उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

अंग भी पूर्ण है


गढ़े जीवन अपना अपना -4
एक बार शरीर के सारे अंगों में विवाद हो गया। पांव कहने कहने लगे ‘हम ही श्रेष्ठ है। हमारे आधार पर ही तो सारा शरीर खड़ा होता है।’ हाथ कहने लगे ‘हम तो सारा काम करते है। हमारे कार्य से ही कमाई होती है। कमाई से पोषण। हम ही सर्वश्रेष्ठ है।’ पेट ने अपना तर्क दिया ‘मैं भोजन ना पचाऊ तो सबकी बैटरी डाऊन हो जाएगी।’ हृदय ने कहा, ‘मैं धड़कना बन्द कर दूं क्या?’ मस्तिष्क कह उठा ‘सब मेरे नियत्रंण से ही संचालित होता है। मैं ही सबका राजा हूं।’ फेफड़ों ने कहा कुछ नहीं एक क्षण रूक गये। श्वास रूकी और सब परेशान। सारे अंग अपनी-अपनी श्रेष्ठता साबित करने में लग गये। कहानी का अंत तो लेखक ने किया आत्मा के विधान द्वारा आत्मा घर छोड़ जाने लगी तो सबकी शक्ति क्षीण हो गई। सब कहने लगे आत्मा ही श्रेष्ठ है क्योंकि इसके बिना तो किसी का कोई अस्तित्व ही नहीं है। किन्तु आत्मा ने कहा ‘आप सभी अपने आप में श्रेष्ठ हो। प्रत्येक अपने अपने कार्य में श्रेष्ठ है। सब अपना कार्य व्यवस्थित करेंगे। तभी शरीर अपना काम कर सकेगा।’ अंगों का कार्य तथा ध्येय पूरे शरीर के अनुरूप होगा तभी उसका महत्व है। शरीर को जहां जाना है पैरों को उसी दिशा में चलना होगा। अन्यथा पैरों का कार्य निरर्थक ही होगा। अंगों की सार्थकता पूरे शरीर के लक्ष्य-पूर्ति में हैं।
अब हम स्वयं को देखें। हमारा अपना एक सर्वश्रेष्ठ भाव है। जैसे पैरों का कार्य हाथ नहीं कर सकते वैसे यदि हम अपने स्वभाव एवं क्षमता के अनुसार जीवन ध्येय चुनेंगे तो सहज सफलता प्राप्त होगी। हमारी क्षमता व रूचि का मेल होता है उसी के अनुसार हमें काम में आनन्द आता है। पूर्व में जो वर्णव्यवस्था थी वह इसी प्रकार गुण-कर्म पर आधारित थी। आज भी यदि हम अपना जीवनध्येय वैज्ञानिक तरीके से तय करना चाहते है तो हमें अपने स्वभाव का वर्ण पहचानना होगा। हमें आनन्द यदि सेवा में आता है तो उसके अनुसार हमें जीवनध्येय चुनना होगा। यदि हमें लाभ प्राप्ति में रस आता है तो हम व्यापारादि उत्पादक कार्यों में अपना जीवनध्येय तय कर सकते है। शारीरिक बल अथवा नेतृत्व में सहजता से रमनेवाले व्यक्ति को रक्षासेवा, प्रशासनिक सेवा अथवा राजनैतिक सेवा का चयन करना उपयोगी होगा। अन्ततः यदि अध्ययन, अनुसंधान या कला संगीत में रूचि हो उसके अनुसार जीवनध्येय बनाने से सहज सफलता मिलेगी।
इस विचार के बाद भी एक बात बच ही जाती है। केवल अपने स्वभाव एवं शक्ति का निर्णय कर लेने से काम नहीं चलेगा। समग्रता से भी विचार करना होगा। जैसे हाथ-पांव आदि हमारे शरीर के अंग है उसी प्रकार हम भी तो राष्ट्रपुरूष के अंग है। भारतमाता के हम अंग है अतः हमारा जीवनध्येय मां भारती के जीवनधर्म के अनुकुल होगा तब ही वह उपयोगी होगा। स्वामी विवेकानन्द कहते है कि भारत का जीवनध्येय (मिशन) है विश्व का मार्गदर्शन करना। हम भारत को विश्वगुरू के पद पर आसीन देखना चाहते है। हमारा जीवनध्येय, कर्म और व्यवसाय चुनते समय हम यदि इस बात का ध्यान रखे तो हमारी सफलता राष्ट्र-सेवा का माध्यम बनेगी और यह भाव कर्म की विशेष प्रेरणा देगा।

एक और बात…
व्यावसायिक लक्ष्य को ही जीवनध्येय न मान बैठे। प्रतिवर्ष लाखों छात्र पीईटी, पीएमटी अथवा आईआईटी की प्रतियोगी परीक्षा में बैठते है। कुछ ही सफल होते है। असफलता छात्र निराशा व हताशा के शिकार हो जाते है। हमने इंजिनियर व डाॅक्टर बनने के व्यावसायिक लक्ष्य को ही जीवनध्येय मान लिया है। व्यवसाय तो साधन है। हमें मुम्बई जाना है। रेल के आरक्षण की लाईन में लगे है। आरक्षण नहीं मिला तो क्या जाना रूक जाएगा? किसी और साधन से चले जाएंगे। हमें अपना ध्येय स्पष्ट होना चाहिए फिर साधन पाने की सफलता अथवा असफलता से निराशा नहीं होगी। डॉक्टर बनना, सीए बनना तो साधन है साध्य अलग-अलग हो सकते है। एक डॉक्टर बनकर सेवा करना चाहता है, दुसरा पैसा कमाना, कोई नया अनुसंधान करना। यदि ध्येय स्पष्ट है तो पी एम टी में असफल रहने पर भी सेवा करने, पैसा कमाने अथवा अनुसंधान करने के वैकल्पिक रास्तों पर विचार किया जा सकता है। दूसरी ओर ध्येय स्पष्ट नहीं हो और केवल भेड़चाल में व्यवसायिक लक्ष्य प्राप्त भी कर लिया तब भी जीवन में संतोष नहीं मिल पाएगा। अतः व्यावसायिक लक्ष्यप्राप्ति पर चिंतन करते समय ही उसके द्वारा प्राप्त करने के जीवनध्येय पर भी ध्यान दें। दोनों स्पष्ट हो जाने पर राह सुगम और आनन्दमय हो जाती है।
एक व्यक्ति ने घर पहूंचकर अपनी पत्नि को कहा, ‘आज मैंने पांच रुपये बचाये।’ ‘कैसे?’ ‘मैं बस के पीछे दौड़ता चला आया।’ पत्नि ने कहा, ‘कल टैक्सी के पीछे दौड़कर आना पच्चीस रुपये बचेंगे।’
साधन का मूल्य सुविधा नहीं, पहुंचना है। क्या बड़े व्यवसाय के पीछे भागकर ज्यादा लाभ मिलेगा? उसी प्रकार एक बार ध्येय, मार्ग और वाहन तीनों का चयन कर लेने के बाद फिर जल्दबाजी या तनाव का क्या काम? रेल गाड़ी में चढ़ जाने के बाद भी यदि कोई अपना सामान सिर पर उठाये रखे तो उसे क्या कहेंगे? या फिर कोई रेल में चढ़ने के बाद भी इंजिन की दिशा में दौड़ता रहे तो क्या जल्दी पहुंच जाएगा?

अक्टूबर 28, 2011 Posted by | आलेख | , , , | 2 टिप्पणियाँ

एक खोज अंदर की ओर ……………….


एक देश सारे विश्व मे विख्यात था। किसी पत्रकार ने सोचा इसकी ख्याति का रहस्य खोजा जाय। जब वह अपनी खोजबीन के लिये उस देश मे पहुंचा तो उसे पता चला की एक प्रान्त के कारण वह सारे विश्व मे प्रसिद्ध था। वह उस प्रान्त में गया तब उसने पाया कि वहां एक जिला है जिसके कारण वह प्रान्त देश में, देश विश्व में विख्यात है। जिले के मुख्यालय पहुचने पर उसे एक गाँव का पता बता दिया गया जिसके कारण जिला प्रान्त में, प्रान्त देश में व देश विश्व में नामवर था। गाँव में भी एक मोहल्ला व मोहल्ले में एक मंदिर जिसके कारण गाँव जिले में, जिला प्रान्त में, प्रान्त देश में और देश सारे विश्व में प्रसिद्ध थे।

मंदिर के गर्भगृह में तो मूर्ति होगी ही। उस मूर्ति की ही प्रतिष्ठा थी जो ख्याति की सुगन्ध सभी भौगोलिक स्तरों पर फैला रही थी। पत्रकार जब गर्भागार में पहुंचा तब उसे बड़ा दुःख हुआ। मूर्ति हल्दी कुमकुम तथा अन्य पूजा सामग्री की परतों से ढकी हुई थी। पुजारी तथा अन्य भक्तगण भी उस देवता का नाम नहीं बता पाये जिसने उस मंदिर को विश्वभर में प्रसिद्ध कर दिया था। पत्रकार बड़ा जीवट का खोजी था। उसने पूजा सामग्री की परतों को खोलना प्रारंभ किया। परत दर परत उसकी संकल्प शक्ति की परीक्षा हो रही थी। वह बड़ी लगन से अपने कार्य में  लगा रहा। कुदेरते-कुदेरते जब वह तह तक पहुंचा, जब सारा आवरण हटा दिया तब उसके आश्चर्य की सीमा ही न रही। वहां कोई मूर्ति थी ही नहीं। था एक दर्पण, शीशा, आईना।

सदियों पूर्व हमारे पूर्वजों ने मंदिर में पूजास्थल की स्थापना की थी। दर्पण जो हमें अपने अंदर झाँकने की प्रेरणा देता है। अपने आप का परिक्षण करने की प्रेरणा देता है। ईश्वर तो हमारे अंदर ही है। उसे खोजना भी अंदर ही है अतः  आत्मस्वरूप का पूजन ही सच्चे अर्थ में पूजा है। मंदिर का अर्थ यही है की हम अपने आप को पहचानना प्रारम्भ करें। मूर्ति के रूप में एक शीशा हो या न हो मंदिर में हम जाते अपने आप के दर्शन हेतु ही। भगवान के दर्शन करना तो निमित्तमात्र है।
दिल्ली में एक गरीब मजदूर रहता था। दिनभर 100-100 किलो अनाज के बोरे उठाता-ठेला चलाता तब शाम तक रु 90-100  कमाता। कभी कबार  एकाध  बोरे की फेरी ज्यादा कर ले तो रु 20-25 अधिक मिल जाते थे। उसी रोजी में से घर की रोटी, बच्चों की पढाई, कपडे सब चलाता था। फिर भी घर में छोटे से कोने में स्थापित मंदिर में रोज कुछ न कुछ चढ़ाता था। जब अधिक रोजी मिलती तो फिर उस दिन तो दानपात्र में रु 20-25 भी डल जाते थे। पत्नी पूछती – भगवान के पास तो सबकुछ है फिर आप उन्हें क्यों देते रहते हो? बच्चों के दो कपड़े अच्छे आ जायेंगे। कभी किसी दिन फल ही खाने को मिलेंगे। वह चुप रहता हँस देता। बचत का क्रम जारी रहता।

उसके मन में दढ़ संकल्प था। वह पर्याप्त बचत के बाद वैष्णौ देवी जाना चाहता था। वर्षों तक मेहनत कर, अपने और अपने बच्चों की सुविधाओं में कटौती  कर इसी एक आस में बचत कर रहा था। जब पर्याप्त राशी जुट गयी तो सबको लेकर कटरा गया कटरा से पैदल पहाड़ी चढ़ना। 14 किमी. की चढाई नाचते – गाते भक्तों के साथ पार हो गई। जय माता दी का घोष कानों में ही नहीं मन में भी गूँज रहा था। सारे वातावरण में यही स्वर थे -मै भी बोलू जय माता दी -तुम भी बोलो जय माता दी। सब मिल के बोलो,  प्रेम से बोलो, जोर से बोलो, गाते बोलो, नाचते बोलो, आते बोलो, जाते बोलो -जय माता दी।

सब अजनबी पर एक दुसरे से प्रेम से अभिवादन करते जय माता दी। सबकी ही पहचान है – सब माता के भक्त। सबका लक्ष्य एक ही -पहाडावाली, शेरावाली के दर्शन। अनेक आयु अवस्था के लोग। कोई टट्टू पर तो कोई पालखी में, कोई झूमता, कोई लंगड़ता, कोई लाठी का सहारा लिए पर सब जा रहे एक ही भवन कि ओर माँ के दर्शन करने………..

जब ऊपर मंदिर के बाहर पहुंचा तो शरीर थक के चूर था पर मन में थी एक अनोखी शांति। लम्बी कतार में खड़े प्रतीक्षा, माँ के दर्शन की… इतने वर्षों की मेहनत, त्याग, बचत और आज के भी लम्बे परिश्रम के बाद वो क्षण आ ही गया जब गुफा के अंदर माँ के दरबार में दाखिल हुआ। मूर्ति के सामने खड़े होने की जगह भी कम है और भीड़ के कारण पुजारी खड़े भी नहीं होने देते। केवल चंद क्षण मिलते है माँ के सामने। अपना बहादुर भाई भी खड़ा हुआ गर्भगृह के सामने। एक क्षण ही माँ के रूप को निहारा होगा कि पुजारी बोल उठा-चल आगे चल। कुछ ही क्षण में उसे निकास गुफा कि ओर धकेला जाना था फिर भी उसने हाथ  जोड़े और आँखे मूँद ली।
वर्षों मजदूरी करके संचित धन को खर्च कर वैष्णौ देवी आया। किसलिए? माँ का दर्शन करने… 14 किमी. पहाड़ी पर थका देने वाली यात्रा की, किसलिए? माँ के दर्शन करने। लम्बी कतार में खड़े होकर प्रतीक्षा की किसलिए? माँ के दर्शन करने….
और फिर जब माँ के सामने दो चार क्षण मिले तो उसमे भी कुछ देर के लिए आँखें बंद कर ली। इतना प्रयास इतना परिश्रम….. माँ के दर्शन के लिए फिर….टकटकी लगाकर देखता रहता आँखें क्यों बंद की?
क्योंकि हम माँ के दर्शन करना चाहते हैं। अपने ही अंदर। अपने ही अंतर्मन में। उपनिषदों में वर्णित इतना बड़ा सच हम जानते हैं उस पर अमल कर रहे हैं और फिर भी हम अंजान हैं। अनजाने मे हम मंदिर में हम दर्शन करने जाते हैं तब अपनी आँखें बंद कर लेते हैं। हम अपने अंदर ईश्वर की खोज करते हैं। किन्तु सजगता के आभाव में वह हमारे जीवन पर प्रभाव नहीं डालता। यदि हम इसका अर्थ समझने का प्रयास करेंगे तो पायेंगे कि देवालय, मंदिर तो निमित्त हैं कि हम अपने अंदर कि खोज प्रारम्भ करें।

सितम्बर 17, 2011 Posted by | आलेख | , , , , , , | 4 टिप्पणियाँ

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