उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

या देवी सर्व संघेशु कार्यपद्धति रूपेण संस्थिता …


पंचमी नवरात्रों की स्कन्द माता की पूजा

उत्तरापथ

संगठन की कार्यपद्धतिः
नवरात्री में आज की देवी स्कंदमाता है। तिथिक्षय के कारण आज पाँचवा दिन है। तिथिक्षय का भी विज्ञान होता है, पर वो फिर कभी| स्कंदमाता कुमार कार्तिकेय की माता के रूप में पार्वती जी का ही नाम है। तारकासुर के वध के लिये स्कंद सेनापति का जन्म हुआ था। इनको षण्मुखनाथ और कार्तिकेय के नाम से भी जाना जाता है। जन्म की कथा भी बड़ी रोचक है। महाकवि कालिदास ने ‘कुमारसम्भव’ में इसका अद्भुत वर्णन किया है। तारकासुर का आतंक बढ़ रहा था। भगवान विष्णु ने देवताओं को बताया कि शिवजी के पुत्र को सेनापति बनाओ तो विजय निश्चित है। पर शिवजी तो माता सति के देहान्त के बाद से अविवाहित है, अब कैसे होगा? हिमालय कन्या गिरीजा उनकी सेवा में रत है। उनको पति के रूप में वरण कर चुकी है। अब तप चल रहा है। पर कैलासपति तो ध्यान में रत बैरागी उनको कौन राजी…

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अक्टूबर 15, 2018 Posted by | Uncategorized | टिप्पणी करे

या देवी सर्वभूतेषु माया रूपेण संस्थिता . . .


नवरात्री पर जय माता दी

उत्तरापथ

संगठन की कार्य प्रणाली:
दूर्गा सप्तशति में मधु-कैटभ वध की कथा आती है। ये अत्यन्त रोचक रुपक है। दो असुर ब्रह्माजी के कान से निकले मैल से उत्पन्न हुए है। उग्र तपस्या से देवी का वरदान पा लेते है। वरदान पाकर उन्मत्त हो जाते है। फिर महाविष्णु उनका वध करते है। देवी की भूमिका असुरों को वर देने पर समाप्त नहीं होती। वे ही क्षीरसागर में शेषशैया पर लेटे विष्णु को सुलानेवाली योग निद्रा भी हैं। ब्रह्माजी के प्रयासों से जब विष्णु नहीं जगते तब वे देवी की प्रार्थना करते है। तब देवी महाविष्णु को जगाती है और असुर संहार के लिये प्रेरित करती है, असुरों की शक्ति तथा कमजोरी का परिचय दे कर मंत्रणा भी देती है।
कथा के रुपक में छिपे प्रतिकों को समझने से ही पुराणों का मर्म खुलकर सामने आता है। ब्रह्मा जी सृष्टिकर्ता है। वे सृजन में रत रहते है। विद्या की देवी सरस्वति के…

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अक्टूबर 15, 2018 Posted by | Uncategorized | टिप्पणी करे

या देवी सर्वभूतेषु धर्मरूपेण संस्थिता . . .


नवरात्री के लिए विशेष

उत्तरापथ

संगठन का कार्य: माता दूर्गा का जीवनकार्य महिषासुर का वध था। सारी रचना इसी बात को ध्यान में रखकर थी। यदि इस पुराण कथा के प्रतिक को समझने का प्रयत्न करते है तो संस्कारों का शास्त्र हमारे सम्मुख आता है। माता का वाहन सिंह है और शत्रु महिष अर्थात भैंसा। दोनों शक्ति के प्रतिक है। एक संयमित पराक्रम का उदाहरण है तो दूसरा विवेकहीन पाशविकता का। मनुष में ये दोनों बीज रुप में उपस्थित होते है। उसे अपने अंदर के सिंहत्व का पालन करना है और उसे अपने लक्ष्य की ओर जाने का वाहन, साधन बनाना है| अनियन्त्रित कामनाओं का भैंसा भी मन में समय समय पर कुलांचे भरता है। उसका मर्दन करना है।
समाज में भी संस्कारों की सिंहशक्ति और असामाजिक महिषशक्ति दोनों पर्याप्त मात्रा में होती है। संगठन को सज्जन-शक्ति को एकत्रित कर उसके पराक्रम का आह्वान करना है। मानवता के विरुद्ध कार्य करने…

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अक्टूबर 15, 2018 Posted by | Uncategorized | टिप्पणी करे

एक मन, विचार, संकल्प और स्वप्न


Navaratri day 2

उत्तरापथ

brahmacharini mataकेवल ध्येय और विचार ही उदात्त होने से काम नहीं चलता संगठन के साने दृष्टि भी उदार होना आवश्यक है। बड़े लक्ष्य लेकर चलने ही बड़े कार्य सम्भव होते है। यदि संग्ठन अपने सम्मूख लक्ष्य ही छोटा रख ले तो फिर उसका दायरा भी सीमित हो जायेगा। शक्तिपूजा हमें उदात्तता की ही प्रेरणा देती है। 1897 में जब भारत की स्वतंत्रता का भी को चिन्ह नहीं दिखाई दे रहा था तब स्वामी विवेकानन्द ने भारत के सम्मूख विश्वविजय का ध्येय रखा। 12 संन्यासी भाइयों से प्रारम्भ कर रामकृष्ण मठ को विश्व को हिन्दू संस्कृति व वेदान्त के संदेश का कार्य दिया। डा हेड़गेवार ने जब 1925 की विजयादशमी को कुछ मुठ्ठीभर बालकों के साथ संघ शाखा का प्रारम्भ किया था तभी उनके सम्मूख पूरे हिन्दू समाज के संगठन का लक्ष्य था। इन उदात्त विचारों ने ही चमत्कार किये है।

महान विचार के साथ लोग जुड़ते है तभी संगठन का स्वरूप…

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अक्टूबर 14, 2018 Posted by | Uncategorized | टिप्पणी करे

संगठन की घटस्थापना


कुछ वर्ष पूर्व नवरात्री पर लेखमाला लिखी थी| सबके अवलोकनार्थ पुनः प्रेषित …

उत्तरापथ

maa-shailputri1नवरात्री का शुभारम्भ! शक्तिपूजा का उत्सव! यह केवल शक्ति के आध्यात्मिक स्वरूप का पूजन नहीं है। वास्तव में हर स्तर पर ही शक्ति का ही असविष्कार जीवन के रूप में हो रहा है। अतः शक्तिपूजा तो जीवन का ही उत्सव है। उत्स से बनता है उत्सव। मन को जो उपर उठाये वह उत्सव। उपर उठने को ही उत्स कहते है। इसी से उत्साह शब्द भी बना है। जब मन उदात्तता का अनुभव करता है तब उत्साह होता है। उत्साह से ही मानव पराक्रम करने में सक्षम होता है। जीवन में जितना अधिक उत्साह होगा उतना ही महान कार्य हो सकेगा। उत्साह का निमित्त यदि भौतिक, शारीरिक या कि स्पष्ट कहे तो केवल ऐन्द्रिक होने से उत्साह क्षणिक और विध्वंसक हो सकता है। यही कुछ उधार के लिये आधुनिक उत्सवों में देखने को मिलता है। गणेशोत्सव व दूर्गापूजा जैसे पारम्पारिक त्योहारों पर भी इस उथली उफन का परिणाम गत कुछ वर्षों…

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अक्टूबर 10, 2018 Posted by | Uncategorized | टिप्पणी करे

Bharatiya Way to Celebrate the New Year


“Dosto countdown begins on 31st…Kesi he tayyari..!!”  This was the heading of this photo on the Face book wall of a teenager. I was stunned by this. One may feel that it is old-fa…

स्रोत: Bharatiya Way to Celebrate the New Year

जनवरी 1, 2017 Posted by | Uncategorized | 1 टिप्पणी

या देवी सर्व भूतेषु दायित्व रूपेण संस्थिता . . .


आज सप्तमी है ! उस अवसर पर लिखा पुराना लेख आज पुनः दल रहा हूँ | बदले सन्दर्भों में भी पूर्ण सार्थक

उत्तरापथ

दायित्व:
देवी भागवत में शुम्भ-निशुम्भ की कथा आती है। ये दोनों मधु-कैटभ के ही वंशज है। उनके वध का प्रतिशोध लेना चाहते है। अपना सशक्त साम्राज्य बना लिया है। ब्रह्माजी से तपस्या कर  वरदान पा लिया कि कोई नर चाहे मानव हो या पशु के हाथों मृत्यु नहीं होगी। उनको दम्भ है कि कोई मादा, नारी से क्या ड़र। वे माता की शक्ति से अपरिचित है क्योंकि स्त्री को मादा के रूप में ही देखते है। यह असुर विचार का एक लक्षण है। नारी को मादा के रूप में भोग का साधन समझना। भारतीय संस्कृति में हर बाला को माँ के रूप में ही देखा जाता है। आज सप्तमी है। कुमारी पूजा का दिन है। स्वामी विवेकानन्द स्वयं कुमारी के अन्दर दिव्यता के दर्शन कर कुमारी पूजा करते थे। कश्मिर में क्षीरभवानि में आसपास जब कोई हिन्दू बालिका नहीं थी तो नाववाले मुसलमान की बेटी की स्वामीजी ने कुमारी पूजा…

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अक्टूबर 8, 2016 Posted by | Uncategorized | टिप्पणी करे

कार्यकर्ता : कृपा कात्यायनी की . . .


2011 में मा परमेश्वरन जी के सान्निध्य में नवरात्री के हर दिन एक आलेख लिखा था | ये है षष्ठी का आलेख

उत्तरापथ

कार्यकर्ताः
बड़ी प्रचलित कहावत है, ‘‘भगतसिंह पैदा तो हो पर पड़ौसी के घर में।’’ देशभक्तों की सब प्रशंसा तो करते है पर उनके बनने की प्रक्रिया की प्रसव पीड़ा को कोई नहीं सहना चाहता। महान त्याग से ही महान कार्य सम्पन्न होते है। पर आज परिवार त्याग के स्थान पर अपने बच्चों को सुरक्षित मार्ग से सहज, सफल जीवन जीने का ही प्रशिक्षण दे रहा है। अपने तक रहो, दुसरों के बीच में मत पड़ना। सामने अन्याय होता दिखे तब भी लफड़े में मत पड़ना यह आज की माता का अपने लाड़ले लल्लू को सतत परामर्श होता है। वीरप्रसवा भारत भूमि में जीजाबाई जैसी मातायें कहाँ चली गई?

नवरात्री के छठे दिन की देवी कात्यायनी है। ऋषि कात्यायन का साहस देखो। देवी से इसी आग्रह के साथ तप किया कि मेरे घर जन्म लो। देवी को परिवार में धारण करने की तैयारी। घोर तपस से प्रसन्न हो देवी ने ऋषि…

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अक्टूबर 6, 2016 Posted by | Uncategorized | टिप्पणी करे

अहिंसा वीरों का व्रत है ।


गत माह असम के तीन जिलों में हिंसा का ताण्डव हुआ। सारा देश जानता है कि अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों द्वारा स्थानीय लोगों की जमीनों का कब्जे तथा जनसांख्यकीय असंतुलन के कारण यह भयावह स्थिति निर्माण हुआ। गत ३०-४० वर्षों में नियोजित रूप से बांग्लादेश से भारत में घुसपैठ जारी है । सरकारी अनुमान के अनुसार भी २ करोड़ से अधिक अवैध घुसपैठी भारत में रह रहे हैं। विशेषज्ञों के निजी अनुमान के साथ ही असम के पूर्व राज्यपाल जनरल सिन्हा द्वारा भारत के राष्ट्रपति को लिखे पत्र में यह कहा गया कि भारत में अवैध बांग्लदेशियों की संख्या ५ करोड़ के निकट है। सभी राज्यों में ये लोग पहुंच चुके हैं। किन्तु असम व पश्चिमी बंगाल के उत्तरी जिलों की स्थिति सर्वाधिक विकट है। जनसंख्या के इस अवांछित दबाव के कारण जहाँ एक ओर आर्थिक संसाधनों पर विपरीत परिणाम हो रहा है वही दूसरी ओर सांस्कृतिक सौहार्द में भी तनाव बढ़ता रहा है। जनगणना के आंकड़ें बताते हैं कि अनेक ग्रामों से स्थानीय हिन्दू जनता का पलायन हो रहा है। असम में हुए दंगों ने घुसपैठ की इस विघातक वस्तुस्थिति को देश के सामने उजागर किया। संसद में सभी दलों ने अपने मतभेदों को भूलाकर समस्या के भयावह स्वरूप को अधोरेखित किया। असम के मुख्यमन्त्री ने घोषणा की कि अवैध विदेशी नागरिकों की पहचान कर उन पर कार्रवाई की जायेगी। 
किन्तु सारे एकमत में खटास तब पड़ी जब हैद्राबाद के सांसद ने धमकी दे दी कि यदि विदेशी बांग्लादेशियों पर कार्रवाई की गई तो भारत का एक विशिष्ट समुदाय आतंकी बन जायेगा। इस विभेदकारी घोषणा ने समस्या को साम्प्रदायिक स्वरूप प्रदान कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि म्यान्मार व असम में घुसपैठ के विरोध में मुम्बई के आझाद मैदान में एक समुदाय के लोगों ने प्रदर्शन किया। संयमित पुलिस के विरूद्ध हिंसा का प्रयोग हुआ। सरकारी वाहनों के साथ ही प्रसार माध्यमों के वाहनों को भी जलाया गया। शहीद स्मारक को क्षति पहुँचाई गई। इसी हिंसा को आतंक के रूप में प्रयोग किया गया। अनाम लोगों द्वारा प्रसारित धमकियों के कारण पूर्वोत्तर के भाइयों को देश के अनेक नगरों से अपने घर की ओर वापसी करनी पड़ी। आंदोलनकारियों के हिंसक रवैये के कारण देश की सम्प्रभुता से जुड़े संवेदनशील मसले को साम्प्रदायिकता का रूप प्रदान कर दिया।
सामूहिक मानस में हिंसा के प्रति झुकाव बढ़ता हुआ ही दिख रहा है। अनेक आंदोलनों में इस प्रकार की असहिष्णु घटनाओं को देखा गया है। गुडगाँव में मारुति कारखाने के श्रमिकों के आन्दोलन में प्रबन्धन के प्रति इतनी हिंसा प्रगट हुई कि एक वरिष्ठ प्रबन्धक को जिन्दा जलाकर मार दिया गया। ओडिसा में एक आंदोलन में महिला पुलिस को अत्यन्त क्रूरता से मारा गया। वाहनों को जलाना तो हर आंदोलन की आम बात हो गई है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भरपूर प्रसिद्धि पाने के लिये इस प्रकार के दृश्यों को दोहराया जाता है । समाज में बढ़ती हिंसा केवल सामूहिक मानस ही नहीं है। व्यक्तिगत जीवन में भी हिंसा की घटनायें बढ़ रही हैं। सडकों पर क्रोध के प्रसंग रोज घटित हो रहे हैं। केवल अपने से अधिक गति से जानेवाला वाहन आगे बढ़ गया इस क्रोध से लोग हत्या तक कर देते हैं। घरों के अन्दर हिंसा की घटनायें बढ़ रही हैं। माता-पिता बालकों के छोटे से व्यवहार पर इतने अधिक क्रुद्ध हो जाते हैं कि उनको भयावह तरीके से दण्डित करते हैं। कई प्रसंगों में मरणांतक हमले हुए हैं। गत सप्ताह एक बालक को उसके शिक्षक ने इतनी दयाहीनता से पीटा कि उसका सिर फट गया। 
समाज में बढ़ती हिंसा के कई कारण है किन्तु सबसे मूल में है धारणा के स्तर पर भ्रम। अहिंसा के गलत अर्थ के कारण हम समाज में इस मूलभूत मूल्य को प्रस्थापित करने में असफल रहे हैं। अहिंसा के नकारात्मक अर्थ ने नई पीढ़ी को इसके मूल से दूर किया। आधुनिक समय में अहिंसा को प्रतिष्ठा प्रदान करनेवाले गांधी, विनोबा जैसे नेताओं ने अहिंसा को नकारात्मक रूप में परिभाषित किया था। ‘ हिंसा  ना करना ‘ अहिंसा का सही अर्थ नहीं है । अहिंसा कमजोरी अथवा अकर्मण्यता नहीं है अपितु एक वीर का व्यवहार है। भगवान महावीर ने भी अहिंसा के प्रतिष्ठित होने को ही वीरता का लक्षण बताया था। इस वीरता का अभाव ही क्रोध को जन्म देता है और उसी से हानी होती है। कलिंग के युद्ध के बाद प्रचण्ड प्राणहानी से विचलित सम्राट अशोक ने अहिंसा के सीमित अर्थ को अपनाया तथा उसे राजनयिक संरक्षण प्रदान कर समाज में कायरता का भ्रम स्थापित किया। गीता के प्रथम अध्याय में अर्जुन को यही भ्रम ग्रसित कर रहा है। किन्तु भगवान श्रीकृष्ण ने कर्म के योग का प्रतिपादन कर अर्जुन को युद्ध के धर्म का पालन करने के लिये तत्पर किया। आज अशोक का मानसिक भ्रम पूरे समाज का भ्रम बन चुका है जिसकी प्रतिक्रिया के रूप में व्यक्तिगत तथा सामाजिक जीवन में हिंसा बढ़ रही है। अत: अहिंसा के वास्तविक अर्थ को समाज में पुनर्स्थापित करना अनिवार्य है।
अहिंसा की व्युत्पत्ति अ-हिंसा ना होकर अहिं- सा है। इस भेद को समझने से ही इसकी सकारात्मक परिभाषा हो सकती है। सारी सृष्टि में एक व्यवस्था स्थापित है। जीवन एक चक्र के रूप में कार्य करता है। गीता के तीसरे अध्याय में इस चक्र का वर्णन किया है। सारे प्राणी अन्न के द्वारा जीवित रहते हैं। अन्न पर्जन्य अर्थात वर्षा के कारण उपजता है। सृष्टि में ऊर्जा को संतुलित रखने के लिये त्याग करने से ही ॠतुचक्र व्यवस्थित रहता है। इसे गीता में ‘यज्ञ’ कहा गया है। इस यज्ञकर्म से कर्म ब्रह्म से और ब्रह्म परमात्मा से प्रेरित है। इस प्रकार पूरे चक्र को ही जीवन कहा जाता है। हम अपने जीवित रहने के लिये इस चक्र में बाधा डालते हैं। मानव अपनी कर्म स्वतन्त्रता के कारण वह सर्वाधिक विनाश करता है। अत: उसे प्रयत्नपूर्वक सृष्टि के जीवनचक्र को प्रस्थापित करने के लिये कर्म करना पड़ता है। इस कर्म को अहिंसा कहते हैं । ‘अहिं’ अर्थात सुचारू  और  ‘सा’ का अर्थ है- बनें । तो जीवनचक्र को सुचारू करने का नाम अहिंसा है । इस अर्थ को समझने से मानव मानव से, मानव समाज से, राष्ट्र से और समूची मानवता तथा प्रकृति से भी सामंजस्य के लिये, जो भी पराक्रम करता है वह सब अहिंसा के आचरण में आयेगा । अत: प्रात: माता-पिता के चरण स्पर्श करना, पेड़ों को जल तथा गाय आदि पशुओं को अन्न देना सब अहिंसा के कार्य हैं। वास्तव में अहिंसा एक जीवनशैली है।
इसे जीवनमूल्य के रूप में समाज में प्रतिष्ठित करने के लिये कुछ पूरक मूल्यों को संजोना आवश्यक है। अहिंसा का पहला तत्व है- संवेदना। प्रत्येक के प्रति आत्मीयता के अनुभव से ही संवेदना जगती है। जब हम सबको अपने समान देखते हैं तब उनका कष्ट भी अपना हो जाता है। स्वामी विवेकानन्द विदेशों में सब सुविधाओं के मध्य भी अपने विपन्न बान्धवों का स्मरण कर रोते थे। यह संवेदना ही वीर के मन में अनुकम्पा का निर्माण करती है जो उसे सबके हित में कर्म करने के लिये प्रवृत्त करती है। संवेदनशील हृदय ही सुबह उठते ही धरती का पैरों से स्पर्श करने के लिये उससे क्षमाप्रार्थना करता है। दूसरा मूल्य है- सहनशीलता। जैसे, सब द्रव्यों के उबलने का एक तापमान होता है उसी प्रकार प्रत्येक के सहन करने की भी सीमा होती है। हमारे तप से हम इस सीमा को किसी भी हद तक बढ़ा सकते हैं। सहनशील व्यक्ति अन्याय का प्रतिकार अधिक शक्ति के साथ कर सकता है। वह अन्याय को सहन नहीं करता किन्तु उसका शिकार भी नहीं बनता। हम शिकार हैं, शोषित हैं, वंचित हैं, यह मानसिकता ही हिंसा को जन्म देती है। इस शिकार मानसिकता का व्यक्ति बड़ा ही कमजोर होता है और अपनी शक्तिहीनता को छिपाने हिंसा का आधार लेता है।
सर्वसमावेशकता का मूल्य भी सामूहिक स्तर पर  अहिंसा के पालन के लिये आवश्यक है। बढ़ती हुई मतांधता व कट्टरता के कारण हम भेद को स्वीकार नहीं कर पाते हैं। इस कारण मानव मानव के बीच के सुचारू जीवनचक्र को तोड़ देते हैं। अत: हम विविधता के उत्सव के द्वारा सबको स्वीकार करने की मानसिकता को जन्म दे सकते हैं। इसी से समाज के स्तर पर अहिंसा के वीरव्रत का पालन सम्भव है। भारतीय संस्कृति सबके अन्दर के वैविध्य को स्वीकार करती है। केवल अलग दिखने के लिये किसी को नकारती नहीं। इसी कारण विश्व को एक कुटुम्ब के रूप में देखने का साहस एक सच्चा हिन्दू कर सकता है। अहिंसा वीरों का व्रत है, अत: साहस के बिना इसका निर्वाह सम्भव नहीं है। स्वयं की क्षमता में आत्मविश्वास के साथ ही प्रयोगधर्मिता से साहस की समाज में वृद्धि हो सकती है। साहसी व्यक्ति ही वास्तव में अहिंसा का पालन कर सकता है। समाज का साहस टूट जाता है तब वह अकरणीय उपायों का अंगीकार करता है। अत: व्यक्तिगत जीवन के साथ ही सामूहिक जीवन में भी साहस का संस्कार अqहसक जीवन पद्धति के लिये अनिवार्य है। अहिंसा वीरों की जीवनशैली है जिसका उद्देश्य सबके कल्याण का होता है।

अक्टूबर 2, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी, Uncategorized | , | 7 टिप्पणियाँ

समर्पण का सम्मान


अनेक वर्ष पहले विवेकानंद केंद्र की हिंदी मासिक पत्रिका “केंद्र भारती” में ये लेख लिखा था| पिछले दिनों नागपुर के साप्ताहिक “भारतवाणी” ने इसे पुनः प्रकाशित किया| मित्रों के आग्रह पर यहाँ प्रकाशित कर रहे है| – उत्तरापथ

“ये अपने केन्द्र में भी पक्षपात होता है ! कुछ लोगों को अधिक महत्व मिलता है, भले ही उनमें योग्यता कम हो ।” अनीश खीजता हुआ-सा बोला ।

रजत बात से सहमत था, “चापलूसी करते हैं न उनको महत्व मिलता है ।”

“नहीं । मैं यह नहीं कह रहा था । मुझे लगता है, महत्व उन्हें मिलता है जो जीवनव्रती बन सकता है । अन्य कोई कितना भी योग्य क्यों न हो, यदि वह जीवनव्रती नहीं बननेवाला है तो उसे महत्व नहीं मिलेगा ।” अनीश ने बात स्पष्ट की ।

दोनों को ध्यान ही नहीं था कि भाईजी कब कक्ष में आ गये ! भाईजी ने खाँसकर उनका ध्यान आकर्षित किया ।

“अनीश ! तुमने सही कहा ! ऐसा तो है ही, पर क्या तुमने इसके कारण पर चिन्तन किया है ? ऊपर से यह पक्षपात लगता है । ऐसे ही पक्षपात का आरोप श्रीकृष्ण पर भी लगा था ।”

अनीश व रजत झेप गये व दत्तचित्त हो सुनने लगे । ” एक बार गोपियों के मन में आया- ये बांसुरी देखो, कैसे सदा कृष्ण के साथ रहती है और वह भी देखो, कैसे उसका लाड करता है ! ऐसा क्या है इस बंसी में जो मोहन के मन को मोह लिया, उसके अधरों पर स्थान बना लिया ?”

सारी गोपियाँ बंसी के पास गईं और उसे लगीं अपमानित करने, “अरी मुरलिया, तू क्यों ऐसे इठलाये ? दो कौडी की तू बाँसुरी, कृष्ण-संग से इतना इतराये ! ऐसा तुझमें है ही क्या जो कृष्ण की स्नेह-भाजन बने ? वह तो उस साँवरे की कृपा है जो तुझ जैसों को भी अपनाता है ।”

बंसी कृष्ण-स्वर का साधन है । उसके लीला का उपकरण है । बंसी जानती है उसका अपना कोई स्वर नहीं, संगीत नहीं, मोल नहीं । सब कुछ कान्हा का है । पर यह कान्हा का स्नेह अकारण नहीं है, वह उसने अर्जित किया है ।

हम सभी ईश्वरीय उद्देश्य के उपकरण बन सकें, इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि, हम बंसी बनने की प्रक्रिया को समझें, उस पर आचरण करें’, भाईजी ने कथा को वर्तमान सन्दर्भ से जोडा । सभी लोग सावधान हो सुनने लगे । अब तो उनकी अपनी बात हो रही थी ।

बंसी ने अपने इस पडाव तक पहुँचने की यात्रा का वर्णन आरम्भ किया, वह बडी विनम्रता से बोली, ”  ऐसे ही नहीं कान्हा ने मुझे अपनाया ! मैंने भी खूब सहा है । बिना तप के कृष्ण-स्वर नहीं बजते जो आप सुनते ही आकर्षित हो भाग आती हो ।”

मेरे निर्माण का, साधना का पहला चरण प्रारम्भ हुआ- मोहमर्दन से ! मेरे हरे-हरे होते हुए यौवन में ही मुझे अपने कुटुम्ब-बाँस के पेड से अलग किया गया । क्षुद्र मोह से नाता तोडा गया । मेरे अनावश्यक भाग को काट कर अलग कर दिया, फिर खण्ड-खण्ड कर दिया ।

” ईश्वरीय उपकरण बनने के लिये समस्त मोह जनक, अधोगामी क्षुद्रता का त्याग करना पडता है । सदा स्नेहमय कृष्ण मुरारी हमें अपनाये, इसलिए हमें अपने शरीर मय नातों को तोडना होगा । अनन्त से नाता जोडने के लिए जडता को छोडना होगा ।” भाईजी ने कार्यकर्ताओं को स्पष्ट किया।

बंसी कह रही थी, ” यह तो केवल प्रारम्भ है । फिर मुझे रेत में तपाया गया । हरा होते हुए तोडा गया, क्योंकि किशोर तरुण ही राष्ट्रकार्य के लिए ज्यादा उपयोगी होते हैं पर उनके बचपने को तो पकना पडेगा । मजबूती तो तब ही आयेगी । तपकर पक्व बाँस ही बांसुरी बन सकता है । परिपक्व चित्त में ही ईश्वरीय संगीत झंकृत हो सकता है । जैसे पके फल से ही रस झरता है । कृष्ण भक्ति तो रसमय है, मधुर है ।

तीसरे चरण में बाँस की गाँठें घिसी गईं । गाँठें न घिसे तो स्वर कैसे बजेगा ? ईश्वर-प्रदत्त कार्य का कार्यकर्ता बनना है तो अपनी गाँठें घिसनी पडेंगी। अपने अहंकार से उत्पन्न राग-द्वेष की गाँठें प्रिय-अप्रिय गाँठें, क्षुद्र मान-अपमान की गाँठें जो उनका होना चाहे, उसे तो विस्तारित होना चाहिए, उदार होना चाहिए ।”

” इसलिये कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण से पूर्व, उनकी आदतों को मुलायम करना पडता है । गाँठें घिसेंगी तो स्वर बजेगा । गाँठें होंगी तो लट्ठ बजेंगे ।” सभी हँस पडे ।

” आजकल नाक इतनी बढ गई है कि घर-घर में लट्ठ बज रहे हैं ।” सोनू ने टिप्पणी की ।

“हाँ, गाँठें घिसने से बाह्य आचरण विनम्र हो जाएगा । पर यह तो अहंकार का केवल बाह्य रूप है । यह घिस जाए व बाँस अन्दर से भरा रहे भूसे से, तब भी बाँसुरी नहीं बजेगी ।”

भाईजी सबको गहराई में ले जाना चाहते थे । कथा आगे बढी । बंसी बोली, ” बंसी बनने के चौथे चरण में तो मुझे अन्दर से खोखला किया गया । कुचर-कुचर कर मेरे अन्दर के भूसे को निकाल दिया गया । जब आर-पार खोखली हो गई, जब अहंकार लेशमात्र भी नहीं रहा, तब मैं बंसी के स्वर हेतु वायु का प्रवाह बनने को तत्पर हुई ।”

अभी तपस्या समाप्त नहीं हुई है । ईश्वरानुरागी बनना है, उनका परम प्रेमस्पद बनना है तो आपको इन्द्रधनुषी योग्यताएँ अर्जित करनी होंगी, गरम सरिये से खोखले बाँस में छः स्वर-छिद्र किये गये । यह ईश्वरीय उपकरण की दिव्य विशेषताएँ हैं ।

भगवान श्रेष्ठता में प्रकट होते हैं । यदि हम अपने जीवन द्वारा ईश्वर को प्रकट करना चाहते हैं तो हमें योग्यताएँ अर्जित करनी होंगी, विविध योग्यताएँ । कार्यकर्ता हर कार्य में दक्ष होना चाहिए, कुशल एवं निपुण होना चाहिए उसे सदा अपने आप को श्रेष्ठ बनाने हेतु प्रयत्नशील रहना चाहिए।

अब भी बंसी नहीं बजेगी । योग्यता के अर्जन मात्र से ईश्वरीय कार्य का हेतु बनना सम्भव नहीं है । मानवी मन की दुर्बलता है कि योग्यता के साथ ही अहंकार भी बढता है । इस अहंकार से स्वर नहीं बज सकते । अतः समस्त खूबियाँ, जीवन में उपार्जित क्षमताएँ समर्पित होनी चाहिए । बंसी के सन्दर्भ में यह समर्पण है- ” फूँक मारने का छिद्र । इसके बिना तो बाँसुरी बज ही नहीं सकती । यह पूर्ण ईश्वर चरण में निवेदन ही बंसी को कृष्ण-स्वर प्रकटन का अधिकार देता है; सदा कान्हा के संग का अवसर प्रदान करता है ।”

” यह समर्पण ही कार्यकर्ता की योग्यता का मापदण्ड है । उसमें कितनी भी शारीरिक बौद्धिक या मानसिक क्षमताएँ हों, यदि समर्पण का भाव न हो तो उसका मूल्य नगण्य है । समर्पण ही ईश्वरप्रकटन का आधार है । अतः केन्द्र-कार्य जैसे सत्कर्म में लगे व्यक्ति को मिलनेवाला महत्व उसके समर्पण के अनुपात में होगा । इसे ही तुम जीवनव्रती बनने की सम्भावना कहकर अभिव्यक्त कर रहे हो ।” भाईजी आविष्ट से बोल रहे थे ।

” और यदि कोई अपने जीवन भर के लिए व्रतस्थ होकर रहने को तत्पर है तो वह सम्मान योग्य है । समाज में भी इस बात की प्रतिष्ठा होना आवश्यक है । समाज आत्मकेन्द्रित होता जा रहा है । क्षुद्र जीविकोपार्जन ही जीवनलक्ष्य होता चला जा रहा है । माता-पिता भी अपने पुत्रों से पशुवत पेटपालन की ही अपेक्षा करने लगे हैं – समाज का यह परिदृश्य बदलना होगा ।”

समर्पण का ही सम्मान होना चाहिए । आइये ! इस योग भूमि में हम त्याग व समर्पण को परम्परा के रूप में कायम करें ।

मई 5, 2012 Posted by | Uncategorized | , | 6 टिप्पणियाँ

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