उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

Look beyond political controversy, Yoga is for all


Another Post as a precursor to IYD. This piece was written for bharatniti.in giving it here for the blog followers.

http://www.bharatniti.in/story/look-beyond-political-controversy-yoga-is-for-all/44

IYD

Yoga has been accepted universally as a discipline of moulding one’s own life to active overall well-being, accepting it as a way of life beyond faith, worship or religious dogmas. The same was evident when more than 170 countries across five continents unanimously supported the resolution for declaring June 21 as the International Day of Yoga at the General Assembly of the UNO.

IYD LogoMany of them proposed or seconded it without any voting or discussion. In fact, many of the Islamic countries too supported the resolution. Yoga is being practiced by people beyond the religious beliefs.

On this background of universal consensus, it is ironical that the decision of the central government to celebrate the International Day of Yoga all over the country is being opposed on religious grounds by some misguided elements. When the whole world is unanimous about the universal appeal of Yoga, it is a shame that this great science of living is being subjected to controversy in the land of its origin.

Social media is full of photographs of members of different communities performing Yogic exercises. The universal acceptance of Yoga is very much witnessed across different communities in India.

Controversy more of political concoction than popular

The present fabricated controversy over the celebration of the International Day of Yoga is the result of intolerant minds. Yoga is a science which demands experiments and experiences and does not ask one to believe or un-believe anything. The performance of Yoga does not affect any belief systems. If at all it will enhance ones capacity to have undeterred in one’s own beliefs. Yoga is necessarily an Bharatiya philosophy as it was first compiled in this holy land and has all the attributes of Sanatana Dharma because it was practiced, experimented and evolved into different systems by generations of Hindus. But it still is a universally applicable science of life and the art of living.

The practice of Yoga will not swerve the individual from his personal religious beliefs. It will also not make him antagonistic to his or any other religion but will, on the contrary, augment his affection for his personal deity. The practice of Yoga will not proselytize a Muslim or a Christian, but will on the contrary make him a better adherent of his faiths. Thus, no one should be afraid of Yoga as it includes all and excludes none.

So what is Yoga actually?

Yoga is beyond a mere physical exercise. In fact, Yoga is neither mere physical exercise nor is it just a therapy. As per the ancient traditions, it is a way of scientific living. A modern being may find it hard to comprehend but the mind is the prime factor of all our actions in life. And yoga is nothing but the training of the mind. Thus it (yoga) enables perfection in every action at all levels. The whole universe functions in disciplined manner. There are laws of existence which govern the natural phenomena irrespective of any subjective intervention. The only exception to this smooth governance of the universe are human beings.

The humans are endowed with the will to act and the power of imagination. The combination of these two have created all the scientific wonders. Like all kinds of powers, this also needs regulation. If uncontrolled, power becomes corrupt and boon is converted into a curse. This is true at individual as well as collective level.

Sage Patanjali, in his Yoga aphorisms, initiates with a simple statement – ath yoga anushasanam [Thus we begin the discipline of Yoga.] The aim of all the yogic practices right from Asanas, Suryanamaskara, Pranayamas up to Dhyana [meditation] and Samadhi is disciplining the mind. If the mind is concentrated, anything and everything can be accomplished.

Yoga is the way of orienting the mental powers to one’s aim. The conflicts and clashes in the world are a result of intolerance born out of lack of coordination among one’s own multiple roles. There are various schools of Yoga and they have different practices.

There are several variants of the same Yogic practice. Some well- meaning noble Acharyas even tried to standardize yogic practices. This futile effort has not succeeded as diversity is an inherent feature of existence. Everything that exists is unique in its form, function and role. Yoga not only takes into account this diverse uniqueness but also enriches the extraordinary individuality of the seeker, the performer. At the same time, yoga helps the sadhaka (practitioner, the doer) to realize the underlying oneness behind the apparent diversity.

So, whatever be the practice, if the mind is tuned properly with a synchronized awareness and relaxation, it integrates one with all. Essence is not in the action but in the intent. Yoga literally means union. Every practice that enables the mind to expand and unite the different levels of collectivity is Yoga. Yoga gives quietude, peace and harmony to the individual mind and if performed regularly by a sizable portion of the humanity, will spread this peace and harmony to the cosmic world.

One can say with full conviction that the mass performance of various Yoga practices on the historic occasion of the International Day of Yoga on June 21 will definitely lead to conflict free and harmonious world.

जून 18, 2015 Posted by | सामायिक टिपण्णी, English Posts | , , , , , , , , , , , , , , , , , , , | 2 टिप्पणियाँ

शासन-निरपेक्ष शिक्षा व्यवस्था ही समस्त समस्याओं का स्थायी उपाय!


schoolभारतीय शिक्षा की परम्परा अतिप्राचीन व अत्यन्त गौरवपूर्ण है। अनादिकाल से ही भारत ने सारे विश्व को मानवता की शिक्षा दी है। केवल आध्यात्मिक शिक्षा ही नहीं, हर प्रकार की लौकिक शिक्षा भी भारत ने ही विश्व को दी। विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के हर क्षेत्र में भारत न केवल प्रगत था ही तो उनके शिक्षा की प्रगत विधि भी भारत में विकसित की गई थी। इसी कारण सारे जगत से यहाँँँ छात्र शिक्षा ग्रहण करने आते रहे है। हजारों की संख्या में आनेवाले छात्रों के लिये अनेक गुरूकुल भारत में चलते थे। इसी व्यवस्था के चलते भारत को जगतगुरू कहा जाता रहा है। 11-12 वी शताब्दी में मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा नालंदा जैसे विश्वविद्यालयों को जला दिया उसके फलस्वरूप सैंकड़ो विश्वविद्यालय बंद कर उनकी ग्रंथसंपदा को सुरक्षित रखा गया। ज्ञान की सुरक्षा भारत के लिये सबसे महत्वपूर्ण थी। इसके बाद के संघर्षकाल में भी भारत में शिक्षा का वटवृक्ष फैला हुआ था। ग्राम ग्राम में उच्च शिक्षा तक की व्यवस्था भारत में थी। मुस्लिम आक्रांताओं ने मंदिरों को तोड़कर उनके स्थान पर मस्जिदें बनवाने पर ही ध्यान दिया। देश के कोने कोने में चल रहे शिक्षा संस्थानों के भारतीय संस्कृति में योगदान के महत्व को सम्भवतः वे लोग समझ नहीं पाये।

इसी के चलते 1823 में अंग्रजों द्वारा किये गये देश के शैक्षिक सर्वेक्षण में पाया गया कि पूरे भारत में लाखों की संख्या में शिक्षा संस्थान थे। प्राथमिक शिक्षा तो लगभग सभी जनसंख्या को उपलब्ध थी। समाज के 76 प्रतिशत लोग उच्च शिक्षा विभूषित थे। प्रख्यात स्वदेशी चिंतक धर्मपाल ने 1966 में लंडन के अभिलेखों किये अनुसंधान पर आधारित पुस्तक ‘‘रमणीय ज्ञानवृक्ष’’ में इस सर्वेक्षण को समग्रता से प्रस्तुत किया है। देश का दुर्भाग्य ही है कि 40 वर्ष हो जाने के बाद भी यह क्रांतिकारी पुस्तक हमारे किसी भी पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं है। सर्वेक्षण में भारतीय शिक्षा व्यवस्था के बारे में अनेक तथ्य उजागर हुए है। सभी वर्णो के बालक-बालिकाओं को विद्यालयों में प्रवेश था। पढ़ाने वालों में भी शुद्रों सहित सभी वर्णों के शिक्षक हुआ करते थे। एक और महत्वपूर्ण बात स्पष्ट होती है कि प्राचीन समय के जैसे ही 19 शताब्दि तक भारतीय शिक्षा व्यवस्था पूर्णतः स्वायत्त थी। शासन का कोई भी हस्तक्षेप शिक्षा में नहीं था। आर्थिक रूप से भी शिक्षा पूर्णतः स्वयंपूर्ण थी। 1823 के शैक्षिक सर्वेक्षण की पृष्ठभूमि इस बात को स्पष्ट करती है।

1813 में कंपनी सरकार ने भूमिसुधार अधिनियम के द्वारा सभी प्रकार की सार्वजनिक भूमि को शासकीय घोषित कर दिया। इसके द्वारा मंदिर से जुड़ी जमीन, गाँव में सामूहिक स्वामीत्व की जमीन आदि के साथ ही शिक्षा संस्थानों की जमीन को भी शासन ने अपने स्वामीत्व में ले लिया। इससे शिक्षा संस्थानों को चलाना कठीन व धीरे-धीरे असंभव हो गया। अनेक विद्यालय-महाविद्यालय बंद पड़ने लगे। तब कुछ प्रतिष्ठित भारतियों ने ब्रिटिश सरकार से हस्तक्षेप के लिये आवेदन आदि किये। शासन के दबाव में इस्ट इंडिया कंपनी ने घोषणा की कि भारतीय शिक्षा संस्थानों को प्रतिवर्ष 1 लाख रूपयों का अनुदान दिया जायेगा। भारतीय इतिहास में यह पहला सरकारी शिक्षा अनुदान है। इससे पूर्व शिक्षा के सरकारीकरण का पाप द्रोणाचार्य को राज्यसेवा में रखने से हुआ था। उस महापाप का क्षालन महाभारत के नरसंहार से हुआ। गत 180 वर्ष के पाप का क्षालन ना जाने कितने रक्तप्रवाह से होगा।

इस अनुदान को बाँटने पर विधिक सलाह देने के लिये मैकाॅले नामक वकील को बुलाया गया। कितने शिक्षा संस्थान है जिन्हें अनुदान दिया जाय यह जानने के लिये पूरे भारत में शैक्षिक सर्वेक्षण किया गया था। वकील मैकाॅले ने अपनी कुटील बुद्धि से भारत की सर्वव्यापी, स्वायत्त, समाजाधारित, समृद्ध शिक्षा व्यवस्था को नष्ट कर दिया। 1835 में उसने शिक्षा का पूर्णतः सरकारीकरण कर दिया। भारतीयों को शिक्षा देने से कानुनन वंचित कर दिया। केवल कंपनी व इसाई मिशनरियों को विद्यालय चलाने की अनुमति दी गई। मैकाॅले की शिक्षा नीति ने प्रथम बार शिक्षा में जाति के आधार पर प्रतिबंध लगाये। ब्राह्मणों के सिवा सभी जातियों को शिक्षा से वंचित कर दिया। बाद में क्षत्रिय तथा वैश्यों के आवेदन करने पर इन्हें तो प्रवेश मिल गया पर असंगठित होने के कारण शुद्र शिक्षा से वंचित रह गये। कुछ ही दशकों में भारत का बहुजन समाज अशिक्षित हो गया। 1823 में जहाँ 76 प्रतिशत जनसंख्या सुशिक्षित थी आज स्वतंत्रता के 67 वर्षों के बाद भी अपना नाम लिख पाने वाले को भी साक्षर समझ लेने के बाद भी केवल 74 प्रतिशत ही साक्षरता हो पायी है। यह अंतर है शासन निरपेक्ष शिक्षा व्यवस्था व सरकारी व्यवस्था का।

स्वतंत्रता के बाद यह अपेक्षा थी कि अंग्रजों की व्यवस्था को बदल कर सही अर्थ में स्व के तन्त्र को लागू किया जायेगा। पर जिन लोगों के हाथ में शासन की बागड़ौर थी वे थे तो भारतीय पर मैकाॅले की व्यवस्था में शिक्षित -‘‘दिखने में तो भारतीय पर अंदर से पूर्णतः अंगे्रज भक्त’’। इन मैकाॅले पुत्रों ने अपने कतृृत्व से अपने आप को मैकाॅले का बाप ही सिद्ध किया है। 1991 के बाद सब ओर जब नीजीकरण का बोलबाला हुआ तब शिक्षा क्षेत्र में भी नीजीकरण हुआ। किंतु यह केवल व्यापारीकरण था। सरकारी नियन्त्रण तो बढ़ता ही रहा है। स्वतंत्रता केवल लूटने की है। छात्र व शिक्षक का शोषण नीजीकरण से बढ़ा। इसके उपाय के रूप में शासन का नियन्त्रण और बढ़ाया गया। अनेक नियामक संस्थाओं का निर्माण हुआ। इनसे शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ने के स्थान पर केवल भ्रष्टाचार ही बढ़ा। शिक्षा क्षेत्र के भ्रष्टाचार ने आज सभी सीमायें लांघ दी है। सभी स्तरों पर गुणवत्ता का प्रचंड ह्रास हुआ है। यदि शीघ्र उपाय नहीं किया गया तो 10 वर्ष बाद हम पढ़े-लिखे मूर्खों का देश हो जायेंगे।

शासन निरपेक्ष शिक्षा ही वास्तव में गुणवत्तापूर्ण, सर्वव्यापी तथा शुचितापूर्ण हो सकती है। शासन निरपेक्ष का अर्थ नीजीकरण नहीं है। नीजी व्यापारियों के हाथ में शिक्षा सौंपना उपाय नहीं हो सकता। गत 25 वर्षों का अनुभव बताता हैं कि इस प्रकार के व्यापारिक नीजीकरण से लाभ से अधिक नुकसान ही होता है। दूसरी ओर शासकीय संस्थानों में कर्मसंस्कृति का पूर्ण अभाव पाया जाता है। काम करने के स्थान पर टालने के उपाय ही किये जाते है। आज हर स्तर पर पाठ्यक्रम पर पूरी तरह शासकीय नियन्त्रण हो गया है। अनेक अनुमतियों, सम्बद्धताओं और उनके वार्षिक नवीनीकरण के नाम पर भ्रष्टाचार के साथ ही प्रशासनीक नियन्त्रण बढ़ गया है। आज अनेक शिक्षाविद् कुलपति जैसे पदों पर आरूढ़ होते हुए भी शासन के शिक्षा विभाग के अधिकारियों के ही नहीं बाबुओं के सामने भी लाचार दिखाई देते है। अतार्किक नीतियों के कारण धन के होते हुए भी आवश्यक कार्यों पर उसका उपयोग नहीं हो पा रहा है। परिणामतः देश में अनुसंधान व नवोन्मेष के क्षेत्र में पूर्ण शिथिलता आ गई है। इस घोर तमस से शिक्षा व्यवस्था को उभारने के लिये केवल सरकार को ही नहीं पूरे देश को भी शिक्षा को प्रथम वरीयता की आवश्यकता मानकर उपाय करना होगा।

वास्तव में अपनी नई पीढ़ि को समय की आवश्यताओं के अनुसार जीवनोपयोगी शिक्षा देने का दायित्व समाज का है सरकार का नहीं। आज भी अनेक सामाजिक संस्थाओं द्वारा आदर्श शिक्षा संस्थाओं का संचालन किया जा रहा है। वैसे तो आर्थिक संसाधन भी समाज ही जुटा सकता है किन्तु जिस प्रकार आज शासन सर्वव्यापी हो गया है उसके चलते कम से कम कुछ दशकों तक तो आर्थिक भार शासन को ही वहन करना होगा। किन्तु नियन्त्रण, नियमन तथा संचालन में स्वायत्तता की ओर गति किये बिना कोई भी उपाय प्रभावी व परिणामकारी नहीं हो सकेंगे। स्वायत्तता का निर्णय शासन को ही करना है। शासन को ही अपने अधिकार कम करने का निर्णय लेना है अतः इसमें राजनयिक ईच्छाशक्ति की प्रचण्ड आवश्यकता होगी। ऐसी ईच्छाशक्ति या तो स्पष्ट वैचारिक प्रतिबद्धता से आती है अथवा लोकतन्त्र में जनमत के दबाव में। दोनों स्तरों पर प्रयास करने होगे।

वर्तमान परिस्थिति में शिक्षा व्यवस्था में शासन की भूमिका पर विचार करते समय शासन-निरपेक्ष शिक्षा के आदर्श को सामने रखकर उसे क्रमशः कैसे प्राप्त किया जाय इस पर विचार करना होगा। सबसे पहला कदम तो राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा को समग्रता से संचालित करने के लिये पूर्णतः स्वायत्त शिक्षा आयोग स्थापित किया जाना होगा। वर्तमान में प्राथमिक, माध्यमिक, उच्च व उच्चतर ऐसे भिन्न-भिन्न स्तरों पर शिक्षा का संचालन किया जा रहा है। इसी के साथ अभियांत्रिकी, चिकित्सा, कृषि व शारीरिक शिक्षा आदि विषयों के अनुसार भी विविध नियामक है। इन सबके स्थन पर शिक्षा आयोग को पूरी शिक्षा को समग्रता से देखने का दायित्व दिया जाय। इससे समग्र व एकात्म शिक्षा नीति का विकास सम्भव होगा। इसी प्रकार के पूर्ण स्वायत्त शिक्षा आयोग राज्य तथा आगे जिला स्तर तक भी स्थापित करने होंगे। सच्चे अर्थों में स्वायत्त होने के लिये शिक्षा आयोग की संरचना पूर्णतः गैर राजनैतिक व गैर प्रशासनिक होनी होगी। शिक्षा विभाग के प्रशासनिक अधिकारी यहाँ तक की मंत्री भी इस आयोग के अधीन होने होंगे। समाज के सभी क्षेत्रों के सुयोग्य, प्रतिष्ठित व प्रामाणिक प्रतिनिधियों को ही आयोग में स्थान मिले। शिक्षा के संचालन, प्रायोजन, नियमन तथा नियन्त्रण का पूर्ण उत्तरदायित्व इस आयोग का हो।

आयोग का कार्य हो कि शिक्षा की स्वायत्तता को नीचले स्तर तक लागू किया जाय। क्रमशः पाठ्यक्रम निर्धारण, नियुक्तियाँ तथा व्यय जैसे सभी कार्यों को जितना विकेन्द्रित रूप में कर सकेंगे उतना ही समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा व्यवस्था का विकास हो सकेगा। विभिन्न स्थानों की स्थिति के अनुसार प्रारम्भिक अथवा व्यावसायिक अथवा सामान्य शिक्षा को वरीयता दी जा सकेगी। जहाँ जैसी प्ररिस्थिति, आवश्यकता व विशेषता हो उसके अनुरूप शिक्षा का प्रावधान सम्भव होगा। नीति-निर्धारण के सभी स्तरों पर शिक्षक, अभिभावक एवं समाज के सभी क्षेत्रों का सहभाग सुनिश्चित किया जाय ताकि शिक्षा केवल सैद्धांतिक ना रहकर व्यावहारिक भी हो सकें। शासन की भुमिका प्रारम्भ में प्रेरक व पोषक की होगी। सकल उत्पाद के 10 प्रतिशत को शिक्षा हेतु आवंटित किया जाय तथा स्वायत्त शिक्षा आयोग के माध्यम से इसके सुनियोजित सम्पूर्ण उपयोग को सुनिश्चित किया जाय। शनैः शनैः समाज का आर्थिक योगदान बढ़ाया जाय व इस स्तर पर भी शिक्षा को शासन निरपेक्ष बनाया जाय। वर्तमान में सभी व्यापारिक प्रतिष्ठानों को विधिक दायित्व के रूप में अपने विशुद्ध लाभ का 2 प्रतिशत सामाजिक दायित्व (CSR) के प्रति व्यय करना होता है। इसका आधा हिस्सा शिक्षा आयोग को मिले ऐसा वैधानिक प्रावधान किया जा सकता है। अन्य कार्यों में भी समाज की भागीदारी ली जा सकती है। राजस्थान में भामाशाह योजना के माध्याम से शासकीय शालाओं में संरचना विकास में समाज की भागीदारी बड़े प्रमाण में होती रही है। पाली जिले के सभी विद्यालयों के भवन, फर्निचर व अन्य शिक्षा सामग्री इस योजना से जुटाई गई। शिक्षकों व इतर कर्मचारियों का वेतन ही केवल शासन को देना पड़ता था। यह उदाहरण स्पष्ट करता है कि पूर्णतः शासन निरपेक्ष शिक्षा केवल आदर्श स्वप्न नहीं अपितु व्यावहारिक रूप से पूर्ण सम्भव है।

समाजोपयोगी, परिणामकारी, समग्र, व्यावहारिक, गुणवत्तायुक्त, सस्ती, सुलभ शिक्षा व्यवस्था के लिये शिक्षा को पूर्णतः शासन निरपेक्ष बनाना होगा। प्रारम्भ में नीति निर्धारण, पाठ्य रचना व शिक्षा पद्धति का निधारण सरकार के स्थान पर स्वायत्त आयोग को सौपना होगा। अगले चरण में शिक्षा के संचालन व प्रशासन को शासन से मुक्त करना और अन्ततः आर्थिक रूप से भी शासन पर निर्भरता को समाप्त करना होगा। तभी सच्चे अर्थों में शासन निरपेक्ष समाजाधारित शिक्षा व्यवस्था को साकार किया जा सकता है। यदि आज प्रारम्भ किया जाय तो देश के प्रगत राज्यों में एक दशक में और पूरे देश में 25 वर्षों में सबके लिये इस प्रकार की आदर्श शिक्षा को सुनिश्चित किया जा सकेगा।

सितम्बर 8, 2014 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , | टिप्पणी करे

Call for Rebooting Education System


TNIEThe New Indian Express deserves congratulations for publishing the series ‘Think Edu Conclave’. The articles by Amita Sharma in the 4th March issue [page 9], and that of  Dr. S. Vaidhyasubramaniam  in the issue of 11th March [page 7] both are really commendable.

Amita Sharma has given very comprehensive overview of the work going on in various IIT’s in the field of research in ancient Bhartiya knowledge system. Her approach towards this subject is very logical and scientific. Without unduly glorifying the traditional achievements of Bharatiya scientists from time immemorial, she emphasises the need of indepth study of their works. Her concluding point appeals to the intellectual mind to come out of dogmatic thinking in terms of binaries such as traditional and modern,  eastern and western and to integrate whole knowledge system for the betterment of humanity.

It has been understood in Bharat that knowledge has no boundaries. “आ नो भद्र: क्रतवो यन्तु विश्वत:” Bharat has been traditionally an open society where knowldge and wisdom are welcomed from all the frontiers. The only purpose of knowledge as per Bharatiya tradition has been the search of inherent oneness- truth and it’s applications for the good of whole humanity. Hence, as beautifully elaborated by Dr. S. Vaidhyasubramaniam in his piece, the traditional knowledge system in Bharat had been widespread and well evolved even in the first decades of 19th century.  

dharmapalDr. S. Vaidhyasubramaniam has extensively quoted from the seminal work of Shri Dharmpal. The data given in Dharmpal’s ‘One Beautiful Tree’ from the primary sources of British surveys is an eyey opener for all of us. It is indeed tragic that this great knowledge has not been made part of formal curriculum even after being in public domain for more than five decades now. read dharmapal here – http://www.samanvaya.com/dharampal/

Both the accomplished authors lament the fact that Bharatiya traditional knowledge system has been neglected completely by the formal education system in independent India. It is indeed hightime that we in Bharat take the revolutionary step of integrating our own indegeneous knowledge system in the main stream education policy. Whole world is facing similar problems in the field of education. Right kind of methodolgy for elementary education is an area of concern for both developed and developing countries. We have the advantage of having a deep rooted cultural background in evolving decentralised, need based, socially self-sufficient education system. We have done so for centuries together. With this genetic advantage we can provide a panacea to the universal problems of complementry education system; with the use of modern technology blended with traditional methodology. This is the paradigm shift called for by both the learned authors.

There is a hope that the atmosphere for complete change in the country auguers well to this much needed systemic change in the field of education right from primary to higher education.

See the original article in TNIE here

http://www.newindianexpress.com/opinion/Designing-Integrated-Knowledge-Systems/2014/03/04/article2088788.ece

 

http://www.newindianexpress.com/nation/Reboot-Indian-Primary-Education/2014/03/11/article2101794.ece

Both of them were speaker at the event 

http://www.newindianexpress.com/nation/Indian-Educators-Ignorant-of-Countrys-Academic-Contributions-to-West/2014/01/30/article2028717.ece

मार्च 14, 2014 Posted by | सामायिक टिपण्णी, English Posts | , , , , , , , , | टिप्पणी करे

स्वावलम्बी युवा! समर्थ भारत!!


sawarkarस्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर को किसी युवा ने पूछा कि आप युवा किस कहते है? भाषा शुद्धिकरण के आन्दोलन को चलाते हुए भारतीय भाषाओं को अनेक नवरचित शब्दों का योगदान देनेवाले महान भाषाशास्त्री सावरकर ने उत्तर दिया, “पद को उलटा करके देखो तो उसका अर्थ स्पष्ट हो जाता है। युवा का प्रतिशब्द है – ‘वायु’। जैसे अनुशासनहीन वायु प्रभंजन के रुप में जीवन का नाश करता है किन्तु जब प्राणायाम से अनुशासित हो जाता है तब वही वायु प्राणदाता बन जाता है। वैसे ही युवा हैं। अनुशासित हो तो राष्ट्र का प्राण और अनुशासनहीन होकर किसी भी व्यवस्था के लिए असाध्य चुनौती।”

आज भारत की 62% जनसंख्या युवा है। जनगणना के आंकड़ों के अनुसार 13 से 45 के मध्य आयुवाले युवाओें की संख्या कुल 125 करोड की आबादी के 62% अर्थात 75 करोड से ऊपर है। किसी भी राष्ट्र के लिए यह अत्यंत गर्व के साथ ही आर्थिक विकास के प्रचंड अवसरों का विषय है। साथ ही चुनौती भी कि इस असाधारण शक्ति का समुचित सदुपयोग हो। अन्यथा अनियंत्रित होने से यही ऊर्जा राष्ट्र विघातक विस्फोटक का कार्य भी कर सकती है। ऊर्जा को बलपूर्वक नियंत्रित नहीं किया जा सकता। जबरदस्ती अथवा दबाव से तो वह और अधिक विध्वंसक बन जाती है जैसे डटे हुए सेफ्टी वाल्व वाले प्रेशर कुकर में भांफ। ऊर्जा के अनुशासित नियोजन का सर्वोत्तम तरीका है उसका सुव्यवस्थित परिचालन। ऊर्जा को सही दिशा में किसी ध्येय की ओर कार्य में लगा देना ही उसका सदुपयोग है। वर्तमान समय में भारतीय समाज के पास अपनी युवाशक्ति को सम्यक ध्येय के साथ सही दिशा की ओर कार्यरत करने की महती चुनौती हैं।

स्वंतत्रता के बाद सबसे बडी विकृती सारे समाज मे व्याप्त हुयी है वह है – शासनावलम्बिता। हम छोटे से छोटे कार्य के लिए भी सरकार का मुँह ताकते हैं। घर में सफाई करने के बाद सरकारी सडक पर सरेआम कचरा फेंकने वाले सभ्य नागरिक स्थानीय शासन से अपेक्षा करते हैं कि नगर में सफाई एवं सौन्दर्य का ध्यान रखें। इसी परावलंबी मानसिकता के कारण ‘युवा भारत‘ के सुनियोजन का दायित्व भी हम लोग सरकार को ही दे बैठे हैं। शासन का नीति निर्धारण इस दिशा में हो इस दृष्टि से आवश्यक मंथन व चिंतन समाज के प्रबुद्ध वर्ग मे होता दिखाई नही देता है। समाज द्वारा वैचारिक अधिष्ठान प्रदान किए बिना शासन की कोई भी नीति कारगर सिद्ध नही होती। अतः युवाओं के ऊर्जा प्रबंधन का दायित्व युवा वर्ग ही सामुहिक रुप से संगठित हो उठायें तो वह प्रभावी एवं परिणामकारी होगा। राष्ट्रनिर्माण का दायित्व शासन का नहीं, समाज का है। समाज जब इस उत्तरदायित्व का निर्वाह करने लगता है तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में ही नहीं राजतंत्र में भी शासन ऐसे प्रबुद्ध समाज का अनुगामी बनने लिए बाध्य हो जाता है।

स्वानुशासन से ऊर्जा का सुनियोजन करने हेतु युवाओं में संकल्प का जागरण करना आवश्यक है। वर्तमान शिक्षाप्रणाली के चलते पनपी मानसिक दासता के कारण आज का युवा स्वावलंबन के स्वप्न भी नही देखता। देश की सर्वोच्च प्रतिभा के अत्युच्च स्वप्न किसी सरकारी, निजी अथवा बहुराष्ट्रीय ऊपक्रम में नौकरी पाना हो गये हैं। प्रतिवर्ष लाखों युवा कुछ हजार सरकारी नौकरियों के लिए प्रतिस्पर्धा परीक्षा में अपनी ऊर्जा को व्यय करते हैं। सबसे प्रतिष्ठित प्रशासकीय नौकरी भारतीय प्रशासनिक सेवा की प्रथम परीक्षा में बैठने हेतु साढे पाँच लाख से अधिक युवा पंजीयन कराते हैं किन्तु उसमे से आधे ही परीक्षा मे बैठते हैं। इनमे सें 13,14 हजार ही मुख्य परीक्षा के लिए पात्र हो पाते और इनमें अंतिम सफलता 800 से 900 परीक्षार्थिओं को ही मिलती है। अर्थात प्रतिवर्ष बडी मात्रा में असफल युवाओं के झुंड़ का निर्माण यह प्रतियोगी परीक्षा करती है। इन असफल युवाओं के साथ ही अन्य नौकरियों के आकांक्षियों को मिलाकर लगभग 90 लाख परीक्षार्थी बैंक, रेल्वे, बीमा आदि अर्द्ध सरकारी नौकरियों के लिए ली जानेवाली प्रतियोगिता परीक्षाओं में बैठते हैं। इनमें से कुछ हजार नौकरी पा भी जाते हैं। उपलब्ध रिक्त स्थान व उसके लिए प्रयत्नरत परीक्षार्थिओं के मध्य यह अत्यंत विसंगत अनुपात समाज की दासता का घोतक है। पूरा समाज ही गुलामी के लिए उत्सुक है। इसका मुख्य कारण यह है कि समाज मे सरकारी नौकरी को गैर अनुपातिक प्रतिष्ठा प्राप्त है। ज्ञान, योग्यता और परिश्रम वा परिणाम में प्रशासनिक सेवा के अधिकारी समाज में बिलकुल भी अग्रणी नहीं हैं किन्तु सम्मान मे इनका स्थान लगभग सर्वोच्च हैं। इस दिखावे की प्रतिष्ठाा के लिये ही इतने युवा असफलता की आशंका के होते हुए भी नौकरी के लिये प्रयासरत रहते है।

नौकरियों के इस परिदृश्य का अत्यंत विद्रुप पहलू यह भी है कि सेना की तीनों शाखाओं मे लगभग 15000 अफसरों के स्थान इस कारण से रिक्त है क्योंकि सुयोग्य युवा उस ओर आकर्षित नही हो रहें। सामान्य सिपाही की भरती के लिए हजारों की भीड़ लग जाती है किन्तु सें संकल्पित अधिकारियों के स्थान योग्य युवाओं की तलाश मे रिक्त रह जाते हैं। किसी भी राष्ट्र की शिक्षा व्यवस्था के यह प्रेरणाहीन परिदृष्य चिन्ता का विषय होना चाहिए। इस महान गौरवशाली राष्ट्र की युवा शक्ति को राष्ट्र निर्माण करने हेतु आत्मनिर्भर बनना होगा। अपने स्वभाव के अनुरुप परिश्रम के द्वारा उद्योग के नवनिर्माण का आत्मविश्वास जब युवाओं मे जग जाता है तब वह रोजगार के लिए दूसरों की ओर नही ताकता।

ऊर्जा प्रबंधन में विकेन्द्रित स्वप्रबंधन ही सर्वोत्तम मार्ग है उसी प्रकार युवा शक्ति के प्रबन्धन हेतु स्थान स्थान पर युवाओं की टोलियाँ संगठित होकर अपने youthपरिश्रम से सृजन के स्वप्न साकार करने लगे। यही 75 करोड युवाओं के सदुपयोग का एकमात्र सुनिश्चित मार्ग है। स्व-रोजगार से ही युवा शक्ति का सम्यक, स्वाभिमानी, उत्पादक प्रयोग हो सकता हैं। कितनी भी सरकारी अथवा निजी नौकरियों का निर्माण करने का उद्यम शासन के केन्द्रीकृत प्रयासों द्वारा किया जाए तब भी यह व्यावहारिक रुप से संभव ही नही है कि किसी देश की 62% जनसंख्या नौकरी करें। हर 100 मे से कम से कम एक युवा नौकरी करने की बजाय नौकरी देने का विचार करने लगे तो यह स्वप्रेरित रोजगार निर्माण ही राष्ट्रनिर्माण का माध्यम बन सकता है।

इस हेतु शिक्षा के साथ ही समाज में पोषक वातावरण का निर्माण भी आवश्यक हैं। उद्यमियो का सम्मान सुप्रतिष्ठित करना होगा। भारतीय संस्कृति में उत्पादक कार्य को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती थी। उत्पादित सामग्री के वितरण, विपणन एवं व्यापार को दुय्यम स्थान था। इस सब आर्थिक व्यवहार के लिए पूरक सेवाओं अर्थात नौकरी को सबसे निकृष्ट माना जाता था। सबसे प्राथमिक उत्पादन तो कृषि में होता है। किसान ही मूल वित्त का निर्माता है। अन्य उद्योग कृषि उत्पाद को रुपांतरित कर सामग्री का निर्माण करते हैं। कृषि के समान ही खनन भी मूल कच्चे माल का उत्पादन करता है किंतु यह कृषि से निम्न हैं क्योंकि खनिजों का भंडार सीमित है एवं पुनर्निर्माण संभव नहीं। कृषि उत्पादन जैविक होने के कारण यदि प्रकृति के समन्वय से कृषि कार्य को किया जाए तो अनंत काल तक असीम उपज संभव हैं। इसीलिए भारत मे कहा गया ‘उत्तम कृषि, मध्यम व्यापार और अधम नौकरी’। इस शुद्ध अर्थशास्त्रीय तत्व की समाज में पुनःप्रतिष्ठा मानवता के अस्तीत्व के लिए अनिवार्य है। आज नौकरी सर्वाधिक प्रतिष्ठित एवं कृषि सर्वाधिक उपेक्षित आर्थिक कार्य हो गया है। प्रतिष्ठा व उत्पादन का यह विपरित संबंध समाज के साथ ही पर्यावरण के भी विघटन एवं विनाश का कारण बन गया है।

youth worldबाह्य रुप से परस्पर विरोधी लगने वाली यह परिस्थिति चुनौती के साथ ही युवा शक्ति को एक अवसर भी प्रदान कर रही है। बडी मात्रा में युवाबल का होना यह सकारात्मक पहलू व परावलंबी नीतियों लगातार चलने के कारण शासनवलंबी विकास के प्रादर्श को अपनाने के कारण आत्मबलहीनता यह दो परस्पर विरोधी तत्व समाज में काम कर रहे हैं। शारीरिक आयु के अनुसार युवा हैं किन्तु युवा का स्वाभाविक उत्साह, आत्मविश्वास व उत्पादक उत्सुकता शासनाभिमुख मानसिकता के कारण सुप्त अथवा मरी हुयी है। शासन में इस युवा शक्ति के सम्यक सदुपयोग की ना तो कोई दृष्टि है न ही व्यावहारिक नीति अतः युवा शक्ति के राजनैतिक दुरूपयोग की संभावना भी क्षीण है। शासन की उदासीनता ने युवा वर्ग को एक प्रकार से स्वनिर्णय व स्वनियोजन की स्वतंत्रता प्रदान कर दी है। आवश्यकता केवल स्वप्रेरणा से उद्यम की है। इसके लिये कुछ व्यावहारिक ठोस उपाय किये जा सकते है।

1. उच्च शिक्षा में पढ रहे युवाओं के मध्य युवाओं के द्वारा ही एक सकारात्मक वैचारिक आंदोलन प्रारंम्भ हो चुका है – Don’t be a job seekar be a job giver  रोजगार माँगो मत रोजगार देनेवाले बनो। सामाजिक प्रसार माध्यम फेसबुक पर इस आंदोलन का जालपृष्ठ Webpage भी है। आवश्यकता है, इस आंदोलन का सब दूर प्रसार कर अधिक से अधिक युवा इसमें जुडे़ं।

2. युवा ही एकत्रित आकर उद्यमिता विकास के प्रकल्प प्रारंभ करें। अनेक सरकारी योजनाओं का लाभ संगठित होकर लिया जा सकता है। कौशल विकास youth logo(Skill development) के माध्यम से स्वरोजगार के अनेक क्षेत्र खुले हैं। निजी सुरक्षा (Private sequrity), खरखाव (House keeping),  पर्यटन (Tourism), घरेलू सेवायें जैसे नल कार्य (Plumbing), बढई (Carpentery), सिलाई (Tailoring), बिजली कार्य (Electrician) आदि के लिए संगठित होकर प्रशिक्षण, प्रचार, विपणन व क्रियान्वयन किया जा सकता है। इन सबके लिए अलग-अलग प्रतिष्ठानों, भागीदारी व्यवसाय (Partenership) अथवा कंपनी का भी गठन किया जा सकता हैं। डा रघुनाथ माशेलकर की अध्यक्षता में कार्य कर रहा राष्ट्रीय कौशल विकास प्राधिकरणNational Skill Development Corporation (NSDC) भी इस कार्य हेतु सहायता प्रदान करता है।

3. सहकारिता के द्वारा युवाओं के नवनवीन उद्यम खोले जा सकते हैं। (National youth co-operative society (NYCS)  इस क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण पहल है।

4. युवाओं के उद्योग को वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए युवा अधिकोष (Youth bank) जैसे प्रकल्पों का प्रारंभ किया जा सकता हैं।youth

5. शिक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण अवसर हैं जिसमें युवा स्वावलंबी व्यवसाय प्रारंभ कर सकते हैं। प्राथमिक विद्यालयों से लेकर निजी मार्गदर्शन (Private coching) और निजी महाविद्यालय तक सभी प्रकार के प्रयास किये जा सकते हैं। कुछ युवाओं को एकत्रित आकर इस दिशा में पहल करनी चाहिये।

6. उत्पादन के क्षेत्र में भी संगठित युवा पहल की आवश्यकता है। जैविक खेती, गो-पालन, मत्स्यपालन, मधुमक्खीपालन, अन्य पशुपालन के क्षेत्र में अवसर उपलब्ध है। आधुनिक प्रसार माध्यमों व तकनीकों का प्रयोग कर इन पारंपारिक व्यवसायों में क्रांति की जा सकती है।

revolution7. समाज सेवाके क्षेत्र में भी युवाओं को समर्पित संगठित प्रयास करने की आवश्यकता है। शिक्षा, चिकित्सा व स्वावलंबन इन तीनों प्रकार के सेवा प्रकल्पों में युवाओं की अत्यधिक आवश्यकता है।

8. ध्येयवादी राष्ट्रीय राजनीति में भी शुद्ध चरित्र के संकल्पबद्ध युवाओं को आगे बढने की आवश्यकता है। राजनीति का अर्थ केवल मंचीय नेतृत्व नहीं है। वास्तव में नेताओं को नीतिओं के बारें में अनुसंधान, अध्ययन कर परामर्श देने वाली टोली की अनिवार्य आवश्यकता है। यह कार्य सुशिक्षित, आधुनिक तकनीक मे तज्ञ युवा ही कर सकते हैं। नीतिगत अनुसंधान, सर्वेक्षण तथा प्रसार यह भी राजनीति का एक अनुंषागिक कार्य है। जिसमें आज बहुत कम लोग लगे हुए हैं। दल-निरपेक्ष राजनीतिक अनुसंधान राष्ट्र के लिये अत्यंत आवश्यक कार्य है। 

भारत एक अतिप्राचीन चिरयुवा राष्ट्र है। समय के प्रवाह के पढकर उसके साथ गतिमान सांस्कृतिक परिवर्तन की लचीली क्षमता ने इस राष्ट्र को कठिन से कठिनतम चुनौतियों के मध्य न केवल जीवित अपितु विजयी बनाये रखा है। काल के प्रवाह में अवसर के कुछ गवाक्ष समय समय पर खुलते हैं। ऐसा ही एक युग परिवर्तन का दौर आज चल रहा है। विश्व भारत से मार्गदर्शन की प्रतीक्षा में है। आइये! ‘युवा भारत’ को उत्पाकद उत्साह से भर दें और यह राष्ट्र अपने चिरयौवन से जगत का जागरण करने के वैश्विक कर्तव्य को पूर्ण करें इस महायज्ञ मे हम अपने जीवन की आहुती प्रदार करें।

दिसम्बर 22, 2013 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , | 4 टिप्पणियाँ

चुनावी रणभूमी मे राष्ट्रवाद का शंखनाद


Republic day2चुनाव लोकतंत्र का महोत्सव है। वर्तमान में चुनाव आयोग द्वारा डाले गये कठोर निर्बंधों के कारण इस महोत्सव का उत्साह कुछ धीमा पड गया दिखता है। जमीनी गतिविधियों का स्थान अब प्रसार माध्यमों के अंदर होनेवाली प्रचार उथल-पुथल ने ले लिया है फिर भी चुनाव का समय सबके लिए ही अतिविशिष्ट सक्रियता का समय होता है। सभी प्रकार के कार्यकर्ता सक्रिय हो जाते हैं। सामाजिक कार्यों मे लगे, सामन्यतः गैर राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय कार्यकर्ताओं के लिए यह चिरंतन संभ्रम बना रहता है कि इस सक्रियता में योगदान करें अथवा नहीं और करें तो किस प्रकार से करें? भारत के वर्तमान परिदृश्य में सरकारी व्यवस्था से अछूता रहना लगभग असंभव है। जीवन के हर क्षेत्र में शासन का हस्तक्षेप है। माना कि ये स्थिति आदर्श नहीं है और विदेशी दासता के अवांछनीय अवशेष के रुप मे विद्यमान है किंतु यह भी नकारा नही जा सकता कि यह वास्तविकता है।

स्वतंत्रता पश्चात् हमने लोकतंत्र को राजनैतीक व्यवस्था के रुप मे स्वीकार किया। भारत के संविधान ने जनता को सर्वोपरि सार्वभौम सत्ता के केन्द्र के रुप के प्रतिष्ठित किया। अपेक्षा थी कि लोकतांत्रिक व्यवस्था इस धारणा को सृदृढ कर प्रत्यक्ष मे उतारती किन्तु प्रतिनिधिक लोकतंत्र के जिस स्वरुप को हमने भारत में अपनाया उसने समाज को जोडने के स्थान पर विघटित करने का ही काम किया। सर्वाधिक मत पाने वाले प्रत्याशी के विजय की व्यवस्था के कारण सबसे बडे गुट का प्रतिनिधि ही जनप्रतिनिधि कहलाया जाता है। बहुदलीय व्यवस्था के अंतर्गत चुनाव क्षेत्र मे अनेक प्रत्याशी होते हैं। जिसको सर्वाधिक मत प्राप्त होते हैं उसे विजयी घोषित कर दिया जाता है। इस व्यवस्था ने ऐसी हास्यास्पद विडम्बना की स्थिति उत्पन्न कर दी है कि कई स्थानो पर 15% से कम मत प्राप्त करने वाले प्रत्याशी भी जनप्रतिनिधि के रुप मे चुने जाते हैं। वास्तव मे देखा जाए तो डाले गए मतों मे से 85% से अधिक मतदाताओं ने इस नेता को प्रतिनिधि के रुप मे नकार दिया फिर भी सबसे बडे गुट का नेता होने के कारण वह उन 85% लोगो का भी प्रतिनिधि कहलाया जाता हैं। यह स्वाभाविक ही था कि राजनीतिक दलों ने अपने निहित स्वार्थ के लिए व्यवस्था की इस कमजोरी का उपयोग किया।

EVMजाति, वर्ग, भाषा आदि जो भी समाज को तोडने के माध्यम मिले उनके द्वारा अपने गुट को सबसे बडा सिद्ध करने का प्रयत्न किया जाने लगा। क्षेत्रीय दलों के उभार ने रणनीति को और आगे बढ़ाकर अपने सीमित समर्थन को बड़ा बनाने के लिए बाकी बचे समाज को छोटे छोटे टुकड़ों में खंडित करने का काम किया। यदि किसी नेता या दल के पास जाति अथवा ऐसे ही किसी आधार पर 100 मे से 20 मतदाताओं का समर्थन है तो उसने भिन्न-भिन्न तरीकों से समाज के बाकी बचे 80 मतदाताओं को इतने टुकडों मे बाँटने का काम किया कि कोई गुट उसके गुट से बड़ा न हो जाए। विभाजनकारी राजनीति ने स्वतंत्रता के 66 वर्षों के पश्चात भी भारत की सुप्त क्षमता को प्रकट नहीं होने दिया है। आज विश्व मे चहुँ ओर सभी देश भारत के सामथ्र्य की सराहना करते हैं। जिनके मन मे मित्रता नही है वे भारत के उभरने की संभावना से आशंकित रहते हैं। किंतु इस राष्ट्र के सामथ्र्य-सूर्य को विघटनकारी राजनीति का ग्रहण लगा है। भारत में राष्ट्र पुनर्निर्माण के कार्य को यदि पूर्ण गति प्रदान करनी है व व्यवस्थागत प्रतिष्ठा दिलानी है तो उसके लिए राजनीति के विभाजक तंत्र को बदलना आवश्यक है। इसके बिना बाकी सारे प्रयास छलनी मे पानी भरने के समान निष्प्रभावी हो जाते हैं।

व्यवस्था  परिवर्तन इसका स्थायी समाधान है।First past the post ’सर्वाधिक मत पानेवाला विजयी’ इस व्यवस्था के स्थान पर प्रत्यक्ष एवं पूर्ण लोकतंत्रकारी ECव्यवस्था ‘बहुसंख्य का समर्थन’ ‘Mojority representation’ की व्यवस्था को लागू करना होगा। इसके अंतर्गत किसी भी चुनाव में जीतने के लिए डाले गए कुल मतों में से 50 प्रतिशत से कम से कम एक मत अधिक पानेवाला व्यक्ति ही विजयी घोषित होगा। ऐसी स्थिति में समर्थन करने वाले मतदाताओं की संख्या नकारने वाले मतदाताओं से निश्चित ही अधिक होगी। तब चुना हुआ नेता सच्चे अर्थ में क्षेत्र का प्रतिनिधि होगा। इस व्यवस्था को लागू करने मे अनेक आक्षेप व कठिनाइयाँ गिनाई जाती है किन्तु राजनीति को राष्ट्रीय एकात्मता के लिए बाध्य करने के लिए यही चिरस्थायी उपाय है। विश्व के अनेक देशों में इसी व्यवस्था के अंतर्गत चुनाव होते है। भारत से भी भौगोलिक रुप से विस्तृत व आबादी में भी लगभग बराबरी के रशिया में भी सभी आम चुनाव इसी विधि से होते हैं। यदि किसी चुनाव क्षेत्र में प्रथम चरण के मतदान में किसी को भी 50% से अधिक मत नही प्राप्त होते हैं तो प्रथम व द्वितीय स्थान पर रहने वाले प्रत्याशियों के मध्य दूसरे दिन पुनः मतदान कराया जाता है। अपने आप किसी न किसी को 50% से अधिक मत मिलेंगे ही। प्रायः ऐसा देखा गया है दूसरे चरण के मतदान की आवश्यकता ही नही पड़ती। इस व्यवस्था में स्वाभाविक रुप से ही प्रत्येक दल ऐसे प्रत्याशी का चयन करता है जिसे समाज के भिन्न-भिन्न वर्गों का समर्थन मिल सके। गुटीय हितों के स्थान पर सामूहिक हित चुनावी मुद्दे बन जाते हैं। क्षेत्रीयता, साम्प्रदायिकता, जातीयता आदि चुनाव जिताने के लिए सक्षम नही होते। अतः राष्ट्रीयता, एकात्मता, एकता, समरसता यह विषय अधिक प्रभावी होते हैं।

मन में यह प्रश्न आना स्वाभाविक है कि जब तक यह व्यवस्था परिवर्तन नही हो जाता तब तक राष्ट्रवाद का चुनावी राजनीति में कोई स्थान ही नहीं? वास्तव में बात बिल्कुल इसके विपरीत है जब तक संपूर्ण एवं प्रभावी लोकतंत्र के रुप मे बहुसंख्या का प्रतिनिधित्व यह नियम लागू नही होता तब तक राजनीति के द्वारा समाज के विभाजन को रोकने का एकमात्र उपाय है ’राष्ट्रवादी राजनीति’। जातीयता, साम्प्रदायिक तुष्टीकरण, वर्गवाद, धनबल तथा बाहुबल आदि लोकतंत्र के असाध्य विकारों को ठीक करने का एकमात्र उपाय है – ’चुनावी रणभूमी मे राष्ट्रवाद का शंखनाद’। राष्ट्र का हित, राष्ट्र की संस्कृती, राष्ट्रीय परंपरायें, राष्ट्रीय जीवनध्येय इन पर आधारित नीतियों को महत्व देनेवाले दल एवं नेता का जब समाज स्वयंस्फूर्त समर्थन करने लगेगा तब अन्य सभी संकुचित स्वार्थों पर आधारित विघटनकारी मुद्दे गौण हो जायेंगे। समाज में काम कर रहे प्रत्येक सामाजिक कार्यकर्ता का यह कर्तव्य बन जाता है कि ऐसे राष्ट्रवादी वातावरण का जागरण करें।

bharatmataलोकतंत्र के महत्वपूर्ण स्तंभ प्रसार माध्यमों का भी कर्तव्य बन जाता है कि विघटनकारी मुद्दों को महत्व देने के स्थान पर जोडनेवाले एकात्मता को बढावा देने वालें विषयों, नेताओं तथा दलों का अधिक प्रचार दें। धन के द्वारा क्रय की हुयी प्रसिद्धी के आधार पर समाज को तोडनेवाले नेताओं व दलों को सबक सिखाने का काम राष्ट्रकार्य के रुप में प्रसार माध्यमों को भी करना होगा। पेड न्यूज के द्वारा माध्यमों का धनबल के आगे समर्पण लोकतंत्र के विनाश का कारण बन रहा है। भारत एक निर्णायक दौर से गुजर रहा है। वैश्विक परिदृश्य में अवसर की जो एक छोटी सी खिडकी खुली है उसका यदि निर्णायक उपयोग करना है तो आज राष्ट्र को सुदृढ, सक्षम व निःस्वार्थ नेतृत्व की आवश्यकता है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ही ऐसे नेतृत्व को जन्म एवं पोषण दे सकता है। पश्चिम में राष्ट्रवाद की अवधारणा राजैनतिक व आर्थिक है। इस कारण से वह राष्ट्रों के मध्य प्रतिस्पर्धा को जन्म देती है। इस प्रतिस्पर्धा का रुपांतरण बाजारी शोषण, शस्त्र स्पर्धा व अंततः युद्धों में भी होता है। द्वितीय महायुद्ध में सारे विश्व पर युद्ध की विभीषिका थोपने वाल हिटलर ने भी जर्मन राष्ट्रवाद के नारे का ही तात्विक आधार लिया था। उसके बाद से अंतरराष्ट्रीय विमर्श में राष्ट्रवाद एक घृणित एवं निन्दनीय पद बन गया है। भारत में भी साम्यवादी व समाजवादी विचार को पोषित करनेवाले विचारकों ने इसी पश्चिमी दृष्टि से प्रभावित होकर राष्ट्रवाद की घोर आलोचना की है। इसे संकुचित, तानाशाही व फासिस्ट जैसे संबोधनों से पुकारा है। इस कारण सामान्य बुद्धिजीवी भी राष्ट्रवाद के प्रति सकारात्मक विचार नही रखते किन्तु भारत में राष्ट्रवाद की संकल्पना कतई आर्थिक अथवा राजनैतिक नहीं है। भारत में यह मूलतः आध्यात्मिक व व्यवहार में सांस्कृतिक विचार है। आर्थिक व राजनैति राष्ट्रवाद जहाँ भौगोलिक सीमाओं और बाजारी प्रतिस्पर्धाओं के कारण विभाजनकारी बन जाता है वहीं दूसरी ओर आध्यात्मिक, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद व्यक्ति से परिवार, समाज से आगे राष्ट्र तक मन के विस्तार का माध्यम होने के कारण एकात्मदृष्टि का विकास करता है। स्वाभाविक ही यह राष्ट्रवाद विस्तार की अगली सीढ़ी के रुप में मानवता को देखता हैं। अतः इस राष्ट्रवाद में राष्ट्रहित के साथ ही विश्वहित व उससे भी परे सृष्टि का हित भी निहित है। यह राष्ट्रवाद तोडता नही जोड़ता है।

जाति, पंथ, सम्प्रदाय, वर्ग, भाषा, क्षेत्र आदि के द्वारा विभिन्न वादों का निर्माण कर चल रहे समाज विघटन के तांडव को यदि रोकना है तो सभी को मिलकर एक ही उद्घोष करना होगा कि ‘राष्ट्र सर्वोपरि है’। मेरे व्यक्तिगत, पारिवारिक, क्षे़त्रीय, सामाजिक, पांथिक, साम्प्रदायिक अथवा प्रांतीय हितों से अधिक महत्वपूर्ण राष्ट्रहित हैं। इस विचार को अपने हर कार्य मे अभिव्यक्त करना होगा। चुनाव में आग्रह पूर्वक सहभागी होना, मतदाताओं का पंजीयन करना अधिक से अधिक लोगों को सकारात्मक मतदान के लिए प्रेरित करना, दलों व नेताओं को राष्ट्रहित के मुद्दों पर विचार एवं बात करने के लिए विवश करना यह हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य है। आइए! लोकतंत्र के महोत्सव में राष्ट्रवाद के उजास को प्रकाशित करने का संकल्प लें।

नवम्बर 29, 2013 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , | 1 टिप्पणी

स्वाधीनता का मर्म


गत माह अमेरिकी विदेषमंत्री हिलेरी क्लिंटन ने एक व्याख्यान में कहा कि चीन में लोकतन्त्र के विकास की ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है और यह चीन के विकास में सबसे बड़ी बाधा है। चीन के एक शोध संस्थान ने इसकी प्रतिक्रीया में एक लेख प्रकाशित किया जिसमें चीनी विद्वानों ने अमेरिकी वैश्विकवाद को चुनौति दी। उन्होंने प्रश्न किये कि जो पश्चिम में अपनाया गया है उसी व्यवस्था को अपनाना विकास कैसे माना जायेगा? क्या पश्चिमी देश दावे के साथ कह सकते है कि उनके द्वारा गत कई वर्षों से अपनाये गये तन्त्र ने देश के सभी लोगों को सुख प्रदान किया है? यदि पश्चिम द्वारा अपनायी व्यवस्था आदर्श होती तो आज उन देशों में बेराजगारी, कर्ज, सामाजिक व पारिवारिक विघटन क्यों बढ़ रहा है? लोकतन्त्र यदि आदर्श व्यवस्था है तो क्या इसने सभी देशों में आदर्श परिणाम दिये है? जिन देशों ने इसे अपनाया वे आज भी जब आदर्श समाज, राजनीति व अर्थव्यवस्था को नही प्राप्त कर सके हैं तो फिर अमेरिका को क्या अधिकार है कि वो इस अधुरी असफल व्यवस्था को सबके उपर थोपें? चीनी विद्वान केवल प्रश्नों तक ही सीमित नहीं रहे। उन्होंने दावा किया कि चीन में व्यवस्थागत सुधार उसके अपने ऐतिहासिक अनुभव, संस्कृति व दर्शन के अनुसार ही होना चाहिये। उनके अनुसार चीन के लिये लोकतन्त्र के स्थान पर कन्फुशियन द्वारा प्रणीत ‘मानवीय सत्ता’ के सिद्धान्त पर विकसित व्यवस्था अधिक उपकारक व सम्यक होगी। शोधकारकों ने इस सिद्धान्त पर आधारित एक व्यवस्था के बारे में विस्तार से प्रस्ताव भी लिखा।

लोकतन्त्र की उपयोगिता अथवा चीनी विद्वानों द्वारा प्रस्तुत राजनयिक व्यवस्था पर विचार विमर्श अथवा विवाद भी हो सकता है किन्तु सबसे महत्वपूर्ण विचारणीय बिन्दू है कि उन्होंने छाती ठोक कर यह कहा कि उनके देश के लिये उनके अपने विचार व इतिहास में से निकली व्यवस्था ही उपयोगी है। किसी और के लिये जो ठीक है वह सबके लिये ठीक ही होगा यह साम्राज्यवादी सोच नहीं चलेगी। साथ ही अपने अन्दर से तन्त्र को विकसित करने के स्थान पर विदेशी विचार से प्ररित होकर व्यवस्था बनाना भी मानसिक दासतता का ही लक्षण है। जब हम स्वतन्त्रता के छः दशकों के बाद के भारत की स्थिति का अवलोकन करते हे तो हमे निराशा ही होती है। 15 अगस्त 1947 को जब भारत स्वतन्त्र हुआ तो हमारे राष्ट्रीय नेतृत्व के साथ ही पूरे विश्व को भी भारत से अनेक अपेक्षायें थी। इसी कारण 1950 के दशक में पूरा विश्व जब दो खेमों में बटा हुआ था तब भारत के आहवान पर 108 देशों ने ‘‘निर्गुट आंदोलन’’ के रूप में भारत का नेतृत्व स्वीकार किया था। भारत के इतिहास व संस्कृति के कारण विश्व के समस्त दुर्बल देशों को भारत से एक कल्याणकारी मार्गदर्शक नेतृत्व की अपेक्षा थी। हमारे प्रथम प्रधानमंत्री ने 14 व 15 अगस्त की मध्यरात्री पर लाल किले पर तिरंगा फहराते हुये ही घोषणा की थी कि भारत विश्व के राष्ट्रपरिवार में अपनी सकारात्मक भुमिका को निभाने के लिये तत्पर है। 15 अगस्त को आकाशवाणी पर प्रसारित संदेश में महायोगी अरविन्द ने स्वतन्त्र भारत के समक्ष तीन चरणो में लक्ष्य रखा था। पहले चरण में भारत के अस्वाभाविक, अप्राकृतिक विभाजन को मिटा अखण्ड भारत का पुनर्गठन, द्वितीय चरण में पूरे एशिया महाद्विप का भारत के द्वारा नेतृत्व तथा अन्ततः पूरे विश्व में गुरूरूप में संस्थापना। आज 65 वर्ष के बाद क्या हम इनमें से किसी भी लक्ष्य के निकट भी पहूँच पाये है?

विश्व के मार्गदर्शन की तो बात दूर रही हम अपने देश को ही पूर्णतः समर्थ, समृद्ध व स्वावलम्बी भी कहाँ बना पाये है? सारा विश्व भारत की असीम सम्भावनाओं की चर्चा करता है। किन्तु उन सम्भावनाओं को प्रत्यक्ष धरातल पर उतारने का काम अभी भी कहाँ हो पाया है? देश 70 प्रतिशत जनता अभाव में जी रही है। धनी व निर्धन के बीच की खाई बढ़ती जा रही है। संस्कारों का क्षरण तेजी से हो रहा है। भारतीय भाषाओं का महत्व व प्रासंगिकता दोनों ही इतनी गति से कम हो रही है कि कई देशी बोलियों के अस्तीत्व पर ही प्रश्नचिन्ह लग रहा है। कुल मिलाकर भारत में से भारतीयता की प्रतिष्ठा समाप्त हो रही है। कहीं पर भी कोई व्यवस्था नहीं दिखाई देती। राजनयिक, सामाजिक तथा प्रशासनिक व्यवस्था पूर्णतः शिथिल व दिशाहीन हो रही है। शिक्षा व्यवस्था भी इतनी प्राणहीन हो गई है कि चरित्रनिर्माण तो दूर की बात सामान्य लौकिक ज्ञान को प्रदान करने में भी इसे सफलता नहीं मिल पा रही। स्नातकोत्तर उपाधि धारण करनेवाले छात्र भी किसी भी एक भाषा में सादा पत्र भी नहीं लिख पाते है। इन शिक्षितों को बिना अंगरेजी का उपयोग किये 4 वाक्य बोलना भी असम्भव सा लगता है। दूसरी ओर वही उच्चशिक्षित छात्र शुद्ध अंगरेजी में भी 4 वाक्य नहीं बोल पाता है। ऐसी शिक्षापद्धति के कारण उत्पन्न चरित्रहीनता से सर्वत्र भ्रष्टाचार व अराजकता का वातावरण बन गया है। इस सबको बदलने के लिये अनेक आंदोलन भी चलाये जा रहे है। जब तक हम समस्या की जड़ को नही जान जाते तब तक सारे प्रयास पूर्ण प्रामाणिक होते हुए भी व्यर्थ ही होंगे।

देश की इस परिस्थिति के कई कारण है। समस्याएं बहुआयामी हैं। आर्थिक, नीतिगत, कार्यकारी, संस्थागत, सामाजिक, व्यक्तिगत कई कारणों से समस्या जटील होती जा रही है। कई प्रकार के देशभक्त व्यक्ति व संगठन इन कारणों के निवारण पर कार्य कर रहे है। फिर भी अपेक्षित परिणाम दिखाई नहीं दे रहा। समस्या के समाधान हेतु सभी पहलुओं पर काम तो करना ही पड़ेगा किन्तु दिशा एक होना आवश्यक है। हमें अपने देश के मूलतत्व, चिति के अनुरूप व्यवस्थाओं का निर्माण करने की ओर प्रयास करना होगा। भारत का जागरण भारतीयता का जागरण है। हमारा राष्ट्रीय तन्त्र हमारे स्वबोध को लेकर विकसित करना होगा तभी यह स्वतन्त्र कहा जायेगा। राज्यव्यवस्था हमारे राष्ट्रीय स्वभाव के अनुसार होगी तभी स्वराज्य का स्वप्न साकार होगा। स्वामी विवेकानन्द ने बार बार कहा है प्रत्येक राष्ट्र का विश्व को संप्रेषित करने अपना विशिष्ट संदेश होता है, नियति होती है जिसे उसे पाना होता है और जीवनव्रत होता है जिसका उसे पालन करना होता है। वे कहते है भारत का प्राणस्वर धर्म है और उसी के अनुरूप उसका मानवता को संदेश है आध्यात्म, नियति है जगत्गुरू तथा जीवनव्रत है मानवता को ऐसी जीवनपद्धति का पाठ पढ़ाना जो सर्वसमावेशक, अक्षय व समग्र हो।

स्वतन्त्र भारत को अपनी नियति को पाने के लिये अपने जीवनव्रत के अनुसार व्यवस्था का निर्माण करना था। उसके स्थान पर हम सदैव उधार की व्यवस्थाओं को अपनाते रहे। हमने अपना संविधान तक विभिन्न देशों से उधार लिया। अनेक शताब्दियों तक विविधता से सम्पन्न विस्तृत राज्य पर सुचारू संचालन करने वाली नैसर्गिक व्यवस्था का सैद्धान्तिक व व्यावहारिक प्रतिपादन करनेवाले चाणक्य, विद्यारण्य तथा शिवाजी आदि स्वदेशी चिंतको की सफल राजव्यवस्थाओं का अध्ययन कर उन्हें कालानुरूप समायोजित करने का विचार ही नहीं हुआ। क्या विदेशी आधार पर बने संविधान से विकसित तन्त्र स्वदेशी हो सकता है? इसी का परिणाम हुआ कि हमने आगे चलकर राष्ट्र के प्राण ‘धर्म’ को ही राजतन्त्र से नकार दिया। यही कारण है कि पूरी व्यवस्था ही प्राणहीन हो गई।

अर्थतन्त्र में भी हमने प्रथम चार दशक तक रूस की साम्यवादी व्यवस्था से प्रेरणा ग्रहण कर समाजवादी अर्थव्यवस्था का निर्माण किया। उसकी निष्फलता सिद्ध हो जाने पर 1991 के बाद आर्थिक उदारता के नाम पर पश्चिम के मुक्त बाज़ार व्यवस्था को अपनाया। जब कि यह विश्वमान्य तथ्य है कि 18 वी शति के प्रारम्भ तक भारत ना केवल विश्व का सबसे समृद्ध देश था अपितु वैश्विक संपदा का 33 प्रतिशत भारत में था। विश्व के धनी देशों के संगठन Organisation for Economic Co-operation and Development (OECD) ने ख्यातनाम अर्थवेत्ता एंगस मेडीसन को इसवी सन के प्रारम्भ से विश्व की सकल सम्पदा (गडप) पर अनुसंधान करने का प्रकल्प दिया। उन्होंने विश्व के आर्थिक इतिहास का संकलन किया। उनके अनुसार भारत व चीन विश्व के सबसे धनी देश रहे है। इसा के काल के प्रारम्भ से 14 वी शती तक तो चीन भी किसी होड़ में नहीं था। अंगरेजों ने इस प्राचीन समग्र व्यवस्था को तोड़ अपनी शोषण पर आधारित व्यवस्था को लागु किया तब से इस देश में विपन्नता का राज प्रारम्भ हुआ। आज राजनैतिक स्वतन्त्रता के 65 वर्षों बाद भी हम उसी दासता को क्यों ढ़ो रहे है? इस देश का अतीत जब इतना समृद्ध रहा है तब यदि आज भी हम अपने सिद्धान्तों पर आधारित व्यवस्था का निर्माण करेंगे तो पुनः विश्व के सिरमौर बन सकते है।

आज हम अपनी स्वतन्त्रता को खोने के कगार पर आ पहूँचे है ऐसे में मानसिक स्वाधीनता का वैचारिक आंदोलन प्रारम्भ करने की आवश्यकता है। एक ऐसे तन्त्र के निर्माण का आन्दोलन जो देशज हो अर्थात इस देश के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक तथा धार्मिक अनुभव से उपजा हो। ऐसे तन्त्र का स्वाधीन होना भी आवश्यक है। अर्थात इसके सभी कारकों पर अपने राष्ट्र का ही निर्णय हो। इस हेतु शिक्षा के राष्ट्रीय बनने की आवश्यकता है। जिससे निर्णायक भी स्वदेश की भावना व ज्ञान से परिपूर्ण हो। स्व-तन्त्र का तिसरा आवश्यक पहलु है स्वावलम्बी तन्त्र। तन्त्र की सहजता व सफलता उसके निचली इकाई तक स्वावलम्बी होने में है। गाँव अपने आप में स्वावलम्बी हो तो ही सबका अभ्युदय सम्भव होगा। भारतीय व्यवस्था हर स्तर पर स्वावलम्बी होती है। इसमें तन्त्र के निर्माण के बाद नियमित संचालन के लिये शासन के भी किसी हस्तक्षेप अथवा सहभाग की आवश्यकता नहीं होती। समाज ही स्वयं संचालन करता है। आपात् स्थिति में ही शासन को ध्यान देना पड़ता है।

आज हम सब स्वाधीनता दिवस मनायेंगे। केवल देशभक्ति की भावना को उजागर करने के साथ ही स्वाधीनता के मर्म पर विचार भी हो यह शुभाकांक्षा।

अगस्त 15, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , , , , , , , | 1 टिप्पणी

अस्मिता भारतीय की, परिचय भारत का . . .


कल वर्षप्रतिपदा है। पूरे देश में उल्हास व धार्मिक पवित्रता के साथ नववर्ष के उत्सव मनाये जायेंगे। विदेशी पंचांग के आदी तथाकथित आधुनिक लोग शायद इसको जानते भी नहीं होंगे। निश्चित ही माध्यमों द्वारा 1 जनवरी के समान हंगामा तो होगा ही नहीं। यदि कोई केवल प्रसार माध्यमों पर ही निर्भर करता हो तो सम्भवतः इस नववर्ष से अनभिज्ञ ही रहेगा। इन परिस्थितियों को देखकर मन में प्रश्न आता है- क्या यही भारत है?

पुदुचेरी के एक युवा लेखक ने अमेरिकी समाचारपत्र न्यूयार्क टाइम्स में लेख लिखा है कि ‘‘भारत अब अमेरिका बन गया है’’।

http://www.nytimes.com/2012/03/11/opinion/sunday/how-india-became-america.html?_r=4&hp

बड़े बड़े माल के चित्र दिखाकर भारत में फैल रहे पाश्चात्य प्रभाव का उदात्तीकरण ही इस लेख में किया है। इसी को विकास के पर्याय के रूप में चित्रित किया गया है। पूरे लेख में ऐसा चित्रण दिया गया है मानो भारत में पूरे संस्कार ही अमेरिका जैसे हो गये है। इस सब में लेखक का भाव उत्सव का है। मानों अमेरिका बन जाना भारत की कोई बहुत बड़ी उपलब्धी है। दो प्रश्न इस युवा पत्रकार को अपने आप से पूछने चाहिये। एक क्या वाकई बहुतांश भारत में यह पाश्चात्यीकरण हुआ है? और दूसरा कि क्या बाहरी परिवर्तन से भारत का मूल स्वभाव, भारत की आत्मा ही बदल जायेगी? हमारी शिक्षा ने हमें अपने आप से ही अनभिज्ञ कर दिया है। आज हमारे शिक्षित युवा नहीं जानते कि भारत क्या है। केवल किसी एक युवा पत्रकार की बात नहीं है अपने इतिहास, संस्कार व संस्कृति से परिचय ना होने के कारण अनेक तथाकथित उच्च शिक्षित युवा विकसित सम्पन्न भारत को अमेरिका की प्रतिकृति के रूप में ही देखना चाहते है।

इसमें वाकई इन युवाओं का दोष नहीं है। हमारे प्रबुद्ध वर्ग का यह दायित्व है। पर प्रबुद्ध वर्ग स्वयं ही भ्रमित दिखाई देता है। सर्वोच्च न्यायालय के एक भूतपूर्व न्यायाधीश जो वर्तमान में प्रसार माध्यमों की संस्था के अध्यक्ष है, ने अमेरिका में दिये अपने व्याख्यान में भारत को एक सराय के रूप में परिभाषित किया। उन्होंने भारत को दूसरे देश से आये प्रवासियों का देश बताया। उनके अनुसार सहस्रों वर्षों से अनेक अलग अलग मूल के लोग यहाँ आते गये और बसते गये। अर्थात वर्तमान में जो हम सब यहाँ के निवासी है उनका इस भूमि से कोई नाता ही नहीं है। हमने भी अपने विद्यालय में इतिहास की पुस्तकों में ऐसी ही बातें पढ़ी है। किन्तु गत 2 से भी अधिक दशकों से मिली पुरातात्विक जानकारी ने इस कहानी को झूठा साबित कर दिया है। आर्यों के भारत बाहर से आने के सिद्धांत का विश्वभर के विद्वान पुरातत्व वेत्ताओं तथा इतिहासकारों ने खण्डन किया है। 1300 से भी अधिक स्थानों पर हुई खुदाई ने हड़प्पा व माहन जो दारों से भी 2000 वर्ष पूर्व से आज तक एक सलग, अखण्ड सरस्वति-सिंधु सभ्यता के होने के प्रमाण प्रचूर मात्रा मे प्रस्तुत किये है। भले ही विद्यालय व महाविद्यालयों की पुस्तकों में इन तथ्यों को आने में और देरी हो सकती है किन्तु विद्वान पूर्वन्यायाधीश को तो यह ज्ञात ही होगा। अतः उनके द्वारा विदेश में भारत की राष्ट्रीय अस्मिता के बारे में इस प्रकार का विपर्याय देख मन में प्रश्न उठता है कि यह भ्रमप्रणीत प्रामाणिक अभिमत है अथवा वाममार्गी विचारकों द्वारा हेतु पुरस्सर किये जा रहे बुद्धिभेद का अंग है?

स्वतन्त्र भारत में हम अपनी अस्मिता को भूलते जा रहे है। अस्मिता अर्थात पहचान। अपने होने का मूल्य, सार्थकता। बिना अस्मिता के भान के देश का स्वाभिमान जागना सम्भव ही नहीं है। विड़म्बना यह है कि भारत में विदेशी शासन के विकट काल में हमने अपनी अस्मिता को अक्षुण्ण रखा और आज जब राजनैतिक स्वतन्त्रता है तब हम इसे भूलते जा रहे है। भारत की आत्मा धर्म है। किसी विदेशी विश्वविद्यालय में इस बात पर अनुसंधान हो रहा है कि इस्लाम के कठोर आक्रमण के सामने विश्व की बड़ी बड़ी सामथ्र्यवान व समृद्ध सभ्यतायें, जैसे मिस्र, मेसोपोटेमिया, पारस आदि कुछ दशकों में ही ध्वस्त हो गई। वहाँ की पूरी जनसंख्या ईस्लाम में मतांतरित हो गई। आज वहाँ पूरानी सभ्यता के केवल अवशेष ही बचे है। कोई जीवित वंशधर नहीं बचा। 700 वर्षों से अधिक के इस्लामी आक्रमण व 170 साल के मुगल राज्य के बाद भी आज भारत में हिन्दू न केवल जीवित है अपितु फल फूल रहा है और अपने पूर्व वैभव को प्राप्त करने की ओर अग्रेसर है। इसके मूल में क्या कारण है? क्या इस संस्कृति की विशेषता है जो इसे शाश्वत सनातन अमृतत्व प्रदान कर रहा है? यह विदेशों में शोध का विषय है किन्तु भारत में आज इस बात का भान ही नहीं है।

वास्तव में हम भ्रमित हैं अतः विरोधाभास से भी ग्रसित हैं। गीता को सायबेरिया के कोर्ट में चुनौति दी जाती है तो सारा देश एकस्वर में विरोध करता है। देश के विदेशमन्त्री रशिया के राजदूत को बुलाकर अपनी नाराजगी व्यक्त करते है। किन्तु इसी के 6 माह पूर्व जब मध्य प्रदेश सरकार विद्यालयों में गीता का पाठ पढ़ाने का निर्णय करती है तो इन्हीं के दल के लोग जबलपुर उच्च न्यायालय में इसका विरोध करते है। नार्वे में हाथ से भोजन करने जैसी भारतीय परम्पराओं को स्वास्थ्य के विपरित बताकर बच्चों को मातापिता से दूर करने का घोर विरोध करते समय मिड़िया कहता रहा कि आप हमारी परम्पराओं को अपनी दृष्टि से कैसे देख सकते है? वही मिड़िया पाद्यपूजा की अतिप्राचीन परम्परा की आलोचना करते समय भूल जाता है कि ये सारी आलोचना पश्चिमी दृष्टि के कारण है। शिक्षित भारत की यह विडम्बना आज के सभी समस्याओं की जड़ है।

वर्तमान में भ्रमित भारत पुनः अपनी अस्मिता को खोज रहा है तब वर्षप्रतिपदा का अवसर भारतीय अस्मिता के जागरण का अवसर है। पूरे देश के अधिकांश भागों में यह नववर्ष का दिन है। हमारी मान्यता के अनुसार आजही के दिन ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना की। यह एक संकल्प लेने का अवसर है। नवीकरण, सृजन के संकल्प का अवसर। इसी दिन भारत की अस्मिता को मूल वेदों की रक्षा द्वारा पुनर्जागृत करने के लिये महर्षि दयानन्द सरस्वति ने आर्य समाज की स्थापना की। हिन्दू समाज को संगठित कर भारत की राष्ट्रीयता का अलख जगाने के लिये राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना करनेवाले युगपुरूष डॉ केशव बळीरामपंत हेडगेवार का भी यह जन्मदिन है। कुल मिलाकर भारत की भारतीयता को जगाने का दिन है। इस वर्ष का संयोग ऐसा है कि इसी दिन हुतात्मा दिवस है। भारत की स्वतन्त्रता के लिये अपने यौवन को आहुत करनेवाले हुतात्मा भगतसिंह, सुखदेव व राजगुरू का बलिदान दिवस 23 मार्च सभी युवाओं के लिये अपने देश के लिये संकल्प लेने का दिन है। किस स्वप्न को संजोंये हँसते हँसते बलिदान हुए थे ये वीर? यह प्रश्न हर मन में गुंजाने का यह दिन है। भारत से भारत का परिचय करा हर भारतीय की अस्मिता को जगाने का संकल्प ही विश्व मानवता का त्राण कर सकता है।

मार्च 22, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , | 3 टिप्पणियाँ

लूला लोकतंत्र : जरुरी है सर्जरी


वर्ष २०११ में हुए आंदोलनों में जनता की प्रचंड ताकत देखने में आई |
किसी भी नीति के निर्धारण में जनता की सोच लोकतान्त्रिक ढांचे में एक महत्वपूर्ण कारक होती है| इसलिए नीतियाँ बनाने वालो की तरफ से हमेशा से ही जनमत या जनता की “सोच”  को ढालने का संगठित प्रयास होता रहता है | मिडिया के बड़े प्रभाव क्षेत्र से लोगो की सोच को प्रभावित करना अब एक विशेष कार्य बन चुका है | प्रिंट मिडिया का अपना एक वर्ग है, और वह उन्हें प्रभावित भी करती है | इलेक्ट्रोनिक मिडिया और सोशल मिडिया में हुयी बढोत्तरी से लोगो को अपनी राय व्यक्त करने के और भी मार्ग मिल गए हैं | पहले दो पर तो सरकार  का प्रभाव   हो सकता है, चूँकि उसके पास इन्हें देने के लिए  भारी भरकम मात्र में धन होता है जो वह अपने विज्ञापनों पर खर्च करती है विज्ञापनों के लिए| लेकिन पूरी दुनिया में सोशल मिडिया पर किसी भी सरकार का प्रभाव जमाना मुश्किल है|
लेकिन अब इस अभूतपूर्व चुनौती  से निपटने के लिए भी कुछ  व्यावसायिक रूप से लोगो की सोच प्रभावित करने वाले  “प्रोफेशनल” लोग काम पर लगाये जा चुके है | विकसित देशो में तो पिछले एक दशक से और अपने यहाँ कोई दो सालो से ही इस तरह के कला और विज्ञान ने प्रगति की है | वर्तमान सरकार तो इसमें बहुत ही निपुण है और इस काम में उसने इस क्षेत्र के सबसे अनुभवी लोगो को लगा रखा है | कुछ अखबारों की रिपोर्टिंग के अनुसार तो सत्ताधारी पार्टी के युवराज को “कौन से कपडे पहनने है” , “किस तरह बोला जाय ” यहाँ तक की कैमरे के सामने भीड़ में “किसी छोटे बच्चे को कैसे अपनी गोद में उठाना है ” यह तक सलाह देने के लिए प्रोफेशनल रखे गए है | कुछ अखबारों की माने तो पिछले दिनों चेहरे पर जो चमक दिखी वह भी प्रधानमंत्री के खास प्रोफेशनल सलाहकारों की सलाह का परिणाम थी | व्यावसायिक रूप से ऐसा करने वालो की करतूत का एक चिंताजनक उदहारण है अन्ना का मुम्बई अनशन |
इसके पूर्व आई. ए. सी. (बिना किसी प्रोफेशनल के ) लोगो में यह सोच बनाने में सफल रही थी की “जनलोकपाल” ही सरकार से सम्बंधित सारी समस्याओं की चाबी है | और केंद्र की सरकार ने बड़ी चालाकी से इसे संभाला …. उसने ऐसा माहोल बनाया  की भ्रष्टाचार के खिलाफ एक कानून “लोकपाल “बनाकर लाये है भले ही जनलोकपाल की कॉपी ही न हो , पर एक कदम तो बढाया! इस से लोगो के मन में एक भ्रम उत्पन्न हो गया की सरकार कुछ कर रही है और अन्ना सिर्फ अपने अहंकार की तुष्टि के लिए ही अनशन कर रहे है | टीम अन्ना ने अपनी राजनैतिक असमर्थता सिद्ध की| भारतीय जनता की मूल प्रवृत्ति है की वो कानूनी कार्यवाही  में अधिक विश्वास  करती है | अगर उन्हें थोड़ी बहुत आशा भी दिखती हो तो लोग सरकार में विश्वास बनाये रखते है | पूर्व में अप्रैल और जून में युपिए की सरकार लोगो को यह मौका देने में चूक गयी | ४ जून  को लोगो के शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर हुए वीभत्स सरकारी हमले (जिसमे महिलाये औ बच्चे भी शामिल थे ) से लोग भड़क गए और लोगो ने स्वयं को अकेला महसूस किया और इसीलिए फिर आन्दोलन को इतना भारी जनसमर्थन मिला |लेकिन सरकार इस बार लोगो में यह सोच बनाने में सफल रही की वे कुछ कर रहे है विपक्ष और टीएमसी जैसी पार्टिया केंद्र सरकार पर कड़े कानून के लिए दवाब बनाये हुए है ऐसे में अलग से कुछ करने की आवश्यकता नहीं रह जाती है ….भारत में सब कैसे होता है यह उस का सटीक उदहारण है |
इसी प्रकरण में एक जो अजीब चीज और देखने में आई वो है उनका कहना है की सारी गड़बड़ी की वजह शासन तंत्र ही है न की कोई शासन करने वाले लोग| जिस प्रकार लोकतान्त्रिक व्यबस्था भारत ने अपनाई हुयी है वास्तव में वाही सारी समस्याओ का मूल है यहाँ तक की टीम अन्ना ने तो सांसदों द्वारा उनकी पार्टी अनुशासन में बंधे रहने तक की आलोचना की | उन्होंने संसद से (व्हिप) “सचेतक”   के प्रावधान को हटाने की मांग की ताकि एक संसद अपनी मर्जी से अपनी सोच से वोट दे सके | दोगलेपन की हद हो गयी | एक तरफ तो आप लोगो के “राईट टू रिकाल ”  की बात कर रहे है , दूसरी तरफ सांसद अपनी ही पार्टी अनुशासन को न माने यह चाहते है | सचेतक का जो वैधानिक प्रावधान है वह  १९८० के समय हुयी सांसदों की खरीद फरोख्त के बाद बने “दल बदल विरोधी कानून” के बाद से और मजबूत हुआ है| एक सांसद अपनी पार्टी के चुनाव चिन्ह के आधार पर चुनाव जीतता है न की उसकी व्यक्तिगत जीत होती है | चुनावों में जनता के मध्य पार्टी की कार्य योजना रखी जाती है जिस पर लोग उन्हें वोट देंगे ऐसी उम्मीद की जाती है | अब कहना की पार्टी के घोषणा पत्र में बंधने की अपेक्षा एक सांसद किसी नैतिक स्थान के लिए व्यक्तिगत रूप से अधिक उपयुर्क्त होगा यह तो संसद में भ्रष्टाचार की बाढ़ ला देगी |
वास्तव में गठबंधन की  वर्तमान विडंबना ही हमारे इस त्रुटी पूर्ण  लोकतंत्र में एक भरी नौटंकी जैसे है| चुनावों में जो पार्टिया एक दुसरे के खिलाफ लडती है , वही जीतने के बाद मिलकर सरकार बनाती है, एक तरफ जहा केंद्र के स्तर पर सी.बी.आई. का डर दिखाकर या राहत का लालच देकर जिन पार्टियों से गठबंधन बनाया जाता है , राज्यों में वही एक दुसरे के कटुता पूर्ण अभियानों का निशाना बनती है |
लेकिन क्या हम इस सब के लिए लोकतंत्र को जिम्म्मेदार ठहरा सकते है ? लोकतंत्र ही मूल समस्या है ऐसा अभिमत बनाना एक वस्तुनिष्ठ समीक्षा के लिए ठीक नहीं बैठता | कोई और विकल्प ही स्वाभाविक रूप से शोषण और भ्रष्टाचार से निजत का उपाय हो सकता है |
१९७७ में जय प्रकाश नारायण की समग्र क्रांति और उसके बाद १९८६ के अयोध्या आन्दोलन में जो देखा, लोकतंत्र में राष्ट्रीय स्तर पर लोगो में हिम्मत जगाने की क्षमता है, और वही गैर राजनितिक रूप से पिछले वर्ष हुआ| निश्चित ही हम यह निष्कर्ष निकाल सकते है की लोकतंत्र के वर्तमान स्वरुप ने कुछ यथाक्रम में गलतियां की है जो हमारी आज की शासन व्यवस्था के ढहने के लिए जिम्मेदार है | पर सिर्फ लोकतंत्र को ही अपने आप ने जिम्मेदार मानकार नकारना समय के साथ उचित नहीं होगा | हमें खेल को खेल के नियमो का पालन करते हुए जीतना  होगा | इसमें कोई संदेह नहीं की बदलाव होना चाहिए | पर हमें सुधार इसी तंत्र में से इसी की अनुरूप उभार कर लाने होंगे न की एकदम अलग से कोई कदम उठाया जाय |
सैधांतिक रूप से देखा जाय तो लोकतंत्र के दो रूपों का चलन है .. पहला है  १- प्रत्यक्ष लोकतंत्र :  ऐसा माना जाता है की यूनान में एथेंस जैसे कुछ नगरो में और उत्तर भारत के कुछ गणों में सिकंदर के आक्रमण के समय यह लागू था, इसमें जनता प्रत्यक्ष रूप से शासन विधि में भाग लेती है और विधान परिषद् की कार्यकारिणी का और कही कही तो न्यायपालिका का भी चुनाव  करती है |
दूसरी है २. प्रतिनिधि आधारित लोकतंत्र :– यह वेस्टमिन्स्टर  नमूना है जो हमने अंगेजी हुकूमत की वसीयत रूप में अपनाया है| इसमें जनता द्वारा अपने प्रतिनिधि निर्वाचित किये  जाते है जो आगे कार्यपालिका का चुनाव करते है तथा अधिकांशतः न्यायपालिका को नियुक्त किया जाता है नाकि निर्वाचित किया जाता है | दोनों ही प्रकारों के तंत्र के अपने अपने गुण-दोष है | अमेरिका ने दोनों के संकर रूप को अपनाया हुआ है , इसमें राज्यों में तथा राष्ट्रीय स्तर पर भी कार्यपालिका का प्रत्यक्ष निर्वाचन होता है |जहाँ एक और विधान परिषद् के लिए प्रतिनिधि सभा होती है वही दूसरी ओर वह कार्यपालिका के नियामक प्राधिकरण के तौर पर भी  कार्य करती है | ऐसा प्रतीत होता है की अमेरिका के अधिकांश राज्यों में न्यायपालिका भी निर्वाचित होती है |
पर लगता है हमने अपने यहाँ भारत में लोकतान्त्रिक नियमो की बुरी गति कर रखी है , जिसमे बहुमत का नियम सबसे पहले है |दोनों ही प्रकार के तंत्र में  बहुमत द्वारा ही नीतिया तय होती है | निर्वाचन में यह निश्चित होना चाहिए की विजयी प्रत्याशी  को  में डाले गए मतों में से कम से कम ५०% से १ अधिक मत प्राप्त हो |जबकि यहाँ भारत में  लोकतंत्र के दिखावटी मुखिया, राष्ट्रपति का निर्वाचन अप्रत्यक्ष रूप से होता है| और सबसे खतरनाक प्रावधान यह है की कार्यकारिणी का मुखिया, प्रधानमंत्री का निर्वाचन भी प्रत्यक्ष रूप से करना अनिवार्य नहीं होता है | वर्तमान प्रधानमंत्री भी राज्यसभा सदस्य है जहाँ जनता के मत का प्रत्यक्ष उपयोग नहीं होता है|  लेकिन एक प्रधानमंत्री के रूप में बने रहने के लिए  लोकसभा के सदस्यों का बहुमत उसके पास होना चाहिए , जिसमे १ +५०% का नियम अनिवार्य है | लेकिन हमारे सांसद  जिस प्रक्रिया से निर्वाचित होते है उसमे यह आवश्यक नहीं होता है की उन्हें बहुमत में वोट प्राप्त हुए हो और इसीलिए हमारे सांसद डाले गए वोटो में से ७% भी अपने पक्ष में पाकर चयनित  हो जाते है | मुश्किल से ही कोई सांसद हो जो यह दावा कर सके की उसे अपने निर्वाचन क्षेत्र से ५०% से भी अधिक वोट प्राप्त हुए हो |और इस प्रकार यह हमारेलोकतंत्र का क्रमश ढहना है | हमारे पास यहाँ तक की संवैधानिक प्रावधानों में भी वास्तविक लोकतंत्र है ही नहीं  | यह तो केवल एक झलक मात्र है | इसी से समाज में अभिजात शासन वर्ग और जाती, क्षेत्र, भाषा  और धर्मं की गन्दी ,भेद और फूट की राजनीती पनपती है | किसी भी  राजनेता के पास जीतने का यही मंत्र है की औरो को इतने टुकडो में बाँट दो की अपना हिस्सा सबसे बड़ा हो जाये | यह अनुवांशिक तौर पर व्याप्त हो चुका है|
जब तक हमारी लोकतान्त्रिक ढांचे की आधारभूत कमी दूर नहीं होती तब तक हम किसी सुधार की आशा नहीं कर सकते |
दो जरुरी आधारभूत सुधार मांगो को रखने की आवश्यकता है |
१. वर्त्तमान पटकथा के हिसाब से पहले  तो कार्यकारिणी के मुखिया, प्रधानमन्त्री का प्रत्यक्ष/सीधा  निर्वाचन हो | इसके लिए संवैधानिक संशोधन लाने होगा की गठबंधन  दौर की इस राजनीती में होना मुश्किल है, जहाँ एक छोटी क्षेत्रीय पार्टी को भी असंगत महत्व और मूल्य प्राप्त है | लेकिन हम शुरुआत  के तौर पर इस मांग का मुद्दा तो उठा ही सकते है | या दूसरा विकल्प यह हो की पहले कदम के रूप में  राष्ट्रपति शासन वाली सरकार जिसमे राष्ट्रपति का सीधा निर्वाचन हो , हो सकता है |
२. दूसरा यह की पंचायत से लेकर राष्ट्रपति तक के चुनाव में जीतने की शर्त , डाले गए कुल मतों में १+५० % मत प्राप्त करना अनिवार्य हो | यह अपेक्षाकृत आसान भी है | केवल “जनप्रतिनिधि अधिनियम” से संशोधन करने से यह हो जायेगा और साधारण बहुमत से इसे पारित भी किया जा सकता है | इससे दो सबसे बड़ी पार्टियों को सीधा लाभ मिलने की सम्भावना है, इसलिए यह सर्वसम्मति से हो भी सकेगा| यह नैतिक और तार्किक दोनों रूप से ही वजनदार तर्क है और कोई इसे नकार भी नहीं सकता | जिसे उसके निर्वाचन क्षेत्र की बहुमत जनता ने नकार दिया हो उसे जनता का प्रतिनिधित्व करने का कोई अधिकार नहीं है |
लेकिन यह कोई जादू की छड़ी भी नहीं है की सारी गड़बड़ियां  ही दूर हो जाएँगी | अंततोगत्वा हमें दो शताब्दी पूर्व के एतिहासिक अनुभवों के परे जनि की आवश्यकता है | वर्त्तमान व्यवस्था  ब्रिटिश शासन के परिणाम स्वरुप सामने आई है, इसकी जड़े वही उपनिवेशिक काल में जमी हुयी हैं| इसलिए अंतिम उपचार के लिए हमें मूल कारण तक जाना होगा और जिसके लिए हमें अपने राष्ट्र के इतिहास की और भी गहराइयो में जाना होगा |
हमारा ५००० वर्षो से भी अधिक का ज्ञात इतिहास है जिसमे प्रत्येक दूसरी शताब्दी में हमारा स्वर्णिम काल रहा है | और हमने आर्थिक सम्पन्नता, शिक्षा, विज्ञान और तकनीक, और सबसे महत्वपूर्ण शांतिपूर्ण सामाजिक-राजनैतिक तंत्र स्थापना में विश्व की अगुवाई की है | शासन तंत्र के विभिन्न प्रकारों  का हमने प्रयोग किया है|  हम भारत के विभिन्न भागो के उस विविध राजनीती तंत्र को पुनः नहीं ला सकते जो पहले हुआ करता था | हिन्दुओ का सदैव ही सामान सिद्धांत के विविध प्रगटीकरण में विश्वास रहा है और हमने राजनीती में भी इसे लागू किया था |चक्रवर्ती अपने जीते हुए राज्यों में उनके स्वयं के  लागू किये हुए शासन -व्यवस्था का सम्मान किया करते थे | इसी श्रंखला में हमारे यहाँ एक और जहाँ विविधताओं से पूर्ण राजनैतिक तंत्र वाले गणराज्य थे वाही दूसरी और मगध साम्राज्य जैसे जटिल ढांचे के  विविध रूप थे |  कुछ  व्यवस्थाये तो ऐसी थी जहाँ केवल एक महिला का ही शासन रहा | लेकिन इन सभी  का आधारभूत  सिद्धांत “धर्मं” था, उन सभी को एक सूत्र में बांधने वाला | आज वास्तव में जिस चीज की कमी है वाह है धार्मिक तंत्र |
आजके इस सामने आये तंत्र को स्वीकार्य कर हमें इसमें धार्मिक सिद्धांतो को लागू करना होगा | किसी ‘विदेशी’ को पचाने का यह हिन्दू तरीका है |  आज हमें वर्तमान समाज के अनुरूप  सनातन धर्म की व्याख्या और युगधर्म की आचार-संहिता तैयार करने के लिए एक नयी स्वच्छ स्मृति की आवश्यकता है | संविधान का यह हमारा स्वदेशी विचार है |
हमारी संसद-भवन  के  नक़्शे के पीछे की प्रेरणा मध्यप्रदेश के मितावली स्थित  चौसठ  योगिनी मंदिर का नक्शा है | वैसे ही हमारे लोकतंत्र को भी हमें अपने राष्ट्रधर्म के सिद्धांतो ठोस आधार पर आधारित करना होगा | वर्तमान लूली व्यवस्था की सम्पूर्ण शल्य-चिकित्सा बहुत जरुरी है न की केवल उपरी दिखावटी लीपापोती मात्र|

जनवरी 22, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , | टिप्पणी करे

महीयसी लोकमाता निवेदिता को समाधि शताब्दी पर विनम्र श्रद्धांजलि


भारत की सांस्कृतिक व आध्यात्मिक जड़ों से जुड़े बिना भारत को समझना और उससे प्रेम करना असम्भव है। स्वामी विवेकानन्द के आहवान पर भारत की सेवा करने भारत आयी मार्गारेट नोबल के लिये भी यह इतना सहज नहीं था। पर अपने गुरु के अद्भुत प्रशिक्षण व स्वयं की अविचल श्रद्धा से उन्होंने इस दुष्कर कार्य को सम्पन्न किया। इस प्रशिक्षण के मघ्य कई बार उन्हें स्वामीजी के क्रोध का सामना करना पड़ा। जब एक बार किसी सन्दर्भ में अनजाने में बिना किसी हेतु के उनके मुख से भारतीयों के लिये ‘ये भारतीय’ ऐसा पराया सम्बोधन निकला। किन्तु स्वामीजी ने अत्यन्त गम्भीरता से झिड़की दी, ‘‘तुम यदि भारत को अपना नहीं मानती तो अपने ब्रिटीश अभिमान के साथ वापिस जा सकती हो। यदि यहाँ रहना है तो अपने अन्दर से सारा ब्रिटीशपन, सारी अंग्रेजियत निकाल दों’’ अपना सबकुछ छोड़कर भारत की सेवा के लिये भारत आयी मार्गारेट के अहंकार पर यह भयंकर चोट थी। उन्होंने अपनी मन की पीड़ा को अपने पत्रों में व्यक्त किया है। पर इसके बाद भारत, भारतीय और हर हिन्दु चीज के लिये उनके मुख से अपनेपन के अलावा कुछ नही निकला। भारत को अंग्रेजी में भी वे कभी ‘इट’ सर्वनाम नहीं लगाती, अत्यन्त व्यक्तिगतता से ‘हर’ ही कहती। उनके हिन्दुत्व को अपनाने के सन्दर्भ में गुरुदेव रविन्द्रनाथ ठाकूर ने कहा था, ‘‘आजतक इस भूमि पर जन्म लिये किसी भी अन्य हिन्दू से भगीनी निवेदिता अधिक हिन्दू थी।’’ उनके इस समर्पण को ही स्वामीजी ने उनके दिक्षित नाम में अभिव्यक्त किया था – ‘निवेदिता’। नवधा भक्ति के अंतिम सोपान आत्मनिवेदन को दर्शाता पूर्ण समर्पण।
भगीनी निवेदिता वास्तव में लोकमाता हो गई थी। जो भी उनके सम्पर्क में आता उसका जीवन वे आलोकित कर देती। अनेक स्वतन्त्रता सेनानियों को उन्होंने केवल प्रेरणा व सम्बल ही नहीं आवश्यकता पड़ने पर सब प्रकार की सहायता की। उनके स्वयं के विचार गरम दल के निकट होने बाद भी नरम दल के सभी काँग्रसियों से उनके आत्मीय सम्बन्ध थे। उनको श्रद्धांजलि अर्पित करते समय गोपाल कृष्ण गोखले अत्यन्त भावविभोर हो गये थे। डॉ जगदीश चन्द्र बसु के साथ लण्डन में हो रहे अन्याय का उन्होंने घोर विरोध किया। हताश बसु के साथ बैठकर उनके प्रबन्धों का लेखन करवाया। भारतीय कलाकारों को स्वदेशी कलाओं के विकास के लिये प्रेरित किया। नन्दलाल बोस, अवनीन्द्रनाथ ठाकुर ऐसे अनेक कलाकारों को पुरातन भारतीय कला के पुनरुज्जीवन के कार्य में पूर्ण सहयोग प्रदान किया। सुब्रह्मण्यम् भारती के विख्यात भारतभक्ति स्तोत्र की प्रेरणा निवेदिता ही थी। श्री अरविन्द के क्रांतिकारियों को संगठित करने के कार्य में भी भगीनी निवेदिता का सम्बल व मार्गदर्शन था। उनकी अनुपस्थिति में ‘वन्दे मातरम्’ के सम्पादन का कार्य भी निवेदिता ने ही सम्हाला।
जब कोई विदेशी विद्वान भारत और हिन्दुत्व के बारे में अपमानजनक टिप्पणी करते वे उसका पूरजार खण्डन करती। उनके द्वारा लिखित पुस्तके हिन्दु जीवन पद्धति को समझने के लिये आवश्यक पठन है। ‘हिन्दुत्व की पालना कथायें’ (Cradle tales of Hinduism) ‘भारतीय जीवन जाल’ (Web of Indian Life), ‘काली हमारी माता’ (Kali The Mother) और ‘आक्रामक हिन्दूत्व’ (Aggressive Hinduism) ये कुछ ऐसी रचनाये है जिन्हें प्रत्येक भारतीय युवा को अनिवार्य रुप से पढ़ना चाहिये। दूर्भाग्य है कि अभी तक भगीनी निवेदिता के अधिकतर साहित्य का हिन्दी अनुवाद नहीं हो पाया है। Religion & Dharma का अनुवाद पथ ओर पाथेय के नाम से हुआ है। श्री शंकरी प्रसाद बसु जैसे अभ्यासु अन्वेषक के प्रयासों से उनका समग्र साहित्य अंग्रेजी में उपलब्ध है। किन्तु उन्ही के द्वारा दो खण्डों में रचित जीवनी ‘लोकमाता निवेदिता’ अभी बांग्ला में ही उपलब्ध है।
वर्तमान में जब भारत की युवा पीढ़ि भारत की जड़ों से कटने की कगार पर है और धर्म की सही व्याख्या भी उपलब्ध नहीं है तब इस समर्पित महीयसी के जीवन के माध्यम से भारत का भारत से परिचय कराने का प्रयास भगिनी निवेदिता के साहित्य को घर घर तक पहुँचाने से हो सकता है|यह वर्ष भगीनी निवेदिता की समाधि का शताब्दी वर्ष है।

आज ही के दिन १०० साल पहले 13 अक्टूबर 1911 को वे दार्जिलिंग में अपने गुरुतत्व में सदा के लिये लीन हो गई। उनका जन्मदिन भी इसी माह आता है 28 अक्टूबर। 13 से 28 अक्टूबर के पखवाड़े को हम निवेदिता पखवाड़े के रुप में मनाये ओर पूरे भारत को पुनः उनका स्मरण करायें।         स्वामीजी के स्वप्न को साकार कर माँ भारती को विश्वगुरु के पद पर पुनः आसीन करने के लिये हर घर में निवेदिता अवतरित हो इस प्रार्थना के साथ सादर . . .

अक्टूबर 13, 2011 Posted by | चरित्र, सामायिक टिपण्णी | , , , , , , | टिप्पणी करे

   

%d bloggers like this: