उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

योग विद्या है भारतीय मनोविज्ञान


omभारतीय मनिषा ने अपने शोधकार्य का बहुत बड़ा अंश मन के बारे में अनुसंधान करने में लगाया है| मन की पहेली को अत्यंत गहराई में जाकर सुलझाने में हमारे पूर्वज सफल हुए| साधना में मन के नियंत्रण के महत्त्व के कारण यह अनुसंधान का विषय बना ही, उसके साथ ही भारतीय ऋषि यह भी जानते थे कि जड़ जगत पर भी मन के द्वारा ही नियंत्रण पाया जा सकता है | अंतर्जगत व बाह्यजगत दोनों में ही ज्ञानप्राप्ति का साधन मन है | अतः, इसको समझना, समझाना और वश में करना ऋषियों के लिए महत्वपूर्ण बना | परिणामस्वरूप इस हेतु एक सम्पूर्ण शास्त्र विकसित हुआ | मन को समझने और नियंत्रित करने के शास्त्र का नाम है – ‘योग’ | हम लोग अंग्रेजी शब्दों का भारतीय भाषाओं में अनुवाद करते समय अपने देशज ज्ञान परंपरा की ऐतिहासिक अनुभूतियों की ओर ध्यान दिए बिना नए शब्द गढ़ देते है | अंग्रेजी विषय Psychology का अनुवाद हमने मानसशास्त्र या मनोविज्ञान किया, जबकि, इस पूरी विद्या को अधिक प्रगल्भता से व्यक्त करनेवाला शब्द योग पहले से विद्यमान था | योग का अर्थ है – ‘जोड़ना’ | यह मन के स्वभाव और गति दोनों को समग्रता से प्रकट करता है| इस एकात्म नामावली में केवल सिद्धांत ही नहीं अपितु उसका प्रयोग भी निहित है | मन सर्वव्यापी होने के कारण चेतना के भिन्न-भिन्न स्तरों को जोड़नेवाला है | साथ ही इसके नियमन की प्रक्रिया भी जोड़ने से ही संपन्न होती है | दोनों ही अर्थों में मनोविज्ञान या मानसशास्त्र से योग यह अधिक परिपूर्ण पद है |

अंतर केवल शब्दों के अर्थ में ही नहीं है अपितु विषय की ओर देखने का दृष्टिकोण ही पूर्णतः अलग हो जाता है| पश्चिम का मनोविज्ञान जहां समस्याओं के समाधान के रूप में इस शास्त्र को देखता है वही भारतीय योगशास्त्र आनंदपूर्ण जीवन जीने की विद्या है | इसमें समस्या-समाधान की नकारात्मकता न होकर स्थायी सुख्प्राप्ति की भावात्मक दृष्टि है | यम – नियम योग के विधि निषेध नहीं है अपितु जीवन के वास्तव स्वरुप को समझाने का माध्यम है | सत्य, अहिंसा, असते अदि का पालन करना है यह तो हम बताते है पर क्यों? इस प्रश्न पर विचार नहीं करते | इस कारण यह अत्यंत कठिन काम लगता है | जबकि सत्य हमारा स्वाभाव है और हम असत्य केवल तब बोलते है जब हमें यह भ्रम होता है कि सत्य से काम नहीं चलेगा | सच बोलना सहज है स्वभावगत है | इसके उलट झूठ के लिए पूरी योजना बनानी पड़ती है | सारा क्लेश, तनाव असत्य के लिए है | सत्य तो सहज सरल होने के कारण आनंददायी है | यदि इस तथ्य का साक्षात्कार कर लिया जाये तो हम सहर्ष सत्यवादी हो जायेंगे | इस वास्तव को अनुभव करना योग है | अहिंसा अदि अन्य नियमों के बारे में भी यही सत्य है | जीवन में अधिकतम समय हम अहिंसा का ही पालन करते है | अधिकांश लोगों को यदि पूछा जय की अंतिम बार हिंसा कब की थी तो याद करना पड़ेगा | क्योंकि अहिंसा ही हमारा स्वाभाव है | अहिंसा तो भ्रम के कारन है | नियम भी इसी स्वाभाव के सामाजिक व्यवहार का नाम है | शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और इश्वर प्रणिधान हमें हमारे विस्तृत रूपों से जोड़ता है | समाज में सहज, अनुशासित और आनंदमय व्यवहार की कुंजी है नियम | योग का यह वास्तविक व्यवहारिक मानस शास्त्र है |

योग आपको कृत्रिम व्यवहार से भावनाओं के नियंत्रण को नहीं कहता अपितु सत्य के साक्षात्कार से जीवन को जानने का अवसर प्रदान करता है | इस सुदृढ़ आधार पर भावनाओं का उदात्तीकरण कर om suryaआनंदानुभुति करना जीवन का परमध्येय है | सभी प्रकार की योगविद्या व योगाभ्यास हमें चित्तशुद्धि के माध्यम से आनंद को अनुभव करने के लिए तत्पर करते है | मन ही इस अनुभूति का माध्यम है | मन से ही स्वाभाव के प्रति भ्रम है जिसने आनंद को रोक रखा है | पर मन ही आनंद की अनुभूति भी कर एकता है | अतः माण्डुक्य कारिका कहती है – मन एव मनुष्याणां कारण बंध मोक्षयो: | मन मनुष्य एके बंधन और मोक्ष दोनों का कारण बनता है | योग अनुशासन है – स्वप्रेरणा से पाला गया अनुशासन | पालन से प्राप्त होनेवाला आनंद ही अनुशासन की सच्ची प्रेरणा है | योग से प्राप्त अनुभवों से हम यह जानते है की जीवन मूल रूप से आनंदमय है और दुःख तो केवल भ्रम है| योग ज्ञानरूपी प्रकाश से इस आवरण को हटा आनंद के दर्शन कराता है | उपनिषदों में इस प्रक्रिया हेतु अत्यंत अद्भुत शब्द प्रयोग हुआ है – अपावृणु | आवरण को हटाने को अपावृणु कहते है | ऋषि प्रार्थना करता है, “सत्य का मुख स्वर्णिम पात्र से ढंका हुआ है, हे विश्व के पोषण करनेवाले सूर्य, उस आवरण को दूर कर हमें सत्यधर्म के दर्शन कराओं |”

हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्याsपिहितं मुखम् |

तत्त्वं पूषण अपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ||”

मन को जानने का शास्त्र और उसका जीवन में वैज्ञानिक प्रयोग करने की कला यह दोनों विश्व में सबसे पहली बार भारत में विकसित हुए | उपनिषदों की परंपरा में इस विषय पर अनेक बातें उपलब्ध है | पूरे शास्त्र को सुव्यवस्थित रूप में सूत्रबद्ध करने का कार्य महर्षि पतंजलि ने योग सूत्रों के माध्यम से किया | योग सूत्रों में केवल मन को नियमन में लाने की विधियाँ ही नहीं है तो इसके कार्य, संरचना और स्तर का भी अनुभूत विश्लेषण है | अंतःकरण चतुष्टय – मन, बुद्धि, चित्त तथा अहम् के रूप में मन के कार्यविभाग, मन की पांच वृत्तियाँ, विविध भूमियाँ आदि विस्तार से मन का अध्ययन योग शास्त्र करता है | मन के बारे में इतना सूक्ष्म एवं अचूक ज्ञान अभी आधुनिक मनोविज्ञान को भी नहीं है |

yoga 2अतः भारत ही विश्व को सबसे गहन, गंभीर व परिपूर्ण मनोविज्ञान का मार्गदर्शन प्रदान कर सकता है | वर्तमान में इस विषय में दो प्रमुख बाधाएँ है | एक तो हमारे विश्वविद्यालयों में मनोविज्ञान के रूप में योगशास्त्र का अध्ययन नहीं कराया जाता और दूसरी ओर समाज में योग का प्रचार व अध्ययन अध्यापन करनेवाले आचार्यों ने इसे केवल शारीरिक व्यायाम, श्वास का व्यायाम व रोगोपचार तक सीमित कर रखा है | कुछ गंभीर आचार्य आध्यात्मिक साधनाविधि के रूप में धारणा-ध्यान आदि का अभ्यास अवश्य कराते है किन्तु मनोविज्ञान अथवा मानसशास्त्र के रूप में योग विषय का शैक्षिक अध्ययन (academic) नहीं हो रहा है| अतः इस दिशा में शीघ्र व प्रामाणिक प्रयोग किये जाने आवश्यक है | पहला अनिवार्य कार्य तो है योग विषय में मनोविज्ञान के रूप में शोध कार्य | यह दो प्रकार से किया जाना चाहिए – एक तो प्राचीन योग साहित्य का मनोवैज्ञानिक दृष्टि से अध्ययन और अनुसन्धान तथा दूसरा योग के मानस शास्त्र का वर्त्तमान में उपचारात्मक प्रयोग कर शोध | दूसरा महत्वपूर्ण कार्य है भारतीय मनोविज्ञान का पाठ्यक्रम विक्सित कर उसको विश्वविद्यालयों में लागू करना | इस पक्ष में भी दो तिन प्रकार से तयारी आवश्यक है | स्नातक स्तर पर मनोविज्ञान विषय में भारतीय ज्ञान परंपरा का समावेश करना, परास्नातक स्टार पर भी कम से कम एक प्रश्नपत्र का भारतीय मनोविज्ञान के रूप में समावेश तथा भारतीय मनोविज्ञान में दो वर्षीय परा स्नातक पाठ्यक्रम का निर्माण यह तीनों कार्य करने होंगे | समुपदेशन (काउन्सलिंग) तथा समूह उपचार (ग्रुप थेरेपी) में भारतीय योग विद्या का उपयोग यह भारतीय मानसशास्त्र की पुनःप्रतिष्ठा की दिशा में अंतिम चरण होगा |

जून 15, 2015 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , | 8 टिप्पणियाँ

   

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