उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

जीवनाचे उद्दिष्ट काय?


GWALIOR-1 copy१९८५ मध्ये भारत सरकारने विचार केला की, पूर्ण देशात एक दिवस तरूणांकरिता असावा. जसा महिला दिन, बाल दिवस तसाच युवा दिवस. शोधाशोध सुरू झाली की कुठल्या सणा-दिवसाला हे बिरूद प्रदान करावं? योजना आयोगाच्या बैठकीत अनेक नेते आणि महापुरुष यांच्या नावाचे सल्ले देण्यात आले. शेवटी एकमत झालं ते स्वामी विवेकानंद जयंतीवर. तेव्हापासून १२ जानेवारी हा दिवस ‘राष्ट्रीय युवा दिवस’ पूर्ण देशात साजरा केला जाऊ लागला. शासकीय कामातही कधी कधी चांगले निर्णय होऊ शकतात याचेच हे उदाहरण. स्वामी विवेकानन्द हे युवकांचे आदर्श आहेत. त्यांनी स्वत: केवळ ३९ वर्षाच्या जीवनात जगभरात अलौकीक काम केले. त्यांच्या वैचारिक अग्निमंत्रांनी युवकांना गेल्या पूर्ण शतकात प्रेरित केलय. स्वामीजींच जीवन आणि विचार दोन्ही युवकांसाठी प्रेरणास्थान ठरले आहेत.

आजच्या तरूणांप्रमाणेच किशोर वयात नरेन्द्रनाथच्या मनात अनेक प्रश्‍न होते. जे सांगितले जात होते त्यावर प्रश्‍न न विचारता विश्‍वास ठेवण्याची त्यांची वृत्ति नव्हती. पण फक्त शंकेने प्रश्‍न विचारण्यापुरता अविश्‍वास अशी स्थिती नव्हती तर सत्य जाणून घेण्याची जिज्ञासा होती. म्हणून प्रश्‍नांचा तार्किक पाठपुरावा करण्याची त्यांची तयारी होती. वेळ पडल्यास प्रयोग करण्याचे धाडसही होते. आमराईच्या चौकीदाराने झाडावरच्या ब्रह्मसमंधाची भीती दाखवली तर लहान बालक नरेन्द्र रात्रभर झाडावर चढून बसला; पाहूया कसा दिसतो ब्रहमराक्षस ते? एकदा कीर्तनकाराने सांगितले की, चिरंजीव मारूति केळीच्या बागेत राहतो तर हा १०-१२ वर्षाचा पट्ठा जाउन बसला केळीच्या बागेत वायुपुत्राला भेटायला! असा हा नरेंद्र.

जिज्ञासा तर विकासाचा पाया पण ही जिज्ञासा श्रध्देच्या पाठबळावर असेल तर ज्ञानात परिणित होते. अन्यथा आस्थाहीन शंकेखोरपणा शेवटी हताशेत आणि परिणामी मानसिक विषण्णेतच बहुदा संपतो. आजच्या शिक्षणात तरूणाला प्रश्‍न विचारण्यास प्रवृत्त तर केले जाते पण पूर्ण पाठपुरावा करून धैर्यानिशी (निष्कर्शापर्यन्त) अंतिम सत्यापर्यन्त पोहचण्याची प्रगल्भता त्याला प्राप्त होत नाही. असल्या अर्धवटपणामुळेच आजचा युवक मनाने इतका कमकुवत झालेला दिसतो की थोडयाश्या अपयशानेही तो खचून जातो. नैराश्य आणि प्रसंगी अगदी आत्महत्येपर्यंत टोकाची स्थिती जाण्याच्या घटनांमध्ये वाढच होतांना दिसते आहे. मनाची खंबीरता वाढवायची असेल तर आजच्या युवकांनी स्वामी विवेकानन्दाच्या चरित्राचा अभ्यास करायला हवा.

सामान्य उत्सकुकतेला जिज्ञासेत व जिज्ञासेला ज्ञानपिपासेत परिपक्व करण्याचे तन्त्रज्ञान स्वामी विवेकानन्दांच्या Questionmarkकिशोरावस्थेतून युवावस्थेपर्यन्तच्या जीवनातून शिकायला मिळते. लोक देव, देव इतकं करतात ते नेमकं काय असतं? खरोखर ईश्‍वर नावाची कुठली सर्वशक्तीमान, सर्वव्यापक, सत्ता मुळात आहे तरी का? असली उत्सुकता आणि कुतुहल तर प्रत्येकाच्याच मनात येत. पण असे किती युवक असतील जे ह्या प्रश्‍नांच्या उत्तरासाठी गांभिर्याने प्रयत्न करतात?

नरेन्द्राचे फक्त उत्सुकतेवर भागणार नव्हते. त्याने यासाठी तीन्ही शास्त्रोक्त उपायांचा अभ्यास केला. अनेक ग्रंथांचा अभ्यास केला. विभिन्न तत्वज्ञानांचा अभ्यास केला. ब्राह्‌मो समाजात जाऊ लागला. अनुभवी लोकांच्या बोलण्याकडे लक्ष देवून त्यांनी सांगितलेल्या उपायांवर स्वत: प्रयोग केले. अनेक तास ध्यान लावण्याचा सराव केला. अशाप्रकारे शास्त्र-स्वाध्याय, आप्त-वाक्य श्रवण व स्वत: प्रत्यक्ष प्रयोग या तीन्ही उपायांनी नरेन्द्रची जिज्ञासा परिपक्व ज्ञानपिपासेत रूपांतरित झाली.

या ज्ञान पिपासेतूनच त्यांना गुरू भेटले. श्रीरामकृष्ण परमहंसाबद्दल त्यांनी स्वत:चे मामा श्री. रामचन्द्र दत्त यांचेकडून ऐकले. त्यांचा मित्र सुरेन्द्रनाथ दत्तच्या घरी श्रीरामकृष्णांसमोर गायनाचा प्रसंगही आला. इंग्रजीच्या प्राध्यापकांनी पण वर्डस्वर्थची कविता शिकवतांना समाधीच्या उदाहरणाकरिता श्रीरामकृष्णांचा उल्लेख केला. मामांबरोबर नरेन्द्र दक्षिणेश्‍वरला गेले. प्रथम भेटीत श्रीरामकृष्णांच्या वागण्यावर त्यांना शंकाच आली. पण परिपक्व ज्ञानपिपासेने शंकेच्या धुक्यातून परिक्षेचा कंदिल धरण्याची प्ररेणा दिली. या गुरू शिष्य सम्बधातून नरेन्द्राच्या जीवनात श्रध्देचा उदय झाला. (याबाबत पुढे पाहू. तुर्तास यौवनाचा पहिला अनविार्य गुण जिज्ञासा याचा विचार.)

शंका, कुतुहल, उत्सुकतेतून उलगडणारी मानवसुलभ जिज्ञासा, स्वाध्याय, श्रवण आणि प्रयोगाच्या मुशीतून तावून निघते तेव्हाच तिचे ज्ञानपिपासेत संस्करण होते. या सगळयाचा प्रारम्भ होतो पण त्यासाठी प्रश्‍न विचारायला हवेत. ज्ञानी जनांना तर प्रश्‍न विचारायचेच पण त्याहून महत्वाचे आहे स्वत:ला प्रश्‍न विचारणे. स्वामी विवेकानन्द सांगतात जो प्रश्‍न आपण इतरांना विचारतो तो प्रथमत: स्वत:ला विचाराल की नाही? चला आजच सुरूवात करूया. जो प्रश्‍न स्वामीजी प्रत्येक युवकाला विचारायचे तोच आज आपण स्वत:ला विचारूया. या माझ्या जीवनाचे उद्दिष्ट काय?

ईश्‍वर साक्षात्काराची जिज्ञासा नसली तरी चालेल. पण स्वत:च्या जीवनाचे काय करायचे ते तर ठरवायलाच हवे ना? प्रत्येकाचे जीवन अद्वितीय आहे. विशिष्ट उद्देश्याने, विशिष्ट कार्यासाठी प्रत्येकाचा जन्म झाला आहे. त्याचा शोध घेणे ही प्रत्येकाची पहिली जिज्ञासा असायला हवी. पण आपण याच महत्वाच्या प्रश्‍नाला टाळत असतो. काय बनायचे याचा विचार करण्याआधी हा विचार करायला हवा की मी कोण? कशासाठी माझा हा जन्म झाला ? काय माझ काम आहे? चला या प्रश्‍नांवर विचार करूया. पुढल्या आठवडयात श्रध्दा जागरणाने या स्वकर्तव्यास कसे तडीस न्यायचे ते पाहुया.

जनवरी 31, 2013 Posted by | Marathi Lekh | , , , , , , , , , , , , , | टिप्पणी करे

जीवनमूल्य – जो हमें मूल्यवान बनायें।


गढ़े जीवन अपना अपना -18
किसी भी नोट पर उसका मूल्य लिखा होता है। किन्तु वह मूल्य रिजर्व बैंक के गवर्नर के आश्वासन का मूल्य होता है ना कि नोट के कागज और छपाई आदि का। अर्थात जिस देश का नोट है उसमें तो उसका वहीं मूल्य होगा पर उस देश के बाहर जाते ही उस कागज का मूल्य कुछ भी नहीं रहेगा क्योंकि उस नोट का मूल्य उसका अपना नहीं है, राज्य की सत्ता द्वारा प्रदत्त मूल्य ही वह कागज का टुकड़ा धारण करता है। उसी प्रकार मनुष्य भी अपने स्थान, परिवार, व्यवसाय, पद आदि के कारण जो महत्व पाता है वह भी उसका स्वयं का मूल्य नहीं होता अपितु उस उस उपाधि के द्वारा मनुष्य पर भावित मूल्य होता है। ऐसे उपाधि मूल्य (Face Value) की अवधि (Expiry) उपाधि के साथ ही समाप्त होती है। जैसे जिले के जिलाधीश (Collector) को मिलने वाला मान-सम्मान पद के होने तक ही होता है। पद के छूट जाने के बाद वह सम्मान नहीं मिलेगा। हृदयरोगियों के बारे में किये आधुनिक अनुसंधानों में पाया गया है कि सेवानिवृत्ति के प्रश्चात के 1-2 सप्ताह में हृदयाघात के प्रकरण अधिक होते है। कारणों की मिमांसा में दो प्रमुख कारण पाये गये – 1. अचानक कार्यनिवृत्ति के कारण आये खालीपन से उत्पन्न निरर्थकता का भाव तथा 2. पदविहीन होने से लोगों के व्यवहार में आये परिवर्तन का झटका (Shock)  जो अधिकारी प्रतिदिन सम्मान का आदी हो जाता है उसे अचानक खाली हो जाने से सम्मान मिलना बन्द हो जाता है जिसको सहन करना कठीन हो जाता है। यह स्थिति उपाधि मूल्य के नष्ट हो जाने से इस कारण होती है क्योंकि हम अपने वास्तविक मूल्य का ध्यान नहीं देते।

हमारा वास्तविक मूल्य हमारा आंतरिक मूल्य (Intrinsic Value) होता है जो हमारे चरित्र का प्रभाव होता है। जिस प्रकार सिक्के में धातु का मूल्य होता है वह उसका आंतरिक मूल्य होता है। वर्तमान में जो एक रूपये का सिक्का है उसके धातु का मूल्य 1 रूपये से अधिक है इस कारण कई शहरों में ऐसे गिरोह कार्य कर रहे हैं जो इन सिक्कों को गलाकर इनमें से प्राप्त होने वाली मूल्यवान धातु को बेंचने का धंदा करते हैं। यह ऐसा उदाहरण है जहाँ उपाधि मूल्य से आंतरिक मूल्य अधिक है। मनुष्य का भी आंतरिक मूल्य ही महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि वह परिस्थिति, पद, सम्बंद्ध ऐसे परिवर्तनीय कारकों पर निर्भर नहीं होता। चाहे बाह्य कारक पूर्णतः बदल जाय फिर भी जो आंतरिक चरित्र है उसका मूल्य वैसे ही बना रहेगा। इसी आधार पर कठीन परिस्थितियों में भी वीर अपने लक्ष्य की प्राप्ति कर ही लेते है। स्वामी विवेकानन्द जब अमेरिका में गये तब उनका परिचय पत्र, सामान सब चोरी हो गया। पराये देश में कोई एक भी परिचित व्यक्ति नहीं जहाँ जाना है वहाँ का पता नहीं। अर्थात उपाधि मूल्य कुछ भी नहीं। ऐसे समय उनका साथ दिया उनके आंतरिक मूल्य नें उनके चरित्र ने, ज्ञान ने। इस असम्भव स्थिति में भी पूर्ण श्रद्धा के साथ उन्होंने अपने लक्ष्य को प्राप्त किया।

बोस्टन में, शिकागो में जिन लोगों से उनका परिचय हुआ वे सब उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रहें। जिस घर में वे रहते थे, वहाँ की गृहस्वामीनी अपनी सहेलियों की चाय पार्टी में स्वामीजी को एक अजूबे के रूप में, मसखरे के रूप में प्रस्तुत करती थी। पर उनकी बातों में भरा जीवन का ज्ञान इस विडम्बना और अपमान को पार कर फैलता गया। फिर उन महिलाओं के परिवारों के प्रबुद्ध सदस्य आकर्षित हेाते गये और स्वामी विवेकानन्द की ख्याति सुरभी की भाँति सर्वत्र फैल गई। विद्वानों ने उन्हे परिचय और सन्दर्भ देकर शिकागो भेजा। प्रोफेसर राइट ने धर्मसभा के आयोजक फादर बैरोज को पत्र लिखा। यह सब आंतरिक मूल्य का परिणाम थे।

हम अपने जीवन में सतत अपने आंतरिक मूल्य को बढ़ाते रहे ताकि उपाधि मूल्य पर हमारे जीवनलक्ष्य की प्राप्ति निर्भर ना हो। अभितक इस श्रृंखला में हमने जो भी जीवननिर्माणकारी बातों की चर्चा की हे वे सारी ही आंतरिक मूल्यवृद्धि में सहायक है। हमारा मूल्य कैसे निर्धारित होगा? दूसरों के मूल्यांकन से ना तो हमारा मूल्य घटता है ना बढ़ता है। सारी बात हमारे अपने जीवन में हम किन बातों को वरीयता देते है इस पर निर्भर हैं। हम जीवन में जिन बातों को मूल्य देंगे वे तय करेंगी की हमारा आंतरिक मूल्य क्या है? अतः हमारे जीवनमूल्य हमारा मूल्य निर्धारित करते है। कोई व्यक्ति पैसे को इतना मूल्यवान समझता हे कि उसके लिये सबकुछ कर सकता है। अब उसके जीवनमूल्य इस बात से प्रभावित होंगे। उसका व्यवहार व दिनचर्या, आदते, मित्र, सम्बन्ध सब इसी से निर्धारित होंगे। कोई अपनी कलासाधना को सर्वाधिक मूल्य प्रदान करता है और उसके लिये कुछ भी त्यागने को तैयार हो सकता है और ऐसे भी उदाहरण है जिन्होंने देशकार्य में समर्पित होने के लिये अपनेकला जीवन को तिलांजली दी। हम जीवन में जिन बातों को मूल्यवान समझते है उनके लिये त्याग करते है। कुछ चीजों को धारण करते हे कुछ को छोड़ देते है। इस प्रकार की छटनी से हमारे जीवन की अपनी शैली विकसित होती है। यह शैली ही हमारे जीवनमूल्य तय करती है। अर्थात ये प्रक्रिया परस्पर पूरक है।

यह केवल व्यक्तिगत स्तर पर ही नहीं होता अपितु सामूहिक भी होता है। समाज अपनी जीवन दृष्टि के अनुसार वरीयतायें निश्चित करता है और इस आधार पर ही उन बातों का भी निर्धारण होता है जिनको सर्वाधिक मूल्य प्रदान करना है। जैसे विश्वविद्यालय के शिक्षकों के समूह में ज्ञान व अनुसंधान को अधिक मूल्य होगा तो सेना के अधिकारियों के क्लब में मान वीरता को दिया जायेगा फिर ज्ञान कुछ कम ही क्यों ना हो। पर कई बार यह इतना स्पष्टरुपेण विभाजित नहीं होता। जैसे जब समाज में सब ओर पैसे का ही बोलबाला हो और संपदा के आधार पर ही प्रतिष्ठा भी मिलती हो ता फिर शिक्षको की चर्चा में भी पगार और बैंकों के ब्याजदरों की बाते प्रमुख स्थान लेने लगती है। पूरे देश की जीवनशैली उसके द्वारा विकसित एवं प्रचलित जीवनमूल्यों पर निर्भर होती है।

स्वामी विवेकानन्द कहते है प्रत्येक देश का अपना स्वभाव होता है। उसी के अनुसार जीवन जीने से उसका पूर्ण विकास सम्भव है। भारत का प्राणतत्व है-धर्म! उसी के अनुरूप जीवनमूल्यों को प्रतिष्ठित करने से ही भारत अपने जीवनध्येय को प्राप्त कर सकेगा। क्या है हमारे राष्ट्रीय जीवनादर्श और उनपर आधारित जीवनमूल्य? देखते है अगली बार!

जुलाई 21, 2012 Posted by | आलेख | , , , , , | 4 टिप्पणियाँ

   

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