तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

Look beyond political controversy, Yoga is for all

Another Post as a precursor to IYD. This piece was written for bharatniti.in giving it here for the blog followers.



Yoga has been accepted universally as a discipline of moulding one’s own life to active overall well-being, accepting it as a way of life beyond faith, worship or religious dogmas. The same was evident when more than 170 countries across five continents unanimously supported the resolution for declaring June 21 as the International Day of Yoga at the General Assembly of the UNO.

IYD LogoMany of them proposed or seconded it without any voting or discussion. In fact, many of the Islamic countries too supported the resolution. Yoga is being practiced by people beyond the religious beliefs.

On this background of universal consensus, it is ironical that the decision of the central government to celebrate the International Day of Yoga all over the country is being opposed on religious grounds by some misguided elements. When the whole world is unanimous about the universal appeal of Yoga, it is a shame that this great science of living is being subjected to controversy in the land of its origin.

Social media is full of photographs of members of different communities performing Yogic exercises. The universal acceptance of Yoga is very much witnessed across different communities in India.

Controversy more of political concoction than popular

The present fabricated controversy over the celebration of the International Day of Yoga is the result of intolerant minds. Yoga is a science which demands experiments and experiences and does not ask one to believe or un-believe anything. The performance of Yoga does not affect any belief systems. If at all it will enhance ones capacity to have undeterred in one’s own beliefs. Yoga is necessarily an Bharatiya philosophy as it was first compiled in this holy land and has all the attributes of Sanatana Dharma because it was practiced, experimented and evolved into different systems by generations of Hindus. But it still is a universally applicable science of life and the art of living.

The practice of Yoga will not swerve the individual from his personal religious beliefs. It will also not make him antagonistic to his or any other religion but will, on the contrary, augment his affection for his personal deity. The practice of Yoga will not proselytize a Muslim or a Christian, but will on the contrary make him a better adherent of his faiths. Thus, no one should be afraid of Yoga as it includes all and excludes none.

So what is Yoga actually?

Yoga is beyond a mere physical exercise. In fact, Yoga is neither mere physical exercise nor is it just a therapy. As per the ancient traditions, it is a way of scientific living. A modern being may find it hard to comprehend but the mind is the prime factor of all our actions in life. And yoga is nothing but the training of the mind. Thus it (yoga) enables perfection in every action at all levels. The whole universe functions in disciplined manner. There are laws of existence which govern the natural phenomena irrespective of any subjective intervention. The only exception to this smooth governance of the universe are human beings.

The humans are endowed with the will to act and the power of imagination. The combination of these two have created all the scientific wonders. Like all kinds of powers, this also needs regulation. If uncontrolled, power becomes corrupt and boon is converted into a curse. This is true at individual as well as collective level.

Sage Patanjali, in his Yoga aphorisms, initiates with a simple statement – ath yoga anushasanam [Thus we begin the discipline of Yoga.] The aim of all the yogic practices right from Asanas, Suryanamaskara, Pranayamas up to Dhyana [meditation] and Samadhi is disciplining the mind. If the mind is concentrated, anything and everything can be accomplished.

Yoga is the way of orienting the mental powers to one’s aim. The conflicts and clashes in the world are a result of intolerance born out of lack of coordination among one’s own multiple roles. There are various schools of Yoga and they have different practices.

There are several variants of the same Yogic practice. Some well- meaning noble Acharyas even tried to standardize yogic practices. This futile effort has not succeeded as diversity is an inherent feature of existence. Everything that exists is unique in its form, function and role. Yoga not only takes into account this diverse uniqueness but also enriches the extraordinary individuality of the seeker, the performer. At the same time, yoga helps the sadhaka (practitioner, the doer) to realize the underlying oneness behind the apparent diversity.

So, whatever be the practice, if the mind is tuned properly with a synchronized awareness and relaxation, it integrates one with all. Essence is not in the action but in the intent. Yoga literally means union. Every practice that enables the mind to expand and unite the different levels of collectivity is Yoga. Yoga gives quietude, peace and harmony to the individual mind and if performed regularly by a sizable portion of the humanity, will spread this peace and harmony to the cosmic world.

One can say with full conviction that the mass performance of various Yoga practices on the historic occasion of the International Day of Yoga on June 21 will definitely lead to conflict free and harmonious world.

जून 18, 2015 Posted by | सामायिक टिपण्णी, English Posts | , , , , , , , , , , , , , , , , , , , | 2 टिप्पणियाँ

स्वावलम्बी युवा! समर्थ भारत!!

sawarkarस्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर को किसी युवा ने पूछा कि आप युवा किस कहते है? भाषा शुद्धिकरण के आन्दोलन को चलाते हुए भारतीय भाषाओं को अनेक नवरचित शब्दों का योगदान देनेवाले महान भाषाशास्त्री सावरकर ने उत्तर दिया, “पद को उलटा करके देखो तो उसका अर्थ स्पष्ट हो जाता है। युवा का प्रतिशब्द है – ‘वायु’। जैसे अनुशासनहीन वायु प्रभंजन के रुप में जीवन का नाश करता है किन्तु जब प्राणायाम से अनुशासित हो जाता है तब वही वायु प्राणदाता बन जाता है। वैसे ही युवा हैं। अनुशासित हो तो राष्ट्र का प्राण और अनुशासनहीन होकर किसी भी व्यवस्था के लिए असाध्य चुनौती।”

आज भारत की 62% जनसंख्या युवा है। जनगणना के आंकड़ों के अनुसार 13 से 45 के मध्य आयुवाले युवाओें की संख्या कुल 125 करोड की आबादी के 62% अर्थात 75 करोड से ऊपर है। किसी भी राष्ट्र के लिए यह अत्यंत गर्व के साथ ही आर्थिक विकास के प्रचंड अवसरों का विषय है। साथ ही चुनौती भी कि इस असाधारण शक्ति का समुचित सदुपयोग हो। अन्यथा अनियंत्रित होने से यही ऊर्जा राष्ट्र विघातक विस्फोटक का कार्य भी कर सकती है। ऊर्जा को बलपूर्वक नियंत्रित नहीं किया जा सकता। जबरदस्ती अथवा दबाव से तो वह और अधिक विध्वंसक बन जाती है जैसे डटे हुए सेफ्टी वाल्व वाले प्रेशर कुकर में भांफ। ऊर्जा के अनुशासित नियोजन का सर्वोत्तम तरीका है उसका सुव्यवस्थित परिचालन। ऊर्जा को सही दिशा में किसी ध्येय की ओर कार्य में लगा देना ही उसका सदुपयोग है। वर्तमान समय में भारतीय समाज के पास अपनी युवाशक्ति को सम्यक ध्येय के साथ सही दिशा की ओर कार्यरत करने की महती चुनौती हैं।

स्वंतत्रता के बाद सबसे बडी विकृती सारे समाज मे व्याप्त हुयी है वह है – शासनावलम्बिता। हम छोटे से छोटे कार्य के लिए भी सरकार का मुँह ताकते हैं। घर में सफाई करने के बाद सरकारी सडक पर सरेआम कचरा फेंकने वाले सभ्य नागरिक स्थानीय शासन से अपेक्षा करते हैं कि नगर में सफाई एवं सौन्दर्य का ध्यान रखें। इसी परावलंबी मानसिकता के कारण ‘युवा भारत‘ के सुनियोजन का दायित्व भी हम लोग सरकार को ही दे बैठे हैं। शासन का नीति निर्धारण इस दिशा में हो इस दृष्टि से आवश्यक मंथन व चिंतन समाज के प्रबुद्ध वर्ग मे होता दिखाई नही देता है। समाज द्वारा वैचारिक अधिष्ठान प्रदान किए बिना शासन की कोई भी नीति कारगर सिद्ध नही होती। अतः युवाओं के ऊर्जा प्रबंधन का दायित्व युवा वर्ग ही सामुहिक रुप से संगठित हो उठायें तो वह प्रभावी एवं परिणामकारी होगा। राष्ट्रनिर्माण का दायित्व शासन का नहीं, समाज का है। समाज जब इस उत्तरदायित्व का निर्वाह करने लगता है तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में ही नहीं राजतंत्र में भी शासन ऐसे प्रबुद्ध समाज का अनुगामी बनने लिए बाध्य हो जाता है।

स्वानुशासन से ऊर्जा का सुनियोजन करने हेतु युवाओं में संकल्प का जागरण करना आवश्यक है। वर्तमान शिक्षाप्रणाली के चलते पनपी मानसिक दासता के कारण आज का युवा स्वावलंबन के स्वप्न भी नही देखता। देश की सर्वोच्च प्रतिभा के अत्युच्च स्वप्न किसी सरकारी, निजी अथवा बहुराष्ट्रीय ऊपक्रम में नौकरी पाना हो गये हैं। प्रतिवर्ष लाखों युवा कुछ हजार सरकारी नौकरियों के लिए प्रतिस्पर्धा परीक्षा में अपनी ऊर्जा को व्यय करते हैं। सबसे प्रतिष्ठित प्रशासकीय नौकरी भारतीय प्रशासनिक सेवा की प्रथम परीक्षा में बैठने हेतु साढे पाँच लाख से अधिक युवा पंजीयन कराते हैं किन्तु उसमे से आधे ही परीक्षा मे बैठते हैं। इनमे सें 13,14 हजार ही मुख्य परीक्षा के लिए पात्र हो पाते और इनमें अंतिम सफलता 800 से 900 परीक्षार्थिओं को ही मिलती है। अर्थात प्रतिवर्ष बडी मात्रा में असफल युवाओं के झुंड़ का निर्माण यह प्रतियोगी परीक्षा करती है। इन असफल युवाओं के साथ ही अन्य नौकरियों के आकांक्षियों को मिलाकर लगभग 90 लाख परीक्षार्थी बैंक, रेल्वे, बीमा आदि अर्द्ध सरकारी नौकरियों के लिए ली जानेवाली प्रतियोगिता परीक्षाओं में बैठते हैं। इनमें से कुछ हजार नौकरी पा भी जाते हैं। उपलब्ध रिक्त स्थान व उसके लिए प्रयत्नरत परीक्षार्थिओं के मध्य यह अत्यंत विसंगत अनुपात समाज की दासता का घोतक है। पूरा समाज ही गुलामी के लिए उत्सुक है। इसका मुख्य कारण यह है कि समाज मे सरकारी नौकरी को गैर अनुपातिक प्रतिष्ठा प्राप्त है। ज्ञान, योग्यता और परिश्रम वा परिणाम में प्रशासनिक सेवा के अधिकारी समाज में बिलकुल भी अग्रणी नहीं हैं किन्तु सम्मान मे इनका स्थान लगभग सर्वोच्च हैं। इस दिखावे की प्रतिष्ठाा के लिये ही इतने युवा असफलता की आशंका के होते हुए भी नौकरी के लिये प्रयासरत रहते है।

नौकरियों के इस परिदृश्य का अत्यंत विद्रुप पहलू यह भी है कि सेना की तीनों शाखाओं मे लगभग 15000 अफसरों के स्थान इस कारण से रिक्त है क्योंकि सुयोग्य युवा उस ओर आकर्षित नही हो रहें। सामान्य सिपाही की भरती के लिए हजारों की भीड़ लग जाती है किन्तु सें संकल्पित अधिकारियों के स्थान योग्य युवाओं की तलाश मे रिक्त रह जाते हैं। किसी भी राष्ट्र की शिक्षा व्यवस्था के यह प्रेरणाहीन परिदृष्य चिन्ता का विषय होना चाहिए। इस महान गौरवशाली राष्ट्र की युवा शक्ति को राष्ट्र निर्माण करने हेतु आत्मनिर्भर बनना होगा। अपने स्वभाव के अनुरुप परिश्रम के द्वारा उद्योग के नवनिर्माण का आत्मविश्वास जब युवाओं मे जग जाता है तब वह रोजगार के लिए दूसरों की ओर नही ताकता।

ऊर्जा प्रबंधन में विकेन्द्रित स्वप्रबंधन ही सर्वोत्तम मार्ग है उसी प्रकार युवा शक्ति के प्रबन्धन हेतु स्थान स्थान पर युवाओं की टोलियाँ संगठित होकर अपने youthपरिश्रम से सृजन के स्वप्न साकार करने लगे। यही 75 करोड युवाओं के सदुपयोग का एकमात्र सुनिश्चित मार्ग है। स्व-रोजगार से ही युवा शक्ति का सम्यक, स्वाभिमानी, उत्पादक प्रयोग हो सकता हैं। कितनी भी सरकारी अथवा निजी नौकरियों का निर्माण करने का उद्यम शासन के केन्द्रीकृत प्रयासों द्वारा किया जाए तब भी यह व्यावहारिक रुप से संभव ही नही है कि किसी देश की 62% जनसंख्या नौकरी करें। हर 100 मे से कम से कम एक युवा नौकरी करने की बजाय नौकरी देने का विचार करने लगे तो यह स्वप्रेरित रोजगार निर्माण ही राष्ट्रनिर्माण का माध्यम बन सकता है।

इस हेतु शिक्षा के साथ ही समाज में पोषक वातावरण का निर्माण भी आवश्यक हैं। उद्यमियो का सम्मान सुप्रतिष्ठित करना होगा। भारतीय संस्कृति में उत्पादक कार्य को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती थी। उत्पादित सामग्री के वितरण, विपणन एवं व्यापार को दुय्यम स्थान था। इस सब आर्थिक व्यवहार के लिए पूरक सेवाओं अर्थात नौकरी को सबसे निकृष्ट माना जाता था। सबसे प्राथमिक उत्पादन तो कृषि में होता है। किसान ही मूल वित्त का निर्माता है। अन्य उद्योग कृषि उत्पाद को रुपांतरित कर सामग्री का निर्माण करते हैं। कृषि के समान ही खनन भी मूल कच्चे माल का उत्पादन करता है किंतु यह कृषि से निम्न हैं क्योंकि खनिजों का भंडार सीमित है एवं पुनर्निर्माण संभव नहीं। कृषि उत्पादन जैविक होने के कारण यदि प्रकृति के समन्वय से कृषि कार्य को किया जाए तो अनंत काल तक असीम उपज संभव हैं। इसीलिए भारत मे कहा गया ‘उत्तम कृषि, मध्यम व्यापार और अधम नौकरी’। इस शुद्ध अर्थशास्त्रीय तत्व की समाज में पुनःप्रतिष्ठा मानवता के अस्तीत्व के लिए अनिवार्य है। आज नौकरी सर्वाधिक प्रतिष्ठित एवं कृषि सर्वाधिक उपेक्षित आर्थिक कार्य हो गया है। प्रतिष्ठा व उत्पादन का यह विपरित संबंध समाज के साथ ही पर्यावरण के भी विघटन एवं विनाश का कारण बन गया है।

youth worldबाह्य रुप से परस्पर विरोधी लगने वाली यह परिस्थिति चुनौती के साथ ही युवा शक्ति को एक अवसर भी प्रदान कर रही है। बडी मात्रा में युवाबल का होना यह सकारात्मक पहलू व परावलंबी नीतियों लगातार चलने के कारण शासनवलंबी विकास के प्रादर्श को अपनाने के कारण आत्मबलहीनता यह दो परस्पर विरोधी तत्व समाज में काम कर रहे हैं। शारीरिक आयु के अनुसार युवा हैं किन्तु युवा का स्वाभाविक उत्साह, आत्मविश्वास व उत्पादक उत्सुकता शासनाभिमुख मानसिकता के कारण सुप्त अथवा मरी हुयी है। शासन में इस युवा शक्ति के सम्यक सदुपयोग की ना तो कोई दृष्टि है न ही व्यावहारिक नीति अतः युवा शक्ति के राजनैतिक दुरूपयोग की संभावना भी क्षीण है। शासन की उदासीनता ने युवा वर्ग को एक प्रकार से स्वनिर्णय व स्वनियोजन की स्वतंत्रता प्रदान कर दी है। आवश्यकता केवल स्वप्रेरणा से उद्यम की है। इसके लिये कुछ व्यावहारिक ठोस उपाय किये जा सकते है।

1. उच्च शिक्षा में पढ रहे युवाओं के मध्य युवाओं के द्वारा ही एक सकारात्मक वैचारिक आंदोलन प्रारंम्भ हो चुका है – Don’t be a job seekar be a job giver  रोजगार माँगो मत रोजगार देनेवाले बनो। सामाजिक प्रसार माध्यम फेसबुक पर इस आंदोलन का जालपृष्ठ Webpage भी है। आवश्यकता है, इस आंदोलन का सब दूर प्रसार कर अधिक से अधिक युवा इसमें जुडे़ं।

2. युवा ही एकत्रित आकर उद्यमिता विकास के प्रकल्प प्रारंभ करें। अनेक सरकारी योजनाओं का लाभ संगठित होकर लिया जा सकता है। कौशल विकास youth logo(Skill development) के माध्यम से स्वरोजगार के अनेक क्षेत्र खुले हैं। निजी सुरक्षा (Private sequrity), खरखाव (House keeping),  पर्यटन (Tourism), घरेलू सेवायें जैसे नल कार्य (Plumbing), बढई (Carpentery), सिलाई (Tailoring), बिजली कार्य (Electrician) आदि के लिए संगठित होकर प्रशिक्षण, प्रचार, विपणन व क्रियान्वयन किया जा सकता है। इन सबके लिए अलग-अलग प्रतिष्ठानों, भागीदारी व्यवसाय (Partenership) अथवा कंपनी का भी गठन किया जा सकता हैं। डा रघुनाथ माशेलकर की अध्यक्षता में कार्य कर रहा राष्ट्रीय कौशल विकास प्राधिकरणNational Skill Development Corporation (NSDC) भी इस कार्य हेतु सहायता प्रदान करता है।

3. सहकारिता के द्वारा युवाओं के नवनवीन उद्यम खोले जा सकते हैं। (National youth co-operative society (NYCS)  इस क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण पहल है।

4. युवाओं के उद्योग को वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए युवा अधिकोष (Youth bank) जैसे प्रकल्पों का प्रारंभ किया जा सकता हैं।youth

5. शिक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण अवसर हैं जिसमें युवा स्वावलंबी व्यवसाय प्रारंभ कर सकते हैं। प्राथमिक विद्यालयों से लेकर निजी मार्गदर्शन (Private coching) और निजी महाविद्यालय तक सभी प्रकार के प्रयास किये जा सकते हैं। कुछ युवाओं को एकत्रित आकर इस दिशा में पहल करनी चाहिये।

6. उत्पादन के क्षेत्र में भी संगठित युवा पहल की आवश्यकता है। जैविक खेती, गो-पालन, मत्स्यपालन, मधुमक्खीपालन, अन्य पशुपालन के क्षेत्र में अवसर उपलब्ध है। आधुनिक प्रसार माध्यमों व तकनीकों का प्रयोग कर इन पारंपारिक व्यवसायों में क्रांति की जा सकती है।

revolution7. समाज सेवाके क्षेत्र में भी युवाओं को समर्पित संगठित प्रयास करने की आवश्यकता है। शिक्षा, चिकित्सा व स्वावलंबन इन तीनों प्रकार के सेवा प्रकल्पों में युवाओं की अत्यधिक आवश्यकता है।

8. ध्येयवादी राष्ट्रीय राजनीति में भी शुद्ध चरित्र के संकल्पबद्ध युवाओं को आगे बढने की आवश्यकता है। राजनीति का अर्थ केवल मंचीय नेतृत्व नहीं है। वास्तव में नेताओं को नीतिओं के बारें में अनुसंधान, अध्ययन कर परामर्श देने वाली टोली की अनिवार्य आवश्यकता है। यह कार्य सुशिक्षित, आधुनिक तकनीक मे तज्ञ युवा ही कर सकते हैं। नीतिगत अनुसंधान, सर्वेक्षण तथा प्रसार यह भी राजनीति का एक अनुंषागिक कार्य है। जिसमें आज बहुत कम लोग लगे हुए हैं। दल-निरपेक्ष राजनीतिक अनुसंधान राष्ट्र के लिये अत्यंत आवश्यक कार्य है। 

भारत एक अतिप्राचीन चिरयुवा राष्ट्र है। समय के प्रवाह के पढकर उसके साथ गतिमान सांस्कृतिक परिवर्तन की लचीली क्षमता ने इस राष्ट्र को कठिन से कठिनतम चुनौतियों के मध्य न केवल जीवित अपितु विजयी बनाये रखा है। काल के प्रवाह में अवसर के कुछ गवाक्ष समय समय पर खुलते हैं। ऐसा ही एक युग परिवर्तन का दौर आज चल रहा है। विश्व भारत से मार्गदर्शन की प्रतीक्षा में है। आइये! ‘युवा भारत’ को उत्पाकद उत्साह से भर दें और यह राष्ट्र अपने चिरयौवन से जगत का जागरण करने के वैश्विक कर्तव्य को पूर्ण करें इस महायज्ञ मे हम अपने जीवन की आहुती प्रदार करें।

दिसम्बर 22, 2013 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , | 4 टिप्पणियाँ

दिग्विजय से पाएं विश्वविजय की प्रेरणा

sVworldजब समूचा राष्ट्र ही अपनी निहित शक्तियों के प्रति अनभिज्ञ होने के कारण आत्मग्लानि से ग्रस्त हो जाता है तब कोई अद्वितीय विजय ही उसे मानसिक लकवे से बाहर ला सकती है।

‘मन के हारे हार है मन के जीते जीत’, ये कहावत जितनी व्यक्ति पर लागू होती है उतनी ही समाज पर भी लागू होती है। विजय की आकांक्षा व विजय की अनुभूति समाजमन का शक्तिवर्धन करते हैं। जब समूचा राष्ट्र ही अपनी निहित शक्तियों के प्रति अनभिज्ञ होने के कारण आत्मग्लानि से ग्रस्त हो जाता है तब कोई अद्वितीय विजय ही उसे मानसिक लकवे से बाहर ला सकती है। आत्म-विस्मृति की मानसिकता पराभव की मानसिकता होती है, अकर्मण्यता की मानसिकता होती है। ऐसे में स्वप्न भी संकुचित हो जाते हैं। असाधारण पराक्रम तो छोड़िये सामान्य जीवनयापन की क्रियाओं के प्रति भी आत्मविश्वास शिथिल हो जाता है। ऐसे में समाज में परावलंबिता तथा बुद्धिजीवियों में परांगमुखता (उदासीनता) आ जाती है। व्यापार व्यवहार में दूसरों पर निर्भरता ही एकमात्र उपाय दिखाई पड़ता है। सोच विचार में भी हर बात के लिए दूसरों का मुख ताकने की प्रवृत्ति होती है। अपना सब कुछ क्षुद्र, त्याज्य लगने लगता है और पराई परम्पराएं, विचार व संस्कार केवल अनुकरणीय ही नहीं सम्माननीय भी बन जाते हैं।26

19वीं शताब्दी के अंत में भारत की यही स्थिति थी कहीं से कोई आशा नहीं दिखाई देती थी। पराधीनता तो थी ही, स्वाधीनता के लिए प्रयत्न करने का आत्मविश्वास भी नष्टप्राय सा हो गया था। उधार के विचार तथा शिक्षाओं पर अपना सार्वजनिक जीवन रचने की होड़ सी लगी हुई थी।  अंग्रेजों के अंधानुकरण का यह चरम काल था। विदेशी शिक्षा में शिक्षित उच्चभू वर्ग अंग्रेज-भक्ति में ही अपनी धन्यता समझने लगा था। यहां तक कि स्वाधीनता के लिए राजनीतिक संगठन की निर्मिती के लिए भी हम विदेशियों पर निर्भर हो गए थे। एल.ओ. ह्यूम द्वारा स्थापित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस हर शिक्षित भारतीय के लिए देशभक्ति का साधन बन गई थी। सामाजिक सांस्कृतिक और धार्मिक सुधारों हेतु भी आयातित विचारों पर उपजे संगठनों यथा थियोसॉफिकल सोसायटी, ब्रह्म समाज, प्रार्थना समाज आदि का ही बोलबाला था। स्वयं के पूर्वजों, परंपराओं यहां तक कि आराध्यों को भी प्रताड़ित करना, मनोरंजन एवं प्रतिष्ठा का साधन बन गया था।

sv chicago stageइस बौद्धिक, मानसिक व आर्थिक दासता की पृष्ठभूमि में 11 सितम्बर, 1893 को शिकागो के सर्वपंथ सभा में हुए दिग्विजयी चमत्कार को समझा जाना चाहिए। सनातन हिन्दू धर्म का गर्वोन्नत प्रतिनिधित्व करते हुए योद्धा युवा संन्यासी स्वामी विवेकानन्द ने प्राचीन ऋषियों के दिव्य सम्बोधन से जब समूचे विश्व को सम्बोधित किया, तब केवल सभागार में बैठे 7000 श्रोता ही नहीं अपितु पूरा अमेरिका बंधुत्वभाव से अनुप्राणित हो गया। उपस्थितों को लगभग आध्यात्मिक सी अनुभूतियां होने लगीं। किसी ने कहा कि – “अमेरिका निवासी मेरे प्यारे भगिनी और बंधुवर”, इन पांच शब्दों को सुनकर हमारे शरीर में विद्युत तरंग सी दौड़ने लगी थी। किसी ने अपनी दैनंदिनी में लिखा कि मुझे मेरा खोया भाई मिल गया। जैसे सामान्यत: प्रचारित किया गया है कि श्रोताओं ने ‘बहनों और भाइयों’ के संबोधन को पहले सुना नहीं था, इस कारण कई मिनिटों तक तालियां बजती रहीं। इसके विपरीत तथ्य यह है कि बंधुत्व के संबोधन का प्रयोग करनेवाले स्वामी विवेकानन्द उस दिन की सभा के पहले वक्ता नहीं थे। उनसे पूर्व महाबोधि सोसायटी के प्रतिनिधि श्रीलंका से पधारे धम्मपाल अंगिकारा, भारत से ही थियोसॉफिकल सोसायटी का प्रतिनिधित्व कर रहे प्रतापचंद्र मजुमदार तथा जापान के एक बौद्ध भिक्खु ने लगभग ऐसे ही संबोधन से सभा को संबोधित किया था। उसी समय लगभग ½ घंटे के उपरांत चौथी बार यह संबोधन सुनने के बाद श्रोताओं ने ऐसी अनूठी प्रतिक्रिया दी। इसके पीछे का कारण केवल नावीन्य नहीं था, अपितु वैदिक ऋषियों की परंपरा से उत्पन्न भारतीय संस्कृति के एकात्म जीवन दर्शन की प्रत्यक्षानुभूति थी। इसलिए यह केवल एक व्यक्ति का जागतिक मंच पर प्रतिष्ठित होना नहीं था, अपितु चिरपुरातन नित्यनूतन हिन्दू जीवन पद्धति का विश्वविजय था।

वर्तमान संचार व्यवस्था के समान अतिजलद संवाद के साधन उपलब्ध न होते हुए भी यह समाचार किसी वडवानल की भांति प्रथम अमेरिका तत्पश्चात यूरोप व अंतत: भारत में प्रसारित हुआ। इस अद्भुत घटना के मात्र 1 वर्ष के अंदर ही देश का सामान्य किसान भी इसके बारे में चर्चा करने लगा था। इस दिग्विजय की घटना ने भारत के मानस को झकझोर दिया और यह सुप्त देश जागृत हुआ। हम भी कुछ कर सकते हैं, हमारे अपने धर्म, संस्कृति, परंपरा में विश्वविजय की क्षमता है इसका भान आत्मग्लानि से ग्रसित राष्ट्रदेवता को अपनी घोर निद्रा से बाहर लाने के लिए पर्याप्त था। अत: शिकागो की परिषद में हुए आध्यात्मिक दिग्विजय को हम भारत के सर्वतोमुखी विश्वविजय का शुभारंभ कह सकते हैं। इतिहास इस घटना के गाम्भीर्य को भले ही अभी पूर्णता से न समझा पाया हो और संभवत: आनेवाले निकट भविष्य में भारत के विजय के पश्चात इस जान सके, किंतु स्वामी विवेकानन्द स्वयं अपने पराक्रम को पहचानते थे। अत: 2 जनवरी, 1897 को रामनाड में बोलते हुए उन्होंने अपने अभूतपूर्व स्वागत के प्रत्युत्तर का प्रारंभ इन शब्दों से किया, – “सुदीर्घ रजनी अब प्राय: समाप्त सी जान पड़ती है; यह काली घनी लम्बी रात अब टल गयी;  पूर्वांचल नभ में उष:काल की लाली ने समूचे विश्व के समुख यह उद्घोष कर दिया है कि यह सोया भारत अब जाग उठा है।”

1897 में अंग्रेजों की पराधीनता से ग्रस्त भारत के प्रति स्वामी विवेकानन्द का अदभुत आत्मविश्वास तो देखिए कि वे आगे कहते हैं, – ‘केवल अंधे देख नहीं सकते और विक्षिप्त बुद्धि समझ नहीं सकते कि यह सोया हुआ अतिकाय अब जाग उठा है। अब यह नहीं सोयेगा। विश्व की कोई शक्ति इसे तबतक परास्त नहीं कर सकती जबतक यह अपने दायित्व को न भूला दे।’ स्वामी विवेकानन्द ने मृतप्राय: हिन्दू समाज के सम्मुख विश्व विजय का उदात्त लक्ष्य रखा।

एक स्थान पर बोलते हुए उन्होंने स्पष्टता से कहा है,- कोई अन्य नहीं व इससे तनिक भी कम नहीं, केवल विश्वविजय ही मेरा लक्ष्य है। जब हम स्वामी विवेकानन्दजी की 150वीं जयंती को पूरे विश्व में तथा भारत के गांव-गांव में मना रहे हैं, तब हमें भारत के इस आध्यात्मिक विश्वविजय के जीवनलक्ष्य का पुन:स्मरण करना अत्यावश्यक है। स्वतंत्रता के पश्चात हमारी शिथिलता ने हमारी नयी पीढ़ी को राष्ट्रध्येय के प्रति विस्मृत कर दिया है। भारत के स्वातंत्र्य का अर्थ ही वर्तमान पीढ़ी भूल गई है। इस कारण जब थोड़े से देशाभिमान से आज का युवा प्रेरित भी हो जाएं तो वह भारत को विश्व का सबसे अमीर देश बनाने का स्वप्न देखता है। वैश्विक महाशक्ति का स्वप्न वर्तमान पीढ़ी आर्थिक महास्वप्न के रूप में ही देखती है। यह भारत के स्वभावानुरूप नहीं है और इसलिए स्वामी विवेकानन्द को अभिप्रेत विश्वविजय भी नहीं है।

स्वामी विवेकानन्द ने स्पष्ट कहा है, भारत विश्वविजय करेगा यह निश्चित है, किन्तु यह विजय राजनीतिक, सामाजिक अथवा आर्थिक बल से नहीं होगी अपितु आत्मा की शक्ति से ही होगी। स्वामीजी ने सिंहगर्जना की थी, “उठो भारत! अपनी आध्यात्मिक शक्ति से सम्पूर्ण विश्व पर विजय प्राप्त करो।”

आर्थिक सम्पन्नता, कूटनीतिक सम्प्रभुता इस आध्यात्मिक जगदगुरु पद के प्रतिबिम्ब मात्र होंगे। अत: प्रयत्न राष्ट्र की संस्कृति के आध्यात्मिक जागरण के लिए होने चाहिए। आर्थिक व राजनीतिक समृद्धि तो इस सांस्कृतिक पुनर्जागरण के सहज सहउत्पाद होंगे। स्वामी विवेकानन्द की सार्ध शती पर हमारी सम्यक श्रद्धांजलि यह होगी कि हम चिरविजय की अक्षय आकांक्षा को राष्ट्रजीवन में पुन: जागृत कर दें। भारत का स्वधर्म ज्ञान प्रवण अध्यात्म है, और इसका व्यावहारिक आचरण जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में धर्म संस्थापना है। अत: 17वीं शताब्दी के प्रारंभ तक विश्व की सकल सम्पदा के 66 प्रतिशत हिस्से का उत्पादन करनेवाला समृद्ध राष्ट्र विश्व व्यापार का आकांक्षी नहीं रहा। हर्षवर्धन, चंद्रगुप्त, समुद्रगुप्त, विक्रमादित्य आदि की बलाढ्य पराक्रमी सेनाओं ने राजनीतिक विजय के लिए कभी राष्ट्र की सीमाओं का उल्लंघन नहीं किया। भारत न तो अपने सामरिक सामर्थ्य से जगत को पादाक्रांत करने की अभिलाषा रखता है, न ही अपनी आर्थिक सम्पत्ति से अन्य राष्ट्रों को बाजार बनाकर उनका शोषण करना चाहता है। भारत की तो सहस्त्राब्दियों से एक ही आकांक्षा रही है कि विश्व की मानवता को ऋषियों की वैज्ञानिक जीवनपद्धति की सीख दे। भारत की महानतम उपलब्धि जगतगुरु बनने में है।

हमारा स्वप्न है कि पुन: आत्मसाक्षात्कारी ज्ञानियों से विश्व के समस्त देशों को प्लावित कर दिया जाए और सभी सभ्यताओं के प्रतिनिधि इस भूमि की दिव्य आध्यात्मिक अनुभूति का स्वाद चखने के लिए पुन: यहां के विश्वविद्यालयों में प्रवेश प्राप्त करें। यह ज्ञानभूमि सच्चे अर्थ में सहिष्णुता, सर्वसमावेशक एकात्म जीवन दृष्टि का ज्ञान सारे विश्व की मानवता को पुन: देने लगे, यही हमारा चरम लक्ष्य है।

स्वामी विवेकानन्द ने यही दृश्य अपनी आँखों से जीवन्त स्पष्ट देखा था और उन्होंने आह्वान किया था हम अपने जीवन पुष्प अर्पित कर अपनी मातृभूमि को अपने विश्वमान्य गुरुपद पर आसीन करें। आइए, उनकी 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में संकल्प करें कि अपने जीते जी इस दृष्टि को जीवन्त करने का प्राणपण से पराक्रम करेंगे।

सितम्बर 11, 2013 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , , , , , | टिप्पणी करे

सदाचार अर्थात सेवा में पहले मै और सुविधा में पहले आप!

गढ़े जीवन अपना अपना -19

राजा की सवारी निकली थी। आगे आगे सेना की एक टुकड़ी मार्ग में आनेवाले लोगों को रोककर मार्ग खाली करने के काम पर लगी थी। एक महात्मा बीच रास्ते में बैठे थे। अपनी ही मस्ती में थे। एक सैनिक उनके पास जाकर चिल्लाया, ‘‘उठो! रास्ता खाली करो!! राजा की सवारी आ रही है।’’ महात्मा हटे नहीं और उस सैनिक से पूछा, ‘‘तूम कौन हो?’’ अपना गणवेष दिखाकर बोला, ‘‘मूझे नहीं जानते? मै राजा की विशेष रक्षा वाहिनी का सिपाही हूँ। हटो!    नहीं तो. . .’’ महात्मा ने मुस्कुराकर कहा, ‘‘तभी’’। सिपाही कुछ समझा नहीं, अपने सुभेदार को ले आया। सुभेदार अकड़कर बोला, ‘‘ना जाने कहाँ कहाँ से आ जाते है भीखमंगे? अरे इतनी सी बात नहीं समझते, राजा की सवारी आ रही है। फूटों यहाँ से! दीखना मत कही आसपास भी।’’ महात्मा ने फिर पुछा, ‘‘तुम कौन?’’ सुभेदारी का परिचय पाकर फिर वही टिप्पणी की, ‘‘तभी!’’ जब महात्मा फिर ध्यानमग्न हो गये और राह से ड़िगे नहीं तो सेनापति आया। ठसन तो थी पर भाषा सभ्य थी, ‘‘महात्माजी हमारी विवशता को समझे, आप नहीं हटेंगे तो राजा की सवारी में विघ्न आयेगा। कृपया राह दें।’’ महात्मा ने फिर परिचय मांगा और परिचय पाने पर फिर वही, ‘‘तभी!’’ अब मंत्री की बारी थी मन्त्री ने प्रणाम कर बड़ी विनम्रता से राह छोड़ने की प्रार्थना की। राजा के गन्तव्य का महत्व भी बताया और राष्ट्रीय आवश्यकता की भी दूहाई दी। महात्मा ने मुस्कुराकर परिचय पूछा। पता चलने पर फिर, ‘‘तभी!’’ अब बात राजा तक पहुँची। महात्मा है कि हटता नहीं और केवल ‘तभी’ ‘तभी’ कहता है। राजा ने रथ से उतरकर साष्टांग दण्डवत किया और महात्मा का आशिर्वाद मांगा। कहा, ‘‘मै राह बदलकर चला जाउंगा पर जिस कार्य पर जा रहा हूँ उसकी सफलता का आशिष दें।’’ महात्मा केवल मुस्कुराये और परिचय पुछा। राजा ने उत्तर दिया, ‘‘महाराज प्रजा का सेवक हूँ। धर्म के अनुसार राज्यपालन का दायित्व है।’’ महात्मा मुस्कुराये और आशिर्वाद का हाथ उठाकर बोले, ‘‘तभी!’’

राजा मार्ग बदलकर आगे बढ़ा। रथ में साथ विराजमान राजगुरु से बोला, ‘‘इस ‘तभी’ का क्या रहस्य है?’’ राजगुरु ने समझाया, ‘‘अपने आप में तो ‘तभी’ कुछ नहीं कहता पर उसके पूर्व के विधान के साथ जोड़कर देखे तो पता चलेगा। सिपाही हो ‘तभी’। सुभेदार हो ‘तभी’। सबके स्तर के अनुसार उनके व्यवहार पर यह टिप्पणी थी। राजन् महात्मा ने अपने ‘तभी’ से सदाचार पर भाष्य किया है। व्यक्ति का शील ही उसका वास्तविक परिचय है। यह शील उसके व्यवहार में झलकता है। आप राजन् है, विनम्रता और सेवाभाव आपका शील है। ‘तभी’ ! इसको उलटा देखने से भी बड़ी शिक्षा मिलती है। उद्दण्ड व्यवहार है तभी केवल सिपाही हो। ठसन है तभी सुभेदार हो। विनम्रता है पर पूर्ण अधिकार नहीं तभी मंत्री हो।’’ राजा मन ही मन गुनगुनाता रहा ‘तभी’।

हमको भी अपने जीवन का ‘तभी’ समझना होगा। अपने व्यवहार का सदा अवलोकन करते रहना होगा। महात्मा जैसे स्पष्ट बोलनेवाले लोग तो मिलेंगे नहीं पर मन ही मन सभी कहेंगे ‘तभी’। और नियती तो कहेगी ही। हमारे शील से ही हमारे मार्ग प्रशस्त होंगे। हमारा आचरण ही हमारा परिचय है। शास्त्र कहते है, ‘‘आचार प्रभवो धर्मः’’। आचरण से ही धर्म जीवित रहता है। अतः हमारे शील को बनानेवाले हमारे राष्ट्रीय जीवनमूल्य हमारे व्यवहार में उतरेंगे तभी धर्म जागृत रहेगा। हम इस सदाचार के कुछ सूत्रो की चर्चा ही कर सकते है। पूरी सूचि बनाना ना तो व्यावहारिक है ओर ना ही आवश्यक। भारत में जन्मा हर व्यक्ति सुशील होने का मर्म तो जानता ही है। प्रयत्न भी करता है। संगती और तथाकथित आधुनिकता के चक्कर में भूल गया होगा तब भी कुछ संकेत मात्र संचित स्मृति को चलित कर शील को आचरण में लाने के लिये पर्याप्त होंगे।

सदाचार मनसा, वाचा, कर्मणा होता है। अपने विचार, वचन और व्यवहार तीनों में जीवनमूल्य परिलक्षित होने चाहिये। केवल दिखावे का सदाचार (Manners & Etiquette) अपेक्षित नहीं है। प्रशिक्षण से अपनाया बनावटी, दिखावे का व्यवहार तात्कालिक प्रभाव तो ड़ाल सकता है पर हृदय को जीतने की क्षमता तो अंतरमन से सुशील होने पर ही आयेगी।

मानव की एकात्मता का जीवनमूल्य सदाचार में परिलक्षित होता है बड़ों के सम्मान और आदर से, पशु-पक्षी पेड़-पौधों के प्रति अनुकम्पा से। जब हम उनमें भी अपने ही अंग होने की आत्मीयता का अनुभव करते है तब सबके साथ उसी आत्मभाव से व्यवहार भी करते है। राह चलते, बस-रेल में कहीं भी दुसरों की सुविधा का ध्यान रखनेवाला व्यवहार हो जाता है। अनावश्यक फूलों को तोड़ना, सहज ही मसल देना, राह चलते आवारा कुत्ते या बकरी को पीड़ा पहुँचाना ये सब स्वतः ही बन्द हो जाता है। पौधे के पत्ते तोड़ने के लिये बढ़ा हाथ किसी के द्वारा अपने कान उमेठने की वेदना को याद कर स्वतः ही रुक जाता है। अति की भी अपेक्षा नहीं है कि आवारा कुत्ते को ही घर ले आये और माँ को नाराज कर दिया। माँ से भी तो आत्मीयता है ना? उसके भाव को भी तो समझना है। फिर हमारे मन में उठी अनुकम्पा का क्या करें? सभी शहरों में आवारा पशुओं की देखभाल के लिये शासकीय और स्वयंसेवी दोनों प्रकार की व्यवस्था होती है। उसकी जानकारी प्राप्त करें और वहाँ तक सूचना पहुँचाये। पीछे पड़कर व्यवस्था होने तक अनुवर्तन करें। अब इतनी बात पर्याप्त है बाकि जब अपने पांव में ठोकर लगती है तो हम उपचार का मार्ग ढूँढ ही लेते है ना? तो जब यही आत्मीयता का भाव होगा तो उसे व्यवहार में उतारने के नव नवीन रास्ते स्वतः सर्जकता से खोज लेंगे।

आधुनिक जीवन में पर्यावरण से लेकर मनुष्यमात्र को जो सर्वाधिक हानी हो रही है वह ऊर्जा एवं अन्य संसाधनों के व्यर्थ जाया करने से हो रही है। हमारी पूरी जीवनशैली ही बिजली पर निर्भर हो गई है। अब हम इस जीवनचर्या को वापिस पूर्णतः प्राकृतिक मार्ग पर तो नहीं लौटा सकते। किन्तु, अस्तीत्व की एकात्मता के जीवनमूल्य को सदाचार में उतारते हुए इतना तो कर ही सकते है कि ऊर्जा की बचत के लिये हर सम्भव उपाय करें। छोटी छोटी आदतों से यह सम्भव है जैसे कमरा छोड़ते समय लाइट, पंखा बन्द करना, पानी का संयम से उपयोग करना आदि।

त्याग का जीवनमूल्य तो पग पग पर प्रगट होता है। हमने देखा था कि त्याग का कर्मरुप सेवा है। सेवा स्वतःस्फूर्त होनी चाहिये। शील प्रगट होता है पहल में। सामने कार्य देखकर स्वतः ही, बिना किसी के कहे, फुर्ति से हम उठ पड़े। आज्ञापालन तो करना ही चाहिये किन्तु घर आये अतिथि को पानी पिलाने के लिये हर बार माँ या पिताजी को आज्ञा देनी पड़े तो समझना होगा कि कुछ गड़बड़ है। ये तो सेवा के छोटे छोटे अवसर हैं इन्हें तो उत्साहपूर्वक हथियाना चाहिये। इससे पहले की अपने भाई या बहन में से कोई और काम करें, हमें कर लेना चाहिये। सच्चा सेवक तो वही होता है जो दरी बिछाने और उठाने में सहजस्फूर्त उत्साही हो। सेवामें सबसे आगे रहना तो ठीक है पर सुशील व्यक्ति सुविधा में ऐसी प्रतिस्पद्र्धा नहीं करता। वहाँ तो उसका मन्त्र होता ‘मै नहीं तू ही।’ विद्यालय में एकसाथ अवकाश होने पर पानी पीने के लिये झुम्बड़ लगती है। बस में से उतरते समय पता है सब उतरेंगे फिर भी धक्का देते है। सदाचारी छात्र तो पहले दूसरे को अवसर देंगे। स्वतः अनुशासन आ जायेगा।

सेवा में पहले मै और सुविधा में पहले आप।

नवम्बर 25, 2012 Posted by | आलेख | , , , , , , | 3 टिप्पणियाँ

गढ़े जीवन अब तक . . .

पिछले 17 लेखों में हम जीवन गठन की प्रक्रिया को देख रहे है। आगे बढ़ने से पहले एक बार अब तक की बातों की एक झलक देख ले।
प्रत्येक का जीवन उसका अपना है, अद्वितीय है फिर भी सब आपस में जुड़े है, एक ही जीवनरस से पोषित है। अतः सबका आपसी सम्बन्ध, अवलम्बन व निर्भरता को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक को अपना कार्य, भुमिका व ध्येय चुनना होता है। प्रकृति के इन नियमों के अनुसार ही जीवन जीना वैज्ञानिक विधि है। जीवनध्येय अपने जीवन के उद्देश्य के अनुरूप तो होना ही चाहिये साथ ही समष्टि में अपनी भुमिका के लिये भी उपयुक्त हो। यह जीवन ध्येय ही अपनी आजीविका ;ब्ंतममतद्ध अर्थात भौतिक जीवन लक्ष्य को तय करने में मुख्य कारक होता है। जब जीवन ध्येय तय होता है वही जीवन की दिशा भी तय करता है।
इस ध्येय को पाने के लिये अपने चरित्र का गठन करना अगला कार्य है। चरित्र गठन के आंतरिक व बाह्य आयाम होते है। आंतरिक आयाम अंतःकरण से जुड़े होते है तो बाह्य आयाम शारीरिक क्षमता से। चरित्र गठन के आंतरिक साधन हैं – प्रेरणा, वीरता, धैर्य व विवेक। प्रेरणा में असम्भव को सम्भव बनाने की क्षमता होती है। चुनौति को स्वीकार करने की ताकद ही वीरता है। प्रतिकूल परिस्थिति में भी मन को स्थिर रखने की अत्यन्त कठीन साधना धैर्य से ही सम्भव है। निर्णय लेते समय उपलब्ध विकल्पों में से सही चुनाव करना विवेक का काम है। इन चारों आंतरिक आयामों का संतुलित विकास चरित्र गठन का महत्वपूर्ण अंग है। प्रेरणा, वीरता, धैर्य व विवेक को एकत्रित रूप से श्रद्धा कहा जा सकता है। स्वामी विवेकानन्द युवाओं में नचिकेता सी श्रद्धा का आहवान करते है। हमने नचिकेता के जीवन के उदाहरणों से ही समझा कि श्रद्धा का विकास कैसे कर सकते है? नियमित आत्मावलोकन, सभी प्रकार की परिस्थिति में उत्साह तथा मन को विस्तारित करनेवाला वैराग्य श्रद्धा को दृढ़ करने के साधन हैं।
चरित्र गठन के बाह्य आयाम शारीरिक लगते हे किन्तु वास्तव में ये पूर्ण व्यक्तित्व की ही अभिव्यक्ति करते हैं। बल में केवल शक्ति ही नहीं तो साथ में तितिक्षा व चापल्य भी आवश्यक है। बल के साथ ही बाह्य आयामों में रूप भी महत्वपूर्ण है। शुद्धि के साथ अनुशासन से ही व्यक्तित्व में आकर्षण उत्पन्न होता है। यह आकर्षण ही रूप का निखार है। स्वास्थ्य को केवल बिमारी से बचाव नहीं माना जाना चाहिये। स्वस्थ होने के लिये सकारात्मक चिंतन भी आवश्यक है। चरित्र का चैथा बाह्य आयाम है कौशल। स्वावलम्बन, यन्त्र तथा कला का कौशल विकसित करना एक सुगठित चरित्र के लिये अनवार्य है। बल, रूप, स्वास्थ्य व कौशल इन चारों के विकास के लिये अभ्यास ही एकमात्र साधन है। योगाचार्य पतंजली दीर्घकाल तक निरन्तरता से सेवाभाव से किये कार्य को अभ्यास कहते है। हमने अपनी लेखमाला में देखा कि अभ्यास एकाग्रता का करना है और पूर्ण अनुशासन व अखण्ड सातत्य के साथ करना है।
जीवन गठन की साधना में ओर भी पाड़ाव बाकि है किन्तु चरित्र गठन के इन आंतरिक व बाह्य आयामों को एक प्रवाह चित्र के रूप में एकत्र देख लेते है।

अप्रैल 18, 2012 Posted by | आलेख | , , , | 3 टिप्पणियाँ

रीसेट मत कर देना!

गढ़े जीवन अपना अपना -17

जर्मन साधक बड़ी श्रद्धा से जप कर रहा था। गंगाजी का किनारा, सामने विशाल हिमालय के उत्तुंग शिखर! उत्तरकाशी में गंगाजी मुड़कर उत्तरवाहिनी हो जाती है। कहते है उसके किनारे जप करने से त्वरित सिद्धि हो जाती है। अपने जर्मन साधक का विश्वास तो और भी अधिक दृढ़ था। उसके गुरू ने उसको बताया था कि यदि वो मन्त्र का सवा लाख जप कर देगा तो रामजी उसे अवश्य दर्शन देंगे। उसके हाथमें अणु गणक (Electronic Counter) था। एक छोटासा यन्त्र जिसपर दो खटके (Buttons) थे। एक गणना के लिये। एक बार मन्त्र का पाठ करने पर इस बटन को दबाने से गणना आगे बढ़ती थी। दूसरा बटन था- पुनरारम्भ (Reset) का जिसको दबाने से गणक फिर शून्य पर आ जाता था। अर्थात सारी गणना फिर प्रारम्भ होगी। वो अपने देश जर्मनी से भारत कई बार आया था, शांति की खोज में। गत वर्ष गुरूजी मिले और फिर यही रह गया। एक दिन बड़ी हिम्मत करके उसने गुरूजी से पूछा, ‘‘क्या मै रामजी के दर्शन कर सकता हूँ?’’ गुरूजी ने तुरन्त उत्तर नहीं दिया। कहा रामजी से पूछकर बताता हूँ। फिर एक दिन बाद बताया कि सवा लाख जप करोगे तो रामजी दर्शन दे देंगे। तो श्रद्धा से साधक बैठ गया जप करने। सामने एक परदा लगा दिया ताकि रामजी उसपर प्रगट हो सके। जप बड़ी श्रद्धा से चल रहा था। बीच बीच में गणक देख लेता।

जप 1 लाख के पार हुआ। पर रामजी का कोई चिह्न नहीं- ना पैर ना मुगुट। थोड़ा सा विचलित हुआ। सोचा कही कुछ गड़बड़ तो नहीं हो गयी? फिर भी एकदम श्रद्धा तो नहीं टूटी इसलिये लगा रहा। पर जब केवल 1000 ही मन्त्र बाकि रहे तब तो लगा मामला निश्चित ही गड़बड़ है और उठ गया। गुरुजी के पास जाकर आवेश में कहने लगा, ‘‘आप गलत कहते है। आपने कहा था जप करने से रामजी दर्शन देंगे पर ऐसा नहीं हुआ। मैने श्रद्धा से जप किया पर दर्शन नहीं हुए।’’ गुरुजी ने आश्चर्य से कहा, ‘‘ऐसा नहीं हो सकता। स्वयं रामजी ने कहा था यदि सवा लाख जप कर लिया तो वे दर्शन अवश्य देंगे। तुमको विश्वास है तुम्हारी मालाओं की गिनती ठीक थी कहीं जप अधुरा तो नहीं रह गया।’’ शिष्य ने कहा, ‘‘त्रुटी की कोई सम्भावना ही नहीं है, अणु गणक है, श्रेष्ठतम (Perfect) है।’’ गुरुजी ने कहा, ‘‘दिखाओ!’’ उसने देते हुए ही स्पष्ट किया, ‘‘अभी 1 लाख 24 हजार हुए है। 1 हजार बाकि ही है पर रामजी का तो एक भी अंग प्रगट नहीं हुआ। मेरा परदा कोरा (Blank) ही है।’’ गुरुजी जोर जोर से हँसने लगे, ‘‘वाकई तुम्हारा परदा तो कोरा ही है। अरे पगले! रामजी प्रत्यक्ष दर्शन देंगे जैसे हम तुम्हे दिख रहे है। इससे भी अधिक प्राणवान। कोई परदा नहीं चाहिये और सवा लाख पूरा होने पर ही दर्शन होंगे। 1 लाख 24 हजार 9 सौ 99 से भी नहीं होगा।’’ जर्मन साधक ने कहा, ‘‘ठीक है! 1000 ही बचे है अभी घण्टे भर में कर लूँगा।’’ गुरुजी ने मुस्कुराते हुए रीसेट का बटन दबा दिया और कहा, ‘‘ऐसे नहीं होता। एक भी व्यवधान का अर्थ है गणना का शून्य होना। अब फिर सवालाख पूरा करना होगा।’’

अभ्यास में सातत्य का यही महत्व है। निरन्तर अभ्यास ही प्रभावी होता है। हम सब अपने जीवन में कुछ पाने की आकांक्षा से संकल्प लेकर बड़ी श्रद्धा से प्रयास करते है पर गड़बड़ यही हो जाती है सातत्य नहीं बना पाते। कुछ ना कुछ बहाना बन जाता है और हम नियम तोड़ देते है। गणना शून्य हो जाती है साधना रीसेट हो जाती है। अतः सातत्य का बड़ा महत्व है। लगातार करने से ही अभ्यास सिद्ध होता है। हम अपने घर में ही देख सकते है, हमारी माँ प्रतिदिन नियम से कुछ काम करती ही है। साधारण से कार्य है जैसे तुलसी को पानी ड़ालना, श्याम को दियाबाती करना, ज्यादा समय या श्रम नहीं लगता। पर हाँ! ध्यान रखना तो पड़ता ही है। और इसी से एकाग्रता और अनुशासन आता है। सातत्य से करने से अभ्यास सिद्ध हो जाता है। इसिलिये हम पाते है साधारण गृहिणी में भी अद्भूत ईच्छाशक्ति होती है। पन्नाधाय और इमरता देवी जैसे असाधारण त्याग को भी वो सहजता से कर लेती है।

राजस्थान में जोधपुर के पास स्थान है खेजड़ी। वहाँ की एक साधारण ग्रामीण महिला ने पर्यावरण की रक्षा के लिये बलिदान कर दिया। जब राजा के सैनिक पेड़ काटने आये तो इमरता देवी एक पेड़ से चिपक गई। ‘सिर कटे तो कटै पर रूख ना कटै।’’ वृक्ष की कीमत हमारी जान से भी बढ़कर है। 300 महिलाये इमरता देवी के बलिदान से प्ररित होकर खेजड़ी के वृक्षों से चिपक गई। राजा को हारना पड़ा वृक्ष बच गयें। आज वहाँ इमरता देवी के सम्मान में उद्यान बना है। विष्नोइयों के 29 नियमों का सातत्य से पालन करने से एक सामान्य अनपढ़ महिला में पर्यावरण की रक्षा के लिये आत्मबलिदान करने का साहस पैदा हो गया।

हम अपने जीवन में प्रतिदिन करने के लिये छोटे छोटे कुछ नियम बना लें। और फिर पूर्ण श्रद्धासे उनका पालन करें। हमारा साहस ही हमारा सम्बल बनेगा। जब आलस से नियम टूटने लगे तो अपने आप को याद दिलाये कि कितने दिनों, महिनों या वर्षोंसे बिना एक दिन का भी विराम लिये हम इस कार्य को कर रहे है। तो फिर मन कहेगा आज एक दिन ना करने से इतनी बड़ी गणना शून्य हो जायेगी। और यह बात हमे नियम तोड़ने से परावृत्त करेगी। जब कांचिकामकोटी पीठ के शंकराचार्य को झूठे आरोपों में बंदी बना लिया तो वहाँ के चन्द्रमौलीश्वर की संध्यापूजा में खण्ड पडा। 1200 वर्षोंसे निरन्तर चल रही पूजा में विराम आ गया। अब आज फिर से प्रारम्भ परम्परा तो मात्र 6 साल पूरानी है।

कहते है कि 12 साल लगातार बिना एक भी खण्ड के अभ्यास करने पर एक तप सिद्ध होता है। एक मनुष्य को अपने जीवन में कम से कम 12 तप करने अपेक्षित है। अब प्रश्न आयेगा 144 वर्ष तो आयु ही नहीं है फिर ये कैसे सम्भव है? सरल सी बात है एक बार में एक तप ही करना थोड़े ही आवश्यक है। एकसाथ छोटे- छाटे 6-7 नियम बना सकते है। आचार्य तुलसी इसे अणुव्रत साधना कहते थे। पर याद रहे अभ्यास रीसेट ना हो जाय!

अप्रैल 11, 2012 Posted by | आलेख | , , , , | 11 टिप्पणियाँ

कुशल मंगल है।

गढ़े जीवन अपना अपना -15

चरित्र निर्माण के बाहरी आयामों में चौथा व अंतिम है – कौशल। शारीरिक बल, रूप ओर स्वास्थ्य के साथ ही विभिन्न प्रकार के कौशल भी जीवन में वांछित सफलता पाने के लिये आवश्यक है। जीवन के लक्ष्य की ओर बढ़ने में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है अन्यथा भी अनेक प्रकार की परिस्थितियों में जीवन को अपने निश्चित लक्ष्य की ओर अग्रेसर करने की चुनौति आ सकती है। आचार्य चाणक्य अपने शिष्यों को शिक्षा देते है कि यदि मार्ग में बाधा नहीं है तो समझना चाहिये कि मार्ग सही दिशा में नहीं है। इसलिये जब हम अपने जीवन में लक्ष्यप्राप्ती का मार्ग चुनते है तो हमें सभी प्रकार की स्थितियों के लिये स्वयं को तैयार करना चाहिये। अतः व्यक्तित्व विकास में कौशल प्राप्ति का असाधारण महत्व है। पांडवों के जीवन में आई प्रत्येक बाधा को उन्होंने कौशल प्राप्ति का साधन बनाया। अर्जुन ने सारे जीवन भर नये नये अस्त्रों को प्राप्त करने के लिये अलग अलग खतरों का सामना किया। किरात रूप में स्वयं शंकर भगवान का सामना कर पाशुपतास्त्र प्राप्त करना हो या नारायणास्त्र की उग्र तपस्या हो, इन सब ने ही अन्ततः धर्मयुद्ध में पाण्डवों को विजयश्री प्रदान की।

वर्तमान युग में तीन प्रकार के कौशल में प्रशिक्षित होना विकसित व्यक्तित्व के लिये आवश्यक है। पहली श्रेणी में जीवनोपयोगी कौशल आते है जो व्यक्ति को स्वावलम्बी बनाते है। स्वयं के लिये हम नियम सा बना ले जो मुझे चाहिये वो मै बना सकूं। खाना खाते है ना तो भोजन पकाना आना चाहिये। आधुनिक घरों के बच्चों को तो भोजन परोसना और थाली धोना भी नहीं आता। कपड़े पहनते है तो कपड़े धोना, प्रेस करना या कुछ थोड़ी बहुत सिलाई करना सीख लेना चाहिये। कुछ सम्पन्न घरों के बालकों को तो कपड़ों की घड़ी करना भी नहीं आता। विकसित व्यक्तित्व का ध्येय हो कि किसी भी परिस्थिति में दूसरे पर निर्भर ना रहना पड़ें। ये उपर से सरल लगने वाली बाते कभी कभी बड़ी बाधा बन जाती है। कपड़े धोने का अभ्यास ना हो तो अचानक साफ कपड़े नहीं धो सकेंगे। स्वावलम्बन की आदत बाल्यकाल में ही पड़ जानी चाहिये। समझदार अभिभावक सामथ्र्य के बावजूद 10 से 16 वर्ष के आयु में बालकों को नौकरों पर निर्भर नहीं होने देते।

दूसरी श्रेणी में अभिव्यक्ति का कौशल आता है। अपने व्यक्तित्व को प्रगट करने के लिये अभिव्यक्ति-कौशल अत्यावश्यक है। जीवनलक्ष्य की प्राप्ति में यह महत्वपूर्ण है। वर्तमान समय में व्यावसायिक सफलता में भी यह अनिवार्य हो गया है। इस श्रेणी के कौशल में भाषा का ज्ञान आता है। व्यक्ति को अधिक से अधिक भाषाओं को सीखना चाहिये। वर्तमान में केवल अंग्रेजी पर बल दिया जाता है पर भाषा कौशल का सर्वोत्तम विकास मातृभाषा में ही होता है। यदि एक बार मातृभाषा में प्रवीणता हासिल कर ले तो फिर अन्य किसी भी भाषा को सीखना सरल हो जाता है। हमारे मस्तिष्क में जो भाषा सम्बंधी केन्द्र है उनका विकास होना आवश्यक है यदि ये केन्द्र ठीक से विकसित हो जाये तो कोई भी नई भाषा सीखना सहज सुलभ हाता है। यन्त्र मानव (रोबोट) के विकास के लिये अनिवार्य कृत्रिम बुद्धि (Artificial Intelligence) के बारे में जो अत्याधुनिक अनुसंधान हुए है वे हमें बताते हैं कि संस्कृत एक ऐसी परिष्कृत भाषा है कि जिसके अध्ययन से मस्तिष्क का पूर्ण विकास होता है। यह भाषा गणितीय होने के कारण बिना किसी विसंगति के भाषीय तर्क का विकास होता है जो मस्तिष्क के भाषा केन्द्रों के स्नायविक उतकों (Neurons) के विकास में गति प्रदान करता है। इसी शास्त्रीयता के चलते इंग्लैण्ड के कुछ विद्यालयों में वैदिक मंत्रो तथा संस्कृत के अध्यापन को प्रारम्भ किया गया है। यदि संस्कृत व अपनी मातृभाषा पर प्रभुत्व प्राप्त कर लिया जाये तो फिर अंग्रेजी में भी सहज प्राविण्य मिल जायेगा। हाँ प्रयास तो करना ही पड़ेगा। मातृभाषा फिर संस्कृत और उसके बाद अंग्रेजी यदि यह क्रम रखा जाये तो भाषा सीखने में आनन्द आयेगा और प्रयास कठीन होने से भी खेल के समान आनन्ददायी होंगे।

अभिव्यक्ति कौशल का दूसरा अंग है कला। प्रत्येक व्यक्ति में अपनी भावनाओं के प्रेषित करने की आकांक्षा भी होती है और उसकी अपनी एक विधा भी। यही विधा कला के रूप में प्रगट होती है। सारी कलायें भावों की अभिव्यक्ति के लिये ही होती है। प्रत्येक के स्वभाव के अनुरूप व्यक्ति अपने भाव शब्द या रूप के द्वारा अभिव्यक्त करता है। शब्द या ध्वनि के द्वारा सम्प्रेषण काव्य, लेखन, संगीत आदि कलाओं में विकसित होता है। रूप अथवा आकार के द्वारा सम्प्रेषण शिल्प, चित्रकला, नृत्य नाट्य आदि कलाओं में विकसित होता है। संसार में प्रत्येक व्यक्ति कलोपासक होता है अर्थात कलाभिव्यक्ति को करनेवाला अथवा उसका आस्वादन करनेवाला होता है। अपने अन्दर की कला का विकास भी व्यक्तित्व के विकास के लिये अत्यावश्यक है। व्यावसायिक लक्ष्य को महत्व देते समय कला को अतिरिक्त एवं अनावश्यक मानते हुए दुर्लक्षित किया जाता है पर यह आत्मघाती है। कलाविहीन व्यक्ति में जो अधुरापन रहता है वह उसे किसी भी क्षेत्र में अपनी पूरी क्षमता से कार्य नहीं करने देता। अतः अपनी अपनी रूचि के अनुसार कलाविधा का चयन कर उसके प्रशिक्षण, अभ्यास व आस्वादन के लिये नियमितता से समय देना चाहिये। जीवन के लक्ष्यप्राप्ति में सहायक होने के साथ ही कलोपासना जीवन को रसमय बनाकर परिपूर्ण कर देती है।

तीसरी श्रेणी के कौशल में यन्त्रविद्या (Technology) का अन्तर्भाव होता है। मानव की शारीरिक क्षमताओं को विस्तारित करने का काम यन्त्र करते है। यन्त्रों के सुविधाजनक प्रयोग से कार्य को सुचारू, सक्षम एवं कम समय में किया जा सकता है। आधुनिक जीवन में संचार के साधन बढ़ जाने के साथ ही जीवन में उपकरणों की संख्या एवं भुमिका दोनों में प्रचण्ड वृद्धि हुई है। संगणक (Computer) और चल-दूरभाष (Mobile) तो प्रत्येक के अनिवार्य उपांग हो गये है। इनके प्रयोग एवं उपयोग में असीम सम्भावनायें है और शायद ही कोई ऐसा दम्भ भर सकें कि इनको पूरी तरहा से जान लिया। इन उपकरणों का प्रयोग तो सभी करते है पर अनेक सुक्ष्म पहलुओं की ओर ध्यान नहीं देते। हममें से कितने लोग जानते है कि केवल कुछ नम्बर डायल करके ही अपने मोबाईल की पूर्णतः समाप्त (Discharged) बैटरी को कुछ और देर तक चलाया जा सकता है। ऐसी अनेक बातें है जिनकी बारीकियों के बारे में हम लोग नहीं जानते। दिल्ली के छतरपूर मंदिर की घटना है। एक अमेरिकी पर्यटक ने अपना अत्याधुनिक कॅमेरा देकर एक भारतीय छात्र को फोटो लेने को कहा। दो-तीन फोटो लेने के बाद कॅमेरा लौटाते हुए छात्र ने पर्यटक को कॅमेरे के बारे में कुछ तकनिकी प्रश्न पूछे। अमेरिकी ने जबाब दिया मै इसकी तकनिक के बारे में कुछ नहीं जानता केवल उपयोग जानता हूँ। जापानी चीजे बनाते हैं हम प्रयोग करके खराब होने पर फैंक देते है। हम भारतीय ही है जो खराब चीजों को भी सुधारकर प्रयोग में लेते है। ये जुगाड़ हमारी कंजुसी या कमी नहीं यन्त्र ज्ञान के प्रति हमारी स्वाभाविक जिज्ञासा है। आधुनिक पीढ़ि में भी ये जिज्ञासा है पर प्रतिस्पद्र्धा की आपाधापी में हम इस कौशल को भूल ना जाये, प्रयत्नपूर्वक विकसित करें।

स्वावलम्बन, कला और यन्त्रविद्या तीनों श्रेणियों के कौशल विकसित करने के लिये नित्य अभ्यास ही एकमात्र उपाय है। कौशल के नैपुण्य में ही हमारा कुशल है और सार्वजनिक उद्देश्य के प्रति समर्पित कुशल ही मानवता के लिये मंगल होता है।

मार्च 14, 2012 Posted by | आलेख | , , , , , , , , , , , | 8 टिप्पणियाँ

मै हूँ सबसे सुन्दर !

गढ़े जीवन अपना अपना -13

“बताओ! गुलाब क्यों सुन्दर होता है?” कुलकर्णी सर थे तो अंग्रजी के शिक्षक पर उनकी आदत थी कि कक्षा का प्रारम्भ किसी ना किसी प्रश्न से किया जाये। और लगभग हर बार प्रश्न ऐसा ही कुछ उटपटांग हुआ करता था। अब इसी को ले लो। गुलाब क्यों सुन्दर होता है? 7 वी कक्षा की बुद्धि के अनुसार छात्र उत्तर देते रहे, ‘गुलाब का रंग सुन्दर होता है इसलिये!’ किसी ने कहा उसकी पंखुड़ियों की रचना के कारण। कोई भी जबाब कुलकर्णी सर को संतुष्ट नहीं कर सका। वैसे भी उनके प्रश्नों का उत्तर उनके स्वयं के पास जो होता था वही उनको मान्य होता था। दो दिन का समय दिया गया छात्रों को ताकि घर में भी सब को पूछ सकें और फिर ये सिद्ध हो जाय कि कोई भी सही जबाब नहीं जानता। वैसे भी इस प्रश्न का माता -पिता भी क्या जबाब दें। ‘‘ये भी कोई बात हुई भला! गुलाब सुन्दर होता ही है अब इसमें क्यों क्या बताये। भगवान ने ही उसे सुन्दर बनाया है।’’

पढ़ते समय आप भी सोचने लगे ना कि गुलाब क्यों सुन्दर होता है? अब आपको कुलकर्णी सर का उत्तर बता ही देते है। सारे उत्तरों को खारीज कर देने के बाद ही शिक्षक वो उत्तर बताता है जो उसके अनुसार सही होता है और अक्सर छात्र इस बात से सहमत नहीं होते कि वो सही उत्तर है। पर कुलकर्णी सर का प्रश्न पूछने के पीछे हेतु ही अलग होता था। उन्होंने उत्तर दिया, ‘‘गुलाब इसलिये सुन्दर होता है क्योंकि सब कहते है कि वो सुन्दर होता है। हर कवि कहता है, हर फिल्म में कहा जाता है कि तुम गुलाब सी सुन्दर हो। इसलिये हम भी मान लेते है।’’ देखा सर ने भी नहीं बताया कि क्यों गुलाब सुन्दर होता है? जब छात्रों ने ये बोला तो सर ने कहा, ‘‘मै तो बता दूँगा। पर मेरा पूछने का आशय ये था कि अधिकतर बाते हम जीवन में ऐसे ही मान लेते है क्योंकि सब कहते है। सोचते कहाँ है कि इसका वास्तविक अर्थ क्या है?’’

हम सब सुन्दर बनना चाहते है या सुन्दर दिखना चाहते है? शायद केवल दिखना चाहते है क्योंकि हम सोचते है सौन्दर्य तो ईश्वरीय देन है। अब हम जैसे पैदा हुए है वैसे ही तो नाक नक्श रहेंगे ना? हाँ! आजकल लोग प्रसाधन शल्य चिकित्सा (Cosmetic Surgery ) से अपने अंगो की रचना भी बदलने लगे है। सब के बस का ये भले ही ना हो पर कम से कम कुछ क्रीम पाउडर लगाकर सुन्दर दिखने का प्रयास तो सब करते ही है। एक सर्वेक्षण के अनुसार अब इस मामले में पुरुषों ने महिलाओं को पीछे छोड़ दिया है। पुरुषों के लिये विशेष प्रसाधनों की बिक्री अब अधिक होने लगी है। हर कोई क्रीम लगाकर गोरा होना चाहता है। बाल बढ़ाकर या भिन्न भिन्न तरह से कटवाकर अपने आप को सुन्दर दिखाने की होड़ लगी है। वैसे इस प्रयास में गलत कुछ नहीं है। केवल ये सारे प्रसाधनों के विज्ञापन मात्र उल्लु बनाओ प्रोग्राम है। इससे सुन्दर व्यक्तित्व का कोई लेना देना नहीं।

किसी कवि ने कहा ही है ना कि सौन्दर्य तो देखनेवाले की दृष्टि में होता है। इसका अर्थ हुआ सुन्दरता का अर्थ है आकर्षित करने की क्षमता। तो गुलाब भी इसीलिये सुन्दर है क्योंकि वह सबको आकर्षित करता है। मन मोह लेता है। यह आकर्षण विशेषता से आता है। दिखने की विशेषता या सुगन्ध की या फिर रचना की। कुछ अलग हटके होगा तो आकर्षण होगा। शायद इसीलिये शोभाचार (Fashion) के नाम पर कुछ ना कुछ विचित्र ही किया जाता है। चित्र विचित्र केशभूषा व वेषभूषा के द्वारा अलग दिखने से लोग आकर्षित होंगे ऐसा विचार होता होगा। पर विड़म्बना देखो। कोई शोभाचार चल जाये, लोकप्रिय हो जाये तो सब वैसे ही बाल कटवाने लगते है और फिर आप अलग दिखने की जगह सभी बन्दरों की तरहा ही लालमुहें दिखने लगते है। सब एक जैसे हो जाये तो फिर आकर्षण कहाँ रहा?

व्यक्तित्व के बाहरी पहलुओं में बल के बाद रूप दूसरा महत्वपूर्ण पहलु है। आकर्षक रूप का विकास भी व्यक्तित्व के विकास का अंग है। कृष्ण के नाम का ही अर्थ है आकर्षित करने वाला। कर्षयति इति कृष्णः। उसकी बांसुरी के पीछे मनुष्य ही क्या पशु पक्षी सब खींचें चले आते थें। रंग काला है गोरा नहीं। कपड़े भी सामान्य पीले रंग के वस्त्र, आभूषण के नाम पर पत्तों की माला और मोर मुकुट। फिर भी विश्व इतिहास का सबसे आकर्षक व्यक्तित्व। तो मानना ही पड़ेगा ये कुछ और बात है। इस सौंदर्य के तत्व को समझना होगा। बाहरी नकल से काम नहीं चलेगा, हमारे अन्दर के कृष्ण को जगाना होगा तभी वास्तविक सुन्दरता का जागरण होगा। सुन्दर दिखने की कोशिश के स्थान पर सुन्दर बनने की कोशिश करनी होगी तो आकर्षण अपने आप आ ही जायेगा।

सुन्दरता का प्रगटीकरण भले ही बाहरी हो पर उसका उद्गम तो भीतर से होता है। सुन्दरता की पहली आवश्यकता है पवित्रता। शरीर, मन और वाणी की पवित्रता। शौच अर्थात शुद्धि को योग में बड़ा महत्व दिया गया है। शरीर शुद्ध ही नहीं होगा तो उपर से कितना भी सजा लो आकर्षण कैसे आयेगा? हमको स्नान के तुरन्त बाद अनुभव होनेवाली ताजगी में कितना सौन्दर्य छिपा है। स्नान के बाद हमारा रूप सर्वोत्तम होता है। फिर हम उपर से प्रसाधन चुपड़कर उसे अपवित्र बना लेते है। नियमित पूर्ण स्नान भी सुन्दर बनने का सहज साधन है। शरीर को शुद्ध रखने की और भी कई विधियाँ योग में बताई गई है। ज्ञाता प्रशिक्षक से सीखकर करने से लाभ होगा। इसीलिये यहाँ उनका वर्णन नहीं कर रहे। बिना प्रशिक्षक के मार्गदर्शन के केवल पढ़कर करने से दुष्परिणाम हो सकते है। वैसे संकल्प के साथ रोज स्नान भी पर्याप्त है। मन की शुद्धि भी अत्यावश्यक है। विचार में शुद्धता का अर्थ है उपर उठाने वाले विचार, विस्तार देनेवाले विचार, बिना छल कपट के विचार। नाक नक्श अच्छे होने के बाद भी विचार दुष्ट या कपटी होने से आकर्षण चला जाता है। वाणी की शुद्धता भी सौन्दर्य को निखरने में अनिवार्य है। सदाचार पर विचार करते समय इसपर विस्तार से चर्चा करेंगे।

सुन्दर रूप का दूसरा घटक है प्रसन्नता। कितने भी संतुलित अंग हो, रुप सुहाना हो पर क्या रोते हुए कोई आकर्षक लग सकता है? अतः सतत प्रसन्न रहने का स्वयं को प्रशिक्षण देना होगा। जरा सोचिये बिना किसी बाहरी प्रेरणा के हमारा भाव क्या होता है? प्रसन्नता का या चिंता का या कष्ट का? जब कोई नहीं है, कोई देख नहीं रहा क्या तब हम प्रसन्न होते है? जो अपने आप से प्रसन्न रहता है वो मदमस्त ही सबसे आकर्षक होता है। मुस्कुराने के लिये कोई कारण नहीं चाहिये। वो हमारा सहज स्वभाव बन जाये। कारण तो दुखी होने के लिये आवश्यक हो।

आकर्षण का तीसरा अनिवार्य अंग है प्रमाणबद्धता या सुव्यवस्था। आकर्षण का सबसे बड़ा उदाहरण है चुम्बक। लोहे और चुम्बक की रासायनिक रचना एक ही है फिर भी चुम्बक में आकर्षण है और लोहे में नहीं है। पर उसी सादे लोहे के टुकड़े को चुम्बक पर लगातार घिसने से वो भी चुम्बक बन जाता है। दोनों के आयनों की संरचना में भेद है। लोहे के आयन अस्त व्यस्त है तो चुम्बक के आयन दक्षिण और उत्तर धृवों के बीच पंक्तिबद्ध हो गये है। लगातार घिसने से लोहे के आयन भी प्रमाणबद्ध हो जाते है और वो भी चुम्बक बन जाता है। अच्छी संगत का यह सुपरिणाम है। अपनी वस्तुओं को व्यवस्थित करना व्यक्तित्व को आकर्षक बनाने का प्रारम्भ है। तो अपना कमरा सुव्यवस्थित कर लो, कपड़ें, किताबें ठीक से रखने लगो। इससे हमारे व्यक्तित्व के आयन भी सुव्यवस्थित होने लगेंगे और हम आकर्षक बन जायेंगे।

प्रत्येक व्यक्ति ही स्वभावतः सुन्दर होता है। केवल लम्बे होने में ही सौन्दर्य नहीं है या किसी का शरीर स्थूल है तो उसका अर्थ ये नहीं कि वो आकर्षक नहीं हो सकता। हम अपने शरीर रचना के अनुसार अपने परिधान आदि का चयन करना सीखेंगे तो रुप निखरेगा। मुख्य बात तो ये है कि पवित्रता, प्रसन्नता और प्रमाणबद्धता ये हमें सुन्दर बनाते है, प्रसाधन नहीं। इसका अभ्यास करें और फिर आपका रोम रोम कह उठेगा,
मै हूँ सबसे सुन्दर!

फ़रवरी 3, 2012 Posted by | आलेख | , , , , , , , , , , , , , | 5 टिप्पणियाँ

क्या हम तत्पर है?

गढ़े जीवन अपना अपना -10
एक गुरुकुल में दो शिष्य थे सुहृत और सुकृत। सुकृत बड़ा विद्वान था। जो भी पाठ पढ़ाया जाता तुरन्त याद कर लेता। अतिरिक्त भी बहुत पढ़ता रहता। आचार्योंसे चर्चा में भी आगे ही रहता था। सुहृत पढ़ने में तो साधारण था पर कुलगुरु का बड़ा प्रिय था। वे अक्सर कहा करते थे कि ये तो धर्म का मर्म जानता है। दोनों गहरे मित्र थे। फिर भी सुकृत के मन में बार बार आता था कि ऐसा क्या है जो सुहृत को गुरुजी का प्रिय बनाये हुए है। मैने सारे धर्मशास्त्र पढ़ लिये है मित्र से अधिक सुत्र मुझे याद है पर फिर भी सम्भवतः मर्म को मै नहीं जान पाया। ये मर्म क्या है? एक बार किसी अत्यावश्यक कार्य से सुकृत को पास के किसी नगर भेजा गया। जाने से पहले उसने सुहृत को कहा कि वो भी साथ चले ताकि साधन भजन में सहायता हो जायेगी। सुहृत ने जो उत्तर दिया उससे स्पष्ट हो गया कि वो क्यों सबका प्रिय है। उसने कहा, ‘मै साथ तो चल सकता हूँ। भजन जप भी साथ में कर सकता हूँ किन्तु सहायता कि कोई सम्भावना नहीं है। इस मामले में कोई किसी की सहायता नहीं कर सकता। ना गुरु ना शास्त्र ना मित्र। ये सब अधिक से अधिक साधना का पथ बता सकते है पर चलना तो स्वयं को ही पड़ेगा। स्वयं के चलने से ही लक्ष्य तक पहुँचेंगे।’ यही है धर्म का मर्म – ‘हम स्वयं ही अपने सहायक है।’ और हाँ गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते है अपने शत्रु भी हम आप ही है। आत्मैव आत्मनो बन्धुः आत्मैव रिपुरात्मनः।
चरित्र गठन की प्रक्रिया को समझने में हमने भी अभी तक के अध्यायों में ये देखा की जीवन का निश्चित उद्देश्य है, लक्ष्य है। यह प्रत्येक का अपना अलग अलग है, अद्वितीय है। एक दिव्य तत्व से ही उपजे ओर जुड़े इस संसार में प्रत्येक की भुमिका अपने आप में विशिष्ट है ओर उसे पहचान कर निभाने में ही जीवन की सार्थकता है। ये भी कि हमारा जीवन अपनी ही बड़ी इकाईयों से जुड़ा होने के कारण हमें अपना जीवनध्येय और कार्य अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के ध्येय व कार्य के अनुरूप रखना होगा। इससे चरित्र गठन में सहजता भी होगी और हमारी उपलब्धियों की पूरे विश्व में सार्थकता भी होगी। पर इस सबको करने के लिये हमारा एकमात्र साधन है हमारा अपना व्यक्तित्व। यही हमारा वाहन है जो हमें गन्तव्य तक पहुँचायेगा। यही हमारा अस्त्र है जिससे हमें लक्ष्यवेध करना है।
हमारे व्यक्तित्व के विकास के बारे में विचार करते समय हमने सबसे पहले आंतरिक उपकरणों पर विचार किया था। हनुमानजी की जलधि लांघती छलांग से हमने देखा था कि प्रेरणा, वीरता, ध्यैर्य और विवेक इनके बल पर हम भी अपने जीवन सागर को और उसमें आने वाली समस्त बाधाओं को लीलया-खेल खेल में पार कर सकते है। आप जैसे आधुनिक साथी पूछना चाहेंगे कि ये सब तो ठीक है किन्तु इन आंतरिक उपकरणों का विकास कैसे किया जाये? तो हनुमानजी को ही पूछते है कि इतना कठिन कार्य उन्होंने कैसे कर लिया? जब वानरदल माता सीता के खोज का शुभसमाचार लेकर किष्किंधा पहुँचां तो महाराज सुग्रीव के साथ सब रामजी के पास पहुँचे। सारा समाचार सुनकर भगवान का हृदय बजरंग बली के प्रति प्रेम से भर आया और वो उनसे सारा वृत्त विस्तार से समझना चाहते थे। कैसे महाबली रावण की लंका को भस्मसात् कर आये। हनुमानजी सारा श्रेय श्रीराम को ही देते है। प्रभु इसमें मेरी कोई बढ़ाई नहीं है यह सब आपका ही प्रभाव है। मै तो क्या कर सकता हूँ जन्म का बन्दर हूँ शाखा से शाखा जाते रहता हूँ वैसे ही छलांग वहाँ भी लगा दी। इस उत्तर में व्यक्तित्व के आंतरिक विकास का रहस्य छिपा है।
स्वामी विवेकानन्द जी कहते है, ‘‘अन्तःकरण में सारे चमत्कारों की सम्भावना है और इस चमत्कारी शक्ति का रहस्य है श्रद्धा! श्रद्धावान् मनुष्य बाधाओं के हिमालय सहज पार कर लेता है। समुद्र को पी जाने की शक्ति रखता है। नचिकेता के समान हँसते हँसते मृत्यु का सामना कर लेता है।’’ महावीर हुनमान के अलावा कठोपनिषद् का वीर हिरो नचिकेता स्वामीजी का प्रिय आदर्श था। वे कहा करते थे, ‘मुझे 100 नचिकेता दे दो और मै विश्व का कायापालट कर दूंगा।’
इस 10 वर्षीय बालक नचिकेता के जीवन को समझने से हम श्रद्धा के जागरण का तन्त्र समझ सकते है। बालक के पिता वाजश्रवा माने हुवे ऋषि है और समय समय पर बड़े बड़े सर्वस्व त्यागी महायज्ञ करते रहते है। और इसी के लिये ख्यातिप्राप्त है। एक समय के यज्ञ में बालक नचिकेता पिता का भ्रष्टाचार देख कर विचलित होता है। वो देखता है कि अपने पूज्य पिता ब्राह्मणों को मृतप्राय गायें दान में दे रहे है। पीतोदका, जितना पानी पीना था पी लिया, दग्धतृणा, अब घास भी खाने की शक्ति जिनमें नहीं बची और वन्ध्या, जो बांझ है; ऐसी पूर्णतः निरुपयागी गायों का दान तो याचक का बोझ बढ़ाना है। ममता के कारण तटस्थ रहने के स्थान पर बालक नचिकेता श्रद्धा से भर गया। श्रद्धा से प्रेरणा पा कर वह पिता से प्रश्न पूछने का साहस कर पाता है। पर अपना ध्यैर्य और विवेक नहीं खोता। पिता पर आरोप नहीं लगाता केवल उनसे विनम्रता से प्रश्न पूछता है।
महायोगी अरविन्द कहते है, ‘श्रद्धा प्रश्नहीन विश्वास नहीं है। अन्ध अनुकरण नहीं है। श्रद्धा तो प्रश्न पूछने का साहस प्रदान करती है। अपने आप से और अपनों से ‘समाधान अवश्य मिलेगा’ इस विश्वास के साथ प्रश्न पूछना श्रद्धा है।’ तो श्रद्धा का पहला अंग है ‘आत्मावलोकन’। श्रद्धावान् स्वयं का यथातथ्य आकलन करता है। श्रद्धा से आविष्ट नचिकेता भी पिता से संवाद यहाँ से ही प्रारम्भ करता है- मै बहुतों से बढ़कर हूँ और बहुतों से कम भी हूँ। मै ना तो सर्वप्रथम हूँ पर नाही अंतिम। अर्थात मै कुछ तो योग्य हूँ। आप मूझे किसे दान देंगे? यह आत्मावलोकन है। वृथा अभिमान नहीं कि मै धर्म जानता हूँ, आप गलत है। कोई अभिमान नहीं। पर झूठी विनम्रता के नाम पर स्वयं का अवमूल्यन भी नहीं। नियमित आत्मावलोकन से आत्मविश्वास जगता है जो श्रद्धा के जागरण का माध्यम बनता है।
नचिकेता ने पिता को पूछा तो ऐसे अपने प्रिय सुयोग्य पुत्र को आप किसे दान दोगे। पिता ने सम्भवतः झल्लाकर या टालने के लिये कह दिया, ‘मृत्यवे ते ददामि।’ जैसे गुस्से से कभी माँ कह देती है ना ‘जा मर!’ नचिकेता के पिता ने कह दिया मै तुझे मृत्यु को दान देता हूँ। सुननेवाले सब अवाक् रह जाते है पर श्रद्धावान् नचिकेता अविचल मुस्कुराता सम्मूख आयी चुनौती को स्वीकार करता है और यमनगरी को जाने को तत्पर होता है। श्रद्धा के विकास की वैज्ञानिक तकनिक को समझने के लिये हमें भी नचिकेता के साथ यमराज जिनका दूसरा नाम धर्मराज भी है उनके पास जाना होगा। पर पहले अपनी क्षमता का अवलोकन तो कर लें। निमर्मता से अपना नित्य आत्मावलोकन करना प्रारम्भ कर दे। रोज सोन से पहले अपनी क्षमता का आकलन करें। अपनी दिनचर्या का अवलोकन कर पूछे स्वयं से श्रद्धा के जागरण के लिये ‘क्या हम तत्पर है?’

दिसम्बर 20, 2011 Posted by | आलेख | , , | 8 टिप्पणियाँ

तुम सा नहीं देखा ….

गढ़े जीवन अपना अपना -5

चार्ल्स  की उर्जा को दिशा देना उसकी माँ के बस का नहीं था। 10 साल का बालक और इतने प्रश्न। माँ ने अपने भाई के पास चार्ल्स को भेज दिया। मामा एक चर्च में पादरी थे। बच्चों को काम देना, अनुशसित करना इसका उन्हें बड़ा अनुभव था। वे समझ गये चार्ल्स उस भूत की तरह है जिसे काम में न लगा पाये तो लगातार प्रश्न ही पूछता रहेगा। उन्होंने चर्च के ग्रंथालय में बकाया कामो में चार्ल्स को लगा दिया। कपाटों की सफाई, ग्रंथों का रखरखाव ऐसे अनेक काम थे उनके पास। पर चार्ल्स तो चार-चार मजदूरों का काम अकेले कर जाता। मामा ने जिस काम के लिए महीने भर की छुट्टियों का समय तय किया था, चार्ल्स ने उसे एक सप्ताह में ही पूरा कर दिया।

अब मामा के सामने समस्या थी। भांजा खाली था और खाली दिमाग तो शैतान का घर होता है। इस शैतान के पास तो प्रश्नों की  खदान थी। पादरी मामा जहाँ जाते वहीं उनके पीछे पहुँच जाता और तरह तरह के प्रश्न पूछता रहता। मामा ने चार्ल्स को व्यस्त रखने के लिए अनूठा काम दे दिया। ‘जाओ बगीचे में से किसी भी पेड़ के दो पत्ते ले  आओ। हाँ! दोनों बिल्कुल एक जैसे होने चाहिए। कोई  भी अंतर नहीं।’ चाल्र्स को लगा ये तो बड़ा सरल काम है। दौड़ कर बगीचे में गया और एक जैसे दिखने वाले दो पत्ते ले आया। मामा ने गौर से देखा और अंतर ढूँढ लिया। सिलसिला चल पड़ा। चार्ल्स पत्ते ले आता और मामा कोई न कोई अंतर दिखा ही देते। किसी की डंठल में भेद था तो किसी का आकार, किसी का रंग गहरा होता तो कभी शिराओं की रचना भिन्न निकल आती।

अब चार्ल्स सुबह से शाम तक बाग में अटका रहता। उसने मामा के पास भी जाना बंद कर दिया। अब वो स्वयं ही कोई न कोई अंतर पकड़ लेता। अब तो ये खेल हो गया कि एक समान लगने वाले पत्तों में अंतर ढूँढों। खेल-खेल में चार्ल्स को सृष्टि के अद्भुत नियम का साक्षात्कार हुआ। विश्व में लाखों पत्तें हैं। लाखों पेड़ पर कोई भी दो एक से नहीं हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपने आप में अद्वितीय है। ईश्वर की ईस अनुपम सर्जनात्मकता का आनंद लेते लेते चार्ल्स सोचने लगा इसके रहस्य के बारे में। इस सृष्टि की अद्वितीय रचना के बारे में। उसके चिंतन में उसे तो विशेष बना ही दिया। यही चार्ल्स बड़ा होकर -‘विकासक्रम के सिद्धांत’  –  Theory of Evolution का जनक चार्ल्स डार्विन बना। हाँ! वही डार्विन जिसने बंदरों को हमारा पूर्वज बताया।

हमारी रूचि डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत में नहीं है पर उसके बचपन के अनुभव ने सिखाए सृष्टि के शाश्वत सिद्धांत में अवश्य है। जब पेड़ के दो पत्ते एक जैसे नहीं होते, विश्व की 6 अरब आबादी में से किन्ही भी दो लोगों की उंगलियों के निशान भी एक दुसरे से नहीं मिलते; केवल अभी जीवित है उनके ही नहीं जो मर गये उनके भी। तो इन सब तथ्यों से ये तो स्पष्ट हुआ कि हम में से प्रत्येक अपने आप में अद्वितीय हैं। अतः जीवन का ध्येय व लक्ष्य निर्धारित करते समय किसी और जैसा बनाने का विचार तो बेमानी ही है। जब हम अद्वितीय ही हैं तो हमें अपने स्वयं के ही वैशिष्ठ्य को खोजना होगा ना?

यह अद्वितीय होना नाक नक्श या उंगुलियों के निशान जैसी शारीरिक बनावट तक सिमित नहीं है, तो हमारे जीवन का उद्देश्य अद्वितीय है। इस विशिष्ट उद्देश्य के लिए केवल हमारा ही जन्म हुआ है। पर इतराने की कोई बात नहीं क्योंकि जितने अद्वितीय हम है उतने ही अन्य सभी है। हाँ इसी कारण जीवन की इस अद्भुत लीला में हमारी भूमिका अद्वितीय है। जिस प्रकार शरीर के प्रत्येक अंग का अपना कार्य है उसी प्रकार हमारा भी कार्य अद्वितीय है।

हमारा जीवन ध्येय व कर्मक्षेत्र इस अद्वितीय उद्देश्य की प्राप्ति के लिए, अद्वितीय भूमिका को निभाने अपने अद्वितीय कार्य को करने का माध्यम होगा। अतः आत्मविश्वास से ये जान ले कि कोई हमें कुछ भी कहे पर सृष्टि का सिद्धांत तो ये ही कह रहा है – ‘तुम सा नहीं देखा’।

नवम्बर 3, 2011 Posted by | आलेख | , | 10 टिप्पणियाँ

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