उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

आइये अपने भीतर के अर्जुन को जगाएं !


bibhishanधर्म अधर्म का युद्ध शाश्वत है| यह महाभारत हर काल में लड़ा जाता है | व्यक्तिकेंद्रित विचार करनेवाले स्वार्थी अपने निजी हितों, स्वार्थों के लिए कौरव सेना में एकत्र आ जाते है | उदात्त विचार और चरित्र के धनी भीष्म पराक्रमी भी अपने व्यक्तिगत प्रतिज्ञा में बंधे प्रतिष्ठा के दास बन जानबूझकर अधर्म की सेना में सम्मिलित हो जाते है | उपकारों के मायावी बोझ के टेल दबे गुरु मन से धर्मराज को आशीर्वाद देते हुए भी अपनी छद्म निष्ठा के चलते चक्रव्यूह रचते है | उधर धर्म की और से लड़नेवाली सेना में भी व्यक्तिगत आकाँक्षाओं, प्रतिज्ञाओं, प्रतिशोधों का व्यापर है ही | सब एकमन से एक लक्ष्य को लेकर लड़ रहे हो ऐसा नहीं होता | फिर भेद क्या? क्यों पांडवों का पक्ष धर्म का और कौरवों का अधर्म का ?? अन्याय का प्रतिकार कर रहे इसलिए? द्रौपदी के अपमान का प्रतिशोध ले रहे इसलिए? अपनी न्यायोचित भूमि को पाने के लिए युद्ध कर रहे इसलिए?? नहीं …..
पांडव पक्ष को धर्म पक्ष बनाता है केवल एक सारथी — कृष्ण | उसका धर्म सन्देश कुरुक्षेत्र के बांधव भेद को धर्मयुद्ध में परिवर्तित कर देता है | Bhagawad Gitaमहाभारत के युद्धारम्भ में यदि गीता न होती तो ये भी केवल दो भाइयों का कुल-संघर्ष ही रह जाता | गीता का कर्मोपदेश धर्म्स्थापना का चिरंतन सन्देश है | यदि गीता हमारे साथ है तो हमारे समस्त व्यक्तिगत उद्देश्य उदात्त बन जाते है | हम धर्मस्थापना के उपकरण बन जाते है | गीता का सार उसके पहले और अंतिम शब्द में छिपा है | गीता का प्रथम श्लोक युद्ध का मूल कारण जिसका पुत्रमोह बना उस धृतराष्ट्र के मुख से है – धर्म क्षेत्रे कुरु क्षेत्रे … | प्रथम शब्द है धर्म | गीता का अंतिम श्लोक ज्ञात इतिहास के प्रथम दूरदर्शी संवाददाता संजय का कहा है – यत्र योगेश्वरो कृष्ण यत्र पार्थो धनुर्धरः | तत्र श्री विजयी भूति धृवा नीतिर्मतिर्मम || अंतिम शब्द हुआ मम | गीता का विषय है – मम धर्म | मेरा धर्म – स्वधर्म | किसी भी परिस्थिति में क्या करणीय है यह गीता बताती है | व्यक्तिकेंद्रित विचार से समष्टिगत विचार की और प्रेरित कर धर्म मार्ग का मार्गदर्शन गीता कराती है |
विश्व में जो कुछ भी अस्तित्व में आया है उसका उद्देश्य होता है | निर्जीव मानव निर्मित वस्तुओं के इ निर्माण का उद्देश्य होता है | महँगी से महँगी कार भी केवल स्वयं के वाहन का साधन नहीं है | वह चालक व यात्रियों को गंतव्य में पहुचने के लिए बनी है | कुर्सी किसी और को आराम पहुँचाने का कार्य करने के लिए बनायीं गयी | स्वयं नहीं आराम करती | जब इन वस्तुओं का निर्माण भी औरों की सेवा के लिए है, उनके अस्तित्व का उद्देश्य परहित है तब जीवितों में अपने आप को सर्वश्रेष्ठ मानने वाला मानव स्वार्थी कैसे हो जाता है?? यह स्वबोध के आभाव के कारण है | गीता के प्रारंभ में अर्जुन इसी रोग से पीड़ित है | युद्ध को अपने व्यक्तिगत हित का साधन समझाने के मोह (भ्रम) के IACकारण अपनों को मरने के शोक से विषद ग्रस्त हो जाता है | पूरी गीता में कृष्ण ने उसे अपने कर्तव्य की ओर प्रेरित किया है | स्व-धर्म का बोध यही है | समष्टि की ओर व्यक्ति का कर्तव्य | जब यह बोध हो जाता है तब कोई मोह नहीं होता | भय और शोक का मूल भ्रम में है | भगवान ने गीता में अनेक प्रकार से इस धर्म का मार्गदर्शन किया है | अर्जुन को निमित्त बना कृष्ण ने पूरी मानवता को ही जीवन जीने का मार्ग बताया है |
वर्तमान समय में सारा विश्व ही अपने स्वबोध के बारे में भ्रम में है | बाह्य चकाचौंध से बाधित दृष्टि के कारण अपने सत्य परिचय को खो बैठा है | सारे कष्ट, तनाव, अपराध, हिंसा, साम्प्रदायिकता, आतंक, लूट के मूल में यह स्व-भ्रम (Identity Crisis) है | व्यक्ति स्वयं से ही भाग रहा है | divyam dadami thay chakshuउपासना में भी आडम्बर का बढ़ता महत्त्व इसी पलायन का द्योतक है | अब्राहम के वंशजों द्वारा प्रसारित रिलिजन तो केवल संख्या व राजनयिक प्रभाव की वृद्धि के लिए सतत संघर्ष को ही धर्म युद्ध मान कई शतकों से मानव रक्त को बहा रहे है | पर्यावरण को भी भोग का साधन मानने की भूल इसी स्वभ्रम के कारण है | यह सब धरती को निरर्थक विनाश की ओर ले जा रहा है | विनाश तो महाभारत में भी हुआ | पर निरर्थक नहीं | गीता ने युद्ध को सार्थकता को प्रदान की | इसीलिए युद्ध के बाद धर्मस्थापना हुई और सदियों तक सर्व-सुखकारी शांति की प्रतिष्ठा भी |
गीता आज भी जीवित है | योगेश्वर कृष्ण आज भी हम सब को मार्गदर्शन देने के लिए तत्पर है | क्या हम अर्जुनत्व जगाने को तैयार है ? दुसरे अध्याय के सातवे श्लोक में अर्जुन शिष्यत्व ग्रहण करता है | शिष्यस्तेहम शाधि माम् त्वां प्रपन्नं | अपने दोषों को स्वीकार कर शिष्यत्व ग्रहण करने से गीता प्रगट होगी | क्या हम इसके लिए तैयार है??

दिसम्बर 2, 2014 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , | 2 टिप्पणियाँ

धर्म का मर्म


कर्मयोग 11:
धर्म के आचरण को मानव का सबसे बड़ा रक्षक और साथी माना जाता रहा है। रामायण में जब राम वनवास में जाने से पूर्व माता कौसल्या का आशिर्वाद ग्रहण करने जाते है तो माता यही आशिर्वाद देती है। यदि आज तक तूमने जीवन में धर्म का पालन किया है, तो वह निर्वाह किया हुआ धर्म सभी संकटों में तुम्हारी रक्षा करेगा। धर्मो रक्षति रक्षितः। जो धर्म की रक्षा करता है धर्म उसकी रक्षा करता है। महाभारत युद्ध से पूर्व जब दूर्योधन अपनी माता गांधारी का आशिर्वाद लेने जाता है तब वह भी यही तत्व बताती है। माँ द्वारा युद्धोत्सुक पूत्र को दीर्घ जीवन का आशिर्वाद दिये जाने पर दूर्योधन आश्चर्य से पूछता है। आपने मुझे विजय का आशिर्वाद नहीं दिया? तब माता उत्तर में धर्म का मर्म बताती है – श्रृणु मुढ़ः। यतो धर्मः ततो जयः। यतो कृष्णः ततो धर्मः। हे मूर्ख सुन, जिस पक्ष में धर्म होगा उसी की विजय होगी। और जहाँ स्वयं कृष्ण है वही धर्म होगा। जब मानव धर्म के मर्म को स्वयं के जीवन में उतार लेता है तब उसका कर्म ही धर्म का मापदण्ड़ बन जाता है। वह स्वयं धर्म का मूर्तिमंत रुप बन जाता है। वाल्मिकी रामायण में कहा है – रामो विग्रहवान धर्मः। राम मूर्तिमन्त धर्म है।

गीता का प्रारम्भ ही धर्म शब्द से होता है। धर्मक्षेत्रे कुरूक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।गी 1.1। धर्म का क्षेत्र, और उसका नाम है कुरूक्षेत्र। कुरू का अर्थ है ‘करो’। अर्थात जो कर्म का क्षेत्र है वही धर्म का क्षेत्र है। संस्कृत में शब्दों का क्रम बदल कर भी अर्थ समान रहता है। अतः इसी पंक्ति को एसे भी समझ सकते हैं। क्षेत्रे क्षेत्रे धर्मं कुरू। अर्थात जीवन के हर क्षेत्र में धर्म का आचरण करों। यह तो पूरी गीता का ही सार हुआ। गीता में क्षेत्र का भी अर्थ विस्तार से समझाया है। पूरा 13 वा अध्याय ही क्षेत्र व क्षेत्रज्ञ के बीच में भेद व सम्बन्ध के बारे में है। क्षेत्र का एक अर्थ है खेत। खेत शब्द की उत्पत्ती ही क्षेत्र से हुई है। उच्चारभेद में क्ष का ख होना सामान्यसा भाषाशास्त्रीय नियम है। गीता पूरे जगत को ही खेत कहती है और ईश्वरीय आत्मतत्व है जो इस खेत में खेती करने वाला किसान है। गीता में इसे क्षेत्रज्ञ कहा है- खेत को जानने वाला। कर्म की खेती में धर्म के नियम लागू करने से ही जीवन में आनन्द व मुक्ति की फसल पा सकेंगे।

आधुनिक समय में धर्म का अर्थ सीमित कर दिया है इसी कारण जब गीता में धर्म की बात होती है तो उसे समझने में कई बार भूल हो जाती है। यह नहीं कहा जा सकता कि इतिहास में कब से धर्म को मत, सम्प्रदाय अथवा पंथ के पर्यायी के रुप में देख जाने लगा, किन्तु गीता में इस पद का प्रयोग इस अर्थ में एक बार भी नहीं हुआ है। भारतीय संकृति में जीवन के शाश्वत अर्थात समयातीत, सभी युगों तथा देशों में लागू होने वाले नियमों को सनातन धर्म कहा गया। इसमें व्यक्ति का व्यक्ति से, व्यक्ति का समष्टि अर्थात सब प्रकार की सामूहिक रचना यथा जनजाति, समाज या राष्ट्र से, व्यक्ति व समष्टि का सृष्टि अर्थात सम्पूर्ण प्राणी व वनस्पति जगत के साथ ही समस्त पर्यावरण के साथ सम्बंधों के बारे में शाश्वत नियमों को जानकर उनपर आधारित जीवनरचना को साकार किया गया। यह पूरी समझ वैज्ञानिक होने के कारण ही सबके लिये समान थी केवल इसकी बाह्य अभिव्यक्ति देश काल के अनुसार विविध हो सकती है। इस सत्य को समझने के कारण ही भारत में विविधता के कारण संघर्ष के स्थान पर समारोह होता है। विविधता का केवल सम्मान ही नही पूजन किया जाता है। इन्ही नियमों में व्यक्ति तथा समष्टि के परमेष्टि अर्थात सर्वव्यापी परमसत्ता से सम्बन्ध को भी परिभाषित किया गया। सम्भवतः इसी अंग के कारण जब संकुचित उपासना पद्धति आधारित सम्प्रदायों से सामना हुआ तब उनकी पंथानुभूति को भी इसी विविधता में से एक समझा गया। पर यह तो भारतीय मूल के सम्प्रदायों की समझ थी जिसे अन्य कट्टर तत्वधारी संकीर्ण मत नहीं मानते थे। हमारे इतिहास में इन मतों के आक्रमणों को ना समझ पाने के कारण बड़ा नुकसान हुआ है। अतः धर्म का अर्थ ठीक से समझना आवश्यक है। सबसे पहले तो यह स्पष्ट कर लेना आवश्यक है कि अंगरेजी के शब्द Religion का अनुवाद धर्म नहीं हो सकता। उन्हें पंथ अथवा मत कह सकते है। भगिनी निवेदिता ने इस भेद को स्ष्ट करने के लिये अंगरेजी में पुस्तक लिखी – Religion and Dharma जिसका हिन्दी अनुवाद कार्यकर्ताओं के लिये ध्येयमार्ग में अत्यंत उपयागी है इसीलिये हिन्दी में इस पुस्तक का शीर्षक है -‘पथ और पाथेय’

जीवन के सनातन नियमों को धर्म कहते हैं। इस विशाल समझ को हम कुछ वैज्ञानिक भागों में विश्लेषित कर ठीक से जान सकते है। इससे यह भी स्पष्ट होगा कि किस प्रकार भिन्न भिन्न सन्दर्भ में धर्म का लाक्षणिक अर्थ अलग अलग छटा के साथ प्रयोग में आता है। जीवन को समझने में जगत की अभिव्यक्ति के सभी अंगों को उनके वास्तविक स्वरूप में जानना होता है। जब वस्तु के वास्तविक रुप अर्थात स्वभाव की समझ को बताना होता है तो उसे उस वस्तु का धर्म कहते है। जैसे अग्नि का धर्म है दाहकता। अब यहाँ आग की जलाने की क्षमता व स्वभाव को दर्शाने के लिये धर्म पद प्रयुक्त हुआ। इसी अर्थ में हम रसायनशास्त्र में जब भिन्न भिन्न रसायनों का वर्णन करते है तो कहते है ये प्राणवायु के गुणधर्म है। यहाँ धर्म गुण अथवा स्वभाव के रुप में प्रयोग हुआ है। जीवनमें उस वस्तु, व्यक्ति अथवा समूह के सम्बन्ध को परिभाषित करने के लिये उसके सनातन गुण या स्वभाव को समझना आवश्यक है इसिलिये यहा धर्म पद का प्रयोग उचित ही है।

केवल वस्तु के स्वभाव को ही नहीं मानव के विशिष्ट स्वभाव को भी धर्म ही कहा गया है। गीता इसी को स्वधर्म कहती है। स्वधर्म ही मानव कोअपने पशुवत् वृत्तियों को नियन्त्रित करने की क्षमता प्रदान करता है और अपने जीवन का समग्र विकास करने का मार्ग प्रदान करता है। इस अर्थ में धर्म आत्मविकास का मार्ग है। पशुमानव से मानव, मानव से महामानव व महामानव से दिव्य मानव और अन्ततः साक्षात दिव्यता को ही प्राप्त करने का मार्ग धर्म है। इसी सन्दर्भ में स्वामी विवेकानन्द कहते है, ‘‘आत्मसाक्षत्कार ही धर्म है।’’ और विस्तार से इसका विवरण भी वे देते है, ‘‘प्रत्येक जीव में अन्तर्निहित दिव्यत्व है। इस दिव्यता को जीवन मे प्रगट करना ही जीवन का लक्ष्य है। प्रकृति के अन्तर्बाह्य नियमन से ही यह सम्भव है। ज्ञानयोग वा भक्तियोग, राजयोग वा कर्मयोग इन चारों में से एक अथवा अनेक या कि सभी के आचरण द्वारा मुक्त हेाना ही धर्म का मर्म है। बाकि सारी बाते जैसे पुस्तकें, परम्परा, उपासना के नियम, मंदिर, मठ यह सब तो गौण उपचार मात्र है।’’ धर्म के इसी अर्थ का विपर्याय होकर इसे केवल उपासना पद्धति के रूप में उसे संकुचित कर देख गया। एक ईश्वर, एक दूत व एक ग्रंथ पर आधारित मत अपने को ही समग्र मान कर अंतिम सत्य के रूप में प्रचारित करने लगते है। इसी एक मार्ग से मुक्ति सम्भव है इस विश्वास को लेकर पूरे विश्व को ज्ञान अथवा शस्त्र बल के आधार पर अपने मत में मतांतरित करने का प्रयास करते है। इससे ही पूरे विश्व में संर्घष व आतंक का प्रादुर्भाव हुआ है। ऐसे मतों के समकक्ष वैज्ञानिक विचार पर आधारित सदा गतिमान सनातन धर्म अथवा वर्तमान में प्रचलित इसके नामाभिधान हिन्दूत्व को नहीं रखा जा सकता। जो थोथी पंथनिरपेक्षता के चक्कर में इस्लाम, इसाई, यहुदी, पारसी आदि पंथों के साथ ही हिन्दू धर्म की तुलना करते हुए सबको समान बताते है वह सत्य से कोसों दूर है। दिखवटी समानता के प्रचार के स्थान पर इनके तुलनात्मक अध्ययन से इनके भेद को समझकर स्वीकार करना ही शांति का स्थायी मार्ग है। हमारे ऋषियों ने इसीका प्रतिपादन किया था – ‘एकं सत् विप्राः बहुदा वदन्ति।’ सत्य एक है, ज्ञानीजन उसका अनेक प्रकार से वर्णन करते हैं। इसे स्वीकार करने पर ही पंथ धर्म का रुप ले सकते है। अन्यथा उनको समान कहना उचित नहीं है।

व्यक्ति व समूह के द्वारा कर्म के माध्यम से ही सम्बन्धों का निर्वाह किया जाता है। इस निबाहने वाले व्यवहार से कुछ अपेक्षायें होती है। उस आधार पर नियमावली विकसित होती है। उसे भी धर्म कहते है। हमारा किसी के साथ कैसा व्यवहार हो इसे अभिव्यक्त करते समय भी धर्म शब्द का प्रयोग होता है। अतः हर सम्बन्ध का अपना धर्म है। पति धर्म, पुत्र धर्म, पड़ौसी का धर्म, राजधर्म यह सब सम्बन्धों को निभाने की विधियाँ हे जिसे धर्म कहा गया है। यह धर्म का एक और अर्थ हुआ। इसमें यह कर्तव्य का रुप धारण करता है। जब हम पतिधर्म या पत्निधर्म की बात करते हे तो पति के पत्नि के प्रति या पत्नि के पति के प्रति कर्तव्य की बात कर रहे होते है। कर्तव्य का ही कर्म में निर्वाह हो सकता है। वर्तमान समय में कर्तव्य को महत्व देने के स्थान पर उसके परिणाम स्वरुप सम्बन्धी को प्राप्त होनवाले लाभ को महत्व दिया गया है। इसे ‘अधिकार’ कहा जाने लगा। अब सारी बात ही उलटी हो गई। अधिकार परिणाम होने के स्थान पर अपेक्षित कर्म बन गये। जब व्यक्ति अपने कर्तव्य के स्थान पर दूसरे के कर्तव्य के फलस्वरूप हमें प्राप्य परिणाम की अपेक्षा को ही जीवन का आधार बना लेता है तो स्वाभाविक ही जीवन परावलम्बी हो जाता है। हम इन अपेक्षाओं को लेकर संघर्ष में पड़ जाते हैं। इसके विपरित यदि प्रत्येक अपने धर्म अर्थात कर्तव्य का पालन करने लगे तो परिणाम स्वरुप सहज ही दूसरों के अधिकारों की पूर्तता हो जायेगी। यह अधिक वैज्ञानिक भी है। कर्तव्य कर्मप्रधान होने के कारण हमारे अधिकार में, नियन्त्रण में है। अधिकार का वास्तविक अर्थ यही है- जिस पर हमारा स्वामीत्व है। दूसरी ओर जिसे आजकल अंगरेजी के Right शब्द के पर्याय अधिकार के रुप में समझा जाता है वह अपेक्षा पर आधारित होने के कारण केवल सम्भावना के अधीन है अतः हमारे नियन्त्रण में नहीं है। कितनी मजेदार बात हुई जिसे हम अधिकार मान रहे है वो वैज्ञानिक तथ्य के अनुसार हमारे अधिकार में ही नहीं है। धर्म का कर्तव्य यह अर्थ भी उसके बृहत् प्रत्यय सृष्टि के सनातन नियम का ही एक अंग है।

यह कर्तव्य धर्म सम्बन्धों के संजाल के द्वारा समाज को धारण करता है। यह धारण करने का कर्म ही उसे धर्म यह नाम प्रदान करता है। अतः समाज को धारण करने की प्रक्रिया को धर्म कहा गया। इसके लिये आध्यात्मिक, औपासनिक व न्यायिक इन तीनों व्यवस्थाओं का निर्माण होता है। अतः धर्म ही विधि अर्थात कानून का रुप लेता है। यदि समाज की प्रगल्भता पर्याप्त रुप से विकसित ना हो ता इसे राजकीय मान्यता की आवश्यकता पड़ती है अतः विधि की रचना करनी पड़ती है। बिना राजनैतिक हस्तक्षेप के सनातन नियमों की युगानुकुल व्याख्या के समाज में रुढ़ होकर उसके द्वारा समाज की सहज धारणा ही आदर्श समाज रचना है। इसीको धर्मराज्य कहा गया। भारत में धर्मराज्य का अर्थ अंगरेजी के Theocracy से नहीं होकर, समाज में धर्म के प्रस्थापित होने से राज्य के विसर्जित हो जाने व मानवीय मूल्यों द्वारा ही प्रत्येक व्यक्ति द्वारा स्वतः एकल व सामूहिक कर्तव्य का पालन किया जाना है। महाभारत के शांतिपर्व में शरशैयापर लेटे भीष्म द्वारा युधिष्ठिर को इसी धर्मराज्य की स्थापना के सुत्रों का मार्गदर्शन किया गया है। उस समय वे पूर्व में साकार धर्मराज्यों का विवरण करते है। न राज्यो न च राजा आसीत, न दण्डों न दण्डितः। न तो कोई राजा आवश्यक था ना ही कोई शासन व्यवस्था। न किसी को सजा देने की आवश्यकता पड़ती थी। धर्मेनैव प्रजा सर्वा रक्षन्ति स्म परस्परं। वर्तन्ति स्म परस्परं।। धर्म के द्वारा ही सारी प्रजा एकदुसरे का परस्पर रक्षण करती थी। एक दूसरे से निर्वाह करती थी।

यह धर्म स्थापित करना ही मानवमात्र का व्यक्तिगत व सामूहिक जीवनध्येय है। इसिलिये इसे चतुविर्ध पुरुषार्थ का सबसे महत्वपूर्ण आधार माना गया है। यह चार पूरूषार्थों में से केवल एक नही हैं। अर्थ व काम को भी धर्म के ही आधार पर करना है। मोक्ष अपने आप में इससे उपर सर्वोच्च लक्ष्य है। जब तक जगत के नियमों से मुक्त नहीं हो जाते तब तक बाकि तीनों पुरूषार्थ ही जीवन का लक्ष्य है और वे तीनों ही धर्म के ही अंग है। मोक्ष की आकांक्षा भी धर्म का ही परिणाम है। जीवन में सब स्तरों पर धर्म का निर्वाह करने से चित्त की शुद्धि के कारण ही मुमुक्षा- मोक्ष की ईच्छा जागृत होती हैं। यह मुमुक्षा ही मोक्ष की ओर अग्रेसर करती है। अतः इसका भी मूल भी धर्म में ही है। यह धर्म का व्यवस्थागत रुप है। इसीकी संस्थापना के लिये बार बार अवतार होते है। इस धर्माधारित विश्वव्यवस्था को अगली बार विस्तार से देखेंगे। तब तक धर्म पद के इन पाँच प्रत्ययों, अर्थछटाओं को हृदयंगम करना आवश्यक है। 1. स्वभाव या गुणधर्म, 2. आत्म विकास का मार्ग, 3. व्यक्ति, समाज, सृष्टि तथा परमेष्टि के आपसी सम्बन्धों के निर्वहन में प्रयुक्त कर्तव्य, 4. विधि अथवा कानून तथा 5. समस्त जगत को धारण करने वाला आधार तत्व यह धर्म के पाँच आयाम हमने देखें। यह समझने के लिये भले ही अलग अलग विश्लेषित किये गये हो इनका अन्तर्निहित मर्म एक ही है। उसका साक्षात्कार ही अपने जीवन में धर्मस्थापना है। धर्म के मर्म को समझे और अपने जीवन में उतारे यही सच्चा योग है।

फ़रवरी 15, 2012 Posted by | योग | , , , , , , , , , | 3 टिप्पणियाँ

भले कर्मकाण्डी बनो! पर मिथ्याचारी नहीं!!


माँ बेटी के साथ बैठकर टी वी देख रही है। भौंडे भौंडे संवाद और वेष सब दोनों एकसाथ देख रही हैं। दादी ने या किसी ने आपत्ति की तो तथाकथित आधुनिक मम्मी का उत्तर था। ‘मै पाखंड (Hypocrisy)  में विश्वास नहीं करती हूँ। मेरे साथ नहीं देखेगी या मे मना भी कर दूँगी तो क्या छिपके नहीं देखेगी?’ बात में तो दम लगता है। पाखण्ड को तो सभी बुरा मानेंगे। पर क्या हमने सोचा है जिसे हम पाखण्ड का नाम दे रहे हे उस ‘लज्जा’ के कारण हमारे समाज में मूल्यों की रक्षा कैसे हुई है? माँ के साथ बैठकर खुलेआम देखने और छिप छिप कर देखने में मन पर संस्कार का अंतर है। पहले प्रसंग में माँ की अनुमति के कारण जो देखा जा रहा है उसका भी अनुमोदन हो रहा है। और इस कारण उसके अनुसरण में भी कोई हिचक नहीं रहेगी। चोरी छिपे देखने में प्रक्रिया में ही बोध निहित है कि जो देखा जा रहा है वह ठीक नहीं है। सामाजिक दृष्टि से वर्जित है। अतः मन में यह विचार कम ही आयेगा कि स्वयं भी ऐसा कुछ करें। युवा अपनी संगत के कारण धुम्रपान करने लगता है। पर संस्कारों के चलते जो ‘आँख की शरम’ के कारण इतनी मर्यादा रखता है कि अपने से बड़ों के सामने धुम्रपान नहीं करता। पिता या उनके समकक्ष कोई दिखने पर धुम्रदण्ड को छिपाने लगता है। अब इस प्रक्रिया में व्यसनमुक्ति की सम्भावना निहित है। पर यदि आधुनिकता व खुलेपन के नाम पर पिता ही युवा पुत्र के साथ बैठकर व्यसनानन्द लेने लगे तो फिर तो सुधार की सम्भावना ही समाप्त। अब बताओ ऐसा पाखण्ड ठीक है या नहीं?
भाषा में पदों के अर्थ तो होते है पर वे अपने आप में अच्छे या बुरे नहीं होते। सन्दर्भ, संस्कृति व कर्म का उद्देश्य तय करेगा कि वह कर्म किस श्रेणी में आयेगा। केवल अच्छे-बुरे का श्वेत-श्याम विभाजन ही नहीं होता, मानव स्वभाव के कई रंग और छटायें होती है। उन्हीं के अनुसार शब्दों के अर्थ होते है। पर गत कुछ वर्षों में हमने शब्दों को भी गुटों में बाँट दिया है। साम्प्रदायिकता का अर्थ था सम्प्रदाय को मानने वाला। यह अत्यन्त सकारात्मक बात थी सम्प्रदाय आपकी आध्यात्मिक साधना को अनुशासित करने का कार्य करते है और सम्प्रदाय का अंग होने के नाते उसके प्रति आपकी निष्ठा अपने आप में एक दायित्व भी होती है। साम्प्रदायिक साधक, गुरू, उपासना और स्थान का भारत में बड़ा सम्मान था। किन्तु पिछले कुछ वर्षों में हमने इस शब्द का अर्थ ही बदल दिया। ऐसी ही स्थिति कर्मकाण्ड की है। साधना में नित्य कर्म का बड़ा ही महत्व है। मन को संस्कारित करने के लिये नियमित रूप से तय कर्म करना अत्यावश्यक होता है। इसी नियमबद्ध उपासना का नाम कर्मकाण्ड है। इसी के द्वारा कठीन समय में साधक की रक्षा होती है। हमारे इतिहास में भी आक्रांताओं के अत्याचारों में जब धर्म का प्रगट पालन भी सम्भव नहीं था तब ज्ञान काण्ड की चर्चा करना तो सोच भी नहीं सकते थे। ऐसे में कर्मकाण्ड ने ही धर्म की रक्षा की। पर गत एक शताब्दी से इस शब्द को हिन्दू धर्म के विकार के रूप में ही प्रयोग किया जाता है और सारी अन्धश्रद्धाओं का पर्यायवाची। बिना अर्थ अथवा पीछे के विज्ञान को जाने केवल कर्मकाण्ड करना सराहनीय निश्चित नहीं है। किन्तु ज्ञान व कर्म दोनों ही ना करने से कुछ एक करना तो अच्छा ही है ना? और जानकर करेंगे तो फिर यह कर्म काण्ड तारक बन जायेगा।
कर्मयोग में कर्म के पीछे के हेतु का बड़ा महत्व होता है। सामान्य जीवन में भी कर्म का महत्व उसके उद्देश्य से ही तय होता है। बड़ा सरल उदाहरण है। एक ही क्रिया – बन्दुक उठाई, निशाना लगाया, घोड़ा दबाया। अगले व्यक्ति के छाति में गोली लगी, तुरन्त प्राण निकल गये। इसी कार्य के लिये एक व्यक्ति को फांसी की सजा दी जाती है तो दूसरे को इसी कार्य के लिये परमवीर चक्र प्रदान किया जाता है। शारीरिक क्रिया भले एक ही हो कर्म अलग अलग था क्योंकि भाव अलग अलग थे। बिना मन के केवल इन्द्रियों से ही तो कर्म नहीं होता। इसी बात को भगवान कृष्ण बड़ी दृढ़ता से बताते है।
तीसरे अध्याय का प्रारम्भ अर्जुन के प्रश्न से हुआ है।
ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव।। गी 3.1।।
जब एक ओर आप बता रहे है कि बुद्धि कर्म से अधिक श्रेष्ठ है तो फिर मुझे क्यों इस घोर कर्म में ढ़केल रहे हो? आगे यहाँ तक भी कह देता हे कि ऐसे मिश्रित वचनों से मुझे भ्रमित क्यों कर रहे हो? इस प्रश्न के उत्तर में भगवान कृष्ण ने कर्मयोग का विवरण प्रारम्भ किया है। निष्क्रियता जीवन का लक्ष्य नहीं हो सकती। ऐसा सम्भव भी नही है, कर्म तो करना ही होगा। केवल कर्मेन्द्रियों का नियन्त्रण कर उनको बन्द कर देने से कर्म नहीं बन्द हो जाता क्योंकि मन तो सोचता ही रहता है ओर सोचना भी तो कर्म है।
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन।
इन्द्रियार्थान् विमूढ़ात्मा मिथ्याचारः स उच्चते।। गी 3.6।।
इसको भगवान् श्रीकृष्ण ने मिथ्याचार कहा है। यह पाखण्ड से घातक है। पाखण्ड दूसरे के प्रति असत्य आचरण है। मिथ्याचार तो स्वयं को ही धोखा देने का प्रयास है। यह तो व्यक्तित्व को ही विभाजित कर देगा। सामान्यतः इन्द्रियों को नियन्त्रित करना कठीन बताया जाता है। पर यहाँ ऐसी स्थिति का वर्णन है जहाँ उपर से कर्मेन्द्रियों को तो रोक लिया है कर्म करने से किन्तु मन के स्तर पर कर्म जारी है। इस मिथ्याचार से बचने के लिये एक उपाय तो हमने देखा है। स्वयं को पूर्ण व्यस्त रखना। अपनी मर्जी से काम करना।
यहाँ मन के संस्कार की बात हो रही है। मन को संस्कारित करना कर्म से भागकर सम्भव नहीं है। अर्जुन इसी भागने की बात कर रहा है और भगवान लड़ने की। दूसरे अध्याय में बताया है – इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः।। गी 2.60।। इन्द्रियाँ बलवान् होती है व मन का भी बलपूर्वक अपहरण करने की क्षमता रखती है। जब इन्द्रियों में मन को खीचने की शक्ति है तब उसी का प्रयोग मन को उपर की ओर ले जाने के लिये क्यों ना किया जाये? पतंग और डोर के समान ये सम्बन्ध है। सामान्यतः पतंग का नियन्त्रण डोर के द्वारा किया जाता है पर हवा का जोर होने पर, यदि पतंग संतुलित हो, तो वह डोर को खींच सकती है। भगवान कह रहे है – तानि सवार्णि संयम्य युक्त आसीत मत्परः।।गी 2.61।। इन इन्द्रियों को संयमित कर मुझमे लगा दो। अब ये करे कैसे?
बड़ा ही सरल सा मार्ग हमारे महापुरुषों ने बताया। जब श्री रामकृष्ण परमहंस को पूछा कि ये काम क्रोधादि रिपुओं, शत्रुओं से कैसे लड़ा जाये। व्यावहारिक एवं सहज उपाय बताने के आदी ठाकुर ने कहा, ‘‘सब विकारों को ईश्वरार्पित कर दो। क्रोध करना है उनपर करों। लोभ, प्रेम, स्नेह करना है उनसे करों।’’ हमने अपनी संस्कृति में यह कर दिखाया। केवल कहा ही नहीं इशवास्यं इदं सर्वं। पर सब विकारों को इश्वरोन्मुखी कर उदात्त कर दिया। बलि के पीछे भी यही तत्व है। मांसाहार करना है तो देवता को अर्पित कर प्रसाद के रुप में ग्रहण करों। बलि प्रथा को अमानवीय कहकर उसका विरोध करने वाले लोग पंचसितारा होटेलों में भोग के लिये कटते लाखों प्राधियों के प्रति दया क्यों नहीं दिखाते। कुछ भैरों मंदिरों में और जनजातीय  परम्पराओं में शराब को भी प्रसाद के रुप में अर्पित कर फिर प्राशन किया जाता है। भोग और उन्माद के लिये सोमपान कर समाज में बलवा करने से तो ये भला ही है। खजुराहों के मंदिरों के शिल्प भी इसी सिद्धान्त का उदाहरण है। काम को इश्वराभिमुख कर उसका उदात्तीकरण।
इन्द्रियों की प्रचण्ड कर्षण शक्ति का सदुपयोग करने के लिये हमें उनको उदात्त आदते डालनी होगी। उदात्त का अर्थ है उंचे ध्येय की ओर। ऐसे शब्दों से ही कभी कभी डर लगता है। पर यदि अपने जीवन को अपने सामने पवित्र रखना है, मिथ्याचार के अपराध बोध से बचना है तो इन्द्रियों को नित्य कर्म में बांध दो। उन्हें कुछ अच्छे कामों की आदत डाल दो। इसे ही कर्मकाण्ड कहते है। इससे कर्म का भाव शुद्ध हो जायेगा। एक बार संकल्प लेते समय उदात्त ध्येय का ध्यान करने से प्रतिदिन कर्म में वहीं भाव अनायास, अवचेतन के स्तर पर कार्य करने लगेगा। यही इन्द्रियों के माध्यम से मन को सही मार्ग पर रखने की सरलतम विधि है। जितना लगता है उतना यह उदात्तीकरण कठीन नहीं है। बड़ा ही सरल है। कई काम हम प्रतिदिन करते ही है। पर संकल्प के साथ नहीं करते। बस इतना ही करना है, संकल्प करना है। संकल्प भाव की शुद्धि करेगा और आदतन कर्म के समय मन को उदात्त करेगा।
तो आज ही तय कर लो क्या क्या प्रतिदिन करेंगे। छोटी छोटी बातें ही बड़ा परिणाम देती है। जैसे प्रतिदिन हनुमान चालिसा का पाठ, 50 सूर्यनमस्कार, कुछ व्यायाम, प्राणायाम, जप। यहाँ तक की नियमित स्नान करना भी एक आदत हो सकती है। कमसे कम पाँच – छः आदते नित्य संकल्प के रूप में ले ही लेनी चाहिये। 2 शरीर के स्तर पर जैसे व्यायाम, स्नान आदि। कम से कम दो भाव के स्तर पर जैसे जप, स्तोत्र पाठ आदि और कम से कम दो बौद्धिक स्तर पर जैसे स्वाध्याय, लेखन, श्रवण आदि। हाँ! बिना चुके, बिना एक दिन भी खण्ड पड़े करना है। फिर देखो मन कैसे उदात्त गगन में विचरण करने लगता है। आपको ही आश्चर्य होगा कि कितना पवित्र, हलका और उर्जावान अनुभव कर रहे हैं।

अक्टूबर 9, 2011 Posted by | योग | , , , , , | 12 टिप्पणियाँ

   

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