उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

आक्रोश का लक्ष्य शत्रु हो, अपनी सरकार नहीं


वर्तमान समय में भारत में होनेवाली घटनाओं पर केवल प्रसार माध्यमों में ही नहीं, सामाजिक माध्यमों (Social Media) में भी बहुत अधिक आक्रोश और क्रोध का भाव उत्पन्न किया जाता है लोगों को अपने भावों को व्यक्त करने के लिए एक माध्यम मिल गया सुकमा में CRPF के २६ जवानों का बलिदान निश्चित रूप से पूरे देश को विचलित कर गया।पाकिस्तान द्वारा भारत के सैनिकों की शिरछेद कर निर्मम हत्या किया जाना भी सारे देश को पूरी तरह से आहत कर गया। इन दोनों दुखद घटनाओं की प्रतिक्रिया में प्रसार माध्यमों ने भी बड़े प्रमाण में विद्रोह का वातावरण उत्पन्न किया पाकिस्तान से युद्ध करो’, ‘बर्बाद कर दो’, ‘तबाह कर दो’, ‘प्रतिशोध ले लोइस प्रकार के कार्यक्रम इलेक्ट्रोनिक माध्यमों में भी दिखाई देने लगे। समाचार पत्रों में लोगों ने अनेक प्रकार के लेख भी लिखे। अनेक देशभक्त लोग भी सोशल मिडिया में facebook, whatsapp आदि पर इन घटनाओं पर बोलते समय अपनी ही सरकार के विरुद्ध बोलने लगे सरकार क्या चूड़ियाँ पहनकर बैठी है ?’, ‘कहाँ गयी ५६ इंच की छाती ?’  इस प्रकार के सन्देश चारों ओर दिखाई देने लगे इन बातों पर थोड़ा गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है

          निश्चित रूप से देश में ऐसी कोई घटना होती है तो सबके मन में दुःख, कष्ट उत्पन्न होना स्वाभाविक है किन्तु उसका जब हम प्रगटीकरण करते हैं, अभिव्यक्ति करते हैं तब हमको यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि हम कही देश को तोड़नेवाली शक्तियों को तो अधिक बल नहीं दे रहे नक्सलवादियों का उद्देश्य ही यह है कि समाजमन में सरकार के विरुद्ध असंतोष भड़के ३०० लोगों ने १५० लोगों को घेरकर २६ जवानों को घात लगाकर मारा।  इस कायरतापूर्ण हिंसा का विरोध करने के स्थान परसरकार क्या कर रही है ?’, ‘राजनाथ सिंह जी को इस्तीफा देना चाहिए’, ‘CRPF का कोई प्रमुख ही नहीं हैइन बातों के ऊपर मिडिया विमर्श को ले जाना यही तो नक्सलवादी चाहते हैं तो हम कही ना कही देशभक्ति के नाम पर अपने देश के विरुद्ध तो बातें नहीं कर रहे ? पाकिस्तान ने सैनिकों को भारत में आकर बड़ी विद्रूपता के साथ, बड़ी क्रूरता के साथ, बर्बरता के साथ हुतात्मा किया लेकिन उसी के प्रतिशोध में तुरंत एक घंटे के अन्दर भारतीय सेना ने पाकिस्तान की सीमा में घुसकर चौकियां उड़ा दी और पाकिस्तान के सैनिकों को मार गिराया के बदले , के बदले इस प्रकार की कार्यवाही सेना ने की प्रसार माध्यमों ने पहली घटना को तो बड़े जोरशोर से प्रसारित किया लेकिन दूसरी घटना को ज्यादा प्रसारित नहीं किया इसलिए समाज में भाव निकला किसेना क्या कर रही है ?’  वास्तविकता में पहली बार सेना को खुली छूट दी गयी है कि वो प्रतिशोध लें लोगों ने सामाजिक मिडिया और प्रसार माध्यमों में यहाँ तक प्रतिक्रिया दी किफुल टाइम हमारे पास में डिफेंस मिनिस्टर नहीं है पर्रीकर जी के जाने के बाद अरुण जेटली जैसे व्यस्त जो वित्त मंत्री पहले से है, ऐसे मंत्री को ही अधिभार दिया गया है इस बात पर भी लोग गए किसी ने जब मुझसे यह कहा तब मैंने उन्हें मजाक में कहा किअच्छा है जो रक्षा मंत्री नहीं है, इसलिए सेना ने स्वतः निर्णय लेकर प्रतिशोध ले लिया रक्षा मंत्री होते तो उनसे अनुमति लेने में समय चला जाता

           ये केवल आज की ही बात नहीं है २६/११ के समय जब दिनों तक पाकिस्तान के क्रूरकर्मा आतंकवादियों ने मुंबई को स्तब्ध कर दिया था पूरा देश टीवी पर चिपटा हुआ उस तमाशा देख रहा था। हमारे सैनिक और कमांडोज ने वीरतापूर्वक कार्यवाही करते हुए अपने नागरिकों को कम से कम नुकसान पहुंचाने का लक्ष्य रखते हुए सारे आतंकवादियों को मार गिराया कसाब को जीवित पकड़ा जिसके कारण पाकिस्तान का सारा षडयंत्र खुलकर सामने आया किन्तु उसके तुरंत बाद गेट वे अव इंडिया पर मुंबई में जो कैंडल मार्च निकला वह सरकार के विरुद्ध था, आतंकी पड़ौसी के विरुद्ध नहीं। तो हम कही ना कही अपने जोश में देशभक्ति के नाम पर अपने देश के विरोध में तो काम नहीं कर रहे ? पाकिस्तान तो यही चाहता है कि भारत की सरकार के विरुद्ध हम बोले मैंने यह दूसरा उदाहरण इसलिए दिया क्योंकि सरकार नरेन्द्र मोदी की है या मनमोहन सिंह की है इससे फरक नहीं पड़ता, कांग्रेस की है या बीजेपी की है इससे फरक नहीं पड़ता। सरकार किसी राजनितिक दल की नहीं होती सरकार तो देश की सरकार होती है। हमारी अपनी सरकार होती है। इसलिए हमारी प्रतिक्रिया संयत और संयमित होनी चाहिए

           वर्तमान समय में राजनीति इतनी अधिक प्रतिस्पर्धी और कटुता भरी हो गयी है कि विपक्षी दल सरकार को प्रधानमंत्री को घेरने के लिए ऐसी संवेदनशील घटनाओं को भी अवसर बनाते है राष्ट्रहित का विचार बिना किए अनेक प्रकार की असत्य अथवा अतिशयोक्त बातें फैलाते है कुछ दलों ने तो ऐसे कामों के लिए विशेष मंत्रणा कक्ष (War Rooms) बना रखे है इनका कार्य ही प्रसार माध्यमों तथा सामाजिक माध्यमों पर भ्रामक सामग्री फैलाना होता है अभी इंदिरा गांधी के काल्पनिक वीरतापूर्ण कार्यों की असत्य अथवा अर्धसत्य सूची देकर वर्तमान सरकार के स्वच्छता अभियान, जनधन, नोट बंदी आदि महत्वपूर्ण पहल की भद्दी मज़ाक़ उड़ाने वाला एक संदेश प्रसारित हो रहा है कपट ये कि संदेश किसी मोदी समर्थक द्वारा लिखा हो इस प्रकार बनाया गया है अनेक सहज देशभक्त इस चाल को समझ नहीं पाते और इस सरकार विरोधी संदेश को अपनी आहत भावना की अभिव्यक्ति समझ आगे बढ़ा देते है अनेक अलगाववादी संगठन भी इन कामों में लिप्त हैं देश के प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थानों में छिपें बौद्धिक नक्षलवादी इस कार्य में प्रवीण है ईसाई मिशनरी भी ऐसी देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त रहे है ऐसे प्रमाण है विदेशी ताकते इन जयचंदों का उपयोग भारत में असंतोष भड़काने में करती है अनेक ग़ैर सरकारी संस्थाएँ  NGO भी इन कार्यों में लिप्त पायी गयी है २६ वीर CRPF जवानों को कायरतापूर्वक मारने की घटना का समर्थन करने के लिए सुरक्षा बलों द्वारा बलात्कार की काल्पनिक कहानी गढ़ी गयी और सामाजिक माध्यमों पर फैलायी गयी सुरक्षा बलों द्वारा दिया खंडन सब जगह नहीं पहुँच पाया हम में से भी अनेक लोग इस प्रामाणिकता का पालन नहीं करते है कि यदि हमने ग़लती से असत्य वा भ्रामक संदेश अग्रेषित (Forward) किया है और बाद में उसका खंडन हमें मिल गया तो उसे भी उन सभी तक प्रसारित करें जिन्हें हमने ग़लत सूचना दी थी परिणामतः खंडन अप्रभावित ही रह जाता है

           इसमें एक और विचारणीय बिंदु है। आज सारे विश्व में जो खुफियातंत्र, गुप्तचर विभाग काम करते हैं उनका एक बहुत बड़ा काम मानसिक युद्ध का है। इस मानसिक युद्ध में प्रसार माध्यमों पर नियंत्रण एक बहुत बड़ी लड़ाई है दुसरे देशों के प्रसार माध्यमों में विज्ञापनों के द्वारा, पैसा देकर, पत्रकारों को खरीदकर देशविरोधी असंतोष का माहौल उत्पन्न किया गया तो इसका लाभ शत्रु देश को मिलता है। यह काम रशिया (USSR) जब अमीर था तब KGB करता रहा, CIA बहुत वर्षों तक करता रहा। अभी २००८ से अमेरिका की आर्थिक स्थिति विकट हो गयी इसलिए CIA का पैसा कम हो गया। किन्तु आज बड़े पैमाने में भारत में चीन और पाकिस्तान की गुप्तचर एजेंसियां यह काम करती हैं। ये गुप्तचर संस्थाएं भारत में प्रसार माध्यमों के माध्यम से इस प्रकार के सरकार विरोधी सन्देश फैलाने का काम करती हैं। अब पिछले कुछ दिनों से उन्होंने सामाजिक माध्यमों (facebook, whatsapp आदि) को भी अपना हथियार बनाया है। इनके द्वारा बड़ीबड़ी कंपनियों के सामग्री बनाने (content generation) दल बनाए गए है ये दल इस प्रकार की सामग्री तैयार करते हैं और कई बार सच को झूठा, विकृत करते हैं सरकार के विरुद्ध असंतोष बनाने वाली सामग्री को फैलाते हैं इनको कश्मीर में हो रही पत्थरबाजी, JNU में हुई घटनाएं ऐसी बातों से आधार मिल जाता है और फिर ऐसा समाचार तुरंत फैलता है   अपने आप को देशभक्त समझनेवाले भी इस बात को फैलाते हैं।पाकिस्तान को मिटा दो’, ‘full fledge war कर दो अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की जिन्हें समझ नहीं है उन्हें यह समझ नहीं आएगा कि इससे चीन का क्या हित साध्य होता है?  चीन इस प्रकार की बातें फैलाकर भारत की जनता को सरकार के विरुद्ध यदि भड़कायेगा तो जो परिस्थितियां बनेगी उसका लाभ चीन पाकिस्तान में उठा सकता है,  अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उठा सकता है। इसलिए बहुत सतर्कता से सोशल मिडिया का  प्रयोग करने की आवश्यकता है

           एक और भावनात्मक बिंदु भी है। क्या यह देश वीरता को भूल गया ?  भारत माँ को एक विशेषणवीर प्रसविणी  बताया जाता है। और, वीरता की सत्य परीक्षा तो मृत्यु के सामने होती है। निश्चित रूप से हमारे सैनिकों की मृत्यु दुखद है। उनके प्रति हमारे मन में श्रद्धा होनी चाहिए और अपने श्रद्धासुमन और श्रद्धांजलि निश्चित रूप से उन्हें अर्पित करने चाहिए। किन्तु मृत्यु से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है मृत्यु से भयभीत होकर यदि हम उस मृत्यु का वर्णन करते हैं तो उनके हुतात्म्य का, उन्होंने किये हुए बलिदान का अपमान करते हैं। हमारे २६ सैनिक शहीद हुए तो हमारी श्रद्धांजलि भी वीरतापूर्ण होनी चाहिए और वीरतापूर्ण श्रद्धांजलि आक्रोश से नहीं होती। वीरता संयम में दिखाई देती है। इसलिए वह संयम केवल सरकार को ही नहीं, समाज को भी रखना है। सरकार को तो मानना पड़ेगा कि सरकार ने बहुत ही संयम के साथ इन सारी बातों का सामना किया है। पत्थरबाजों के ऊपर पेलेट गन का उपयोग भले ही किया हो, लेकिन कही पर भी गलती से भी गोली नहीं चलायी। अगर कोई एक मर जाता तो तुरंत उसे विक्टिम प्रस्तुत कर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बवाल मचाने का अवसर मिल जाता। इसलिए सरकार ने तो संयम रखना ही होता है।

अफझल खान के आक्रमण के समय छत्रपति शिवाजी महाराज ने अद्भुत संयम दिखाया था प्रताप गढ़ के घने जंगल में उसे घेरने की योजना की अफझल ने बहुत उकसाने का प्रयत्न किया यहाँ तक कि महाराज की कलदेवी तुलजा भवानी का मंदिर भी तोड़ दिया पर महाराज डिगे नहीं प्रतीक्षा करते रहे सही समय और अवसर की समय आने पर अफझल की बलि माता को देने के बाद सब भग्न मंदिरों का जीर्णोद्धार किया ये तो अच्छा ही था कि उन दिनों २४ घंटे बकबक करने वाले ख़बरिया चैनल भी नहीं थे और घर बैठे रणनीति बखारने हेतु सामाजिक माध्यम भी नहीं थे आज भी हमें हमारी सेना पर विश्वास रखने की आवश्यकता है जैसे शिवाजी महाराज ने अपने समय पर अपने द्वारा तय स्थान पर कार्यवाही की वही बात तो हमारे सेनानायक ने कही, ” मुँहतोड़ जवाब देंगे पर समय भी हम तय करेंगे और स्थान भी

          आज सोशल मिडिया के युग में हम जैसे देशभक्तों को भी इन मामलों में संयम रखने की आवश्यकता है। हमको निश्चित रूप से अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करना चाहिए। लेकिन भावनाओं को अभिव्यक्त करते समय हमारे सैनिकों के बलिदान के कारण आक्रमणकारी उन कायरों के विरुद्ध अपना पराक्रम होना चाहिए। नक्सलवादियों के ऊपर हमारा आक्रोश होना चाहिए   नक्सलवाद को दूर से, वैचारिक रूप से, बौद्धिक रूप से संबल प्रदान करनेवाले कम्युनिस्टों को, बाहर देश से उन्हें पैसा देनेवाले ISI और चीन के विरुद्ध हमारा आक्रोश होना चाहिए।  ना कि हमारी सेना, CRPF, रक्षामंत्री, गृहमंत्री, मुख्यमंत्री या हमारे प्रधानमंत्री के विरुद्ध   हमारा आक्रोश शत्रु के विरुद्ध हो, अपनों के विरुद्ध ना हो यह संयम हमको अपने मन में रखना पड़ेगा। पाकिस्तान के विरुद्ध हम बात करें इस कायरता का विरोध और जवाब देने के लिए अपनी सरकार पर दबाव बनाये यह तर्क ठीक है। लेकिन आज इस दबाव की आवश्यकता नहीं है सेना और नेतृत्व की क्षमताओं पर हमको विश्वास रखना चाहिए। इस प्रकार के सामाजिक उद्रेक से दबाव में आकर सरकारें काम नहीं करती हैं और यदि सरकार ऐसी सामाजिक कायरता से, आक्रोश से वशीभूत होकर काम करती है तो हमेशा गलत काम ही होता है   मृत्यु से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि मृत्यु अवश्यम्भावी है। मृत्यु से डरकर, भय में जो निर्णय लिए जाते हैं वे कभी सही नहीं हो सकते। पाकिस्तानी आतंकवादियों ने नेपाल से Air India के विमान का अपहरण किया उसमें बैठे हमारे जो १८० भारतीय नागरिक थे उनके रिश्तेदार सरकार के सामने उनके मृत्यु के भय से नंगा नाच कर रहे थे। सारी मिडिया ने उसे दबाव का तंत्र बनाया।  ये १८० लोग जीवित रहने चाहिए इसलिए सारे देश ने कायरता और नपुंसकता दिखाई। वीरता का परिचय देकर संयम का परिचय नहीं दिया और दुर्भाग्य से उस समय की सरकार भी इनके सामने झुकी। सरकार ने भी संयम नहीं दिखाया और तीन दुर्दांत आतंकवादियों को हमने १८० लोगों की मृत्यु के भय से, उनकी जान बचाने के लिए छोड़ दिया उन तीन में से एक है अजहर मसूद। उस एक की आतंकवादी घटनाओं के कारण ही पिछले १०१२ वर्षों में, १८० को बचाने के लिए तब उसको छोड़ा गया था, और तब से लेकर आज तक १८००० से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं १० गुना से अधिक मृत्यु भारतमाता को झेलनी पड़ी क्योंकि भारत के नागरिकों ने कायरता का परिचय दिया उस समय उन १८० में से केवल ऐसे लोग थे, जिनके रिश्तेदारों ने कैमरा के सामने जाकर कहा किहमारे लोग बलिदान हो जाए तो भी कोई बात नहीं लेकिन सरकार को आतंकवादियों को नहीं छोड़ना चाहिए।  बाकि बचे १७८ लोगों के रिश्तेदार सरकार पर दबाव डाल रहे थे किभले ही आतंकवादी छोड़ दो लेकिन हमारे रिश्तेदार को बचाओ   यह कैसा कायरों का देश हमने बना दिया?  क्या हमारे यहाँ वीरता नहीं ? आज भी जिस प्रकार की प्रतिक्रिया हमारे २६ जवानों के वीरगति पर समाज में की जा रही है वह कायरता की प्रतिक्रिया है, कायरता का आक्रोश है यह पराक्रम का आक्रोश नहीं है। पराक्रम का आक्रोश होता तो हमारे आक्रोश का लक्ष्य वो नक्सलवादी होते हमारे आक्रोश का लक्ष्य उनको पीछे से संबल देनेवाला चीन और पाकिस्तान होता, और उसके पीछे का अर्थतंत्र होता हम अपने अन्दर झाँककर देखते कि मेरे घर के अन्दर आनेवाली किसी चीनी वस्तु से ही तो पैसा नक्सलियों के पास नहीं गया ? उन २६ जवानों को जो गोली मारी गयी थी उन गोलियों के अन्दर जो पैसा लगा था वो पैसा कही मेरे द्वारा खरीदी गयी विदेशी चीजों के कारण तो नहीं था ? यह भी तो स्वयं को पूंछना चाहिए। पराक्रम इसे कहते है सरकार को कोसना पराक्रम नहीं है। प्रसार माध्यमों का तो हम कुछ नहीं कर सकते किन्तु हमारे जैसे सामाजिक माध्यमों पर काम करनेवाले देशभक्तों को ऐसी संवेदनशील स्थितियों में, ऐसी कठिन घड़ी में अपनी बंदूकों को, अपने वाग्बाणों को, अपने पूरे मोर्चे को शत्रु की ओर रखना चाहिए ना कि अपनी सरकार को कमजोर और हतोत्साहित करने के लिए सरकार देश की होती है और उसके ऊपर विश्वास रखना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है अगर विश्वास नहीं है तो साल बाद अवसर मिलेगा तब इनको हटाने का भी आपके पास अधिकार है लेकिन साल के लिए जिस सरकार को हमने चुनकर दिया है उसके उपर विश्वास रखना चाहिए दबाव बनाना चाहते है तो उसके लिए पूरे अध्ययनपूर्ण लेख लिखे जा सकते हैं

          लेकिन भावनाओं का यदि उद्रेक करना है तो वह शत्रु के विरुद्ध ही हो, अपनी सरकार के विरुद्ध ना हो यह अत्यंत आवश्यक बात है

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मई 9, 2017 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , , | टिप्पणी करे

शुभकामना नही शुभसंकल्प


बुरा ना मानो होली है ॰ ॰ ॰

होली के अवसर पर भ्रमण ध्वनि शुभकामना संदेशों से पट गया है। नए साधनों के कारण चित्र, रंग सब इन संदेशों में आ गए है। कई बार तो संदेश मिटाना भी बड़ी समस्या हो जाती है। प्रश्न ये है कि क्या हमने अपने अपने सारे उत्सवों को यंत्रों के समान ही एकरूप तो नहीं बना दिया। हर बात पे केवल हैपी कह देना। हैपी दिवाली कहो या हैपी होली सब एक सा। सारे संदेश एक से। जीवन कभी एकरूप नहीं होता। वैसे ही सारे उत्सव भी एक से नहीं हो सकते हो। हर उत्सव का अपना महत्व है और अपनी पद्धति भी। होली तो मन को साफ़ करने का उत्सव है। केवल घर का कचरा जलना ही नहीं तो अपने मन की सब कुंठाएँ क्रोध सब को ही मन से बाहर करना है। इस हेतु देश के भिन्न भिन्न भागों में अलग अलग प्रकार की परम्पराएँ विकसित हुई है। एक दूसरे को छेड़ना, कष्ट देना और कहना -‘बुरा ना मानो होली है ‘

इसी अवसर पर प्रस्तुत है उत्सवों पर संदेश देने की वैज्ञानिक विधि पर दिवाली के बाद लिखा यह लेख। पूरा होते होते देर हो गयी इसलिए तब प्रस्तुत नहीं किया था अब लीजिए ॰ ॰ ॰

शुभकामना नही शुभसंकल्प

          दिवाली एक तरफ विश्व का सबसे बडा उत्सव बनता जा रहा है। विश्व के अनेक देशों  में बडे़ उत्साह से दीपोत्सव को मनाए जाने की खबरें मिल रही हैं संयुक्त राष्ट्र संघ मुख्यालय पर भी दियों की जगमग से Happy Diwali प्रकाशित किया गया। इंग्लैंड की नूतन प्रधानमंत्री ‘थेरेसा मे’ ने पूरा 3.30 मिनीट का वीडियो संदेश दिवाली की समस्त पौराणिक कथाओं का उल्लेख करते हुए प्रसारित किया। आस्ट्रेलिया व कॅनडा ने अक्टूबर माह को दीपोत्सव माह के रूप में मनाने की घोषणा की। ये सब समाचार भी सामाजिक माध्यम (Social Media) से ही प्राप्त हुए। दूसरी ओर भारत में उत्सवों का स्वरूप बदलता हुआ दिखाई दे रहा है। प्रत्यक्ष मिलना, साथ आना, विभिन्न परंपराओं को निभाना इससे अधिक संदेशों के आदान-प्रदान से ही उत्सव मनाए जा रहे है, ऐसा प्रतीत हुआ। संचार के माध्यम निश्चित रूप से बढ गए है और उनका पूरा उपयोग उत्सवों में किया गया। मोबाईल कंपनियों ने दिवाली और भाईदूज के दिन सारी मुफ्तसेवाओं को बंद रखा। उसके बाद भी Whatsap, Facebook आदि संचार माध्यमों में दिवाली संदेशों  का तांता लगा रहा। ऊपरी तौर पर तो यह बडा आकर्षक और उत्साहवर्धक लगता है किंतु थोडा गंभीरता से सोचने पर हमे उत्सवों के उथले होने का खतरा स्पष्ट दिखाई देगा।

         पहले थोडीसी मीमांसा संदेशों  की कर लेते हैं। यह शोध का विषय होगा कि उत्सवों के अवसर पर एक दूसरे को सदिच्छा संदेश भेजने की परंपरा कहाँ से व कबसे प्रारंभ हुयी। सतही खेज में इतना तो ध्यान में आता है कि इस परंपरा का मूल किसी भारतीय पौराणिक अथवा ऐतिहासिक तथ्य में तो नही मिलता। हमारे यहा सामान्य रूप से भी एक दूसरे के अभिवादन में आध्यात्मिकता का परिचय मिलता है। जय राम जी की, जय श्रीकृष्ण,  राम-राम आदि सीधे ईश्वर वाचक अभिवादनों के साथ ही नमस्ते जैसे सामान्य अभिवादन में भी ‘मै नही तू ही’ का अथवा ‘तेरे अंदर के ईश्वर को प्रणाम’ का आध्यात्मिक संदेश ही छुपा है। ऐसे में उत्सवों के अवसर पर एक दूसरे को दिवाली मुबारक अथवा Happy Diwali कहकर संबोधित करना एक अत्यंत उथली मनः स्थिति का निर्माण तो नहीं कर रहा? मुबारक में तो कम से कम समृद्धी की कामना है किंतु Happines तो मात्र  शारिरीक अथवा भौतिक सुख की कामना है। हिंदी में अथवा अन्य भारतीय भाषाओं में जो पर्याय ढूंढा गया वह इन दोनो से थोडा बेहतर है। ‘शुभ दीपावली’ इस संदेश से शुभ अर्थात कल्याणकारी, धार्मिक भले की बात की है। हमारे यहा लाभ भी शुभ हो अर्थात नैतिकता से कमाया हुआ हो यह मान्यता है। अशुभ आमदनी को लाभ भी नहीं कहा जाता। इन तीनों संदेशों के अर्थ भले ही अलग-अलग हो किंतु एक दूसरे को प्रेषित करने का भाव समान ही है। Happy Diwali कहने वाले को यह ध्यान में नही है कि वह केवल भौतिक सुख की कामना कर रहा है उसी प्रकार मुबारक अथवा शुभ की कामना करने वाले को भी अपने संदेश के अर्थ का ज्ञान होगा ही ऐसा आवश्यक नही है। कुल मिलाकर विषय यह है कि हम एक दूसरे के प्रति अपनी आत्मीयता को इन भिन्न-भिन्न भावों से व्यक्त करना चाह रहे है। दिवाली हमारे लिए आत्मीयता के प्रकटीकरण का अवसर है इसीलिए मन में यह प्रश्न आता है कि संचार माध्यमों के सहज प्रयोग से थोक के भाव में भेजे गए संदेश  क्या उस आत्मीयता को भेजने और पानेवाले के मन में प्रेरित कर पाते है? भेजने वाला क्या अपने ‘मित्र (?) सूची’ (Friend list) के सभी लोगों को एक साथ भेजे संदेशों की बौछार में प्रत्येक भेजने वाले से कैसे जुड सकेगा? आपस में मिलकर साथ में कुछ क्षण बिताकर जो आत्मीयता विस्तारित होती है उसका पर्याय यह यांत्रिक संदेश हो सकते है क्या?       

            भारत में उत्सवों को सामाजिक, सांस्कृतिक के साथ ही आध्यात्मिक दृष्टि से भी महत्व दिया जाता है। इसलिए, उत्सवों को मनाने का तरीका भी उसी प्रकार से होता है। उत्सवों के अवसर पर एकत्रित आकर सर्वशक्तिमान से प्रार्थना करने हेतु पूजा आदि का विधान होता है। दीपावली भी इसी प्रकार महालक्ष्मी की पूजा का उत्सव है। महालक्ष्मी केवल मात्र धन और वैभव की देवता नही है अपिुत समृद्धि के समग्र अधिष्ठान को महालक्ष्मी के रूप में पूजा जाता है।  दीपावली सबके जीवन में नैतिक समृद्धि के साथ ही स्वास्थ्य, सौभाग्य, विद्या आदि सभी वरदायिनी शक्तियों की कृपा हेतु किया जानेवाला अनुष्ठान है। अतः साथ मिलकरके इस प्रकार का आयोजन किया जाए यह अपेक्षित है। बदले हुए आधुनिक परिवेश में भी हर सामूहिक इकाई में दिवाली मिलन मनाने की परंपरा बनी है यह अधिक उचित दिखाई देता है। इस बहाने सब लोग एकत्रित आकर अपनत्व एवं आत्मीयता का अनुभव करते है। यांत्रिक संदेशों के आदान प्रदान से यह भारतीय परंपरा के अधिक निकट है। संदेश भेजने में भी हमारी सांस्कृतिक आध्यात्मिक विरासत का ध्यान यदि रखा जाए तो संदेश कामना के न होकर प्रार्थना के होंगे। कामना, वासना, इच्छा मन को नीचे की ओर ले जाती है। भौतिकता, जडता की ओर इनकी गति होती है अतः  कामना पूर्ति के लिए धर्म का अधिष्ठान आवश्यक माना गया है। नैतिक मार्ग से ही कामना पूर्ती की अपेक्षा की जाती है। जब कामना हावी हो जाती है तो नैतिकता का विलोपन होता है। परंपराओं में भी ऐसे ही क्षरण आता है। दिवाली के दिन विभिन्न प्रकारों से जुआ खेलने की परंपरा इसी नैतिक स्खलन का परिणाम है। महालक्ष्मी के समग्र रूप को भुलाकर केवल भौतिक संपत्ति को ही लक्ष्मी का प्रसाद मानने की भूल के कारण ऐसे अनैतिक मार्गो का महिमामंडन किया जाने लगा।

अतः कामना के स्थान पर मन को ऊध्र्वगामी उदात्त लक्ष्य की ओर अग्रेसर करने के लिए उत्सवों के अवसर पर सामूहिक स्तर पर प्रार्थना एवं व्यक्तिगत स्तर पर संकल्प का आधार लिया जाता है। यांत्रिक संचार माध्यमों से भेजे जानेवाले संदेशों  मे भी यदि प्रार्थना एवं संकल्प की अभिव्यक्ति हो तो वह उत्सव के उद्देश्य के अनुरूप होगा। दिवाली पर संदेश  में महालक्ष्मी की प्रार्थना के द्वारा नैतिक समृद्धि की अभिलाषा प्रकट करना एक दूसरे को व्यक्तिगत शुभकामना का आदान-प्रदान करने से अधिक उचित होगा। संदेश में प्रकाशोत्सव, राम-विजय लक्ष्मी पूजन आदि के अनुरूप शुभ संकल्प का उच्चारण भी भारतीय संस्कृती के लिए अधिक पोषक होगा। हमारे सभी उत्सवों में उदात्त सामूहिक समरसता के संदेश छापे हुए है जिनको संकल्प के रूप में दोहराने से मानव जीवन अधिक सौहार्द्रमय एवं आनंददायी होगा। 

मार्च 13, 2017 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , | 3 टिप्पणियाँ

व्यवहार में एकात्म मानव दर्शन


pandit_deenadayal_upadyaपं. दीनदयाल उपाध्याय की जन्मशती के अवसर पर एकात्म मानव दर्शन को लेकर अनेक गोष्टियों परिचर्चा ये और प्रकाशन हो रहे हैं। सामन्यतः इन सबमे दर्शन एवं सिद्धांतो की ही चर्चा अधिक होती है। थोडा अधिक चिंतन करने वाले व्यक्तियों ने एकात्म मानव दर्शन पर आधारित नीतियों का कैसे निर्माण किया जाए इस पर सुविचारित मंथन कर कुछ मार्गदर्शन नीतियों का आलेख भी किया है। जैसे एकात्म मानव दर्शन पर आधारित अर्थनीति, शिक्षानीति, राजनीति आदि-आदि। इसके आगे भी और अधिक व्यवहारिक धरातल पर एकात्म मानव दर्शन का प्रयोग किया जा सकता है। वास्तव में एकात्म मानव दर्शन का सही उद्देश्य है। अपने परिवार को, व्यापार को, संस्थान को विद्यालय, महाविद्यालय आदि को कल कारखानों, बैक आदि से लेकर सरकार तक सभी स्तरों पर एकात्म मानव दर्शन का व्यवहारिक प्रयोग संभव है। इस दृष्टि में कुछ बिन्दु नीचे सूची बद्ध करने का प्रयत्न किया है। यह सूची ना तो पूर्ण है, न ही सटीक। परिवर्तन, रूपांतरण एवं सूची में और बिन्दु जोडने की पूर्ण संभवना है।

1. आत्मीयता से एकात्मता (Integrated approach through empathy) – akmहर सामूहिक इकाई फिर चाहे वह परिवार हो या कार्य चमू (Working Team) जैसे विद्यालय के सभी अध्यापक एक एकात्म ईकाई के रूप में कार्य करें यह उद्देश्य प्राप्ति हेतु अनिवार्य है। यह जैविक एकात्मता आत्मीयता से ही संभव है। एकात्म मानव दर्शन में सब अपने ही है कोई दूसरा है ही नही। आत्मीयता का वातावरण बनाने से कार्य स्थल पर भी एकात्म चमूत्व (Team Spirit) प्रकट होता है।

2. उदात्तध्येय (Noble Mission Statement) – प्रत्येक कार्य का अधिष्ठान कियी उदात्त विचार से प्रेरित होने पर ही सभी को उस आदर्श  की ओर बढने की प्रेरना प्राप्त होती है। गुरूकुल रीती सदा चला आई प्राण जाई पर वचन न जाई – यह परिवार का ध्येय वाक्य बना। अतः व्यवहार उससे संचालित हुआ। व्यापारिक संस्थान हो या शि क्षा संस्थान या षासन सबको अपना ध्येय उदात्त विचारों के आधार पर सुस्पष्ट परिभाषीत करना होगा। सामान्यतः व्यापार का उद्देश्य लाभ कमाना माना जाता है किंतु यथार्थ में जिस वस्तु अथवा सेवा का व्यापार किया जा रहा है उसको सर्वोत्तम गुणवत्ता के स्तर पर न किया जाए तो, वह व्यापार स्थायी रूप से लाभकारी नही हो सकता अतः व्यापारिक संस्थान का उदात्त ध्येय अपने विनिमय में सर्वोच्च गुणवत्ता एवं पारदार्शीता हो सकता है। यह उदाहरण के लिए किया गया सामान्यीकरण है। वास्तव में प्रत्येक पेन्शन  को अपनी विशिष्ट चिती के अनुरूप उदात्त ध्येय स्पष्ट रूप से शब्दबद्ध करना चाहिये।

youth3. सहशासन से सुशासन (Participatory Governance) – परिवार हो या संस्था या सरकार सभी को सुव्यवस्थित ढंग से संचालित किया जाना अपेक्षित है। किसी भी सामूहिक ईकाई में स्वभावतः श्रेणी (Hirerarchy) का निर्माण होता है। ऐसे में प्रशासकीय व्यवस्थाओं का निर्माण भी होना स्वाभाविक ही है। किंतु निर्णय प्रक्रिया में सबका सहभाग सुनिश्चित करने से प्रशासन के स्थान पर सुशासन का निर्माण किया जा सकता है। केवल संस्था अथवा सरकार में कार्यरत अधिकारी, कर्मचारी ही नही अपितु लाभार्थी जैसे व्यापारिक संस्थान के ग्राहक, विद्यालय के छात्र और सरकार के मामले मे तो सभी नागरिक इन्हे भी शासन में सहभागिता का अवसर प्रदान करने से सर्वत्र अपनत्व का निर्माण होता है।  इस हेतु हर स्तर पर सुसंवाद की सरल व्यवस्था का निर्माण किया जाना चाहिये। वर्तमान युग में अनेक प्रकार के संचार माध्यम इस कार्य में उपलब्ध है।

4. अंत्योदय (सबका विकास) Devlopment of all – जब अंतिम व्यक्ति के विकास की बात की जाती है तो उसका अर्थ केवल वंचित विकास की बात नही है हर स्तर पर पंक्ति के प्रत्येक व्यक्ति को सर्वांगीण विकास की आवश्यकता होती है। अतः अंत्योदय का अर्थ सबको विकास के समुचित अवसर प्रदान करने वाले वातावरण और व्यवस्था का निर्माण करना है। यह जिस प्रकार से अपने सभी बच्चों को उनकी आवश्यकता के अनुसार पोषण, रक्षण और ताडन (डाँटना) भी करती है। उसी प्रकार का वातावरण संस्थान, समाज और सरकार में भी निर्माण किया जा सकता है। साथ ही सभी घटक भी याने परिवार के उदाहरण में भाई भी ईकाईयों के विकास में सहयोग, प्रेरणा, मार्गदर्शन जहाँ जो आवश्यक हो प्रदान करते रहें।

5. सतत गुणवत्ता विकास (Continuous Excellence) – किbirdsसी भी व्यक्ति समूह या ईकाई में यदि सतत उन्नयन का प्रयत्न न हो तो स्थिरता और जडता आ जाती है। जीवन का क्रम फिसलन भरी फिसल रही पर उपर चढने का प्रयास है रूकने से ही पतन निश्चित है। अतः अपने संस्थान में, चमू में सतत स्वयं को और अधिक गुणवत्तापूर्ण विकसित सृजनशील एवं नवोन्मेषशाली (Innovative) बनाए रखने का भाव निर्माण करना होता है। एकात्म मानव दर्शन पर आधारित गुणवत्ता वृद्धि में बाह्य परीक्षण अथवा प्रतियोगिता का आश्रय नही लिया जाता। अंदर से ही अपने आपको सतत बेहतर बनाने की प्रेरणा जगानी होती है। इस हेतु हर स्तर पर नवनवीन एवं उच्चतर चुनौतीयों की प्रस्तुत करना यह इसका मार्ग है।

6. सर्वांगीण उन्नती (Over all progress) – एकात्म मानव दर्शन मनुष्य को केवल भौतिक रूप मे नही देखता अपितु शरीर, मन, बुद्धि एवं आत्मा इन चारों आयामों का विचार करता है। केवल व्यक्ति के स्तर पर ही नही प्रत्येक सामूहिक ईकाई में भी इन चारों के प्रगटन की बात एकात्म मानव दर्शन में की है। इसे व्यवहार में लाने के लिए उन्नती के पैमाने तय करते समय केवल भौतिक आधार पर मूल्यांकन करने के स्थान पर भावनात्मक वातावरण, चुनौतियों का सामना करने की संकल्प षक्ति एवं आत्मीय एकात्मता का मुल्यांकन भी किया जाए। किसी संस्था में अथवा शासन में जो विभाग है, उस विभाग की चमू का मुल्यांकन करते समय सर्वांगीण विकास पर बल देना प्रारंभ करेंगे तो अपने आप ही सारी बाते व्यवस्थित हो जायेगी।

7. योगदान का भाव (Sense of Contribution) – व्यष्टि और समष्टी संबंध एकात्म मानव दर्शन का एक प्रमुख सिद्धांत है। व्यष्टि अर्थात छोटी ईकाई और समष्टी अर्थात बड़ी इकाई जैसे परिवार समष्टी है तो व्यक्ति व्यष्टि है। किंतु समाज समाज समष्टी है तो परिवार व्यष्टि है। इसी प्रकार किसी भी संस्था में पुरी संस्था यही समष्टी है तो उसमें कार्यरत विभिन्न विभाग व्यष्टि है। उन विभागों में जो छोटी छोटी चमूएं है वो उस विभाग की भी व्यष्टि हुई। हर स्तर पर छोटी इकाई और बड़ी इकाई के मध्य संबंध होना पुरे संस्था के और अंन्ततोगत्वा पुरे राष्ट्र के ध्येय के लिए अत्यंत आवष्यक है। व्यक्ति से लेकर सरकार तक सभी एक ध्येय की ओर अग्रसर हो इस हेतु प्रत्येक स्तर पर हर इकाई में योगदान का भाव Sence of Contribution आना आवश्यक है। जैसे व्यक्ति की उन्नती परिवार में योगदान करने से होगी। किसी संस्था में प्रत्येक कार्यकर्ता का अपनी चमू में योगदान, फिर उस विभाग का पूरे संस्थान में योगदान और राष्ट्र का समुची मानवता के अर्थात राष्ट्रों के परिवार के उन्नयन में योगदान इस प्रकार क्रमशः प्रत्येक व्यष्टि का अपने से अगली समष्टी में योगदान का भाव जागृत रहे तो स्वतः ही पुरे समाज का एकात्म एवं समग्र विकास संभव होता है यही सर्वे भवन्तु सुखिना का आदर्श  है।

8. मौलिकता का प्रोत्साहन Promoting Originality  चिति की संकल्पना इस एकात्म मानव दर्शन की एक विशिष्टता है। प्रत्येक व्यक्ती और प्रत्येक इकाई की अपनी विशिष्ट अनुभूति होती है। इसे उसकी चिति कहते है। इस चिति अनुरूप ही वह इकाई सर्वोत्तम कार्य करती है। नैसर्गिक इकाई में चिति अपने आप प्रकट होती है। मानव निर्मीत कृत्रिम इकाईयों में अर्थात चमू, सरकार के विभाग कोई, व्यापारिक अथवा शिक्षा संस्थान इनमे चिति का निर्माण ध्यानपूर्वक करना होता है। प्रत्येक व्यष्टि अपनी विशिष्ट चिति के अनुरूप ही समष्टी में योगदान देती है। अतः एक दूसरे को परिपूरक विशिष्टताओं का निर्माण करते हुए, उन्हे प्रोत्साहन देते हुए कार्य करने से एकात्म रूप से विकास संभव है। इस हेतु प्रत्येक को मौलिक रूप से कार्य करने का अवसर प्रदान करना होगा। पूर्व के अनुसार नकल करने से त्रुटी होने की संभावना कम होती है। अतः प्रशासन में कई बार नवीनता को और सृजन को हतोत्साहित किया जाता है। कोई पत्र भी लिखना है, तो ‘पुराना देख के लिख दो’ इस प्रकार का भाव होता है। मौलिकता समाप्त होने से यांत्रिकता आ जाती है। अतः चिती के विकास के लिए मौलिकता से पद्धतीयों का (Processes) का निर्माण किया जाना आवश्यक है। उदा. के लिए Indian Coffee House यह भी अपने आप में किसी और रेस्टरों के समान ही एक उपहार गृह है जहाँ भोजन और नास्ते की व्यवस्था है, किंतु उन्होने अपनी मौलिक विशेषता के आधार पर एक पद्धती का निर्माण किया है। पूरे देश में कही पर भी आप ICH में जायेंगे तो वह मौलिकता और विशेषता आपको स्पष्ट दिखाई देगी। उसी प्रकार सरस्वती विद्यामंदीरों में अपने आप एक मौलिक विषेषता की अभिव्यक्ती हम देखते है। ऐसा होते हुए भी किसी विशिष्ट विद्यामंदीरों में वहाँ के प्रधानाचार्य और अन्य आर्चायों की चिति का प्रगठन भी विशिष्टता से दिखाई देता है। अतः समष्टी के रूप में सरस्वती विद्यामंदिरों की चिति होते हुए भी उसके अंतर्गत प्रधानाचायों, विद्यामंदिरों और आचार्य को अपने चिति के अनुसार मौलिक कार्य करने का स्वातंत्र्य और प्रोत्साहन मिलता रहता है।

bharatmata9. विराट राष्ट्र की कार्यशक्ती (Comprehensive National Strength)राष्ट्र यह नैसर्गिक रूप से सबसे बडी व्यष्टि है। मानवता को राष्ट्रों के परिवार के रूप यदि हम देखें तो इस राष्ट्र परिवारों की समष्टी की राष्ट्र यह व्यष्टि है। प्रत्येक राष्ट्र अपनी चिती के अनुसार इस विश्व परिवार में अपना योगदान देता है। वही उस राष्ट्र की कार्यशक्ती है। एकात्म मानव दर्शन के प्रेरणा स्त्रोत दैशिक शास्त्र में इसे ‘विराट’ कहा है। राष्ट्र की समस्त इकाईया केन्द्र सरकार, राज्य सरकार, उसके विभिन्न विभाग यहाँ तक की निजि संस्थान फिर व शिक्षा के हो, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय हो व्यापारिक संस्थान हो, उद्योग हो, क्रीडा क्षेत्र के विभिन्न संघ हो, कला के क्षेत्र में काम करने वाले कलाकारों से लेकर विभिन्न उत्पादक संस्थाये हो, प्रोडक्षन हाऊस हो। ये सभी मिलकर राष्ट्र की विराट कार्यशक्ती निर्माण करते है, आधुनिक भाषा में इसे Comprehensive National Strength इसमें Soft Power और Hard Power मृदुशक्ती और स्थूलशक्ती दोनो का योगदान है। कला, संस्कृती, परंपराएँ यह सब मृदुशक्ती का अंग है। सैन्यशक्ती, उद्योग, आर्थिक, सामथ्र्य ये सारे स्थूलशक्ती है। (हार्ड पावर) में आते है। प्रत्येक संस्थान अपने-अपने क्षमता अद्वितीयता और कार्य के अनुसार इस विराट को योगदान देता है, सिचिंत करता है। जैसे शरीर के भिन्न-भिन्न अंग शरीर की शक्ति का हिस्सा होते है। उसी प्रकार राष्ट्र में चलने वाली प्रत्येक गतिविधी अंततोगत्वा उस राष्ट्र की शक्ती अथवा कमजोरी (दुर्बलता) का कारण बनती है। यदि इसका भान प्रत्येक इकाई को हो तो राष्ट्र हित में राष्ट्रीय ध्येय की पूर्ती में योगदान करते हुए प्रत्येक व्यक्ती और संस्थान का स्वयं का भी पूर्ण विकास संभव होता है।

जनवरी 25, 2017 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , | 1 टिप्पणी

धर्मानुसारी शिक्षा की स्थापना में शिक्षकों की भूमिका


Ruprekhaमानव की पहचान संबंधों से है | बिना संबंधों के मनुष्य का कोई परिचय ही नहीं है | समस्त सृष्टि के अन्तर्निहित एकत्व का सुप्त ज्ञान मानव मन को अनंत विस्तार हेतु प्रेरित करता है | प्रकटतः भले ही हम स्वयं को सबसे अलग मानते है फिर भी अंतर्मन में इस बात का भान सदैव रहता है कि हम उस एक ईश्वरीय चेतना के अंग है | इस अनुभूति के कारण ही मनुष्य सदैव अपनी चेतना का विस्तार करने का प्रयत्न करता है | इसीलिए मानव को सामाजिक प्राणी भी कहते है | यह सामाजिकता मनुष्यता का महत्वपूर्ण अंग है किंतु सृष्टि के सम्बन्ध केवल मानव समाज तक ही सीमित नहीं है | इसके तंतु सर्वव्यापी है | मानव का मानव से, मानव का समाज से, मानव का अन्य प्राणियों से, सृष्टि से, समूचे ब्रम्हांड से तथा अंततोगत्वा परमात्मा से जो सम्बन्ध है, उन संबंधों के निर्वहन को धर्म कहते है | इस पूरे अस्तित्व को जिन अन्तर्निहित नियमों द्वारा धारण किया गया है उसी को धर्म कहते है | यही धर्म व्यवहार में भी अपेक्षित है | धर्मानुसारी शिक्षा का अर्थ है प्रत्येक को इस धर्म की अनुभूती कराना तथा उसपर आधारित व्यवहार का प्रशिक्षण प्रदान करना |

वर्तमान समय में धर्मसंकल्पना का अर्थ स्पष्ट न होने के कारण पूरी शिक्षा ही धर्मविहीन हो गयी है| उपासना के रूप में धर्म का सीमित अर्थ प्रचलित होने के कारण उसे भेद का मूल मान लिया | परिणामतः धर्मनिरपेक्षता के नाम पर धर्म के समग्र रूप को ही व्यवहार से बाहर कर दिया | धर्मानुसारी शिक्षा तो क्या, शिक्षा में धर्म के अंतर्भाव की भी कल्पना वर्तमान वातावरण में नहीं कर सकते | ऐसी स्थिति में से धर्मानुसारी शिक्षा के आदर्श तक पहुँचने हेतु जिन महत्प्रयासों की आवश्यकता है उनमें शिक्षकों की भूमिका सर्वोपरि है | शिक्षक ही शिक्षा की धुरी है | चाहे जैसी भी व्यवस्था हो, शिक्षक के बिना शिक्षा की कल्पना ही नहीं कर सकते | व्यवस्था चाहे जितने भी निर्बंध लगा ले, कक्षाकक्ष में पढ़ाते समय विधि एवं व्यवहार की स्वतंत्रता को कोई छीन नहीं सकता | शिक्षक यदि अपने इस स्वातंत्र्य का समुचित उपयोग करे तो शिक्षा व्यवस्था के पुनरुत्थान में चमत्कार संभव है | वैसे भी धर्म आचरण से ही संभव है और आचरण का प्रशिक्षण किसी पाठ्यक्रम की अपेक्षा व्यावहारिकता से अधिक दिया जा सकता है | अतः यदि शिक्षक अपनी भूमिका का धर्म के अनुसार निर्वहन करने लगे तो वर्तमान व्यवस्था में भी धर्मानुसारी शिक्षा प्रदान करना संभव है | २ से ३ प्रतिशत शिक्षकों के दृष्टिकोण में सम्यक परिवर्तन आ जाये तो व्यवस्था परिवर्तन भी प्रारंभ हो जायेगा | व्यवस्था परिवर्तन के २ मार्ग है | क्रान्ति के मार्ग से व्यवस्था को एक झटके में बदला जाता है | किंतु इस पद्धति में परिवर्तन का आधार राजतंत्र होता है जोकि अपनेआप में धर्मानुसारी शिक्षा के सिद्धांतों के विपरीत है | क्रान्ति में परिवर्तन ऊपर से नीचे की ओर होता है | परिवर्तन का दूसरा मार्ग सहज, स्वाभाविक, क्रमशः होनेवाला परिवर्तन है | परिवर्तन संसार का स्थायी स्वभाव है | संसरति इति संसारः | अतः समाज में स्वतः होनेवाले परिवर्तनों के साथ शिक्षा में भी क्रमशः परिवर्तन होता है | इसे उत्क्रांति मार्ग कहते है | वैज्ञानिकों का मानना है कि यह अनियंत्रित परिवर्तन पतन की ओर ही जाता है | भौतिक शास्त्र में इसे Entropy (परिक्षय) का सिद्धांत कहते है | क्रांति में प्रस्थापित व्यवस्था का ध्वंस निहित है | १८३५ में मैकोले ने यही किया था | सकारात्मक शिक्षा की प्रस्थापना हेतु क्रांतिकारी परिवर्तन कितना भी आकर्षक लगे, अत्यंत कठिन है | एक तो ऐसे परिवर्तन हेतु आवश्यक सम्पूर्ण सैद्धांतिक स्पष्टता तथा उसे व्यवहार में उतारनेवाले प्रशिक्षित आचार्य एक साथ एक समय इतनी बड़ी संख्या में तैयार करना तथा इस व्यवस्था को स्थापित करने हेतु अनुकूल राजतंत्र का उपलब्ध होना, दोनों ही बातें दुष्प्राप्य है | यदि महत्प्रयास से धर्मसत्ता आदर्श आचार्यों को तथा राजसत्ता राजनैतिक इच्छाशक्ति को प्राप्त भी कर ले तब भी अचानक व्यवस्था परिवर्तन समाज में सांस्कृतिक क्षोभ (cultural shock) उत्पन्न करेगा | दूरस्थ वनवासी क्षेत्रों में अचानक आधुनिक शिक्षा को प्रस्थापित करने से ऐसा विक्षोभ देखने में आता है | ऐसे सामूहिक विक्षोभ की स्थिति में अधिकतर समय समाज अच्छी बातों को भी नकार देता है |

उत्क्रांति का पथ सहज, स्वाभाविक व नैसर्गिक है | किंतु फिर भी उसमें विकास के स्थान पर पतन की ही अधिक संभावना है | प्रयत्नपूर्वक धर्मानुसारी शिक्षा की chanakyaस्थापना हेतु आवश्यक परिवर्तन करना यह मार्ग ना तो अचानक झटके से की हुई क्रान्ति हो सकता है और ना ही अत्यंत धीमी गति से होनेवाली उत्क्रांति | जिस मार्ग का अवलंबन धर्मसंस्थापना के लिए किया जाना अपेक्षित है उसे सम्यक क्रान्ति कहा जा सकता है | संस्कृत में इसे यदि एक शब्द में कहना हो तो कहेंगे ‘संक्रांति’ | संक्रांति में परिवर्तन क्रमशः व नैसर्गिक है किंतु परिवर्तन की गति व दिशा सुनियोजित होगी | क्रमशः उत्थान करते हुए अंतिम आदर्श को प्राप्त किया जायेगा | यही भारतीय पद्धति है | संक्रांति में क्रान्ति की तरह विस्फोट नहीं है और ना ही उत्क्रांति की तरह पतन | जो-जो जिस-जिस स्तर पर है वही से क्रमशः उत्थान की ओर अग्रसर हो यही संक्रांति का मार्ग है | धर्मसंस्थापना की यही शाश्वत विधि है |

शिक्षा में संक्रांति की आधारशिला शिक्षक ही होंगे | संक्रांति में चूंकि परिवर्तन बाहर से थोपा नहीं जाता अपितु अन्दर से ही किया जाता है | अतः यह हमेशा मानव-केन्द्रित होगा, व्यवस्थानुगत नहीं हो सकता | शिक्षक धर्मानुसारी शिक्षा की संकल्पना को अर्थात धर्म की सुस्पष्ट संकल्पना को हृदयंगम करे | इसीसे शिक्षा में संक्रान्ति प्रारम्भ होगी | इस धर्म को अपने व्यक्तिगत जीवन में आचरण से प्रारम्भ करना होगा | धीरे-धीरे अध्ययन, अध्यापन व शिष्यों के साथ व्यवहार में धर्म का प्रभाव प्रारम्भ होगा | शिक्षक के कक्षा में धर्माचरण प्रारम्भ करने से सकारात्मक परिवर्तन दृष्टिगोचर होंगे | किसी भी शैक्षिक संस्थान में यदि १० प्रतिशत शिक्षक धर्माचरण करनेवाले हो जाये तो प्रयत्नपूर्वक उस शिक्षा संस्थान को धर्मानुसारी शिक्षा के आदर्श के रूप में प्रस्थापित किया जा सकता है | जब इन शिक्षा संस्थानों से समाज के सभी क्षेत्रों में सर्वोत्तम व्यक्तित्व प्रदान किये जायेंगे तब सारा समाज इन शिक्षा संस्थानों का अनुसरण करने लगेगा | परिवर्तन का धर्मानुसारी मार्ग यही है |

संक्रांति का प्रारम्भ शिक्षकों के सुगठन हेतु आयोजन करने से होगा | आचार्य निर्माण की यह प्रक्रिया बाहरी प्रशिक्षण से नहीं अपितु अंदरूनी स्वाध्याय से ही संभव है | धर्मसंस्थापना की प्रेरणा से उद्दीपित आचार्य एकत्रित आकर धर्म को समझने हेतु अध्ययन, विमर्श, मनन, चिंतन करेंगे तब उसे स्वाध्याय कहा जायेगा | इस स्वाध्याय का मूल आधार तो शास्त्र ग्रन्थ ही हो सकते है | किंतु साथ ही शास्त्रीय सिद्धांतों की युगानुकुल अभिव्यक्ति को भी स्वाध्याय का आधार बनाना होगा | धर्म के तत्व को हृदयंगम करना स्वाध्याय का प्रथम चरण है | इसका अगला चरण धर्मावलंबन के व्यावहारिक आयामों का सृजन है | कुछ दो, चार, दस या पचास लोग भी कुछ विधियों की सूचि बनाकर सारे अध्यापकों को दे देंगे तो काम नहीं चलेगा | धर्मावलंबन की विधियों का सृजन प्रत्येक को अपनी प्रतिभा का समुचित उपयोग करते हुए करना होगा | यह सृजन प्रक्रिया प्रत्येक के लिए स्वतंत्र होते हुए भी व्यक्तिगत नहीं हो सकती | धर्म का मर्म सामूहिक क्रिया में है | अतः स्वाध्याय भी सामूहिक ही करना पड़ेगा | चिंतन मनन द्वारा समझे हुए तत्व को व्यवहार में उतारने का नाम है निदिध्यासन | इसी से स्वाध्याय परिपूर्ण होगा | स्वाध्यायी आचार्यों के नियमित मंडल सर्वत्र प्रारम्भ करने होंगे | प्रयत्नपूर्वक पूरे समाज में इस योजना को क्रियान्वित करना होगा |

स्वाध्याय से प्राप्त विधियों को अपने-अपने अध्यापन में प्रयोग कर परिष्कृत किया जायेगा | ऐसे कुछ शिक्षक साथ मिलकर या तो पूर्व से चल रहे शिक्षा संस्थान को आदर्श बनायेंगे अथवा नूतन पूर्णतः धर्मानुसारी शिक्षा संस्थानों का निर्माण करेंगे | इनके प्रभाव से नीतियों में भी परिवर्तन होगा | प्रारम्भ में केवल इतना भी हो जाये कि राजसत्ता ऐसे पूर्णतः निःस्वार्थ भाव से चलनेवाले गैर-वाणिज्यिक धार्मिक शिक्षा संस्थानों को स्वतंत्रता से कार्य करने दे, किसी भी प्रकार का नीतिगत हस्तक्षेप ना करने दे तो भी पर्याप्त है | ऐसे समाजपोषित शिक्षा संस्थान क्रमशः प्रमुखता प्राप्त करते जायेंगे व शासनमुक्त शिक्षा व्यवस्था का विकास करेंगे |

Saraswati-Statue-to-Washingtonइस पूरी प्रक्रिया में शैक्षिक संगठनों की भी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है | इस हेतु शैक्षिक संगठनों के कार्यकर्ताओं का मानस धर्मसंकल्पना के प्रति दृढ़ करना होगा | वर्तमान में देश में भारतीय दृष्टी को ध्यान में रखकर काम करनेवाले तीन प्रकार के शैक्षिक संगठन कार्यरत हैं | कुछ संगठन शिक्षा संस्थानों का संचालन करते हैं | निःस्वार्थ सेवा भाव से राष्ट्रनिर्माण हेतु चरित्र निर्माण करनेवाली संस्कारवान शिक्षा प्रदान करनेवाले कई शैक्षिक संगठन हैं | संख्या की दृष्टी से विद्याभारती इनमें अग्रणी है | रामकृष्ण मिशन, चिन्मय मिशन, भारत सेवक समाज, सर्वोदयी विचारधारा से चलनेवाले संगठन आदि अनेक संगठन इस श्रेणी में आते हैं | यद्यपि इन शिक्षा संगठनों द्वारा चलाये जानेवाले शिक्षा संस्थान आधुनिक व्यवस्था का अंग होने के कारण पूर्णतः भारतीय नहीं है | फिर भी इन संगठनों का संचालन करनेवाले कार्यकर्ताओं की मंशा धर्माधिष्ठित भारतीय पद्धति को स्थापित करने के लिए अनुकूल है | धर्मदृष्टि को समझने से इन शिक्षा संस्थानों के शिक्षकों द्वारा संक्रांति होना तुलनात्मक रूप से अधिक सुकर होगा |

दूसरे प्रकार के संगठन शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत विभिन्न घटकों के हितों की रक्षा हेतु काम करते हैं | विद्यार्थियों के हितों के लिए विद्यार्थी संगठन जैसे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, शिक्षकों के हितों के लिए विभिन्न राज्यों में गठित शिक्षक संघ तथा कई राज्यों में निजी संस्थाचालकों के संगठन भी हैं | इस प्रकार के शैक्षिक संगठन प्रमुखतः अपने सदस्यों के अधिकारों, आर्थिक हितों तथा समस्याओं के समाधान हेतु आन्दोलन शासन से चर्चा अथवा न्यायालयीन दावों के माध्यम से कार्य करते हैं | इन संगठनों का मूल स्वभाव सदस्यों की स्वार्थपूर्ति होने के कारण इनमें जुडनेवालों के मन में भी निजी हितों की वरीयता अधिक होती हैं | इसका सकारात्मक परिणाम यह है कि इन संगठनों की सदस्य संख्या बहुत अधिक होती है | यह संख्याबल इनकी प्राथमिक शक्ति है | धर्मानुसारी शिक्षा के तत्वों का प्रचार कर अनुकूल वातावरण निर्मिती में ये संगठन महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं | इनके माध्यम से शिक्षा में जुड़े हुए एक बड़े वर्ग तक वैचारिक सन्देश पहुंचाना संभव हो सकता है | यद्यपि इसका सैद्धांतिक गुणांकन नहीं होगा फिर भी धर्माचरण में रत शिक्षकों को नैतिक समर्थन देनेवाले अनुकूल मन के समर्थकों का वर्ग तैयार किया जा सकता है | ये लोग स्वाध्याय और संक्रांति के क्रियान्वयन में पूरी तरह से सहभागी भले ही न हो उसके लिए पोषक उर्वराभूमि का निर्माण निश्चित रूप से कर सकते हैं | संक्रांति के द्वितीय चरण धर्माधिष्ठित शिक्षा के सर्वव्यापीकरण में लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत संख्या का भी बड़ा महत्त्व है | इस चरण में इन शैक्षिक संगठनों की भूमिका सबसे प्रभावी होगी | इन संगठनों में धर्मानुसारी शिक्षा के विचार का बीजारोपण करने हेतु कुछ वैचारिक कार्यक्रमों की योजना करना आवश्यक होगा | ऐसे कार्यक्रमों के माध्यम से कार्यकर्ताओं को धर्मसंकल्पना का परिचय दिया जा सकेगा | संख्या बड़ी होने के कारण पूर्ण वैचारिक स्पष्टता की अपेक्षा तो नहीं कर सकते, केवल अधिकारों के साथ कर्तव्यों का विचार करने का संस्कार भी प्रेरित किया जा सके तो प्रारंभ के लिए पर्याप्त होगा | अधिकारों के लिए लड़ने के साथ ही कर्तव्यपालन में ही हमारा अधिक स्थायी हित है यह बात समझना धर्मविचार का शुभारम्भ है |

तीसरे प्रकार के शैक्षिक संगठन वैचारिक कार्य करनेवाले संगठन हैं | इनका मूल काम ही शिक्षा के भारतीय प्रतिमान पर अनुसंधान कर उसे युगानुकूल रूप में प्रस्थापित करने का नियोजन करना है | पुनरुत्थान विद्यापीठ, भारतीय शिक्षण मंडल, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास आदि संगठन इस श्रेणी में आते हैं | धर्माधिष्ठित शिक्षा को ही विभिन्न नामाभिधानों से प्रकट करते हुए उसकी संस्थापना हेतु ये वैचारिक संगठन कार्य कर रहे हैं | शिक्षा व्यवस्था में धर्मसंस्थापना हेतु संक्रांति करने में इन संगठनों की योजक भूमिका अपेक्षित है | संक्रांति के लिए आवश्यक विभिन्न घटकों को एक सूत्र में गूंथने का परोक्ष कार्य इन संगठनों को करना होगा | संक्रांति के तात्विक अधिष्ठान की सुस्पष्टता की जिम्मेवारी भी इन्ही संगठनों की बनती है | अनादि काल से भारत में जीवंत धर्मसंकल्पना को मूल रूप में समझकर उसका युगानुकुल स्पष्टिकरण समाज में प्रदान करना धर्मानुसारी शिक्षा के लिए प्रथम आवश्यकता है | धर्म तो साक्षात्कार का विषय है | अतः इन संगठनों के कार्यकर्ताओं को साधक बनना होगा | उपरी प्रवचन, उद्घोषणाएं, प्रस्ताव आदि तो संगठनात्मक आवश्यकताओं के अनुरूप चलते रहेंगे किंतु इन संगठनों का वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि गहन गंभीर साधना को तत्पर कितने कार्यकर्ताओं का निर्माण इन संगठनों की प्रेरणा से हुआ | संक्रांति के अन्य सभी चरणों की शुद्धि, पावित्र्य, प्रभाव, साफल्य तथा सार्थकता इस साधना पर निर्भर करती है | अतः इन संगठनों से जुड़े सभी कार्यकर्ताओं का शास्त्राध्ययन तथा स्वाध्याय कठोर नियमितता के साथ होना अपेक्षित है | समय-समय पर सामूहिक विमर्श, प्रत्यक्ष प्रयोग, उन प्रयोगों से प्राप्त अनुभवों पर पुनः सर्वांगीण संविमर्श तथा आपसी समन्वय यह इस साधना की कार्यपद्धति बनती है | इस चर्चा स्वाध्याय के साथ ही इन विचारों का युगानुकुल शब्दावलि में संहिता लेखन भी अनिवार्य है | तैतरीय उपनिषद् के शिक्षावल्ली अनुवाक् में गुरु अपने दीक्षांत आदेश में स्पष्ट निर्देश दे रहा है – स्वाध्याय प्रवचनाभ्यां मा प्रमदितव्यं – स्वाध्याय और प्रवचन में कभी आलस न करना | यहाँ वर्तमान युग के अनुरूप प्रवचन के अर्थ को विस्तारित करके समझना होगा | वैसे भी प्रवचन का अर्थ है पूर्ण गंभीरता से प्रकट करना – प्रकर्षेण वाच्यति इति प्रवचनं | वर्तमान स्थिति में वैखरी वाणी का अक्षररूप अर्थात लिखित साहित्य अधिक प्रामाणिक माना जाता है | अतः प्रवचन के अर्थ में गंभीर लेखन को सम्मिलित करना पड़ेगा | वैचारिक संगठनों के कार्यकर्ताओं को प्रयत्नपूर्वक नित्यलेखन का अभ्यास करना होगा | प्रतिदिन नियमपूर्वक कुछ पृष्ठ लिखने की आदत बन जाये तो शनैः शनैः लेखनी में स्पष्टता व लेखन में गांभीर्य आ जायेगा |

धर्म के सुस्पष्ट साक्षात्कार के साथ ही वैचारिक संगठनों के कार्यकर्ताओं का यह भी दायित्व बनता है कि उसका युगानुकुल प्रयोग करे | अतः शिक्षकों व पहले दो प्रकार के संगठनों के साथ मिलकर शिक्षा में धर्मप्राण नवोन्मेष करने का शुभ व्रत भी इन संगठनों का है | ऐसे प्रयोगों से प्राप्त निष्कर्षों को संहिताबद्ध कर अनेक स्थानों पर दोहराने योग्य प्रतिमान का निर्माण करना होगा | यह प्रतिमान सभी स्तरों पर स्वाध्याय, प्रयोग व धर्माचरण का आधार बनेगा | इसी प्रतिमान से धर्मानुसारी शिक्षा को स्थापित करने, धर्मप्राण, स्वाध्यायी आचार्यों की संक्रांति संभव होगी |

अप्रैल 4, 2016 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , | 11 टिप्पणियाँ

प्रसार माध्यम भी कहे – ‘पहले भारत!’


newshourयह बहस का विषय है की प्रसार माध्यम और पत्रकारिता समाज के दर्पण के रूप में काम करे या उनपर समाज के प्रबोधन का दायित्व हो? वर्तमान में प्रसार माध्यम गंदगी को परोसते समय यह तर्क देते है की समाज यही देखना/पढ़ना चाहता है | वैसे तो यह कुतर्क ही है और इसकी सत्यता को भी प्रमाणित नहीं किया जा सकता | समाज में फूहड़ पत्र-पत्रिकाओं की पाठकसंख्या कुछ हजार ही होगी वहीं दूसरी ओर ‘अखंड ज्योति’ जैसी धार्मिक पत्रिकाएँ लाखों की संख्या में प्रकाशित, मुद्रित व वितरित होती है | चित्रवाहिनियों (Channels) में भी आस्था, संस्कार जैसे धार्मिक वाहिनियों की दर्शकसंख्या MTV या iTunes जैसी दिनभर फूहड़ गाने बजानेवाली वाहिनियों से कई गुना अधिक है| फिर भी प्रसार माध्यम कहते है की ‘जो बिकता है वही छपता है’ | तर्क के लिए यह बात मान भी ली जाये की समाज अश्लीलता को देखना-पढ़ना चाहता है | तब हमारे पास यह प्रश्न उठता है कि प्रसार माध्यम और उनमें काम करनेवाले पत्रकारों का नैतिक, सामाजिक व राष्ट्रीय दायित्व क्या है?

स्वतंत्रतापूर्व राष्ट्रीय आंदोलन में पत्रकारिता राष्ट्रजागरण व जनप्रबोधन का माध्यम बनी | लगभग सभी राष्ट्रीय नेताओं ने या तो समाचारपत्र चलाये या किसी न किसी पत्र-पत्रिका में कार्य किया | लोकमान्य तिलक द्वारा प्रारंभ किये गए ‘केसरी’ और ‘मराठा’ राष्ट्रीय आंदोलन के महत्वपूर्ण आधार रहे | महात्मा गाँधी ने भी ‘Young India’ व ‘हरिजन’ को जनप्रबोधन का माध्यम बनाया | अरविंद घोष ने भी राष्ट्रीय आंदोलन का प्रारंभ ‘वंदे मातरम्’ इस पत्र के संपादन द्वारा किया | ऐसे और भी कई उदाहरण दिए जा सकते है जहा पत्रकारिता क्रांति की मशाल बन गयी | गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे राष्ट्रनायक भी पत्रकारिता की ही देन है | स्वतंत्र भारत में भी आपातकाल की तानाशाही का विरोध करने के लिए जयप्रकाश नारायण की समग्र क्रांति का साथ रामनाथ गोयनका ने Indian Express समूह के माध्यम से दिया | अरुण शौरी, एस. गुरुमूर्ति जैसे पत्रकारों ने इस राष्ट्रधर्म का निर्वाह आगे भी किया |

आज भी अनेक स्तंभलेखक पत्रकारिता को प्रबोधन का माध्यम मानकर लेखनकर्म करते है किंतु मुख्यधारा की पत्रकारिता ने यह भाव खो दिया है | 24 घंटे की समाचारवाहिनियों ने सतत ख़बरों की खोज के चलते पत्रकारिता के स्तरों को नित्य नूतन नीचाइयों के दर्शन कराए है | हमारे समाचार देने से समाज पर उसका क्या असर होगा इसका विचार शायद ही कोई पत्रकार करता है | केवल एक अंधी प्रतियोगिता में नकारात्मक समाचार लेखन/चित्रण की दौड़ चल पड़ी है | कई बार सारे तथ्य जाने बिना ही सनसनी के रूप में समाचार दिए जाते है | अनेक बार तो अच्छी बातों को भी नकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया जाता है | नवरात्रि के दिनों में एक समाचार चला कि अहमदाबाद के सरकारी अस्पताल ने राज्य के स्वास्थ्य मंत्री के कार्यक्रम के बाद डॉक्टरों और नर्सों ने गरबा किया | लगभग सभी समाचारवाहिनियों ने इसे नकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया | स्वास्थ्य मंत्री से भी प्रश्न पूछे गए और उन्होंने भी पूछताछ करने का आदेश दे दिया तथा दोषी कर्मचारियों पर कारवाई करने का आश्वासन भी | यह माध्यमों की ताकत है | किन्तु, जब तथ्य सामने आये तो वे चौंकानेवाले थे | एक अत्यंत सकारात्मक पहल के रूप में यह कार्यक्रम आयोजित हुआ था | घुटना प्रत्यारोपण (knee replacement) के बारे में समाज में जागृति लाने हेतु यह आयोजन था | गरबा करनेवाले सभी लोग ऐसे थे जिनके घुटने बदले जा चुके थे और इस शस्त्रक्रिया के बाद आप सामान्य जीवन जी सकते है इस बात का संदेश देने के लिए गरबा के सांस्कृतिक कार्यक्रम का प्रयोग किया गया था | वास्तव में इस घटना में सकारात्मक समाचार छुपा हुआ है किंतु सनसनी खोजने की जल्दबाजी में हर बात का नकारात्मक चित्रण करना ही हमारा पत्रकारधर्म है ऐसा मानकर यह उल्टा काम हुआ |

समाचार किस बात में है यह समझना पत्रकार का पहला धर्म है | नए पत्रकारों को सिखाते समय यह समझाया जाता है कि पत्रकार की नाक तेज होनी चाहिए | सड़क पर घटित होनेवाली सामान्य घटना में भी समाचार सूंघने की शक्ति पत्रकार में होती है | वही सच्चे अर्थ में पत्रकार है | किंतु, इसके साथ ही यह भी समझाया जाता है कि हर घटना समाचार नहीं होती | सामान्य से हटकर कोई बात हो तब ही वह समाचार की श्रेणी में आती है | सामान्यतः दिया जानेवाला उदाहरण है कि कुत्ता यदि मनुष्य को काटे तो समाचार नहीं बनता किन्तु यदि मनुष्य कुत्ते को काटे तो समाचार है क्योंकि यह असामान्य घटना है | असामान्यत्व के इस उदाहरण में ही इतनी नकारात्मकता छिपी हुई है कि पत्रकार का स्वभाव ही बन जाता है कि हर बात में उल्टा समाचार ही ढूंढे | जिस प्रकार गिद्ध को ऊँचे आकाश में विहार करते हुए नीचे के सुन्दर दृश्य में और कुछ नहीं दिखाई पड़ता, केवल शव ही दिखाई देता है, सडी हुई लाश हो तो और पहले दिखाई देती है, उसी प्रकार वर्तमान मीडियाकर्मी समाज में से सडांध को ढूंढकर समाज के सामने प्रस्तुत करना अपना कर्तव्य मान बैठे हैं | समाज में हो रहे सकारात्मक कार्य उनके दृष्टिपथ में ही नहीं आते | जबकि ऐसी अनेक असामान्य किन्तु अनुकरणीय घटनायें, कार्य समाज में चल रहे है | समाचार उन सकारात्मक बातों में भी छिपा है और जब कभी ऐसी बातें समाज के सामने प्रस्तुत की जाती है तो उनका बहुत अधिक स्वागत एवं सराहना होती है | समाज जो देखना चाहता है वह परोसने की बात करनेवाले माध्यम इस पर ध्यान नहीं देते |

वास्तविकता में मनुष्य की दृष्टि उसके उद्देश पर निर्भर करती है | अतः समाचारमाध्यमों के उद्देश पर विचार करना आवश्यक है | ‘केसरी’, ‘मराठा’ या ‘वंदे मातरम्’ जैसे समाचारपत्रों का उद्देश ही स्वतंत्रता आंदोलन था | अतः उसमें कार्य करनेवाले पत्रकारों की दृष्टि भी उसी प्रकार से थी | वर्तमान में प्रसारमाध्यमों को भी व्यापारिक दृष्टिकोण से ही देखा जा रहा है | जिसके कारण पत्रकारों का दृष्टिकोण भी व्यापारिक हो गया है | पत्रकारिता अब व्रत (mission) नहीं रहा | अब उसे व्यवसाय (profession) के रूप में देखा जाने लगा है | इस स्थिति को राष्ट्रभाव के जागरण से ही बदला जा सकता है | जब हर बात में राष्ट्रहित महत्वपूर्ण हो जायेगा तो समाचार लिखनेवाले पत्रकार से लेकर उसे संपादित करनेवाले संपादक और माध्यमों के कर्ताधर्ता स्वामियों में भी दृष्टिपरिवर्तन संभव होगा | जिन्हें यह अत्यंत आदर्शवादी व अव्यावहारिक बात लगती है उनके लिए वर्तमान समय के एक अत्यंत विकसित राष्ट्र का उदाहरण दिया जाना उचित होगा| डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की आत्मकथा में एक प्रसंग आता है | वे किसी संगोष्ठी हेतु इजराइल गए थे | तेल-अवीव में जिस होटल में वे रुके थे उसी पर आतंकवादी हमला हुआ | विस्फोटकों से भरा हुआ ट्रक लेकर आतंकवादी होटल की दीवार से टकरायें | विस्फोट के बाद सड़क पर लाशें बिछी हुई थी | ऊपर होटल के कमरे से इस दृश्य को देखकर डॉ. कलाम ने सोचा की कल सुबह सभी समाचारपत्रों के मुखपृष्ठ पर यही तस्वीरें दिखाई देंगी | किंतु उन्हें आश्चर्य तब हुआ जब दूसरे दिन के किसी भी समाचारपत्र में मुखपृष्ठ पर न तो घृणित तस्वीरें थी न ही इस समाचार ने कोई स्थान पाया था | सभी समाचारपत्रों के 12वे से 15वे पृष्ठ पर एक छोटीसी घटना के रूप में इस समाचार का वर्णन किया गया था और मुखपृष्ठ पर – देश के कोने में एक छोटेसे गाँव के किसान ने सिंचाई में नए प्रयोग द्वारा गन्ने का विक्रमी उत्पादन किया – यह समाचार उस किसान की हंसती हुई तस्वीर के साथ प्रमुखता से प्रकाशित था |

‘अग्निपंख’ (Wings of Fire) पुस्तक में इस प्रसंग को पढ़ने के बाद इस बात पर खोजबीन की कि ऐसा कैसे संभव है ? क्या इजराइल में कोई कानून है जो समाचारपत्रों को सकारात्मक समाचार प्रमुखता से प्रकाशित करने के लिए विवश करता है ? ऐसा कोई कानून नहीं है, ना ही कोई विवशता | वहाँ की शिक्षा पद्धति प्रत्येक नागरिक को देशभक्ति का ऐसा पाठ पढ़ाती है की वह किसी भी व्यवसाय में हो, देश उसके लिए सर्वोपरि है | व्यवसाय से चिकित्सक भी स्वेच्छा से वर्ष में कुछ माह सीमा पर जाकर सुरक्षा का कार्य करता है | हर व्यक्ति को आयु के 12 वर्ष पूर्ण करते ही 2 साल का सैनिकी प्रशिक्षण दिया जाता है | इसलिए वे अपनेआप को देश के सिपाही ही मानते है | बातचीत में भी यह सुनने को मिल सकता है की ‘मैं देश का सिपाही पहले, प्रोफेसर बाद में; सिपाही पहले और पत्रकार बाद में हूँ |’ जब ऐसा राष्ट्रीय भाव हो तब अपनेआप ही आतंकवादी गतिविधियों की खबर प्रमुखता नहीं पायेगी | हमारे देश में भी सेना व पुलिस नहीं चाहती की अपराधियों का महिमामंडन हो | यदि पत्रकार/मीडियाकर्मी स्वयं को सैनिक मानने लगे तो वह समाचारों को उसी दृष्टि से देखने लगेगा फिर घटना का समाज के मन पर और राष्ट्र के मानस पर होनेवाला परिणाम प्रमुख स्थान निश्चित करेगा |

अमेरिका जैसे घोर व्यापारिक देश में भी, समाचार माध्यमों के बीच गलाकाट प्रतिस्पर्धा होने के बाद भी, राष्ट्रहित का ध्यान रखा जाता है | न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर आतंकी हमले के बाद 2 साल तक मलबा हटाया नहीं जा सका किंतु अमेरिका की किसी समाचारवाहिनी ने यह बात विश्व के सामने नहीं रखी | ना ही कोई पत्रकार माइक लेकर न्यूयॉर्क के महापौर के पीछे भागा कि ‘देश जानना चाहता है कि मलबा अभी तक साफ़ क्यों नहीं हुआ?’ समस्त सांस्कृतिक, आर्थिक एवं सामाजिक खामियों के बावजूद अमेरिका के शक्तिशाली होने का सबसे महत्वपूर्ण कारण नागरिकों की देशभक्ति है | इसके मूल में है शिक्षा | केवल 500 साल का इतिहास होते हुए भी वे अपने प्रत्येक नागरिक को बचपन से ही उसपर गर्व करना सिखाते है | दुनियाभर के देशों के प्रवासी लाखों की संख्या में प्रतिवर्ष अमेरिकी नागरिकता के लिए प्रयास करते है | उन सभी को अमेरिका का इतिहास पढ़ना पड़ता है, परीक्षा देनी होती है | तभी नागरिकता प्राप्त होती है |

पत्रकारिता को राष्ट्रीयता का माध्यम तब बनाया जा सकता है जब हमारी शिक्षा राष्ट्रगौरव और राष्ट्रीयता का निर्माण नागरिकों में करने लगे | वर्तमान समय में परेशानी यह है कि हमारी आज की पत्रकारिता शिक्षा में इस प्रकार के परिवर्तनों के प्रयास को भी नकारात्मक रूप से प्रचारित करेगी | क्या कोई सोच सकता है कि विद्यालयों में ‘सुबह उठकर माता-पिता के चरण छूना’ यह शिक्षा देना सांप्रदायिकता है ? किंतु ऐसा भारत में हुआ | जब गुजरात सरकार ने दीनानाथ बत्रा जी की बालकों को संस्कारित करनेवाली पुस्तकें सह-पठन के लिए प्रकाशित करवाकर सरकारी विद्यालयों में वितरित की तब देश के प्रमुख अंग्रेजी समाचारपत्रों ने इसे घोर राष्ट्रद्रोही कदम के रूप में प्रचारित किया |

अतः शिक्षा बदले ना बदले, कुछ पत्रकारों को तो बदलना होगा| सकारात्मक समाचारों को सुव्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करना होगा | ग्वालियर में जब सूर्यनमस्कार का गिनीज विश्वविक्रम बना तब 4 पृष्ठों में उसकी खबर छापनेवाले संपादक मित्र ने टिप्पणी की थी, “अच्छी बातों को समाचार बनने के लिए बहुत प्रयत्न करने पड़ते है| 150 कार्यकर्ताओं द्वारा 6 माह तक 350 विद्यालयों में प्रशिक्षण के महान परिश्रम के कारण यह अच्छा समाचार तयार हुआ|” संपादक मित्र को जो उस समय उत्तर दिया था वह आज भी प्रासंगिक है | अच्छे प्रयास समाचार बनने का प्रयत्न तो छोड़ो, स्वप्न भी नहीं देखते | सच्चा पत्रकार ऐसे प्रयासों को ढूंढकर उन्हें समाचार बना देता है | अच्छे काम तो समाज में हो ही रहे है | पर आज के वातावरण में उन्हें समाचार बनने में प्रयास करना पड़ रहा है | इजराइल जैसी राष्ट्रीय पत्रकारिता भले ही भारत के लिए अभी दूर हो किंतु हमारे पत्रकार इतना काम तो कर ही सकते है कि अच्छी खबरों को प्रयत्नपूर्वक खोजकर समाज के सामने लाये | संपादक व प्रसारमाध्यमों के स्वामी ऐसे पत्रकारों को प्रोत्साहन दे, कम से कम प्रतिरोध तो ना करे | देश में राष्ट्रीय पत्रकारिता का अगला चरण होगा जब पत्रकार, संपादक व स्वामी देश में घटनेवाली नकारात्मक घटनाओं का चित्रण करते समय भी राष्ट्रहित का ध्यान रखेंगे | तब प्रसारमाध्यमों के लिए भी राष्ट्र सर्वोपरि होगा |

प्रसारमाध्यम ऐसी अगुवाई करेंगे तो उनके साथ ही देश का हर व्यवसायी, हर नागरिक अपने नीजी हित के पहले सोचने लगेगा – ‘पहले भारत!’

नवम्बर 3, 2015 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , | 1 टिप्पणी

पुरस्कार वापसी का राजनैतिक अरण्य रुदन


sahity akadamiप्रश्न यह है कि साहित्यकारों ने माहौल बनाना है या माहौल के अनुसार चलना है | कहते है कि साहित्य समाज का दर्पण है | फिर यदि समाज में किसी विषय पर आक्रोश है तो वह कवि की लेखनी या लेखक के आलेख को विषय देगा | जब लेखनी कमजोर पड़ जाये तब साहित्यकारों को अपना आक्रोश व्यक्त करने के लिए अन्य माध्यम ढूँढने पड़ते है | एक कविता, एक उपन्यास अथवा एक लेख ही क्रान्ति को दिशा देने में समर्थ होता है | अंग्रेजों की नौकरी में बाबूगिरी करते हुए बंकिमचन्द्र की लेखनी से जन्मा एक गीत पूरे भारत को जगानेवाला जागरणमन्त्र बन गया | भारत के अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतंत्रता आन्दोलन के इतिहास में एकमात्र सफल आन्दोलन ‘वंग-भंग’ का प्रेरणागीत ‘वंदे मातरम’ ही था | 1857 से लेकर 1942 तक के अन्य सभी आन्दोलन अंग्रेजों द्वारा निर्ममता से कुचल दिए गए | जिन सीमित उद्देशों के लिए वे आंदोलन चलाये गए थे उनमें भी आंशिक सफलता किसी आंदोलन में नहीं मिली |

1905 में अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन किया और सारा देश एकमुख से मातृभूमि केsaptakoti kanth इस विभाजन का विरोध करने खड़ा हुआ | बंगाल से लेकर महाराष्ट्र तक, पंजाब-उत्तराँचल से लेकर मदुरै तक इस राष्ट्रीय उठाव में क्रान्तिगान बना बंकिम के उपन्यास ‘आनंदमठ’ का वह मात्रुगान ‘बोंदे मातरम’ | मूलतः 1882 में बंगला में लिखे उपन्यास आनंदमठ का सन्यासियों द्वारा गाया गया भक्तिगीत 1896 में गुरुदेव रविन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में जब गाया गया तब भारत का निर्विवाद राष्ट्रगीत बन गया | इसको गाते-गाते क्रान्तिकारी हँसते-हँसते फांसी पर झूल गए | नंदलाल बोस जैसे राष्ट्रीय चित्रकारों ने इस गीत से प्रेरणा पाकर भारत माँ के चित्रों की मालिका बनायी | राष्ट्रकवि सुब्रमण्यम भारती ने भारतभक्ति स्तोत्र लिखा | वंग-भंग का आंदोलन तब सफल हुआ जब 1911 में अंग्रेजों को बंगाल का विभाजन वापस लेना पड़ा | देश पुनः अखंड हुआ | यह वंदे मातरम की ही शक्ति थी जिसने पूरे भारत को एक सूत्र में पिरोया | बंगला साहित्यकारों और उनसे प्रेरित क्रांतिकारियों से अंग्रेज ऐसे भयभीत हुए कि उन्हें अपनी राजधानी कलकत्ता से बदलकर दिल्ली लानी पड़ी | यह है साहित्य की शक्ति |

1905 में भी बंकिमचंद्र सरकारी नौकरी में ही थे | अंग्रेजों के निर्णय का विरोध करने के लिए उन्हें नौकरी से त्यागपत्र नहीं देना पड़ा | साहित्यकार की ताकत उसकी लेखनी होती है | उसे राजनीती की आवश्यकता नहीं पड़ती |

ramprasad bismilराष्ट्र के लिए कार्य करनेवाले देशभक्तों में यदि साहित्य की शक्ति हो तो वह उनकी प्रेरणा को धार देती है और कार्य को गति | रामप्रसाद बिस्मिल जैसा क्रांतिकारी राष्ट्रहित में क्रान्ति के कार्य करने के साथ ही उन्होंने ऐसी सुन्दर कविताओं की निर्मिती की है कि अनेक युवाओं को राष्ट्रकार्य में भाग लेने हेतु प्रेरित किया | भागा-दौड़ी के जीवन में भी उन्होंने इतनी रचनाएं की कि उनका समग्र साहित्य 5 खण्डों में प्रकाशित है | ‘तेरा वैभव सदा रहे माँ, हम दिन चार रहे ना रहे’, ‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले’ ऐसी अनेक सुप्रसिद्ध रचनाएँ इस महान क्रान्तिकारी ने की है | हर क्रांतिकारी भले ही कवि ना हो पर हर कवि क्रांतिकारी जरुर होता है |

इस पार्श्वभूमी पर वर्तमान में साहित्यकारों द्वारा पुरस्कार लौटाने की घटना का विश्लेषण करें तो हम इसे प्रामाणिक आक्रोश के स्थान पर राजनीती से प्रेरित छद्मविलाप ही जानेंगे | यदि वास्तविकता में आक्रोश होता तो वह लेखनी को धार देता और कोई क्रान्ति की रचना निकल पड़ती | जब साहित्यकारों को अपने सृजन के अलावा और किसी धरने, आन्दोलन, प्रदर्शन आदि साधन का उपयोग विरोध करने के लिए प्रयोग करना पड़ता है तब वह साहित्य के नपुंसक होने की स्थिति है |

Akadami boardजो साहित्यकार टीवी चैनलों पर आ-आकर पुरस्कार लौटाने का समर्थन कर रहे है उनके तर्क भी अधूरे है | उन्हें अचानक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कुठाराघात होते हुए दिखाई दे रहा है, असहिष्णुता बढ़ी दिखाई दे रही है, भय का वातावरण समाज में व्याप्त होता दिखाई दे रहा है | इस सबका कोई यथार्थ आधार उनके पास नहीं है | विशेषज्ञ बताते हैं कि साम्प्रदायिक तनाव तथा जातिगत, पन्थगत विभेदों से उपजी हिंसा के मामलों में बड़े स्तर पर कटौती हुई है | गत 10 वर्षों में लगभग 700 ऐसे मामले प्रतिवर्ष हुए है जबकि 2015 के 9 महीनों में मात्र 215 ऐसी घटनाएं हुई है | यह विडम्बना है कि घटनाएं कम होते हुए भी चर्चा अधिक है | तथाकथित विद्वानों द्वारा जानबूझकर इस प्रकार का वातावरण बनाया जा रहा है | माननीय प्रधानमंत्री के चमत्कारिक नेतृत्व में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को मिली प्रचंड लोकतान्त्रिक सफलता कुछ लोगों को हजम नहीं हो रही | इसके पीछे उनके व्यक्तिगत हितों का भी प्रश्न है | गत कई वर्षों से अनेक सरकारी, अर्ध-सरकारी संस्थाओं पर आपसी साठ-गाँठ से निरंकुश शासन चलानेवाले इन ‘ख्यातनाम’ ‘विद्वानों’ की ठेकेदारी समाप्त होती दिखाई दे रही है | एक मजेदार तथ्य यह है कि पुरस्कार लौटानेवाले महानुभावों में वे सारे लोग सम्मिलित है जिन्होंने एक-दूसरे को पुरस्कार बांटे हैं | एक के पुरस्कार में बाकी दो जूरी रहे | जिसे पुरस्कार मिला उसने भी लौटाया और जिसने दिया उसने भी अपना पुरस्कार लौटाया | अब उसके जूरियों में से भी किसी ने पुरस्कार लौटाया | 3-4 चरण बाद पहला पुरस्कारकर्ता आपको जूरी में मिल जायेगा | ऊपर के 2-3 वाक्यों से पाठक संभ्रमित हो तो उसमें आश्चर्य नहीं क्योंकि गत 60 वर्षों से पुरस्कारों की दुनिया में यही हेरा-फेरी चल रही है | ये लगभग वही लोग है जो 15 वर्षों से बिना किसी तथ्य के गुजरात दंगों को लेकर देश-विदेश में बवाल मचाते रहे है | संजीव भट और तीस्ता सेतलवाड जैसे लोगों की पोल सर्वोच्च न्यायलय में खुलने के बाद भी इस कबीले का मगरमच्छी साम्प्रदायिक विलाप बदस्तूर जारी है |

पुरस्कार लौटाने की इस राजनीती के पीछे विदेशी षडयंत्रों को भी नकारा नहीं जा सकता | रूसी जासूसी संस्था केजीबी की फाइलों तथा विकिलीक्स के IYD Logoदस्तावेजों से यह स्पष्ट है कि हमारे यहाँ के कई विद्वान विदेशी पैसों के बूते पर देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त रहे हैं | वर्तमान में वैश्विक परिदृश्य कुछ ऐसा दिखाई देता है जो इस शंका को और अधिक बलवती करता है | गत डेढ़ वर्ष में अंतर्राष्ट्रीय जगत में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ी है | अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस को संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा एकमत से स्वीकार करना भारत की नई मान्यता का परिचायक है | गत कुछ महीनों में हमारे विदेश विभाग में संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषदों में स्थायी सदस्यता हेतु भारत के दावे को अत्यंत बलपूर्वक रखा है | विश्व के बहुसंख्य देशों का इस बात को प्रत्यक्ष व परोक्ष समर्थन मिल रहा है | स्वाभाविक रूप से ही हमारे दोनों पड़ोसियों के पेट में प्रचंड शूल उठा है | गत सप्ताह संयुक्त राष्ट्र संघ के संयुक्त सचिव की भ्रष्टाचार के मामले में हुई गिरफ़्तारी में यह तथ्य सामने आया कि भारत को सुरक्षा परिषद् में स्थान न मिल पाए इस हेतु चीन ने उसे अरबों डॉलर्स की घूस दी थी | हमारे देश में अचानक उठे विद्वत आक्रोश के पीछे भी ऐसा कोई घोर सांसारिक कारण सामने आये तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए | काश कि इन सबके बैंक खातों की निष्पक्ष पूछताछ की जाती |

youthइन सब विद्वानों की प्रेरणा का मुख्य स्त्रोत प्रचार है | यदि प्रसार माध्यम संभल जाये और पुरस्कार लौटाने की खबर दिखाना बंद कर दे तो पुरस्कार लौटाने अपनेआप बंद हो जायेंगे | पर इतनी देशभक्ति प्रसार माध्यमों में कहाँ ? दादरी की निंदनीय घटना को महीनों तक प्रतिदिन घंटों दिखानेवाले ये समाचार माध्यम गणेश पंडाल में पढ़ी जानेवाली नमाज को अथवा संघ के पथसञ्चलन पर पुष्पवृष्टि करते मुस्लिम बांधवों की तस्वीरों को एक बार भी नहीं दिखाते | अतः समाज को जोड़नेवाले तथा राष्ट्र को एकता के सूत्र में बांधनेवाले विषयों को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने का जिम्मा हम जैसे जागृत भारतवासियों का ही है | आन्तरताने ने विश्व खोल दिया है | सामाजिक माध्यम हर हाथ में पहुंचे मोबाईल के माध्यम से बहुत प्रभावी हो चुका है | उत्तरापथ के सुधि पाठकों से निवेदन है कि इस लेख में दिए गए विषयों को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाए | काटकर अपने-अपने माध्यमों पर चिपकाने की पूर्ण स्वतंत्रता आपको है | आपकी चर्चा और टिप्पणी विषय की गंभीरता को समाज में प्रसारित करेगी | अतः टिप्पणी अवश्य दें |

अक्टूबर 27, 2015 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , | 3 टिप्पणियाँ

एकात्म स्वावलंबी ग्राम विकास


sgv1अनेक विद्यालयों के द्वार पर लिखा होता है ‘ज्ञानार्थ प्रवेश-सेवार्थ प्रस्थान’ | यह शिक्षा के समग्र उद्दिष्ट का नित्य स्मरण है | केवल ज्ञानप्राप्ति अथवा व्यक्तिगत कौशल का विकास शिक्षा का पूर्ण उद्देश नहीं प्रकट करता | यह ज्ञानप्राप्ति अथवा कौशल विकास किस उद्देश से है यह भी स्पष्ट होना आवश्यक है | विद्यालय से निकला बालक परिवार, समाज, राष्ट्र व विश्व में योगदान करने के लिए सुयोग्य बने ऐसी अपेक्षा है | यह योगदान कितना भी अर्थकारक हो किंतु उसके पीछे का भाव सेवा का ही रहे ऐसा संस्कार विद्यालयों में नई पीढ़ी को प्राप्त हो यह शिक्षा के परिपूर्ण उद्देश की व्याख्या है | अतः शिक्षा के विषय में चिंतन करते समय व्यक्तित्व विकास के साथ ही सामाजिक विकास के विभिन्न आयामों पर चिंतन करना भी आवश्यक है | जब तक समाज की भिन्न-भिन्न इकाइयाँ यथा परिवार, ग्राम, संगठन, नगर आदि के विकास की सम्यक अवधारणा सुस्पष्ट न हो तब तक शिक्षित पीढ़ी के सम्यक उपाययोजन की योजना शिक्षाविद नहीं बना सकते | समग्र ग्राम विकास, नगर विकास, संगठनशास्त्र, व्यापार प्रबंधन आदि पर स्पष्ट प्रारूप तयार करना भी शिक्षा के भारतीय स्वरुप के विकास हेतु आवश्यक है |

आजकल स्मार्ट सिटी, स्मार्ट विलेज आदि की चर्चा चलती है | स्मार्ट विलेज की बात करते हीsgv2 योजनाकारों के मन में आधुनिक शहरी सुविधाओं से संपन्न, संचार के सभी साधनों से परिपूर्ण गांव का ही विचार मन में आता है | चिकनी-चुपड़ी पक्की सड़कें हो, बिजली की अखंड आपूर्ति, मोबाइल इंटरनेट आदि सभी संचार के साधन हर गांव में उपलब्ध करा दिए जाएँ | सरकार ने इस दिशा में कार्य प्रारंभ भी कर दिया है | पंडित दीनदयाल उपाध्याय के नाम से ग्रामीण फीडरों को अलग करने की देशव्यापी महत्त्वाकांक्षी योजना केन्द्र सरकार ने सितंबर 2015 में प्रारंभ की | इसके माध्यम से गांव-गांव में 24 घंटे बिजली की आपूर्ति होगी | सिंचाई के लिए आवश्यक 3 चरण (three phase) विद्युत आपूर्ति भले ही कुछ समय के लिए प्राप्त हो किंतु घरेलू एवं अन्य व्यापारी उपयोग के लिए आवश्यक एकल चरण (single phase) बिजली 24 घंटे गांव-गांव में उपलब्ध होगी | इस आधार पर इंटरनेट आदि संचार के साधन गांव में पूरे समय उपलब्ध रह सकेंगे | सभी गांवों को पक्की सड़क से जोड़ने की योजना भी इसी दिशा में एक प्रयास है कि गांवों का यातायात तथा मालवाहक संपर्क द्रुत गति से हो सके | किंतु प्रश्न यह है कि क्या इस सबसे गांव का समग्र विकास हो पायेगा? केवल व्यापार और संचार के अवसर उपलब्ध हो जाने से नई पीढ़ी का नगरों की ओर पलायन रुक जायेगा?

शहरों की ओर स्थानांतरण के अन्य दो महत्वपूर्ण कारक योजनाकारों ने खोजे है – स्वाथ्य एवं शिक्षा | प्राथमिक एवं माध्यमिक के आगे की शिक्षा तथा इस स्तर पर भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा गांवों में उपलब्ध न होने के कारण जिन्हें भी संभव है वो अपने बच्चों को शिक्षा हेतु शहर में भेजना पसंद करते है | एकबार पढ़ाई के लिए शहर गया बालक पढ़-लिख कर जवान होने पर गांव क्यों लौटेंगे ? अतः गांव के गांव ही युवाओं से रिक्त होते जा रहे है | अनेक राज्यों में आने वाले दिनों में यह एक बहुत बड़ी चुनौती होगी | नई पीढ़ी जब गांव में रहेगी ही नहीं तो ये संचार साधन, ये बिजली किस काम आयेगी ?

ग्रामीण स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए स्थिति बड़ी विकट है | अनेक स्थानों पर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र उपलब्ध ही नहीं है | जहाँ भवन उपलब्ध है वहां भी चिकित्सकों का अभाव है | कोई चिकित्सक गांव जाना ही नहीं चाहता है | सरकार ने अनेक प्रयास कर लिए, कुछ वर्षों की अनिवार्यता कर दी, अतिरिक्त भत्ता देना प्रारंभ कर दिया फिर भी चिकित्सक शहर छोड़ना नहीं चाहता है | निजी व्यवसाय में इतनी अधिक कमाई है कि महाराष्ट्र जैसे राज्यों के शहरों के सरकारी अस्पतालों में भी चिकित्सक नहीं जाना चाहते है | अतः स्वास्थ्य सुविधाओं का गांवों में उन्नयन असंभव के बराबर है | इस हेतु नए सिरे से सोचना होगा |

शहरीकरण की नकल के रूप में ग्रामविकास का विचार किया जा रहा है | इस सोच में ही मूलभूत परिवर्तन आवश्यक हैsgv | वर्तमान में विकास के वैश्विक परिमाणों में शहरीकरण एक प्रमुख मापदंड है | जिस देश में जितना अधिक शहरीकरण होगा उसे उतना ही अधिक विकसित माना जाता है | समूची जनसंख्या के कितने प्रतिशत जनसंख्या शहरी है यह विकास का मापदंड है | इसी जीवनदृष्टि के कारण गांवों का शहरीकरण ही गांव का विकास माना जा रहा है | ग्राम विकास के नाम पर सारा सरकारी चिंतन व योजनायें इसी दिशा में है | यह पूर्णतया अभारतीय विचार है | भारत में गांव एक परिपूर्ण जैविक इकाई है | पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने ग्रामोदय के एकात्मिक प्रारूप में इस बात का विचार किया है | सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक स्तर पर पूर्णतः स्वावलंबी ग्रामों अथवा ग्रामसमूहों का विकास किया जाना भारत में ग्रामविकास का माध्यम हो सकता है | गांवों की जीवनशैली में कृषि व गोरक्ष यह केवल आर्थिक उत्पादन के साधन न होकर उनका सांस्कृतिक व सामाजिक मूल्य भी है | जब तक हम इन दोनों को लाभ का व्यवसाय नहीं बनाते तब तक ग्रामोदय के सारे प्रयास अधूरे ही होंगे | वर्तमान समय के अनुरूप कृषि एवं गोरक्षा के साथ-साथ ग्रामीण उद्योग और कृषि उत्पादों के व्यापार को भी जोड़ा जा सकता है | इन सबके आधार पर संपूर्णरूपेण स्वावलंबी ग्रामों का विकास किया जा सकता है |

इस विकास की प्रक्रिया का भी जैविक होना आवश्यक है | स्वावलंबी समाज निर्माण सरकारी बैसाखियों से नहीं हो सकता | सरकारी योजनाओं के माध्यम से सरकारी पैसा सरकारी अधिकारियों द्वारा ही खर्च किया जाता रहा तो सारे विश्व की पूंजी एक गाँव में लगाने पर भी ग्रामविकास कतई संभव नहीं है | योजना के स्तर से ही ग्रामीणों का न केवल सहभाग अपितु नेतृत्व सच्चे ग्रामविकास में अनिवार्य है | सारा गांव पूर्ण जागरूकता के साथ संगठित होकर एक मन से विकास का संकल्प ले तब वह ग्रामविकास का प्रथम चरण होगा | भौगोलिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक आधार पर कुछ गांवों के समूह बनाये जा सकते है | समूह में कितने और कौनसे गांव हो इसका निर्णय भी ग्रामवासी ही आपस में मिल कर करें | नैसर्गिक संसाधन, मानव बल, आर्थिक उपलब्धता तथा भौगोलिक दूरी के आधार पर पूर्ण स्वावलंबी ग्रामसमूह विकसित करने हेतु आवश्यक गांवों की संख्या ग्रामवासी निर्धारित करेंगे | यह एकत्रिकरण बहुत अधिक कठोर नहीं होना चाहिए | और अधिक ग्रामों को जोड़ने अथवा कुछ गांवों को समूह बदलने की लचीली सुविधा इस व्यवस्था में उपलब्ध हो | कुछ गांव धीरे-धीरे अपनेआप में ही स्वावलंबी बनने का प्रयत्न कर सकते है | इस स्थिति में उन्हें किसी समूह का हिस्सा बने रहने की आवश्यकता नहीं रहेगी |

यह ग्रामसमूह अपने स्तर पर नियोजन करे कि किस प्रकार वे पाँच-सात वर्षों की अवधि में पूर्णतः आत्मनिर्भर हो सकते है | शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, गौरक्षा, व्यापार के साथ ही ऊर्जा के उत्पादन आदि में भी यह ग्रामसमूह पूर्णरूपेण आत्मनिर्भर बने | इस हेतु ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों का उपयोग करना आवश्यक होगा | तेलंगाना के लगभग 40 गांव जैव-इंधन (bio-diesel) के माध्यम से बिजली के उत्पादन में आत्मनिर्भर हो गए है | ऐसे ही सौर, पवन, छोटे नालों पर बने चक बाँध आदि को मिलाकर विकेन्द्रित विद्युत् आत्मनिर्भरता को प्राप्त किया जा सकता है | सिंचाई एवं पेयजल हेतु भी इसी प्रकार का चिंतन एवं नियोजन किया जाये कि कुछ अवधि में यह ग्रामसमूह उस मामले में भी आत्मनिर्भर बन सके | कृषि का नियोजन भी ‘स्वपोषण’ व ‘व्यापार’ इन दो रूपों में किया जाये | गांवों की अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ ही गांव शहरों के भी अन्नदाता है | आसपास की नगरीय आवश्यकताओं का ध्यान रखते हुए कृषि का व्यापारिक नियोजन किया जाये | फल, सब्जी और अनाज की आपूर्ति के अलावा अनेक ऐसे कृषिउत्पाद है जिनकी औद्योगिक उपयोगिता है | इन सभी का अपनी स्थानीय विशेषताओं के अनुरूप नियोजन किया जाये तो कृषि न केवल भरण-पोषण का अपितु अच्छे लाभ का माध्यम भी बन सकती है | किंतु यह एकल चिंतन अथवा प्रयोग से संभव नहीं है | सामूहिक चिंतन, संगठित प्रयास इस हेतु अनिवार्य है | कुछ कृषिउत्पाद सीधे बाजार में बेचने के स्थान पर थोड़ी सी प्रक्रिया करने से उनमें बहुत बड़ी मूल्य वृद्धि हो सकती है | अतः ऐसे कृषि के सहयोगी ग्रामोद्योगों की योजना भी ग्राम्य विकास का महत्वपूर्ण अंग है |

इस sgv3सब हेतु, शिक्षा में भी स्वावलंबी विचार इन ग्रामसमूहों को करना होगा | अपने नए पीढ़ी की शैक्षिक आवश्यकताओं की पूर्ति अपने ही ग्रामसमूह में हो सके ऐसी आत्मनिर्भरता को लक्ष्य किया जाये | हर बालक को 8वी तक जीवनोपयोगी सामान्य शिक्षा सहज, सुलभ, जहा तक हो सके निःशुल्क प्राप्त हो | उसके आगे की शिक्षा का नियोजन बालकों के स्वभाव एवं रूचि के अनुरूप तथा ग्रामसमूह की आवश्यकता के अनुसार किया जाये | इस हेतु विशेष रूप से ग्रामीण शिक्षा संस्थानों का निर्माण करना पड़ेगा जिसमें कृषि एवं कृषि सहायक उद्योगों में कार्य करने का प्रशिक्षण ग्रामीणों को दिया जाये | सामान्य उच्च विद्यालयीन शिक्षा (9वी से 12वी) तथा स्नातक तक महाविद्यालयीन शिक्षा ग्रामसमूह में उपलब्ध हो | केवल परास्नातक अथवा व्यावसायिक शिक्षा हेतु छात्रों को किसी अन्य ग्रामसमूह अथवा शहर में जाने की आवश्यकता रहे | इस प्रकार ग्रामसमूह शैक्षिक आवश्यकताओं हेतु पूर्णतः आत्मनिर्भर बन सकेंगे | स्वास्थ्य सुविधाओं में भी इसी प्रकार की आत्मनिर्भरता पाई जा सकती है | प्रत्येक गांव के एक या दो युवा-युवती को परा-चिकित्सकीय (para-medical) प्रशिक्षण दिलाकर आरोग्य मित्र के रूप में तैयार किया जाये | सामान्य छोटे-मोटे हादसों से होनेवाली छोटी-मोटी चोटें, सामान्य संक्रमण, बुखार, जुकाम, पेट की बिमारियाँ आदि के उपचार का ज्ञान व दवाई आरोग्य मित्र के माध्यम से हर गांव में उपलब्ध हो | थोड़े प्रगत उपचार तथा कुछ दिन के निवासी उपचार हेतु प्राथमिक स्वाथ्य केंद्र हर ग्रामसमूह में हो | ग्रामीणों के हाथ इस सबका प्रबंधन/संचालन दिया जाये ताकि चिकित्सकों की साप्ताहिक उपस्थिति व परिचारक कर्मचारियों (nursing staff) की नित्य उपलब्धता सुनिश्चित हो |

इस प्रकार का स्वावलंबी ग्रामविकास तभी संभव है जब शिक्षित, समरस, संगठित, शोषणमुक्त समाज स्थापित किया जाये | यह काम धार्मिक आयोजनों के माध्यम से सदियों से होता रहा है | यज्ञ, कथा, कीर्तन, जत्रा, उत्सव आदि के पारंपारिक आयोजन समाज को सुसंगठित करने के माध्यम रहे हैं | स्वावलंबी ग्रामविकास में इनकी महती भूमिका है | मठों, मंदिरों, धर्माचार्यों तथा सामाजिक संगठनों ने एकात्म स्वावलंबी ग्रामविकास के इस व्रत को अपनाया तो यह स्वप्न साकार होने में बहुत अधिक समय नहीं लगेगा | सरकार की भूमिका केवल उत्प्रेरक (catalyst) की रह जाएगी | रास्तें, भवन, तालाब, कैनाल, उर्जा संयंत्र, शिक्षा जैसी आवश्यक अधोसंरचनाओं (infrastructures) का निर्माण ग्रामीणों के माध्यम से सरकारी अनुदान के उपयोग से हो | बाकि आवश्यक संसाधन समाज के संबल से ही खडे किये जाये |

स्वावलंबी ग्रामविकास की प्रक्रिया भी शासनमुक्त, समाज पोषित व ग्रामीणों पर पूर्ण विश्वास रखनेवाली होगी तभी उचित परिणाम भी प्राप्त होंगे |

अक्टूबर 24, 2015 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , | 3 टिप्पणियाँ

Look beyond political controversy, Yoga is for all


Another Post as a precursor to IYD. This piece was written for bharatniti.in giving it here for the blog followers.

http://www.bharatniti.in/story/look-beyond-political-controversy-yoga-is-for-all/44

IYD

Yoga has been accepted universally as a discipline of moulding one’s own life to active overall well-being, accepting it as a way of life beyond faith, worship or religious dogmas. The same was evident when more than 170 countries across five continents unanimously supported the resolution for declaring June 21 as the International Day of Yoga at the General Assembly of the UNO.

IYD LogoMany of them proposed or seconded it without any voting or discussion. In fact, many of the Islamic countries too supported the resolution. Yoga is being practiced by people beyond the religious beliefs.

On this background of universal consensus, it is ironical that the decision of the central government to celebrate the International Day of Yoga all over the country is being opposed on religious grounds by some misguided elements. When the whole world is unanimous about the universal appeal of Yoga, it is a shame that this great science of living is being subjected to controversy in the land of its origin.

Social media is full of photographs of members of different communities performing Yogic exercises. The universal acceptance of Yoga is very much witnessed across different communities in India.

Controversy more of political concoction than popular

The present fabricated controversy over the celebration of the International Day of Yoga is the result of intolerant minds. Yoga is a science which demands experiments and experiences and does not ask one to believe or un-believe anything. The performance of Yoga does not affect any belief systems. If at all it will enhance ones capacity to have undeterred in one’s own beliefs. Yoga is necessarily an Bharatiya philosophy as it was first compiled in this holy land and has all the attributes of Sanatana Dharma because it was practiced, experimented and evolved into different systems by generations of Hindus. But it still is a universally applicable science of life and the art of living.

The practice of Yoga will not swerve the individual from his personal religious beliefs. It will also not make him antagonistic to his or any other religion but will, on the contrary, augment his affection for his personal deity. The practice of Yoga will not proselytize a Muslim or a Christian, but will on the contrary make him a better adherent of his faiths. Thus, no one should be afraid of Yoga as it includes all and excludes none.

So what is Yoga actually?

Yoga is beyond a mere physical exercise. In fact, Yoga is neither mere physical exercise nor is it just a therapy. As per the ancient traditions, it is a way of scientific living. A modern being may find it hard to comprehend but the mind is the prime factor of all our actions in life. And yoga is nothing but the training of the mind. Thus it (yoga) enables perfection in every action at all levels. The whole universe functions in disciplined manner. There are laws of existence which govern the natural phenomena irrespective of any subjective intervention. The only exception to this smooth governance of the universe are human beings.

The humans are endowed with the will to act and the power of imagination. The combination of these two have created all the scientific wonders. Like all kinds of powers, this also needs regulation. If uncontrolled, power becomes corrupt and boon is converted into a curse. This is true at individual as well as collective level.

Sage Patanjali, in his Yoga aphorisms, initiates with a simple statement – ath yoga anushasanam [Thus we begin the discipline of Yoga.] The aim of all the yogic practices right from Asanas, Suryanamaskara, Pranayamas up to Dhyana [meditation] and Samadhi is disciplining the mind. If the mind is concentrated, anything and everything can be accomplished.

Yoga is the way of orienting the mental powers to one’s aim. The conflicts and clashes in the world are a result of intolerance born out of lack of coordination among one’s own multiple roles. There are various schools of Yoga and they have different practices.

There are several variants of the same Yogic practice. Some well- meaning noble Acharyas even tried to standardize yogic practices. This futile effort has not succeeded as diversity is an inherent feature of existence. Everything that exists is unique in its form, function and role. Yoga not only takes into account this diverse uniqueness but also enriches the extraordinary individuality of the seeker, the performer. At the same time, yoga helps the sadhaka (practitioner, the doer) to realize the underlying oneness behind the apparent diversity.

So, whatever be the practice, if the mind is tuned properly with a synchronized awareness and relaxation, it integrates one with all. Essence is not in the action but in the intent. Yoga literally means union. Every practice that enables the mind to expand and unite the different levels of collectivity is Yoga. Yoga gives quietude, peace and harmony to the individual mind and if performed regularly by a sizable portion of the humanity, will spread this peace and harmony to the cosmic world.

One can say with full conviction that the mass performance of various Yoga practices on the historic occasion of the International Day of Yoga on June 21 will definitely lead to conflict free and harmonious world.

जून 18, 2015 Posted by | सामायिक टिपण्णी, English Posts | , , , , , , , , , , , , , , , , , , , | 2 टिप्पणियाँ

योग विद्या है भारतीय मनोविज्ञान


omभारतीय मनिषा ने अपने शोधकार्य का बहुत बड़ा अंश मन के बारे में अनुसंधान करने में लगाया है| मन की पहेली को अत्यंत गहराई में जाकर सुलझाने में हमारे पूर्वज सफल हुए| साधना में मन के नियंत्रण के महत्त्व के कारण यह अनुसंधान का विषय बना ही, उसके साथ ही भारतीय ऋषि यह भी जानते थे कि जड़ जगत पर भी मन के द्वारा ही नियंत्रण पाया जा सकता है | अंतर्जगत व बाह्यजगत दोनों में ही ज्ञानप्राप्ति का साधन मन है | अतः, इसको समझना, समझाना और वश में करना ऋषियों के लिए महत्वपूर्ण बना | परिणामस्वरूप इस हेतु एक सम्पूर्ण शास्त्र विकसित हुआ | मन को समझने और नियंत्रित करने के शास्त्र का नाम है – ‘योग’ | हम लोग अंग्रेजी शब्दों का भारतीय भाषाओं में अनुवाद करते समय अपने देशज ज्ञान परंपरा की ऐतिहासिक अनुभूतियों की ओर ध्यान दिए बिना नए शब्द गढ़ देते है | अंग्रेजी विषय Psychology का अनुवाद हमने मानसशास्त्र या मनोविज्ञान किया, जबकि, इस पूरी विद्या को अधिक प्रगल्भता से व्यक्त करनेवाला शब्द योग पहले से विद्यमान था | योग का अर्थ है – ‘जोड़ना’ | यह मन के स्वभाव और गति दोनों को समग्रता से प्रकट करता है| इस एकात्म नामावली में केवल सिद्धांत ही नहीं अपितु उसका प्रयोग भी निहित है | मन सर्वव्यापी होने के कारण चेतना के भिन्न-भिन्न स्तरों को जोड़नेवाला है | साथ ही इसके नियमन की प्रक्रिया भी जोड़ने से ही संपन्न होती है | दोनों ही अर्थों में मनोविज्ञान या मानसशास्त्र से योग यह अधिक परिपूर्ण पद है |

अंतर केवल शब्दों के अर्थ में ही नहीं है अपितु विषय की ओर देखने का दृष्टिकोण ही पूर्णतः अलग हो जाता है| पश्चिम का मनोविज्ञान जहां समस्याओं के समाधान के रूप में इस शास्त्र को देखता है वही भारतीय योगशास्त्र आनंदपूर्ण जीवन जीने की विद्या है | इसमें समस्या-समाधान की नकारात्मकता न होकर स्थायी सुख्प्राप्ति की भावात्मक दृष्टि है | यम – नियम योग के विधि निषेध नहीं है अपितु जीवन के वास्तव स्वरुप को समझाने का माध्यम है | सत्य, अहिंसा, असते अदि का पालन करना है यह तो हम बताते है पर क्यों? इस प्रश्न पर विचार नहीं करते | इस कारण यह अत्यंत कठिन काम लगता है | जबकि सत्य हमारा स्वाभाव है और हम असत्य केवल तब बोलते है जब हमें यह भ्रम होता है कि सत्य से काम नहीं चलेगा | सच बोलना सहज है स्वभावगत है | इसके उलट झूठ के लिए पूरी योजना बनानी पड़ती है | सारा क्लेश, तनाव असत्य के लिए है | सत्य तो सहज सरल होने के कारण आनंददायी है | यदि इस तथ्य का साक्षात्कार कर लिया जाये तो हम सहर्ष सत्यवादी हो जायेंगे | इस वास्तव को अनुभव करना योग है | अहिंसा अदि अन्य नियमों के बारे में भी यही सत्य है | जीवन में अधिकतम समय हम अहिंसा का ही पालन करते है | अधिकांश लोगों को यदि पूछा जय की अंतिम बार हिंसा कब की थी तो याद करना पड़ेगा | क्योंकि अहिंसा ही हमारा स्वाभाव है | अहिंसा तो भ्रम के कारन है | नियम भी इसी स्वाभाव के सामाजिक व्यवहार का नाम है | शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और इश्वर प्रणिधान हमें हमारे विस्तृत रूपों से जोड़ता है | समाज में सहज, अनुशासित और आनंदमय व्यवहार की कुंजी है नियम | योग का यह वास्तविक व्यवहारिक मानस शास्त्र है |

योग आपको कृत्रिम व्यवहार से भावनाओं के नियंत्रण को नहीं कहता अपितु सत्य के साक्षात्कार से जीवन को जानने का अवसर प्रदान करता है | इस सुदृढ़ आधार पर भावनाओं का उदात्तीकरण कर om suryaआनंदानुभुति करना जीवन का परमध्येय है | सभी प्रकार की योगविद्या व योगाभ्यास हमें चित्तशुद्धि के माध्यम से आनंद को अनुभव करने के लिए तत्पर करते है | मन ही इस अनुभूति का माध्यम है | मन से ही स्वाभाव के प्रति भ्रम है जिसने आनंद को रोक रखा है | पर मन ही आनंद की अनुभूति भी कर एकता है | अतः माण्डुक्य कारिका कहती है – मन एव मनुष्याणां कारण बंध मोक्षयो: | मन मनुष्य एके बंधन और मोक्ष दोनों का कारण बनता है | योग अनुशासन है – स्वप्रेरणा से पाला गया अनुशासन | पालन से प्राप्त होनेवाला आनंद ही अनुशासन की सच्ची प्रेरणा है | योग से प्राप्त अनुभवों से हम यह जानते है की जीवन मूल रूप से आनंदमय है और दुःख तो केवल भ्रम है| योग ज्ञानरूपी प्रकाश से इस आवरण को हटा आनंद के दर्शन कराता है | उपनिषदों में इस प्रक्रिया हेतु अत्यंत अद्भुत शब्द प्रयोग हुआ है – अपावृणु | आवरण को हटाने को अपावृणु कहते है | ऋषि प्रार्थना करता है, “सत्य का मुख स्वर्णिम पात्र से ढंका हुआ है, हे विश्व के पोषण करनेवाले सूर्य, उस आवरण को दूर कर हमें सत्यधर्म के दर्शन कराओं |”

हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्याsपिहितं मुखम् |

तत्त्वं पूषण अपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ||”

मन को जानने का शास्त्र और उसका जीवन में वैज्ञानिक प्रयोग करने की कला यह दोनों विश्व में सबसे पहली बार भारत में विकसित हुए | उपनिषदों की परंपरा में इस विषय पर अनेक बातें उपलब्ध है | पूरे शास्त्र को सुव्यवस्थित रूप में सूत्रबद्ध करने का कार्य महर्षि पतंजलि ने योग सूत्रों के माध्यम से किया | योग सूत्रों में केवल मन को नियमन में लाने की विधियाँ ही नहीं है तो इसके कार्य, संरचना और स्तर का भी अनुभूत विश्लेषण है | अंतःकरण चतुष्टय – मन, बुद्धि, चित्त तथा अहम् के रूप में मन के कार्यविभाग, मन की पांच वृत्तियाँ, विविध भूमियाँ आदि विस्तार से मन का अध्ययन योग शास्त्र करता है | मन के बारे में इतना सूक्ष्म एवं अचूक ज्ञान अभी आधुनिक मनोविज्ञान को भी नहीं है |

yoga 2अतः भारत ही विश्व को सबसे गहन, गंभीर व परिपूर्ण मनोविज्ञान का मार्गदर्शन प्रदान कर सकता है | वर्तमान में इस विषय में दो प्रमुख बाधाएँ है | एक तो हमारे विश्वविद्यालयों में मनोविज्ञान के रूप में योगशास्त्र का अध्ययन नहीं कराया जाता और दूसरी ओर समाज में योग का प्रचार व अध्ययन अध्यापन करनेवाले आचार्यों ने इसे केवल शारीरिक व्यायाम, श्वास का व्यायाम व रोगोपचार तक सीमित कर रखा है | कुछ गंभीर आचार्य आध्यात्मिक साधनाविधि के रूप में धारणा-ध्यान आदि का अभ्यास अवश्य कराते है किन्तु मनोविज्ञान अथवा मानसशास्त्र के रूप में योग विषय का शैक्षिक अध्ययन (academic) नहीं हो रहा है| अतः इस दिशा में शीघ्र व प्रामाणिक प्रयोग किये जाने आवश्यक है | पहला अनिवार्य कार्य तो है योग विषय में मनोविज्ञान के रूप में शोध कार्य | यह दो प्रकार से किया जाना चाहिए – एक तो प्राचीन योग साहित्य का मनोवैज्ञानिक दृष्टि से अध्ययन और अनुसन्धान तथा दूसरा योग के मानस शास्त्र का वर्त्तमान में उपचारात्मक प्रयोग कर शोध | दूसरा महत्वपूर्ण कार्य है भारतीय मनोविज्ञान का पाठ्यक्रम विक्सित कर उसको विश्वविद्यालयों में लागू करना | इस पक्ष में भी दो तिन प्रकार से तयारी आवश्यक है | स्नातक स्तर पर मनोविज्ञान विषय में भारतीय ज्ञान परंपरा का समावेश करना, परास्नातक स्टार पर भी कम से कम एक प्रश्नपत्र का भारतीय मनोविज्ञान के रूप में समावेश तथा भारतीय मनोविज्ञान में दो वर्षीय परा स्नातक पाठ्यक्रम का निर्माण यह तीनों कार्य करने होंगे | समुपदेशन (काउन्सलिंग) तथा समूह उपचार (ग्रुप थेरेपी) में भारतीय योग विद्या का उपयोग यह भारतीय मानसशास्त्र की पुनःप्रतिष्ठा की दिशा में अंतिम चरण होगा |

जून 15, 2015 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , | 6 टिप्पणियाँ

तंत्रनिकेतन नव्हे तंत्रशिक्षणाचा सर्वंकष विचार


Questionmarkगेल्या काही दिवसांपासून अभियांत्रिकी शिक्षणाबद्दल काही वेगळीच चर्चा सुरू झाली आहे. काही दिवसांपूर्वी महाराष्ट्राच्या शिक्षणमंत्र्यांनी केलेल्या विधानावर तरुण भारतात श्रीधर हरकरे यांनी ‘डिप्लोमा इंजिनीयरिंगचा दुरुपयोग’ शीर्षकाने प्रकाशित झालेले पत्र. पदविकाधारकांनी अभियांत्रिकी पदवी (बी. ई.) च्या द्वितीय वर्षात प्रवेश घेण्याला अपराधी स्वरूपात व्यक्त केले आहे. तीन वर्षे तंत्रनिकेतन (पॉलिटेक्निक) मध्ये पदविका शिक्षण घेतल्यानंतर पदवी पाठ्यक्रमात सरळ द्वितीय वर्षात प्रवेश घेता येतो. शिक्षण मंत्र्यांच्या मते गेल्या काही वर्षांत अशा प्रकारे प्रवेश घेण्यार्‍यांची संख्या वाढली आहे व ही परंपरा एकूणच तंत्र शिक्षणाकरिता अनुचित असल्याचा सूर या विधानात आहे. श्रीधर हरकरे तर याला पदविका अभ्यासक्रमाचा दुरुपयोग, असे नाव देतात. या निमित्ताने तंत्रशिक्षणाच्या एकूण व्यवस्थेचा सर्वांगीण विचार करण्याकरिता हा लेखनप्रपंच.

सध्या भारतामध्ये तंत्रशिक्षणाचे तीन स्पष्ट स्तर आहेत. प्रारंभिक पायरीवर औद्योगिक प्रशिक्षण संस्था (आय. टी. आय.) द्वारा प्रमाणपत्र अभ्यासक्रम चालवले जातात. कारखान्यातील कुशल श्रमिक तयार करणे हा सीमित उद्देश या स्तरावर आहे. दुसर्‍या स्तरावर तंत्रनिकेतनातील पदविका अभ्यासक्रमाचा उद्देश पर्यवेक्षण करण्यात तरबेज अशा श्रमिक नेतृत्वाचा पुरवठा उद्योगांना करणे हा आहे. कुशल व अकुशल श्रमिकांकडून व्यवस्थित, परिणामकारी कार्य करून घेण्याची जबाबदारी असलेला गटप्रमुख (फोरमन) किंवा पर्यवेक्षक (सुपरवायझर) तयार करणे हे तंत्र निकेतनचे उद्दिष्ट मानले जाते. पूर्वीच्या काळात पदविका प्राप्त तंत्रज्ञांना लक्ष देणार्‍यास ओव्हरसीयर म्हटले जायचे. आजकाल त्याचे नाव कनिष्ठ अभियंता (ज्युनिअर इंजिनिअर) करण्यात आले आहे.

तंत्रशिक्षणाच्या तिसर्‍या स्तरावर अभियांत्रिकीचे पदवी अभ्यासक्रम बी. ई, बी. टेक, बी. आर्किटेक्चर असे पाठ्यक्रम सध्या चालू आहेत. या स्तरावर अभियांत्रिकीचे सैद्धांतिक ज्ञान दिले जाते. प्रात्यक्षिक पण व्हावे अशी अपेक्षा आहे. परंतु सध्या व्यवहार ज्ञानापेक्षा सैद्धांतिक माहितीवर अधिक भर दिला जातो, असे आढळून येते. जेव्हा की वरिष्ठ अभियंत्यापासून मुख्य अभियन्त्यांपर्यंत सर्वांना प्रकल्प पूर्ण करण्यासाठी आवश्यक तांत्रिक नियोजन, क्रियान्वयन तसेच समस्या समाधान करावे लागते. यासाठी आवश्यक व्यवहारज्ञान पदवी अथवा पदव्युत्तर शिक्षणात मिळत नसून, काम करता करता अनुभवातून शिकावे लागत आहे. अभियांत्रिकी पदवीधारकाच्या योग्यतेबाबत अनेक सर्वेक्षणे वेळोवेळी केली जातात. त्यात आढळून आले की केवळ १७ ते २० टक्के विद्यार्थीच अभियंता बनण्याजोगे असतात. नव्वदच्या दशकानंतर अभियांत्रिकी महाविद्यालयाची संख्या कित्येक पटींनी वाढली, पण गुणवत्तेत सुधार झाला नाही.

भारतीय शिक्षण मंडळातर्फे ‘तंत्रशिक्षणाचे भारतीय प्रारूप’ या विषयावर देशात अनेक ठिकाणी मुक्त चर्चा घेण्यात आल्या. अनुभवी प्राध्यापक, प्राचार्य या चर्चेमध्ये सामील झाले. चर्चेत तंत्रशिक्षणाचे व्यावहारिक समीक्षण आपोआपच झाले. सर्वात महत्त्वाचा मुद्दा असा आला की, शिक्षक व विद्यार्थी दोघांनाही प्रत्यक्ष कार्यानुभव असणे चांगले अभियंते बनण्यासाठी अत्यंत आवश्यक आहे. तंत्रशिक्षकांनी सुट्यांमध्ये प्रत्यक्ष उद्योगात कार्यानुभव घ्यावा अशाही सूचना समोर आल्या. शिक्षकांनी आपल्या अनुभवाने एक महत्त्वाची बाब सांगितली- पदविका अभ्यासक्रम करून नंतर अभियांत्रिकी महाविद्यालयात प्रवेश घेणार्‍या विद्यार्थ्यांना संकल्पना जास्त चांगल्या स्पष्ट होतात व ते जास्त चांगले अभियंते सिद्ध होतात. या निष्कर्षाबद्दल सविस्तर चर्चा केल्यावर लक्षात आले की, तंत्रनिकेतनात व्यावहारिक प्रयोग करण्याची संधी विद्यार्थ्यांना अधिक मिळते. त्यामुळे त्यांना अभियांत्रिकी शिक्षणाचे सिद्धांत सहज उलगडतात. सरळ पदवी अभ्यासक्रमात प्रवेश घेणारे विद्यार्थी बारावपिर्यंतच विज्ञानाचा अभ्यास करत असतात व तंत्रज्ञानाची ओळख त्यांना महाविद्यालयाच्या प्रथम वर्षातच होते. त्याउलट दहावीनंतर तंत्रनिकेतनात शिकलेल्या विद्यार्थ्यांना तीन वर्षाचा तंत्रज्ञानाचा अनुभव मिळालेला असतो. एक वर्ष अभियांत्रिकीचे शिक्षण घेतलेला विद्यार्थी व सरळ द्वितीय वर्षात प्रवेश घेणारा विद्यार्थी याची तुलना केल्यास पदविका प्राप्त केलेला विद्यार्थीच सरस ठरतो.

प्रवेश परीक्षांची झालेली अधोगती सर्वांनाच ठावूक आहे. महाराष्ट्रासहित अनेक राज्यांनी प्रवेश परीक्षा रद्द केल्या आहेत व केन्द्रीय प्रवेश परीक्षेच्या गुणांवर अभियांत्रिकी महाविद्यालयात प्रवेश देणे प्रारंभ केले आहे. यामागील पृष्ठभूमी अशी की, गेल्या वर्षात प्रत्येक राज्यांमध्ये हजारोच्या संख्येमध्ये जागा रिकाम्या राहिल्या. प्रवेश परीक्षा (पी.ई.टी) मध्ये शून्य गुण असणार्‍यांना देखील प्रवेश मिळू लागला. अशा परिस्थितीत बारावी व प्रवेश परीक्षा या मार्गाऐवजी पदविका अभ्यासक्रम पूर्ण करून द्वितीय वर्षात प्रवेश घेणे याला सोपा मार्ग अथवा शॉर्टकट म्हणणे बरोबर वाटत नाही. उलट हा अधिक सुज्ञपणाचा मार्ग आढळतो. व्यक्तिगत स्तरावर आवश्यकता असल्यास तीन वर्षाच्या पदविकेनंतर पर्यवेक्षक व सदृश नोकरी किंवा छोटा-मोठा स्वरोजगार काढण्याचा पर्याय मोकळा असतो. परिवाराची ऐपत असेल तर पुढे पदवीचा अभ्यास घेण्याचा मार्ग देखील खुला असतो. देश व समाजाच्या दृष्टीने देखील पदविका अभ्यासक्रमात प्राप्त व्यवहारज्ञानाने संपन्न अभियंता अधिक कुशल व परिणामकारी असतो. शिक्षण व्यवस्थेत अशा प्रकारची लवचीकता कुठल्याही राष्ट्राला अधिक उपयोगी असते. म्हणून तंत्र शिक्षणाबद्दल पुनर्विचार करायचा झाल्यास केवळ पदविका अभ्यासक्रमाच्या उपयुक्ततेचा विचार न करता सर्व स्तरावरील तंत्रशिक्षणाच्या गुणवत्तेचा सर्वंकष विचार करावा लागेल.

Ruprekhaभारतीय शिक्षण मंडळाने चार हजाराहून अधिक शिक्षणतज्ज्ञांच्या विचारांना संपादित करून शिक्षणाचे समग्र व एकाग्र धोरण तयार करण्याचा प्रयत्न केला आहे. ‘भारतीय शिक्षण रूपरेखा’ ही पुस्तिका इंग्रजीसहित सर्व भारतीय भाषांमधे प्रकाशित केली आहे. देशातील सर्व जिल्ह्यांमध्ये या रूपरेषेवर चर्चासत्रे आयोजित होत आहेत. आठवीपर्यंत सोपे सामान्य शिक्षण घेतल्यानंतर प्रत्येकानेच कुठल्या ना कुठल्या कौशल्याचे प्रावीण्य प्राप्त करावे अशी अपेक्षा आहे. आठवी नंतर मोठ्या प्रमाणात विद्यार्थ्यांनी औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थेत (आयटीआय) प्रवेश घ्यावा. आठवी झालेले काही विद्यार्थी प्रत्यक्ष कामातही लागू शकतील. आयटीआय केल्यानंतरही स्वरोजगार किंवा नोकरीचे मार्ग सुलभ होतील. प्रत्यक्ष कामाचा अनुभव घेतलेल्या विद्यार्थ्यांना पुढे शिक्षणात आवड असल्यास त्यांना सेतू अभ्यासक्रमाद्वारे औद्योगिक शिक्षण संस्थेत किवा तंत्रनिकेतनात प्रवेश द्यावा. आयटीआय केलेल्यांपैकी काही जणांस तंत्रनिकेतनात प्रवेश घेण्यासाठी प्रेरित केले जावे. तसेच तंत्रनिकेतनातील बहुतांश विद्यार्थ्यांना पुढे अभियांत्रिकीचा मार्ग मोकळा असावा. दुसरीकडे आठवी नंतर नववी ते बारावीचे उच्च विद्यालयीन शिक्षण हा पर्याय निवडणार्‍यांना देखील या स्तरावर कमीतकमी एक औद्योगिक कौशल्य शिकणे अनिवार्य असावे, असा प्रस्ताव भारतीय शिक्षण रूपरेषेत करण्यात आला आहे. हे तांत्रिक कौशल्य पुढे व्यावसायिक महाविद्यालयात प्रवेशाचा भक्कम पाया ठेवेल. ज्याला पुढे विद्युत अभियंता व्हायचे असेल, त्यांनी नववी ते बारावी मध्ये विद्युत गृहकार्य कौशल्य म्हणून घ्यावे. ज्याला पुढे चिकित्साशास्त्राचा अभ्यास करून वैद्य (डॉक्टर) बनायचे आहे त्यांनी नववी ते बारावी मध्ये परिचर्या (नर्सिंग) या कौशल्याचा अभ्यास करावा. असे अनेक क्रांतिकारी उपाय रूपरेषेने सुचवले आहेत.

उभरत्या भारताच्या तरुणाईला प्रोत्साहन, दिशा व त्याचबरोबर योग्य कार्य द्यायचे असल्यास तंत्र शिक्षणाचा समावेश शालेय स्तरापासून करणे नितांत आवश्यक आहे. केवळ तंत्रनिकेतनाचाच नव्हे, तर तंत्रशिक्षणाचा सर्वंकष विचार करणे आज आवश्यक आहे.

अप्रैल 16, 2015 Posted by | सामायिक टिपण्णी | 1 टिप्पणी

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