उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

मातृ देवो भव ! पितृ देवो भव !!


एक अद्भुत अनुभूति उज्जैन में एक अत्यंत उच्च शिक्षा विभूषित गृहस्थ के घर पर हुई। जिनके घर हम प्रातराश के लिए गए थे वे स्वयं वेद, वेदांग, ज्योतिष के बहुत बड़े विद्वान पंडित हैं तथा एक विश्वविद्यालय में विभागाध्यक्ष हैं। उनके स्वयं के अनेक शिष्य PhD,  बड़े-बड़े विद्वान, पंडित, कर्मकांडी हैं। इनके स्वयं के भी ज्योतिष आदि के प्रयोगों में भी अनेकों को लाभ मिला है। इनके पिताजी भी बहुत बड़े महामहोपाध्याय काशी से विभूषित संस्कृत के विद्वान पद्मश्री से सम्मानित हैं। पिता  की आयु 95 वर्ष, माता की 93 वर्ष, इनके घर जब हम 7-8 कार्यकर्ता कालभैरव आदि के दर्शन करके लगभग 10 बजे पहुँचे, तो पंडित जी ने स्वयं अपने हाथ से परोस कर सबको प्रातराश करवाया। अत्यंत आदर और प्रेम से, अतिथि देवो भव की भारत की संकल्पना को साक्षात् साकार किया। यह अत्यंत आनंददायी अनुभव था।

सबसे बड़ी बात थी अपने वयोवृद्ध माता-पिता के प्रति उनकी श्रद्धा और सम्मान। आज वर्तमान में फिल्मों, नाटकों में दिखाते है कि बड़े-बड़े उच्च पदों पर बैठे पुत्र अपने माता-पिता को अपने घर में इसलिए नहीं रखते हैं कि उनके व्यवहार से वे लज्जास्पद अनुभव करते हैं। माता-पिता घर में आने वाले बड़े अतिथियों के सामने कुछ भी बोल देंगे, कैसे भी आचरण करेंगे, कुछ भी व्यवहार करेंगे, इस कारण उन्हें घर में नहीं रखते हैं। रखते भी हैं तो उनका परिचय देने में कठिनाई अनुभव होती है। ऐसे समय जब केवल नकारात्मक समाचार ही प्रसारित किये जाते है, तब  यह अत्यंत सुखद अनुभूति जिसमें भारतीयता का एक अद्भुत उदाहरण हमें साक्षात् देखने को मिला, को समाज में फैलाना आनंद का विषय है।

स्वयं महापंडित अपने माता-पिता से अत्यंत विनम्रता से बातचीत कर रहे थे। पिताजी को सुनाई नहीं देता है तो वे पास जाकर उनके कान में परिचय दे रहे थे। उनके किसी भी बात को बार-बार पूछने पर बिलकुल बिना झल्लाए, विना कोई चिड़चिड़ाहट दिखाए, अत्यंत संयम के साथ, धैर्य से, प्रेम, स्नेह और आ

दर के साथ अपने माता-पिता के हर प्रश्न का उत्तर उन्होंने दिया। माता जी को सुनाई भी देता है और बोलती भी बहुत अच्छा है, गाती भी अच्छा है। माता जी हम सबसे परिचय ले रही थी, हम सब से बात भी कर रही थी। कुछ हिन्दीभाषी थे, उनसे भी त्रुटिवश वह कभी-कभी मराठी में बात कर रही थी। लेकिन पंडित जी ने कभी भी माँ को नहीं टोका कि अरे उन्हें मराठी नहीं आती। उन्होंने माँ को कुछ नहीं कहा। माँ जो मराठी में बोलती थी, वे हिन्दी में अनुवाद कर बताते थे।

मैंने बिना यह सोचे कि इस आयु में उन्हें सुपाच्य होगा के नहीं, चलेगा की नहीं, माँ से पूछ लिया, “आप लेंगी पोहा?”
माँ ने कहा, “हाँ ले लूँगी।”
पर बाद में जब थाली आयी, पंडित जी ने रोक दिया कि अभी-अभी उनका प्रातराश हो चुका है, यह जानकर ही उन्होंने माँ को नहीं दिया था।
माँ ने पुत्र को 4 बार टोका, “अरे मुझे भी तो दे!”
पुत्र ने कहा, “माँ, आपको अभी नहीं देना है, बाद में दूँगा। आवश्यकता नहीं है अभी।”
मॉं ने कहा भी, “देखो अब तो इ

सके ऊपर ही निर्भर है, ये नहीं देगा तो मैं कैसे खाऊँगी!”

फिर थोड़ी देर बाद माँ ने और ज़ोर देकर कहा, “चलो मुझे भी नहीं दे रहे हो, पिताजी को भी नहीं दे रहे हो, तो तुम ही खा लो सबके साथ!”
7-8 लोग घर में आए हुए हैं, पंडित जी परोस रहे थे इस कारण वे हमारे साथ नहीं ले सकते थे । पर उन्होंने माँ को एक बार भी मना नहीं किया।

माँ ने फिर दो बार, तीन बार कहा तो माँ को कहते, “हाँ माँ, बस अभी लेता हूँ।”, “मैं बाद में इनके जाने के बाद लूंगा।”, “मुझे बहुत ज़्यादा खाना है, आप तो जानती ही हो, मेरी डाइट बहुत ज़्यादा है, ज़्यादा खाता हूँ। इसलिए इनके सामने नहीं खा रहा हूँ।” आदि आदि।
एक बार भी माँ को नहीं कहा, “क्यों आप बार-बार कह रही हो?” झल्लाए नहीं, कुछ नहीं। बहुत प्रेम से, स्नेह से माँ की बातों का उत्तर दिया। माँ का इस आयु में यह बाल हठ – एक श्लोक सुनाऊँ? तुम्हें एक संस्कृत का गीत सुनाऊँ? स्रोत्र सुनाऊँ?
तो पुत्र ने यह नहीं कहा

कि अरे रहने दो माँ, बल्कि पुत्र ने कहा, “हाँ हाँ माँ सुनाओ, वह वाला सुनाओ।

कैसा अद्भुत दृश्य था वह!!
मेरी आँखों में अश्रु आ गए। मुझे स्वयं का अनुभव स्मरण हुआ, मैंने कैसे अपनी माँ से व्यवहार किया। वैसे तो प्रचारक होने के नाते 30 वर्ष से घर में हूँ नहीं। किन्तु जब घर आता-जाता हूँ (नागपुर केंद्र हो जाने से घर में माता-पिता का हालचाल जानने हेतु आना-जाना थोड़ा बढ़ भी गया है), भले ही रात को ना रुकूँ लेकिन आना-जाना तो होता ही है। तो मेरा माँ पर छोटी-छोटी बात पर झल्लाना, अपने मन में तसल्ली देना कि मैं उनके स्वास्थ्य के लिए, उनके भले के लिए ही कह रहा हूँ। लेकिन ज़ोर से बोल देना, अधिकार से बोलना, वह सब वहाँ बैठे-बैठे स्मरण हो रहा था। मैं मन ही मन सोच रहा था की यह आदर्श है, प्रयत्न करना होगा ऐसे बनाने का।

मैंने पूछा, “माँ की आयु क्या है?”
उन्होंने बताया, “93”
माँ ने सुना तो टोक दिया, “नहीं नहीं, अभी अभी 90 पूरा हुआ है, 91 शुरू हुआ है।”
पुत्र ने मॉं को नहीं कहा कि अरे माँ आपको याद नहीं है, पुत्र ने मुस्कुराकर “हाँ हाँ, ठीक है” ऐसा बोलकर, मुस्कुराकर बात को टाल दिया।
जब हम में से एक कार्यकर्ता ने कहा, “अरे आप तो लगती नहीं 90 की भी, आप तो 70-75 की लगती हैं!”
मॉं इस आयु में भी एकदम ऐसी प्रसन्न हुई कि उनका आनंद देखते ही बनता था। ऐसी स्त्री-सुलभ प्रसन्नता हुई उन्हें आयु कम बताने से कि बस पूछो नहीं!
बेटे को कहती, “राजू देख देख, क्या कह रहा है, तू तो बुड्ढी कहता है।”

सारा प्रसंग इतना अद्भुत था, प्रेम में, आदर में, सम्मान में, भारतीय संस्कृति का साक्षात अनुभव किया। मुझे लगता है आज भी सभी घरों में ऐसे ही माता-पिता हैं, सभी घरों में ऐसा ही पुत्र है और ऐसे ही संस्कार हैं। केवल प्रेम से आदर व्यक्त करने की पद्धति सबकी पद्धति कुछ कुछ निराली है। कोई थोड़ा कम झल्लाता है, कोई थोड़ा ज़्यादा झल्लाता है। मैं डॉ. राजराजेश्वर शास्त्री मूसलगांवकर को दंडवत प्रणाम करता हूँ कि वे धैर्य की साक्षात् प्रतिमूर्ति थे, पूरे समय वे एक बार भी नहीं झल्लाए। वैसे उनके सभी शिष्य और साथी जानते हैं कि उनका स्वभाव इतना धैर्यवान नहीं है। उनके रुद्र रूप को बहुत लोगों ने देखा है और ऐसा नहीं है कि वे क्रोधित नहीं होते।

माता-पिता तथा गुरु दोनों हमें मूल्य प्रदान करते हैं, उनका न तो मूल्यांकन किया जाता है, न ही उनके प्रति कोई भी मन में निर्णायक विचार लाया जाता है और न ही उन पर कभी क्रोधित हुआ जाता है अथवा झल्लाया जाता है। यह जो भारतीय संस्कृति की सीख है, यह साक्षात् आचरण में देखने को मिली और मन बड़ा प्रसन्न हुआ, आश्वस्त हुआ कि सनातन संस्कृति शाश्वत है, सनातन है। नित्य नूतन, चिर पुरातन है।

दिसम्बर 5, 2019 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , | 1 टिप्पणी

क्या हम तत्पर है?


गढ़े जीवन अपना अपना -10
एक गुरुकुल में दो शिष्य थे सुहृत और सुकृत। सुकृत बड़ा विद्वान था। जो भी पाठ पढ़ाया जाता तुरन्त याद कर लेता। अतिरिक्त भी बहुत पढ़ता रहता। आचार्योंसे चर्चा में भी आगे ही रहता था। सुहृत पढ़ने में तो साधारण था पर कुलगुरु का बड़ा प्रिय था। वे अक्सर कहा करते थे कि ये तो धर्म का मर्म जानता है। दोनों गहरे मित्र थे। फिर भी सुकृत के मन में बार बार आता था कि ऐसा क्या है जो सुहृत को गुरुजी का प्रिय बनाये हुए है। मैने सारे धर्मशास्त्र पढ़ लिये है मित्र से अधिक सुत्र मुझे याद है पर फिर भी सम्भवतः मर्म को मै नहीं जान पाया। ये मर्म क्या है? एक बार किसी अत्यावश्यक कार्य से सुकृत को पास के किसी नगर भेजा गया। जाने से पहले उसने सुहृत को कहा कि वो भी साथ चले ताकि साधन भजन में सहायता हो जायेगी। सुहृत ने जो उत्तर दिया उससे स्पष्ट हो गया कि वो क्यों सबका प्रिय है। उसने कहा, ‘मै साथ तो चल सकता हूँ। भजन जप भी साथ में कर सकता हूँ किन्तु सहायता कि कोई सम्भावना नहीं है। इस मामले में कोई किसी की सहायता नहीं कर सकता। ना गुरु ना शास्त्र ना मित्र। ये सब अधिक से अधिक साधना का पथ बता सकते है पर चलना तो स्वयं को ही पड़ेगा। स्वयं के चलने से ही लक्ष्य तक पहुँचेंगे।’ यही है धर्म का मर्म – ‘हम स्वयं ही अपने सहायक है।’ और हाँ गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते है अपने शत्रु भी हम आप ही है। आत्मैव आत्मनो बन्धुः आत्मैव रिपुरात्मनः।
चरित्र गठन की प्रक्रिया को समझने में हमने भी अभी तक के अध्यायों में ये देखा की जीवन का निश्चित उद्देश्य है, लक्ष्य है। यह प्रत्येक का अपना अलग अलग है, अद्वितीय है। एक दिव्य तत्व से ही उपजे ओर जुड़े इस संसार में प्रत्येक की भुमिका अपने आप में विशिष्ट है ओर उसे पहचान कर निभाने में ही जीवन की सार्थकता है। ये भी कि हमारा जीवन अपनी ही बड़ी इकाईयों से जुड़ा होने के कारण हमें अपना जीवनध्येय और कार्य अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के ध्येय व कार्य के अनुरूप रखना होगा। इससे चरित्र गठन में सहजता भी होगी और हमारी उपलब्धियों की पूरे विश्व में सार्थकता भी होगी। पर इस सबको करने के लिये हमारा एकमात्र साधन है हमारा अपना व्यक्तित्व। यही हमारा वाहन है जो हमें गन्तव्य तक पहुँचायेगा। यही हमारा अस्त्र है जिससे हमें लक्ष्यवेध करना है।
हमारे व्यक्तित्व के विकास के बारे में विचार करते समय हमने सबसे पहले आंतरिक उपकरणों पर विचार किया था। हनुमानजी की जलधि लांघती छलांग से हमने देखा था कि प्रेरणा, वीरता, ध्यैर्य और विवेक इनके बल पर हम भी अपने जीवन सागर को और उसमें आने वाली समस्त बाधाओं को लीलया-खेल खेल में पार कर सकते है। आप जैसे आधुनिक साथी पूछना चाहेंगे कि ये सब तो ठीक है किन्तु इन आंतरिक उपकरणों का विकास कैसे किया जाये? तो हनुमानजी को ही पूछते है कि इतना कठिन कार्य उन्होंने कैसे कर लिया? जब वानरदल माता सीता के खोज का शुभसमाचार लेकर किष्किंधा पहुँचां तो महाराज सुग्रीव के साथ सब रामजी के पास पहुँचे। सारा समाचार सुनकर भगवान का हृदय बजरंग बली के प्रति प्रेम से भर आया और वो उनसे सारा वृत्त विस्तार से समझना चाहते थे। कैसे महाबली रावण की लंका को भस्मसात् कर आये। हनुमानजी सारा श्रेय श्रीराम को ही देते है। प्रभु इसमें मेरी कोई बढ़ाई नहीं है यह सब आपका ही प्रभाव है। मै तो क्या कर सकता हूँ जन्म का बन्दर हूँ शाखा से शाखा जाते रहता हूँ वैसे ही छलांग वहाँ भी लगा दी। इस उत्तर में व्यक्तित्व के आंतरिक विकास का रहस्य छिपा है।
स्वामी विवेकानन्द जी कहते है, ‘‘अन्तःकरण में सारे चमत्कारों की सम्भावना है और इस चमत्कारी शक्ति का रहस्य है श्रद्धा! श्रद्धावान् मनुष्य बाधाओं के हिमालय सहज पार कर लेता है। समुद्र को पी जाने की शक्ति रखता है। नचिकेता के समान हँसते हँसते मृत्यु का सामना कर लेता है।’’ महावीर हुनमान के अलावा कठोपनिषद् का वीर हिरो नचिकेता स्वामीजी का प्रिय आदर्श था। वे कहा करते थे, ‘मुझे 100 नचिकेता दे दो और मै विश्व का कायापालट कर दूंगा।’
इस 10 वर्षीय बालक नचिकेता के जीवन को समझने से हम श्रद्धा के जागरण का तन्त्र समझ सकते है। बालक के पिता वाजश्रवा माने हुवे ऋषि है और समय समय पर बड़े बड़े सर्वस्व त्यागी महायज्ञ करते रहते है। और इसी के लिये ख्यातिप्राप्त है। एक समय के यज्ञ में बालक नचिकेता पिता का भ्रष्टाचार देख कर विचलित होता है। वो देखता है कि अपने पूज्य पिता ब्राह्मणों को मृतप्राय गायें दान में दे रहे है। पीतोदका, जितना पानी पीना था पी लिया, दग्धतृणा, अब घास भी खाने की शक्ति जिनमें नहीं बची और वन्ध्या, जो बांझ है; ऐसी पूर्णतः निरुपयागी गायों का दान तो याचक का बोझ बढ़ाना है। ममता के कारण तटस्थ रहने के स्थान पर बालक नचिकेता श्रद्धा से भर गया। श्रद्धा से प्रेरणा पा कर वह पिता से प्रश्न पूछने का साहस कर पाता है। पर अपना ध्यैर्य और विवेक नहीं खोता। पिता पर आरोप नहीं लगाता केवल उनसे विनम्रता से प्रश्न पूछता है।
महायोगी अरविन्द कहते है, ‘श्रद्धा प्रश्नहीन विश्वास नहीं है। अन्ध अनुकरण नहीं है। श्रद्धा तो प्रश्न पूछने का साहस प्रदान करती है। अपने आप से और अपनों से ‘समाधान अवश्य मिलेगा’ इस विश्वास के साथ प्रश्न पूछना श्रद्धा है।’ तो श्रद्धा का पहला अंग है ‘आत्मावलोकन’। श्रद्धावान् स्वयं का यथातथ्य आकलन करता है। श्रद्धा से आविष्ट नचिकेता भी पिता से संवाद यहाँ से ही प्रारम्भ करता है- मै बहुतों से बढ़कर हूँ और बहुतों से कम भी हूँ। मै ना तो सर्वप्रथम हूँ पर नाही अंतिम। अर्थात मै कुछ तो योग्य हूँ। आप मूझे किसे दान देंगे? यह आत्मावलोकन है। वृथा अभिमान नहीं कि मै धर्म जानता हूँ, आप गलत है। कोई अभिमान नहीं। पर झूठी विनम्रता के नाम पर स्वयं का अवमूल्यन भी नहीं। नियमित आत्मावलोकन से आत्मविश्वास जगता है जो श्रद्धा के जागरण का माध्यम बनता है।
नचिकेता ने पिता को पूछा तो ऐसे अपने प्रिय सुयोग्य पुत्र को आप किसे दान दोगे। पिता ने सम्भवतः झल्लाकर या टालने के लिये कह दिया, ‘मृत्यवे ते ददामि।’ जैसे गुस्से से कभी माँ कह देती है ना ‘जा मर!’ नचिकेता के पिता ने कह दिया मै तुझे मृत्यु को दान देता हूँ। सुननेवाले सब अवाक् रह जाते है पर श्रद्धावान् नचिकेता अविचल मुस्कुराता सम्मूख आयी चुनौती को स्वीकार करता है और यमनगरी को जाने को तत्पर होता है। श्रद्धा के विकास की वैज्ञानिक तकनिक को समझने के लिये हमें भी नचिकेता के साथ यमराज जिनका दूसरा नाम धर्मराज भी है उनके पास जाना होगा। पर पहले अपनी क्षमता का अवलोकन तो कर लें। निमर्मता से अपना नित्य आत्मावलोकन करना प्रारम्भ कर दे। रोज सोन से पहले अपनी क्षमता का आकलन करें। अपनी दिनचर्या का अवलोकन कर पूछे स्वयं से श्रद्धा के जागरण के लिये ‘क्या हम तत्पर है?’

दिसम्बर 20, 2011 Posted by | आलेख | , , | 8 टिप्पणियाँ

   

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