाओं की जिज्ञासायें विद्रोह के आवरण में ही व्यक्त होती है। पर भाईजी को तो इस प्रकार की आपत्तियों को झेलने का पुराना अभ्यास है। उन्हें पता था युवक की बात अभी पूरी नहीं हुई है अतः वे केवल हँस दिये। प्रश्नकर्ता ने कहा, ‘‘मुझे पता है आप कहेंगे सच्ची सफलता अलग होती है। सफलता का अर्थ क्या है? आदि आदि। पर जब आप कहते है कि गीता जीवन का मार्गदर्शन करती है तो फिर इस बारे में भी तो कुछ होगा ना उसमें?’’

भाईजी ने कहा गीता में सफलता के बारे में कुछ कैसे हो सकता है? गीता तो कहती है आपका कर्म पर तो पूरा अधिकार है किंतु फल पर कोई अधिकार ही नहीं है। जब फल पर अधिकार ही नहीं है तो फिर स-फल अर्थात फल पाने वाले होने का क्या अर्थ हुआ? गीता तो कहती है – न मे कर्मफले स्पृहा।। कर्मफल के प्रति कोई लिप्सा नहीं है। हमारी पारम्पारिक व्रत कथाओं में इससे अधिक गहरे पद का प्रयोग होता है। सुफल – अच्छा फल। हमारे व्रत का परिणाम अच्छे फल को देनेवाला हो ऐसी प्रार्थना है। सु-फल कौनसा होगा यह प्रत्येक की स्थिति पर निर्भर करेगा। देवताओं की स्तुति में किये जानेवाले स्तोत्रों के अंत में फलश्रृति आती है जिसमे अक्सर यह प्रार्थना होती है – विद्यार्थि लभते विद्या, धनार्थि लभते धनम्। पुत्रार्थि लभते पुत्रान् मोक्षार्थि लभते गतिम्।। जिसको जो चाह हो उसको वो मिले। संत ज्ञानेश्वर ने तो इन्हीं शब्दों में पसायदान, प्रसाद मांगा है। जो जे वांछिल तो ते लाहो। प्राणिजात। ये तो बड़ी ही बढ़िया बात हुई। जो चाहो वो मिल जाये। गीता से तो ये ही अच्छा है। पर ज्ञानेश्वरी तो गीता की ही मराठी में व्याख्या है फिर इसके अंत में मांगे पसायदान में गीता के विपरित बात कैसे हो सकती है?  यह गीता के अनुसार ही है। गीता में भगवान कह रहे है – ये यथा माम् प्रपद्यन्ते तांस तथैव भजाम्यहम्। मम वत्र्मानुवर्तन्ते मनुष्या पार्थ सर्वशः।। गी 4.11।। जो जैसे भाव से पूजा करेगा वैसा ही ईश्वर को प्राप्त करेगा।

यह भाव कैसे आता है? हमारी मर्जी अथवा चाह भी हमारे भाव पर ही निर्भर करेगी। हम इसी के अनुरूप कार्य करेंगे। और उसी के अनुसार फल को प्राप्त करेंगे। हमारा कर्म ही हमारी पूजा है अतः उसका फल उस पूजा का प्रसाद। मन अपनी क्षमता, स्तर व योग्यता के अनुसार ही कामना करेगा। इन तीनों के सम्मिलित प्रभाव को हम हमारी स्थिति कह सकते है। गीता में इसके लिये बड़ा ही मार्मिक शब्द प्रयोग हुआ है -उपपत्ति। क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ न एतद् त्वयि उपपद्यते। गी 2.3।। कापुरूषता को मत प्राप्त हो अर्जुन। यह तेरी उपपत्ति नहीं है। सरल भाषा में तुम्हारे स्तर के व्यक्ति को यह शोभा नहीं देता। हमारी उपपत्ति के अनुसार किया कार्य ही हमें शोभा देता है। उपपत्ति का अर्थ है अंतिम लक्ष्य के सन्दर्भ में हमारी स्थिति। कहाँ तक हम पहुँचे हैं? किस स्थान पर बैठने की हमारी योग्यता है? इसी के अनुसार हमारा मन कामना करेगा। कर्म भी इस प्रकृति के अनुसार होंगे और फलकामना भी इसी की सीमा में होगी। कई बार कर्म करते समय हम अपनी उपपत्ति को भूल जाते है फिर भी उसी के अनुरूप फल की कामना करने लगते है। तब कर्म और परिणाम की अपेक्षा में विभेद हो जाता है। कर्म पर ध्यान दिये बिना केवल परिणाम की ईच्छा करना सामान्यतः इसे ही सफलता की चाह माना जाता है। ये चाह हमेशा मर्यादित, सीमित ही होगी। अतः इसके पूर्ण हो जाने से क्षणिक आवेशयुक्त सुख का अनुभव भले ही हो, संतोष नहीं मिलेगा। क्योंकि हमे अपनी प्रकृति की सीमा से परे जोने में ही संतोष मिलता है। कर्म प्रकृति के वशी भूत होकर चलता है तो कामनापूर्ति भी सुख नहीं देती। अंग्रजी शब्द Success का भी शाब्दिक अर्थ है -‘के पार जाना’। अपने लक्ष्य को पार करना अथवा अपनी क्षमता की सीमा को पार पाना या फिर बाधाओं पर पार पाना इसे ही वास्तव में Success माना गया है। तो हिन्दी में इसका सही अनुवाद होगा विजय। प्रकृति पर विजय। अपनी स्वाभविक सीमा पर विजय। प्रकृति पर विजय उसके विपरित जाकर नहीं हो सकती। अपनी प्रकृति के अनुरूप कर्म करते हुए ही उसके पार जाया जा सकता है।

प्रकृति के दो मोटे मोटे वर्ग किये गये है- प्रवृत्तिं च निवृत्तिंच। प्रवृत्ति अर्थात कामनाओं की ओर मन की गति। निवृत्ति अर्थात कामनाओं से वैराग्य की ओर मन की स्वभावतः गति। हमे अपनी स्थिति इन दो में से किस ओर अधिक है यह देखना चाहिये ताकि इसके अनुरूप हम अपने लिये सही कर्म मार्ग चुन सकें। यदि हमारा मन अधिक बहिर्मुख है। बाहरी बातों में अधिक रमता है। ईच्छाओं में इन्द्रियों के सुख के लिये अधिक लालायित होता है तो मानना होगा कि हमारे लिये प्रवृत्ति मार्ग ठीक है। यदि किसी उदात्त ध्येय के लिये काम करते हुए इन सुखों का त्याग करने में आनन्द का अनुभव होता है। स्वयं को भूला देने वाले कार्य में मन अधिक रमता है। स्वयं से अधिक औरों के हित में विचार करने का मन है तो फिर हम कह सकते है कि हमारी गति वैराग्य की ओर है और हमारे लिये निवृत्ति मार्ग श्रेयस्कर है। ‘श्रेय’ इस शब्द का गीता में बार बार प्रयोग हुआ है। कामना, वासना या इच्छा से कर्म का निर्धारण नहीं होगा। हमारी प्रकृति के अनुरूप जो हमारे लिये श्रेय की ओर ले जानेवाला है वही हमारा कर्तव्य है।
गीता के प्रथम अध्याय में अपने मन के सम्भ्रम का वर्णन करते समय भी अर्जुन प्रारम्भ इसी से करता है।

निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव। न च श्रेयोनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे।। गी 1.31।।  हे केशव सारे लक्षण मुझे अपने विपरित दिखाई पड़ते है। इस युद्ध में अपने स्वजनों को मारने में मै कोई श्रेय नहीं देखता हूँ। आगे पूरा वर्णन इसी क्रम में है कि किस प्रकार यह युद्ध धर्म का नाश करेगा अतः श्रेयस्कर – श्रेय की ओर ले जाने वाला नहीं है। इसलिये मै युद्ध नहीं करूंगा। श्रेय ही अर्जुन का तर्क है। फिर भगवान द्वारा उपपत्ति का भान करा दिये जाने पर अपने भय व भ्रम का साक्षात्कार हो जाने पर जब अर्जुन शरणागति से शिष्यत्व ग्रहण करता हे तब फिर श्रेय का उल्लेख है। कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः। यत् श्रेयः स्यात् निश्चितं ब्रुहि तन्मे शिष्यस्तेSहम शाधि माम् त्वां प्रपन्नं।।गी 2.7।।  भय के कारण मेरा स्वभाव कृपणता अर्थात संकुचितता से ढ़क गया है और इसके कारण मै अपने धर्म अर्थात कर्तव्य के प्रति भ्रमित हो गया हूँ। इसलिये मेरे लिये क्या श्रेयस्कर है वह निश्चित कर आप मुझे बताओ। मै आपका शिष्य हूँ और आपकी शरण आया हूँ। मेरी रक्षा करें। भगवान भी जीवन के यथार्थ का ज्ञान बताते है और फिर कहते है – धर्म्याद्धि युद्धाद् श्रेयो अन्यत् क्षत्रियस्य न विद्यते।। गी 2.31।।  धर्म की स्थापना के उद्देश्य से किये गये युद्ध से क्षत्रिय के लिये और अधिक श्रेयस्कर कुछ भी नहीं है। आगे के 6 श्लोंकों में स्वधर्म से पलायन के दुष्परिणामों का वर्णन करने के बाद अपने श्रेय के लिये युद्ध का आदेश देते है। तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चय।। गी 2.37।। आगे भी जहाँ जहाँ शंका आई वहाँ वहाँ अर्जुन ने अपने लिये श्रेयस्कर क्या है यही पूछा है। तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोSहमाप्नुयाम्।। गी 3.2।।  अतः एक तय करके बता दो कि मेरे लिये क्या श्रेयस्कर होगा – कर्म का मार्ग या ज्ञान का मार्ग?

गीता श्रेय का मार्ग बताती है। श्रेय अर्थात जो श्री की ओर ले जाये। श्री को प्राप्त करने का मार्ग। श्री के कई अर्थ लगाये जाते है। सबसे प्रचलित अर्थ है – लक्ष्मी। इसी से श्रीमन्त अर्थात अमीर जैसे शब्द भी प्रचलित हुए। श्री का अर्थ केवल धन से लेना अधुरा ही होगा। श्री अर्थात परिपूर्णता के साथ समृद्धि। समृद्ध का अर्थ है जिसके पास सबकुछ है। भौतिक साधनसम्पन्नता के साथ ही आत्मिक सामथ्र्य भी। जो स्वावलम्बी होने के साथ ही औरों को भी आवश्यकतानुसार सम्बल देने की क्षमता व नियत दोनों का होना वास्तविक श्रीमन्ती है।

‘श्री’ का एक और अर्थ है – विद्या। किसी विषय का पूर्ण ज्ञान, स्वामीत्व होना विद्या है। केवल सैद्धान्तिक जानकारी ही नही अपितु पूर्ण व्यावहारिक ज्ञान भी। विद्वान अर्थात जिसके पास विद्या है। तो विद्वान होने का अर्थ केवल किसी विषय की व्याख्या करने की क्षमता से नहीं है अपितु आवश्यकतानुसार उसके प्रयोग का भी पूर्ण ज्ञान आवश्यक है। वाहनशास्त्र (Automobile) का विद्वान अभियन्ता (Engineer) यदि अपना स्वयं का वाहन ठीक नहीं कर सकता हो तो वह कैसा विद्वान? उससे तो वह अनपढ़ यन्त्री (Mechanic) अच्छा जो रासायनिक व भौतिक विज्ञान के सुत्र तो नहीं जानता जिससे वाहन चलता है किन्तु बन्द पड़े वाहन की तृटी को पहचान कर उसको ठीक करने का कौशल तो उसके पास है। विद्या का अर्थ ज्ञान व कौशल दोनों का समन्वय है। अतः श्री से युक्त -श्रीयुत का अर्थ होगा जो ज्ञानी होने के साथ ही व्यावहारिक भी है। विद्या का एक और शास्त्रीय वर्गीकरण भी है। परा विद्या व अपरा विद्या। पराविद्या वह आध्यात्मिक ज्ञान व विज्ञान है जो ईश्वर से सम्बंधित है। अर्थात ईश्वरसाक्षात्कार का ज्ञान व कौशल। अपरा विद्या में अन्य सभी भौतिक जगत के विषयों का ज्ञान आता है। ‘श्री’ पद में परा व अपरा दोनों विद्याओं का समावेश होता है।

श्रेय अर्थात श्री की ओर ले जानेवाला यह कहते समय श्री का अर्थ और अधिक गहन व परिपूर्ण लिया गया है। इसमें उपरोक्त दोनों अर्थों के साथ ही और भी अधिक समृद्धि की बात अभिप्रेत है। प्रत्येक की उपपत्ति के अनुसार उसका स्वभाव होता है। इस स्वभाव के अनुरूप उसके जीवन का विशिष्ठ लक्ष्य होता है। इस लक्ष्य को पाने हेतु उसे सामर्थ्य, क्षमता व विद्या के साथ ही सम्यक व्यवहार भी करना होता है। यह श्री है जिसे पाने की ओर अग्रेसर होना श्रेय कहलायेगा। तो हमारे लिये वह श्रेयस्कर होगा जो हमें अपने स्वधर्म की ओर ले जाये। ऐसा कर्म जो हमारे स्वधर्म को साकार करने में सहायक हो वही हमारा कर्तव्य कहलायेगा। ऐसे कर्तव्य पथ पर सब अग्रेसर हो ऐसी अपेक्षा है इसिलिये नाम के साथ श्री लगाने की परम्परा है। श्रीराम अर्थात श्री से युक्त राम। हम एक दुसरे के नाम में आदरपूर्वक श्री का प्रयोग करते है तब वह योग्यता वाचक भले ही ना हो किन्तु लक्ष्य का स्मरण करानेवाला तो होता ही है कि हमे श्री की ओर ही जाना है। इस ध्येयमार्ग को ही कठोपनिषद् में ‘श्रेयो मार्ग’ कहा है। आवश्यक नहीं की श्रेयो मार्ग प्रेयो मार्ग भी हो। यमराज तो नचिकेता को दिये उपदेश में दोनों को एक दूसरे के विपरीत बताते है। उनके अनुसार प्रवृत्ति की ओर जानेवाला इन्द्रिय सुख का मार्ग प्रेयो मार्ग है और निवृत्ति की ओर ले जानेवाला श्रेयो मार्ग जिसके बारे में अन्त में वे कहते है कि यह तलवार की धार पर चलने के समान कठीन मार्ग है। शुरस्य धारा निषिदा दुरत्यया। यमराज के उपदेश का विषय आत्मज्ञान होने के कारण ऐसा कहा होगा। किन्तु कर्मयोग में श्रेयगामी मार्ग सहज, स्वभावगत होने के कारण आनन्ददायी भी होता है। सुखकर होगा ही ऐसा नहीं किन्तु कल्याणकारी कष्ट भी तो आनन्द देता है। अपनी पूरी शक्ति के साथ दौड़ लगाकर स्वर्णपदक जीतनेवाला धावक पूरी थकान के बाद भी कितने आनन्द का अनुभव करता है। विजय प्राप्ति के लिये किया गया कष्ट भी आनन्ददायी होता है। यदि लक्ष्य का भान भूल जाये तब सुख-सुविधा से सम्पन्न जीवन भी उपर से चाहे जितना प्रिय लगे अर्थहीन होने के कारण उबाउ और थका देनेवाला ही होता है। जीवन में स्वभावानुसार सही कर्म चुना हो तब श्रेय मार्ग प्रियकर भी होता है। किन्तु यदि किसी समय संयम की शिथिलता के कारण श्रेय मार्ग पे्रय ना हो तब चुनाव अप्रिय होते हुए भी श्रेयका ही करना है। सामान्य सा उदाहरण मधुमेह के रोगी को मिठाई खाने की इच्छा का है। इसमें जो प्रिय है वो श्रेय नहीं है। अतः क्षणिक सुखकर होते हुये भी दीर्घतः दुखदायी है। सर्वदा सुख व आनन्ददायी तो श्रेयो मार्ग ही है।

श्री प्राप्त करने के लिये प्रयास ही विजय का प्रयास है। अपने जीवनध्येय को पहचान उसकी पूर्णता में स्वयं को पूरा झोंक देना चिरविजय का मार्ग है। जीवन संग्राम के छोटे छोटे संघर्षों पर विजय प्राप्त करने की आपाधापी में यदि हम जीवन के परमध्येय को भूल गये तो फिर सफल भले ही हो संतुष्ट नहीं होंगे। संतुष्टि तो चिरविजय में ही है। यह चिरविजय की कामना ही हमारे जीवन को गतिमान व ध्येयगामी बनाये रखती है। भारतीय संस्कृति प्रत्येक को उदात्त ध्येय की ओर ही प्रेरित करती है। जन्म जन्मांतर की अखण्डयात्रा में इस बार का जो पाड़ाव हमने पाया है वह हमारी उपपत्ति है। यहाँ तक पहुँचे है यह तो तय है। इसे ही प्रारब्ध भी कहते है। इसे नहीं बदल सकते पर चिंता की कोई बात नहीं यह हमारी सीमा थोड़े ही है। यदि अपनी उपपत्ति के अनुरूप श्रेयो मार्ग चुन लिया तो आगे बढ़ने की कोई सीमा नहीं है। शायर कहता है – सरे अक्स सितारों से आगे जहां और भी है। बुलन्दी परों की उड़ानों से आगे आसमां और भी है।
सफलता की चाह तो केवल सीमित परिणाम की नपुंसक अपेक्षा मात्र है। अपनी प्रकृति के अनुरूप कर्म करते समय अधिक और अधिक बड़े ध्येय को प्राप्त करने का पराक्रम करते रहना ही चिरविजय की कामना है।

जनवरी 19, 2012 Posted by | योग | , , , , , , , , , , | 4 टिप्पणियाँ

कोई शक या सवाल?


कर्मयोग 9:
प्रश्नों का गीता में बड़ा महत्व है। अर्जुन के प्रश्नों से ही गीता का प्रवाह आगे बढ़ता है। अन्यथा तो दूसरे अध्याय में भगवान ने अपनी बात पूरी ही कर ली है। जीवन में प्रश्नों का बड़ा महत्व है। ज्ञानप्राप्ति में उचित प्रश्नों का सही आदरयुक्त सेवाभाव से पूछा जाना आवश्यक होता है। कर्मयोग के रहस्यों को समझते समय हम यह भी कला विकसित करें ये आवश्यक है। मन में उठनेवाले हर प्रश्नवाचक विचार को ज्ञानकुंजी प्रश्न नहीं कहा जा सकता। अर्जुन जैसे सटीक प्रश्न मन में पकने देने होते है। सामान्यतः विचारश्रृंखला का प्रारम्भ जिज्ञासा से होता है। जिज्ञासा में हम ज्ञानप्राप्ति का प्रयत्न प्रारम्भ करते है। द्वितीय अध्याय में अर्जुन द्वारा स्थितःप्रज्ञ के लक्षणों के बारे में पूछना जिज्ञासा कि श्रेणी में आता है। कृष्ण द्वारा दूसरे अध्याय में प्रदत्त ज्ञानयोग व कर्मयोग के सिद्धांतों के आकलन से अर्जुन विषाद की स्थिति से बाहर आ गया है व जिज्ञासा को प्रगट कर रहा है। जिज्ञासा ज्ञान को ग्रहण करने की तत्परता को दर्शाती है। बिना जिज्ञासा के कितना भी श्रेष्ठ व्याख्याकार क्यों ना हो वह अपने उपदेश से तात्कालिक बौद्धिक क्षुधा शांति तो कर सकता है किन्तु ज्ञानदान नहीं। ज्ञानदान गुरु की योग्यता से भी अधिक शिष्य की तत्परता पर निर्भर करता है। इस जिज्ञासा को जागृत करना सच्चे गुरु का प्रथम कर्तव्य है।
किन्तु प्रथम प्रयास में सुने हुए उच्च सिद्धान्त कई बार हजम नहीं होते है। पूरा समाधान नहीं होता ऐसे में मन का भ्रम से सामना होता है। दो प्रगटतः परस्पर विरोधी सिद्धांतों में अपक्व बुद्धि भी सामंजस्य बैठाने का प्रयास करती है। पर हो नहीं पाता तब भ्रम होता है। भ्रमित मन से सटीक प्रश्न नहीं पूछे जा सकते किन्तु जब भ्रम की स्थिति में हम किसी से मार्गदर्शन पाने का प्रयत्न करते है तब गुरु कितना भी ज्ञानी व सुयोग्य क्यों ना हो मन में शंका ही प्रगट होती है। तीसरे अध्याय के प्रारम्भ में अर्जुन पूछता है
जायसी चेत् कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन
तत् किं कर्मणी घोरे माम् नियोजयसि केशव।।गी 3.1।।
जब आप स्वयं ही कह रहे हो कि ज्ञान कर्म से अधिक श्रेष्ठ है तो फिर मूझे क्यों ऐसे भयंकर कर्म में धकेल रहे हो? यह सर्वाधिक सुयोग्य गुरु द्वारा प्रदत्त सर्वोच्च ज्ञान पर की गई शंका है। अगले श्लोक में तो अर्जुन स्पष्टता से अपने सम्भ्रम को मानता है और कृष्ण पर आरोप लगाता है कि आपकी मिश्रित बातों से ये हो रहा है।
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसिव मे।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोSहमाप्नुयाम।।गी 3.2।।
ऐसी दोगली बातों से आप मेरी बुद्धि को भ्रमित कर रहे हो। कर्म करना श्रेष्ठ है अथवा ज्ञान के लिये कर्म का त्याग? इस संभ्रम और शंका में भी उसकी श्रद्धा अड़ीग है। अतः वह इस शंका की स्थिति में भी अपने शिष्यत्व को नहीं भूला है और कृष्ण से ही कह रहा है कि आप ही ऐसे में निश्चित करके बता दो कि मेरे लिये क्या श्रेयस्कर है?
महर्षि अरविन्द कहते है श्रद्धा कभी भी अन्ध नहीं होती ना ही बिना प्रश्न के विश्वास करने को कहती है। श्रद्धा में तो प्रश्न पूछने की स्वतन्त्रता है। शिष्य के मन में कोई भय नहीं है कि मूझे गलत समझा जायेगा। या मेरे द्वारा शंका प्रगट करने पर गुरु मेरे प्रति दूर्भाव धारण करेगा। यदि ऐसी आशंका में प्रश्न पूछने का संकोच हे तो यह श्रद्धा की कमी है। श्रद्धावान के मन में ना तो कोई भय है ना ही आशंका अथवा संकोच। बालक जिस प्रकार माता से निःसंकाच अपने मन की बात कह सकता है वैसे ही शिष्य अपने गुरु के सामने अपने अंतर की जिज्ञासा, भ्रम अथवा शंका को खुलकर प्रग्ट करता है। इस विश्वास के साथ कि यहाँ से उत्तर अवश्य मिलेगा। शंका का समाधान होगा। भ्रम का निरास होगा।
अर्जुन का कृष्ण से नितान्त स्नेह का सम्बन्ध है। इतना घनीष्ठ कि कोई दुराव या संकोच नहीं है। 11 वे अध्याय में विश्वरूप दर्शन के बाद अचंभित अर्जुन अपने सखासे क्षमा मांगता है
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति।
अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि।।गी 11.41।।
तुम्हारी महिमा को ना जानते हुये मैने प्रेम में आपको कई मित्रवत् संबोधनों से पुकारा है। कृपया मेरी इस धृष्टता को क्षमा कर दें। इस सख्य के होते हुए भी अर्जुन का शिष्यत्व उच्च कोटी का है। और यदि हम गीता के मर्म को जानने का यत्न कर रहे है तो हमें अर्जुन सा शिष्यत्व प्राप्त करने के लिये प्रार्थना करनी चाहिये। दूसरे अध्याय के 7 वे श्लोक में शिष्यस्तेSहम शाधि माम् त्वां प्रपन्नं।।गी 2.7।। कहकर शरणागति प्राप्त करने के बाद से ही हम अर्जुन के संवादों में विषाद के स्थान पर शिष्यत्व की प्रगल्भता का विकास देखते है। जिज्ञासा, भ्रम और शंका की सिढ़ियों का पार करते हुये अर्जुन प्रश्न और उससे भी विकसित परिप्रश्न तक पहुँचता है और भगवान से अंतिम ज्ञान प्राप्त करता है।
चौथे अध्याय में ज्ञान की महिमा बताते हुये उसके प्राप्ति का माध्यम भी बताया है।
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिनः।।गी 4.34।।
प्रणिपात अर्थात विनम्र शरणागति, परिप्रश्न अर्थात अपने तप से तपा हुआ सटीक प्रश्न और सेवा से संतुष्ट हुए तत्वदर्शी ज्ञानीगण ज्ञान का उपदेश देते है। तीनों आवश्यक है। वर्तमान युग में शिक्षा में तर्क का आधार अधिक होने के कारण प्रश्नों का पकना सबसे कठीन है। विनम्रता व सेवा तो श्रद्धा से आ ही जायेगी किन्तु सही प्रश्न को अपने अन्दर पकाने का ध्यैर्य व सही गुरु से पूछने का विनम्र साहस आज के युग मे प्रयत्नपूर्वक विकसित करने पड़ेंगे।
गीता में अर्जुन की अनेक जिज्ञासायें हैं जैसे स्थितःप्रज्ञ के लक्षण पूछना,
स्थितःप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्।। गी 2.54।।
या फिर पापाचरण का कारण पूछना
अथ केन प्रयुक्तोSयं पापं चरति पुरूषः।
अनिच्छन्नपि वाष्र्णेय बलादिव नियोजितः।। गी 3.36।।
बिना स्वयं की इच्छा के भी बलपूर्वक किस प्रेरणा से मनुष्य पाप का आचरण करता है? ये जिज्ञासायें है – अतन्त्य निष्पाप मन से पूछी गयी जानकारीयाँ। यह ज्ञान सर्वजनहिताय है।
किन्तु तिसरे अध्याय के प्रारम्भ कर्म व ज्ञान के चयन के बारे में पूछे उपरोक्त भ्रमजनित प्रश्न अथवा चौथे अध्याय में जन्मक्रम के भ्रम के बारे में पूछना
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः।
कथमेतद्विजानियां त्वमादौ प्रोक्तवान् इति।। गी 4.4।।
आपका जन्म तो विवस्वान के बाद हुआ है फिर हम ये कैसे मान ले कि आपने पूर्व में ही विवस्वान को यह कर्मयोग का ज्ञान बताया था? वैसे ही फिर पाँचवे अध्याय के प्रारम्भ में
संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि।
यच्छ्रेयं एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितं।।गी 5.1।।
कभी कर्म के सिद्धांत की बात करते हो पुनः फिर से कर्म योग की बात करते हो। हे कृष्ण इनमें से जो एक मेरे लिये श्रेयस्कर हो वो तय कर के मुझे बता दो। ये सारी शंकायें है। कृष्ण द्वारा बतायें गये उपदेश में जो ऊपरी विरोधाभास है उससे भ्रमित होकर पूछी गई शंकायें। पर एक बात स्पष्ट है शंका प्रगट करते समय भी अर्जुन स्पष्ट हे कि उसे क्या चाहिये। उसने ये नहीं कहा कि मुझे क्या भयेगा अथवा सहज होगा? ये पूछा है कि मेरे लिये क्या श्रेयस्कर है वा बताओ। हर बार श्रेय की चिंता है।
इन सब स्तरों में से पकते पकते अर्जुन की मेधा प्रश्न पूछने के लिये तैयार हुई और फिर अनेक जिज्ञासाओं, भ्रम और शंकाओं के बाद उसका प्रश्न प्रगट हुआ,
एवमेतद्यथत्थ त्वमात्मानं परमेश्वर।
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम।।गी 11.3।।
हे परमेश्वर आपका वह सर्वव्यापी रूप मै देखना चाहता हूँ। यदि सम्भव हो तो मुझे वह परम दर्शन करायें। इससे पूर्व पहले श्लोक में वह मान चुका हे कि उसका भ्रम दूर हुआ। अब मोह नहीं रहा।
यत्त्वयोक्तं वचस्तेनं मोहोSयं विगतो मम।। गी 11.1।। आपके द्वारा कहे गये इन गुढ़ अध्यात्मज्ञान युक्त वचनों से मेरा मोह जाता रहा है। मोह के जाने के बाद प्रश्न प्रगट हुआ है। परमज्ञान की अनुभूति करने वाला प्रश्न। साक्षात्कार की भूमिका बना वह प्रश्न। जिस प्रश्न के उत्तर में अर्जुन को योगी, ज्ञानियों को भी दूर्लभ ऐसा विश्वरूप दर्शन हुआ वह प्रश्न। इसे ही परिप्रश्न कहते है। पूर्ण परिपक्व मेधा से उत्पन्न सटीक प्रश्न।
हम भी अपने अन्दर अर्जुन की श्रद्धा का जागरण करें। अपने मन की जिज्ञासाओं, भ्रम और शंकाओं को प्रगट करें। उसी में से प्रश्न को पूछने की परिपक्वता आयेगी। यदि मन में उठनेवाली शंकाओं को ही संकोच, भय अथवा उपहास की आशंका से दबा देंगे तो प्रश्न का पकना ही असम्भव हो जायेगा। और फिर ज्ञान की सम्भावना भी दूरस्थ होगी। सबसे बड़ी समस्या होती है कि किसे पूछे? सच्चा गुरु आज कहाँ मिलेगा?  यदि हमारा शिष्यत्व पक जाये तो गुरु को आना ही होगा। अभी तो किसी ऐसे सुहृद  से पूछना प्रारम्भ करे जिसके बारे में तीन बाते हमें निश्चित हो – 1. वह हमसे अधिक ज्ञानी वा अनुभवी है। 2. वह हमसे प्रेम करता है और हमारे ध्येय के बारे में सम्भवतः हमसे अधिक जानता है। 3. उसका अपना कोई स्वार्थ नहीं है।
ऐसा मार्गदर्शक मिलना कम से कम भारत में तो आज भी कठीन नहीं है। तो आज ही शुरू हो जाये पूछना चाहे जिज्ञासा हो, भ्रम हो या शंका? जैसे सेना में अधिकारी हर बात को समझाने के बाद अवसर देते हुए पूछता है – कोई शक या सवाल?

जनवरी 10, 2012 Posted by | योग | , , , , , , , , | 1 टिप्पणी

आसक्ति कैसे जा सकती है?


कर्मयोग 8:
आठवी कक्षा में पढ़ने वाली बच्ची ने पत्र में पूछा, ‘‘भैया ये आसक्ति क्या होती है?’’ सुसंस्कृत परिवार था। घर में पाठ, स्वाध्याय होता रहता था। इसलिये ऐसे शब्द सुन रखे थे। अर्थ पता नहीं था पर किसी से पूछने का साहस भी नहीं कर पायी होगी। अब विश्वास बना कि कोई बता सकता हे तो बेझिझक पूछ लिया। पर उत्तर देना इतना सहज नहीं था। वैसे भी इन सूक्ष्म संकल्पनाओं को समझना और समझाना कठीन ही होता है। यहाँ तो 12-13 साल की बच्ची वह भी बड़ी कठीन परिस्थिति का सामना कर रही है। कुछ ही दिनों में माँ की गंभीर शल्य-चिकित्सा (Surgery)  होनेवाली थी। ऐसे समय वह बालिका जानना चाह रही है कि आसक्ति क्या है?
गीता में बार बार कहा गया है -अनासक्त होकर कर्म करें। ‘‘तस्मात असक्तः सततं।। गी 3.19।।’’ सदैव आसक्ति से मुक्त रहो। ‘‘संगं त्यक्त्वा धनंजय।। गी 2.48।।’’ हे धनंजय! आसक्ति का त्याग कर। ‘‘कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगं असक्तः स विशिष्यते।।गी 2.7।।’’ कर्मेन्द्रियों में आसक्ति ना होना ही कर्म को कर्मयोग बनाता है। ‘‘मुक्तसंगः’’ आसक्ति से जो मुक्त है वह सात्विक कर्ता है। आदि अनेक स्थानों पर इस महत्वपूर्ण बात का उल्लेख मिलता है। कर्मयोग की परिभाषा का यह महत्वपूर्ण घटक है। अतः कर्मयोग के विविरण में यह बार बार आता है। किन्तु बारवे अध्याय में जहाँ भक्ति योग का विवरण है वहाँ भी भक्तों के लक्षणों में ‘‘समः संगविवर्जितः।। गी 12.18।।’’ सभी द्वन्द्वों को समान दृष्टि से देखनेवाला के साथ ही आसक्ति को जिसने छोड़ दिया है यह भी आता है। गीता का महत्वपूर्ण संदेश है आसक्ति को छोड़ो। यह ऐसा केवल इसलिये नहीं है कि अर्जुन की आसक्ति गीता का निमित्त बनीं और उसको युद्ध के लिये प्रेरित करने के लिये अनासक्त होना आवश्यक था अतः भगवान् श्रीकृष्ण बार बार आसक्ति के छोड़ने पर बल दे रहे है। यह तात्कालिक कारण कितना भी मोहक लगता हो किन्तु गीता का निमित्त भले ही तात्कालिक धर्मयुद्ध और अर्जुन का उसके प्रति विरक्त होना हो किन्तु गीता का विषय सार्वकालिक है। सनातन धर्म के शाश्वत सिद्धान्तों की गीता सार्वभौम, सार्वकालिक, व्यावहारिक व्याख्या है। कर्मकौशल का योग समझाने वाली गीता को अनासक्ति, असंग, संगरहितं, संगत्याग आदि पर बल देना अनिवार्य हो जाता है क्योंकि सब बन्धनों, दबावों तथा समस्याओं से मुक्त होकर स्वतन्त्र कर्म करने के लिये आसक्ति का हटना प्रथम आवश्यकता है। इसी कारण विनोबा भावे गीता का विषय अनासक्ति योग है ऐसा बताते है।
यह सब विशेषता तो ठीक है पर मूल प्रश्न तो वही बना रहा, ‘‘आसक्ति है क्या?’’ हमारे मन में सदा ये प्रश्न आता है। अनासक्त होना तो असम्भव है। मनुष्य है तो भावनायें भी होंगी ही। ऐसे निष्ठुर, कठोर हृदय थोड़े ही हो जायेंगे कि अपने परिवार, परिजन से कोई लगाव ही ना हो? ये कैसे सम्भव है? और सम्भव हो भी तो क्यों करना? क्या पत्थरदिल हो जाना ही जीवन है। ऐसा सब करके सफल हो भी गये तो ये सफलता किसके लिये? अपनों से आत्मीयता ही नहीं रही तो फिर जीवन ही निरर्थक हो जायेगा। ऐसी अनेक बातें हमारे विचारों में आ जाती है जब भी काई आसक्ति को छोड़ने की बात करता है। यह ठीक अर्जुन का तर्क है। पहले अध्याय में यही सारे तर्क उसने युद्धविमुख होने की अपनी कायरता को उदात्त बताने के लिये दिये है। इन शंकाओं का समाधान पाने के लिये हमें आसक्ति, प्रेम, आत्मीयता आदि में भेद को समझना होगा। वास्तव में आसक्ति या संग, प्रेम या आत्मीयता के विलोम है। एक के होने से दूसरा नहीं हो सकता। अतः जब तक आसक्ति होगी हम वास्तव में प्रेम, लगाव, आत्मीयता आदि उदात्त भावों का अनुभव ही नहीं कर पायेंगे और इन्द्रियों के स्तर पर कीचड़ में खेलने को ही आनन्द मान बैठेंगे।
गीता के दूसरे अध्याय में स्थितःप्रज्ञ लक्षणों में भगवान् अत्याधुनिक प्रबन्धकों की प्रस्तुतियों के समान ही एक प्रवाह रेखांकन (Flow Chart) दिखा रहे है। पतन का प्रवाह चित्रण है यह। कैसे थोड़ी सी असावधानी पूर्ण पतन का कारण बन सकती है इसका यह व्यावहारिक वर्णन है। इसमें ही हमें संग अथवा आसक्ति की परिभाषा व परिणाम दोनों देखने को मिलते है।
ध्यायतो विषयान् पुंसः संगस्तेषुपजायते।
संगात्संजायते कामः कामात् क्रोधोभिजायते।।गी 2.62।।
क्रोधाद् भवति सम्मोहः सम्मोहात्समृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात् प्रणश्यति।।गी 2.63।।
विषयों के बारे में सोचने से संग अर्थात इन्द्रिय विषयों के प्रति आसक्ति उत्पन्न होती है। आसक्ति से वासनाओं का जन्म होता है। इच्छाओं की पूर्ति न होने से क्रोध और क्रोध से भ्रम पैदा होते है। सम्मोह का अर्थ है सही मार्ग के प्रति भ्रमित हो जाना। इस भ्रम से स्मृति विकृत हो जाती है। जो बाते जैसी है उस प्रकार याद नहीं आती। इस के कारण बुद्धि का आधार ही नष्ट हो जाता है। बुद्धि का कार्य विश्लेषण का है। नयी जानकारी का विश्लेषण स्मृति में संचित जानकारी के साथ तुलना द्वारा ही सम्भव है। जब स्मृति ही सुव्यवस्थित नहीं होगी तो बुद्धि विश्लेषण किस आधार पर करेगी? और जब बुद्धि ही नष्ट हो गयी तो बचा ही क्या यह तो पूर्ण विनाश ही है।
इस पतन के क्रम का प्रारम्भ ‘संग’ से है। उससे पहले उसका कारण है ‘विषयों का ध्यान’। यह अपने आप में प्रक्रिया है परिणाम तो है संग अर्थात आसक्ति। तो इस आधार पर इन्द्रियजन्य चिन्तन से उत्पन्न राग को, चाह को आसक्ति कहा है। सम्बन्धों को शरीर के स्तर पर देखना एक बाध्यकारी आकर्षण को जन्म देता है। यही पतन का प्रारम्भ है। जब हम जीवन का उद्देश्य भोग बना लेते है और प्रत्येक वस्तु व व्यक्ति को उसका साधन तब जीवन इस चक्र में फँस जाता है। यह लिप्सा, चिपकना जीवन की कीचड़ है। जैसे भैंस कीचड़ में और सुअर गंदी नाली में सुख का अनुभव करता है वही स्थिति आसक्ति में फँसे मनुष्य की होती है। किसी शराबी की तरहा वह बार बार अपने को रोकने का प्रयास करता है पर इन्द्रियाँ उसे बलपूर्वक पतन की ओर खींच कर ले जाती है। यह चिकनी ढ़लान पर पैर फिसलने के समान है। एक बार पैर फिसला तो बीच में रूकना असम्भव है। जो भी सावधानी बरतनी है फिसलने से पूर्व ही बरतनी है। मन को विषयों के चक्र में फँसने से पूर्व ही बचाना होगा। प्रेम, आत्मीयता यह उदात्त भाव है। उसमें चिपकना नहीं होता मुक्ति होती है। मजबुरी नहीं होती। पर हम सामान्यतः फिल्मी प्रभाव में वासना, आकर्षण जैसी आसक्तिजन्य भाव-लहरों को प्रेम मान लेते है और पतन की फिसलपट्टी पर सरपट पसर जाते है।
अब आता है व्यावहारिक प्रश्न। आसक्ति के फेरे से बचे कैसे? कई बार प्रवचन आदि सुनकर लगता है कि ये तो बड़ा ही कठीन है। पर वास्तव में इससे सरल कुछ नहीं है। मानव को मानव के रूप में रहना कैसे कठीन हो सकता है? किन्तु यदि हम पशुवत आनन्द की ओर बढ़ गये तो फिर मुश्किल होती है। इसमें अपूर्णता भी रहती है आनन्द से ज्यादा कष्ट भी होता है। सच्चा और स्थायी आनन्द तो मानवीय ही होगा ना? मानवीय आनन्द आसक्ति रहित कार्य से ही सम्भव है। प्रश्न फिर वही है आसक्ति से कैसे बचे? इसका सरल सा मार्ग है – उदात्तीकरण। शब्द बड़ा भारी भरकम लगता है पर अर्थ सरल है – उपर उठना। जमीन पर चलते समय रास्ते के गढ्ढ़े पीड़ादायक होते है और मन भी त्रस्त होता है किन्तु जब पहाड़ी की चोटी पर पहुँच जाते हे तो वहाँ से जो दृश्य दिखाई देता है उसमे उतार चढ़ाव नही होते। वैसे ही जीवन के उदात्त ध्येय को महत्व देना शुरू कर देते है तो मन फिर इन क्षुद्र चीजों में नहीं लगता। तुलसीदास जी के विवाह के बाद वे अपनी पत्नि के मोहपाश में ऐसे बन्ध गये कि जब वो मायके गई तो पीछे-पीछे पहुँच गये। मन काम में ऐसा लगा था कि कुछ भी सुध नहीं। बाढ़ के पानी में कूद पड़े, बहती लाश पर बैठकर नदी पार की। पत्नि के घर रात को पहुँचे। खिड़की से कोई रस्सी लटक रही है ऐसा समझकर सांप को पकड़ कर उपर चढ़ गये। पत्नि ने धिक्कारा ये कैसा काम? इतनी लगन राम में लगाई होती तो भगवान के दर्शन हो गये होते। इस झिड़क से इन्द्रिय भोग का नशा उतर गया। जीवन का उदात्तीकरण हो गया और अब मन राम मे रम गया। मानस में रामजी प्रगटे और स्वयं हनुमानजी ने रामकथा सुनाई। सारी दुनिया को रामचरित मानस की निधि प्राप्त हो गई। आसक्ति का बल अगाध होता है उसे उपर की ओर मोड़ देते है तो उसी गति से अनासक्त मन बड़े कार्य में लग जाता है।
जब हम किसी कार्य में पूरे रम जाते है तो स्वयं को भूल जाते है। यदि पूरा जीवन ही किसी उदात्त कार्य में रस लेने लगे तो फिर इन्द्रियों के खेल को भूलना सहज हो जाता है। साथ ही इन्द्रियों का प्रशिक्षण भी आवश्यक है जो हमने पूर्व के आलेख ‘‘भले ही कर्मकाण्डी बनों . . .’’ में देखा ही है। उदात्त ध्येयगामी कार्य और इन्द्रियनिग्रह के सतत प्रयास दोनों का निरन्तर चलना जीवन को आनन्ददायी, संगरहित, अनासक्त बना देता है। यही तो कर्मयोग का रहस्य है। सामान्य कार्य को भी सहज योग बना देना।
आठवी की बहना के पत्र के उत्तर में तो सहज लिख दिया था कि ”आसक्ति वो है जो कभी भी आ सकती है और आये तो जकड़ भी सकती है। इसलिये अपने को भगवान में ही आसक्त कर लो ताकि जकड़े तो रामजी ही जकड़े।” आज 18 वर्ष बाद उस पत्र को याद कर के ये उपाय लिखे है। पर याद रहे दोनों उपाय करने सतत होंगे। क्योंकि आसक्ति कभी भी आ सकती है। पर योगयुक्त जीवन के नियमित अभ्यास से ही जा सकती है।

दिसम्बर 8, 2011 Posted by | योग | , , , | टिप्पणी करे

जाने अपना वर्ण! पहचाने अपना स्वभाव!


कर्मयोग 7:

स्वधर्म पर आधारित कर्म से ही जीवन में परिपूर्णता एवं संतुष्टि प्राप्त हो सकती है। यही गीता का संदेश है। इसको जीवन में उतारना कर्मयोग है और यही सच्चा भक्तियोग भी है। यदि इसे आचरण में नहीं लायेंगे और केवल कृष्ण कृष्ण का नाम रटन करते रहेंगे तो वह पाखण्ड ही होगा। भक्ति नहीं। स्वामी रंगनाथानन्दजी द्वारा उद्धृत श्लोक है, जिसका सही सन्दर्भ अभी नहीं मिल पाया है। स्वामीजी ने डॉ राधाकृष्णन् के हवाले से इसे विष्णुपुराण में होना बताया है। पर स्वामीजी स्वयं ही स्पष्ट कहते है कि विष्णुपुराण की उपलब्ध प्रकाशनों में उसे नहीं खोज पाये है। पर श्लोक बड़ा मार्मिक है –
स्वधर्म कर्म विमुखाः कृष्ण कृष्णेति वादिनः।
ते हरेर्द्वेषिणा मूढ़ाः धर्मार्थं जन्म यत् हरेः।।
कृष्ण कृष्ण रटते रहे पर स्वधर्म से विमुख हो तो ऐसे लोग हरि के विरोधी और मूर्ख हैं। क्योंकि हरि का जन्म ही धर्मकार्य के लिये हुआ था। तो उनकी भक्ति करने के लिये हमें भी धर्मकार्य ही करना होगा। स्वधर्म को पहचानने की शास्त्रीय विधि वर्णधर्म पर आधारित है। जब हम स्मृतिग्रंथों का अध्ययन करते है तो पाते है कि वर्ण ही हमारे समाज का आधार रहा है। स्मृतियों में चाहे व्यक्ति व्यवहार हो, वर्ण व्यवहार हो या राज व्यवहार तीनों मूलतः वर्ण के अनुसार ही बताये गये हैं। वर्ण का समाज में असर 20 वी शती के प्रारम्भ तक दिखाई देता है। महात्मा गांधी का समग्र साहित्य 120 खण्डों में प्रकाशित है ओर उसमें बार बार वर्ण के आधार पर सामाजिक सुधार की बात गांधी करते हैं। 1914 में कैथोलिक बिशप्स के साथ वार्ता में एक प्रश्न के उत्तर में वे कहते है, ‘‘ब्राह्मण राजनीति में तो आ सकते है किन्तु उन्हें सत्ता व चुनाव की राजनीति नहीं करनी चाहिये।’’ भारत के मूल विचार को ठीक से समझनेवाले गिने चुने महापुरूषों में से एक गांधी के अनुसार वर्णव्यवस्था एक वैज्ञानिक सामाजिक रचना थी जिसे स्वार्थी नेतृत्व ने विकृत बना दिया।
आज यदि कोई केवल वैज्ञानिकता के आधार पर वर्णव्यवस्था की पुनस्र्थापना की वकालत करने लगे तो उसका चहुओर से विरोध ही होगा। ऐतिहासिक अनुभव व राजनयीक कुप्रचार के कारण सार्वजनिक चिंतन में वर्णव्यवस्था अत्यंत घृणित हो गई है। इसलिये इसके पुनरुज्जीवन की बात करना तो बेमानी है। जब समाज इसके विषय में सुनने को ही तैयार नहीं है तो युगानुकूल परिवर्तन के साथ इसको लागु करने की बात भले ही कितनी भी तार्किक क्यों ना हो अव्यावहारिक हो जाती है। किन्तु केवल समाज में अस्वीकार्य होने से कोई विज्ञान अप्रासंगिक नहीं हो जाता। समय के साथ पुनः इसका महत्व सबको पता चलता है। जैसे आजकल आयुर्वेद की ओर सबकी फिरसे रुचि बढ़ने लगी है। सम्भव है वर्णव्यवस्था के साथ भी ऐसा कुछ हो। आज तो हम केवल व्यक्तिगत स्तर पर इसका प्रयोग कर सकते है। वह भी औरों के साथ सामाजिक व्यवहार के लिये नहीं अपितु अपने स्वभाव को पहचानने के लिये। स्वधर्म के अनुसार कर्म का चयन करने के लिये हमें अपने स्वभाव को जानना होगा। हमने पिछली बार देखा था कि स्वभाव द्वारा नियत कर्म करना कर्मयोग की एक मूलभूत अनिवार्यता है। भगवद्गीता स्वभाव को अध्यात्म मानती है। गीता के आठवे अध्याय में अर्जुन के प्रश्न का उत्तर देते हुए भगवान कहते है-
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावो अध्यात्म उच्चते।
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्म संज्ञितः।।गी 8.3।।
जिसका कभी नाश नहीं होता वह ब्रह्म है, उसको जानने का मार्ग स्वभाव है और जिस बल के प्रवाह से अथवा त्याग से सृजन होता है वह कर्म है। कितनी परिपूर्ण व्याख्या है! अनाशवान् ईश्वर अथवा ब्रह्म अपने आदि संकल्प ‘‘मै एक हूँ बहुत हो जाऊँ। एकोSहम् बहुस्याम।’’ के द्वारा विश्वरूप हो गया। स्वयं ही प्रत्येक के अन्दर प्रगट हुआ है। यही स्वभाव है। हमारा हृदयस्थ ईश्वर और इसे प्रगट करने का माध्यम है कर्म जिसकी परिभाषा यहाँ की गई – सृजनशील विसर्ग। विसर्ग का एक अर्थ है स्वयं होकर प्रवाहित बल और दूसरा अर्थ है त्याग, विसर्जन का कर्म। दोनों ही ईश्वरत्व के प्रगटीकरण के माध्यम है। स्वभाव को जानकर उसके अनुसार कर्म करने अर्थात त्याग करने अर्थात समाज में योगदान करने से ही हम अपने स्वस्वरुप केा पा सकते है। यही सर्वोत्तम उपलब्धि है। सबसे बड़ा सृजन।
कर्म केवल स्वयं के स्तर तक सीमित नहीं होता। कर्म में हमारा औरों से व्यवहार जुड़ा होता है। अतः बिना इस सम्बन्ध का निर्वाह किये हमारा कर्म सफल व संतुष्टिदाता नहीं हो सकता। इसीलिये इस बार हम वर्ण के विज्ञान द्वारा स्वभाव को पहचानने की विधि को समझने का प्रयत्न करते है। गीता के चैथे अध्याय में भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं को चातुर्वण्र्य व्यवस्था का जनक बताते है-
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टम् गुणकर्म विभागशः।
तस्य कर्तारपि माम् विद्ध्यकर्तारमव्ययम्।।गी 4.13।।
गुण ओर कर्मों के अनुसार समाज की संरचना बनती है। चार वर्ण अर्थात चार प्रकार से मानव समाज में कार्य करता है। किंतु जिसने ईश्वर साक्षत्कार कर लिया वह इन सब कर्मों से परे है। इस श्लोक से यह भाव निकलता है कि वर्णव्यवस्था मानव के स्वभाव के अनुसार कर्म के चयन द्वारा निर्मित प्राकृतिक समाजरचना है। यह अपने आप, स्वतः ही विद्यमान होती है। यदि समाज में धर्म प्रस्थापित हो अर्थात प्रत्येक अपने कर्तव्य का पालन करते हुए औरों के लिये योगदान कर रहा हो तो अपने आप समाज इन चार प्रकार के कार्य विभाजन में संचालित होने लगता है। वर्तमान लेख में हमारा उद्देश्य हम अपने स्वभाव को कैसे पहचाने यह जानना है। उसके लिये हमें अपने वर्ण को पहचानना होगा। इसका जन्म से कोई सम्बन्ध नहीं है। किस जाति में जन्म हुआ उससे स्वभाव वर्ण निर्धारित करने की स्थिति वर्तमान समय में समाज में नहीं है। अतः हमें इन वर्णों के लक्षणों को जानकर किस वर्ण के लक्षण हम में अधिक दिखाई देते है उसका निर्धारण करना है। यह जानने से पूर्व एक बात ध्यान में रखनी होगी। प्रत्येक वर्ण अपने आप में महत्वपूर्ण है और उनमें उच-नीच का भेद नहीं है। हमारे स्वभाव के लिये हमारा वर्ण ही सर्वश्रेष्ठ है और उसके अनुसार कर्म का चयन ही हमारे लिये श्रेयस्कर है।
शमो दमस्तपः शौचं क्षांतिरार्जवमेव च।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्।।गी 18.42 ।।
सौम्यता, संयम, तपस्या, शुद्धि, ध्यैर्य तथा ऋजुता अथवा सरलता, ज्ञान व उसके विशेष प्रयोग- विज्ञान तथा ईश्वर पर विश्वास यह ब्राह्मण के स्वभाव विशेष हैं। इसी के द्वारा ब्राह्मण के स्वकर्म का निर्धारण होगा। इस वर्ण के स्वभाव वाले व्यक्ति का प्रत्येक कार्य को करने के पीछे ‘ज्ञानप्राप्ति‘ का उद्देश्य होता है। इस स्वभाव का व्यक्ति गलती से किसी अन्य कर्म यथा व्यापार, सुरक्षा अथवा सेवा में चला भी जाये तो उसे उस काम में भी ज्ञान पाने की अभिलाषा होगी। ब्राह्मण स्वभाव वाले व्यक्ति का स्थायी प्रेरक ‘त्याग’ होता है। त्याग से ही उसे कर्म करने की आकांक्षा व कर्म से आनन्द की अनुभूति होती है। सहजता से योगदान करना ऐसे लोगों की आदत होती है। इनके निर्णय का आधार ‘धर्म-अधर्म विचार’ होता है। अर्थात किसी भी कार्य का चयन करते समय इनका विचार होगा कि मेरा कर्तव्य क्या है? कार्य करणीय है अथवा नही? इससे समष्टि का हित होगा या नुकसान? क्योंकि धर्म हमारा समाज के पति कर्तव्य ही तो है। ऐसे स्वभाव वाले व्यक्ति को पठन-पाठन, अध्यापन, अनुसंधान, लेखन, पत्रकारिता आदि व्यवसायों में सहज सफलता मिलेगी साथ ही स्वभाव के अनुकुल कार्य करने के कारण संतुष्टि भी।
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्।
दानमीश्वरभावश्च क्षत्रं कर्म स्वभावजम्।।गी 18.43।।
वीरता, तेज, अड़ीगता, दक्षता, युद्ध से कभी पलायन ना करना, दान तथा स्वामीत्व अथवा नेतृत्व का बोध यह क्षत्रीय वर्ण के स्वभाव लक्षण है। क्षात्रवर्ण का स्वभाव होने पर व्यक्ति के कर्म का उद्देश्य ‘प्रतिष्ठा’ होता है। इस स्वभाव का व्यक्ति ज्ञानार्जन भी प्रतिष्ठा के लिये करेगा। अपनी आन की खातिर जीवन तक लगा देने की तैयारी क्षत्रीय की होती है। इस वर्ण का स्थायी प्रेरक ‘वीरता’ है। वीर्य के लिये इस स्वभाव का व्यक्ति हर कर्म करता है और इस वीरभाव की तुष्टि से ही आनन्द प्राप्त करता है। इस वर्ण में नेतृत्व का गुण सहज होता है। अतः कार्य के निर्णय का आधार ‘न्याय-अन्याय विचार’ होता है। किसी भी विषय में निर्णय लेते समय यह न्यायकारी है अथवा नहीं यह विचार चयन का आधार बनता है। इस वर्ण स्वभाव के व्यक्ति को सुरक्षा बल, प्रशासन कार्य, राजनीति अथवा क्रीड़ा क्षेत्र में व्यवसाय करने से सहज सफलता व संतुष्टि प्राप्त होगी।
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्।गी 18.44।
इस श्लोक की पहली पंक्ति में वैश्य के कर्म का बखान है। कृषि, पशुपालन तथा व्यापार यह वैश्य वर्ण के स्वभावगत कर्म है। कृषि अर्थात सर्व प्रकार का मौलिक उत्पादन। वर्तमान अर्थव्यवस्था में ऊपरी चलन से वित्त के जनन का भ्रम निर्माण किया जाता है और जब यह बुलबुला फूटता है तो अभी के समान मंदी की स्थिति बनती है। वास्तव में एक बीज से अनेक का निर्माण कर मूलभूत उत्पादन कार्य तो किसान ही करता है। बाकी सारे औद्यागिक उत्पादन कृषि व खनन से प्राप्त वस्तुओं के रुपांतरण ही होते है। श्री के निर्माण का मूल कार्य कृषि व पशुपालन करता है। यह केवल अन्न का ही नहीं पूरे औद्योगिक उत्पादन के लिये कच्चे माल का भी निर्माण कार्य है। तो वैश्य का कार्य है श्री का सृजन, उत्पादन व उसका व्यापार। इस स्वभाव के व्यक्ति का कार्य के पीछे उद्दीष्ट लाभ का होता है। हर कार्य से क्या मिलेगा इस विचार से ही इस वर्ण का व्यक्ति कार्य करता है। कर्म का स्थायी प्रेरक ‘स्वर्ण’ अर्थात आर्थिक लाभ होता है। इस वर्ण के स्वभाव वाले व्यक्तियों के निर्णय का आधार भी ‘लाभ-हानी’ विचार होता है। वर्तमान समय में युग का प्रभावी वर्ण वैश्य होने के कारण इस स्वभाव का सर्वत्र चलन दिखाई पड़ता है। लोक प्रभाव में हम भी ऐसे चिंतन को स्वयं पर आरोपित करने की भूल कर सकते है। अतः सकर्तता से अपने स्वभाव को जाँचना होगा। यदि बाहरी प्रभाव के अलावा आंतरिक रुप से भी हमारा स्वभाव वैश्य वर्ण का हो तो फिर उत्पादन, विपणन, व्यापार आदि व्यवसाय हमारे लिये अनुकूल होंगे। इस वर्ण के कर्मों में कृषि को सर्वश्रेष्ठ कहा है। इसके बाद अन्य उत्पादक व्यवसाय तथा सबसे अंत में व्यापार अर्थात अन्य किसी के द्वारा उत्पादित वस्तु का विपणन। वर्तमान में वित्तीय सेवा, लेखा सेवा व विज्ञापन ये नये क्षेत्र भी वैश्य कर्म में बने है। इस वर्ण स्वभाव के व्यक्ति को इन सभी व्यवसायों में से अपनी क्षमता, रुचि व शिक्षा के अनुसार चयन करना चाहिये।
परिचर्यात्मकं कर्मं शुद्रस्यापि स्वभावजम्।।गी18.44।।
शुद्र वर्ण के लोगों का स्वभाव सेवाकार्य करने का होता है। सेवा के भी भिन्न भिन्न प्रकार हो सकते है किंतु जो व्यक्ति स्वभावतः किसी और के आदेशों के अनुसार कार्य करने में सहजता का अनुभव करते है वे भी आवश्यक होते है। यदि समाज में सभी लोग नेतृत्व करने लगे तो समस्या हो जायेगी वे नेतृत्व करेंगे किसका? अतः सभी समय में समाज में बहुसंख्य लोग स्वभावतः ऐसे होते है कि जो स्वयं निर्णय लेने की जिम्मेवारी नहीं उठाना चाहते अपितु किसी और के लिये निर्णयों पर बड़े सेवाभाव से अमल करते है। किसी भी संस्थान में ऐसे व्यक्ति संस्थाके निष्ठावान कर्मचारी होते है। संस्थान की उत्पादकता, प्रभाव व वाणिज्यिक सफलता ऐसे लोगों की कुशलता पर निर्भर करती है। सेवा अथवा परिचर्या के उद्दीष्ट से कार्य करनेवाले व्यक्ति का स्वभाव शुद्र वर्ण का होता है। इस वर्ण के व्यक्ति स्वभावतः तमसप्रधान होने के कारण इनका स्थायी प्रेरक ‘भय’ होता है। किसी की डाँट के भय से हम में से अनेक लोग अधिक कौशल व क्षमता का प्रदर्शन कर पाते है। यह कोई न्यून नहीं है अपने आप में प्रकृतिजन्य स्वभाव है। इस वर्ण स्वभाव के लागों का निर्णय ‘हिताहित विचार’, स्वयं के प्रत्यक्ष एवं तुरंत हित व अहित के विचार पर निर्भर होता है। समाज में इस वर्ण की सभी युगों में बहुलता होती है। अतः यदि हमारा स्वभाव इस श्रेणी में आता है तो उसमे लज्जा की कोई बात नहीं। वर्तमान समय में सवार्धिक अवसर इसी स्वभाव के लोगों के लिये है। ऐसे लोग नौकरी के लिये सर्वोत्तम होते है। किसी भी चमु में (टीम)  में इनके सफलता की सम्भावना अधिक होती है। आज सभी क्षेत्रों में चमुत्व का बड़ा महत्व है अतः शुद्र स्वभाव के लोगों की सफलता का यह युग है। स्वामी विवेकानन्द कहते है कि आनेवाले युग में शुद्रवर्ण का राज होगा। अर्थात सेवाभाव प्रभावी भाव होगा।
चारों वर्णों के स्वभावविशेष को जान लेने के बाद भी स्वयं के स्वभाव का निर्णय करना इतना सहज नहीं होता है। जीवन में अलग अलग समय पर भिन्न भिन्न परिस्थिति में हम अपने आप में अलग अलग वर्ण स्वभाव का प्राधान्य देखते है। अतः सम्भ्रम हो सकता है। निर्णायक यह होगा कि हमे आंतरिक आनन्द किस वर्णस्वभाव के उद्देश्य को पूर्ण करने से होता है? ज्ञान से? प्रतिष्ठा से? लाभ से? या सेवा से? दूसरा संकेत प्रेरक तत्वों का है। कार्य का प्रेरक क्या है? त्याग? वीरता अर्थात आन-शान? स्वर्ण अर्थात पैसा? या असफलता, डाँट का भय ? स्वभाव का निर्णय कर लेने के बाद यदि हम अपनी आजीविका के व्यवसाय का सही चयन करेंगे तो कम प्रयास में अधिक सफलता सुनिश्चित है। वर्ण स्वभाव जान लेने के बाद उपलब्ध अवसरों का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन कर निर्णय लेना चाहिये। नियत कार्य को चुनने के लिये कोई भी समय अनुचित नहीं है। केवल अनेक वर्षों से ठीक ठाक परिणाम के साथ कोई कार्य कर रहे है इसलिये वही हमारा नियत कार्य हो यह आवश्यक नहीं। यदि जीवन के किसी भी पाड़ाव पर यह ध्यान में आये कि हम अपने स्वभाव के विपरित अथवा अन्यथा कर्म में फँसे हुए है तो ऐसी स्थिति में 1. या तो इसी कर्म को अपने स्वभाव के अनुरूप करने का पर्याय चुने 2. चाहे जितनी जोखिम उठानी पड़े अपने स्वभाव के अनुसार कार्य हाथ में ले ले। आदर्श तो दूसरा पर्याय ही है किन्तु हमारी आजीविका अपने परिवार व अन्य अनेक लोगों के जीवन से जुड़ी होती है अतः निर्णय व्यक्तिगत ना होकर सामूहिक होना चाहिये। विश्लेषण के समय से ही सभी सम्बधितों को विचार प्रक्रिया में सम्मिलित करना चाहिये।

नवम्बर 17, 2011 Posted by | योग | , , , | 2 टिप्पणियाँ

जीवन में संतुष्टी चाहिए तो स्वधर्म आधारित कर्म करें !


कर्मयोग 6:
चंगु की अच्छी खासी नौकरी है, ठीक ठाक कमाई भी। स्नेहमय, सुखी, समझदार, सहयोगी परिवार; तेजस्वी, प्रखर बुद्धि, आज्ञाकारी पुत्र भी है। अब यह सब जिसके पास हो उसके तो बड़ा ही भाग्यशाली कहा जायेगा ना? समाज भी चंगु को सफल ही मानेगा। मित्र प्रशंसा व सराहना भी करेंगे और जिसके जीवन में एक इन में से एक भी न्यून होगा वह मन ही मन यह भी साचेगा कि काश मै भी इतना भाग्यवान होता। कुछ परिचित अथवा सम्बन्धी जलन का भी अनुभव कते होंगे। पर जरा स्वयं चंगु से तो पूछो कि क्या वह संतुष्ट है जीवन से? उसे स्वयं भी कारण पता नहीं पर सोचता है कि कुछ तो कमी है ही। कुछ खोजता रहता है।
मंगु एक सफल चिकित्सक है। अच्छी ग्राहकी है। उसके निदान व उपचार से उसके नियमित रोगी प्रसन्न है। वह स्वयं भी सदा प्रसन्न रहता है। हाँ ! बाकि चिकित्सकों से उसको समय जरा ज्यादा लगाना पड़ता है अपने चिकित्सालय में। एक तो रोगियों की संख्या भी अपेक्षाकृत अधिक रहती है और प्रत्येक रोगी के निदान में समय भी अधिक लगता है। उनके उपचार कक्ष में वे एकसाथ 5-6 रोगियों को बुला लेते है। फिर प्रत्येक का ठीक से परिक्षण भी करते है। वर्तमान युग में विकार प्रयोगशालाओं (Pathology Labs) पर निर्भर रहनेवाले चिकित्सकों के विपरित डॉ मंगु स्वयं हस्त परिक्षण में अधिक विश्वास रखते है। पूरे समय रोगी को रोग के बारे में समझाते भी रहते है। रोग के कारण, निदान व उपचार के साथ ही दवा व पथ्य की भी पूरी जानकारी देते है। बाकि 4-5 रुग्णों का भी ज्ञानवर्द्धन हो जाता है। कोई जिज्ञासा, शंका या प्रश्न पूछ ले तो फिर तो और आनन्द की बात है। ये सफल भी है और प्रसन्न भी, जीवन से पूर्ण संतुष्ट भी लगते है और यदा कदा आवश्यकतानुसार सामाजिक कार्य के लिये समय भी निकाल लेते है। लगता हे इनकी खोज पूरी हो गई है। पा गये है जो पाना चाहते थे। किसी निवृत्त प्राचार्य ने एक बार कहा था, ‘‘आप गलती से डॉक्टर बन गये, आपको तो शिक्षक बनना चाहिये था। आपका स्वभाव ही शिक्षक का है।’’ डॉ मंगु केवल मुस्कुरा दिये, मानो कह रहे हो, ‘मै और क्या करता हूँ ? ये रोगी मेरे छात्र ही तो है। उपचार से अधिक शिक्षण से ही इनका रोग दूर होता है।’
चंगु और मंगु भले ही काल्पनिक नाम हो पर ये व्यक्तित्व काल्पनिक नहीं है। हमारे आसपास ऐसे अनेक चुगु मंगु हमने देखें होंगे। हो सकता है कुछ कुछ हमारे जीवन की ही कहानी हो ये। लोग कहते है संतुष्ट होने के दो ही मार्ग है। या तो वह कार्य करों जो आपको प्रिय हो या जो कार्य कर रहे हो उसे प्रेम करों। पर कर्मयोग ऐसे, वा, अथवा, किन्तु, परन्तु ओं को नहीं मानता। उसका तो सीधा सपाट आदेश है। नियतं कुरु कर्म त्वम्।। गी 3.8।। अपने लिये तय किया हुआ कार्य करोगे तभी सफलता, संतुष्टी और परिपूर्णता का अनुभव होगा। नियत किया कार्य। किसके द्वारा नियत किया? ईश्वर, विधाता अथवा विधि विधान जैसी बाते तो भक्तों वा भाग्यवादियों की हो सकती है। कर्मयोगी तेा पुरुषार्थ पर विश्वास करता है। अपने पौरुष, पराक्रम से जीवन पर विजय पाने का नाम कर्मयोग है। और गीता का नेपथ्य तो रणभूमि है। उसका उद्देश्य अर्जुन को युद्धार्थ तत्पर करना है। अतः जीवन संग्राम की प्रेरणा का व्यावहारिक मर्मज्ञान गीता देती है। जब गीता नियत कर्म करने का आदेश दे रही है तो वह किसी और द्वारा कार्य नियत करने जैसी दासता की बात नहीं कर रही। गीता तो स्वतन्त्रता का गान है। अतः नियत का मर्म भी हमे गीता के श्लोक में ही मिलेगा। स्वभाव नियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्।।गी 18.47।। स्वभाव द्वारा तय किये गये कर्म को करने से कोई भी कलंक, पाप अथवा अवगुण नहीं लगता। स्वभाव का आधार है स्वधर्म। स्वधर्म गीता की टेक है। टेक अर्थात बार बार दोहराया जाने वाला मर्मवाक्य। जैसे राम चरित मानस के गायन में दोहे, चैचाई, छंद और सोरठे के परिवर्तन के बीच ‘मंगल भुवन अमंगल हारी’ अथवा ऐसी ही कोई और टेक का प्रयोग होता है। वैसे ही गीता की टेक है स्वधर्म, उत्तिष्ठ और युध्यस्व। इनमें स्वधर्म सबसे महत्व का है क्योंकि यह गीता का मुख्य विषय है। संस्कृत ग्रंथों के विषयवस्तु को जानने के लिये एक विधि है पहले और अंतिम शब्द को जोड़कर देखना। इस विधि से देखने पर गीता का पहला श्लोक है ‘‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता ……’’ तो प्रथम शब्द हुआ ‘धर्म’। अंतिम श्लोक की अंतिम पंक्ति है- ‘‘धृवा नीतिर्मतिर्मम।’’ तो अंतिम शब्द हुआ ‘मम’। इनको जोड़कर गीता का विषय बनता है – ‘‘मम धर्म’’
इसी श्लोक की पूर्वपंक्ति में भगवान कहते है- श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात्।।गी 18.47।। स्वधर्म में कुछ न्यून होने पर भी किसी और के धर्म का पालन करने से स्वधर्म अधिक श्रेयस्कर है। कर्म की अपनी गुणवत्ता अथवा उपयोगिता कर्म के चयन का आधार नहीं हो सकती। यदि जीवन में सफलता के साथ संतुष्टी और परिपूणता को प्राप्त करना है तो 1. स्वकर्म का चयन स्वधर्म व स्वभाव के आधार पर करना होगा। अथवा 2. प्राप्त कर्म को अपने स्वभाव के अनुसार ढ़ाल कर उसके माध्यम से स्वधर्म का निर्वाह करना। डॉ मंगु का स्वभाव शिक्षक का है और परिस्थितिवश वे चिकित्सा कार्य में आ गये। तो उसे भी अपने स्वभावानुसार ही निर्वाह कर अपने स्वधर्म का पालन कर रहे है। प्रयत्नपूर्वक यदि चिकित्सा महाविद्यालय में अध्यापक बन गये तो और अधिक आनन्द की बात होगीं भले ही आर्थिक रुप से कमाई कुछ कम हो।
स्वधर्म का पालन सबसे प्रमुख बात है। यदि यह नहीं कर पाये तो बाकि सारी उपलब्धियाँ शून्य हो जाती है और चंगु भाईसाब की भाँति जीवन में अधुरापन बना ही रहता है। सामान्यतः हम मानते है कि सबसे बड़ा भय तो मृत्यु का होता है किन्तु भगवान गीता में परधर्म को अर्थात स्वधर्म के अतिरिक्त किसी भी कर्म को मृत्यु से भी अधिक भयावह बता रहे है। स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।। गी 3.35।। स्वधर्म के पालन में मृत्यु भी परधर्म से अधिक श्रेयस्कर है। श्रेय शास्त्रों का पारिभाषिक पद है। इसका बड़ा ही गहन अर्थ है। अभी तो श्री की ओर ले जाने वाल श्रेय अर्थात कल्याणकारी इतना पर्याप्त है। फिर कभी विस्तार से चर्चा करेंगे। इस श्लोक की पूर्वपंक्ति भी वही है जो 18 वे अध्याय के 47 वे श्लोक की है। किसी और के अधिक उपयोगी कार्य की तुलना में स्वधर्म में कुछ कमी, बुराई हो तो भी वह हमारे लिये श्रेष्ठ ही होगा। एक ही विधान के दो निष्कर्ष का अर्थ है दोनों निष्कर्ष भी आपस में ही जुड़े है। एक में स्वधर्म के लिये निधन की बात है तो दूसरे में स्वभाव द्वारा निर्धारित कर्म के पवित्रता का दाखला है। इन दोनों को जोड़कर समझने का प्रयत्न करते है तो ये बात निकलकर आती है कि स्वभाव के अनुसार कर्म करना ही स्वधर्म पालन है।
गीता माता स्वभाव व स्वधर्म को जानने का व्यववहारिक मार्ग भी बताती है। उसे हम अगली बार देखेंगे। आज इतना आत्मपरिक्षण कर ले कि क्या हम अपने जीवन के कार्य से संतुष्ट है? बाहरी सफलता की बात नहीं है। आंतरिक परिपूर्णता के अनुभव की बात है। तृप्ति, प्रसन्नता ये कुछ मापदण्ड हो सकते है पर सबसे महत्वपूर्ण परिमाण यह होगा कि क्या हमारा योगदान है? उन सबके लिये जो हमसे प्रत्यक्ष जुड़े है और जो थोड़े परोक्ष रुप से। क्योंकि धर्म का इस सन्दर्भ में अर्थ होता है कर्तव्य। धर्म ही सम्बन्धों का वास्तविक आधार है। भारतीय संस्कृति में अधिकार का कोई सक्रीय स्थान नहीं है। कर्तव्य सक्रीय है उनके परोक्ष परिणाम के रुप में अधिकारों की रक्षा हो ही जाती है। अतः अपने स्वभाव को जानने से पूर्व अपने सम्बन्धों का परीक्षण करना होगा। अपने सबसे निकट परिवार से प्रारम्भ कर सकते है। हमारी औरों से क्या अपेक्षायें होती है इसका चिंतन करने से स्वभाव तक नहीं पहुँच पायेंगे। अपेक्षायें तो क्वचित, कभी कभार ही वास्तविक होती है। अतः ना तो अपनी औरों से अपेक्षा का मूल्यांकन और ना ही सब परिवार जनों की हमसे अपेक्षा का ज्ञान स्वभाव को जानने के चिंतन में उपयुक्त होगा। तो फिर सम्बन्धों का आत्मावलोकन कैसे करना है? सरल है। सम्बन्ध का अर्थ है आत्मीयता का प्रगटन। तो इसका चिंतन करना है। आत्मीयता के बिन्दुओं को खोजना है। परिवार, मित्र मण्डली, साथी और परिचित भी इनमें किनके साथ अधिक आत्मीयता का अनुभव होता है। किन गुणों, आदतों अथवा व्यवहार में आत्मीयता का स्पन्दन अनुभव होता है? ये विचारणीय बिन्दु हैं। बृहदारण्यक उपनिषद में याज्ञवल्क अपनी विदूषी पत्नि मैत्रेयी को बड़े प्रेम से समझाते है, ‘‘न वा अरे मैत्रेयी पतिकामांस पति प्रियो भवति आत्मकामांस्तु एव’’ अरी मैत्रेयी पति की कामना से पति प्रिय नही होता वह तो अपनी आत्मा के प्रकाश के कारण प्रिय होता है। अर्थात वह मेरा पति है इस बात से प्रेम हेाता है। यही सब सम्बन्धों के बारे में बताते है। बड़ा ही आत्मीय संवाद है।
सम्बन्ध दर्पण के समान होते है। अपने आप को स्वयं के अंदर स्पष्टता से देखना बड़ा कठीन होता है। सम्बन्ध अनजाने में भी हमें अपना दर्शन करवाते है। अतः स्वभाव को समझने का प्रथम सोपान है अपने सम्बन्धों को जानना। आईये इस सप्ताह इस यथार्थ गृहकार्य को करें फिर आगे गीता की स्वभाव निर्धारण तकनिक को समझेंगे।

नवम्बर 10, 2011 Posted by | योग | , | 6 टिप्पणियाँ

कर्म के बॉस बनों! पूछो! मै यहाँ तू कहाँ??


कर्मयोग ५:

सुबह कर्मचारी के हाथ से पानी का गिलास गिरा और पानी बिखरा। आवाज से बॉस वहाँ आयें देखकर गुस्सा हुए। डाँट लगाई, ‘‘देख कर काम नहीं कर सकते? इतनी लापरवाही? ध्यान कहा रहता है?’’ बिचारा कर्मचारी सहम गया। संयोग से शाम को बॉस  का हाथ लगकर पानी से भरा गिलास गिर गया, पानी बिखरा। बॉस गुस्से से चिल्लाये, ‘‘किसने यहाँ पानी भरा गलास रखा है? ये कोई जगह है पानी रखने की।’’ सारे कर्मचारी चूप। मन ही मन भले ही हँस रहे हो। पर बाहर तो कुछ नहीं कह पाये। बॉस के जाने के बाद सुबह जिसे डाँट पड़ी थी वह कर्मचारी कुलबुलाने लगा। शिकायत करने लगा। अन्याय की बाते करने लगा। गलती किसी की भी हो डाँट तो हमे ही पड़ेगी, आदि आदि। एक साथी ने हॉल के कोने में लगे एक पोस्टर की ओर उसका ध्यान दिलाया। पोस्टर पर बड़े अक्षरों में छपा था, “This office has 3 rules. 1.Boss is always right. 2. No one can challange the Boss or complain against him. 3. If you feel boss is wrong, …. please refer to Rule number 1.

यह सामान्य सी बात है। जो स्वामी होगा उसी कि चलेगी। दास को स्वामी की सुननी ही पड़ेगी। अब आपको तय करना है कि आप स्वामी बनना चाहते हे या दास? यदि आप अपनी ईच्छा के अनुसार कर्म करना चाहते है तो आपको स्वामी ही बनना होगा। और सबसे पहला स्वामीत्व स्वयं पर होता है। हम स्वतन्त्रता से कर्म करना चाहते है। कोई दास के रूप में काम नहीं करना चाहता। कर्मयोग हमें स्वतन्त्र होने का रास्ता बताता है। सबसे बड़ी दासता किसकी है? इन्द्रियों की। यदि हमने उनपर नियन्त्रण नहीं किया तो वे हम पर नियन्त्रण करेगी ही।
तीसरे अध्याय में मिथ्याचार को बताने के बाद भगवान् श्रीकृष्ण इसी का विज्ञान समझाते है।यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभते अर्जुन। इन्द्रियों का मन के द्वारा नियमन करना है। नियम्य का अर्थ नियन्त्रण से भी लिया जा सकता है। पर नियन्त्रण में थोड़ा जबरदस्ती का भाव है। और युवा को कोई बात प्रेम से कह दो मान जायेगा पर वही बात अकड़कर जबरदस्ती करवाने का प्रयास करों तो विद्रोह कर देगा। हमारा मन भी हमेशा युवा होता है। इसलिये उसे भी जबरदस्ती पर विद्रोह की आदत होती है। अतः नियमन अधिक उपयोगी है। मन में प्रचण्ड ऊर्जा होती है और वह इन्द्रियों से सुक्ष्म भी है। अतः उसके माध्यम से ही इन्द्रियों को सही दिशा दी जा सकती है। इन्द्रियों का कार्य ही मन के आधार पर होता है। अधिष्ठाय मनश्चायं विषयान् उपसेवते।। गी 15.9।। मन के अधिष्ठान बिना इन्द्रियों का कार्य सम्भव ही नहीं है। जैसे जब रास्ते पर वाहन चलाते हुए दुर्घटना हो जाती है तब सामान्य सा संवाद होता है, ‘‘अन्धे हो क्या? दिखता नहीं है? या आँखें बन्द करके चलते हो?’’ या फिर, ‘‘इतना भोंपु बजा रहा हूँ। सुनाई नहीं देता? बहरे हो गये हो क्या?’’ जिसकी गलती होती है वो ना तो बहरा होता है ना ही अंधा। पर उसका एक ही स्पष्टीकरण होता है। भाषा बदल सकती है पर बात यही आयेगी हर बार कि, ‘‘ध्यान नहीं था।’’ इसका क्या अर्थ हुआ। मन कान या आँख के साथ नहीं था। मन के अधिष्ठान के बिना कोई इन्द्रिय कार्य नहीं कर सकती। इसलिये जब हम कहते है कि इन्द्रियाँ नहीं मानती हम वास्तविकता में कह रहे होते है मन नहीं मानता।

मन के द्वारा इन्द्रिय नियमन का उपाय है हर कर्म को पूर्ण सजगता से करना। ऐसी आदत मन को ड़ल जाये कि कभी किसी काम में यह ना कहना पड़, ‘‘ध्यान नहीं था।’’ सजगता का अर्थ खेल के समय खेल और पढ़ाई के समय पढ़ाई। हम जो कर रहे है उसमें सूक्ष्मतम स्तर पर सजग रहना। आसन प्राणायाम के अभ्यास का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य इस सजगता को बढ़ाने का ही होता है। हम छोटे छोटे कामों को करते समय भी अपने मन को उनमें नहीं लगाते। इसके कारण वास्तविकता में हम उन कार्यों का आनन्द ही नहीं ले पाते। जैसे भोजन के समय हम टी वी देखते है। फिर ध्यान खाने में कहाँ होगा। यदि ये कहा जाय कि अधिकतर लोग भोजन का वास्तविक स्वाद ही नहीं जानते है तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। हम में से कितने लोगों ने इस बात पर ध्यान दिया है कि कद्दु मिठा होता है। जी हाँ मिठा! अगली बार खाते समय अपना पूरा ध्यान जिव्हा पर अर्थात स्वादेन्द्रियों पर केन्द्रित करें। तो पता चलेगा, सारे मसालों के मध्य भी कद्दु का मिठापन समझ में आयेगा। यदि किसी योग शिविर में ये प्रयोग करेंगे तो और आसानी होगी। मसालों का व्यवधान भी तो नहीं होगा ना?

आधुनिक युवा कहता है ये योग-वोग मत बताओ हम तो जीवन का पूर्ण आनन्द लेना चाहते है। इतना अनमोल जीवन है उसे ऐसे ही नहीं गवाँना चाहते। पूरा भोग करना चाहते है। पर बिना सजगता के भोग भी कहाँ सम्भव है? जैसे स्वाद का उदाहरण देखा वैसे ही बाकि सब भोगों का भी है। यदि मन एकाग्र नहीं हो तो हम किसी भी विषय का भोग नहीं कर सकते। भोग के लिये भी इतना योग तो करना ही होगा। नहीं तो जैसा हम बोलते भी है भोग के सहायक ‘उपभोग’ से काम चलाना पड़ेगा। उपभोग ना तो भोगी वस्तू का पूर्ण आनन्द देता है ओर ना ही संतोष। इससे तृष्णा भी बढ़ती है और अपूर्णता भी। इसी को आज की भाषा में लोग तणाव (स्ट्रेस) कहते है। और इससे पिण्ड छुड़ाने के लिये ना जाने क्या क्या करते है? तणाव को उत्पन्न होने से ही रोकने का तरिका है-सजगता से कर्म करना।

सजगता का जितना अभ्यास करेंगे उतनी वह सूक्ष्मता तक जायेगी। जैसे योगाभ्यास में हम प्रथम शिथिलीकरण व्यायाम करते है तो उस समय शरीर की मांसपेशियों के बदलाव को ध्यान से देखते है। सजगता ठोस स्तर पर होती है। फिर आसन के समय रक्त के प्रवाह को ध्यान से देखते है। तो सजगता तरल स्तर पर होती है और श्वसन का ध्यान देते समय वायु के स्तर पर होती है। अधिक अभ्यास से स्नायविक स्पन्दन तथा प्राण प्रवाह जैसे और भी सुक्ष्म स्तर पर सजगता का विकास कर सकते है। किन्तु, इन्द्रियों के निग्रह के लिये शारीरिक स्तर पर सजगता पर्याप्त है। पर शरीर की क्रियाओं में सजगता तो केवल अभ्यास के लिये है। जीवन में कर्म के समय अनेक क्रियाओं का समन्वय होता है साथ ही हेतु, प्रक्रिया आदि के बारे में विचार भी चल रहे होते है। इन सबका सम्मिलित ध्यान रखना सजगता है। अलग अलग ध्यान रखना भले ही कठीन हो पर पूरे कर्म को एकसाथ देखने की तो हमें आदत होती है। हर नये काम को सीखते समय हम पूरी प्रक्रिया को ध्यान से देखकर ही करते है। अतः ये आदत बड़ी सहजता से लग सकती है। केवल याद रखना होता है। बीच बीच में अपने आप को पूछते रहना है कि मनिराम कहाँ है? मनिराम की क्षमता होती है कि कहीं भी जा सकता है। पर यही क्षमता यदि नियन्त्रण में ना रहे और अपने आप होने लगे तो सजगता को तोड़ देती है और फिर आप के हाथ में अपने कर्म का स्वामीत्व नहीं रहता है। उपनिषदों का उदाहरण लिया जाय तो रथ को सारथी के स्थान पर घोड़े दिशा देने लगेंगे तो रथ कहाँ जायेगा? फिर पीछे कितना भी बड़ा महारथी क्यों ना हो युद्ध तो घोड़े ओर सारथी में ही होता रहेगा। आधुनिक समय में ऐसीं कारों की कल्पना की जा रही है जो स्वयं अपने आप ही चलेगी। किन्तु गन्तव्य का संचालन भले ही पूर्वनिर्धारित हो करेगा तो मनुष्य ही। यही तो सहगता की आदत से होता है। हम अपने कर्म को सहजता से करते हुए भी उसके बारे में पूर्ण सजग होते है। अवचेतन मन के स्तर पर यह कार्य होता है। यह हमारा अपना चिरपुरातन विश्वासु स्वचालक (Auto Pilot)  है। जब अपने आप अवचेतन कर्म का नियन्त्रण हाथ में ले लेता है तब हम इसे सहज कर्म कहते है। अनायास, बिना किसी प्रयास के। यह मन के भी प्रशिक्षण का विषय है और इन्द्रियों के भी।

कुछ लोग कह सकते है ये बड़ा झंझट का काम है। वैसे ऐसा है नहीं। बस थोड़ा याद ही तो रखना है कि अपना मन वही हो जहाँ हमारी इन्द्रियाँ है। और यदि थोड़ा कठीन भी है तब भी पर्याय क्या है? ये लड़ाई वाकई आर-पार की है। यदि आप के पास स्वामीत्व नहीं होगा तो वो इन्द्रियों के हाथ में चला जायेगा। जिसके कर्म का स्वामीत्व इन्द्रियों के पास चला गया है उसको भगवान श्रीकृष्ण इन्द्रियराम नाम देते है। और कहते है कि पाप की आयु भरे ऐसे इन्द्रियराम का जीवन ही व्यर्थ है। अघायुः इन्द्रियारामों मोघं पार्थ स जीवति।।गी 3.16।।

यदि हम अपने जीवन को व्यर्थ नहीं गँवाना चाहते तो फिर अपने कर्म की ड़ोर अपने हाथ में लेनी होगी। बड़ा सरल है- जहाँ हम है वही हमारा मन हो। सजगता से अपने मनिराम को पूछते रहना है -‘‘मै यहाँ तू कहाँ??‘‘ और यदि पता चले कि भाईसाब कहीं घुमने गये है तो तुरन्त वापिस बुलाना है। ‘‘आ S आ S  आ S Sजा ’’। अब केवल गाना गाने से तो मन नियन्त्रण में नहीं आ जायेगा। कर्मयोग हमें इसका व्यावहारिक मार्ग बताता है। इसका व्यावहारिक मार्ग है अपने शरीर को ध्यान से देखना, महसूस करना। अपने अंगों का ऐक दूसरे से होता स्पर्श, काम करते समय मांसपेशियों में होती हलचल, कपड़ों का शरीर से होता स्पर्श इन सब पर ध्यान देने से मनिराम तुरन्त वापिस आ जाता है। धीरे धीरे अभ्यास से ये बड़ा आनन्ददायी हो जाता है। थकान तो आती ही नहीं यदि दिन में दो तीन बार भी इस प्रकार अपना ध्यान एकाग्र कर ले। तणाव का नाम ही नहीं रहता। यही तो कर्मयोग है। प्रसन्नता से कर्म करने की कला। व्यस्त रहते हुए भी मस्त रहना।

अक्टूबर 22, 2011 Posted by | योग | , , , , , | 3 टिप्पणियाँ

भले कर्मकाण्डी बनो! पर मिथ्याचारी नहीं!!


माँ बेटी के साथ बैठकर टी वी देख रही है। भौंडे भौंडे संवाद और वेष सब दोनों एकसाथ देख रही हैं। दादी ने या किसी ने आपत्ति की तो तथाकथित आधुनिक मम्मी का उत्तर था। ‘मै पाखंड (Hypocrisy)  में विश्वास नहीं करती हूँ। मेरे साथ नहीं देखेगी या मे मना भी कर दूँगी तो क्या छिपके नहीं देखेगी?’ बात में तो दम लगता है। पाखण्ड को तो सभी बुरा मानेंगे। पर क्या हमने सोचा है जिसे हम पाखण्ड का नाम दे रहे हे उस ‘लज्जा’ के कारण हमारे समाज में मूल्यों की रक्षा कैसे हुई है? माँ के साथ बैठकर खुलेआम देखने और छिप छिप कर देखने में मन पर संस्कार का अंतर है। पहले प्रसंग में माँ की अनुमति के कारण जो देखा जा रहा है उसका भी अनुमोदन हो रहा है। और इस कारण उसके अनुसरण में भी कोई हिचक नहीं रहेगी। चोरी छिपे देखने में प्रक्रिया में ही बोध निहित है कि जो देखा जा रहा है वह ठीक नहीं है। सामाजिक दृष्टि से वर्जित है। अतः मन में यह विचार कम ही आयेगा कि स्वयं भी ऐसा कुछ करें। युवा अपनी संगत के कारण धुम्रपान करने लगता है। पर संस्कारों के चलते जो ‘आँख की शरम’ के कारण इतनी मर्यादा रखता है कि अपने से बड़ों के सामने धुम्रपान नहीं करता। पिता या उनके समकक्ष कोई दिखने पर धुम्रदण्ड को छिपाने लगता है। अब इस प्रक्रिया में व्यसनमुक्ति की सम्भावना निहित है। पर यदि आधुनिकता व खुलेपन के नाम पर पिता ही युवा पुत्र के साथ बैठकर व्यसनानन्द लेने लगे तो फिर तो सुधार की सम्भावना ही समाप्त। अब बताओ ऐसा पाखण्ड ठीक है या नहीं?
भाषा में पदों के अर्थ तो होते है पर वे अपने आप में अच्छे या बुरे नहीं होते। सन्दर्भ, संस्कृति व कर्म का उद्देश्य तय करेगा कि वह कर्म किस श्रेणी में आयेगा। केवल अच्छे-बुरे का श्वेत-श्याम विभाजन ही नहीं होता, मानव स्वभाव के कई रंग और छटायें होती है। उन्हीं के अनुसार शब्दों के अर्थ होते है। पर गत कुछ वर्षों में हमने शब्दों को भी गुटों में बाँट दिया है। साम्प्रदायिकता का अर्थ था सम्प्रदाय को मानने वाला। यह अत्यन्त सकारात्मक बात थी सम्प्रदाय आपकी आध्यात्मिक साधना को अनुशासित करने का कार्य करते है और सम्प्रदाय का अंग होने के नाते उसके प्रति आपकी निष्ठा अपने आप में एक दायित्व भी होती है। साम्प्रदायिक साधक, गुरू, उपासना और स्थान का भारत में बड़ा सम्मान था। किन्तु पिछले कुछ वर्षों में हमने इस शब्द का अर्थ ही बदल दिया। ऐसी ही स्थिति कर्मकाण्ड की है। साधना में नित्य कर्म का बड़ा ही महत्व है। मन को संस्कारित करने के लिये नियमित रूप से तय कर्म करना अत्यावश्यक होता है। इसी नियमबद्ध उपासना का नाम कर्मकाण्ड है। इसी के द्वारा कठीन समय में साधक की रक्षा होती है। हमारे इतिहास में भी आक्रांताओं के अत्याचारों में जब धर्म का प्रगट पालन भी सम्भव नहीं था तब ज्ञान काण्ड की चर्चा करना तो सोच भी नहीं सकते थे। ऐसे में कर्मकाण्ड ने ही धर्म की रक्षा की। पर गत एक शताब्दी से इस शब्द को हिन्दू धर्म के विकार के रूप में ही प्रयोग किया जाता है और सारी अन्धश्रद्धाओं का पर्यायवाची। बिना अर्थ अथवा पीछे के विज्ञान को जाने केवल कर्मकाण्ड करना सराहनीय निश्चित नहीं है। किन्तु ज्ञान व कर्म दोनों ही ना करने से कुछ एक करना तो अच्छा ही है ना? और जानकर करेंगे तो फिर यह कर्म काण्ड तारक बन जायेगा।
कर्मयोग में कर्म के पीछे के हेतु का बड़ा महत्व होता है। सामान्य जीवन में भी कर्म का महत्व उसके उद्देश्य से ही तय होता है। बड़ा सरल उदाहरण है। एक ही क्रिया – बन्दुक उठाई, निशाना लगाया, घोड़ा दबाया। अगले व्यक्ति के छाति में गोली लगी, तुरन्त प्राण निकल गये। इसी कार्य के लिये एक व्यक्ति को फांसी की सजा दी जाती है तो दूसरे को इसी कार्य के लिये परमवीर चक्र प्रदान किया जाता है। शारीरिक क्रिया भले एक ही हो कर्म अलग अलग था क्योंकि भाव अलग अलग थे। बिना मन के केवल इन्द्रियों से ही तो कर्म नहीं होता। इसी बात को भगवान कृष्ण बड़ी दृढ़ता से बताते है।
तीसरे अध्याय का प्रारम्भ अर्जुन के प्रश्न से हुआ है।
ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव।। गी 3.1।।
जब एक ओर आप बता रहे है कि बुद्धि कर्म से अधिक श्रेष्ठ है तो फिर मुझे क्यों इस घोर कर्म में ढ़केल रहे हो? आगे यहाँ तक भी कह देता हे कि ऐसे मिश्रित वचनों से मुझे भ्रमित क्यों कर रहे हो? इस प्रश्न के उत्तर में भगवान कृष्ण ने कर्मयोग का विवरण प्रारम्भ किया है। निष्क्रियता जीवन का लक्ष्य नहीं हो सकती। ऐसा सम्भव भी नही है, कर्म तो करना ही होगा। केवल कर्मेन्द्रियों का नियन्त्रण कर उनको बन्द कर देने से कर्म नहीं बन्द हो जाता क्योंकि मन तो सोचता ही रहता है ओर सोचना भी तो कर्म है।
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन।
इन्द्रियार्थान् विमूढ़ात्मा मिथ्याचारः स उच्चते।। गी 3.6।।
इसको भगवान् श्रीकृष्ण ने मिथ्याचार कहा है। यह पाखण्ड से घातक है। पाखण्ड दूसरे के प्रति असत्य आचरण है। मिथ्याचार तो स्वयं को ही धोखा देने का प्रयास है। यह तो व्यक्तित्व को ही विभाजित कर देगा। सामान्यतः इन्द्रियों को नियन्त्रित करना कठीन बताया जाता है। पर यहाँ ऐसी स्थिति का वर्णन है जहाँ उपर से कर्मेन्द्रियों को तो रोक लिया है कर्म करने से किन्तु मन के स्तर पर कर्म जारी है। इस मिथ्याचार से बचने के लिये एक उपाय तो हमने देखा है। स्वयं को पूर्ण व्यस्त रखना। अपनी मर्जी से काम करना।
यहाँ मन के संस्कार की बात हो रही है। मन को संस्कारित करना कर्म से भागकर सम्भव नहीं है। अर्जुन इसी भागने की बात कर रहा है और भगवान लड़ने की। दूसरे अध्याय में बताया है – इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः।। गी 2.60।। इन्द्रियाँ बलवान् होती है व मन का भी बलपूर्वक अपहरण करने की क्षमता रखती है। जब इन्द्रियों में मन को खीचने की शक्ति है तब उसी का प्रयोग मन को उपर की ओर ले जाने के लिये क्यों ना किया जाये? पतंग और डोर के समान ये सम्बन्ध है। सामान्यतः पतंग का नियन्त्रण डोर के द्वारा किया जाता है पर हवा का जोर होने पर, यदि पतंग संतुलित हो, तो वह डोर को खींच सकती है। भगवान कह रहे है – तानि सवार्णि संयम्य युक्त आसीत मत्परः।।गी 2.61।। इन इन्द्रियों को संयमित कर मुझमे लगा दो। अब ये करे कैसे?
बड़ा ही सरल सा मार्ग हमारे महापुरुषों ने बताया। जब श्री रामकृष्ण परमहंस को पूछा कि ये काम क्रोधादि रिपुओं, शत्रुओं से कैसे लड़ा जाये। व्यावहारिक एवं सहज उपाय बताने के आदी ठाकुर ने कहा, ‘‘सब विकारों को ईश्वरार्पित कर दो। क्रोध करना है उनपर करों। लोभ, प्रेम, स्नेह करना है उनसे करों।’’ हमने अपनी संस्कृति में यह कर दिखाया। केवल कहा ही नहीं इशवास्यं इदं सर्वं। पर सब विकारों को इश्वरोन्मुखी कर उदात्त कर दिया। बलि के पीछे भी यही तत्व है। मांसाहार करना है तो देवता को अर्पित कर प्रसाद के रुप में ग्रहण करों। बलि प्रथा को अमानवीय कहकर उसका विरोध करने वाले लोग पंचसितारा होटेलों में भोग के लिये कटते लाखों प्राधियों के प्रति दया क्यों नहीं दिखाते। कुछ भैरों मंदिरों में और जनजातीय  परम्पराओं में शराब को भी प्रसाद के रुप में अर्पित कर फिर प्राशन किया जाता है। भोग और उन्माद के लिये सोमपान कर समाज में बलवा करने से तो ये भला ही है। खजुराहों के मंदिरों के शिल्प भी इसी सिद्धान्त का उदाहरण है। काम को इश्वराभिमुख कर उसका उदात्तीकरण।
इन्द्रियों की प्रचण्ड कर्षण शक्ति का सदुपयोग करने के लिये हमें उनको उदात्त आदते डालनी होगी। उदात्त का अर्थ है उंचे ध्येय की ओर। ऐसे शब्दों से ही कभी कभी डर लगता है। पर यदि अपने जीवन को अपने सामने पवित्र रखना है, मिथ्याचार के अपराध बोध से बचना है तो इन्द्रियों को नित्य कर्म में बांध दो। उन्हें कुछ अच्छे कामों की आदत डाल दो। इसे ही कर्मकाण्ड कहते है। इससे कर्म का भाव शुद्ध हो जायेगा। एक बार संकल्प लेते समय उदात्त ध्येय का ध्यान करने से प्रतिदिन कर्म में वहीं भाव अनायास, अवचेतन के स्तर पर कार्य करने लगेगा। यही इन्द्रियों के माध्यम से मन को सही मार्ग पर रखने की सरलतम विधि है। जितना लगता है उतना यह उदात्तीकरण कठीन नहीं है। बड़ा ही सरल है। कई काम हम प्रतिदिन करते ही है। पर संकल्प के साथ नहीं करते। बस इतना ही करना है, संकल्प करना है। संकल्प भाव की शुद्धि करेगा और आदतन कर्म के समय मन को उदात्त करेगा।
तो आज ही तय कर लो क्या क्या प्रतिदिन करेंगे। छोटी छोटी बातें ही बड़ा परिणाम देती है। जैसे प्रतिदिन हनुमान चालिसा का पाठ, 50 सूर्यनमस्कार, कुछ व्यायाम, प्राणायाम, जप। यहाँ तक की नियमित स्नान करना भी एक आदत हो सकती है। कमसे कम पाँच – छः आदते नित्य संकल्प के रूप में ले ही लेनी चाहिये। 2 शरीर के स्तर पर जैसे व्यायाम, स्नान आदि। कम से कम दो भाव के स्तर पर जैसे जप, स्तोत्र पाठ आदि और कम से कम दो बौद्धिक स्तर पर जैसे स्वाध्याय, लेखन, श्रवण आदि। हाँ! बिना चुके, बिना एक दिन भी खण्ड पड़े करना है। फिर देखो मन कैसे उदात्त गगन में विचरण करने लगता है। आपको ही आश्चर्य होगा कि कितना पवित्र, हलका और उर्जावान अनुभव कर रहे हैं।

अक्टूबर 9, 2011 Posted by | योग | , , , , , | 12 टिप्पणियाँ

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