उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

क्रांतिकारी कृष्ण


इस वर्ष जन्माष्टमी का पर्व अगस्त क्रांति के दिनांक पर आ रहा है। 9 अगस्त को सच्चे अर्थ में क्रांति दिवस मनाया जाना चाहिये अथवा नहीं इस पर विवाद हो सकता है किन्तु इस बात पर कोई दुमत नहीं हो सकता कि कृष्ण का तो पूरा जीवन ही क्रांतिकारी है। उन्होंने प्रस्थापित को पूरी तरह से बदल डाला। यह परिवर्तन अपनी किसी अलौकिक दैवी शक्ति का प्रयोग कर चमत्कार के द्वारा नही किया अपितु समाज के जागरण के द्वारा सामूहिक शक्ति के सुनियोजित प्रयोग के माध्यम से यह परिवर्तन घटित किया गया। इसलिये वे सामाजिक क्रांतिकारियों के आदर्श कहे जा सकते है। उनके जीवन से हम सफल सामाजिक क्रांति के लिये आवश्यक तत्वों को समझ सकते हैं।

श्रीकृष्ण के जीवन के तीन स्पष्ट भाग हैं। नंदग्राम की लीलाओं से लेकर कंसवध तक का प्रथम भाग मूलतः असुरों के दमन का है। पुतना से प्रारम्भ कर कालिया मर्दन सहित अनेक राक्षसों के निःपात के बाद चाणूर तक पूरा बाल्यकाल इस संघर्ष का साक्षी है। जरासंध के मथुरापर सतत आक्रमण के बाद रणछोड़दास का दोष लेते हुए द्वारिका गमन तथा वहाँ पर शून्य से प्रारम्भ कर स्वयं हल चलाकर स्वर्णीम राज्य का निर्माण यह रचनात्मक सृजन का कालखण्ड। तीसरा कालखण्ड है महाभारत का – पूर्ण व्यवस्था का परिवर्तन। गीता का सिद्धान्त इस धर्मराज्य की स्थापना का आधार है।

वर्तमान समय मे भी यह तीनों कार्य सफल क्रांति तथा पूर्ण व्यवस्था परिवर्तन के लिये आवश्यक है। भ्रष्टाचारियों के विरूद्ध लड़ाई असुर निर्दालन के समान ही है। आज के कंस-चाणूरों का मर्दन भी आवश्यक है। पुतना बनकर आये सम्बंधियों को भी सबक सिखाना होगा और धरति के संसाधनों में विष फैलाते कालिया की फन पर नृत्य भी करना होगा। कंस के गुण्डों के पोषण हेतु मथुरा जा रहे दूध-दही की मटकियों को फोड़ अपने गोपबालों का पोषण करने की सहज बाललीला भी आज अनिवार्य है। काले धन के प्रवाह को रोकना तथा इसे पुनः देश में लाकर स्वदेशी संसाधनों के स्वदेश विकास में प्रयोग की क्रांति ही कान्हा की दहीहांडी का संदेश है। द्वारिका की रचना पूरे समाज को सुखी करनेवाले विकास की व्यवस्था का एक छोटे स्तर पर प्रयोग है। आज अनेक संगठन अपने अपने स्तर पर ऐसे प्रयोग कर रहे है। राजकीय स्तर पर गुजरात में विकसित विकास के प्रादर्श को भी इसी रूप में देखा जा सकता है। पाण्डवों को स्थापित करने महाभारत के युद्ध का सारथी बन निर्देशन तथा उसके तात्विक आधार को स्पष्ट करता गीता का आख्यान आज की आवश्यकता है। यह निर्णायक धर्मयुद्ध धर्माधारित राज्य की स्थापना के लिये अनिवार्य है। पर युद्ध से पूर्व आज के समय के अनुसार क्रांतिगीता की रचना भी आवश्यक है। वर्तमान व्यवस्था परिवर्तन में रत क्रांतिकारी इस मुख्य चरण की ओर ध्यान नहीं दे रहे इसी कारण सारे प्रयास अधुरे ही सिद्ध हो रहे हैं। वर्तमान समय के अनुरूप सनातन सिद्धान्तों की व्याख्या कर युगानुकुल गीता की रचना के द्वारा ही व्यवस्था परिवर्तन का संघर्ष अपने अंतिम युद्ध में सफल हो सकता है।

क्रांति पथ के इस अनुपम मार्गदर्शन के साथ ही क्रांति की कार्यपद्धति के बारे में भी संकेत भगवान कृष्ण के जीवन से हमें प्राप्त होते हैं। सभी संघर्षों में उनकी भौतिक शक्ति विरोधी के सामने कम ही थी। चाणूर मुष्टिक के सामने कान्हा-दाउ तो सुकुमार बालक ही थे। जरासंध से संरक्षित कंस के सम्मूख विस्थापित कृष्ण और उसकी गोपसेना का बल था ही क्या? महाभारत में भी कौरवों की 11 अक्षोहिणी सेना का सामना पाण्डवों की सात अक्षोहिणी सेना को करना था। महारथियों की सुचि भी ऐसीही विषम थी। सारे जीवन श्रीकृष्ण ने संख्या व संसाधनों में कमजोर होते हुए भी अपने से कई गुना बलशाली शत्रु का निर्दालन किया। केवल सत्य व धर्म के अपने पक्ष में होने के आदर्शवाद के सहारे ही नहीं अपितु व्यावहारिक चतुराई के द्वारा यह विजय सम्भव हुई। अतः क्रांति का पहला पाठ जो कृष्ण के जीवन से हम पढ़ सकते है वह है – युक्ति से शक्ति का सामना। कालयवन का मारना उनके बस में नही था तो भाग कर चतुराई से उसे उस गुफा में ले गये जहाँ मुचकुन्द तपस्या कर रहे थे। कालयवन द्वारा तपस्या भंग किये जाने पर मुचकुन्द के तपोबल से वह भस्म हुआ। मुचकुन्द ने कृष्ण को श्राप दिया कि उसे रणछोड़ का लांछन प्राप्त होगा। धर्म व समाज के भले के लिये कन्हाई ने इस लांछन को भी गर्व से धारण किया। महाभारत में तो पार्थसारथी की युक्तियों के बिना धर्म की विजय सम्भव ही नहीं होती। जयद्रथ, द्रोण, भीष्म, कर्ण, घटोत्कच के वध तथा अंत में दुर्योधन की जंघा का मर्दन होने तक सब प्रसंगों में कृष्ण की व्यावहारिक नीतियों ने पाण्डवों की सुनिश्चित हार को विजय में परिवर्तित किया। कृष्णनीति में साध्य की शुद्धता को अधिक महत्व दिया गया। यदि साध्य धर्म के अनुसार है तो उसकी प्राप्ति में लगनेवाले साधन की शुद्धता पर अति मीन मेख करना कृष्णनीति का अंग नहीं है। द्रोण को शोकाकुल करने ‘अश्वत्थामा हतः’ का अर्धसत्य बोलने के लिये धर्मराज को तत्पर करना अथवा दलदल में फँसे रथचक्र में उलझे कर्ण पर बाण चलाने के लिये अर्जुन को प्रेरित करने में पार्थसारथी ने दिखा दिया कि खोखली नैतिकता से स्वयं के हाथ बांधकर दमनकारी राक्षसों नहीं लड़ा जा सकता। इस व्यावहारिकता के साथ क्रांति की रचना करना आज अत्यावश्यक है। सभी अधर्मी षड़यन्त्रों से राज्य कर रहे दुष्टों का सामना केवल आदर्शवाद के सहारे करना असम्भव ही लगता है।
क्रांतिकारी कृष्ण के आंदोलन का दूसरा महत्वपूर्ण पाठ है — सामान्य जन के आत्मबल को जागृत कर पूरे समाज को क्रांति में सम्मिलित करना। नंदग्राम में सामान्य गोपबालों को उनके अन्दर के असीम बल के प्रति जागृत कर कंस के शोषण से मुक्ति दिलाने का कार्य कान्हा ने किया। गोवर्धन पूजा के समय इन्द्र के प्रकोप से रक्षा अपनी कनिष्ठिका के बल पर करने का सामाथ्र्य रखने वाले गिरीधारी ने उंगली लगाने से पूर्व सारे गोप-गोपियों को अपनी लाठी का आधार देने के लिये प्रवृत्त किया। सबके सहभाग से ही क्रांति की सफलता सम्भव है। द्वारिका के निर्माण में भी बहुजन समाज के सहभाग से ही रचनात्मक आंदोलन खड़ा किया गया। कृष्ण चरित्र के इस भाग के विस्तार से अध्ययन की आवश्यक है। द्वारिका के वैज्ञानिक निर्माण में वहाँ के स्थानिय समाज का सहभाग भी उतना ही महतवपूर्ण था। अतः सामान्यजन के आत्मबल को जगाना कृष्ण की क्रांति का महत्वपूर्ण घटक है। वर्तमान समय में इस सामूहिक आत्मविश्वास के जागरण की अत्यन्त आवश्यकता है। केवल संख्या जुटाने से जगनेवाले उत्साह को आत्मबल मान लेना ठीक नहीं है। जबतक क्रांति में जुटनेवाला प्रत्येक व्यक्ति निस्वार्थ भाव से अपने अन्दर की शक्ति को जानकर संघर्ष में नहीं जुट जाता क्रांति का समग्र परिणाम सम्भव नहीं है। महाभारत का विनाशकारी युद्ध भी केवल सत्ता परिवर्तन मात्र ही रह जाता यदि गीता के द्वारा धर्म की क्रांतिकारी व्याख्या का प्रतिपादन भगवान् कृष्ण ने नहीं किया होता। गीता जनप्रबोधन का गीत है। जनजागरण के तीन स्तरों को कृष्ण के जीवन से हम सीख सकते है। नन्दलाला के वेणुद्वारा किया गया भावात्मक जागरण, द्वारिका में बलराम के हल के साथ जुट़े समाज के हाथों से क्रियात्मक जागरण व धर्मक्षेत्र कुरूक्षेत्र की रणभूमि में गाये गीता के विशुद्ध तत्वज्ञान द्वारा वैचारिक जागरण। तीनों में से केवल किसी एक के होने से ही क्रांति नहीं हो जाती। मन की संवेदना, बुद्धि की योजना व हाथों के कर्म से ही रचनात्मक क्रांति सुफल होती है।

कृष्ण की क्रांति का तिसरा तत्व है – सकारात्मकता। क्रांति मूल रूप से प्रस्थापित के परिवर्तन के लिये होती है अतः सामान्यतः ऐसे आंदोलनों में प्रतिक्रियावाद का हावी होना स्वाभाविक होता है। किसी के विरोध में लोगों का समर्थन जुटाना भी सहज होता है। शत्रु प्रत्यक्ष होने से संघर्ष भी स्पष्ट होता है। किन्तु प्रतिक्रिया के नकारात्मक विचार की नीव पर खड़ी क्रांति का भवन अधिक समय तक स्थिर नहीं हो सकता। अभावात्मक अथवा नाकारा विचार के लिये किया गया शुभ कर्म भी समग्र तथा स्थायी परिणाम नहीं दे सकता। द्वारिका में पहुँचना भले ही जरासंध के मथुरा पर 17 बार किये आक्रमणों की प्रतिक्रिया थी किन्तु उसके पीछे का भाव मथुरा की जनता की रक्षा ही था। स्वयं पर पलायन का लांछन भले ही लगे किन्तु अपने वैमनस्य के कारण जनता का नुकसान ना हो इस सद्भावना पर आधारित होने के कारण ही यादव राज्य के निर्माण का रचनात्मक आंदोलन सफल रहा। उससे पहले भी नन्दग्राम में किये समरसता के सामाजिक आंदोलन की नीव भी सबके अन्दर विद्यमान देवत्व के जागरण की एकात्मता ही थी। इसीलिये गोवर्द्धन पूजा की पर्यावरण क्रांति के समय भी इन्द्र के साम्राज्यवादी पुंजीवाद का प्रत्यक्ष विरोध ना करते हुए सकारात्मक विकल्प प्रदान कर परिवर्तन किया गया। इसी कारण गोपबालों के आत्मजागरण की क्रांति सफल हो सकी और कंस के वध के बाद भी जनता के कोप का सामना नहीं करना पड़ा। क्रांति का लक्ष्य, वैचारिक आधार व मार्ग तीनों का सकारात्मक होना आवश्यक है। वर्तमान में अधिकतर आंदोलन इस प्रकार का सकारात्मक लक्ष्य ना रख पाने के कारण ही सीमित व अस्थायी सिद्ध हो रहे है। यह कृष्ण की ही विशेषता है कि महाभारत का युद्ध पाण्डवों का प्रतिशोध मात्र होने के स्थान पर धर्मयु़द्ध का सकारात्मक रूप ले सका। भले ही उसके लिये उन्हें स्वय कौरव राजसभा में पाण्डवों के दूत के रूप में पैरवी कर अपमान सहना पड़ा।

क्रांतिकारी कृष्ण की कार्यपद्धति का सबसे महत्वपूर्ण चैथा आयाम है उनका स्वयंका पूर्णतः सत्ता निरपेक्ष होना। कंस के वध के बाद यदि कृष्ण स्वयं राजा बन जाते तो जनता तो उनका स्वागत ही करती किन्तु कृष्ण का जीवन इससे कई गुना उदात्त है। इसी कारण वे कंस के जन्मदाता उग्रसेन को बंदिगृह से मुक्त कर उनका राज्याभिषेक मथुरा के राजा के रूप में करते है। कृष्ण को तो सारी जनता के हृदय पर राज करना है। द्वारिका में भी राज्यस्थापना के बाद वे स्वयं कोई पद ग्रहण नहीं करते है। अपने पिता वसुदेव को यादवराज्य के राजा के रूप में प्रतिष्ठित करते है। महाभारत युद्ध से पूर्व भी बिना किसी पक्षपात के कौरव पाण्डवों दोनों को सहयोग प्रदान करते है। यह निरपेक्षता ही कृष्ण की नैतिक शक्ति है जिसके कारण वे पूरे विश्व के हृदय पर शासन करते है और सही शासक को सत्ता प्रदान कर बाहर से नीतिगत मार्गदर्शन कर सकते है। वर्तमान में भी इसी प्रकार के राजनैतिक आकांक्षाओं से पूर्णतः अलिप्त निःस्वार्थ नैतिक नेतृत्व की क्रांति को प्रतिक्षा है।

आज की जन्माष्टमी हमारे लिये आत्मावलोकन का समुचित अवसर प्रदान करती है। आज जब दैवी असंतोष से पीड़ित जनता भारत में आमूलचूल परिवर्तन के लिये समग्र स्थायी क्रांति के लिये उद्यत है तब हम अपने अन्दर के कन्हाई को जगाये। युक्ति की शक्ति, सर्वसामान्य जन का भावात्मक, क्रियात्मक व वैचारिक जनजागरण, सकारात्मक लक्ष्य तथा सत्ता निरपेक्ष निःस्वार्थ नेतृत्व के चिरंतन तत्वों को आचरण में उतारकर सच्ची क्रांति का निर्धार करे। क्रांतिकारी कृष्ण हमारा नेतृत्व अवश्य करेंगे, पार्थसारथी की गीता हमारा सारथ्य करेगी और कंस चाणूर का मर्दन करनेवाले विश्ववन्द्य जगत्गुरू माँ भारती को पुनःप्रतिष्ठित करने में हमारे साथी बनेंगे।

अगस्त 9, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , | 5 टिप्पणियाँ

भले कर्मकाण्डी बनो! पर मिथ्याचारी नहीं!!


माँ बेटी के साथ बैठकर टी वी देख रही है। भौंडे भौंडे संवाद और वेष सब दोनों एकसाथ देख रही हैं। दादी ने या किसी ने आपत्ति की तो तथाकथित आधुनिक मम्मी का उत्तर था। ‘मै पाखंड (Hypocrisy)  में विश्वास नहीं करती हूँ। मेरे साथ नहीं देखेगी या मे मना भी कर दूँगी तो क्या छिपके नहीं देखेगी?’ बात में तो दम लगता है। पाखण्ड को तो सभी बुरा मानेंगे। पर क्या हमने सोचा है जिसे हम पाखण्ड का नाम दे रहे हे उस ‘लज्जा’ के कारण हमारे समाज में मूल्यों की रक्षा कैसे हुई है? माँ के साथ बैठकर खुलेआम देखने और छिप छिप कर देखने में मन पर संस्कार का अंतर है। पहले प्रसंग में माँ की अनुमति के कारण जो देखा जा रहा है उसका भी अनुमोदन हो रहा है। और इस कारण उसके अनुसरण में भी कोई हिचक नहीं रहेगी। चोरी छिपे देखने में प्रक्रिया में ही बोध निहित है कि जो देखा जा रहा है वह ठीक नहीं है। सामाजिक दृष्टि से वर्जित है। अतः मन में यह विचार कम ही आयेगा कि स्वयं भी ऐसा कुछ करें। युवा अपनी संगत के कारण धुम्रपान करने लगता है। पर संस्कारों के चलते जो ‘आँख की शरम’ के कारण इतनी मर्यादा रखता है कि अपने से बड़ों के सामने धुम्रपान नहीं करता। पिता या उनके समकक्ष कोई दिखने पर धुम्रदण्ड को छिपाने लगता है। अब इस प्रक्रिया में व्यसनमुक्ति की सम्भावना निहित है। पर यदि आधुनिकता व खुलेपन के नाम पर पिता ही युवा पुत्र के साथ बैठकर व्यसनानन्द लेने लगे तो फिर तो सुधार की सम्भावना ही समाप्त। अब बताओ ऐसा पाखण्ड ठीक है या नहीं?
भाषा में पदों के अर्थ तो होते है पर वे अपने आप में अच्छे या बुरे नहीं होते। सन्दर्भ, संस्कृति व कर्म का उद्देश्य तय करेगा कि वह कर्म किस श्रेणी में आयेगा। केवल अच्छे-बुरे का श्वेत-श्याम विभाजन ही नहीं होता, मानव स्वभाव के कई रंग और छटायें होती है। उन्हीं के अनुसार शब्दों के अर्थ होते है। पर गत कुछ वर्षों में हमने शब्दों को भी गुटों में बाँट दिया है। साम्प्रदायिकता का अर्थ था सम्प्रदाय को मानने वाला। यह अत्यन्त सकारात्मक बात थी सम्प्रदाय आपकी आध्यात्मिक साधना को अनुशासित करने का कार्य करते है और सम्प्रदाय का अंग होने के नाते उसके प्रति आपकी निष्ठा अपने आप में एक दायित्व भी होती है। साम्प्रदायिक साधक, गुरू, उपासना और स्थान का भारत में बड़ा सम्मान था। किन्तु पिछले कुछ वर्षों में हमने इस शब्द का अर्थ ही बदल दिया। ऐसी ही स्थिति कर्मकाण्ड की है। साधना में नित्य कर्म का बड़ा ही महत्व है। मन को संस्कारित करने के लिये नियमित रूप से तय कर्म करना अत्यावश्यक होता है। इसी नियमबद्ध उपासना का नाम कर्मकाण्ड है। इसी के द्वारा कठीन समय में साधक की रक्षा होती है। हमारे इतिहास में भी आक्रांताओं के अत्याचारों में जब धर्म का प्रगट पालन भी सम्भव नहीं था तब ज्ञान काण्ड की चर्चा करना तो सोच भी नहीं सकते थे। ऐसे में कर्मकाण्ड ने ही धर्म की रक्षा की। पर गत एक शताब्दी से इस शब्द को हिन्दू धर्म के विकार के रूप में ही प्रयोग किया जाता है और सारी अन्धश्रद्धाओं का पर्यायवाची। बिना अर्थ अथवा पीछे के विज्ञान को जाने केवल कर्मकाण्ड करना सराहनीय निश्चित नहीं है। किन्तु ज्ञान व कर्म दोनों ही ना करने से कुछ एक करना तो अच्छा ही है ना? और जानकर करेंगे तो फिर यह कर्म काण्ड तारक बन जायेगा।
कर्मयोग में कर्म के पीछे के हेतु का बड़ा महत्व होता है। सामान्य जीवन में भी कर्म का महत्व उसके उद्देश्य से ही तय होता है। बड़ा सरल उदाहरण है। एक ही क्रिया – बन्दुक उठाई, निशाना लगाया, घोड़ा दबाया। अगले व्यक्ति के छाति में गोली लगी, तुरन्त प्राण निकल गये। इसी कार्य के लिये एक व्यक्ति को फांसी की सजा दी जाती है तो दूसरे को इसी कार्य के लिये परमवीर चक्र प्रदान किया जाता है। शारीरिक क्रिया भले एक ही हो कर्म अलग अलग था क्योंकि भाव अलग अलग थे। बिना मन के केवल इन्द्रियों से ही तो कर्म नहीं होता। इसी बात को भगवान कृष्ण बड़ी दृढ़ता से बताते है।
तीसरे अध्याय का प्रारम्भ अर्जुन के प्रश्न से हुआ है।
ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव।। गी 3.1।।
जब एक ओर आप बता रहे है कि बुद्धि कर्म से अधिक श्रेष्ठ है तो फिर मुझे क्यों इस घोर कर्म में ढ़केल रहे हो? आगे यहाँ तक भी कह देता हे कि ऐसे मिश्रित वचनों से मुझे भ्रमित क्यों कर रहे हो? इस प्रश्न के उत्तर में भगवान कृष्ण ने कर्मयोग का विवरण प्रारम्भ किया है। निष्क्रियता जीवन का लक्ष्य नहीं हो सकती। ऐसा सम्भव भी नही है, कर्म तो करना ही होगा। केवल कर्मेन्द्रियों का नियन्त्रण कर उनको बन्द कर देने से कर्म नहीं बन्द हो जाता क्योंकि मन तो सोचता ही रहता है ओर सोचना भी तो कर्म है।
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन।
इन्द्रियार्थान् विमूढ़ात्मा मिथ्याचारः स उच्चते।। गी 3.6।।
इसको भगवान् श्रीकृष्ण ने मिथ्याचार कहा है। यह पाखण्ड से घातक है। पाखण्ड दूसरे के प्रति असत्य आचरण है। मिथ्याचार तो स्वयं को ही धोखा देने का प्रयास है। यह तो व्यक्तित्व को ही विभाजित कर देगा। सामान्यतः इन्द्रियों को नियन्त्रित करना कठीन बताया जाता है। पर यहाँ ऐसी स्थिति का वर्णन है जहाँ उपर से कर्मेन्द्रियों को तो रोक लिया है कर्म करने से किन्तु मन के स्तर पर कर्म जारी है। इस मिथ्याचार से बचने के लिये एक उपाय तो हमने देखा है। स्वयं को पूर्ण व्यस्त रखना। अपनी मर्जी से काम करना।
यहाँ मन के संस्कार की बात हो रही है। मन को संस्कारित करना कर्म से भागकर सम्भव नहीं है। अर्जुन इसी भागने की बात कर रहा है और भगवान लड़ने की। दूसरे अध्याय में बताया है – इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः।। गी 2.60।। इन्द्रियाँ बलवान् होती है व मन का भी बलपूर्वक अपहरण करने की क्षमता रखती है। जब इन्द्रियों में मन को खीचने की शक्ति है तब उसी का प्रयोग मन को उपर की ओर ले जाने के लिये क्यों ना किया जाये? पतंग और डोर के समान ये सम्बन्ध है। सामान्यतः पतंग का नियन्त्रण डोर के द्वारा किया जाता है पर हवा का जोर होने पर, यदि पतंग संतुलित हो, तो वह डोर को खींच सकती है। भगवान कह रहे है – तानि सवार्णि संयम्य युक्त आसीत मत्परः।।गी 2.61।। इन इन्द्रियों को संयमित कर मुझमे लगा दो। अब ये करे कैसे?
बड़ा ही सरल सा मार्ग हमारे महापुरुषों ने बताया। जब श्री रामकृष्ण परमहंस को पूछा कि ये काम क्रोधादि रिपुओं, शत्रुओं से कैसे लड़ा जाये। व्यावहारिक एवं सहज उपाय बताने के आदी ठाकुर ने कहा, ‘‘सब विकारों को ईश्वरार्पित कर दो। क्रोध करना है उनपर करों। लोभ, प्रेम, स्नेह करना है उनसे करों।’’ हमने अपनी संस्कृति में यह कर दिखाया। केवल कहा ही नहीं इशवास्यं इदं सर्वं। पर सब विकारों को इश्वरोन्मुखी कर उदात्त कर दिया। बलि के पीछे भी यही तत्व है। मांसाहार करना है तो देवता को अर्पित कर प्रसाद के रुप में ग्रहण करों। बलि प्रथा को अमानवीय कहकर उसका विरोध करने वाले लोग पंचसितारा होटेलों में भोग के लिये कटते लाखों प्राधियों के प्रति दया क्यों नहीं दिखाते। कुछ भैरों मंदिरों में और जनजातीय  परम्पराओं में शराब को भी प्रसाद के रुप में अर्पित कर फिर प्राशन किया जाता है। भोग और उन्माद के लिये सोमपान कर समाज में बलवा करने से तो ये भला ही है। खजुराहों के मंदिरों के शिल्प भी इसी सिद्धान्त का उदाहरण है। काम को इश्वराभिमुख कर उसका उदात्तीकरण।
इन्द्रियों की प्रचण्ड कर्षण शक्ति का सदुपयोग करने के लिये हमें उनको उदात्त आदते डालनी होगी। उदात्त का अर्थ है उंचे ध्येय की ओर। ऐसे शब्दों से ही कभी कभी डर लगता है। पर यदि अपने जीवन को अपने सामने पवित्र रखना है, मिथ्याचार के अपराध बोध से बचना है तो इन्द्रियों को नित्य कर्म में बांध दो। उन्हें कुछ अच्छे कामों की आदत डाल दो। इसे ही कर्मकाण्ड कहते है। इससे कर्म का भाव शुद्ध हो जायेगा। एक बार संकल्प लेते समय उदात्त ध्येय का ध्यान करने से प्रतिदिन कर्म में वहीं भाव अनायास, अवचेतन के स्तर पर कार्य करने लगेगा। यही इन्द्रियों के माध्यम से मन को सही मार्ग पर रखने की सरलतम विधि है। जितना लगता है उतना यह उदात्तीकरण कठीन नहीं है। बड़ा ही सरल है। कई काम हम प्रतिदिन करते ही है। पर संकल्प के साथ नहीं करते। बस इतना ही करना है, संकल्प करना है। संकल्प भाव की शुद्धि करेगा और आदतन कर्म के समय मन को उदात्त करेगा।
तो आज ही तय कर लो क्या क्या प्रतिदिन करेंगे। छोटी छोटी बातें ही बड़ा परिणाम देती है। जैसे प्रतिदिन हनुमान चालिसा का पाठ, 50 सूर्यनमस्कार, कुछ व्यायाम, प्राणायाम, जप। यहाँ तक की नियमित स्नान करना भी एक आदत हो सकती है। कमसे कम पाँच – छः आदते नित्य संकल्प के रूप में ले ही लेनी चाहिये। 2 शरीर के स्तर पर जैसे व्यायाम, स्नान आदि। कम से कम दो भाव के स्तर पर जैसे जप, स्तोत्र पाठ आदि और कम से कम दो बौद्धिक स्तर पर जैसे स्वाध्याय, लेखन, श्रवण आदि। हाँ! बिना चुके, बिना एक दिन भी खण्ड पड़े करना है। फिर देखो मन कैसे उदात्त गगन में विचरण करने लगता है। आपको ही आश्चर्य होगा कि कितना पवित्र, हलका और उर्जावान अनुभव कर रहे हैं।

अक्टूबर 9, 2011 Posted by | योग | , , , , , | 12 टिप्पणियाँ

   

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