उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

शुभकामना नही शुभसंकल्प


बुरा ना मानो होली है ॰ ॰ ॰

होली के अवसर पर भ्रमण ध्वनि शुभकामना संदेशों से पट गया है। नए साधनों के कारण चित्र, रंग सब इन संदेशों में आ गए है। कई बार तो संदेश मिटाना भी बड़ी समस्या हो जाती है। प्रश्न ये है कि क्या हमने अपने अपने सारे उत्सवों को यंत्रों के समान ही एकरूप तो नहीं बना दिया। हर बात पे केवल हैपी कह देना। हैपी दिवाली कहो या हैपी होली सब एक सा। सारे संदेश एक से। जीवन कभी एकरूप नहीं होता। वैसे ही सारे उत्सव भी एक से नहीं हो सकते हो। हर उत्सव का अपना महत्व है और अपनी पद्धति भी। होली तो मन को साफ़ करने का उत्सव है। केवल घर का कचरा जलना ही नहीं तो अपने मन की सब कुंठाएँ क्रोध सब को ही मन से बाहर करना है। इस हेतु देश के भिन्न भिन्न भागों में अलग अलग प्रकार की परम्पराएँ विकसित हुई है। एक दूसरे को छेड़ना, कष्ट देना और कहना -‘बुरा ना मानो होली है ‘

इसी अवसर पर प्रस्तुत है उत्सवों पर संदेश देने की वैज्ञानिक विधि पर दिवाली के बाद लिखा यह लेख। पूरा होते होते देर हो गयी इसलिए तब प्रस्तुत नहीं किया था अब लीजिए ॰ ॰ ॰

शुभकामना नही शुभसंकल्प

          दिवाली एक तरफ विश्व का सबसे बडा उत्सव बनता जा रहा है। विश्व के अनेक देशों  में बडे़ उत्साह से दीपोत्सव को मनाए जाने की खबरें मिल रही हैं संयुक्त राष्ट्र संघ मुख्यालय पर भी दियों की जगमग से Happy Diwali प्रकाशित किया गया। इंग्लैंड की नूतन प्रधानमंत्री ‘थेरेसा मे’ ने पूरा 3.30 मिनीट का वीडियो संदेश दिवाली की समस्त पौराणिक कथाओं का उल्लेख करते हुए प्रसारित किया। आस्ट्रेलिया व कॅनडा ने अक्टूबर माह को दीपोत्सव माह के रूप में मनाने की घोषणा की। ये सब समाचार भी सामाजिक माध्यम (Social Media) से ही प्राप्त हुए। दूसरी ओर भारत में उत्सवों का स्वरूप बदलता हुआ दिखाई दे रहा है। प्रत्यक्ष मिलना, साथ आना, विभिन्न परंपराओं को निभाना इससे अधिक संदेशों के आदान-प्रदान से ही उत्सव मनाए जा रहे है, ऐसा प्रतीत हुआ। संचार के माध्यम निश्चित रूप से बढ गए है और उनका पूरा उपयोग उत्सवों में किया गया। मोबाईल कंपनियों ने दिवाली और भाईदूज के दिन सारी मुफ्तसेवाओं को बंद रखा। उसके बाद भी Whatsap, Facebook आदि संचार माध्यमों में दिवाली संदेशों  का तांता लगा रहा। ऊपरी तौर पर तो यह बडा आकर्षक और उत्साहवर्धक लगता है किंतु थोडा गंभीरता से सोचने पर हमे उत्सवों के उथले होने का खतरा स्पष्ट दिखाई देगा।

         पहले थोडीसी मीमांसा संदेशों  की कर लेते हैं। यह शोध का विषय होगा कि उत्सवों के अवसर पर एक दूसरे को सदिच्छा संदेश भेजने की परंपरा कहाँ से व कबसे प्रारंभ हुयी। सतही खेज में इतना तो ध्यान में आता है कि इस परंपरा का मूल किसी भारतीय पौराणिक अथवा ऐतिहासिक तथ्य में तो नही मिलता। हमारे यहा सामान्य रूप से भी एक दूसरे के अभिवादन में आध्यात्मिकता का परिचय मिलता है। जय राम जी की, जय श्रीकृष्ण,  राम-राम आदि सीधे ईश्वर वाचक अभिवादनों के साथ ही नमस्ते जैसे सामान्य अभिवादन में भी ‘मै नही तू ही’ का अथवा ‘तेरे अंदर के ईश्वर को प्रणाम’ का आध्यात्मिक संदेश ही छुपा है। ऐसे में उत्सवों के अवसर पर एक दूसरे को दिवाली मुबारक अथवा Happy Diwali कहकर संबोधित करना एक अत्यंत उथली मनः स्थिति का निर्माण तो नहीं कर रहा? मुबारक में तो कम से कम समृद्धी की कामना है किंतु Happines तो मात्र  शारिरीक अथवा भौतिक सुख की कामना है। हिंदी में अथवा अन्य भारतीय भाषाओं में जो पर्याय ढूंढा गया वह इन दोनो से थोडा बेहतर है। ‘शुभ दीपावली’ इस संदेश से शुभ अर्थात कल्याणकारी, धार्मिक भले की बात की है। हमारे यहा लाभ भी शुभ हो अर्थात नैतिकता से कमाया हुआ हो यह मान्यता है। अशुभ आमदनी को लाभ भी नहीं कहा जाता। इन तीनों संदेशों के अर्थ भले ही अलग-अलग हो किंतु एक दूसरे को प्रेषित करने का भाव समान ही है। Happy Diwali कहने वाले को यह ध्यान में नही है कि वह केवल भौतिक सुख की कामना कर रहा है उसी प्रकार मुबारक अथवा शुभ की कामना करने वाले को भी अपने संदेश के अर्थ का ज्ञान होगा ही ऐसा आवश्यक नही है। कुल मिलाकर विषय यह है कि हम एक दूसरे के प्रति अपनी आत्मीयता को इन भिन्न-भिन्न भावों से व्यक्त करना चाह रहे है। दिवाली हमारे लिए आत्मीयता के प्रकटीकरण का अवसर है इसीलिए मन में यह प्रश्न आता है कि संचार माध्यमों के सहज प्रयोग से थोक के भाव में भेजे गए संदेश  क्या उस आत्मीयता को भेजने और पानेवाले के मन में प्रेरित कर पाते है? भेजने वाला क्या अपने ‘मित्र (?) सूची’ (Friend list) के सभी लोगों को एक साथ भेजे संदेशों की बौछार में प्रत्येक भेजने वाले से कैसे जुड सकेगा? आपस में मिलकर साथ में कुछ क्षण बिताकर जो आत्मीयता विस्तारित होती है उसका पर्याय यह यांत्रिक संदेश हो सकते है क्या?       

            भारत में उत्सवों को सामाजिक, सांस्कृतिक के साथ ही आध्यात्मिक दृष्टि से भी महत्व दिया जाता है। इसलिए, उत्सवों को मनाने का तरीका भी उसी प्रकार से होता है। उत्सवों के अवसर पर एकत्रित आकर सर्वशक्तिमान से प्रार्थना करने हेतु पूजा आदि का विधान होता है। दीपावली भी इसी प्रकार महालक्ष्मी की पूजा का उत्सव है। महालक्ष्मी केवल मात्र धन और वैभव की देवता नही है अपिुत समृद्धि के समग्र अधिष्ठान को महालक्ष्मी के रूप में पूजा जाता है।  दीपावली सबके जीवन में नैतिक समृद्धि के साथ ही स्वास्थ्य, सौभाग्य, विद्या आदि सभी वरदायिनी शक्तियों की कृपा हेतु किया जानेवाला अनुष्ठान है। अतः साथ मिलकरके इस प्रकार का आयोजन किया जाए यह अपेक्षित है। बदले हुए आधुनिक परिवेश में भी हर सामूहिक इकाई में दिवाली मिलन मनाने की परंपरा बनी है यह अधिक उचित दिखाई देता है। इस बहाने सब लोग एकत्रित आकर अपनत्व एवं आत्मीयता का अनुभव करते है। यांत्रिक संदेशों के आदान प्रदान से यह भारतीय परंपरा के अधिक निकट है। संदेश भेजने में भी हमारी सांस्कृतिक आध्यात्मिक विरासत का ध्यान यदि रखा जाए तो संदेश कामना के न होकर प्रार्थना के होंगे। कामना, वासना, इच्छा मन को नीचे की ओर ले जाती है। भौतिकता, जडता की ओर इनकी गति होती है अतः  कामना पूर्ति के लिए धर्म का अधिष्ठान आवश्यक माना गया है। नैतिक मार्ग से ही कामना पूर्ती की अपेक्षा की जाती है। जब कामना हावी हो जाती है तो नैतिकता का विलोपन होता है। परंपराओं में भी ऐसे ही क्षरण आता है। दिवाली के दिन विभिन्न प्रकारों से जुआ खेलने की परंपरा इसी नैतिक स्खलन का परिणाम है। महालक्ष्मी के समग्र रूप को भुलाकर केवल भौतिक संपत्ति को ही लक्ष्मी का प्रसाद मानने की भूल के कारण ऐसे अनैतिक मार्गो का महिमामंडन किया जाने लगा।

अतः कामना के स्थान पर मन को ऊध्र्वगामी उदात्त लक्ष्य की ओर अग्रेसर करने के लिए उत्सवों के अवसर पर सामूहिक स्तर पर प्रार्थना एवं व्यक्तिगत स्तर पर संकल्प का आधार लिया जाता है। यांत्रिक संचार माध्यमों से भेजे जानेवाले संदेशों  मे भी यदि प्रार्थना एवं संकल्प की अभिव्यक्ति हो तो वह उत्सव के उद्देश्य के अनुरूप होगा। दिवाली पर संदेश  में महालक्ष्मी की प्रार्थना के द्वारा नैतिक समृद्धि की अभिलाषा प्रकट करना एक दूसरे को व्यक्तिगत शुभकामना का आदान-प्रदान करने से अधिक उचित होगा। संदेश में प्रकाशोत्सव, राम-विजय लक्ष्मी पूजन आदि के अनुरूप शुभ संकल्प का उच्चारण भी भारतीय संस्कृती के लिए अधिक पोषक होगा। हमारे सभी उत्सवों में उदात्त सामूहिक समरसता के संदेश छापे हुए है जिनको संकल्प के रूप में दोहराने से मानव जीवन अधिक सौहार्द्रमय एवं आनंददायी होगा। 

मार्च 13, 2017 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , | 5 टिप्पणियाँ

Look beyond political controversy, Yoga is for all


Another Post as a precursor to IYD. This piece was written for bharatniti.in giving it here for the blog followers.

http://www.bharatniti.in/story/look-beyond-political-controversy-yoga-is-for-all/44

IYD

Yoga has been accepted universally as a discipline of moulding one’s own life to active overall well-being, accepting it as a way of life beyond faith, worship or religious dogmas. The same was evident when more than 170 countries across five continents unanimously supported the resolution for declaring June 21 as the International Day of Yoga at the General Assembly of the UNO.

IYD LogoMany of them proposed or seconded it without any voting or discussion. In fact, many of the Islamic countries too supported the resolution. Yoga is being practiced by people beyond the religious beliefs.

On this background of universal consensus, it is ironical that the decision of the central government to celebrate the International Day of Yoga all over the country is being opposed on religious grounds by some misguided elements. When the whole world is unanimous about the universal appeal of Yoga, it is a shame that this great science of living is being subjected to controversy in the land of its origin.

Social media is full of photographs of members of different communities performing Yogic exercises. The universal acceptance of Yoga is very much witnessed across different communities in India.

Controversy more of political concoction than popular

The present fabricated controversy over the celebration of the International Day of Yoga is the result of intolerant minds. Yoga is a science which demands experiments and experiences and does not ask one to believe or un-believe anything. The performance of Yoga does not affect any belief systems. If at all it will enhance ones capacity to have undeterred in one’s own beliefs. Yoga is necessarily an Bharatiya philosophy as it was first compiled in this holy land and has all the attributes of Sanatana Dharma because it was practiced, experimented and evolved into different systems by generations of Hindus. But it still is a universally applicable science of life and the art of living.

The practice of Yoga will not swerve the individual from his personal religious beliefs. It will also not make him antagonistic to his or any other religion but will, on the contrary, augment his affection for his personal deity. The practice of Yoga will not proselytize a Muslim or a Christian, but will on the contrary make him a better adherent of his faiths. Thus, no one should be afraid of Yoga as it includes all and excludes none.

So what is Yoga actually?

Yoga is beyond a mere physical exercise. In fact, Yoga is neither mere physical exercise nor is it just a therapy. As per the ancient traditions, it is a way of scientific living. A modern being may find it hard to comprehend but the mind is the prime factor of all our actions in life. And yoga is nothing but the training of the mind. Thus it (yoga) enables perfection in every action at all levels. The whole universe functions in disciplined manner. There are laws of existence which govern the natural phenomena irrespective of any subjective intervention. The only exception to this smooth governance of the universe are human beings.

The humans are endowed with the will to act and the power of imagination. The combination of these two have created all the scientific wonders. Like all kinds of powers, this also needs regulation. If uncontrolled, power becomes corrupt and boon is converted into a curse. This is true at individual as well as collective level.

Sage Patanjali, in his Yoga aphorisms, initiates with a simple statement – ath yoga anushasanam [Thus we begin the discipline of Yoga.] The aim of all the yogic practices right from Asanas, Suryanamaskara, Pranayamas up to Dhyana [meditation] and Samadhi is disciplining the mind. If the mind is concentrated, anything and everything can be accomplished.

Yoga is the way of orienting the mental powers to one’s aim. The conflicts and clashes in the world are a result of intolerance born out of lack of coordination among one’s own multiple roles. There are various schools of Yoga and they have different practices.

There are several variants of the same Yogic practice. Some well- meaning noble Acharyas even tried to standardize yogic practices. This futile effort has not succeeded as diversity is an inherent feature of existence. Everything that exists is unique in its form, function and role. Yoga not only takes into account this diverse uniqueness but also enriches the extraordinary individuality of the seeker, the performer. At the same time, yoga helps the sadhaka (practitioner, the doer) to realize the underlying oneness behind the apparent diversity.

So, whatever be the practice, if the mind is tuned properly with a synchronized awareness and relaxation, it integrates one with all. Essence is not in the action but in the intent. Yoga literally means union. Every practice that enables the mind to expand and unite the different levels of collectivity is Yoga. Yoga gives quietude, peace and harmony to the individual mind and if performed regularly by a sizable portion of the humanity, will spread this peace and harmony to the cosmic world.

One can say with full conviction that the mass performance of various Yoga practices on the historic occasion of the International Day of Yoga on June 21 will definitely lead to conflict free and harmonious world.

जून 18, 2015 Posted by | सामायिक टिपण्णी, English Posts | , , , , , , , , , , , , , , , , , , , | 2 टिप्पणियाँ

योग विद्या है भारतीय मनोविज्ञान


omभारतीय मनिषा ने अपने शोधकार्य का बहुत बड़ा अंश मन के बारे में अनुसंधान करने में लगाया है| मन की पहेली को अत्यंत गहराई में जाकर सुलझाने में हमारे पूर्वज सफल हुए| साधना में मन के नियंत्रण के महत्त्व के कारण यह अनुसंधान का विषय बना ही, उसके साथ ही भारतीय ऋषि यह भी जानते थे कि जड़ जगत पर भी मन के द्वारा ही नियंत्रण पाया जा सकता है | अंतर्जगत व बाह्यजगत दोनों में ही ज्ञानप्राप्ति का साधन मन है | अतः, इसको समझना, समझाना और वश में करना ऋषियों के लिए महत्वपूर्ण बना | परिणामस्वरूप इस हेतु एक सम्पूर्ण शास्त्र विकसित हुआ | मन को समझने और नियंत्रित करने के शास्त्र का नाम है – ‘योग’ | हम लोग अंग्रेजी शब्दों का भारतीय भाषाओं में अनुवाद करते समय अपने देशज ज्ञान परंपरा की ऐतिहासिक अनुभूतियों की ओर ध्यान दिए बिना नए शब्द गढ़ देते है | अंग्रेजी विषय Psychology का अनुवाद हमने मानसशास्त्र या मनोविज्ञान किया, जबकि, इस पूरी विद्या को अधिक प्रगल्भता से व्यक्त करनेवाला शब्द योग पहले से विद्यमान था | योग का अर्थ है – ‘जोड़ना’ | यह मन के स्वभाव और गति दोनों को समग्रता से प्रकट करता है| इस एकात्म नामावली में केवल सिद्धांत ही नहीं अपितु उसका प्रयोग भी निहित है | मन सर्वव्यापी होने के कारण चेतना के भिन्न-भिन्न स्तरों को जोड़नेवाला है | साथ ही इसके नियमन की प्रक्रिया भी जोड़ने से ही संपन्न होती है | दोनों ही अर्थों में मनोविज्ञान या मानसशास्त्र से योग यह अधिक परिपूर्ण पद है |

अंतर केवल शब्दों के अर्थ में ही नहीं है अपितु विषय की ओर देखने का दृष्टिकोण ही पूर्णतः अलग हो जाता है| पश्चिम का मनोविज्ञान जहां समस्याओं के समाधान के रूप में इस शास्त्र को देखता है वही भारतीय योगशास्त्र आनंदपूर्ण जीवन जीने की विद्या है | इसमें समस्या-समाधान की नकारात्मकता न होकर स्थायी सुख्प्राप्ति की भावात्मक दृष्टि है | यम – नियम योग के विधि निषेध नहीं है अपितु जीवन के वास्तव स्वरुप को समझाने का माध्यम है | सत्य, अहिंसा, असते अदि का पालन करना है यह तो हम बताते है पर क्यों? इस प्रश्न पर विचार नहीं करते | इस कारण यह अत्यंत कठिन काम लगता है | जबकि सत्य हमारा स्वाभाव है और हम असत्य केवल तब बोलते है जब हमें यह भ्रम होता है कि सत्य से काम नहीं चलेगा | सच बोलना सहज है स्वभावगत है | इसके उलट झूठ के लिए पूरी योजना बनानी पड़ती है | सारा क्लेश, तनाव असत्य के लिए है | सत्य तो सहज सरल होने के कारण आनंददायी है | यदि इस तथ्य का साक्षात्कार कर लिया जाये तो हम सहर्ष सत्यवादी हो जायेंगे | इस वास्तव को अनुभव करना योग है | अहिंसा अदि अन्य नियमों के बारे में भी यही सत्य है | जीवन में अधिकतम समय हम अहिंसा का ही पालन करते है | अधिकांश लोगों को यदि पूछा जय की अंतिम बार हिंसा कब की थी तो याद करना पड़ेगा | क्योंकि अहिंसा ही हमारा स्वाभाव है | अहिंसा तो भ्रम के कारन है | नियम भी इसी स्वाभाव के सामाजिक व्यवहार का नाम है | शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और इश्वर प्रणिधान हमें हमारे विस्तृत रूपों से जोड़ता है | समाज में सहज, अनुशासित और आनंदमय व्यवहार की कुंजी है नियम | योग का यह वास्तविक व्यवहारिक मानस शास्त्र है |

योग आपको कृत्रिम व्यवहार से भावनाओं के नियंत्रण को नहीं कहता अपितु सत्य के साक्षात्कार से जीवन को जानने का अवसर प्रदान करता है | इस सुदृढ़ आधार पर भावनाओं का उदात्तीकरण कर om suryaआनंदानुभुति करना जीवन का परमध्येय है | सभी प्रकार की योगविद्या व योगाभ्यास हमें चित्तशुद्धि के माध्यम से आनंद को अनुभव करने के लिए तत्पर करते है | मन ही इस अनुभूति का माध्यम है | मन से ही स्वाभाव के प्रति भ्रम है जिसने आनंद को रोक रखा है | पर मन ही आनंद की अनुभूति भी कर एकता है | अतः माण्डुक्य कारिका कहती है – मन एव मनुष्याणां कारण बंध मोक्षयो: | मन मनुष्य एके बंधन और मोक्ष दोनों का कारण बनता है | योग अनुशासन है – स्वप्रेरणा से पाला गया अनुशासन | पालन से प्राप्त होनेवाला आनंद ही अनुशासन की सच्ची प्रेरणा है | योग से प्राप्त अनुभवों से हम यह जानते है की जीवन मूल रूप से आनंदमय है और दुःख तो केवल भ्रम है| योग ज्ञानरूपी प्रकाश से इस आवरण को हटा आनंद के दर्शन कराता है | उपनिषदों में इस प्रक्रिया हेतु अत्यंत अद्भुत शब्द प्रयोग हुआ है – अपावृणु | आवरण को हटाने को अपावृणु कहते है | ऋषि प्रार्थना करता है, “सत्य का मुख स्वर्णिम पात्र से ढंका हुआ है, हे विश्व के पोषण करनेवाले सूर्य, उस आवरण को दूर कर हमें सत्यधर्म के दर्शन कराओं |”

हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्याsपिहितं मुखम् |

तत्त्वं पूषण अपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ||”

मन को जानने का शास्त्र और उसका जीवन में वैज्ञानिक प्रयोग करने की कला यह दोनों विश्व में सबसे पहली बार भारत में विकसित हुए | उपनिषदों की परंपरा में इस विषय पर अनेक बातें उपलब्ध है | पूरे शास्त्र को सुव्यवस्थित रूप में सूत्रबद्ध करने का कार्य महर्षि पतंजलि ने योग सूत्रों के माध्यम से किया | योग सूत्रों में केवल मन को नियमन में लाने की विधियाँ ही नहीं है तो इसके कार्य, संरचना और स्तर का भी अनुभूत विश्लेषण है | अंतःकरण चतुष्टय – मन, बुद्धि, चित्त तथा अहम् के रूप में मन के कार्यविभाग, मन की पांच वृत्तियाँ, विविध भूमियाँ आदि विस्तार से मन का अध्ययन योग शास्त्र करता है | मन के बारे में इतना सूक्ष्म एवं अचूक ज्ञान अभी आधुनिक मनोविज्ञान को भी नहीं है |

yoga 2अतः भारत ही विश्व को सबसे गहन, गंभीर व परिपूर्ण मनोविज्ञान का मार्गदर्शन प्रदान कर सकता है | वर्तमान में इस विषय में दो प्रमुख बाधाएँ है | एक तो हमारे विश्वविद्यालयों में मनोविज्ञान के रूप में योगशास्त्र का अध्ययन नहीं कराया जाता और दूसरी ओर समाज में योग का प्रचार व अध्ययन अध्यापन करनेवाले आचार्यों ने इसे केवल शारीरिक व्यायाम, श्वास का व्यायाम व रोगोपचार तक सीमित कर रखा है | कुछ गंभीर आचार्य आध्यात्मिक साधनाविधि के रूप में धारणा-ध्यान आदि का अभ्यास अवश्य कराते है किन्तु मनोविज्ञान अथवा मानसशास्त्र के रूप में योग विषय का शैक्षिक अध्ययन (academic) नहीं हो रहा है| अतः इस दिशा में शीघ्र व प्रामाणिक प्रयोग किये जाने आवश्यक है | पहला अनिवार्य कार्य तो है योग विषय में मनोविज्ञान के रूप में शोध कार्य | यह दो प्रकार से किया जाना चाहिए – एक तो प्राचीन योग साहित्य का मनोवैज्ञानिक दृष्टि से अध्ययन और अनुसन्धान तथा दूसरा योग के मानस शास्त्र का वर्त्तमान में उपचारात्मक प्रयोग कर शोध | दूसरा महत्वपूर्ण कार्य है भारतीय मनोविज्ञान का पाठ्यक्रम विक्सित कर उसको विश्वविद्यालयों में लागू करना | इस पक्ष में भी दो तिन प्रकार से तयारी आवश्यक है | स्नातक स्तर पर मनोविज्ञान विषय में भारतीय ज्ञान परंपरा का समावेश करना, परास्नातक स्टार पर भी कम से कम एक प्रश्नपत्र का भारतीय मनोविज्ञान के रूप में समावेश तथा भारतीय मनोविज्ञान में दो वर्षीय परा स्नातक पाठ्यक्रम का निर्माण यह तीनों कार्य करने होंगे | समुपदेशन (काउन्सलिंग) तथा समूह उपचार (ग्रुप थेरेपी) में भारतीय योग विद्या का उपयोग यह भारतीय मानसशास्त्र की पुनःप्रतिष्ठा की दिशा में अंतिम चरण होगा |

जून 15, 2015 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , | 8 टिप्पणियाँ

सूर्यनमस्कार का विज्ञान


जो सूर्यनमस्कार का प्रतिदिन अभ्यास करते हैं, उनको आयु, वीर्य, बल, प्रज्ञा तथा तेज की प्राप्ति होती है  और सामूहिक सूर्यनमस्कार के अभ्यास से समाज में राष्ट्रीय चारित्र्य का निर्माण होता है। 
 
snm‘भारत’ शब्द का ही अर्थ है ‘प्रकाश की उपासना करनेवाला।’ भा अर्थात ‘प्रकाश’, रत अर्थात ‘में व्यस्त’। प्रकाश की उपासना भारतीय संस्कृति का वैज्ञानिक आधार है। हमारी सारी परम्पराएं वैज्ञानिक हैं। उसका आधार प्राण विज्ञान है। मध्यकाल के संघर्ष के कारण इस प्राणविद्या का ज्ञान समाज में नहीं रहा। किन्तु हमें पता नहीं है इसका अर्थ यह नहीं कि वह विज्ञान ही लुप्त हो गया। चाहे आयुर्वेद हो, ज्योतिष विद्या अथवा वास्तुशास्त्र सबका मूल आधार प्राणविद्या ही है। प्राण के प्रवाह को ही देखकर वास्तुशास्त्र की दिशा तय होती है। प्राण प्रवाह की गणना ही ज्योतिष के मुहूर्तों का भाव तय करती है। जगत में प्राण का मूल स्रोत सूर्य है। इस कारण सूर्य की उपासना का हिन्दू जीवन में बड़ा महत्व है। सूर्य की स्तुति, उसका पूजन और जल द्वारा उसको अध्र्य प्रदान करना यह उपासना के सामान्य आधार रहे हैं। जनजातियों में भी सूर्य की उपासना का महत्व है। सूर्य की उपासना की सबसे वैज्ञानिक विधि योगविद्या द्वारा विकसित की गई ‘सूर्यनमस्कार’ है। सूर्यनमस्कार सूर्य की उपासना का सम्पूर्ण माध्यम है। साधरणत: पूजा में कुछ उपचार एवं भाव ही प्रयोग में लाए जाते हैं, सूर्यनमस्कार पूर्ण व्यक्तित्व से ही सूर्य की पूजा है। शरीर, मन, बुद्धि को लेकर प्राणशक्ति के द्वारा सूर्य के यजन की विधि है- ‘सूर्यनमस्कार’! विभिन्न आसनों के माध्यम से शरीर का पूर्ण संचालन करते हुए साष्टांग प्रणिपात किया जाता है। साथ ही मन से सूर्य का ध्यान व बुद्धि में वही प्रखर विचार। सूर्यनमस्कार की चक्रीय विधि है ही ऐसी की उस समय कोई और विचार मन में आ ही नहीं सकता। पूरा व्यक्तित्व सूर्य की ऊर्जा पर एकत्र हो जाता है। प्राण का प्रवाह पूरे शरीर में सुव्यवस्थित प्रवाहित होता है। सारी नाड़ियों में ही चालना आती है। अधिकतर विकार प्राण के कुप्रवाह, अप्रवाह या अतिप्रवाह के कारण होते हैं। आयुर्वेद इसे कुजीर्ण, अजीर्ण व अतिजीर्ण की संज्ञा देता है। सूर्यनमस्कार से प्राण का सम्यक व समुचित प्रवहण हो जाता है। इस सुजीर्ण के चलते सकारात्मक स्वास्थ्य की प्राप्ति हो जाती है। अत: सूर्यनमस्कार के नियमित अभ्यास से सभी रोगों से रक्षा हो जाती है। जीवन बलपूर्वक, प्रसन्नता से दीर्घकाल तक सार्थक चल सकता है। 
सूर्यनमस्कार व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास का सहज सुलभ साधन है। अत्यंत कम समय में शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, बौद्धिक व आध्यात्मिक विकास का इससे ब‹ढकर कोई अन्य एकात्म साधन नहीं है। शरीर का स्थायी सौष्ठव सूर्यनमस्कार से ही मिलता है। अन्य व्यायाम तात्कालिक परिणाम दे सकते हैं किन्तु स्थायी परिवर्तन का माध्यम योगिक सूर्यनमस्कार ही है। श्वास पर ध्यान देकर किए गए सूर्यनमस्कार से मन को एकाग्र करने की क्षमता का अद्भुत विकास होता है। विद्यार्थियों को नियमित सूर्यनमस्कार का अभ्यास अनिवार्य रूप से करना चाहिए। इससे अध्ययन के लिए अत्यावश्यक एकाग्रता के साथ ही स्मणरशक्ति का भी चमत्कारिक विकास होता है। ऊर्जा के संतुलन के कारण भावनाएं भी संतुलित हो जाती हैं। 
सूर्यनमस्कार में प्रयुक्त मन्त्रों का भी अपना महत्व है। मन्त्र बहुआयामी प्रभाव डालते हैं। उच्च स्वर में स्पष्ट मन्त्रोच्चारण से उत्पन्न ध्वनि के shiv samarthस्पन्दन शरीर, मन, बुद्धि तीनों को ही शुद्ध करते हैं। मन्त्रों में सूर्य के जो 12 नाम लिए जाते हैं, उनमें से प्रत्येक नाम का विशिष्ट परिणाम है। व्यक्तित्व के आवश्यक अनेक गुणों का विकास इन मन्त्रों के उच्चारण से होता है। सूर्य का एक नाम सविता है। सविता बुद्धि के देवता है। सूर्यनमस्कार से भ्रम, वितर्क व विपर्याय से परे सत्य को देखने की प्रखर बुद्धि प्राप्त होती है। नियमित सूर्यनमस्कार करनेवाला छात्र संकल्पना को सुस्पष्टता से समझ लेता है। अत: उसका अध्ययन केवल परीक्षा के लिए संग्रहित जानकारी तक सीमित न होकर जीवनोपयोगी ज्ञान का साधन बन जाता है। कम समय में सदा के लिए पढ़ाई हो जाती है। बार-बार रटने की मजबुरी में समय व्यर्थ नहीं गवांना पड़ता। 
वैसे तो भारत में अनादिकाल से ही सूर्यनमस्कार प्रचलित रहे हैं। किन्तु अनेक विषयों की तरह ही संघर्षकाल में इसका समाज को विस्मरण हो गया। आधुनिक काल  में सूर्यनमस्कार को समाज में प्रचलित करने का श्रेय छत्रपति शिवाजी के गुरु समर्थ रामदासजी को जाता है। उन्होंने बलोपासना का सुगठित तन्त्र विकसित किया। गांव-गांव में मारुति (हनुमान) के मंदिर स्थापित किए। उनके सम्मुख युवाओं को एकत्रित कर सामूहिक सूर्यनमस्कार का अनुष्ठान किया। इन वीर सूर्योपासकों में से ही शिवाजी की अजेय सेना का निर्माण हुआ। हिन्दवी स्वराज्य की स्थापना, मुगल शासन का अंत तथा पूरे देश में मराठों के शासन के चमत्कार का मूल समर्थ रामदास द्वारा प्रचलित सूर्यनमस्कार की संगठित ऊर्जा में ही था। 
6 वर्ष की आयु से ऊपर के सभी स्त्री-पुरुष सूर्यनमस्कार का नियमित अभ्यास कर सकते हैं। वर्तमान में भारत में सूर्यनमस्कार की 10-12 पद्धतियां प्रचलित हैं। आसनों के क्रम अंकों में कुछ थोड़े-थोड़े भेद से आचार्यों ने अपनी-अपनी पद्धतियों का विकास किया है। समर्थ रामदास द्वारा प्रचलित 10 अंकों की विधि सर्वाधिक अभ्यास में है। तोलासन से सीधे साष्टांग प्रणिपात में जाने के कारण इसमें बजरंगी दण्ड लगता है। यह बलवद्र्धन के लिए सर्वोत्तम है। बाल, किशोर व युवाओं को इस विधि से ही अधिक लाभ प्राप्त होता है। योगाभ्यासी मण्डल के जनार्दन स्वामी द्वारा प्रचारित 12 अंकों की विधि में दो बार शशांकासन किया जाता है, साष्टांग प्रणिपात से पूर्व तथा पर्वतासन के बाद। अधिक आयु के लोगों के लिए यह सुकर होने के साथ ही नाभी में प्राण को संग्रहित करने में भी सहायक है। 
वैसे तो 12 मंत्रों के साथ 12 चक्र सूर्यनमस्कार अपनेआप में पूर्ण है। सूर्य की इस उपासना को ईश्वर प्राप्ति का अधिष्ठान प्रदान करने के लिए समर्थ रामदास ने 13 मन्त्र नारायण के प्रति जोड़ दिया- ‘श्री सवितृ सूर्यनारायणाय नम:’ यह पूरी प्रक्रिया को पूजा बना देता है। इसी भाव से सूर्यनमस्कार का मन्त्र आता है – 
ध्येय: सदा सवितृ-मण्डल-मध्यवर्ती
नारायण: सरसिजासन-सन्निविष्ट:।
केयूरवान् मकर-कुण्डलवान् किरीटि
हारी हिरण्यमय वपुर्धृत शंख-चक्र:।।
सूर्य जिनके मध्य स्थान में है ऐसे स्वर्णीम कांतिवाले परमेश्वर नारायण की यह स्तुति सूर्यनमस्कार के आरम्भ में की जाती है। हमारे सूर्यनमस्कार उस परमशक्ति तक पहुंचे यह भाव है। 
प्रतिदिन नियम से प्रात: अथवा सायं सूर्यनमस्कार करने चाहिए। 13 चक्रों से प्रारम्भ कर सकते हैं किन्तु बाल, युवा, किशोर और युवा वर्ग के भाई-बहनों को धीरे-धीरे इनकी संख्या बढ़ानी चाहिए। समर्थ रामदास स्वयं प्रतिदिन 1200 सूर्यनमस्कार करते थे। वर्तमान युग में भी यह सम्भव है। कन्याकुमारी में ली गई प्रतियोगिता में दो कार्यकर्ताओं ने 3 घण्टे में 1201 सूर्यनमस्कार किए थे। इतने तक ना भी जाए तब भी 108 सूर्यनमस्कार तो हर युवा को करने ही चाहिए। इसमें 25 से 30 मिनट का समय लगता है और पूर्ण व्यक्तित्व का व्यायाम हो जाता है। अजेय आत्मविश्वास, सुशीलवान, विनम्रता, प्रगल्भ मेधा, संवेदनशील हृदय इन सभी गुणों का एक साथ विकास होता है। 
सूर्यनमस्कार के सामूहिक अभ्यास का भी बड़ा महत्व है। अकेले किए सूर्यनमस्कार से तो अपने प्रयत्न का ही फल मिलेगा। सामूहिक अभ्यास से प्रत्येक को सभी की साधना का सुफल प्राप्त होगा। अत: जितने साधक साथ होंगे उतने गुणा सबको पुण्य प्राप्ति होगी। वर्तमान राष्ट्रीय परिस्थितियों का निदान भी सामूहिक अभ्यास में ही है। आज माँ भारती को केवल व्यक्तित्व ही नहीं अपितु राष्ट्रीय चारित्र्य के विकास की आवश्यकता है। सामूहिक सूर्यनमस्कार के अभ्यास से इस संगठित राष्ट्रीय चारित्र्य का विकास होगा। 
सूर्यनमस्कार के अंत में फलश्रुति का पाठ करते हैं- 
आदित्यस्य नमस्कारान् य कुर्वन्ति दिने दिने।
आयुप्र्रज्ञा बलं वीर्यं, तेजस् तेषां च जायते।।
जो सूर्यनमस्कार का प्रतिदिन अभ्यास करते हैं, उनको आयु, वीर्य, बल, प्रज्ञा तथा तेज की प्राप्ति होती है। आइए, हम सामूहिक अभ्यास से मां भारती को यह सब अर्पित करें ताकि वह विश्वगुरु पद की नियति को प्राप्त कर सके।

फ़रवरी 9, 2013 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , , , | 6 टिप्पणियाँ

सदाचार अर्थात सेवा में पहले मै और सुविधा में पहले आप!


गढ़े जीवन अपना अपना -19

राजा की सवारी निकली थी। आगे आगे सेना की एक टुकड़ी मार्ग में आनेवाले लोगों को रोककर मार्ग खाली करने के काम पर लगी थी। एक महात्मा बीच रास्ते में बैठे थे। अपनी ही मस्ती में थे। एक सैनिक उनके पास जाकर चिल्लाया, ‘‘उठो! रास्ता खाली करो!! राजा की सवारी आ रही है।’’ महात्मा हटे नहीं और उस सैनिक से पूछा, ‘‘तूम कौन हो?’’ अपना गणवेष दिखाकर बोला, ‘‘मूझे नहीं जानते? मै राजा की विशेष रक्षा वाहिनी का सिपाही हूँ। हटो!    नहीं तो. . .’’ महात्मा ने मुस्कुराकर कहा, ‘‘तभी’’। सिपाही कुछ समझा नहीं, अपने सुभेदार को ले आया। सुभेदार अकड़कर बोला, ‘‘ना जाने कहाँ कहाँ से आ जाते है भीखमंगे? अरे इतनी सी बात नहीं समझते, राजा की सवारी आ रही है। फूटों यहाँ से! दीखना मत कही आसपास भी।’’ महात्मा ने फिर पुछा, ‘‘तुम कौन?’’ सुभेदारी का परिचय पाकर फिर वही टिप्पणी की, ‘‘तभी!’’ जब महात्मा फिर ध्यानमग्न हो गये और राह से ड़िगे नहीं तो सेनापति आया। ठसन तो थी पर भाषा सभ्य थी, ‘‘महात्माजी हमारी विवशता को समझे, आप नहीं हटेंगे तो राजा की सवारी में विघ्न आयेगा। कृपया राह दें।’’ महात्मा ने फिर परिचय मांगा और परिचय पाने पर फिर वही, ‘‘तभी!’’ अब मंत्री की बारी थी मन्त्री ने प्रणाम कर बड़ी विनम्रता से राह छोड़ने की प्रार्थना की। राजा के गन्तव्य का महत्व भी बताया और राष्ट्रीय आवश्यकता की भी दूहाई दी। महात्मा ने मुस्कुराकर परिचय पूछा। पता चलने पर फिर, ‘‘तभी!’’ अब बात राजा तक पहुँची। महात्मा है कि हटता नहीं और केवल ‘तभी’ ‘तभी’ कहता है। राजा ने रथ से उतरकर साष्टांग दण्डवत किया और महात्मा का आशिर्वाद मांगा। कहा, ‘‘मै राह बदलकर चला जाउंगा पर जिस कार्य पर जा रहा हूँ उसकी सफलता का आशिष दें।’’ महात्मा केवल मुस्कुराये और परिचय पुछा। राजा ने उत्तर दिया, ‘‘महाराज प्रजा का सेवक हूँ। धर्म के अनुसार राज्यपालन का दायित्व है।’’ महात्मा मुस्कुराये और आशिर्वाद का हाथ उठाकर बोले, ‘‘तभी!’’

राजा मार्ग बदलकर आगे बढ़ा। रथ में साथ विराजमान राजगुरु से बोला, ‘‘इस ‘तभी’ का क्या रहस्य है?’’ राजगुरु ने समझाया, ‘‘अपने आप में तो ‘तभी’ कुछ नहीं कहता पर उसके पूर्व के विधान के साथ जोड़कर देखे तो पता चलेगा। सिपाही हो ‘तभी’। सुभेदार हो ‘तभी’। सबके स्तर के अनुसार उनके व्यवहार पर यह टिप्पणी थी। राजन् महात्मा ने अपने ‘तभी’ से सदाचार पर भाष्य किया है। व्यक्ति का शील ही उसका वास्तविक परिचय है। यह शील उसके व्यवहार में झलकता है। आप राजन् है, विनम्रता और सेवाभाव आपका शील है। ‘तभी’ ! इसको उलटा देखने से भी बड़ी शिक्षा मिलती है। उद्दण्ड व्यवहार है तभी केवल सिपाही हो। ठसन है तभी सुभेदार हो। विनम्रता है पर पूर्ण अधिकार नहीं तभी मंत्री हो।’’ राजा मन ही मन गुनगुनाता रहा ‘तभी’।

हमको भी अपने जीवन का ‘तभी’ समझना होगा। अपने व्यवहार का सदा अवलोकन करते रहना होगा। महात्मा जैसे स्पष्ट बोलनेवाले लोग तो मिलेंगे नहीं पर मन ही मन सभी कहेंगे ‘तभी’। और नियती तो कहेगी ही। हमारे शील से ही हमारे मार्ग प्रशस्त होंगे। हमारा आचरण ही हमारा परिचय है। शास्त्र कहते है, ‘‘आचार प्रभवो धर्मः’’। आचरण से ही धर्म जीवित रहता है। अतः हमारे शील को बनानेवाले हमारे राष्ट्रीय जीवनमूल्य हमारे व्यवहार में उतरेंगे तभी धर्म जागृत रहेगा। हम इस सदाचार के कुछ सूत्रो की चर्चा ही कर सकते है। पूरी सूचि बनाना ना तो व्यावहारिक है ओर ना ही आवश्यक। भारत में जन्मा हर व्यक्ति सुशील होने का मर्म तो जानता ही है। प्रयत्न भी करता है। संगती और तथाकथित आधुनिकता के चक्कर में भूल गया होगा तब भी कुछ संकेत मात्र संचित स्मृति को चलित कर शील को आचरण में लाने के लिये पर्याप्त होंगे।

सदाचार मनसा, वाचा, कर्मणा होता है। अपने विचार, वचन और व्यवहार तीनों में जीवनमूल्य परिलक्षित होने चाहिये। केवल दिखावे का सदाचार (Manners & Etiquette) अपेक्षित नहीं है। प्रशिक्षण से अपनाया बनावटी, दिखावे का व्यवहार तात्कालिक प्रभाव तो ड़ाल सकता है पर हृदय को जीतने की क्षमता तो अंतरमन से सुशील होने पर ही आयेगी।

मानव की एकात्मता का जीवनमूल्य सदाचार में परिलक्षित होता है बड़ों के सम्मान और आदर से, पशु-पक्षी पेड़-पौधों के प्रति अनुकम्पा से। जब हम उनमें भी अपने ही अंग होने की आत्मीयता का अनुभव करते है तब सबके साथ उसी आत्मभाव से व्यवहार भी करते है। राह चलते, बस-रेल में कहीं भी दुसरों की सुविधा का ध्यान रखनेवाला व्यवहार हो जाता है। अनावश्यक फूलों को तोड़ना, सहज ही मसल देना, राह चलते आवारा कुत्ते या बकरी को पीड़ा पहुँचाना ये सब स्वतः ही बन्द हो जाता है। पौधे के पत्ते तोड़ने के लिये बढ़ा हाथ किसी के द्वारा अपने कान उमेठने की वेदना को याद कर स्वतः ही रुक जाता है। अति की भी अपेक्षा नहीं है कि आवारा कुत्ते को ही घर ले आये और माँ को नाराज कर दिया। माँ से भी तो आत्मीयता है ना? उसके भाव को भी तो समझना है। फिर हमारे मन में उठी अनुकम्पा का क्या करें? सभी शहरों में आवारा पशुओं की देखभाल के लिये शासकीय और स्वयंसेवी दोनों प्रकार की व्यवस्था होती है। उसकी जानकारी प्राप्त करें और वहाँ तक सूचना पहुँचाये। पीछे पड़कर व्यवस्था होने तक अनुवर्तन करें। अब इतनी बात पर्याप्त है बाकि जब अपने पांव में ठोकर लगती है तो हम उपचार का मार्ग ढूँढ ही लेते है ना? तो जब यही आत्मीयता का भाव होगा तो उसे व्यवहार में उतारने के नव नवीन रास्ते स्वतः सर्जकता से खोज लेंगे।

आधुनिक जीवन में पर्यावरण से लेकर मनुष्यमात्र को जो सर्वाधिक हानी हो रही है वह ऊर्जा एवं अन्य संसाधनों के व्यर्थ जाया करने से हो रही है। हमारी पूरी जीवनशैली ही बिजली पर निर्भर हो गई है। अब हम इस जीवनचर्या को वापिस पूर्णतः प्राकृतिक मार्ग पर तो नहीं लौटा सकते। किन्तु, अस्तीत्व की एकात्मता के जीवनमूल्य को सदाचार में उतारते हुए इतना तो कर ही सकते है कि ऊर्जा की बचत के लिये हर सम्भव उपाय करें। छोटी छोटी आदतों से यह सम्भव है जैसे कमरा छोड़ते समय लाइट, पंखा बन्द करना, पानी का संयम से उपयोग करना आदि।

त्याग का जीवनमूल्य तो पग पग पर प्रगट होता है। हमने देखा था कि त्याग का कर्मरुप सेवा है। सेवा स्वतःस्फूर्त होनी चाहिये। शील प्रगट होता है पहल में। सामने कार्य देखकर स्वतः ही, बिना किसी के कहे, फुर्ति से हम उठ पड़े। आज्ञापालन तो करना ही चाहिये किन्तु घर आये अतिथि को पानी पिलाने के लिये हर बार माँ या पिताजी को आज्ञा देनी पड़े तो समझना होगा कि कुछ गड़बड़ है। ये तो सेवा के छोटे छोटे अवसर हैं इन्हें तो उत्साहपूर्वक हथियाना चाहिये। इससे पहले की अपने भाई या बहन में से कोई और काम करें, हमें कर लेना चाहिये। सच्चा सेवक तो वही होता है जो दरी बिछाने और उठाने में सहजस्फूर्त उत्साही हो। सेवामें सबसे आगे रहना तो ठीक है पर सुशील व्यक्ति सुविधा में ऐसी प्रतिस्पद्र्धा नहीं करता। वहाँ तो उसका मन्त्र होता ‘मै नहीं तू ही।’ विद्यालय में एकसाथ अवकाश होने पर पानी पीने के लिये झुम्बड़ लगती है। बस में से उतरते समय पता है सब उतरेंगे फिर भी धक्का देते है। सदाचारी छात्र तो पहले दूसरे को अवसर देंगे। स्वतः अनुशासन आ जायेगा।

सेवा में पहले मै और सुविधा में पहले आप।

नवम्बर 25, 2012 Posted by | आलेख | , , , , , , | 3 टिप्पणियाँ

अभ्यास भैया अभ्यास!


गढ़े जीवन अपना अपना -16
आधी रात का समय था। हस्तिनापुर के प्रासाद में सब ओर शांति थी। अर्जुन को लघुशंका के लिये जाना पड़ा। हाथ में मशाल लिये अर्जुन जब मैदान से लौट रहा था तो उसे भोजनालय में से कुछ खटपट की आवाज आई। जब जाकर के देखा तो भीम महाराज थाली में चावल का पहाड़ रचकर खा रहे थे। अर्जुन को देखकर सहम गये और अपनी सफाई देने लगे, ‘‘क्या है ना आप सब भाई थोड़ा थोड़ा खाकर अपना भोजन समाप्त कर देते हो। तो आपके साथ मुझे भी रुकना पड़ता है। पर पेट तो खाली ही रहता है। लज्जा के मारे मै भी उठ जाता हूँ। पर रात को इतनी भूख लगती है कि यहाँ आकर जो मिलता है वो खा लेता हूँ। अब माता कुंति को पता है तो वो मेरे लिये कुछ ज्यादा ही बचाकर रखती है। देखो बाकी लोगों को मत बताना। सब हसेंगे।’’ अर्जुन ने कहा, ‘‘मै आपकी समस्या समझ सकता हूँ। मै किसी को नहीं बताउंगा। पर मुझे एक प्रश्न है अंधेरे में आप खा कैसे लेते हो? हाथ सीधा मूह तक कैसे पहूँच जाता है? इधर उधर क्यों नहीं जाता?’’ भीम खिलखिलाकर हँस पड़े, ‘‘अभ्यास भैया अभ्यास! आचार्य बताते है ना सब कुशलता अभ्यास से ही आयेगी। तुम धनुर्विद्या का अभ्यास करते हो मै खादविद्या का।’’ अर्जुन को मन्त्र मिल गया – ‘अभ्यास भैया अभ्यास!’ और उसने रात को धनुर्विद्या का अभ्यास करना प्रारम्भ किया और अन्धेरे में भी निशाना लगाने में निष्णात हो गया।

केवल कुशलता ही नहीं व्यक्तित्व के सारे बाह्य आयाम बल, रुप, स्वास्थ व कौशल सभी अभ्यास के द्वारा ही विकसित किये जा सकते है। अभ्यास को योग में भी वैराग्य के साथ सबसे अधिक महत्व का साधन माना गया है। महर्षि पतंजलि अभ्यास की व्याख्या करते है ‘‘स तु दीर्घकाल नैरन्तर्य सत्कारसेवितो दृढ़भुमि।’’ हम बहुत अधिक तकनिकी चर्चा नहीं करेंगे। हमारे व्यावहारिक प्रयोग के लिये अभ्यास के तीन अंगों का समझना पर्याप्त है। अभ्यास किसका करना है – एकाग्रता का। कैसे करना है अनुशासन से करना है। और कब करना है सातत्य से करना है दीर्घकाल तक। स्वामी विवेकानन्द के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के पास असीम शक्ति है। किन्तु कौन व्यक्ति कितनी शक्ति का अपने जीवन में लक्ष्य प्राप्ति की ओर प्रयोग कर पाता है ये इस बात पर निर्भर करता है कि किसके पास कितनी एकाग्र होने की क्षमता है। एकाग्रता की क्षमता प्रत्येक में होती है। अभ्यास से उसको बढ़ाया भी जा सकता है और अधिक प्रभावी भी बनाया सकता है। मन में प्रचण्ड ताकद है पर वह बिखरी हुई होने के कारण चरित्र के विकास में साधक नहीं हो सकती। यदि हम इस मन को एकाग्र होने का प्रशिक्षण प्रदान करते है तो यह मन की शक्ति दृढ़भूमि बनकर ईच्छाशक्ति बन जाती है।

आसन, प्राणायाम या सूर्यनमस्कार योग के इन सभी अभ्यासों में मूलतः मन को एकाग्र करने का ही अभ्यास होता है। त्राटक जैसे विशेष शुद्धिक्रिया भी सीख सकते है जो सीधे मन की एकाग्रता को बढ़ाती है। इन सब को सूयोग्य प्रशिक्षित शिक्षकों के मार्गदर्शन में सीखकर बाद में ही किया जा सकता है। धारणा-ध्यान आदि आंतरिक योग के साधन एकाग्रता में प्रशिक्षित होने के बाद ही सम्भव हो पाते है। पर एकाग्रता को अपने व्यक्तित्व का अंग बनाने का सबसे सरल मार्ग है खेल। मैदानी खेलों में मन की एकाग्रता का सहज और आनन्द के साथ विकास होता है। इसलिये पढ़ाई में भी यदि सबसे आगे बढ़ना हे तो खेल का अभ्यास प्रारम्भ कर दो। हाँ नियमितता से अभ्यास।

ये नियमितता भी तो अभ्यास से ही आती है। अनुशासन के अभ्यास से। अनुशासन अर्थात स्वयं का स्वयं पर शासन। जो व्यक्ति किसी और के अधीन नहीं रहना चाहता है उसे अनुशासित होना होगा। अनुशासन स्वयं के प्रति सम्मान का प्रगटीकरण है। जो खुद से प्यार करता है वह अपने जीवन को सहज ही अनुशासित कर लेता है। अनुशासित व्यक्ति अपने आप में बड़ा ही स्वतन्त्र हो जाता है। युवाओं के मन में ये बहुत बड़ी गलतफहमी होती है कि अनुशासनहीन होने में आनन्द है। वास्तव में यदि आप समय और शरीर को अनुशासित कर सकें तो आप पायेंगे की आपके पास जो चाहे वो करने के लिये पर्याप्त समय भी होता है, सामथ्र्य भी और विकल्प चूनने की स्वतन्त्रता भी। अनुशासित छात्र पढ़ाई नियमित करता है तो बकाया (Pending) काम कुछ भी ना रहने से कम समय में ही मुक्त हो जाता है और फिर परीक्षा के मध्य भी अपनी रूचि के अनुसार खेल अथवा मनोरंजन के लिये समय निकाल लेता है।

समयपालन, आज्ञापालन और सुव्यवस्था ये अनुशासन के अभ्यास के तीन मार्ग हैं। हम स्वयं तय करके समयपालन करें यह अपने जीवन का सम्मान है। यदि हम किसी से समय तय करें तो उसका कड़ाई से पालन करें स्वयं के गठन के लिये। कहते है नेपोलियन ने महत्वपूर्ण मन्त्रणा के लिये रखे भोज में सेनापति को देरी होने पर अकेले ही भोजन कर लिया और बादमें भूखे पेट ही मन्त्रणा प्रारम्भ कर दी। किसी के यह कहने पर कि 20 सेकण्ड ही तो देरी हुई थी उत्तर दिया कि ‘‘रणभूमि में 20 सेकण्ड का अन्तर जीवन और मृत्यु के मध्य का अन्तर होगा। और इससे भी अधिक महत्व की बात है कि यह विजय और पराजय के बीच का भी अन्तर होगा।मै विजय की आदत डालना चाहता हूँ। उसका प्रारम्भ समयपालन की आदत से होता है।’’

आज्ञापालन मन को अनुशासित करता है और बल, रूप स्वास्थ्य और कुशलता में यह अनिवार्य है। आज्ञा के रुप में मन के विरूद्ध बात को भी किया जाता है तब उसे आज्ञापालन कहते है। यदि पहलवान मन की माने और शरीर को कष्ट देनेवाले व्यायाम से कतराये ते कैसे बलवान् होगा। पर यदि वह प्रशिक्षक की आज्ञा का पालन कर मन की कमजोरी को जीत ले तो अवश्य अपराजेय हो जायेगा। इसलिये जीवन में विजयी व्यक्तित्व को गढ़ना है तो मनमानी नहीं चलेगी, आज्ञामानी ही दौड़ेगी। तो हर बार कार्य करते समय स्वयं को पूछे मनमानी या आज्ञामानी?

सुन्दरता के लिये शारीरिक अनुशासन अर्थात सुव्यवस्था अत्यावश्यक है। आकर्षक चुम्बकत्व आयनों के अनुशासित होने से आता है यह हमने देखा था। इसका अभ्यास हमें अपने स्वामीत्व की हर वस्तु को सुव्यवस्थित करने से करना होगा। जिस चीज को हम अपना कह देते है उसके साथ अपने अहं के माध्यम से हम अपने चरित्र को जोड़ देते है। अर्थात हमारे कपड़े, पुस्तके, जूते-चप्पल, गाडी, खेल के उपकरण, गुड्डा-गुड्डी जिसे भी हम हमारा कहते है सब हमारे व्यक्तित्व को ना केवल दर्शाते है अपितु गढ़ते भी है। अतः शारीरिक अनुशासन का प्रारम्भ इन चीजों को व्यवस्थित करने से होता है। पुस्तके, कपड़े साफ-स्वच्छ, सुन्दर रखने में जो प्रयास लगेगा वो हमारे मन को भी सुन्दर कर देगा। अव्यवस्था से व्यवस्था और व्यवस्था से सुव्यवस्था का प्रवास जीवन को सुन्दरता और सहज निर्मलता की ओर ले जाता है।

एकाग्रता और अनुशासन के साथ ही अभ्यास का सबसे श्रेष्ठ अंग है -सातत्य। महर्षि पतंजलि ने जिसे नैरन्तर्य कहा है- निरन्तरता। इसकी चर्चा को अभी निरन्तर रखते है अगले सप्ताह के लिये। तब तक पहले दो अंगों का तो अभ्यास प्रारम्भ कर ले। भीम सा बल, अर्जुन सा रूप और दोनों का स्वास्थ्य और कौशल पाने का एक ही तो मन्त्र है ‘‘अभ्यास भैया अभ्यास!’’

मार्च 19, 2012 Posted by | आलेख | , , , , , , , , , , , | 3 टिप्पणियाँ

प्राणवान ही पूर्ण स्वस्थ


गढ़े जीवन अपना अपना -14
आद्य क्रांतिकारी वासुदेव बलवन्त फडके को जेल में बंद रखना भी सम्भव नहीं था। जेल से भागने के लिये उन्होंने कोई बहुत बड़ी योजना नहीं बनाई। उनका अपनी शक्ति पर विश्वास था। उन्होंने अपनी कोटरी के आगे लगे सलाखों के जाल को दोनों हाथों से पकड़कर उखाड़ लिया और फिर उसे उठाकर ही दौड़ पड़े। उसी फाटक को जेल की दिवार से सटाकर खड़ा किया और उसी की सीढ़ी बनाकर दिवार फांद गये। जंगल में फिर भीलों की सेना बनाई और क्रांति का कार्य जारी रखा। कोई उन्हें कभी पकड़ ही नहीं पाता यदि वे बुखार से पीड़ित नहीं हो जाते। ज्वर ने ऐसा घेरा कि मंदिर में नींद में ही बेहोश हो गये। तब अंगरेज सेनापति सोते वासुदेव की छाती पर सवार हो गया। फिर भी होश आते ही उसे धक्का देकर गीरा दिया। पर शस्त्र निकाल लिये गये थे और कमजोरी भी इतनी थी कि भागना सम्भव नहीं था इसलिये पकड़े गये।

बाघा जतीन भी बालासोर के जंगलों में 9 सितम्बर 1915 को अंगेजों से लड़ते हुए मरणांतक घायल हुए और दूसरे दिन अस्पताल में उन्होंने अंतिम श्वास ली। उससे पहले 4 दिन से बारीश के बीच जंगल में भागते भागते उन्हें भी बुखार चढ़ गया था और इस ज्वर में लड़ने के कारण ही वे अंग्रेजों के शिकार हो गये। यदि स्वास्थ्य साथ देता तो शायद इन दोनों क्रांतिकारियों का कार्य और अधिक आगे बढ़ता। इसी महत्व को ध्यान में रखते हुए लोकमान्य बाल गंगाधर टिळक ने 11 वी कक्षा के बाद अपनी पढ़ाई में से एक वर्ष का विराम लेकर योग व्यायाम आदि के द्वारा पूर्ण स्वास्थ्य को प्राप्त किया। इसी के चलते मण्डाले में घोर शारीरिक यातनाओं के बाद भी वो पूरे बल के साथ राष्ट्र का नेतृत्व करने लौट सके।

जीवन को गढ़ने की प्रक्रिया में व्यक्तित्व विकास के बाहरी आयामों में बल और रुप के बाद तीसरा है – स्वास्थ्य। यह केवल शरीर के स्तर पर ही नहीं है। पूरे व्यक्तित्व का ही स्वस्थ होना अत्यन्त आवश्यक है। व्यक्तित्व के पांचों स्तर – शरीर, मन, भाव, बुद्धि तथा आध्यात्मिक स्तर पर स्वस्थ होना चरित्र के सम्यक विकास के लिये अनिवार्य है। सामान्यतः निरोगी होने अर्थात रोग ना होने को ही स्वास्थ्य समझा जाता है। पर वास्तव में स्वस्थ होना एक सकारात्मक विधा है। स्वामी विवेकानन्द ने लण्डन में दिये एक व्याख्यान में कहा कि ‘हम भारतीय इतने आध्यात्मिक हैं कि जब एक-दूसरे से मिलते है तब अभिवादन में भी गहरा प्रश्न पूछते है।’ उन्होंने अंग्रेजी में वह प्रश्न बताया – Are you upon yourself? अर्थात क्या आप अपने आप में स्थित है? भिन्न भिन्न भाषाओं में अभिवादनों को देखने पर इस अर्थ का कोई सीधा अभिवादन ध्यान में नहीं आता है। पर अभिवादन के साथ सामान्यतः हम स्वास्थ्य की पृच्छा करते है। ‘क्या आप स्वस्थ है?’ यदि संस्कृत में संधि तोड़कर देखे तो ‘क्या आप स्व में, -अपने आप में स्थित है?’  भारत में ‘स्व में स्थित होने’ को ही स्वस्थ होना मानते है।

स्व में स्थित होना केवल आध्यात्मिक ही नहीं व्यक्तित्व के सभी स्तरों पर होता है और इन स्तरों के आपसी संबन्ध में भी। जैसे मन और शरीर का सीधा सम्बन्ध है। मन प्रसन्न हो तो शरीर भी स्वस्थ होता है। भावों के असंतुलित होने से श्वसन, पाचन, रक्तदाब जैसी सामान्य शारीरिक प्रक्रियाएँ भी बाधित होती है। अतः पूर्ण रुप से स्वस्थ रहने के लिये इन सब स्तरों को जोड़नेवाले तत्व को समझना पड़ेगा। छान्दोग्य उपनिषद् में रेक्व महामूनि की कथा आती है। केवल 15 वर्ष की आयु में विश्व में व्याप्त शक्ति को समझने के लिये तप किया और तत्व का साक्षात्कार भी किया – ‘यथा ब्रह्माण्डे वायु तथा पिण्डे प्राणः’। जैसे सारे जगत में वायु व्याप्त है उसी प्रकार व्यक्तित्व में प्राण सर्वव्यापी है। बिना वायु के कोई स्थान नहीं रह सकता वैसे ही प्राण का भी निर्बाध प्रवाह चलना अनिवार्य है। मन और शरीर को जोड़ने वाला भी प्राण ही है। अतः स्वस्थ होने का अर्थ है प्राणवान होना। प्राण अर्थात जीवनी उर्जा। इस उर्जा की मात्रा (Quantity) तथा गुण (Quality) दोनों स्वास्थ्य के प्रमुख कारक हैं।

प्राण का एकमात्र स्रोत सूर्य है। सूर्य से ही हमें प्राणउर्जा प्राप्त होता है। भोजन में भी जो शक्ति हम पाते है वह भी सूर्य की ही उर्जा होती है। वनस्पति सूर्य की उर्जा को अन्न में परिवर्तित करती है। शाकाहारी भोजन में हमे यह प्राण सीधे प्राप्त होता है। मांसाहारी भोजन में यह परोक्ष रुप से ही प्राप्त होती है क्योंकि अधिकतर जिन प्राणियों का मांस खाया जाता है वे स्वयं शाकाहारी होते है अतः उनके द्वारा वनस्पति से प्राप्त सूर्य के प्राणों को द्वितीय चरण में मनुष्य उनके मांस से प्राप्त करते है। अतः मांसाहार में मात्रा एवं गुण दोनों स्तरों पर प्राण का ह्रास होता है। भोजन से अधिकतम प्राण की उर्जा प्राप्त करने के लिये ताजा भोजन सर्वाधिक उपयोगी होता है।

पारम्पारिक ज्ञान की दृष्टि से प्राण 3 गुणों से भावित होता है। सात्विक, राजसिक व तामसिक। किन्तु आधुनिक समय में इन सब तकनिकी बातों में उलझने के स्थान पर शुद्धि एवं ताजगी का ध्यान रखना ही पर्याप्त होगा। प्राण की पर्याप्त प्राप्ति के साथ ही उसके समुचित प्रयोग एवं अपव्यय को रोकना भी आवश्यक है। प्राण के सम्यक प्रयोग के लिये हमारी प्रणालियों, खासकर श्वसन तथा पाचन की प्रणालियों का सुदृढ़ होना जरूरी होगा। इन सब के लिये अपनी क्षमता के अनुसार नियमित व्यायाम करना चाहिये। प्राण का अपव्यय मन के स्तर पर सर्वाधिक होता है अतः अपनी आदतों को संयमित करने से ही हम अधिक प्राणवान हो सकते है। अपव्यय को रोकने का दूसरा प्रभावी माध्याम है सही विश्राम। हम सोते भले ही 8 घण्टे हो पर विश्राम पूरा नहीं पाते है। इसीलिये तो पूरे रात की नीन्द के बाद भी सुबह उठने पर ताजगी के अनुभव की जगह और कुछ समय सोने की ईच्छा बनी रहती है। सब बच्चे माँ से यही कहते है ‘पांच मिनट और . . .’ सोने से पूर्ण आराम पाने के लिये गहरी नीन्द होना आवश्यक है। इसके लिये सरल उपाय है सोने से पूर्व हाथ पांव धोना। मन को शांत करने के लिये जप, प्राणायाम अथवा किसी भावात्मक पुस्तक का स्वाध्याय। योग में प्रशिक्षित लोग शवासन तथा योगनिद्रा का भी प्रयोग समयक विश्राम द्वारा प्राण संरक्षण के लिये कर सकते है।

प्राण की प्रचुरता से ही व्यक्तित्व के सभी स्तर निरामय होते है और पूर्ण स्वास्थ्य का लाभ मिलता है। प्रतिरोधी प्रणाली के समर्थ होने के कारण रोग पास ही नही फटकेंगे अतः निरोगी होने का सह उत्पाद (By-Product) भी प्राप्त होगा। पर ये ध्यान रखना चाहिये की योग एवं अन्य साधनाओं का उद्देश्य पूर्ण स्वास्थ्यलाभ से चरित्र का विकास है ना कि रोगों से छुटकारा। अन्यथा स्थिति उस साधक की तरहा होगी जो शिवरात्रि के दिन पूरी रात जागकर चारो याम पूजन करता है। सुबह शिवजी प्रसन्न होकर दर्शन देते है और कहते है ‘मांगो जो वरदान मांगना हो।’ कुछ देर पहले ही साधक के पीठ पर एक कीड़ा काटा है और ऐसी जगह खुजली हो रही है जहाँ हाथ भी नहीं पहुँच पा रहा। तो जब शिवजी प्रगट हुए तब सबसे बड़ी समस्या पीठ की खुजली है। अतः शिवजी से वर भी मांगा तो यही कि खुजली मिटा दो। जो सर्वकल्याणकारी शंकर सबकुछ दे सकता है उनके वर को केवल खुजली मिटाने में व्यर्थ गवांने के समान ही मूर्खता है रोगमुक्ति के लिये योग करना।

याद रहे! प्राणवान होना ही पूर्ण स्वास्थ है केवल निरोगी होना नहीं।

फ़रवरी 11, 2012 Posted by | आलेख | , , , , | 4 टिप्पणियाँ

सफलता की चाह नहीं! चिरविजय का पराक्रम !!


कर्मयोग 10:
‘‘हर कोई सफल होना चाहता है। पर क्या यह सम्भव है? आपकी गीता क्या कहती है?’’ युवाओं की जिज्ञासायें विद्रोह के आवरण में ही व्यक्त होती है। पर भाईजी को तो इस प्रकार की आपत्तियों को झेलने का पुराना अभ्यास है। उन्हें पता था युवक की बात अभी पूरी नहीं हुई है अतः वे केवल हँस दिये। प्रश्नकर्ता ने कहा, ‘‘मुझे पता है आप कहेंगे सच्ची सफलता अलग होती है। सफलता का अर्थ क्या है? आदि आदि। पर जब आप कहते है कि गीता जीवन का मार्गदर्शन करती है तो फिर इस बारे में भी तो कुछ होगा ना उसमें?’’

भाईजी ने कहा गीता में सफलता के बारे में कुछ कैसे हो सकता है? गीता तो कहती है आपका कर्म पर तो पूरा अधिकार है किंतु फल पर कोई अधिकार ही नहीं है। जब फल पर अधिकार ही नहीं है तो फिर स-फल अर्थात फल पाने वाले होने का क्या अर्थ हुआ? गीता तो कहती है – न मे कर्मफले स्पृहा।। कर्मफल के प्रति कोई लिप्सा नहीं है। हमारी पारम्पारिक व्रत कथाओं में इससे अधिक गहरे पद का प्रयोग होता है। सुफल – अच्छा फल। हमारे व्रत का परिणाम अच्छे फल को देनेवाला हो ऐसी प्रार्थना है। सु-फल कौनसा होगा यह प्रत्येक की स्थिति पर निर्भर करेगा। देवताओं की स्तुति में किये जानेवाले स्तोत्रों के अंत में फलश्रृति आती है जिसमे अक्सर यह प्रार्थना होती है – विद्यार्थि लभते विद्या, धनार्थि लभते धनम्। पुत्रार्थि लभते पुत्रान् मोक्षार्थि लभते गतिम्।। जिसको जो चाह हो उसको वो मिले। संत ज्ञानेश्वर ने तो इन्हीं शब्दों में पसायदान, प्रसाद मांगा है। जो जे वांछिल तो ते लाहो। प्राणिजात। ये तो बड़ी ही बढ़िया बात हुई। जो चाहो वो मिल जाये। गीता से तो ये ही अच्छा है। पर ज्ञानेश्वरी तो गीता की ही मराठी में व्याख्या है फिर इसके अंत में मांगे पसायदान में गीता के विपरित बात कैसे हो सकती है?  यह गीता के अनुसार ही है। गीता में भगवान कह रहे है – ये यथा माम् प्रपद्यन्ते तांस तथैव भजाम्यहम्। मम वत्र्मानुवर्तन्ते मनुष्या पार्थ सर्वशः।। गी 4.11।। जो जैसे भाव से पूजा करेगा वैसा ही ईश्वर को प्राप्त करेगा।

यह भाव कैसे आता है? हमारी मर्जी अथवा चाह भी हमारे भाव पर ही निर्भर करेगी। हम इसी के अनुरूप कार्य करेंगे। और उसी के अनुसार फल को प्राप्त करेंगे। हमारा कर्म ही हमारी पूजा है अतः उसका फल उस पूजा का प्रसाद। मन अपनी क्षमता, स्तर व योग्यता के अनुसार ही कामना करेगा। इन तीनों के सम्मिलित प्रभाव को हम हमारी स्थिति कह सकते है। गीता में इसके लिये बड़ा ही मार्मिक शब्द प्रयोग हुआ है -उपपत्ति। क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ न एतद् त्वयि उपपद्यते। गी 2.3।। कापुरूषता को मत प्राप्त हो अर्जुन। यह तेरी उपपत्ति नहीं है। सरल भाषा में तुम्हारे स्तर के व्यक्ति को यह शोभा नहीं देता। हमारी उपपत्ति के अनुसार किया कार्य ही हमें शोभा देता है। उपपत्ति का अर्थ है अंतिम लक्ष्य के सन्दर्भ में हमारी स्थिति। कहाँ तक हम पहुँचे हैं? किस स्थान पर बैठने की हमारी योग्यता है? इसी के अनुसार हमारा मन कामना करेगा। कर्म भी इस प्रकृति के अनुसार होंगे और फलकामना भी इसी की सीमा में होगी। कई बार कर्म करते समय हम अपनी उपपत्ति को भूल जाते है फिर भी उसी के अनुरूप फल की कामना करने लगते है। तब कर्म और परिणाम की अपेक्षा में विभेद हो जाता है। कर्म पर ध्यान दिये बिना केवल परिणाम की ईच्छा करना सामान्यतः इसे ही सफलता की चाह माना जाता है। ये चाह हमेशा मर्यादित, सीमित ही होगी। अतः इसके पूर्ण हो जाने से क्षणिक आवेशयुक्त सुख का अनुभव भले ही हो, संतोष नहीं मिलेगा। क्योंकि हमे अपनी प्रकृति की सीमा से परे जोने में ही संतोष मिलता है। कर्म प्रकृति के वशी भूत होकर चलता है तो कामनापूर्ति भी सुख नहीं देती। अंग्रजी शब्द Success का भी शाब्दिक अर्थ है -‘के पार जाना’। अपने लक्ष्य को पार करना अथवा अपनी क्षमता की सीमा को पार पाना या फिर बाधाओं पर पार पाना इसे ही वास्तव में Success माना गया है। तो हिन्दी में इसका सही अनुवाद होगा विजय। प्रकृति पर विजय। अपनी स्वाभविक सीमा पर विजय। प्रकृति पर विजय उसके विपरित जाकर नहीं हो सकती। अपनी प्रकृति के अनुरूप कर्म करते हुए ही उसके पार जाया जा सकता है।

प्रकृति के दो मोटे मोटे वर्ग किये गये है- प्रवृत्तिं च निवृत्तिंच। प्रवृत्ति अर्थात कामनाओं की ओर मन की गति। निवृत्ति अर्थात कामनाओं से वैराग्य की ओर मन की स्वभावतः गति। हमे अपनी स्थिति इन दो में से किस ओर अधिक है यह देखना चाहिये ताकि इसके अनुरूप हम अपने लिये सही कर्म मार्ग चुन सकें। यदि हमारा मन अधिक बहिर्मुख है। बाहरी बातों में अधिक रमता है। ईच्छाओं में इन्द्रियों के सुख के लिये अधिक लालायित होता है तो मानना होगा कि हमारे लिये प्रवृत्ति मार्ग ठीक है। यदि किसी उदात्त ध्येय के लिये काम करते हुए इन सुखों का त्याग करने में आनन्द का अनुभव होता है। स्वयं को भूला देने वाले कार्य में मन अधिक रमता है। स्वयं से अधिक औरों के हित में विचार करने का मन है तो फिर हम कह सकते है कि हमारी गति वैराग्य की ओर है और हमारे लिये निवृत्ति मार्ग श्रेयस्कर है। ‘श्रेय’ इस शब्द का गीता में बार बार प्रयोग हुआ है। कामना, वासना या इच्छा से कर्म का निर्धारण नहीं होगा। हमारी प्रकृति के अनुरूप जो हमारे लिये श्रेय की ओर ले जानेवाला है वही हमारा कर्तव्य है।
गीता के प्रथम अध्याय में अपने मन के सम्भ्रम का वर्णन करते समय भी अर्जुन प्रारम्भ इसी से करता है।

निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव। न च श्रेयोनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे।। गी 1.31।।  हे केशव सारे लक्षण मुझे अपने विपरित दिखाई पड़ते है। इस युद्ध में अपने स्वजनों को मारने में मै कोई श्रेय नहीं देखता हूँ। आगे पूरा वर्णन इसी क्रम में है कि किस प्रकार यह युद्ध धर्म का नाश करेगा अतः श्रेयस्कर – श्रेय की ओर ले जाने वाला नहीं है। इसलिये मै युद्ध नहीं करूंगा। श्रेय ही अर्जुन का तर्क है। फिर भगवान द्वारा उपपत्ति का भान करा दिये जाने पर अपने भय व भ्रम का साक्षात्कार हो जाने पर जब अर्जुन शरणागति से शिष्यत्व ग्रहण करता हे तब फिर श्रेय का उल्लेख है। कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः। यत् श्रेयः स्यात् निश्चितं ब्रुहि तन्मे शिष्यस्तेSहम शाधि माम् त्वां प्रपन्नं।।गी 2.7।।  भय के कारण मेरा स्वभाव कृपणता अर्थात संकुचितता से ढ़क गया है और इसके कारण मै अपने धर्म अर्थात कर्तव्य के प्रति भ्रमित हो गया हूँ। इसलिये मेरे लिये क्या श्रेयस्कर है वह निश्चित कर आप मुझे बताओ। मै आपका शिष्य हूँ और आपकी शरण आया हूँ। मेरी रक्षा करें। भगवान भी जीवन के यथार्थ का ज्ञान बताते है और फिर कहते है – धर्म्याद्धि युद्धाद् श्रेयो अन्यत् क्षत्रियस्य न विद्यते।। गी 2.31।।  धर्म की स्थापना के उद्देश्य से किये गये युद्ध से क्षत्रिय के लिये और अधिक श्रेयस्कर कुछ भी नहीं है। आगे के 6 श्लोंकों में स्वधर्म से पलायन के दुष्परिणामों का वर्णन करने के बाद अपने श्रेय के लिये युद्ध का आदेश देते है। तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चय।। गी 2.37।। आगे भी जहाँ जहाँ शंका आई वहाँ वहाँ अर्जुन ने अपने लिये श्रेयस्कर क्या है यही पूछा है। तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोSहमाप्नुयाम्।। गी 3.2।।  अतः एक तय करके बता दो कि मेरे लिये क्या श्रेयस्कर होगा – कर्म का मार्ग या ज्ञान का मार्ग?

गीता श्रेय का मार्ग बताती है। श्रेय अर्थात जो श्री की ओर ले जाये। श्री को प्राप्त करने का मार्ग। श्री के कई अर्थ लगाये जाते है। सबसे प्रचलित अर्थ है – लक्ष्मी। इसी से श्रीमन्त अर्थात अमीर जैसे शब्द भी प्रचलित हुए। श्री का अर्थ केवल धन से लेना अधुरा ही होगा। श्री अर्थात परिपूर्णता के साथ समृद्धि। समृद्ध का अर्थ है जिसके पास सबकुछ है। भौतिक साधनसम्पन्नता के साथ ही आत्मिक सामथ्र्य भी। जो स्वावलम्बी होने के साथ ही औरों को भी आवश्यकतानुसार सम्बल देने की क्षमता व नियत दोनों का होना वास्तविक श्रीमन्ती है।

‘श्री’ का एक और अर्थ है – विद्या। किसी विषय का पूर्ण ज्ञान, स्वामीत्व होना विद्या है। केवल सैद्धान्तिक जानकारी ही नही अपितु पूर्ण व्यावहारिक ज्ञान भी। विद्वान अर्थात जिसके पास विद्या है। तो विद्वान होने का अर्थ केवल किसी विषय की व्याख्या करने की क्षमता से नहीं है अपितु आवश्यकतानुसार उसके प्रयोग का भी पूर्ण ज्ञान आवश्यक है। वाहनशास्त्र (Automobile) का विद्वान अभियन्ता (Engineer) यदि अपना स्वयं का वाहन ठीक नहीं कर सकता हो तो वह कैसा विद्वान? उससे तो वह अनपढ़ यन्त्री (Mechanic) अच्छा जो रासायनिक व भौतिक विज्ञान के सुत्र तो नहीं जानता जिससे वाहन चलता है किन्तु बन्द पड़े वाहन की तृटी को पहचान कर उसको ठीक करने का कौशल तो उसके पास है। विद्या का अर्थ ज्ञान व कौशल दोनों का समन्वय है। अतः श्री से युक्त -श्रीयुत का अर्थ होगा जो ज्ञानी होने के साथ ही व्यावहारिक भी है। विद्या का एक और शास्त्रीय वर्गीकरण भी है। परा विद्या व अपरा विद्या। पराविद्या वह आध्यात्मिक ज्ञान व विज्ञान है जो ईश्वर से सम्बंधित है। अर्थात ईश्वरसाक्षात्कार का ज्ञान व कौशल। अपरा विद्या में अन्य सभी भौतिक जगत के विषयों का ज्ञान आता है। ‘श्री’ पद में परा व अपरा दोनों विद्याओं का समावेश होता है।

श्रेय अर्थात श्री की ओर ले जानेवाला यह कहते समय श्री का अर्थ और अधिक गहन व परिपूर्ण लिया गया है। इसमें उपरोक्त दोनों अर्थों के साथ ही और भी अधिक समृद्धि की बात अभिप्रेत है। प्रत्येक की उपपत्ति के अनुसार उसका स्वभाव होता है। इस स्वभाव के अनुरूप उसके जीवन का विशिष्ठ लक्ष्य होता है। इस लक्ष्य को पाने हेतु उसे सामर्थ्य, क्षमता व विद्या के साथ ही सम्यक व्यवहार भी करना होता है। यह श्री है जिसे पाने की ओर अग्रेसर होना श्रेय कहलायेगा। तो हमारे लिये वह श्रेयस्कर होगा जो हमें अपने स्वधर्म की ओर ले जाये। ऐसा कर्म जो हमारे स्वधर्म को साकार करने में सहायक हो वही हमारा कर्तव्य कहलायेगा। ऐसे कर्तव्य पथ पर सब अग्रेसर हो ऐसी अपेक्षा है इसिलिये नाम के साथ श्री लगाने की परम्परा है। श्रीराम अर्थात श्री से युक्त राम। हम एक दुसरे के नाम में आदरपूर्वक श्री का प्रयोग करते है तब वह योग्यता वाचक भले ही ना हो किन्तु लक्ष्य का स्मरण करानेवाला तो होता ही है कि हमे श्री की ओर ही जाना है। इस ध्येयमार्ग को ही कठोपनिषद् में ‘श्रेयो मार्ग’ कहा है। आवश्यक नहीं की श्रेयो मार्ग प्रेयो मार्ग भी हो। यमराज तो नचिकेता को दिये उपदेश में दोनों को एक दूसरे के विपरीत बताते है। उनके अनुसार प्रवृत्ति की ओर जानेवाला इन्द्रिय सुख का मार्ग प्रेयो मार्ग है और निवृत्ति की ओर ले जानेवाला श्रेयो मार्ग जिसके बारे में अन्त में वे कहते है कि यह तलवार की धार पर चलने के समान कठीन मार्ग है। शुरस्य धारा निषिदा दुरत्यया। यमराज के उपदेश का विषय आत्मज्ञान होने के कारण ऐसा कहा होगा। किन्तु कर्मयोग में श्रेयगामी मार्ग सहज, स्वभावगत होने के कारण आनन्ददायी भी होता है। सुखकर होगा ही ऐसा नहीं किन्तु कल्याणकारी कष्ट भी तो आनन्द देता है। अपनी पूरी शक्ति के साथ दौड़ लगाकर स्वर्णपदक जीतनेवाला धावक पूरी थकान के बाद भी कितने आनन्द का अनुभव करता है। विजय प्राप्ति के लिये किया गया कष्ट भी आनन्ददायी होता है। यदि लक्ष्य का भान भूल जाये तब सुख-सुविधा से सम्पन्न जीवन भी उपर से चाहे जितना प्रिय लगे अर्थहीन होने के कारण उबाउ और थका देनेवाला ही होता है। जीवन में स्वभावानुसार सही कर्म चुना हो तब श्रेय मार्ग प्रियकर भी होता है। किन्तु यदि किसी समय संयम की शिथिलता के कारण श्रेय मार्ग पे्रय ना हो तब चुनाव अप्रिय होते हुए भी श्रेयका ही करना है। सामान्य सा उदाहरण मधुमेह के रोगी को मिठाई खाने की इच्छा का है। इसमें जो प्रिय है वो श्रेय नहीं है। अतः क्षणिक सुखकर होते हुये भी दीर्घतः दुखदायी है। सर्वदा सुख व आनन्ददायी तो श्रेयो मार्ग ही है।

श्री प्राप्त करने के लिये प्रयास ही विजय का प्रयास है। अपने जीवनध्येय को पहचान उसकी पूर्णता में स्वयं को पूरा झोंक देना चिरविजय का मार्ग है। जीवन संग्राम के छोटे छोटे संघर्षों पर विजय प्राप्त करने की आपाधापी में यदि हम जीवन के परमध्येय को भूल गये तो फिर सफल भले ही हो संतुष्ट नहीं होंगे। संतुष्टि तो चिरविजय में ही है। यह चिरविजय की कामना ही हमारे जीवन को गतिमान व ध्येयगामी बनाये रखती है। भारतीय संस्कृति प्रत्येक को उदात्त ध्येय की ओर ही प्रेरित करती है। जन्म जन्मांतर की अखण्डयात्रा में इस बार का जो पाड़ाव हमने पाया है वह हमारी उपपत्ति है। यहाँ तक पहुँचे है यह तो तय है। इसे ही प्रारब्ध भी कहते है। इसे नहीं बदल सकते पर चिंता की कोई बात नहीं यह हमारी सीमा थोड़े ही है। यदि अपनी उपपत्ति के अनुरूप श्रेयो मार्ग चुन लिया तो आगे बढ़ने की कोई सीमा नहीं है। शायर कहता है – सरे अक्स सितारों से आगे जहां और भी है। बुलन्दी परों की उड़ानों से आगे आसमां और भी है।
सफलता की चाह तो केवल सीमित परिणाम की नपुंसक अपेक्षा मात्र है। अपनी प्रकृति के अनुरूप कर्म करते समय अधिक और अधिक बड़े ध्येय को प्राप्त करने का पराक्रम करते रहना ही चिरविजय की कामना है।

जनवरी 19, 2012 Posted by | योग | , , , , , , , , , , | 4 टिप्पणियाँ

कोई शक या सवाल?


कर्मयोग 9:
प्रश्नों का गीता में बड़ा महत्व है। अर्जुन के प्रश्नों से ही गीता का प्रवाह आगे बढ़ता है। अन्यथा तो दूसरे अध्याय में भगवान ने अपनी बात पूरी ही कर ली है। जीवन में प्रश्नों का बड़ा महत्व है। ज्ञानप्राप्ति में उचित प्रश्नों का सही आदरयुक्त सेवाभाव से पूछा जाना आवश्यक होता है। कर्मयोग के रहस्यों को समझते समय हम यह भी कला विकसित करें ये आवश्यक है। मन में उठनेवाले हर प्रश्नवाचक विचार को ज्ञानकुंजी प्रश्न नहीं कहा जा सकता। अर्जुन जैसे सटीक प्रश्न मन में पकने देने होते है। सामान्यतः विचारश्रृंखला का प्रारम्भ जिज्ञासा से होता है। जिज्ञासा में हम ज्ञानप्राप्ति का प्रयत्न प्रारम्भ करते है। द्वितीय अध्याय में अर्जुन द्वारा स्थितःप्रज्ञ के लक्षणों के बारे में पूछना जिज्ञासा कि श्रेणी में आता है। कृष्ण द्वारा दूसरे अध्याय में प्रदत्त ज्ञानयोग व कर्मयोग के सिद्धांतों के आकलन से अर्जुन विषाद की स्थिति से बाहर आ गया है व जिज्ञासा को प्रगट कर रहा है। जिज्ञासा ज्ञान को ग्रहण करने की तत्परता को दर्शाती है। बिना जिज्ञासा के कितना भी श्रेष्ठ व्याख्याकार क्यों ना हो वह अपने उपदेश से तात्कालिक बौद्धिक क्षुधा शांति तो कर सकता है किन्तु ज्ञानदान नहीं। ज्ञानदान गुरु की योग्यता से भी अधिक शिष्य की तत्परता पर निर्भर करता है। इस जिज्ञासा को जागृत करना सच्चे गुरु का प्रथम कर्तव्य है।
किन्तु प्रथम प्रयास में सुने हुए उच्च सिद्धान्त कई बार हजम नहीं होते है। पूरा समाधान नहीं होता ऐसे में मन का भ्रम से सामना होता है। दो प्रगटतः परस्पर विरोधी सिद्धांतों में अपक्व बुद्धि भी सामंजस्य बैठाने का प्रयास करती है। पर हो नहीं पाता तब भ्रम होता है। भ्रमित मन से सटीक प्रश्न नहीं पूछे जा सकते किन्तु जब भ्रम की स्थिति में हम किसी से मार्गदर्शन पाने का प्रयत्न करते है तब गुरु कितना भी ज्ञानी व सुयोग्य क्यों ना हो मन में शंका ही प्रगट होती है। तीसरे अध्याय के प्रारम्भ में अर्जुन पूछता है
जायसी चेत् कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन
तत् किं कर्मणी घोरे माम् नियोजयसि केशव।।गी 3.1।।
जब आप स्वयं ही कह रहे हो कि ज्ञान कर्म से अधिक श्रेष्ठ है तो फिर मूझे क्यों ऐसे भयंकर कर्म में धकेल रहे हो? यह सर्वाधिक सुयोग्य गुरु द्वारा प्रदत्त सर्वोच्च ज्ञान पर की गई शंका है। अगले श्लोक में तो अर्जुन स्पष्टता से अपने सम्भ्रम को मानता है और कृष्ण पर आरोप लगाता है कि आपकी मिश्रित बातों से ये हो रहा है।
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसिव मे।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोSहमाप्नुयाम।।गी 3.2।।
ऐसी दोगली बातों से आप मेरी बुद्धि को भ्रमित कर रहे हो। कर्म करना श्रेष्ठ है अथवा ज्ञान के लिये कर्म का त्याग? इस संभ्रम और शंका में भी उसकी श्रद्धा अड़ीग है। अतः वह इस शंका की स्थिति में भी अपने शिष्यत्व को नहीं भूला है और कृष्ण से ही कह रहा है कि आप ही ऐसे में निश्चित करके बता दो कि मेरे लिये क्या श्रेयस्कर है?
महर्षि अरविन्द कहते है श्रद्धा कभी भी अन्ध नहीं होती ना ही बिना प्रश्न के विश्वास करने को कहती है। श्रद्धा में तो प्रश्न पूछने की स्वतन्त्रता है। शिष्य के मन में कोई भय नहीं है कि मूझे गलत समझा जायेगा। या मेरे द्वारा शंका प्रगट करने पर गुरु मेरे प्रति दूर्भाव धारण करेगा। यदि ऐसी आशंका में प्रश्न पूछने का संकोच हे तो यह श्रद्धा की कमी है। श्रद्धावान के मन में ना तो कोई भय है ना ही आशंका अथवा संकोच। बालक जिस प्रकार माता से निःसंकाच अपने मन की बात कह सकता है वैसे ही शिष्य अपने गुरु के सामने अपने अंतर की जिज्ञासा, भ्रम अथवा शंका को खुलकर प्रग्ट करता है। इस विश्वास के साथ कि यहाँ से उत्तर अवश्य मिलेगा। शंका का समाधान होगा। भ्रम का निरास होगा।
अर्जुन का कृष्ण से नितान्त स्नेह का सम्बन्ध है। इतना घनीष्ठ कि कोई दुराव या संकोच नहीं है। 11 वे अध्याय में विश्वरूप दर्शन के बाद अचंभित अर्जुन अपने सखासे क्षमा मांगता है
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति।
अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि।।गी 11.41।।
तुम्हारी महिमा को ना जानते हुये मैने प्रेम में आपको कई मित्रवत् संबोधनों से पुकारा है। कृपया मेरी इस धृष्टता को क्षमा कर दें। इस सख्य के होते हुए भी अर्जुन का शिष्यत्व उच्च कोटी का है। और यदि हम गीता के मर्म को जानने का यत्न कर रहे है तो हमें अर्जुन सा शिष्यत्व प्राप्त करने के लिये प्रार्थना करनी चाहिये। दूसरे अध्याय के 7 वे श्लोक में शिष्यस्तेSहम शाधि माम् त्वां प्रपन्नं।।गी 2.7।। कहकर शरणागति प्राप्त करने के बाद से ही हम अर्जुन के संवादों में विषाद के स्थान पर शिष्यत्व की प्रगल्भता का विकास देखते है। जिज्ञासा, भ्रम और शंका की सिढ़ियों का पार करते हुये अर्जुन प्रश्न और उससे भी विकसित परिप्रश्न तक पहुँचता है और भगवान से अंतिम ज्ञान प्राप्त करता है।
चौथे अध्याय में ज्ञान की महिमा बताते हुये उसके प्राप्ति का माध्यम भी बताया है।
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिनः।।गी 4.34।।
प्रणिपात अर्थात विनम्र शरणागति, परिप्रश्न अर्थात अपने तप से तपा हुआ सटीक प्रश्न और सेवा से संतुष्ट हुए तत्वदर्शी ज्ञानीगण ज्ञान का उपदेश देते है। तीनों आवश्यक है। वर्तमान युग में शिक्षा में तर्क का आधार अधिक होने के कारण प्रश्नों का पकना सबसे कठीन है। विनम्रता व सेवा तो श्रद्धा से आ ही जायेगी किन्तु सही प्रश्न को अपने अन्दर पकाने का ध्यैर्य व सही गुरु से पूछने का विनम्र साहस आज के युग मे प्रयत्नपूर्वक विकसित करने पड़ेंगे।
गीता में अर्जुन की अनेक जिज्ञासायें हैं जैसे स्थितःप्रज्ञ के लक्षण पूछना,
स्थितःप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्।। गी 2.54।।
या फिर पापाचरण का कारण पूछना
अथ केन प्रयुक्तोSयं पापं चरति पुरूषः।
अनिच्छन्नपि वाष्र्णेय बलादिव नियोजितः।। गी 3.36।।
बिना स्वयं की इच्छा के भी बलपूर्वक किस प्रेरणा से मनुष्य पाप का आचरण करता है? ये जिज्ञासायें है – अतन्त्य निष्पाप मन से पूछी गयी जानकारीयाँ। यह ज्ञान सर्वजनहिताय है।
किन्तु तिसरे अध्याय के प्रारम्भ कर्म व ज्ञान के चयन के बारे में पूछे उपरोक्त भ्रमजनित प्रश्न अथवा चौथे अध्याय में जन्मक्रम के भ्रम के बारे में पूछना
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः।
कथमेतद्विजानियां त्वमादौ प्रोक्तवान् इति।। गी 4.4।।
आपका जन्म तो विवस्वान के बाद हुआ है फिर हम ये कैसे मान ले कि आपने पूर्व में ही विवस्वान को यह कर्मयोग का ज्ञान बताया था? वैसे ही फिर पाँचवे अध्याय के प्रारम्भ में
संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि।
यच्छ्रेयं एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितं।।गी 5.1।।
कभी कर्म के सिद्धांत की बात करते हो पुनः फिर से कर्म योग की बात करते हो। हे कृष्ण इनमें से जो एक मेरे लिये श्रेयस्कर हो वो तय कर के मुझे बता दो। ये सारी शंकायें है। कृष्ण द्वारा बतायें गये उपदेश में जो ऊपरी विरोधाभास है उससे भ्रमित होकर पूछी गई शंकायें। पर एक बात स्पष्ट है शंका प्रगट करते समय भी अर्जुन स्पष्ट हे कि उसे क्या चाहिये। उसने ये नहीं कहा कि मुझे क्या भयेगा अथवा सहज होगा? ये पूछा है कि मेरे लिये क्या श्रेयस्कर है वा बताओ। हर बार श्रेय की चिंता है।
इन सब स्तरों में से पकते पकते अर्जुन की मेधा प्रश्न पूछने के लिये तैयार हुई और फिर अनेक जिज्ञासाओं, भ्रम और शंकाओं के बाद उसका प्रश्न प्रगट हुआ,
एवमेतद्यथत्थ त्वमात्मानं परमेश्वर।
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम।।गी 11.3।।
हे परमेश्वर आपका वह सर्वव्यापी रूप मै देखना चाहता हूँ। यदि सम्भव हो तो मुझे वह परम दर्शन करायें। इससे पूर्व पहले श्लोक में वह मान चुका हे कि उसका भ्रम दूर हुआ। अब मोह नहीं रहा।
यत्त्वयोक्तं वचस्तेनं मोहोSयं विगतो मम।। गी 11.1।। आपके द्वारा कहे गये इन गुढ़ अध्यात्मज्ञान युक्त वचनों से मेरा मोह जाता रहा है। मोह के जाने के बाद प्रश्न प्रगट हुआ है। परमज्ञान की अनुभूति करने वाला प्रश्न। साक्षात्कार की भूमिका बना वह प्रश्न। जिस प्रश्न के उत्तर में अर्जुन को योगी, ज्ञानियों को भी दूर्लभ ऐसा विश्वरूप दर्शन हुआ वह प्रश्न। इसे ही परिप्रश्न कहते है। पूर्ण परिपक्व मेधा से उत्पन्न सटीक प्रश्न।
हम भी अपने अन्दर अर्जुन की श्रद्धा का जागरण करें। अपने मन की जिज्ञासाओं, भ्रम और शंकाओं को प्रगट करें। उसी में से प्रश्न को पूछने की परिपक्वता आयेगी। यदि मन में उठनेवाली शंकाओं को ही संकोच, भय अथवा उपहास की आशंका से दबा देंगे तो प्रश्न का पकना ही असम्भव हो जायेगा। और फिर ज्ञान की सम्भावना भी दूरस्थ होगी। सबसे बड़ी समस्या होती है कि किसे पूछे? सच्चा गुरु आज कहाँ मिलेगा?  यदि हमारा शिष्यत्व पक जाये तो गुरु को आना ही होगा। अभी तो किसी ऐसे सुहृद  से पूछना प्रारम्भ करे जिसके बारे में तीन बाते हमें निश्चित हो – 1. वह हमसे अधिक ज्ञानी वा अनुभवी है। 2. वह हमसे प्रेम करता है और हमारे ध्येय के बारे में सम्भवतः हमसे अधिक जानता है। 3. उसका अपना कोई स्वार्थ नहीं है।
ऐसा मार्गदर्शक मिलना कम से कम भारत में तो आज भी कठीन नहीं है। तो आज ही शुरू हो जाये पूछना चाहे जिज्ञासा हो, भ्रम हो या शंका? जैसे सेना में अधिकारी हर बात को समझाने के बाद अवसर देते हुए पूछता है – कोई शक या सवाल?

जनवरी 10, 2012 Posted by | योग | , , , , , , , , | 1 टिप्पणी

जाने अपना वर्ण! पहचाने अपना स्वभाव!


कर्मयोग 7:

स्वधर्म पर आधारित कर्म से ही जीवन में परिपूर्णता एवं संतुष्टि प्राप्त हो सकती है। यही गीता का संदेश है। इसको जीवन में उतारना कर्मयोग है और यही सच्चा भक्तियोग भी है। यदि इसे आचरण में नहीं लायेंगे और केवल कृष्ण कृष्ण का नाम रटन करते रहेंगे तो वह पाखण्ड ही होगा। भक्ति नहीं। स्वामी रंगनाथानन्दजी द्वारा उद्धृत श्लोक है, जिसका सही सन्दर्भ अभी नहीं मिल पाया है। स्वामीजी ने डॉ राधाकृष्णन् के हवाले से इसे विष्णुपुराण में होना बताया है। पर स्वामीजी स्वयं ही स्पष्ट कहते है कि विष्णुपुराण की उपलब्ध प्रकाशनों में उसे नहीं खोज पाये है। पर श्लोक बड़ा मार्मिक है –
स्वधर्म कर्म विमुखाः कृष्ण कृष्णेति वादिनः।
ते हरेर्द्वेषिणा मूढ़ाः धर्मार्थं जन्म यत् हरेः।।
कृष्ण कृष्ण रटते रहे पर स्वधर्म से विमुख हो तो ऐसे लोग हरि के विरोधी और मूर्ख हैं। क्योंकि हरि का जन्म ही धर्मकार्य के लिये हुआ था। तो उनकी भक्ति करने के लिये हमें भी धर्मकार्य ही करना होगा। स्वधर्म को पहचानने की शास्त्रीय विधि वर्णधर्म पर आधारित है। जब हम स्मृतिग्रंथों का अध्ययन करते है तो पाते है कि वर्ण ही हमारे समाज का आधार रहा है। स्मृतियों में चाहे व्यक्ति व्यवहार हो, वर्ण व्यवहार हो या राज व्यवहार तीनों मूलतः वर्ण के अनुसार ही बताये गये हैं। वर्ण का समाज में असर 20 वी शती के प्रारम्भ तक दिखाई देता है। महात्मा गांधी का समग्र साहित्य 120 खण्डों में प्रकाशित है ओर उसमें बार बार वर्ण के आधार पर सामाजिक सुधार की बात गांधी करते हैं। 1914 में कैथोलिक बिशप्स के साथ वार्ता में एक प्रश्न के उत्तर में वे कहते है, ‘‘ब्राह्मण राजनीति में तो आ सकते है किन्तु उन्हें सत्ता व चुनाव की राजनीति नहीं करनी चाहिये।’’ भारत के मूल विचार को ठीक से समझनेवाले गिने चुने महापुरूषों में से एक गांधी के अनुसार वर्णव्यवस्था एक वैज्ञानिक सामाजिक रचना थी जिसे स्वार्थी नेतृत्व ने विकृत बना दिया।
आज यदि कोई केवल वैज्ञानिकता के आधार पर वर्णव्यवस्था की पुनस्र्थापना की वकालत करने लगे तो उसका चहुओर से विरोध ही होगा। ऐतिहासिक अनुभव व राजनयीक कुप्रचार के कारण सार्वजनिक चिंतन में वर्णव्यवस्था अत्यंत घृणित हो गई है। इसलिये इसके पुनरुज्जीवन की बात करना तो बेमानी है। जब समाज इसके विषय में सुनने को ही तैयार नहीं है तो युगानुकूल परिवर्तन के साथ इसको लागु करने की बात भले ही कितनी भी तार्किक क्यों ना हो अव्यावहारिक हो जाती है। किन्तु केवल समाज में अस्वीकार्य होने से कोई विज्ञान अप्रासंगिक नहीं हो जाता। समय के साथ पुनः इसका महत्व सबको पता चलता है। जैसे आजकल आयुर्वेद की ओर सबकी फिरसे रुचि बढ़ने लगी है। सम्भव है वर्णव्यवस्था के साथ भी ऐसा कुछ हो। आज तो हम केवल व्यक्तिगत स्तर पर इसका प्रयोग कर सकते है। वह भी औरों के साथ सामाजिक व्यवहार के लिये नहीं अपितु अपने स्वभाव को पहचानने के लिये। स्वधर्म के अनुसार कर्म का चयन करने के लिये हमें अपने स्वभाव को जानना होगा। हमने पिछली बार देखा था कि स्वभाव द्वारा नियत कर्म करना कर्मयोग की एक मूलभूत अनिवार्यता है। भगवद्गीता स्वभाव को अध्यात्म मानती है। गीता के आठवे अध्याय में अर्जुन के प्रश्न का उत्तर देते हुए भगवान कहते है-
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावो अध्यात्म उच्चते।
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्म संज्ञितः।।गी 8.3।।
जिसका कभी नाश नहीं होता वह ब्रह्म है, उसको जानने का मार्ग स्वभाव है और जिस बल के प्रवाह से अथवा त्याग से सृजन होता है वह कर्म है। कितनी परिपूर्ण व्याख्या है! अनाशवान् ईश्वर अथवा ब्रह्म अपने आदि संकल्प ‘‘मै एक हूँ बहुत हो जाऊँ। एकोSहम् बहुस्याम।’’ के द्वारा विश्वरूप हो गया। स्वयं ही प्रत्येक के अन्दर प्रगट हुआ है। यही स्वभाव है। हमारा हृदयस्थ ईश्वर और इसे प्रगट करने का माध्यम है कर्म जिसकी परिभाषा यहाँ की गई – सृजनशील विसर्ग। विसर्ग का एक अर्थ है स्वयं होकर प्रवाहित बल और दूसरा अर्थ है त्याग, विसर्जन का कर्म। दोनों ही ईश्वरत्व के प्रगटीकरण के माध्यम है। स्वभाव को जानकर उसके अनुसार कर्म करने अर्थात त्याग करने अर्थात समाज में योगदान करने से ही हम अपने स्वस्वरुप केा पा सकते है। यही सर्वोत्तम उपलब्धि है। सबसे बड़ा सृजन।
कर्म केवल स्वयं के स्तर तक सीमित नहीं होता। कर्म में हमारा औरों से व्यवहार जुड़ा होता है। अतः बिना इस सम्बन्ध का निर्वाह किये हमारा कर्म सफल व संतुष्टिदाता नहीं हो सकता। इसीलिये इस बार हम वर्ण के विज्ञान द्वारा स्वभाव को पहचानने की विधि को समझने का प्रयत्न करते है। गीता के चैथे अध्याय में भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं को चातुर्वण्र्य व्यवस्था का जनक बताते है-
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टम् गुणकर्म विभागशः।
तस्य कर्तारपि माम् विद्ध्यकर्तारमव्ययम्।।गी 4.13।।
गुण ओर कर्मों के अनुसार समाज की संरचना बनती है। चार वर्ण अर्थात चार प्रकार से मानव समाज में कार्य करता है। किंतु जिसने ईश्वर साक्षत्कार कर लिया वह इन सब कर्मों से परे है। इस श्लोक से यह भाव निकलता है कि वर्णव्यवस्था मानव के स्वभाव के अनुसार कर्म के चयन द्वारा निर्मित प्राकृतिक समाजरचना है। यह अपने आप, स्वतः ही विद्यमान होती है। यदि समाज में धर्म प्रस्थापित हो अर्थात प्रत्येक अपने कर्तव्य का पालन करते हुए औरों के लिये योगदान कर रहा हो तो अपने आप समाज इन चार प्रकार के कार्य विभाजन में संचालित होने लगता है। वर्तमान लेख में हमारा उद्देश्य हम अपने स्वभाव को कैसे पहचाने यह जानना है। उसके लिये हमें अपने वर्ण को पहचानना होगा। इसका जन्म से कोई सम्बन्ध नहीं है। किस जाति में जन्म हुआ उससे स्वभाव वर्ण निर्धारित करने की स्थिति वर्तमान समय में समाज में नहीं है। अतः हमें इन वर्णों के लक्षणों को जानकर किस वर्ण के लक्षण हम में अधिक दिखाई देते है उसका निर्धारण करना है। यह जानने से पूर्व एक बात ध्यान में रखनी होगी। प्रत्येक वर्ण अपने आप में महत्वपूर्ण है और उनमें उच-नीच का भेद नहीं है। हमारे स्वभाव के लिये हमारा वर्ण ही सर्वश्रेष्ठ है और उसके अनुसार कर्म का चयन ही हमारे लिये श्रेयस्कर है।
शमो दमस्तपः शौचं क्षांतिरार्जवमेव च।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्।।गी 18.42 ।।
सौम्यता, संयम, तपस्या, शुद्धि, ध्यैर्य तथा ऋजुता अथवा सरलता, ज्ञान व उसके विशेष प्रयोग- विज्ञान तथा ईश्वर पर विश्वास यह ब्राह्मण के स्वभाव विशेष हैं। इसी के द्वारा ब्राह्मण के स्वकर्म का निर्धारण होगा। इस वर्ण के स्वभाव वाले व्यक्ति का प्रत्येक कार्य को करने के पीछे ‘ज्ञानप्राप्ति‘ का उद्देश्य होता है। इस स्वभाव का व्यक्ति गलती से किसी अन्य कर्म यथा व्यापार, सुरक्षा अथवा सेवा में चला भी जाये तो उसे उस काम में भी ज्ञान पाने की अभिलाषा होगी। ब्राह्मण स्वभाव वाले व्यक्ति का स्थायी प्रेरक ‘त्याग’ होता है। त्याग से ही उसे कर्म करने की आकांक्षा व कर्म से आनन्द की अनुभूति होती है। सहजता से योगदान करना ऐसे लोगों की आदत होती है। इनके निर्णय का आधार ‘धर्म-अधर्म विचार’ होता है। अर्थात किसी भी कार्य का चयन करते समय इनका विचार होगा कि मेरा कर्तव्य क्या है? कार्य करणीय है अथवा नही? इससे समष्टि का हित होगा या नुकसान? क्योंकि धर्म हमारा समाज के पति कर्तव्य ही तो है। ऐसे स्वभाव वाले व्यक्ति को पठन-पाठन, अध्यापन, अनुसंधान, लेखन, पत्रकारिता आदि व्यवसायों में सहज सफलता मिलेगी साथ ही स्वभाव के अनुकुल कार्य करने के कारण संतुष्टि भी।
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्।
दानमीश्वरभावश्च क्षत्रं कर्म स्वभावजम्।।गी 18.43।।
वीरता, तेज, अड़ीगता, दक्षता, युद्ध से कभी पलायन ना करना, दान तथा स्वामीत्व अथवा नेतृत्व का बोध यह क्षत्रीय वर्ण के स्वभाव लक्षण है। क्षात्रवर्ण का स्वभाव होने पर व्यक्ति के कर्म का उद्देश्य ‘प्रतिष्ठा’ होता है। इस स्वभाव का व्यक्ति ज्ञानार्जन भी प्रतिष्ठा के लिये करेगा। अपनी आन की खातिर जीवन तक लगा देने की तैयारी क्षत्रीय की होती है। इस वर्ण का स्थायी प्रेरक ‘वीरता’ है। वीर्य के लिये इस स्वभाव का व्यक्ति हर कर्म करता है और इस वीरभाव की तुष्टि से ही आनन्द प्राप्त करता है। इस वर्ण में नेतृत्व का गुण सहज होता है। अतः कार्य के निर्णय का आधार ‘न्याय-अन्याय विचार’ होता है। किसी भी विषय में निर्णय लेते समय यह न्यायकारी है अथवा नहीं यह विचार चयन का आधार बनता है। इस वर्ण स्वभाव के व्यक्ति को सुरक्षा बल, प्रशासन कार्य, राजनीति अथवा क्रीड़ा क्षेत्र में व्यवसाय करने से सहज सफलता व संतुष्टि प्राप्त होगी।
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्।गी 18.44।
इस श्लोक की पहली पंक्ति में वैश्य के कर्म का बखान है। कृषि, पशुपालन तथा व्यापार यह वैश्य वर्ण के स्वभावगत कर्म है। कृषि अर्थात सर्व प्रकार का मौलिक उत्पादन। वर्तमान अर्थव्यवस्था में ऊपरी चलन से वित्त के जनन का भ्रम निर्माण किया जाता है और जब यह बुलबुला फूटता है तो अभी के समान मंदी की स्थिति बनती है। वास्तव में एक बीज से अनेक का निर्माण कर मूलभूत उत्पादन कार्य तो किसान ही करता है। बाकी सारे औद्यागिक उत्पादन कृषि व खनन से प्राप्त वस्तुओं के रुपांतरण ही होते है। श्री के निर्माण का मूल कार्य कृषि व पशुपालन करता है। यह केवल अन्न का ही नहीं पूरे औद्योगिक उत्पादन के लिये कच्चे माल का भी निर्माण कार्य है। तो वैश्य का कार्य है श्री का सृजन, उत्पादन व उसका व्यापार। इस स्वभाव के व्यक्ति का कार्य के पीछे उद्दीष्ट लाभ का होता है। हर कार्य से क्या मिलेगा इस विचार से ही इस वर्ण का व्यक्ति कार्य करता है। कर्म का स्थायी प्रेरक ‘स्वर्ण’ अर्थात आर्थिक लाभ होता है। इस वर्ण के स्वभाव वाले व्यक्तियों के निर्णय का आधार भी ‘लाभ-हानी’ विचार होता है। वर्तमान समय में युग का प्रभावी वर्ण वैश्य होने के कारण इस स्वभाव का सर्वत्र चलन दिखाई पड़ता है। लोक प्रभाव में हम भी ऐसे चिंतन को स्वयं पर आरोपित करने की भूल कर सकते है। अतः सकर्तता से अपने स्वभाव को जाँचना होगा। यदि बाहरी प्रभाव के अलावा आंतरिक रुप से भी हमारा स्वभाव वैश्य वर्ण का हो तो फिर उत्पादन, विपणन, व्यापार आदि व्यवसाय हमारे लिये अनुकूल होंगे। इस वर्ण के कर्मों में कृषि को सर्वश्रेष्ठ कहा है। इसके बाद अन्य उत्पादक व्यवसाय तथा सबसे अंत में व्यापार अर्थात अन्य किसी के द्वारा उत्पादित वस्तु का विपणन। वर्तमान में वित्तीय सेवा, लेखा सेवा व विज्ञापन ये नये क्षेत्र भी वैश्य कर्म में बने है। इस वर्ण स्वभाव के व्यक्ति को इन सभी व्यवसायों में से अपनी क्षमता, रुचि व शिक्षा के अनुसार चयन करना चाहिये।
परिचर्यात्मकं कर्मं शुद्रस्यापि स्वभावजम्।।गी18.44।।
शुद्र वर्ण के लोगों का स्वभाव सेवाकार्य करने का होता है। सेवा के भी भिन्न भिन्न प्रकार हो सकते है किंतु जो व्यक्ति स्वभावतः किसी और के आदेशों के अनुसार कार्य करने में सहजता का अनुभव करते है वे भी आवश्यक होते है। यदि समाज में सभी लोग नेतृत्व करने लगे तो समस्या हो जायेगी वे नेतृत्व करेंगे किसका? अतः सभी समय में समाज में बहुसंख्य लोग स्वभावतः ऐसे होते है कि जो स्वयं निर्णय लेने की जिम्मेवारी नहीं उठाना चाहते अपितु किसी और के लिये निर्णयों पर बड़े सेवाभाव से अमल करते है। किसी भी संस्थान में ऐसे व्यक्ति संस्थाके निष्ठावान कर्मचारी होते है। संस्थान की उत्पादकता, प्रभाव व वाणिज्यिक सफलता ऐसे लोगों की कुशलता पर निर्भर करती है। सेवा अथवा परिचर्या के उद्दीष्ट से कार्य करनेवाले व्यक्ति का स्वभाव शुद्र वर्ण का होता है। इस वर्ण के व्यक्ति स्वभावतः तमसप्रधान होने के कारण इनका स्थायी प्रेरक ‘भय’ होता है। किसी की डाँट के भय से हम में से अनेक लोग अधिक कौशल व क्षमता का प्रदर्शन कर पाते है। यह कोई न्यून नहीं है अपने आप में प्रकृतिजन्य स्वभाव है। इस वर्ण स्वभाव के लागों का निर्णय ‘हिताहित विचार’, स्वयं के प्रत्यक्ष एवं तुरंत हित व अहित के विचार पर निर्भर होता है। समाज में इस वर्ण की सभी युगों में बहुलता होती है। अतः यदि हमारा स्वभाव इस श्रेणी में आता है तो उसमे लज्जा की कोई बात नहीं। वर्तमान समय में सवार्धिक अवसर इसी स्वभाव के लोगों के लिये है। ऐसे लोग नौकरी के लिये सर्वोत्तम होते है। किसी भी चमु में (टीम)  में इनके सफलता की सम्भावना अधिक होती है। आज सभी क्षेत्रों में चमुत्व का बड़ा महत्व है अतः शुद्र स्वभाव के लोगों की सफलता का यह युग है। स्वामी विवेकानन्द कहते है कि आनेवाले युग में शुद्रवर्ण का राज होगा। अर्थात सेवाभाव प्रभावी भाव होगा।
चारों वर्णों के स्वभावविशेष को जान लेने के बाद भी स्वयं के स्वभाव का निर्णय करना इतना सहज नहीं होता है। जीवन में अलग अलग समय पर भिन्न भिन्न परिस्थिति में हम अपने आप में अलग अलग वर्ण स्वभाव का प्राधान्य देखते है। अतः सम्भ्रम हो सकता है। निर्णायक यह होगा कि हमे आंतरिक आनन्द किस वर्णस्वभाव के उद्देश्य को पूर्ण करने से होता है? ज्ञान से? प्रतिष्ठा से? लाभ से? या सेवा से? दूसरा संकेत प्रेरक तत्वों का है। कार्य का प्रेरक क्या है? त्याग? वीरता अर्थात आन-शान? स्वर्ण अर्थात पैसा? या असफलता, डाँट का भय ? स्वभाव का निर्णय कर लेने के बाद यदि हम अपनी आजीविका के व्यवसाय का सही चयन करेंगे तो कम प्रयास में अधिक सफलता सुनिश्चित है। वर्ण स्वभाव जान लेने के बाद उपलब्ध अवसरों का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन कर निर्णय लेना चाहिये। नियत कार्य को चुनने के लिये कोई भी समय अनुचित नहीं है। केवल अनेक वर्षों से ठीक ठाक परिणाम के साथ कोई कार्य कर रहे है इसलिये वही हमारा नियत कार्य हो यह आवश्यक नहीं। यदि जीवन के किसी भी पाड़ाव पर यह ध्यान में आये कि हम अपने स्वभाव के विपरित अथवा अन्यथा कर्म में फँसे हुए है तो ऐसी स्थिति में 1. या तो इसी कर्म को अपने स्वभाव के अनुरूप करने का पर्याय चुने 2. चाहे जितनी जोखिम उठानी पड़े अपने स्वभाव के अनुसार कार्य हाथ में ले ले। आदर्श तो दूसरा पर्याय ही है किन्तु हमारी आजीविका अपने परिवार व अन्य अनेक लोगों के जीवन से जुड़ी होती है अतः निर्णय व्यक्तिगत ना होकर सामूहिक होना चाहिये। विश्लेषण के समय से ही सभी सम्बधितों को विचार प्रक्रिया में सम्मिलित करना चाहिये।

नवम्बर 17, 2011 Posted by | योग | , , , | 2 टिप्पणियाँ

%d bloggers like this: