उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

धर्मानुसारी शिक्षा की स्थापना में शिक्षकों की भूमिका


Ruprekhaमानव की पहचान संबंधों से है | बिना संबंधों के मनुष्य का कोई परिचय ही नहीं है | समस्त सृष्टि के अन्तर्निहित एकत्व का सुप्त ज्ञान मानव मन को अनंत विस्तार हेतु प्रेरित करता है | प्रकटतः भले ही हम स्वयं को सबसे अलग मानते है फिर भी अंतर्मन में इस बात का भान सदैव रहता है कि हम उस एक ईश्वरीय चेतना के अंग है | इस अनुभूति के कारण ही मनुष्य सदैव अपनी चेतना का विस्तार करने का प्रयत्न करता है | इसीलिए मानव को सामाजिक प्राणी भी कहते है | यह सामाजिकता मनुष्यता का महत्वपूर्ण अंग है किंतु सृष्टि के सम्बन्ध केवल मानव समाज तक ही सीमित नहीं है | इसके तंतु सर्वव्यापी है | मानव का मानव से, मानव का समाज से, मानव का अन्य प्राणियों से, सृष्टि से, समूचे ब्रम्हांड से तथा अंततोगत्वा परमात्मा से जो सम्बन्ध है, उन संबंधों के निर्वहन को धर्म कहते है | इस पूरे अस्तित्व को जिन अन्तर्निहित नियमों द्वारा धारण किया गया है उसी को धर्म कहते है | यही धर्म व्यवहार में भी अपेक्षित है | धर्मानुसारी शिक्षा का अर्थ है प्रत्येक को इस धर्म की अनुभूती कराना तथा उसपर आधारित व्यवहार का प्रशिक्षण प्रदान करना |

वर्तमान समय में धर्मसंकल्पना का अर्थ स्पष्ट न होने के कारण पूरी शिक्षा ही धर्मविहीन हो गयी है| उपासना के रूप में धर्म का सीमित अर्थ प्रचलित होने के कारण उसे भेद का मूल मान लिया | परिणामतः धर्मनिरपेक्षता के नाम पर धर्म के समग्र रूप को ही व्यवहार से बाहर कर दिया | धर्मानुसारी शिक्षा तो क्या, शिक्षा में धर्म के अंतर्भाव की भी कल्पना वर्तमान वातावरण में नहीं कर सकते | ऐसी स्थिति में से धर्मानुसारी शिक्षा के आदर्श तक पहुँचने हेतु जिन महत्प्रयासों की आवश्यकता है उनमें शिक्षकों की भूमिका सर्वोपरि है | शिक्षक ही शिक्षा की धुरी है | चाहे जैसी भी व्यवस्था हो, शिक्षक के बिना शिक्षा की कल्पना ही नहीं कर सकते | व्यवस्था चाहे जितने भी निर्बंध लगा ले, कक्षाकक्ष में पढ़ाते समय विधि एवं व्यवहार की स्वतंत्रता को कोई छीन नहीं सकता | शिक्षक यदि अपने इस स्वातंत्र्य का समुचित उपयोग करे तो शिक्षा व्यवस्था के पुनरुत्थान में चमत्कार संभव है | वैसे भी धर्म आचरण से ही संभव है और आचरण का प्रशिक्षण किसी पाठ्यक्रम की अपेक्षा व्यावहारिकता से अधिक दिया जा सकता है | अतः यदि शिक्षक अपनी भूमिका का धर्म के अनुसार निर्वहन करने लगे तो वर्तमान व्यवस्था में भी धर्मानुसारी शिक्षा प्रदान करना संभव है | २ से ३ प्रतिशत शिक्षकों के दृष्टिकोण में सम्यक परिवर्तन आ जाये तो व्यवस्था परिवर्तन भी प्रारंभ हो जायेगा | व्यवस्था परिवर्तन के २ मार्ग है | क्रान्ति के मार्ग से व्यवस्था को एक झटके में बदला जाता है | किंतु इस पद्धति में परिवर्तन का आधार राजतंत्र होता है जोकि अपनेआप में धर्मानुसारी शिक्षा के सिद्धांतों के विपरीत है | क्रान्ति में परिवर्तन ऊपर से नीचे की ओर होता है | परिवर्तन का दूसरा मार्ग सहज, स्वाभाविक, क्रमशः होनेवाला परिवर्तन है | परिवर्तन संसार का स्थायी स्वभाव है | संसरति इति संसारः | अतः समाज में स्वतः होनेवाले परिवर्तनों के साथ शिक्षा में भी क्रमशः परिवर्तन होता है | इसे उत्क्रांति मार्ग कहते है | वैज्ञानिकों का मानना है कि यह अनियंत्रित परिवर्तन पतन की ओर ही जाता है | भौतिक शास्त्र में इसे Entropy (परिक्षय) का सिद्धांत कहते है | क्रांति में प्रस्थापित व्यवस्था का ध्वंस निहित है | १८३५ में मैकोले ने यही किया था | सकारात्मक शिक्षा की प्रस्थापना हेतु क्रांतिकारी परिवर्तन कितना भी आकर्षक लगे, अत्यंत कठिन है | एक तो ऐसे परिवर्तन हेतु आवश्यक सम्पूर्ण सैद्धांतिक स्पष्टता तथा उसे व्यवहार में उतारनेवाले प्रशिक्षित आचार्य एक साथ एक समय इतनी बड़ी संख्या में तैयार करना तथा इस व्यवस्था को स्थापित करने हेतु अनुकूल राजतंत्र का उपलब्ध होना, दोनों ही बातें दुष्प्राप्य है | यदि महत्प्रयास से धर्मसत्ता आदर्श आचार्यों को तथा राजसत्ता राजनैतिक इच्छाशक्ति को प्राप्त भी कर ले तब भी अचानक व्यवस्था परिवर्तन समाज में सांस्कृतिक क्षोभ (cultural shock) उत्पन्न करेगा | दूरस्थ वनवासी क्षेत्रों में अचानक आधुनिक शिक्षा को प्रस्थापित करने से ऐसा विक्षोभ देखने में आता है | ऐसे सामूहिक विक्षोभ की स्थिति में अधिकतर समय समाज अच्छी बातों को भी नकार देता है |

उत्क्रांति का पथ सहज, स्वाभाविक व नैसर्गिक है | किंतु फिर भी उसमें विकास के स्थान पर पतन की ही अधिक संभावना है | प्रयत्नपूर्वक धर्मानुसारी शिक्षा की chanakyaस्थापना हेतु आवश्यक परिवर्तन करना यह मार्ग ना तो अचानक झटके से की हुई क्रान्ति हो सकता है और ना ही अत्यंत धीमी गति से होनेवाली उत्क्रांति | जिस मार्ग का अवलंबन धर्मसंस्थापना के लिए किया जाना अपेक्षित है उसे सम्यक क्रान्ति कहा जा सकता है | संस्कृत में इसे यदि एक शब्द में कहना हो तो कहेंगे ‘संक्रांति’ | संक्रांति में परिवर्तन क्रमशः व नैसर्गिक है किंतु परिवर्तन की गति व दिशा सुनियोजित होगी | क्रमशः उत्थान करते हुए अंतिम आदर्श को प्राप्त किया जायेगा | यही भारतीय पद्धति है | संक्रांति में क्रान्ति की तरह विस्फोट नहीं है और ना ही उत्क्रांति की तरह पतन | जो-जो जिस-जिस स्तर पर है वही से क्रमशः उत्थान की ओर अग्रसर हो यही संक्रांति का मार्ग है | धर्मसंस्थापना की यही शाश्वत विधि है |

शिक्षा में संक्रांति की आधारशिला शिक्षक ही होंगे | संक्रांति में चूंकि परिवर्तन बाहर से थोपा नहीं जाता अपितु अन्दर से ही किया जाता है | अतः यह हमेशा मानव-केन्द्रित होगा, व्यवस्थानुगत नहीं हो सकता | शिक्षक धर्मानुसारी शिक्षा की संकल्पना को अर्थात धर्म की सुस्पष्ट संकल्पना को हृदयंगम करे | इसीसे शिक्षा में संक्रान्ति प्रारम्भ होगी | इस धर्म को अपने व्यक्तिगत जीवन में आचरण से प्रारम्भ करना होगा | धीरे-धीरे अध्ययन, अध्यापन व शिष्यों के साथ व्यवहार में धर्म का प्रभाव प्रारम्भ होगा | शिक्षक के कक्षा में धर्माचरण प्रारम्भ करने से सकारात्मक परिवर्तन दृष्टिगोचर होंगे | किसी भी शैक्षिक संस्थान में यदि १० प्रतिशत शिक्षक धर्माचरण करनेवाले हो जाये तो प्रयत्नपूर्वक उस शिक्षा संस्थान को धर्मानुसारी शिक्षा के आदर्श के रूप में प्रस्थापित किया जा सकता है | जब इन शिक्षा संस्थानों से समाज के सभी क्षेत्रों में सर्वोत्तम व्यक्तित्व प्रदान किये जायेंगे तब सारा समाज इन शिक्षा संस्थानों का अनुसरण करने लगेगा | परिवर्तन का धर्मानुसारी मार्ग यही है |

संक्रांति का प्रारम्भ शिक्षकों के सुगठन हेतु आयोजन करने से होगा | आचार्य निर्माण की यह प्रक्रिया बाहरी प्रशिक्षण से नहीं अपितु अंदरूनी स्वाध्याय से ही संभव है | धर्मसंस्थापना की प्रेरणा से उद्दीपित आचार्य एकत्रित आकर धर्म को समझने हेतु अध्ययन, विमर्श, मनन, चिंतन करेंगे तब उसे स्वाध्याय कहा जायेगा | इस स्वाध्याय का मूल आधार तो शास्त्र ग्रन्थ ही हो सकते है | किंतु साथ ही शास्त्रीय सिद्धांतों की युगानुकुल अभिव्यक्ति को भी स्वाध्याय का आधार बनाना होगा | धर्म के तत्व को हृदयंगम करना स्वाध्याय का प्रथम चरण है | इसका अगला चरण धर्मावलंबन के व्यावहारिक आयामों का सृजन है | कुछ दो, चार, दस या पचास लोग भी कुछ विधियों की सूचि बनाकर सारे अध्यापकों को दे देंगे तो काम नहीं चलेगा | धर्मावलंबन की विधियों का सृजन प्रत्येक को अपनी प्रतिभा का समुचित उपयोग करते हुए करना होगा | यह सृजन प्रक्रिया प्रत्येक के लिए स्वतंत्र होते हुए भी व्यक्तिगत नहीं हो सकती | धर्म का मर्म सामूहिक क्रिया में है | अतः स्वाध्याय भी सामूहिक ही करना पड़ेगा | चिंतन मनन द्वारा समझे हुए तत्व को व्यवहार में उतारने का नाम है निदिध्यासन | इसी से स्वाध्याय परिपूर्ण होगा | स्वाध्यायी आचार्यों के नियमित मंडल सर्वत्र प्रारम्भ करने होंगे | प्रयत्नपूर्वक पूरे समाज में इस योजना को क्रियान्वित करना होगा |

स्वाध्याय से प्राप्त विधियों को अपने-अपने अध्यापन में प्रयोग कर परिष्कृत किया जायेगा | ऐसे कुछ शिक्षक साथ मिलकर या तो पूर्व से चल रहे शिक्षा संस्थान को आदर्श बनायेंगे अथवा नूतन पूर्णतः धर्मानुसारी शिक्षा संस्थानों का निर्माण करेंगे | इनके प्रभाव से नीतियों में भी परिवर्तन होगा | प्रारम्भ में केवल इतना भी हो जाये कि राजसत्ता ऐसे पूर्णतः निःस्वार्थ भाव से चलनेवाले गैर-वाणिज्यिक धार्मिक शिक्षा संस्थानों को स्वतंत्रता से कार्य करने दे, किसी भी प्रकार का नीतिगत हस्तक्षेप ना करने दे तो भी पर्याप्त है | ऐसे समाजपोषित शिक्षा संस्थान क्रमशः प्रमुखता प्राप्त करते जायेंगे व शासनमुक्त शिक्षा व्यवस्था का विकास करेंगे |

Saraswati-Statue-to-Washingtonइस पूरी प्रक्रिया में शैक्षिक संगठनों की भी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है | इस हेतु शैक्षिक संगठनों के कार्यकर्ताओं का मानस धर्मसंकल्पना के प्रति दृढ़ करना होगा | वर्तमान में देश में भारतीय दृष्टी को ध्यान में रखकर काम करनेवाले तीन प्रकार के शैक्षिक संगठन कार्यरत हैं | कुछ संगठन शिक्षा संस्थानों का संचालन करते हैं | निःस्वार्थ सेवा भाव से राष्ट्रनिर्माण हेतु चरित्र निर्माण करनेवाली संस्कारवान शिक्षा प्रदान करनेवाले कई शैक्षिक संगठन हैं | संख्या की दृष्टी से विद्याभारती इनमें अग्रणी है | रामकृष्ण मिशन, चिन्मय मिशन, भारत सेवक समाज, सर्वोदयी विचारधारा से चलनेवाले संगठन आदि अनेक संगठन इस श्रेणी में आते हैं | यद्यपि इन शिक्षा संगठनों द्वारा चलाये जानेवाले शिक्षा संस्थान आधुनिक व्यवस्था का अंग होने के कारण पूर्णतः भारतीय नहीं है | फिर भी इन संगठनों का संचालन करनेवाले कार्यकर्ताओं की मंशा धर्माधिष्ठित भारतीय पद्धति को स्थापित करने के लिए अनुकूल है | धर्मदृष्टि को समझने से इन शिक्षा संस्थानों के शिक्षकों द्वारा संक्रांति होना तुलनात्मक रूप से अधिक सुकर होगा |

दूसरे प्रकार के संगठन शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत विभिन्न घटकों के हितों की रक्षा हेतु काम करते हैं | विद्यार्थियों के हितों के लिए विद्यार्थी संगठन जैसे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, शिक्षकों के हितों के लिए विभिन्न राज्यों में गठित शिक्षक संघ तथा कई राज्यों में निजी संस्थाचालकों के संगठन भी हैं | इस प्रकार के शैक्षिक संगठन प्रमुखतः अपने सदस्यों के अधिकारों, आर्थिक हितों तथा समस्याओं के समाधान हेतु आन्दोलन शासन से चर्चा अथवा न्यायालयीन दावों के माध्यम से कार्य करते हैं | इन संगठनों का मूल स्वभाव सदस्यों की स्वार्थपूर्ति होने के कारण इनमें जुडनेवालों के मन में भी निजी हितों की वरीयता अधिक होती हैं | इसका सकारात्मक परिणाम यह है कि इन संगठनों की सदस्य संख्या बहुत अधिक होती है | यह संख्याबल इनकी प्राथमिक शक्ति है | धर्मानुसारी शिक्षा के तत्वों का प्रचार कर अनुकूल वातावरण निर्मिती में ये संगठन महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं | इनके माध्यम से शिक्षा में जुड़े हुए एक बड़े वर्ग तक वैचारिक सन्देश पहुंचाना संभव हो सकता है | यद्यपि इसका सैद्धांतिक गुणांकन नहीं होगा फिर भी धर्माचरण में रत शिक्षकों को नैतिक समर्थन देनेवाले अनुकूल मन के समर्थकों का वर्ग तैयार किया जा सकता है | ये लोग स्वाध्याय और संक्रांति के क्रियान्वयन में पूरी तरह से सहभागी भले ही न हो उसके लिए पोषक उर्वराभूमि का निर्माण निश्चित रूप से कर सकते हैं | संक्रांति के द्वितीय चरण धर्माधिष्ठित शिक्षा के सर्वव्यापीकरण में लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत संख्या का भी बड़ा महत्त्व है | इस चरण में इन शैक्षिक संगठनों की भूमिका सबसे प्रभावी होगी | इन संगठनों में धर्मानुसारी शिक्षा के विचार का बीजारोपण करने हेतु कुछ वैचारिक कार्यक्रमों की योजना करना आवश्यक होगा | ऐसे कार्यक्रमों के माध्यम से कार्यकर्ताओं को धर्मसंकल्पना का परिचय दिया जा सकेगा | संख्या बड़ी होने के कारण पूर्ण वैचारिक स्पष्टता की अपेक्षा तो नहीं कर सकते, केवल अधिकारों के साथ कर्तव्यों का विचार करने का संस्कार भी प्रेरित किया जा सके तो प्रारंभ के लिए पर्याप्त होगा | अधिकारों के लिए लड़ने के साथ ही कर्तव्यपालन में ही हमारा अधिक स्थायी हित है यह बात समझना धर्मविचार का शुभारम्भ है |

तीसरे प्रकार के शैक्षिक संगठन वैचारिक कार्य करनेवाले संगठन हैं | इनका मूल काम ही शिक्षा के भारतीय प्रतिमान पर अनुसंधान कर उसे युगानुकूल रूप में प्रस्थापित करने का नियोजन करना है | पुनरुत्थान विद्यापीठ, भारतीय शिक्षण मंडल, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास आदि संगठन इस श्रेणी में आते हैं | धर्माधिष्ठित शिक्षा को ही विभिन्न नामाभिधानों से प्रकट करते हुए उसकी संस्थापना हेतु ये वैचारिक संगठन कार्य कर रहे हैं | शिक्षा व्यवस्था में धर्मसंस्थापना हेतु संक्रांति करने में इन संगठनों की योजक भूमिका अपेक्षित है | संक्रांति के लिए आवश्यक विभिन्न घटकों को एक सूत्र में गूंथने का परोक्ष कार्य इन संगठनों को करना होगा | संक्रांति के तात्विक अधिष्ठान की सुस्पष्टता की जिम्मेवारी भी इन्ही संगठनों की बनती है | अनादि काल से भारत में जीवंत धर्मसंकल्पना को मूल रूप में समझकर उसका युगानुकुल स्पष्टिकरण समाज में प्रदान करना धर्मानुसारी शिक्षा के लिए प्रथम आवश्यकता है | धर्म तो साक्षात्कार का विषय है | अतः इन संगठनों के कार्यकर्ताओं को साधक बनना होगा | उपरी प्रवचन, उद्घोषणाएं, प्रस्ताव आदि तो संगठनात्मक आवश्यकताओं के अनुरूप चलते रहेंगे किंतु इन संगठनों का वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि गहन गंभीर साधना को तत्पर कितने कार्यकर्ताओं का निर्माण इन संगठनों की प्रेरणा से हुआ | संक्रांति के अन्य सभी चरणों की शुद्धि, पावित्र्य, प्रभाव, साफल्य तथा सार्थकता इस साधना पर निर्भर करती है | अतः इन संगठनों से जुड़े सभी कार्यकर्ताओं का शास्त्राध्ययन तथा स्वाध्याय कठोर नियमितता के साथ होना अपेक्षित है | समय-समय पर सामूहिक विमर्श, प्रत्यक्ष प्रयोग, उन प्रयोगों से प्राप्त अनुभवों पर पुनः सर्वांगीण संविमर्श तथा आपसी समन्वय यह इस साधना की कार्यपद्धति बनती है | इस चर्चा स्वाध्याय के साथ ही इन विचारों का युगानुकुल शब्दावलि में संहिता लेखन भी अनिवार्य है | तैतरीय उपनिषद् के शिक्षावल्ली अनुवाक् में गुरु अपने दीक्षांत आदेश में स्पष्ट निर्देश दे रहा है – स्वाध्याय प्रवचनाभ्यां मा प्रमदितव्यं – स्वाध्याय और प्रवचन में कभी आलस न करना | यहाँ वर्तमान युग के अनुरूप प्रवचन के अर्थ को विस्तारित करके समझना होगा | वैसे भी प्रवचन का अर्थ है पूर्ण गंभीरता से प्रकट करना – प्रकर्षेण वाच्यति इति प्रवचनं | वर्तमान स्थिति में वैखरी वाणी का अक्षररूप अर्थात लिखित साहित्य अधिक प्रामाणिक माना जाता है | अतः प्रवचन के अर्थ में गंभीर लेखन को सम्मिलित करना पड़ेगा | वैचारिक संगठनों के कार्यकर्ताओं को प्रयत्नपूर्वक नित्यलेखन का अभ्यास करना होगा | प्रतिदिन नियमपूर्वक कुछ पृष्ठ लिखने की आदत बन जाये तो शनैः शनैः लेखनी में स्पष्टता व लेखन में गांभीर्य आ जायेगा |

धर्म के सुस्पष्ट साक्षात्कार के साथ ही वैचारिक संगठनों के कार्यकर्ताओं का यह भी दायित्व बनता है कि उसका युगानुकुल प्रयोग करे | अतः शिक्षकों व पहले दो प्रकार के संगठनों के साथ मिलकर शिक्षा में धर्मप्राण नवोन्मेष करने का शुभ व्रत भी इन संगठनों का है | ऐसे प्रयोगों से प्राप्त निष्कर्षों को संहिताबद्ध कर अनेक स्थानों पर दोहराने योग्य प्रतिमान का निर्माण करना होगा | यह प्रतिमान सभी स्तरों पर स्वाध्याय, प्रयोग व धर्माचरण का आधार बनेगा | इसी प्रतिमान से धर्मानुसारी शिक्षा को स्थापित करने, धर्मप्राण, स्वाध्यायी आचार्यों की संक्रांति संभव होगी |

अप्रैल 4, 2016 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , | 11 टिप्पणियाँ

बहुआयामी धर्म की एकात्म संकल्पना


BG2किसी भी राष्ट्र में सामाजिक, राजनैतिक समस्याओके मूल में वैचारिक अस्पष्टता की बहुत बडी भूमिका रहती है। भारत में ब्रिटिष राज के अवषेष आज भी वैचारिक विभ्रम के रूप में बने हुए है। सदियों से ऐतिहासिक सांस्कृतिक अनुभूति के आधार पर जिन संकल्पनाओं का विकास हुआ उनकी अवधारणाओं एंव मर्म को अनुवाद की अपर्याप्तता के कारण भ्रमित कर दिया गया है। समाज एवं लोक जीवन में प्रचंड विविधता के बाद भी अनेक संकल्पनायें देश के सभी भाग में समान रूप से समझी जाती है। आपको उस प्रांत की प्रादेशिक भाषा का ज्ञान हो न हो अनेक आध्यात्मिक गूढ संकल्पनाओं को भी आप सहजता से समझ सकते है। कैलास से लेकर कन्याकुमारी व द्वारका से लेकर परषुराम कुंड तक कही पर भी आप जाइए-माया, लीला, श्रद्धा आदि अत्यंत गंभीर आध्यात्मिक संकल्पनाओं को सामान्य से सामान्य व्यक्ति भी सहजता से समझता है। अतिविषिष्ट भाषाई विविधता के होते हुए भी इन संकल्पनाओं का एक समान अर्थ पूरे देश में प्रचलित है। लीला को समझाने के लिए महर्षि वेदव्यास को भागवत महापुराण की रचना करनी पडी, जयदेव को गीत गोविंद लिखना पडा और तुलसी को मानस। संभवतः इन्ही सबके सदियो तक किए हुए अनुष्ठान का ही परिणाम है कि आज हमारा पूरा समाज इन गूढ मान्यताओं को सामान्य बोलचाल की भाषा मे अचूक प्रयोग करता है । ऐसे अनेक पद ऐतिहासिक अनुभूतियों से विकसित होते हैं । वे केवल इस भाषा के शब्द नही होते अपितु एक जीवंत व्यावहारिक संकल्पना होते हैं । इन शब्दों का न तो किसी भाषा मे अनुवाद किया जा सकता है और न ही ऐसा प्रयास करने की कोई आवश्यकता है । जैसे लड्डू को विश्व की सभी भाषाओं मे लड्डू ही कहना चाहिए और पिझ्झा को पिझ्झा ही । वैसे ही इन संकल्पनाओं को अनुवाद के बिना जस का तस व्यक्त किया जाना वैचारिक प्रामाणिकता के लिए अनिवार्य है । ब्रिटिश राज के काल में विद्वानो द्वारा इस महत्वपूर्ण तथ्य की अनदेखी की गई । जिस कारण संकल्पनाओं का विकृत, संकुचित और सीमित अर्थ समाज मे प्रचलित हुआ । जिसके फलस्वरूप सामूहिक संभ्रम की स्थिति देश की मेधा में छा गई । राज प्रतिष्ठित विद्वानों द्वारा इन भ्रमित संकल्पनाओं पर आधारित नीतियों पर आधारित कार्य्रक्रमों का चलन हुआ । देश में व्याप्त मानसिक गुलामी का यह सबसे बडा कारण हैं । जिस एक संकल्पना के संकीर्ण व भ्रमित होने के कारण स्वतंत्र भारत मे सर्वाधिक परिणाम हुए हैं, वह है ‘धर्म’ की अवधारणा । धर्म को रिलीजन के पर्यायवाची मान लिए जाने के कारण, सर्वपंथ समभाव को पंथ निरपेक्षता के रूप मे परिभाषित किया जाना, और इस विकृत शब्दरचना के कारण राजकीय व्यवस्थाओं तथा सभी सामुदायिक गतिविधियों से धर्म को प्रयत्नपूर्वक अलग कर दिया गया । शिक्षा में से भी धर्म को अलग करने के प्रयास में सभी संस्कार, सदाचार, नैतिकता आदि अनिवार्य बातें भी हटा दी गई । अब इन सब बातों को लागू करने के लिए मूल्य शिक्षा जैसे अधूरे प्रयास किए जा रहे है । आवश्यकता तो यह है कि धर्म की सही अवधारणा को पुनःप्रस्थापित कर धर्मानुसारी शिक्षा की पुनर्रचना की जाए ।

भारत में धर्म यह एक बहुआयामी संकल्पना है । वास्तव में यह एक जीवन जीने का मार्ग है । पाशविक वासनाओं से उपर उठकर मानवीय संवेदनाओं के अनुरूप जीवन जीना तथा क्रमश: विकसित होते हुए महामानव, देवमानव, दिव्यमानव व अंततः प्रत्यक्ष दिव्यता की अनुभूति यह विकास का मार्ग धर्म है । धर्म केवल व्यक्तिगत आत्मोन्akmनति ही नही अपितु पूरे समाज के ही दिव्यत्व की ओर गति करने का माध्यम बनता है । धर्माधिष्ठित समाज में प्रत्येक व्यक्ति अपने -अपने स्वभाव के अनुसार जहाॅ हैं उस स्थिती से क्रमशः इस प्रगति की ओर अग्रेसर होता है । समाज जीवन मे धर्म प्रतिष्ठित होने पर प्रत्येक में यह उच्च आकांक्षा स्वतः जन्म लेती है । साथ ही समाज में इस प्रकार के अवसर और मार्गदर्षक दोनो ही उपलब्ध होते हैं । समाज जीवन के सभी अंग धर्मप्राण होते हैं । अतः जो प्रजा को धारण करता है वह ‘धर्म’, ऐसी धर्म की व्याख्या की जाती है । स्वभाव को भी धर्म कहा है । अतः उस स्वभाव के अनुरूप ही मार्ग का चयन करना होता हैं । स्वभाव भी धर्म है और उन्नतिगामी समाज में आपसी संबंध व सामुदायिक जीवन की परंपरायें भी धर्म है । मानव का मानव से, परिवार से, समाज से, सृष्टी से तथा अंत मे परमेष्ठी मे एकात्म संबंध है । इस संबंध को समझकर उसका निर्वाह करना धर्म है । अतः भारत में सामान्य बोलचाल की भाषा मे पुत्रधर्म, पितृधर्म, पत्नीधर्म, पतिधर्म ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जाता हैं । आपसी संबंधो का निर्वहन कर्म के द्वारा किया जाता हैं । अतः क्या करणीय है ? और क्या अकरणीय है? यह जो बताया है, उसे भी धर्म कहते हैं । उस अर्थ मे धर्म कर्तव्य का परिचायक हैं । ‘राजधर्म’ आदि शब्दों मे ‘राजा के कर्तव्य’ यही भाव प्रकट होता हैं । स्वयं के व सृष्टी के प्रति मनुष्य के कर्तव्य का बोध होने पर धर्म संयम का रूप धारण करता हैं । अतः इसे मर्यादा भी कहा गया है । कर्तव्य, अकर्तव्य के साथ ही भोगने की मर्यादा भी धर्म निर्धारित करता हैं । इन्द्रियों के द्वारा कितना भोग करेंगे? क्या भोगें? व कैसे भोगे? यह बात जिस अलिखित नियम से, संस्कारो के रूप मे सामूहिक मन मेे सुप्रतिष्ठित की जाती हैं उस नियम को भी धर्म कहते हैं । समाज जीवन के नियम धर्माधारित होते हैं । अपेक्षा यह है कि राज सत्ता भी धर्म विधान से ही परिचालित हो । अतः भारत मे न्याय करने हेतु रचित विधिविधान के नियमों को भी धर्म कहा गया । जब इसमें किसी व्याख्या का निर्धारण करना हो तो ‘धर्मसभा’ का आयोजन किया जाता था । अब आधुनिक युग मे कानून, विधि विधान तथा नैतिक अपेक्षा व धर्म विहित कर्तव्य दोनो अलग-अलग हो गये हैं । वास्तव में राजव्यवस्था धर्माधिष्ठित हो तब इन दोनो का भी तादात्म्य ही होता हैं ।

चर अचर सभी वस्तुओं के स्वभाव को धर्म ही कहा जाता हैं । आधुनिक विज्ञान शिक्षा मे भी वस्तुओं के गुणधर्म सिखायें जाते हैं । किसी भी सजीव भूतमात्र अथवा निर्जीव वस्तु का स्वभाव ‘धर्म’ कहलाता है जैसे अग्नि का धर्म है दाहकता, जल का धर्म है प्रवाहित होना । कितने भी छोटे स्थान पर जल को बांध भी दे वह लहरों के रूप प्रवाहित होता हैं । प्रत्येक वस्तु अपने स्वभावधर्म को धारण किए हुए अस्तित्व मे रहती हैं । प्रत्येक मनुष्य भी अपने आप में विशिष्ट स्वभाव का होता है । वह स्वभाव ही उसका स्वधर्म हैं । उसी के अनुसार उसे स्वयं से व अन्यों से संबंधों का निर्वाह करना हैं । यह संबंध भी धर्म द्वारा परिभाषित हैं । सारी सृष्टि ही एक ईश्वर की एकात्म अभिव्यक्ति हैं । अतः उसके प्रत्येक अंग का विशिष्ट स्थान होने के साथ अन्य अंगो के साथ अंगांगी संबंध हैं| जिस प्रकार शरीर के विभिन्न अंग परस्पर पूरकता के साथ स्वयं के कार्य को करते हुए औरों के सहयोगी बनते हैं उसी प्रकार मनुष्य को परिवार, समाज, सृष्टि व परमेष्टि के साथ समन्वयात्मक संबंध का निर्वाह करना होता है । सृष्टि के इन ईश्वरीय नियमों को ‘धर्म’ कहते हैं । मानव को अपने स्वधर्म का प्रगटीकरण कर्म रूप मे करना होता हैं । उद्देष्यपूर्ण कर्म स्वधर्म होता हैं । स्वधर्माधिष्टित कर्म मानव जीवन को परिपूर्ण बनाता हैं । धर्म केवल तत्व न हो करके प्रत्यक्ष व्यवहार में उतारना पडता है । अतः कहा गया है कि ‘आचार प्रभवो धर्म’ इन इतनी सारी विविध छॅटाओ का एक साथ धारण किए हुए धर्म की संकल्पना इस यज्ञ भूमि मे विकसित हुयी । समय-समय पर लोगों ने इसे अपने जीवन मे उतारकर आदर्श प्रस्तुत किए । विद्वानों ने इसके गुण तत्वों की मीमांसा की । जीवन के विभिन्न आयामों मे धर्म को सुव्यवस्थित रूप से परिभाषित करने का काम शास्त्रों ने किया । सार्वकालिक, शाश्वत तत्वों के रूप मे मनुष्यों ने इसकी पहचान की । मनुमहाराज ने धर्म के दस लक्षण बताए हैं । एक दो भेंदो के साथ यही पंतजली के योगसूत्रों मे परिलक्षित हुए हैं । भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद गीता के सोलहवे अध्याय मे दैवी गुण सम्पद के सोलह गुणों के रूप मे धर्माचरण को स्पष्ट किया हैं ।

समाज जीवन में व्यक्ति को भिन्न-भिन्न भूमिकाओं का निर्वाह करना पडता है । अनेक बार इन विभिन्न भूमिकाओं मे आचरण किए जाने वाले धर्म का आपसी टकराव हो जाता है । ऐसे धर्म संकट में से बाहर निकलने का मार्ग भी शास्त्र बताते हैं । जहाॅ व्यष्टि धर्म समष्टि धर्म के साथ टकराता है, वहाॅ बडी इकाई को महत्व देना साधारण सा नियम है| जब व्यक्ति के ही दो व्यक्तिगत धर्मो के बीच टकराव हो तब शास्त्र कहते हैं कि समाज के अधिकतम हित का ध्यान रखते हुए ज्यादा से ज्यादा लोगों का जिसमे हित हो उस बात को वरीयता दी जाए । इसी प्रकार से एक और वर्गीकरण धर्मपालन की कठोर नियमितता को लेकर शास्त्रों में मिलता है। वह है सामान्य धर्म, विशेष धर्म व आपदधर्म । सामान्य जीवन यापन करते हुए नित्यनियम के रूप मे कुछ कर्तव्यो का समावेष होता है, उसे सामान्य धर्म कहते हैं । यात्रा, बीमारी आदि विशेष परिस्थितियों मे इन नियमों की कठोरता में कुछ मात्रा मे रियायत बरती जाती है उसे विषेष धर्म कहते है । जब प्राणों पर ही संकट आ पडें, उस समय सामान्य रूप से अकरणीय कार्य को करने की अनुमती होती है इसे आपदधर्म कहते है | धर्मपालन के लिए जब देह ही न बचे ऐसी आशंका की परिस्थिती में ही आपदधर्म का अवलंब किया जा सकता है अन्यथा नही ।
इस प्रकार धर्म का अत्यंत व्यावहारिक एवं सूक्ष्म विवेचन भारत मे शास्त्र ग्रंथो में और साथ ही लोक जीवन में भी दिखाई देता है । आज भी हिंदू समाज के अधिकतकम लोग सहज सुलभ परंपरा के रूप मे धर्म का अवलंबन करते हैं । धर्म पालन में त्रुटि के परिणाम स्वरूप जीवन में जो संकट आयेंगे उनका स्पष्ट भान सामान्य भारतीय को परंपरा से प्राप्त हुआ है । अतः धर्म भीरूता के चलते सामान्य व्यक्ति शुद्ध सात्विक एवं प्रामाणिक जीवनयापन करने का प्रयत्न करता है । विदेशी शासन के चले जाने के बाद भी विदेशी तंत्र को ही अपनाए रखने के कारण व्यवस्था में से धर्म लुप्त हो गया हैं । उस कारण चरित्र का संकट शासन तंत्र और उससे जुडी सामूहिक गतिविधियों में दिखाई दे रहा हैं । यह अत्यावश्यक है कि हम अपनी समस्त व्यवस्थाओं को शाश्वत, सनातन धर्मानुसार पुनर्गठित करें । चिरस्थायी सार्वजनिक सुख का यह एकमात्र मार्ग हैं । धर्मराज्य की स्थापना ही सर्वे भवन्तु सुखिनः की वैश्विक प्रार्थना को साकार कर सकती हैं ।

दिसम्बर 23, 2015 Posted by | आलेख | , , , , , , , | 2 टिप्पणियाँ

धर्म का मर्म


कर्मयोग 11:
धर्म के आचरण को मानव का सबसे बड़ा रक्षक और साथी माना जाता रहा है। रामायण में जब राम वनवास में जाने से पूर्व माता कौसल्या का आशिर्वाद ग्रहण करने जाते है तो माता यही आशिर्वाद देती है। यदि आज तक तूमने जीवन में धर्म का पालन किया है, तो वह निर्वाह किया हुआ धर्म सभी संकटों में तुम्हारी रक्षा करेगा। धर्मो रक्षति रक्षितः। जो धर्म की रक्षा करता है धर्म उसकी रक्षा करता है। महाभारत युद्ध से पूर्व जब दूर्योधन अपनी माता गांधारी का आशिर्वाद लेने जाता है तब वह भी यही तत्व बताती है। माँ द्वारा युद्धोत्सुक पूत्र को दीर्घ जीवन का आशिर्वाद दिये जाने पर दूर्योधन आश्चर्य से पूछता है। आपने मुझे विजय का आशिर्वाद नहीं दिया? तब माता उत्तर में धर्म का मर्म बताती है – श्रृणु मुढ़ः। यतो धर्मः ततो जयः। यतो कृष्णः ततो धर्मः। हे मूर्ख सुन, जिस पक्ष में धर्म होगा उसी की विजय होगी। और जहाँ स्वयं कृष्ण है वही धर्म होगा। जब मानव धर्म के मर्म को स्वयं के जीवन में उतार लेता है तब उसका कर्म ही धर्म का मापदण्ड़ बन जाता है। वह स्वयं धर्म का मूर्तिमंत रुप बन जाता है। वाल्मिकी रामायण में कहा है – रामो विग्रहवान धर्मः। राम मूर्तिमन्त धर्म है।

गीता का प्रारम्भ ही धर्म शब्द से होता है। धर्मक्षेत्रे कुरूक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।गी 1.1। धर्म का क्षेत्र, और उसका नाम है कुरूक्षेत्र। कुरू का अर्थ है ‘करो’। अर्थात जो कर्म का क्षेत्र है वही धर्म का क्षेत्र है। संस्कृत में शब्दों का क्रम बदल कर भी अर्थ समान रहता है। अतः इसी पंक्ति को एसे भी समझ सकते हैं। क्षेत्रे क्षेत्रे धर्मं कुरू। अर्थात जीवन के हर क्षेत्र में धर्म का आचरण करों। यह तो पूरी गीता का ही सार हुआ। गीता में क्षेत्र का भी अर्थ विस्तार से समझाया है। पूरा 13 वा अध्याय ही क्षेत्र व क्षेत्रज्ञ के बीच में भेद व सम्बन्ध के बारे में है। क्षेत्र का एक अर्थ है खेत। खेत शब्द की उत्पत्ती ही क्षेत्र से हुई है। उच्चारभेद में क्ष का ख होना सामान्यसा भाषाशास्त्रीय नियम है। गीता पूरे जगत को ही खेत कहती है और ईश्वरीय आत्मतत्व है जो इस खेत में खेती करने वाला किसान है। गीता में इसे क्षेत्रज्ञ कहा है- खेत को जानने वाला। कर्म की खेती में धर्म के नियम लागू करने से ही जीवन में आनन्द व मुक्ति की फसल पा सकेंगे।

आधुनिक समय में धर्म का अर्थ सीमित कर दिया है इसी कारण जब गीता में धर्म की बात होती है तो उसे समझने में कई बार भूल हो जाती है। यह नहीं कहा जा सकता कि इतिहास में कब से धर्म को मत, सम्प्रदाय अथवा पंथ के पर्यायी के रुप में देख जाने लगा, किन्तु गीता में इस पद का प्रयोग इस अर्थ में एक बार भी नहीं हुआ है। भारतीय संकृति में जीवन के शाश्वत अर्थात समयातीत, सभी युगों तथा देशों में लागू होने वाले नियमों को सनातन धर्म कहा गया। इसमें व्यक्ति का व्यक्ति से, व्यक्ति का समष्टि अर्थात सब प्रकार की सामूहिक रचना यथा जनजाति, समाज या राष्ट्र से, व्यक्ति व समष्टि का सृष्टि अर्थात सम्पूर्ण प्राणी व वनस्पति जगत के साथ ही समस्त पर्यावरण के साथ सम्बंधों के बारे में शाश्वत नियमों को जानकर उनपर आधारित जीवनरचना को साकार किया गया। यह पूरी समझ वैज्ञानिक होने के कारण ही सबके लिये समान थी केवल इसकी बाह्य अभिव्यक्ति देश काल के अनुसार विविध हो सकती है। इस सत्य को समझने के कारण ही भारत में विविधता के कारण संघर्ष के स्थान पर समारोह होता है। विविधता का केवल सम्मान ही नही पूजन किया जाता है। इन्ही नियमों में व्यक्ति तथा समष्टि के परमेष्टि अर्थात सर्वव्यापी परमसत्ता से सम्बन्ध को भी परिभाषित किया गया। सम्भवतः इसी अंग के कारण जब संकुचित उपासना पद्धति आधारित सम्प्रदायों से सामना हुआ तब उनकी पंथानुभूति को भी इसी विविधता में से एक समझा गया। पर यह तो भारतीय मूल के सम्प्रदायों की समझ थी जिसे अन्य कट्टर तत्वधारी संकीर्ण मत नहीं मानते थे। हमारे इतिहास में इन मतों के आक्रमणों को ना समझ पाने के कारण बड़ा नुकसान हुआ है। अतः धर्म का अर्थ ठीक से समझना आवश्यक है। सबसे पहले तो यह स्पष्ट कर लेना आवश्यक है कि अंगरेजी के शब्द Religion का अनुवाद धर्म नहीं हो सकता। उन्हें पंथ अथवा मत कह सकते है। भगिनी निवेदिता ने इस भेद को स्ष्ट करने के लिये अंगरेजी में पुस्तक लिखी – Religion and Dharma जिसका हिन्दी अनुवाद कार्यकर्ताओं के लिये ध्येयमार्ग में अत्यंत उपयागी है इसीलिये हिन्दी में इस पुस्तक का शीर्षक है -‘पथ और पाथेय’

जीवन के सनातन नियमों को धर्म कहते हैं। इस विशाल समझ को हम कुछ वैज्ञानिक भागों में विश्लेषित कर ठीक से जान सकते है। इससे यह भी स्पष्ट होगा कि किस प्रकार भिन्न भिन्न सन्दर्भ में धर्म का लाक्षणिक अर्थ अलग अलग छटा के साथ प्रयोग में आता है। जीवन को समझने में जगत की अभिव्यक्ति के सभी अंगों को उनके वास्तविक स्वरूप में जानना होता है। जब वस्तु के वास्तविक रुप अर्थात स्वभाव की समझ को बताना होता है तो उसे उस वस्तु का धर्म कहते है। जैसे अग्नि का धर्म है दाहकता। अब यहाँ आग की जलाने की क्षमता व स्वभाव को दर्शाने के लिये धर्म पद प्रयुक्त हुआ। इसी अर्थ में हम रसायनशास्त्र में जब भिन्न भिन्न रसायनों का वर्णन करते है तो कहते है ये प्राणवायु के गुणधर्म है। यहाँ धर्म गुण अथवा स्वभाव के रुप में प्रयोग हुआ है। जीवनमें उस वस्तु, व्यक्ति अथवा समूह के सम्बन्ध को परिभाषित करने के लिये उसके सनातन गुण या स्वभाव को समझना आवश्यक है इसिलिये यहा धर्म पद का प्रयोग उचित ही है।

केवल वस्तु के स्वभाव को ही नहीं मानव के विशिष्ट स्वभाव को भी धर्म ही कहा गया है। गीता इसी को स्वधर्म कहती है। स्वधर्म ही मानव कोअपने पशुवत् वृत्तियों को नियन्त्रित करने की क्षमता प्रदान करता है और अपने जीवन का समग्र विकास करने का मार्ग प्रदान करता है। इस अर्थ में धर्म आत्मविकास का मार्ग है। पशुमानव से मानव, मानव से महामानव व महामानव से दिव्य मानव और अन्ततः साक्षात दिव्यता को ही प्राप्त करने का मार्ग धर्म है। इसी सन्दर्भ में स्वामी विवेकानन्द कहते है, ‘‘आत्मसाक्षत्कार ही धर्म है।’’ और विस्तार से इसका विवरण भी वे देते है, ‘‘प्रत्येक जीव में अन्तर्निहित दिव्यत्व है। इस दिव्यता को जीवन मे प्रगट करना ही जीवन का लक्ष्य है। प्रकृति के अन्तर्बाह्य नियमन से ही यह सम्भव है। ज्ञानयोग वा भक्तियोग, राजयोग वा कर्मयोग इन चारों में से एक अथवा अनेक या कि सभी के आचरण द्वारा मुक्त हेाना ही धर्म का मर्म है। बाकि सारी बाते जैसे पुस्तकें, परम्परा, उपासना के नियम, मंदिर, मठ यह सब तो गौण उपचार मात्र है।’’ धर्म के इसी अर्थ का विपर्याय होकर इसे केवल उपासना पद्धति के रूप में उसे संकुचित कर देख गया। एक ईश्वर, एक दूत व एक ग्रंथ पर आधारित मत अपने को ही समग्र मान कर अंतिम सत्य के रूप में प्रचारित करने लगते है। इसी एक मार्ग से मुक्ति सम्भव है इस विश्वास को लेकर पूरे विश्व को ज्ञान अथवा शस्त्र बल के आधार पर अपने मत में मतांतरित करने का प्रयास करते है। इससे ही पूरे विश्व में संर्घष व आतंक का प्रादुर्भाव हुआ है। ऐसे मतों के समकक्ष वैज्ञानिक विचार पर आधारित सदा गतिमान सनातन धर्म अथवा वर्तमान में प्रचलित इसके नामाभिधान हिन्दूत्व को नहीं रखा जा सकता। जो थोथी पंथनिरपेक्षता के चक्कर में इस्लाम, इसाई, यहुदी, पारसी आदि पंथों के साथ ही हिन्दू धर्म की तुलना करते हुए सबको समान बताते है वह सत्य से कोसों दूर है। दिखवटी समानता के प्रचार के स्थान पर इनके तुलनात्मक अध्ययन से इनके भेद को समझकर स्वीकार करना ही शांति का स्थायी मार्ग है। हमारे ऋषियों ने इसीका प्रतिपादन किया था – ‘एकं सत् विप्राः बहुदा वदन्ति।’ सत्य एक है, ज्ञानीजन उसका अनेक प्रकार से वर्णन करते हैं। इसे स्वीकार करने पर ही पंथ धर्म का रुप ले सकते है। अन्यथा उनको समान कहना उचित नहीं है।

व्यक्ति व समूह के द्वारा कर्म के माध्यम से ही सम्बन्धों का निर्वाह किया जाता है। इस निबाहने वाले व्यवहार से कुछ अपेक्षायें होती है। उस आधार पर नियमावली विकसित होती है। उसे भी धर्म कहते है। हमारा किसी के साथ कैसा व्यवहार हो इसे अभिव्यक्त करते समय भी धर्म शब्द का प्रयोग होता है। अतः हर सम्बन्ध का अपना धर्म है। पति धर्म, पुत्र धर्म, पड़ौसी का धर्म, राजधर्म यह सब सम्बन्धों को निभाने की विधियाँ हे जिसे धर्म कहा गया है। यह धर्म का एक और अर्थ हुआ। इसमें यह कर्तव्य का रुप धारण करता है। जब हम पतिधर्म या पत्निधर्म की बात करते हे तो पति के पत्नि के प्रति या पत्नि के पति के प्रति कर्तव्य की बात कर रहे होते है। कर्तव्य का ही कर्म में निर्वाह हो सकता है। वर्तमान समय में कर्तव्य को महत्व देने के स्थान पर उसके परिणाम स्वरुप सम्बन्धी को प्राप्त होनवाले लाभ को महत्व दिया गया है। इसे ‘अधिकार’ कहा जाने लगा। अब सारी बात ही उलटी हो गई। अधिकार परिणाम होने के स्थान पर अपेक्षित कर्म बन गये। जब व्यक्ति अपने कर्तव्य के स्थान पर दूसरे के कर्तव्य के फलस्वरूप हमें प्राप्य परिणाम की अपेक्षा को ही जीवन का आधार बना लेता है तो स्वाभाविक ही जीवन परावलम्बी हो जाता है। हम इन अपेक्षाओं को लेकर संघर्ष में पड़ जाते हैं। इसके विपरित यदि प्रत्येक अपने धर्म अर्थात कर्तव्य का पालन करने लगे तो परिणाम स्वरुप सहज ही दूसरों के अधिकारों की पूर्तता हो जायेगी। यह अधिक वैज्ञानिक भी है। कर्तव्य कर्मप्रधान होने के कारण हमारे अधिकार में, नियन्त्रण में है। अधिकार का वास्तविक अर्थ यही है- जिस पर हमारा स्वामीत्व है। दूसरी ओर जिसे आजकल अंगरेजी के Right शब्द के पर्याय अधिकार के रुप में समझा जाता है वह अपेक्षा पर आधारित होने के कारण केवल सम्भावना के अधीन है अतः हमारे नियन्त्रण में नहीं है। कितनी मजेदार बात हुई जिसे हम अधिकार मान रहे है वो वैज्ञानिक तथ्य के अनुसार हमारे अधिकार में ही नहीं है। धर्म का कर्तव्य यह अर्थ भी उसके बृहत् प्रत्यय सृष्टि के सनातन नियम का ही एक अंग है।

यह कर्तव्य धर्म सम्बन्धों के संजाल के द्वारा समाज को धारण करता है। यह धारण करने का कर्म ही उसे धर्म यह नाम प्रदान करता है। अतः समाज को धारण करने की प्रक्रिया को धर्म कहा गया। इसके लिये आध्यात्मिक, औपासनिक व न्यायिक इन तीनों व्यवस्थाओं का निर्माण होता है। अतः धर्म ही विधि अर्थात कानून का रुप लेता है। यदि समाज की प्रगल्भता पर्याप्त रुप से विकसित ना हो ता इसे राजकीय मान्यता की आवश्यकता पड़ती है अतः विधि की रचना करनी पड़ती है। बिना राजनैतिक हस्तक्षेप के सनातन नियमों की युगानुकुल व्याख्या के समाज में रुढ़ होकर उसके द्वारा समाज की सहज धारणा ही आदर्श समाज रचना है। इसीको धर्मराज्य कहा गया। भारत में धर्मराज्य का अर्थ अंगरेजी के Theocracy से नहीं होकर, समाज में धर्म के प्रस्थापित होने से राज्य के विसर्जित हो जाने व मानवीय मूल्यों द्वारा ही प्रत्येक व्यक्ति द्वारा स्वतः एकल व सामूहिक कर्तव्य का पालन किया जाना है। महाभारत के शांतिपर्व में शरशैयापर लेटे भीष्म द्वारा युधिष्ठिर को इसी धर्मराज्य की स्थापना के सुत्रों का मार्गदर्शन किया गया है। उस समय वे पूर्व में साकार धर्मराज्यों का विवरण करते है। न राज्यो न च राजा आसीत, न दण्डों न दण्डितः। न तो कोई राजा आवश्यक था ना ही कोई शासन व्यवस्था। न किसी को सजा देने की आवश्यकता पड़ती थी। धर्मेनैव प्रजा सर्वा रक्षन्ति स्म परस्परं। वर्तन्ति स्म परस्परं।। धर्म के द्वारा ही सारी प्रजा एकदुसरे का परस्पर रक्षण करती थी। एक दूसरे से निर्वाह करती थी।

यह धर्म स्थापित करना ही मानवमात्र का व्यक्तिगत व सामूहिक जीवनध्येय है। इसिलिये इसे चतुविर्ध पुरुषार्थ का सबसे महत्वपूर्ण आधार माना गया है। यह चार पूरूषार्थों में से केवल एक नही हैं। अर्थ व काम को भी धर्म के ही आधार पर करना है। मोक्ष अपने आप में इससे उपर सर्वोच्च लक्ष्य है। जब तक जगत के नियमों से मुक्त नहीं हो जाते तब तक बाकि तीनों पुरूषार्थ ही जीवन का लक्ष्य है और वे तीनों ही धर्म के ही अंग है। मोक्ष की आकांक्षा भी धर्म का ही परिणाम है। जीवन में सब स्तरों पर धर्म का निर्वाह करने से चित्त की शुद्धि के कारण ही मुमुक्षा- मोक्ष की ईच्छा जागृत होती हैं। यह मुमुक्षा ही मोक्ष की ओर अग्रेसर करती है। अतः इसका भी मूल भी धर्म में ही है। यह धर्म का व्यवस्थागत रुप है। इसीकी संस्थापना के लिये बार बार अवतार होते है। इस धर्माधारित विश्वव्यवस्था को अगली बार विस्तार से देखेंगे। तब तक धर्म पद के इन पाँच प्रत्ययों, अर्थछटाओं को हृदयंगम करना आवश्यक है। 1. स्वभाव या गुणधर्म, 2. आत्म विकास का मार्ग, 3. व्यक्ति, समाज, सृष्टि तथा परमेष्टि के आपसी सम्बन्धों के निर्वहन में प्रयुक्त कर्तव्य, 4. विधि अथवा कानून तथा 5. समस्त जगत को धारण करने वाला आधार तत्व यह धर्म के पाँच आयाम हमने देखें। यह समझने के लिये भले ही अलग अलग विश्लेषित किये गये हो इनका अन्तर्निहित मर्म एक ही है। उसका साक्षात्कार ही अपने जीवन में धर्मस्थापना है। धर्म के मर्म को समझे और अपने जीवन में उतारे यही सच्चा योग है।

फ़रवरी 15, 2012 Posted by | योग | , , , , , , , , , | 3 टिप्पणियाँ

   

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