उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

दायित्वबोध की देवी हम करे आराधन


दायित्व:
देवी भागवत में शुम्भ-निशुम्भ की कथा आती है। ये दोनों मधु-कैटभ के ही वंशज है। उनके वध का प्रतिशोध लेना चाहते है। अपना सशक्त साम्राज्य बना लिया है। ब्रह्माजी से तपस्या कर  वरदान पा लिया कि कोई नर चाहे मानव हो या पशु के हाथों मृत्यु नहीं होगी। उनको दम्भ है कि कोई मादा, नारी से क्या ड़र। वे माता की शक्ति से अपरिचित है क्योंकि स्त्री को मादा के रूप में ही देखते है। यह असुर विचार का एक लक्षण है। नारी को मादा के रूप में भोग का साधन समझना। भारतीय संस्कृति में हर बाला को माँ के रूप में ही देखा जाता है। आज सप्तमी है। कुमारी पूजा का दिन है। स्वामी विवेकानन्द स्वयं कुमारी के अन्दर दिव्यता के दर्शन कर कुमारी पूजा करते थे। कश्मिर में क्षीरभवानि में आसपास जब कोई हिन्दू बालिका नहीं थी तो नाववाले मुसलमान की बेटी की स्वामीजी ने कुमारी पूजा की। वो नाववाला भी गद् गद् हुआ। आज भी कश्मिर के मुसलमान अपने आप को पंडीतों के वंशज मानते है। राजनीति और पाकीस्तान के हस्तक्षेप से मामला बिगड़ा हुआ है।
तो शुम्भ-निशुम्भ के आतंक से पीड़ित देवताओं ने माता दूर्गा की प्रार्थना की। पार्वती ने देवताओं पर दया कर कौशिकी का रूप लिया। उसे काली या कालरात्री भी कहते है। कहीं कही काली को उनकी सहायक के रूप में भी बताया गया है। वैसे इस युद्ध में सभी देवताओं की शक्तियाँ देवी के साथ लड़ी थी। कुल सात देवियों ने मिलकर धुम्रलोचन, चण्ड-मुण्ड, रक्तबीज सहित लाखों असुर सेना का नाश कर दिया। चमूत्व (Team) की शक्ति का यह चमत्कार था। धुम्रलोचन के साथ सबसे पहले युद्ध हुआ। उस समय कौशिकी माता ने अकेले ही अपने वाहन सिंह के साथ 60000 असुरों का वध कर दिया। फिर चण्ड मुण्ड अनेक मायावी दानवों की सेना लेकर आये। तब सातों देवियों ने मिलकर उनका निःपात किया। इसी से देवी का एक नाम चामुण्डा पड़ा। रक्तबीज का वरदान विचित्र था। उसके रक्त की बून्द जमीन पर गिरने से उसमें से और दानव उत्पन्न हो जाते। क्लोनिंग की कितनी उन्नत विधि? तो देवी ने काली को दायित्व दिया कि अपने खप्पर में रक्तबीज के रक्त के हर बून्द को धरती पर गिरने पहले ही पकड़ लो। और देवी ने उसके मस्तक का छेद कर दिया।
यह चमुत्व संगठन की शक्ति को कई गुणा बढ़ा देता है। कम कार्यकर्ता भी बड़े बड़े चमत्कार कर देते है। शिवाजी की सेना की सफलता का यही रहस्य था। चमु में सबका दायित्व स्पष्ट होना आवश्यक होता है। संगठन में प्रत्येक कार्यकर्ता का तय दायित्व हो ताकि कोई भ्रम अथवा कार्य का दोहराव ना हो। सब अपना अपना दायित्व निभाते हुए एक-दूसरे के पूरक बनें। दायित्व ही कार्यकर्ता का परिचय हो जाता है। इससे कार्य में व्यक्तिगतता नहीं आती। कार्य व्यक्ति निरपेक्ष हो जाता है। अपने दायित्व से कार्यकर्ता का आत्मबल, क्षमता और प्रभाव बढ़ता है। अन्यथा सामान्य गुणोंवाला कार्यकर्ता भी असामान्य परिणाम देता है।
कालरात्री का वाहन गर्दभ है। कार्यकर्ता भी चाहे जिस श्रेणी का हो दायित्व रूपी देवी की सवारी बनते ही वह भी पूजनीय हो जाता है। दायित्ववान कार्यकर्ता संगठन को अपने लक्ष्य कीओर अग्रेसर करता है। आदर्श चमु में हर दायित्व के लिये कार्य कर्ता और हर कार्यकर्ता के लिये दायित्व होता है। हम अपने दायितव का पूर्ण निर्वाह करते हुए कालरात्री की पूजा करें। यही हमारा कुमारी पूजन है। इसीसे वर्तमान असुर सेना का नाश होगा। खप्परवाली का खप्पर खाली ना रहे। कोई कार्यकर्ता दायित्व बिना न रहे!

अक्टूबर 17, 2018 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , | टिप्पणी करे

कात्यायनी : कार्यकर्ता निर्माण की कथा


कार्यकर्ताः
बड़ी प्रचलित कहावत है, ‘‘भगतसिंह पैदा तो हो पर पड़ौसी के घर में।’’ देशभक्तों की सब प्रशंसा तो करते है पर उनके बनने की प्रक्रिया की प्रसव पीड़ा को कोई नहीं सहना चाहता। महान त्याग से ही महान कार्य सम्पन्न होते है। पर आज परिवार त्याग के स्थान पर अपने बच्चों को सुरक्षित मार्ग से सहज, सफल जीवन जीने का ही प्रशिक्षण दे रहा है। अपने तक रहो, दुसरों के बीच में मत पड़ना। सामने अन्याय होता दिखे तब भी लफड़े में मत पड़ना यह आज की माता का अपने लाड़ले लल्लू को सतत परामर्श होता है। वीरप्रसवा भारत भूमि में जीजाबाई जैसी मातायें कहाँ चली गई?

नवरात्री के छठे दिन की देवी कात्यायनी है। ऋषि कात्यायन का साहस देखो। देवी से इसी आग्रह के साथ तप किया कि मेरे घर जन्म लो। देवी को परिवार में धारण करने की तैयारी। घोर तपस से प्रसन्न हो देवी ने ऋषि कात्यायन के घर जन्म लिया इसी से नाम पड़ा कात्यायनि।

संगठन में दिव्यता को अपने में जन्म देने की तैयारी वाले कार्यकर्ताओं की आवश्यकता होती है। वास्तव में ऐसे समर्पित कार्यकर्ता ही संगठन बनाते है। वे ही संगठन का आधार होते है। जितनी अधिक मात्रा में ऐसे कार्यकर्ता संगठन के पास होंगे उतना ही संगठन का विस्तार होगा। कुछ संगठनों में अपना पूर्ण जीवन संगठन को अर्पित करनेवाले पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं की व्यवस्था होती है। उन संगठनों में ये पूर्ण समर्पित कार्यकर्ता संगठन की रीढ़ बनते है। फिर अगले चक्र में ऐसे कार्यकर्ता होते है जो पूरा समय तो नहीं दे पाते किन्तु समर्पण पूर्ण होता है। अपने व्यवसाय व परिवार के साथ बराबर की वरीयता व महत्व ये कार्यकर्ता संगठन को देते है। समय भी नियमित रूप से निकालते है संगठन के कार्य के लिये। संसाधनों को एकत्रित करने में भी ऐसे कार्यकर्ताओं का बड़ा योगदान होता है। पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं की संख्या कितनी भी अधिक हो जाये सीमित ही होगी। अतः दूसरे चक्र के कार्यकर्ता कार्य को स्थायित्व प्रदान करते है। संगठन की समाज में प्रतिष्ठा भी ऐसे कार्यकर्ताओं के आचरण पर निर्भर होती है। समाज में प्रतिष्ठित व्यक्ति यदि किसी संगठन के साथ जुड़ जाते है तो अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा से संगठन की साख में वृद्धि करते है।

तीसरी श्रेणी में ऐसे कार्यकर्ता आते है जो नियमित समयदान अथवा वैचारिक योगदान भी नहीं करते किन्तु पूरी श्रद्धा से मूख्य कार्यकर्ताओं का नैतिक समर्थन करते है और समय पड़ने पर आवश्यकता के अनुसार समय, श्रम और अन्य संसाधनों का योगदान भी करते है। एक चौथी परत भी होती है संगठन से जुड़ने वालों की। इन्हें कार्यकर्ता तो नहीं कहा जा सकता किन्तु होते ये भी महत्वपूर्ण हैं। इन्हें आप संगठन के शुभचिंतक कह सकते है। ये संगठन के विचार, लक्ष्य व कार्य को समझते है और इससे सहमत भी होते है। किन्तु भिन्न वरीयताओं के कारण प्रत्यक्ष योगदान नहीं देते। किन्तु समाज में संगठन का अच्छा प्रभाव बनें इसमें सहायक होते है। सहज चर्चा में संगठन के प्रति सहानुभुति के शब्दों से समाज का सकारात्मक अभिमत बनाने का कार्य करते है। इनकी भी संगठन की प्रगति में अपनी भूमिका है।

कात्यायन सी तपस्या सभी संगठकों को करनी पड़ती है। अच्छा कार्य करते है तो विघ्नसंतोषी लोग विरोध भी करेंगे। संगठक को ऐसे लोगों से भी व्यवहार कुशलता से बरतना होता है। विरोध की धार बोथी हो ऐसा प्रयास करना होता है। जो दूरस्थ है वो निकट आये, सहानुभुति रखनेवाले सक्रीय हो, जो सक्रीय है वो नियमित हो यह तपस्या है। इसी के द्वारा संगठन में अधिक कार्यकर्ता पैदा होते है। अर्थात कात्यायनी माता की कृपा होती है।

अक्टूबर 16, 2018 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , | टिप्पणी करे

एक मन, विचार, संकल्प और स्वप्न


 

केवल ध्येय और विचार ही उदात्त होने से काम नहीं चलता, संगठन के सामने दृष्टि भी उदार होना आवश्यक है। बड़े लक्ष्य लेकर चलने से ही बड़े कार्य सम्भव होते हैं। यदि संगठन अपने सम्मुख लक्ष्य ही छोटा रख ले तो फिर उसका दायरा भी सीमित हो जाएगा। शक्तिपूजा हमें उदात्तता की ही प्रेरणा देती है। 1897 में जब भारत की स्वतंत्रता का भी कोई चिन्ह नहीं दिखाई दे रहा था तब स्वामी विवेकानन्द ने भारत के सम्मुख विश्वविजय का ध्येय रखा। 12 संन्यासी भाइयों से प्रारम्भ कर रामकृष्ण मठ को स्थापित कर विश्व को हिन्दू संस्कृति व वेदान्त के संदेश का कार्य दिया। डॉ हेड़गेवार ने जब 1925 की विजयादशमी को कुछ मुठ्ठीभर बालकों के साथ संघ शाखा का प्रारम्भ किया था तभी उनके सम्मुख पूरे हिन्दू समाज के संगठन का लक्ष्य था। इन उदात्त विचारों ने ही चमत्कार किये हैं।

महान विचार के साथ लोग जुड़ते हैं तभी संगठन का स्वरूप बनता है। केवल कुछ लोगों तक विचार पहुँचाने मात्र से संगठन का काम नहीं हो जाता। अधिक से अधिक लोगों के जीवन में यह विचार उतारना ही संगठन का ध्येय है। ध्येयवादी संगठन सत्य पर आधृत होता है। इस विचार की सार्वभौमिकता के कारण ही यह सब के लिये स्वीकार्य हो सकता है। सनातन हिन्दू धर्म इन्हीं शाश्वत सिद्धांतों को व्यावहारिक रूप में उतारने का नाम है। जब संगठन का आधार भी ऐसा ही पूर्णतः शास्त्रीय सनातन सिद्धांत होता है तब संगठन सार्वजनीन हो जाता है और उससे जुड़ने की क्षमता के लोगों की संख्या असीम होती है। वास्तव में कोई भी ऐसे संगठन से विचार के स्तर पर जुड़ सकता है। कार्यप्रणाली व पद्धति के अनुसार रूचि रखनेवाले लोग ही संगठन से जुड़ेंगे किन्तु विचार के स्तर पर किसी को भी कोई आपत्ती नहीं होगी। इन सनातन सत्यों को अनेक प्रकार से पुकारा जाता है। उनमें से एक नाम है ‘ब्रह्म’। संगठन का ध्येय ही ब्रह्म है।

ब्रह्मचर्य का सही अर्थ है – ब्रह्म की ओर चलना – ब्रह्मैव चरति इति ब्रह्मचारी। संगठनात्मक सन्दर्भ में इसका अर्थ हुआ सतत ध्येय की ओर चलना। मार्ग में आनेवाले अन्य प्रलोभनों अथवा आकर्षणों की ओर किंचित भी ध्यान ना बंटने देना। नवरात्री के दूसरे दिन की देवी है माँ ब्रह्मचारीणी। माता पार्वती द्वारा पूर्ण एकाग्रता से दीर्घकाल तक किये तप के कारण उन्हें यह नाम मिला है। अपने ध्येय शिवकृपा के लिये सबकुछ दांव पर लगानेवाले तप की अवधि में माता ने पूर्ण कठोरता के साथ ब्रह्मचर्य का पालन किया। यहाँ तक की आहार का भी पूर्ण त्याग कर दिया। एक समय पेड़ के पत्तों का सेवन भी त्याग देने के कारण ही उनका एक नाम पड़ा – अपर्णा। पार्वती की तपस्या से विह्वल उनकी माता ने करूण पुकार के साथ उन्हें कहा, “अरी मत”, संस्कृत में उSSमा और पार्वती का नाम ही पड़ गया उमा। माता ब्रह्मचारिणी इस तप की प्रतिक हैं। इसीलिए उनके हाथ में जपमाल है। जप मन की एक तानता से की गई धारणा का द्योतक है। यह जपमाल रूद्राक्ष की है। रूद्र के अक्ष की आस में ही तो सारा तप चल रहा है ना?

संगठन में ब्रह्मचारिणी की साधना का क्या अर्थ होगा? यहाँ केवल एक व्यक्ति की व्यक्तिगत निष्ठा की बात नहीं है। पूरे संगठन का ही एकसाथ एक विचार पर एकाग्र होना संगठनात्मक ब्रह्मचर्य होगा। इसलिए यह लम्बी प्रक्रिया है। अत्यंत सुव्यवस्थित योजना से संगठन के मन का संस्कार करना होता है। सब एक विचार पर एकाग्र हो सकें इस हेतु संगठन को एक सामान्य शब्दावली का निर्माण करना होता है। संगठनात्मक अनुशासन की रचना करनी होती है। विविध स्वभाव के कार्यकर्ता संगठन में एक विचार से, एक ध्येय के लिये एकसाथ आकर कार्य कर रहे होते हैं। थोड़ा सा भी व्यवधान होने से व्यक्तिगत आकांक्षायें, क्षुद्र अहंकार ऊपर आ जाते हैं। यह सब संगठन की एकाग्रता को भग्न करने के लिये पर्याप्त होते हैं। उपाय एक ही है सतत ध्येयस्मरण। पर फिर याद रहे कि एक व्यक्ति के मन की बात नहीं है। अनेक विविधताओं से भरे, कई बार मीलों की दूरी पर फैली शाखाओं में कार्यरत व्यक्तियों के समूह को अनेक प्रकार की स्थितियों के मध्य इस ध्येयस्मरण को जीवित रखना है। संगठन के सभी सदस्यों को, कार्यकर्ता, पदाधिकारी सभी को एक मन से एक विचार पर एकाग्र होना है। एक संकल्प के साथ एक समान स्वप्न देखने से ही यह सम्भव है। सबके स्वप्न एक हो, संकल्प एक हो और वे एक मन से किये गये एक विचार पर आधृत हो। इस अद्वितीय एकात्मता हेतु विशिष्ट तकनिक का प्रयोग करना होता है। इस तकनिक को ‘नित्य कार्यपद्धति’ कहते हैं।

ब्रह्मचारिणी माता की जपमाल ही संगठन की कार्यपद्धति है। संगठन के विचार, ध्येय व स्वभाव के अनुरूप ही संगठन की कार्यपद्धति को गढ़ना होता है। जैसे जपमाल में एक-एक मणके को फेरने के साथ इष्ट का नामस्मरण किया जाता है, वैसे ही कार्यपद्धति में नियमित अंतराल में नियत गतिविधि के द्वारा ध्येयस्मरण किया जाता है। कार्यपद्धति की नियमितता उसका सबसे प्रमुख लक्षण है। नियमित समय के अंतराल पर आयोजित होने के कारण इसकी आदत पड़ती है। मन को संस्कारित करने का यही एकमात्र उपाय है। कार्यपद्धति की गतिविधि सबके लिये होती है। अतः उसके बहुत अधिक क्लिष्ट होने से नहीं चलेगा। कार्यपद्धति के कार्यक्रम सहज सरल होने चाहिये। बहुत अधिक साधनों अथवा स्थान आदि में विशिष्टता की आवश्यकता नहीं होनी चाहिये। कार्यपद्धति जितनी सरल होगी उतनी ही प्रभावी होगी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रभाव का सबसे प्रमुख कारण उसकी अत्यंत सरल कार्यपद्धति में है। प्रतिदिन लगनेवाली शाखा के लिये किसी भी विशेष साधन अथवा प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं होती। सहज, सरल, सुलभ होना ही इसकी सफलता का रहस्य है।

प्रत्येक संगठन को अपनी कार्यपद्धति की रचना करनी होती है। जो संगठन ऐसा कर पाते हैं, वे संगठन लम्बे चलते हैं और एक मन, विचार, संकल्प और स्वप्न के साथ ध्येय की ओर अग्रसर होते हैं। ब्रह्मचारिणी की कृपा का यही माध्यम है। आइए, अपनी कार्यपद्धति की माला जपें और संगठनात्मक ब्रह्मचर्य के द्वारा ध्येय की ओर बढ़ें।

अक्टूबर 6, 2013 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , | 2 टिप्पणियाँ

संगठन की घटस्थापना


 

पहले रात्री की देवी है – शैलपुत्री। हिमालय की पुत्री होने के नाते माँ पार्वती का ही यह नाम है। हिमवान की पुत्री ने उसी के समान कठोर तपस्या से भगवान शिव को प्रसन्न किया। यदि हमारे लक्ष्य को हम शिव अर्थात कल्याण करनेवाला मानते हैं तो हमारा संगठन उन्हें पाने के लिये ही कार्य कर रहा है। इस उद्देश्य में सिद्धी तभी सम्भव है जब संगठन का जन्म उदात्त ध्येय के लिये हुआ हो। ध्येय जितना उँचा होगा उतना ही संगठन का मूल बल अधिक होगा। किसी भी संगठन की प्रथम शक्ति उसके ध्येय की नैतिक उदात्तता होती है। अतः शैलपुत्री का संदेश है। शैल समान उदात्त विचार से हुआ जन्म। किसी भी संगठन का जन्म एक विचार से होता है। यदि वह विचार संकुचित हो तो संगठन नहीं होगा, गिरोह होगा। यदि ध्येय स्वार्थ होगा तो संगठन व्यापारी संस्थान ही होगा। इसी कारण राजनीतिक संगठन जब अपने उदात्त ध्येयवाद को भुला देते हैं अथवा जिन दलों का जन्म ही व्यक्तिगत अहंकार वा स्वार्थ से हुआ होता है, वे शीघ्र ही एक व्यापारी संस्थान का रूप ले लेते हैं। दीर्घकाल तक मानव कल्याण के कार्य का ध्येय प्राप्त करते हुए कार्य करने वाले संगठन वे ही हो सकते हैं जिनके मूल में हिमालय सा भव्य व दिव्य विचार होता है।

विचार के उदात्त होने के साथ ही उसके मूर्त रूप में उतरने के लिये प्रखर तप भी करना पड़ता है। पार्वती ने शिवजी को पाने के लिये उग्र तप किया। स्वयं को पूर्ण समर्पित कर दिया। ऐसे समय जब शिवजी उनकी ओर देखने को भी तैयार नहीं थे तब भी पूर्ण लगन से अपनी तपस्या को जारी रखा। सच्चे कार्यकर्ता को भी ध्येय के प्रति पूर्ण श्रद्धा रखते हुए कार्य करना चाहिए। कई बार बाहरी रूप से कोई परिणाम अथवा यश नहीं दिखाई देता, तब भी यदि लगन टिक सकें तो ही अन्ततः लक्ष्यप्राप्ति हो पाती है। इसका एक ही मार्ग है – सतत अपने जन्म के रहस्य अर्थात अपने संगठन के बीज विचार का स्मरण। यदि उस विचार की उदात्तता व सत्यता पर विश्वास दृढ़ हो तो फिर कितनी भी निराशाजनक परिस्थिति में कार्यकर्ता अपने पथ से विचलित नहीं होता।

माँ शैलपुत्री का नाम ही कार्यकर्ता को प्रेरणा देता है अपने पिता अर्थात अपने मूल को सदा अपने परिचय के रूप में धारण करने की। हमारा विचार ही हमारा सच्चा परिचय होता है। जब हम किसी महान कार्य में जुटे संगठन के अंग होते हैं, तब वह संगठन विचार ही हमारा एकमात्र स्थायी आधार होता है। वही हमें शक्ति प्रदान करता है। माता शैलपुत्री का रूप भी अत्यन्त सांकेतिक है। पहले नवरात्री को इसका पूजन करते समय इसके अर्थ को समझना चाहिये। माता का वाहन श्वेत वृषभ है – सफेद बैल। यह शक्ति का सनातन प्रतिक है। हमारी ध्येय साधना का वाहन ऐसा ही बलवान हो। शुभ्र रंग बल की सात्विकता का द्योतक है। बल जब कल्याणकारी होता है तब सात्विक होता है। जब औरों को पीड़ा देने में बल का प्रयोग होता है, तब वह तामसिक बल कहलाता है और जब बल का गर्व कर उसका दुरूपयोग होता है, तब वह राजसिक बल होता है। संगठन हमें बल प्रदान करता है। वह सात्विक तभी होगा जब हम उसका प्रयोग संगठन की ध्येयप्राप्ति में ही करेंगे, अपने स्वार्थ अथवा दूसरों की हानि के लिये नहीं।

शैलपुत्री माता के एक हाथ में त्रिशूल है और दूसरे में कमल। इस प्रतिक का भी यही अर्थ है। कमल शांति का प्रतिक है और त्रिशूल साधनों का। संगठन हमें अनेक शस्त्र अर्थात विविध साधन प्रदान करता है। यह आंतरिक गुणों के रूप में भी होते हैं और बाह्य संसाधनों, सम्पर्कों के रूप में भी। इनका भी उपयोग संगठन के ध्येय के अनुरूप सबके कल्याण व शांति के लिये करना होता है।

आइये, पहले नवरात्री को संगठन की शक्तिपूजा की घटस्थापना करते है। माँ शैलपुत्री की पूजा में हिमालय सा उदात्त विचार व उसके आचरण हेतु तप व प्राप्त बल का सदुपयोग करने का संकल्प लेते हैं। माता हमें संगठन को सशक्त बनाने का शुभाशिष प्रदान करें।

 

अक्टूबर 5, 2013 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , , , | 14 टिप्पणियाँ

स्वामीजी और संघ


16‘‘माँ आज मुझे किसी से प्यार हो गया है ।’’ एक शाम स्वामी विवेकानन्द ने साराह ओले बुल को कहाँ, जिन्हें वे मेरी ममतामयी अमेरिकी माँ कहा करते थे। ठिठोली करते हुए माँ ने पूछा ‘‘कौन है वह भाग्यवान युवती?’’ स्वामीजी ने गंभीरता से उत्तर दिया -‘‘ संगठन! माँ वह कोई युवती नहीं अमेरिका की संगठन क्षमता है जिससे मूझे प्यार हो गया है।’’

हिन्दूओं की खोई संघ क्षमता का पुनः परिचय स्वामी विवेकानन्द ने करवाया । उन्होंने संगठन की शक्ति को बार बार अधोरेखित किया । हिन्दू धर्म के सम्मान को विश्वमंचपर प्रतिष्ठित करने के बाद स्वामी विवेकानन्द जब भारत लौटे तब उन्होंने भारत को चार मन्त्र दिए – आत्म गौरव, संगठन, पुनरूत्थान तथा विश्वविजय। भेड़ों के मध्य पले सिंह के समान अपने पराक्रम को भूल चुके हिन्दुओं के आत्मगौरव को स्वामी विवेकानन्द ने जागृत किया । ‘तभी और केवल तभी तुम हिंदू कहलाने के अधिकारी हो जब इस शब्द को सुनते ही आपकी नसों में विद्युत तरंग दौड़ जाती हो । जब इस नामाभिधान को धारण करनेवाले किसी जाति, वर्ग, भाषा, प्रांत के व्यक्ति को देखते ही तुम्हारा हृदय अकथनीय आत्मीयता व स्नेह से भर पड़े कि यह मेरा बन्धू है ।’

उन्होंने संगठन के महत्व को केवल प्रतिपादन ही नहीं किया अपितु श्रीरामकृष्ण संघ की स्थापना की । स्वामीजी ने भारत में हर क्षेत्र में संगठन की 31आवश्यकता पर बल दिया । किसी युवा के पूछने पर कि देश में कितने संगठन होने चाहिए । स्वामीजी ने कहा असंख्य । हम करोड़ो है । हमारे कार्य भी अनेक है । सब संगठित होकर ही चल सकते है । संगठन को ही उन्होंने भारत के पुनरूत्थान का मार्ग बताया । उन्होंने स्पष्ट किया समाज सुधार कोई नवनिर्माण की प्रक्रिया नहीं है । यह तो खोए गौरव को प्राप्त करना है । अतः यह पुनर्निमाण है । पुनरूत्थान है नवोत्थान नहीं । यह महत्वपूर्ण दृष्टिभेद था । अंग्रेजों के शासन में पश्चिम की हर बात को ही अनुकरीणय मानकर कार्य करनेवाले सुधारकों को स्वामीजी ने आगाह किया – यह तो विनाश का मार्ग है । यह समाज सदियों से अपनी जड़ों से जुड़ा है । उसका उत्थान उनकी आस्थाओं को क्षति पहुँचाये बिना करना होगा ।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि स्वामीजी ने भारत को उसके जीवनध्येय के प्रति जागृत किया । उन्होंने घोषणा की – ‘‘उठो भारत! अपनी आध्यात्मिकता से विश्वविजय करो!’’ विश्वविजय को स्वामीजी ने भारत का लक्ष्य बताया । उन्होंने स्पष्ट किया भारत की आकांक्षा विश्वगुरू बनने  की है । मानवता को जीवन जीने की वैज्ञानिक पद्धति का पाठ पढ़ाना ही भारत का अवतार कार्य है । इसी के लिए भारत को कार्य करना है ।

dr Hedgewar1925 में जब पूरे भारत में स्वतंत्रता आंदोलन चरम पर था तब डा केशव बलिरामपंत हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की । केवल स्वतंत्रता नही भारत के पूर्ण विजय को लक्ष्य बनाकर हिन्दूओं के संघटन का लक्ष्य उन्होंने सामने रखा । आज पूरे विश्व में वटवृक्ष की भाँति फैला संघ स्वामी विवेकानन्द के स्वप्न को साकार करने का ही कार्य कर रहा है । चरित्र निर्माण के प्रेरणा केन्द्र निर्माण करने की योजना स्वामी विवेकानन्द ने मद्रास में युवाओं के संम्मूख रखी थी । ऐसे प्रेरणाकेन्द्र जहाँ सभी जाति, मतों के हिन्दू एकत्रित हो सके । उन्होंने ॐ कार के मंदिरों की स्थापना का भी संकेत दिया था । जनसमान्य को संगठित कर आत्मबल से परिपूर्ण समाज का निर्माण ही स्वामीजी के अनुसार भारत निर्माण का एकमात्र मार्ग था । अनुशासन, प्रामाणिकता, निष्ठा, श्रद्धा से सम्पन्न व्यक्तिगत चारित्र्य व एकात्मता देशभक्ति, त्याग, सेवा व समर्पण से युक्त राष्ट्रीय चारित्र्य के निर्माण की जो योजना स्वामी विवेकानन्द ने रखीथी उसी को डा हेडगेवार ने संघ शाखा के रूप में व्यवहारिक तन्त्र प्रदान किया । स्वामीजी के मन्त्र मनुष्य निर्माण – चरित्रवान् मनुष्यों का राष्ट्रगठन के लिए निर्माण को संघ ने साकार कर दिखाया ।

वर्तमान में विश्व के सबसे विशाल स्वयंसेवी संगठन के रूप में ख्यात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने shakhaस्वामी विवेकानन्द के विचारों को ही मूर्त रूप प्रदान किया है । सभी जाति, वर्ग, भाषा, प्रांत, मत, सम्प्रदायों के हिन्दू समस्त मतभेदों को भूल भारतमाता की पूजा करने प्रतिदिन भगवे ध्वज के सम्मूख एकत्रित होते है । भारत की सामान्य जनता को एकसूत्रता में बांधने क यह अभिनव प्रयोग है । अमेरिका से अपने शिष्य आलासिंगा पेरूमाल को लिखे पत्र में स्वामीजी ने आहवान किया कि देशकार्य के लिए लाखों युवक समर्पित हो । संघ ने प्रचारकों की टोली के रूप में स्वामीजी के इसी कार्य को मूर्तरूप प्रदान किया है । सन्यासेतर समर्पित कार्यकर्ताओं की श्रृखंला का निर्माण संघ ने किया है । स्वयं के व्यक्तिगत जीवन को पूर्णतः आहूत कर अपना सर्वस्व राष्ट्रकार्य में लगानेवाले प्रचारक स्वामीजी के आहवान का ही प्रत्युत्तर हैं ।

Shri Gurujiराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक प.पू. श्री. गुरूजी स्वामी विवेकानन्द के गुरूभाई स्वामी अखण्डानन्द से दिक्षित थे । यह संघ का स्वामीजी से सीधा आध्यात्मिक नाता है । स्वामी अखण्डानन्द ने बंगाल के सारागाछी में श्रीरामकृष्ण आश्रम के सेवाकार्यों का प्रारम्भ किया । ‘जीवभावे शिव सेवा’ के श्रीरामकृष्ण परमहंस के मन्त्र को उन्होंने वहाँ साकार किया । पः पू. श्री गुरूजी ने सारगाछी आश्रम में स्वामी अखण्डानन्उ जी की सेवा की । उन्हीं के आदेशानुसार गुरूजी ने जीवनभर केशधारण किए । गुरू ने कहा था ये दाढ़ी व बाल तुम्हें जँचते है इसे काटना मत । गुरू अन्य सभी शिक्षाओं के साथ ही इस व्रत का भी पालन इस अद्भूत शिष्य ने जीवनभर किया ।

सेवा को समाजधारण व सभी के उत्थान का सर्वोत्तम साधन के रूप में स्वामी विवेकानन्द ने प्रतिपादित किया । वंचितों के उद्धार का मार्ग संघर्ष नहीं अपितु प्रभावी लोंगों के हृदय में जागृत संवेदना से उपजी सेवा है । स्वामीजी के इस संर्वांगीण उत्कर्ष के सेवा मंत्र को संघ ने अपने विविध क्षेत्रों के माध्यम से साकार किया है । स्वामीजी ने सेवा के भिन्न भिन्न स्तर बताये थे । भौतिक सेवा सबसे निम्न पहला स्तर है । भूखे को रोटी और बेघर को घर देनेवाली सेवा । उससे उपर लौकिक ज्ञान के दान की सेवा । और सबसे उँची आध्यात्मिक ज्ञान के दान की सेवा । पर इन सबसे भी परे एक ऐसी सामूहिक साधना की ओर स्वामीजी ने संकेत किया जिसके द्वारा एक ऐसे आदर्श समाज का निर्माण करना जिसमें सब सूखी हो । किसी को सेवा की आवश्यकता ही ना लगे । इस हेतु एकात्म विचार पर आधारित व्यवस्थाओं की रचना करनी होगी । आज संघ पूर्ण समर्पण से संगठन व सेवा के कार्य में लगा है ।

स्वामीजी ने तिसरा मन्त्र दिया था विश्वविजय का । संघ का कार्य विश्व के अनेक देशों में चल रहा है । आज स्वामी विवेकानन्द की सार्द्ध शती के अवसर पर ‘भारत जागो ! विश्व जगाओ !’ इस बोधविचार के साथ जनजागरण का महाअभियान चल पड़ा है इस निमित्त राष्ट्रीय आध्यात्मिक शक्तियों के संगठन में लगायी है । इसी के माध्यम से स्वामी विवेकानन्द की ऐतिहासिक भविष्यवाणी साकार होगी –

bharatmata
‘‘एक दृश्य में जीवंत स्पष्टता से अपनी आँखो के सामने देखता हूँ – यह मेरी चिरपुरातन भारतमाता जागृत होकर पूर्व से भी अधिक गौरव व दिप्ती के साथ विश्व के गुरू पद पर सिंहासनारूढ़ है । आइये अपने जीवन की आहूति देकर विश्व के सम्मूख उसके विजय की घोषणा करे ।’’

फ़रवरी 13, 2013 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , , | टिप्पणी करे

   

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