उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

शुभकामना नही शुभसंकल्प


बुरा ना मानो होली है ॰ ॰ ॰

होली के अवसर पर भ्रमण ध्वनि शुभकामना संदेशों से पट गया है। नए साधनों के कारण चित्र, रंग सब इन संदेशों में आ गए है। कई बार तो संदेश मिटाना भी बड़ी समस्या हो जाती है। प्रश्न ये है कि क्या हमने अपने अपने सारे उत्सवों को यंत्रों के समान ही एकरूप तो नहीं बना दिया। हर बात पे केवल हैपी कह देना। हैपी दिवाली कहो या हैपी होली सब एक सा। सारे संदेश एक से। जीवन कभी एकरूप नहीं होता। वैसे ही सारे उत्सव भी एक से नहीं हो सकते हो। हर उत्सव का अपना महत्व है और अपनी पद्धति भी। होली तो मन को साफ़ करने का उत्सव है। केवल घर का कचरा जलना ही नहीं तो अपने मन की सब कुंठाएँ क्रोध सब को ही मन से बाहर करना है। इस हेतु देश के भिन्न भिन्न भागों में अलग अलग प्रकार की परम्पराएँ विकसित हुई है। एक दूसरे को छेड़ना, कष्ट देना और कहना -‘बुरा ना मानो होली है ‘

इसी अवसर पर प्रस्तुत है उत्सवों पर संदेश देने की वैज्ञानिक विधि पर दिवाली के बाद लिखा यह लेख। पूरा होते होते देर हो गयी इसलिए तब प्रस्तुत नहीं किया था अब लीजिए ॰ ॰ ॰

शुभकामना नही शुभसंकल्प

          दिवाली एक तरफ विश्व का सबसे बडा उत्सव बनता जा रहा है। विश्व के अनेक देशों  में बडे़ उत्साह से दीपोत्सव को मनाए जाने की खबरें मिल रही हैं संयुक्त राष्ट्र संघ मुख्यालय पर भी दियों की जगमग से Happy Diwali प्रकाशित किया गया। इंग्लैंड की नूतन प्रधानमंत्री ‘थेरेसा मे’ ने पूरा 3.30 मिनीट का वीडियो संदेश दिवाली की समस्त पौराणिक कथाओं का उल्लेख करते हुए प्रसारित किया। आस्ट्रेलिया व कॅनडा ने अक्टूबर माह को दीपोत्सव माह के रूप में मनाने की घोषणा की। ये सब समाचार भी सामाजिक माध्यम (Social Media) से ही प्राप्त हुए। दूसरी ओर भारत में उत्सवों का स्वरूप बदलता हुआ दिखाई दे रहा है। प्रत्यक्ष मिलना, साथ आना, विभिन्न परंपराओं को निभाना इससे अधिक संदेशों के आदान-प्रदान से ही उत्सव मनाए जा रहे है, ऐसा प्रतीत हुआ। संचार के माध्यम निश्चित रूप से बढ गए है और उनका पूरा उपयोग उत्सवों में किया गया। मोबाईल कंपनियों ने दिवाली और भाईदूज के दिन सारी मुफ्तसेवाओं को बंद रखा। उसके बाद भी Whatsap, Facebook आदि संचार माध्यमों में दिवाली संदेशों  का तांता लगा रहा। ऊपरी तौर पर तो यह बडा आकर्षक और उत्साहवर्धक लगता है किंतु थोडा गंभीरता से सोचने पर हमे उत्सवों के उथले होने का खतरा स्पष्ट दिखाई देगा।

         पहले थोडीसी मीमांसा संदेशों  की कर लेते हैं। यह शोध का विषय होगा कि उत्सवों के अवसर पर एक दूसरे को सदिच्छा संदेश भेजने की परंपरा कहाँ से व कबसे प्रारंभ हुयी। सतही खेज में इतना तो ध्यान में आता है कि इस परंपरा का मूल किसी भारतीय पौराणिक अथवा ऐतिहासिक तथ्य में तो नही मिलता। हमारे यहा सामान्य रूप से भी एक दूसरे के अभिवादन में आध्यात्मिकता का परिचय मिलता है। जय राम जी की, जय श्रीकृष्ण,  राम-राम आदि सीधे ईश्वर वाचक अभिवादनों के साथ ही नमस्ते जैसे सामान्य अभिवादन में भी ‘मै नही तू ही’ का अथवा ‘तेरे अंदर के ईश्वर को प्रणाम’ का आध्यात्मिक संदेश ही छुपा है। ऐसे में उत्सवों के अवसर पर एक दूसरे को दिवाली मुबारक अथवा Happy Diwali कहकर संबोधित करना एक अत्यंत उथली मनः स्थिति का निर्माण तो नहीं कर रहा? मुबारक में तो कम से कम समृद्धी की कामना है किंतु Happines तो मात्र  शारिरीक अथवा भौतिक सुख की कामना है। हिंदी में अथवा अन्य भारतीय भाषाओं में जो पर्याय ढूंढा गया वह इन दोनो से थोडा बेहतर है। ‘शुभ दीपावली’ इस संदेश से शुभ अर्थात कल्याणकारी, धार्मिक भले की बात की है। हमारे यहा लाभ भी शुभ हो अर्थात नैतिकता से कमाया हुआ हो यह मान्यता है। अशुभ आमदनी को लाभ भी नहीं कहा जाता। इन तीनों संदेशों के अर्थ भले ही अलग-अलग हो किंतु एक दूसरे को प्रेषित करने का भाव समान ही है। Happy Diwali कहने वाले को यह ध्यान में नही है कि वह केवल भौतिक सुख की कामना कर रहा है उसी प्रकार मुबारक अथवा शुभ की कामना करने वाले को भी अपने संदेश के अर्थ का ज्ञान होगा ही ऐसा आवश्यक नही है। कुल मिलाकर विषय यह है कि हम एक दूसरे के प्रति अपनी आत्मीयता को इन भिन्न-भिन्न भावों से व्यक्त करना चाह रहे है। दिवाली हमारे लिए आत्मीयता के प्रकटीकरण का अवसर है इसीलिए मन में यह प्रश्न आता है कि संचार माध्यमों के सहज प्रयोग से थोक के भाव में भेजे गए संदेश  क्या उस आत्मीयता को भेजने और पानेवाले के मन में प्रेरित कर पाते है? भेजने वाला क्या अपने ‘मित्र (?) सूची’ (Friend list) के सभी लोगों को एक साथ भेजे संदेशों की बौछार में प्रत्येक भेजने वाले से कैसे जुड सकेगा? आपस में मिलकर साथ में कुछ क्षण बिताकर जो आत्मीयता विस्तारित होती है उसका पर्याय यह यांत्रिक संदेश हो सकते है क्या?       

            भारत में उत्सवों को सामाजिक, सांस्कृतिक के साथ ही आध्यात्मिक दृष्टि से भी महत्व दिया जाता है। इसलिए, उत्सवों को मनाने का तरीका भी उसी प्रकार से होता है। उत्सवों के अवसर पर एकत्रित आकर सर्वशक्तिमान से प्रार्थना करने हेतु पूजा आदि का विधान होता है। दीपावली भी इसी प्रकार महालक्ष्मी की पूजा का उत्सव है। महालक्ष्मी केवल मात्र धन और वैभव की देवता नही है अपिुत समृद्धि के समग्र अधिष्ठान को महालक्ष्मी के रूप में पूजा जाता है।  दीपावली सबके जीवन में नैतिक समृद्धि के साथ ही स्वास्थ्य, सौभाग्य, विद्या आदि सभी वरदायिनी शक्तियों की कृपा हेतु किया जानेवाला अनुष्ठान है। अतः साथ मिलकरके इस प्रकार का आयोजन किया जाए यह अपेक्षित है। बदले हुए आधुनिक परिवेश में भी हर सामूहिक इकाई में दिवाली मिलन मनाने की परंपरा बनी है यह अधिक उचित दिखाई देता है। इस बहाने सब लोग एकत्रित आकर अपनत्व एवं आत्मीयता का अनुभव करते है। यांत्रिक संदेशों के आदान प्रदान से यह भारतीय परंपरा के अधिक निकट है। संदेश भेजने में भी हमारी सांस्कृतिक आध्यात्मिक विरासत का ध्यान यदि रखा जाए तो संदेश कामना के न होकर प्रार्थना के होंगे। कामना, वासना, इच्छा मन को नीचे की ओर ले जाती है। भौतिकता, जडता की ओर इनकी गति होती है अतः  कामना पूर्ति के लिए धर्म का अधिष्ठान आवश्यक माना गया है। नैतिक मार्ग से ही कामना पूर्ती की अपेक्षा की जाती है। जब कामना हावी हो जाती है तो नैतिकता का विलोपन होता है। परंपराओं में भी ऐसे ही क्षरण आता है। दिवाली के दिन विभिन्न प्रकारों से जुआ खेलने की परंपरा इसी नैतिक स्खलन का परिणाम है। महालक्ष्मी के समग्र रूप को भुलाकर केवल भौतिक संपत्ति को ही लक्ष्मी का प्रसाद मानने की भूल के कारण ऐसे अनैतिक मार्गो का महिमामंडन किया जाने लगा।

अतः कामना के स्थान पर मन को ऊध्र्वगामी उदात्त लक्ष्य की ओर अग्रेसर करने के लिए उत्सवों के अवसर पर सामूहिक स्तर पर प्रार्थना एवं व्यक्तिगत स्तर पर संकल्प का आधार लिया जाता है। यांत्रिक संचार माध्यमों से भेजे जानेवाले संदेशों  मे भी यदि प्रार्थना एवं संकल्प की अभिव्यक्ति हो तो वह उत्सव के उद्देश्य के अनुरूप होगा। दिवाली पर संदेश  में महालक्ष्मी की प्रार्थना के द्वारा नैतिक समृद्धि की अभिलाषा प्रकट करना एक दूसरे को व्यक्तिगत शुभकामना का आदान-प्रदान करने से अधिक उचित होगा। संदेश में प्रकाशोत्सव, राम-विजय लक्ष्मी पूजन आदि के अनुरूप शुभ संकल्प का उच्चारण भी भारतीय संस्कृती के लिए अधिक पोषक होगा। हमारे सभी उत्सवों में उदात्त सामूहिक समरसता के संदेश छापे हुए है जिनको संकल्प के रूप में दोहराने से मानव जीवन अधिक सौहार्द्रमय एवं आनंददायी होगा। 

मार्च 13, 2017 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , | 5 टिप्पणियाँ

जीवनाचे उद्दिष्ट काय?


GWALIOR-1 copy१९८५ मध्ये भारत सरकारने विचार केला की, पूर्ण देशात एक दिवस तरूणांकरिता असावा. जसा महिला दिन, बाल दिवस तसाच युवा दिवस. शोधाशोध सुरू झाली की कुठल्या सणा-दिवसाला हे बिरूद प्रदान करावं? योजना आयोगाच्या बैठकीत अनेक नेते आणि महापुरुष यांच्या नावाचे सल्ले देण्यात आले. शेवटी एकमत झालं ते स्वामी विवेकानंद जयंतीवर. तेव्हापासून १२ जानेवारी हा दिवस ‘राष्ट्रीय युवा दिवस’ पूर्ण देशात साजरा केला जाऊ लागला. शासकीय कामातही कधी कधी चांगले निर्णय होऊ शकतात याचेच हे उदाहरण. स्वामी विवेकानन्द हे युवकांचे आदर्श आहेत. त्यांनी स्वत: केवळ ३९ वर्षाच्या जीवनात जगभरात अलौकीक काम केले. त्यांच्या वैचारिक अग्निमंत्रांनी युवकांना गेल्या पूर्ण शतकात प्रेरित केलय. स्वामीजींच जीवन आणि विचार दोन्ही युवकांसाठी प्रेरणास्थान ठरले आहेत.

आजच्या तरूणांप्रमाणेच किशोर वयात नरेन्द्रनाथच्या मनात अनेक प्रश्‍न होते. जे सांगितले जात होते त्यावर प्रश्‍न न विचारता विश्‍वास ठेवण्याची त्यांची वृत्ति नव्हती. पण फक्त शंकेने प्रश्‍न विचारण्यापुरता अविश्‍वास अशी स्थिती नव्हती तर सत्य जाणून घेण्याची जिज्ञासा होती. म्हणून प्रश्‍नांचा तार्किक पाठपुरावा करण्याची त्यांची तयारी होती. वेळ पडल्यास प्रयोग करण्याचे धाडसही होते. आमराईच्या चौकीदाराने झाडावरच्या ब्रह्मसमंधाची भीती दाखवली तर लहान बालक नरेन्द्र रात्रभर झाडावर चढून बसला; पाहूया कसा दिसतो ब्रहमराक्षस ते? एकदा कीर्तनकाराने सांगितले की, चिरंजीव मारूति केळीच्या बागेत राहतो तर हा १०-१२ वर्षाचा पट्ठा जाउन बसला केळीच्या बागेत वायुपुत्राला भेटायला! असा हा नरेंद्र.

जिज्ञासा तर विकासाचा पाया पण ही जिज्ञासा श्रध्देच्या पाठबळावर असेल तर ज्ञानात परिणित होते. अन्यथा आस्थाहीन शंकेखोरपणा शेवटी हताशेत आणि परिणामी मानसिक विषण्णेतच बहुदा संपतो. आजच्या शिक्षणात तरूणाला प्रश्‍न विचारण्यास प्रवृत्त तर केले जाते पण पूर्ण पाठपुरावा करून धैर्यानिशी (निष्कर्शापर्यन्त) अंतिम सत्यापर्यन्त पोहचण्याची प्रगल्भता त्याला प्राप्त होत नाही. असल्या अर्धवटपणामुळेच आजचा युवक मनाने इतका कमकुवत झालेला दिसतो की थोडयाश्या अपयशानेही तो खचून जातो. नैराश्य आणि प्रसंगी अगदी आत्महत्येपर्यंत टोकाची स्थिती जाण्याच्या घटनांमध्ये वाढच होतांना दिसते आहे. मनाची खंबीरता वाढवायची असेल तर आजच्या युवकांनी स्वामी विवेकानन्दाच्या चरित्राचा अभ्यास करायला हवा.

सामान्य उत्सकुकतेला जिज्ञासेत व जिज्ञासेला ज्ञानपिपासेत परिपक्व करण्याचे तन्त्रज्ञान स्वामी विवेकानन्दांच्या Questionmarkकिशोरावस्थेतून युवावस्थेपर्यन्तच्या जीवनातून शिकायला मिळते. लोक देव, देव इतकं करतात ते नेमकं काय असतं? खरोखर ईश्‍वर नावाची कुठली सर्वशक्तीमान, सर्वव्यापक, सत्ता मुळात आहे तरी का? असली उत्सुकता आणि कुतुहल तर प्रत्येकाच्याच मनात येत. पण असे किती युवक असतील जे ह्या प्रश्‍नांच्या उत्तरासाठी गांभिर्याने प्रयत्न करतात?

नरेन्द्राचे फक्त उत्सुकतेवर भागणार नव्हते. त्याने यासाठी तीन्ही शास्त्रोक्त उपायांचा अभ्यास केला. अनेक ग्रंथांचा अभ्यास केला. विभिन्न तत्वज्ञानांचा अभ्यास केला. ब्राह्‌मो समाजात जाऊ लागला. अनुभवी लोकांच्या बोलण्याकडे लक्ष देवून त्यांनी सांगितलेल्या उपायांवर स्वत: प्रयोग केले. अनेक तास ध्यान लावण्याचा सराव केला. अशाप्रकारे शास्त्र-स्वाध्याय, आप्त-वाक्य श्रवण व स्वत: प्रत्यक्ष प्रयोग या तीन्ही उपायांनी नरेन्द्रची जिज्ञासा परिपक्व ज्ञानपिपासेत रूपांतरित झाली.

या ज्ञान पिपासेतूनच त्यांना गुरू भेटले. श्रीरामकृष्ण परमहंसाबद्दल त्यांनी स्वत:चे मामा श्री. रामचन्द्र दत्त यांचेकडून ऐकले. त्यांचा मित्र सुरेन्द्रनाथ दत्तच्या घरी श्रीरामकृष्णांसमोर गायनाचा प्रसंगही आला. इंग्रजीच्या प्राध्यापकांनी पण वर्डस्वर्थची कविता शिकवतांना समाधीच्या उदाहरणाकरिता श्रीरामकृष्णांचा उल्लेख केला. मामांबरोबर नरेन्द्र दक्षिणेश्‍वरला गेले. प्रथम भेटीत श्रीरामकृष्णांच्या वागण्यावर त्यांना शंकाच आली. पण परिपक्व ज्ञानपिपासेने शंकेच्या धुक्यातून परिक्षेचा कंदिल धरण्याची प्ररेणा दिली. या गुरू शिष्य सम्बधातून नरेन्द्राच्या जीवनात श्रध्देचा उदय झाला. (याबाबत पुढे पाहू. तुर्तास यौवनाचा पहिला अनविार्य गुण जिज्ञासा याचा विचार.)

शंका, कुतुहल, उत्सुकतेतून उलगडणारी मानवसुलभ जिज्ञासा, स्वाध्याय, श्रवण आणि प्रयोगाच्या मुशीतून तावून निघते तेव्हाच तिचे ज्ञानपिपासेत संस्करण होते. या सगळयाचा प्रारम्भ होतो पण त्यासाठी प्रश्‍न विचारायला हवेत. ज्ञानी जनांना तर प्रश्‍न विचारायचेच पण त्याहून महत्वाचे आहे स्वत:ला प्रश्‍न विचारणे. स्वामी विवेकानन्द सांगतात जो प्रश्‍न आपण इतरांना विचारतो तो प्रथमत: स्वत:ला विचाराल की नाही? चला आजच सुरूवात करूया. जो प्रश्‍न स्वामीजी प्रत्येक युवकाला विचारायचे तोच आज आपण स्वत:ला विचारूया. या माझ्या जीवनाचे उद्दिष्ट काय?

ईश्‍वर साक्षात्काराची जिज्ञासा नसली तरी चालेल. पण स्वत:च्या जीवनाचे काय करायचे ते तर ठरवायलाच हवे ना? प्रत्येकाचे जीवन अद्वितीय आहे. विशिष्ट उद्देश्याने, विशिष्ट कार्यासाठी प्रत्येकाचा जन्म झाला आहे. त्याचा शोध घेणे ही प्रत्येकाची पहिली जिज्ञासा असायला हवी. पण आपण याच महत्वाच्या प्रश्‍नाला टाळत असतो. काय बनायचे याचा विचार करण्याआधी हा विचार करायला हवा की मी कोण? कशासाठी माझा हा जन्म झाला ? काय माझ काम आहे? चला या प्रश्‍नांवर विचार करूया. पुढल्या आठवडयात श्रध्दा जागरणाने या स्वकर्तव्यास कसे तडीस न्यायचे ते पाहुया.

जनवरी 31, 2013 Posted by | Marathi Lekh | , , , , , , , , , , , , , | टिप्पणी करे

कुशल मंगल है।


गढ़े जीवन अपना अपना -15

चरित्र निर्माण के बाहरी आयामों में चौथा व अंतिम है – कौशल। शारीरिक बल, रूप ओर स्वास्थ्य के साथ ही विभिन्न प्रकार के कौशल भी जीवन में वांछित सफलता पाने के लिये आवश्यक है। जीवन के लक्ष्य की ओर बढ़ने में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है अन्यथा भी अनेक प्रकार की परिस्थितियों में जीवन को अपने निश्चित लक्ष्य की ओर अग्रेसर करने की चुनौति आ सकती है। आचार्य चाणक्य अपने शिष्यों को शिक्षा देते है कि यदि मार्ग में बाधा नहीं है तो समझना चाहिये कि मार्ग सही दिशा में नहीं है। इसलिये जब हम अपने जीवन में लक्ष्यप्राप्ती का मार्ग चुनते है तो हमें सभी प्रकार की स्थितियों के लिये स्वयं को तैयार करना चाहिये। अतः व्यक्तित्व विकास में कौशल प्राप्ति का असाधारण महत्व है। पांडवों के जीवन में आई प्रत्येक बाधा को उन्होंने कौशल प्राप्ति का साधन बनाया। अर्जुन ने सारे जीवन भर नये नये अस्त्रों को प्राप्त करने के लिये अलग अलग खतरों का सामना किया। किरात रूप में स्वयं शंकर भगवान का सामना कर पाशुपतास्त्र प्राप्त करना हो या नारायणास्त्र की उग्र तपस्या हो, इन सब ने ही अन्ततः धर्मयुद्ध में पाण्डवों को विजयश्री प्रदान की।

वर्तमान युग में तीन प्रकार के कौशल में प्रशिक्षित होना विकसित व्यक्तित्व के लिये आवश्यक है। पहली श्रेणी में जीवनोपयोगी कौशल आते है जो व्यक्ति को स्वावलम्बी बनाते है। स्वयं के लिये हम नियम सा बना ले जो मुझे चाहिये वो मै बना सकूं। खाना खाते है ना तो भोजन पकाना आना चाहिये। आधुनिक घरों के बच्चों को तो भोजन परोसना और थाली धोना भी नहीं आता। कपड़े पहनते है तो कपड़े धोना, प्रेस करना या कुछ थोड़ी बहुत सिलाई करना सीख लेना चाहिये। कुछ सम्पन्न घरों के बालकों को तो कपड़ों की घड़ी करना भी नहीं आता। विकसित व्यक्तित्व का ध्येय हो कि किसी भी परिस्थिति में दूसरे पर निर्भर ना रहना पड़ें। ये उपर से सरल लगने वाली बाते कभी कभी बड़ी बाधा बन जाती है। कपड़े धोने का अभ्यास ना हो तो अचानक साफ कपड़े नहीं धो सकेंगे। स्वावलम्बन की आदत बाल्यकाल में ही पड़ जानी चाहिये। समझदार अभिभावक सामथ्र्य के बावजूद 10 से 16 वर्ष के आयु में बालकों को नौकरों पर निर्भर नहीं होने देते।

दूसरी श्रेणी में अभिव्यक्ति का कौशल आता है। अपने व्यक्तित्व को प्रगट करने के लिये अभिव्यक्ति-कौशल अत्यावश्यक है। जीवनलक्ष्य की प्राप्ति में यह महत्वपूर्ण है। वर्तमान समय में व्यावसायिक सफलता में भी यह अनिवार्य हो गया है। इस श्रेणी के कौशल में भाषा का ज्ञान आता है। व्यक्ति को अधिक से अधिक भाषाओं को सीखना चाहिये। वर्तमान में केवल अंग्रेजी पर बल दिया जाता है पर भाषा कौशल का सर्वोत्तम विकास मातृभाषा में ही होता है। यदि एक बार मातृभाषा में प्रवीणता हासिल कर ले तो फिर अन्य किसी भी भाषा को सीखना सरल हो जाता है। हमारे मस्तिष्क में जो भाषा सम्बंधी केन्द्र है उनका विकास होना आवश्यक है यदि ये केन्द्र ठीक से विकसित हो जाये तो कोई भी नई भाषा सीखना सहज सुलभ हाता है। यन्त्र मानव (रोबोट) के विकास के लिये अनिवार्य कृत्रिम बुद्धि (Artificial Intelligence) के बारे में जो अत्याधुनिक अनुसंधान हुए है वे हमें बताते हैं कि संस्कृत एक ऐसी परिष्कृत भाषा है कि जिसके अध्ययन से मस्तिष्क का पूर्ण विकास होता है। यह भाषा गणितीय होने के कारण बिना किसी विसंगति के भाषीय तर्क का विकास होता है जो मस्तिष्क के भाषा केन्द्रों के स्नायविक उतकों (Neurons) के विकास में गति प्रदान करता है। इसी शास्त्रीयता के चलते इंग्लैण्ड के कुछ विद्यालयों में वैदिक मंत्रो तथा संस्कृत के अध्यापन को प्रारम्भ किया गया है। यदि संस्कृत व अपनी मातृभाषा पर प्रभुत्व प्राप्त कर लिया जाये तो फिर अंग्रेजी में भी सहज प्राविण्य मिल जायेगा। हाँ प्रयास तो करना ही पड़ेगा। मातृभाषा फिर संस्कृत और उसके बाद अंग्रेजी यदि यह क्रम रखा जाये तो भाषा सीखने में आनन्द आयेगा और प्रयास कठीन होने से भी खेल के समान आनन्ददायी होंगे।

अभिव्यक्ति कौशल का दूसरा अंग है कला। प्रत्येक व्यक्ति में अपनी भावनाओं के प्रेषित करने की आकांक्षा भी होती है और उसकी अपनी एक विधा भी। यही विधा कला के रूप में प्रगट होती है। सारी कलायें भावों की अभिव्यक्ति के लिये ही होती है। प्रत्येक के स्वभाव के अनुरूप व्यक्ति अपने भाव शब्द या रूप के द्वारा अभिव्यक्त करता है। शब्द या ध्वनि के द्वारा सम्प्रेषण काव्य, लेखन, संगीत आदि कलाओं में विकसित होता है। रूप अथवा आकार के द्वारा सम्प्रेषण शिल्प, चित्रकला, नृत्य नाट्य आदि कलाओं में विकसित होता है। संसार में प्रत्येक व्यक्ति कलोपासक होता है अर्थात कलाभिव्यक्ति को करनेवाला अथवा उसका आस्वादन करनेवाला होता है। अपने अन्दर की कला का विकास भी व्यक्तित्व के विकास के लिये अत्यावश्यक है। व्यावसायिक लक्ष्य को महत्व देते समय कला को अतिरिक्त एवं अनावश्यक मानते हुए दुर्लक्षित किया जाता है पर यह आत्मघाती है। कलाविहीन व्यक्ति में जो अधुरापन रहता है वह उसे किसी भी क्षेत्र में अपनी पूरी क्षमता से कार्य नहीं करने देता। अतः अपनी अपनी रूचि के अनुसार कलाविधा का चयन कर उसके प्रशिक्षण, अभ्यास व आस्वादन के लिये नियमितता से समय देना चाहिये। जीवन के लक्ष्यप्राप्ति में सहायक होने के साथ ही कलोपासना जीवन को रसमय बनाकर परिपूर्ण कर देती है।

तीसरी श्रेणी के कौशल में यन्त्रविद्या (Technology) का अन्तर्भाव होता है। मानव की शारीरिक क्षमताओं को विस्तारित करने का काम यन्त्र करते है। यन्त्रों के सुविधाजनक प्रयोग से कार्य को सुचारू, सक्षम एवं कम समय में किया जा सकता है। आधुनिक जीवन में संचार के साधन बढ़ जाने के साथ ही जीवन में उपकरणों की संख्या एवं भुमिका दोनों में प्रचण्ड वृद्धि हुई है। संगणक (Computer) और चल-दूरभाष (Mobile) तो प्रत्येक के अनिवार्य उपांग हो गये है। इनके प्रयोग एवं उपयोग में असीम सम्भावनायें है और शायद ही कोई ऐसा दम्भ भर सकें कि इनको पूरी तरहा से जान लिया। इन उपकरणों का प्रयोग तो सभी करते है पर अनेक सुक्ष्म पहलुओं की ओर ध्यान नहीं देते। हममें से कितने लोग जानते है कि केवल कुछ नम्बर डायल करके ही अपने मोबाईल की पूर्णतः समाप्त (Discharged) बैटरी को कुछ और देर तक चलाया जा सकता है। ऐसी अनेक बातें है जिनकी बारीकियों के बारे में हम लोग नहीं जानते। दिल्ली के छतरपूर मंदिर की घटना है। एक अमेरिकी पर्यटक ने अपना अत्याधुनिक कॅमेरा देकर एक भारतीय छात्र को फोटो लेने को कहा। दो-तीन फोटो लेने के बाद कॅमेरा लौटाते हुए छात्र ने पर्यटक को कॅमेरे के बारे में कुछ तकनिकी प्रश्न पूछे। अमेरिकी ने जबाब दिया मै इसकी तकनिक के बारे में कुछ नहीं जानता केवल उपयोग जानता हूँ। जापानी चीजे बनाते हैं हम प्रयोग करके खराब होने पर फैंक देते है। हम भारतीय ही है जो खराब चीजों को भी सुधारकर प्रयोग में लेते है। ये जुगाड़ हमारी कंजुसी या कमी नहीं यन्त्र ज्ञान के प्रति हमारी स्वाभाविक जिज्ञासा है। आधुनिक पीढ़ि में भी ये जिज्ञासा है पर प्रतिस्पद्र्धा की आपाधापी में हम इस कौशल को भूल ना जाये, प्रयत्नपूर्वक विकसित करें।

स्वावलम्बन, कला और यन्त्रविद्या तीनों श्रेणियों के कौशल विकसित करने के लिये नित्य अभ्यास ही एकमात्र उपाय है। कौशल के नैपुण्य में ही हमारा कुशल है और सार्वजनिक उद्देश्य के प्रति समर्पित कुशल ही मानवता के लिये मंगल होता है।

मार्च 14, 2012 Posted by | आलेख | , , , , , , , , , , , | 8 टिप्पणियाँ

   

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