उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

दायित्वबोध की देवी हम करे आराधन


दायित्व:
देवी भागवत में शुम्भ-निशुम्भ की कथा आती है। ये दोनों मधु-कैटभ के ही वंशज है। उनके वध का प्रतिशोध लेना चाहते है। अपना सशक्त साम्राज्य बना लिया है। ब्रह्माजी से तपस्या कर  वरदान पा लिया कि कोई नर चाहे मानव हो या पशु के हाथों मृत्यु नहीं होगी। उनको दम्भ है कि कोई मादा, नारी से क्या ड़र। वे माता की शक्ति से अपरिचित है क्योंकि स्त्री को मादा के रूप में ही देखते है। यह असुर विचार का एक लक्षण है। नारी को मादा के रूप में भोग का साधन समझना। भारतीय संस्कृति में हर बाला को माँ के रूप में ही देखा जाता है। आज सप्तमी है। कुमारी पूजा का दिन है। स्वामी विवेकानन्द स्वयं कुमारी के अन्दर दिव्यता के दर्शन कर कुमारी पूजा करते थे। कश्मिर में क्षीरभवानि में आसपास जब कोई हिन्दू बालिका नहीं थी तो नाववाले मुसलमान की बेटी की स्वामीजी ने कुमारी पूजा की। वो नाववाला भी गद् गद् हुआ। आज भी कश्मिर के मुसलमान अपने आप को पंडीतों के वंशज मानते है। राजनीति और पाकीस्तान के हस्तक्षेप से मामला बिगड़ा हुआ है।
तो शुम्भ-निशुम्भ के आतंक से पीड़ित देवताओं ने माता दूर्गा की प्रार्थना की। पार्वती ने देवताओं पर दया कर कौशिकी का रूप लिया। उसे काली या कालरात्री भी कहते है। कहीं कही काली को उनकी सहायक के रूप में भी बताया गया है। वैसे इस युद्ध में सभी देवताओं की शक्तियाँ देवी के साथ लड़ी थी। कुल सात देवियों ने मिलकर धुम्रलोचन, चण्ड-मुण्ड, रक्तबीज सहित लाखों असुर सेना का नाश कर दिया। चमूत्व (Team) की शक्ति का यह चमत्कार था। धुम्रलोचन के साथ सबसे पहले युद्ध हुआ। उस समय कौशिकी माता ने अकेले ही अपने वाहन सिंह के साथ 60000 असुरों का वध कर दिया। फिर चण्ड मुण्ड अनेक मायावी दानवों की सेना लेकर आये। तब सातों देवियों ने मिलकर उनका निःपात किया। इसी से देवी का एक नाम चामुण्डा पड़ा। रक्तबीज का वरदान विचित्र था। उसके रक्त की बून्द जमीन पर गिरने से उसमें से और दानव उत्पन्न हो जाते। क्लोनिंग की कितनी उन्नत विधि? तो देवी ने काली को दायित्व दिया कि अपने खप्पर में रक्तबीज के रक्त के हर बून्द को धरती पर गिरने पहले ही पकड़ लो। और देवी ने उसके मस्तक का छेद कर दिया।
यह चमुत्व संगठन की शक्ति को कई गुणा बढ़ा देता है। कम कार्यकर्ता भी बड़े बड़े चमत्कार कर देते है। शिवाजी की सेना की सफलता का यही रहस्य था। चमु में सबका दायित्व स्पष्ट होना आवश्यक होता है। संगठन में प्रत्येक कार्यकर्ता का तय दायित्व हो ताकि कोई भ्रम अथवा कार्य का दोहराव ना हो। सब अपना अपना दायित्व निभाते हुए एक-दूसरे के पूरक बनें। दायित्व ही कार्यकर्ता का परिचय हो जाता है। इससे कार्य में व्यक्तिगतता नहीं आती। कार्य व्यक्ति निरपेक्ष हो जाता है। अपने दायित्व से कार्यकर्ता का आत्मबल, क्षमता और प्रभाव बढ़ता है। अन्यथा सामान्य गुणोंवाला कार्यकर्ता भी असामान्य परिणाम देता है।
कालरात्री का वाहन गर्दभ है। कार्यकर्ता भी चाहे जिस श्रेणी का हो दायित्व रूपी देवी की सवारी बनते ही वह भी पूजनीय हो जाता है। दायित्ववान कार्यकर्ता संगठन को अपने लक्ष्य कीओर अग्रेसर करता है। आदर्श चमु में हर दायित्व के लिये कार्य कर्ता और हर कार्यकर्ता के लिये दायित्व होता है। हम अपने दायितव का पूर्ण निर्वाह करते हुए कालरात्री की पूजा करें। यही हमारा कुमारी पूजन है। इसीसे वर्तमान असुर सेना का नाश होगा। खप्परवाली का खप्पर खाली ना रहे। कोई कार्यकर्ता दायित्व बिना न रहे!

अक्टूबर 17, 2018 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , | टिप्पणी करे

कात्यायनी : कार्यकर्ता निर्माण की कथा


कार्यकर्ताः
बड़ी प्रचलित कहावत है, ‘‘भगतसिंह पैदा तो हो पर पड़ौसी के घर में।’’ देशभक्तों की सब प्रशंसा तो करते है पर उनके बनने की प्रक्रिया की प्रसव पीड़ा को कोई नहीं सहना चाहता। महान त्याग से ही महान कार्य सम्पन्न होते है। पर आज परिवार त्याग के स्थान पर अपने बच्चों को सुरक्षित मार्ग से सहज, सफल जीवन जीने का ही प्रशिक्षण दे रहा है। अपने तक रहो, दुसरों के बीच में मत पड़ना। सामने अन्याय होता दिखे तब भी लफड़े में मत पड़ना यह आज की माता का अपने लाड़ले लल्लू को सतत परामर्श होता है। वीरप्रसवा भारत भूमि में जीजाबाई जैसी मातायें कहाँ चली गई?

नवरात्री के छठे दिन की देवी कात्यायनी है। ऋषि कात्यायन का साहस देखो। देवी से इसी आग्रह के साथ तप किया कि मेरे घर जन्म लो। देवी को परिवार में धारण करने की तैयारी। घोर तपस से प्रसन्न हो देवी ने ऋषि कात्यायन के घर जन्म लिया इसी से नाम पड़ा कात्यायनि।

संगठन में दिव्यता को अपने में जन्म देने की तैयारी वाले कार्यकर्ताओं की आवश्यकता होती है। वास्तव में ऐसे समर्पित कार्यकर्ता ही संगठन बनाते है। वे ही संगठन का आधार होते है। जितनी अधिक मात्रा में ऐसे कार्यकर्ता संगठन के पास होंगे उतना ही संगठन का विस्तार होगा। कुछ संगठनों में अपना पूर्ण जीवन संगठन को अर्पित करनेवाले पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं की व्यवस्था होती है। उन संगठनों में ये पूर्ण समर्पित कार्यकर्ता संगठन की रीढ़ बनते है। फिर अगले चक्र में ऐसे कार्यकर्ता होते है जो पूरा समय तो नहीं दे पाते किन्तु समर्पण पूर्ण होता है। अपने व्यवसाय व परिवार के साथ बराबर की वरीयता व महत्व ये कार्यकर्ता संगठन को देते है। समय भी नियमित रूप से निकालते है संगठन के कार्य के लिये। संसाधनों को एकत्रित करने में भी ऐसे कार्यकर्ताओं का बड़ा योगदान होता है। पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं की संख्या कितनी भी अधिक हो जाये सीमित ही होगी। अतः दूसरे चक्र के कार्यकर्ता कार्य को स्थायित्व प्रदान करते है। संगठन की समाज में प्रतिष्ठा भी ऐसे कार्यकर्ताओं के आचरण पर निर्भर होती है। समाज में प्रतिष्ठित व्यक्ति यदि किसी संगठन के साथ जुड़ जाते है तो अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा से संगठन की साख में वृद्धि करते है।

तीसरी श्रेणी में ऐसे कार्यकर्ता आते है जो नियमित समयदान अथवा वैचारिक योगदान भी नहीं करते किन्तु पूरी श्रद्धा से मूख्य कार्यकर्ताओं का नैतिक समर्थन करते है और समय पड़ने पर आवश्यकता के अनुसार समय, श्रम और अन्य संसाधनों का योगदान भी करते है। एक चौथी परत भी होती है संगठन से जुड़ने वालों की। इन्हें कार्यकर्ता तो नहीं कहा जा सकता किन्तु होते ये भी महत्वपूर्ण हैं। इन्हें आप संगठन के शुभचिंतक कह सकते है। ये संगठन के विचार, लक्ष्य व कार्य को समझते है और इससे सहमत भी होते है। किन्तु भिन्न वरीयताओं के कारण प्रत्यक्ष योगदान नहीं देते। किन्तु समाज में संगठन का अच्छा प्रभाव बनें इसमें सहायक होते है। सहज चर्चा में संगठन के प्रति सहानुभुति के शब्दों से समाज का सकारात्मक अभिमत बनाने का कार्य करते है। इनकी भी संगठन की प्रगति में अपनी भूमिका है।

कात्यायन सी तपस्या सभी संगठकों को करनी पड़ती है। अच्छा कार्य करते है तो विघ्नसंतोषी लोग विरोध भी करेंगे। संगठक को ऐसे लोगों से भी व्यवहार कुशलता से बरतना होता है। विरोध की धार बोथी हो ऐसा प्रयास करना होता है। जो दूरस्थ है वो निकट आये, सहानुभुति रखनेवाले सक्रीय हो, जो सक्रीय है वो नियमित हो यह तपस्या है। इसी के द्वारा संगठन में अधिक कार्यकर्ता पैदा होते है। अर्थात कात्यायनी माता की कृपा होती है।

अक्टूबर 16, 2018 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , | टिप्पणी करे

धर्मानुसारी शिक्षा की स्थापना में शिक्षकों की भूमिका


Ruprekhaमानव की पहचान संबंधों से है | बिना संबंधों के मनुष्य का कोई परिचय ही नहीं है | समस्त सृष्टि के अन्तर्निहित एकत्व का सुप्त ज्ञान मानव मन को अनंत विस्तार हेतु प्रेरित करता है | प्रकटतः भले ही हम स्वयं को सबसे अलग मानते है फिर भी अंतर्मन में इस बात का भान सदैव रहता है कि हम उस एक ईश्वरीय चेतना के अंग है | इस अनुभूति के कारण ही मनुष्य सदैव अपनी चेतना का विस्तार करने का प्रयत्न करता है | इसीलिए मानव को सामाजिक प्राणी भी कहते है | यह सामाजिकता मनुष्यता का महत्वपूर्ण अंग है किंतु सृष्टि के सम्बन्ध केवल मानव समाज तक ही सीमित नहीं है | इसके तंतु सर्वव्यापी है | मानव का मानव से, मानव का समाज से, मानव का अन्य प्राणियों से, सृष्टि से, समूचे ब्रम्हांड से तथा अंततोगत्वा परमात्मा से जो सम्बन्ध है, उन संबंधों के निर्वहन को धर्म कहते है | इस पूरे अस्तित्व को जिन अन्तर्निहित नियमों द्वारा धारण किया गया है उसी को धर्म कहते है | यही धर्म व्यवहार में भी अपेक्षित है | धर्मानुसारी शिक्षा का अर्थ है प्रत्येक को इस धर्म की अनुभूती कराना तथा उसपर आधारित व्यवहार का प्रशिक्षण प्रदान करना |

वर्तमान समय में धर्मसंकल्पना का अर्थ स्पष्ट न होने के कारण पूरी शिक्षा ही धर्मविहीन हो गयी है| उपासना के रूप में धर्म का सीमित अर्थ प्रचलित होने के कारण उसे भेद का मूल मान लिया | परिणामतः धर्मनिरपेक्षता के नाम पर धर्म के समग्र रूप को ही व्यवहार से बाहर कर दिया | धर्मानुसारी शिक्षा तो क्या, शिक्षा में धर्म के अंतर्भाव की भी कल्पना वर्तमान वातावरण में नहीं कर सकते | ऐसी स्थिति में से धर्मानुसारी शिक्षा के आदर्श तक पहुँचने हेतु जिन महत्प्रयासों की आवश्यकता है उनमें शिक्षकों की भूमिका सर्वोपरि है | शिक्षक ही शिक्षा की धुरी है | चाहे जैसी भी व्यवस्था हो, शिक्षक के बिना शिक्षा की कल्पना ही नहीं कर सकते | व्यवस्था चाहे जितने भी निर्बंध लगा ले, कक्षाकक्ष में पढ़ाते समय विधि एवं व्यवहार की स्वतंत्रता को कोई छीन नहीं सकता | शिक्षक यदि अपने इस स्वातंत्र्य का समुचित उपयोग करे तो शिक्षा व्यवस्था के पुनरुत्थान में चमत्कार संभव है | वैसे भी धर्म आचरण से ही संभव है और आचरण का प्रशिक्षण किसी पाठ्यक्रम की अपेक्षा व्यावहारिकता से अधिक दिया जा सकता है | अतः यदि शिक्षक अपनी भूमिका का धर्म के अनुसार निर्वहन करने लगे तो वर्तमान व्यवस्था में भी धर्मानुसारी शिक्षा प्रदान करना संभव है | २ से ३ प्रतिशत शिक्षकों के दृष्टिकोण में सम्यक परिवर्तन आ जाये तो व्यवस्था परिवर्तन भी प्रारंभ हो जायेगा | व्यवस्था परिवर्तन के २ मार्ग है | क्रान्ति के मार्ग से व्यवस्था को एक झटके में बदला जाता है | किंतु इस पद्धति में परिवर्तन का आधार राजतंत्र होता है जोकि अपनेआप में धर्मानुसारी शिक्षा के सिद्धांतों के विपरीत है | क्रान्ति में परिवर्तन ऊपर से नीचे की ओर होता है | परिवर्तन का दूसरा मार्ग सहज, स्वाभाविक, क्रमशः होनेवाला परिवर्तन है | परिवर्तन संसार का स्थायी स्वभाव है | संसरति इति संसारः | अतः समाज में स्वतः होनेवाले परिवर्तनों के साथ शिक्षा में भी क्रमशः परिवर्तन होता है | इसे उत्क्रांति मार्ग कहते है | वैज्ञानिकों का मानना है कि यह अनियंत्रित परिवर्तन पतन की ओर ही जाता है | भौतिक शास्त्र में इसे Entropy (परिक्षय) का सिद्धांत कहते है | क्रांति में प्रस्थापित व्यवस्था का ध्वंस निहित है | १८३५ में मैकोले ने यही किया था | सकारात्मक शिक्षा की प्रस्थापना हेतु क्रांतिकारी परिवर्तन कितना भी आकर्षक लगे, अत्यंत कठिन है | एक तो ऐसे परिवर्तन हेतु आवश्यक सम्पूर्ण सैद्धांतिक स्पष्टता तथा उसे व्यवहार में उतारनेवाले प्रशिक्षित आचार्य एक साथ एक समय इतनी बड़ी संख्या में तैयार करना तथा इस व्यवस्था को स्थापित करने हेतु अनुकूल राजतंत्र का उपलब्ध होना, दोनों ही बातें दुष्प्राप्य है | यदि महत्प्रयास से धर्मसत्ता आदर्श आचार्यों को तथा राजसत्ता राजनैतिक इच्छाशक्ति को प्राप्त भी कर ले तब भी अचानक व्यवस्था परिवर्तन समाज में सांस्कृतिक क्षोभ (cultural shock) उत्पन्न करेगा | दूरस्थ वनवासी क्षेत्रों में अचानक आधुनिक शिक्षा को प्रस्थापित करने से ऐसा विक्षोभ देखने में आता है | ऐसे सामूहिक विक्षोभ की स्थिति में अधिकतर समय समाज अच्छी बातों को भी नकार देता है |

उत्क्रांति का पथ सहज, स्वाभाविक व नैसर्गिक है | किंतु फिर भी उसमें विकास के स्थान पर पतन की ही अधिक संभावना है | प्रयत्नपूर्वक धर्मानुसारी शिक्षा की chanakyaस्थापना हेतु आवश्यक परिवर्तन करना यह मार्ग ना तो अचानक झटके से की हुई क्रान्ति हो सकता है और ना ही अत्यंत धीमी गति से होनेवाली उत्क्रांति | जिस मार्ग का अवलंबन धर्मसंस्थापना के लिए किया जाना अपेक्षित है उसे सम्यक क्रान्ति कहा जा सकता है | संस्कृत में इसे यदि एक शब्द में कहना हो तो कहेंगे ‘संक्रांति’ | संक्रांति में परिवर्तन क्रमशः व नैसर्गिक है किंतु परिवर्तन की गति व दिशा सुनियोजित होगी | क्रमशः उत्थान करते हुए अंतिम आदर्श को प्राप्त किया जायेगा | यही भारतीय पद्धति है | संक्रांति में क्रान्ति की तरह विस्फोट नहीं है और ना ही उत्क्रांति की तरह पतन | जो-जो जिस-जिस स्तर पर है वही से क्रमशः उत्थान की ओर अग्रसर हो यही संक्रांति का मार्ग है | धर्मसंस्थापना की यही शाश्वत विधि है |

शिक्षा में संक्रांति की आधारशिला शिक्षक ही होंगे | संक्रांति में चूंकि परिवर्तन बाहर से थोपा नहीं जाता अपितु अन्दर से ही किया जाता है | अतः यह हमेशा मानव-केन्द्रित होगा, व्यवस्थानुगत नहीं हो सकता | शिक्षक धर्मानुसारी शिक्षा की संकल्पना को अर्थात धर्म की सुस्पष्ट संकल्पना को हृदयंगम करे | इसीसे शिक्षा में संक्रान्ति प्रारम्भ होगी | इस धर्म को अपने व्यक्तिगत जीवन में आचरण से प्रारम्भ करना होगा | धीरे-धीरे अध्ययन, अध्यापन व शिष्यों के साथ व्यवहार में धर्म का प्रभाव प्रारम्भ होगा | शिक्षक के कक्षा में धर्माचरण प्रारम्भ करने से सकारात्मक परिवर्तन दृष्टिगोचर होंगे | किसी भी शैक्षिक संस्थान में यदि १० प्रतिशत शिक्षक धर्माचरण करनेवाले हो जाये तो प्रयत्नपूर्वक उस शिक्षा संस्थान को धर्मानुसारी शिक्षा के आदर्श के रूप में प्रस्थापित किया जा सकता है | जब इन शिक्षा संस्थानों से समाज के सभी क्षेत्रों में सर्वोत्तम व्यक्तित्व प्रदान किये जायेंगे तब सारा समाज इन शिक्षा संस्थानों का अनुसरण करने लगेगा | परिवर्तन का धर्मानुसारी मार्ग यही है |

संक्रांति का प्रारम्भ शिक्षकों के सुगठन हेतु आयोजन करने से होगा | आचार्य निर्माण की यह प्रक्रिया बाहरी प्रशिक्षण से नहीं अपितु अंदरूनी स्वाध्याय से ही संभव है | धर्मसंस्थापना की प्रेरणा से उद्दीपित आचार्य एकत्रित आकर धर्म को समझने हेतु अध्ययन, विमर्श, मनन, चिंतन करेंगे तब उसे स्वाध्याय कहा जायेगा | इस स्वाध्याय का मूल आधार तो शास्त्र ग्रन्थ ही हो सकते है | किंतु साथ ही शास्त्रीय सिद्धांतों की युगानुकुल अभिव्यक्ति को भी स्वाध्याय का आधार बनाना होगा | धर्म के तत्व को हृदयंगम करना स्वाध्याय का प्रथम चरण है | इसका अगला चरण धर्मावलंबन के व्यावहारिक आयामों का सृजन है | कुछ दो, चार, दस या पचास लोग भी कुछ विधियों की सूचि बनाकर सारे अध्यापकों को दे देंगे तो काम नहीं चलेगा | धर्मावलंबन की विधियों का सृजन प्रत्येक को अपनी प्रतिभा का समुचित उपयोग करते हुए करना होगा | यह सृजन प्रक्रिया प्रत्येक के लिए स्वतंत्र होते हुए भी व्यक्तिगत नहीं हो सकती | धर्म का मर्म सामूहिक क्रिया में है | अतः स्वाध्याय भी सामूहिक ही करना पड़ेगा | चिंतन मनन द्वारा समझे हुए तत्व को व्यवहार में उतारने का नाम है निदिध्यासन | इसी से स्वाध्याय परिपूर्ण होगा | स्वाध्यायी आचार्यों के नियमित मंडल सर्वत्र प्रारम्भ करने होंगे | प्रयत्नपूर्वक पूरे समाज में इस योजना को क्रियान्वित करना होगा |

स्वाध्याय से प्राप्त विधियों को अपने-अपने अध्यापन में प्रयोग कर परिष्कृत किया जायेगा | ऐसे कुछ शिक्षक साथ मिलकर या तो पूर्व से चल रहे शिक्षा संस्थान को आदर्श बनायेंगे अथवा नूतन पूर्णतः धर्मानुसारी शिक्षा संस्थानों का निर्माण करेंगे | इनके प्रभाव से नीतियों में भी परिवर्तन होगा | प्रारम्भ में केवल इतना भी हो जाये कि राजसत्ता ऐसे पूर्णतः निःस्वार्थ भाव से चलनेवाले गैर-वाणिज्यिक धार्मिक शिक्षा संस्थानों को स्वतंत्रता से कार्य करने दे, किसी भी प्रकार का नीतिगत हस्तक्षेप ना करने दे तो भी पर्याप्त है | ऐसे समाजपोषित शिक्षा संस्थान क्रमशः प्रमुखता प्राप्त करते जायेंगे व शासनमुक्त शिक्षा व्यवस्था का विकास करेंगे |

Saraswati-Statue-to-Washingtonइस पूरी प्रक्रिया में शैक्षिक संगठनों की भी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है | इस हेतु शैक्षिक संगठनों के कार्यकर्ताओं का मानस धर्मसंकल्पना के प्रति दृढ़ करना होगा | वर्तमान में देश में भारतीय दृष्टी को ध्यान में रखकर काम करनेवाले तीन प्रकार के शैक्षिक संगठन कार्यरत हैं | कुछ संगठन शिक्षा संस्थानों का संचालन करते हैं | निःस्वार्थ सेवा भाव से राष्ट्रनिर्माण हेतु चरित्र निर्माण करनेवाली संस्कारवान शिक्षा प्रदान करनेवाले कई शैक्षिक संगठन हैं | संख्या की दृष्टी से विद्याभारती इनमें अग्रणी है | रामकृष्ण मिशन, चिन्मय मिशन, भारत सेवक समाज, सर्वोदयी विचारधारा से चलनेवाले संगठन आदि अनेक संगठन इस श्रेणी में आते हैं | यद्यपि इन शिक्षा संगठनों द्वारा चलाये जानेवाले शिक्षा संस्थान आधुनिक व्यवस्था का अंग होने के कारण पूर्णतः भारतीय नहीं है | फिर भी इन संगठनों का संचालन करनेवाले कार्यकर्ताओं की मंशा धर्माधिष्ठित भारतीय पद्धति को स्थापित करने के लिए अनुकूल है | धर्मदृष्टि को समझने से इन शिक्षा संस्थानों के शिक्षकों द्वारा संक्रांति होना तुलनात्मक रूप से अधिक सुकर होगा |

दूसरे प्रकार के संगठन शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत विभिन्न घटकों के हितों की रक्षा हेतु काम करते हैं | विद्यार्थियों के हितों के लिए विद्यार्थी संगठन जैसे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, शिक्षकों के हितों के लिए विभिन्न राज्यों में गठित शिक्षक संघ तथा कई राज्यों में निजी संस्थाचालकों के संगठन भी हैं | इस प्रकार के शैक्षिक संगठन प्रमुखतः अपने सदस्यों के अधिकारों, आर्थिक हितों तथा समस्याओं के समाधान हेतु आन्दोलन शासन से चर्चा अथवा न्यायालयीन दावों के माध्यम से कार्य करते हैं | इन संगठनों का मूल स्वभाव सदस्यों की स्वार्थपूर्ति होने के कारण इनमें जुडनेवालों के मन में भी निजी हितों की वरीयता अधिक होती हैं | इसका सकारात्मक परिणाम यह है कि इन संगठनों की सदस्य संख्या बहुत अधिक होती है | यह संख्याबल इनकी प्राथमिक शक्ति है | धर्मानुसारी शिक्षा के तत्वों का प्रचार कर अनुकूल वातावरण निर्मिती में ये संगठन महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं | इनके माध्यम से शिक्षा में जुड़े हुए एक बड़े वर्ग तक वैचारिक सन्देश पहुंचाना संभव हो सकता है | यद्यपि इसका सैद्धांतिक गुणांकन नहीं होगा फिर भी धर्माचरण में रत शिक्षकों को नैतिक समर्थन देनेवाले अनुकूल मन के समर्थकों का वर्ग तैयार किया जा सकता है | ये लोग स्वाध्याय और संक्रांति के क्रियान्वयन में पूरी तरह से सहभागी भले ही न हो उसके लिए पोषक उर्वराभूमि का निर्माण निश्चित रूप से कर सकते हैं | संक्रांति के द्वितीय चरण धर्माधिष्ठित शिक्षा के सर्वव्यापीकरण में लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत संख्या का भी बड़ा महत्त्व है | इस चरण में इन शैक्षिक संगठनों की भूमिका सबसे प्रभावी होगी | इन संगठनों में धर्मानुसारी शिक्षा के विचार का बीजारोपण करने हेतु कुछ वैचारिक कार्यक्रमों की योजना करना आवश्यक होगा | ऐसे कार्यक्रमों के माध्यम से कार्यकर्ताओं को धर्मसंकल्पना का परिचय दिया जा सकेगा | संख्या बड़ी होने के कारण पूर्ण वैचारिक स्पष्टता की अपेक्षा तो नहीं कर सकते, केवल अधिकारों के साथ कर्तव्यों का विचार करने का संस्कार भी प्रेरित किया जा सके तो प्रारंभ के लिए पर्याप्त होगा | अधिकारों के लिए लड़ने के साथ ही कर्तव्यपालन में ही हमारा अधिक स्थायी हित है यह बात समझना धर्मविचार का शुभारम्भ है |

तीसरे प्रकार के शैक्षिक संगठन वैचारिक कार्य करनेवाले संगठन हैं | इनका मूल काम ही शिक्षा के भारतीय प्रतिमान पर अनुसंधान कर उसे युगानुकूल रूप में प्रस्थापित करने का नियोजन करना है | पुनरुत्थान विद्यापीठ, भारतीय शिक्षण मंडल, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास आदि संगठन इस श्रेणी में आते हैं | धर्माधिष्ठित शिक्षा को ही विभिन्न नामाभिधानों से प्रकट करते हुए उसकी संस्थापना हेतु ये वैचारिक संगठन कार्य कर रहे हैं | शिक्षा व्यवस्था में धर्मसंस्थापना हेतु संक्रांति करने में इन संगठनों की योजक भूमिका अपेक्षित है | संक्रांति के लिए आवश्यक विभिन्न घटकों को एक सूत्र में गूंथने का परोक्ष कार्य इन संगठनों को करना होगा | संक्रांति के तात्विक अधिष्ठान की सुस्पष्टता की जिम्मेवारी भी इन्ही संगठनों की बनती है | अनादि काल से भारत में जीवंत धर्मसंकल्पना को मूल रूप में समझकर उसका युगानुकुल स्पष्टिकरण समाज में प्रदान करना धर्मानुसारी शिक्षा के लिए प्रथम आवश्यकता है | धर्म तो साक्षात्कार का विषय है | अतः इन संगठनों के कार्यकर्ताओं को साधक बनना होगा | उपरी प्रवचन, उद्घोषणाएं, प्रस्ताव आदि तो संगठनात्मक आवश्यकताओं के अनुरूप चलते रहेंगे किंतु इन संगठनों का वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि गहन गंभीर साधना को तत्पर कितने कार्यकर्ताओं का निर्माण इन संगठनों की प्रेरणा से हुआ | संक्रांति के अन्य सभी चरणों की शुद्धि, पावित्र्य, प्रभाव, साफल्य तथा सार्थकता इस साधना पर निर्भर करती है | अतः इन संगठनों से जुड़े सभी कार्यकर्ताओं का शास्त्राध्ययन तथा स्वाध्याय कठोर नियमितता के साथ होना अपेक्षित है | समय-समय पर सामूहिक विमर्श, प्रत्यक्ष प्रयोग, उन प्रयोगों से प्राप्त अनुभवों पर पुनः सर्वांगीण संविमर्श तथा आपसी समन्वय यह इस साधना की कार्यपद्धति बनती है | इस चर्चा स्वाध्याय के साथ ही इन विचारों का युगानुकुल शब्दावलि में संहिता लेखन भी अनिवार्य है | तैतरीय उपनिषद् के शिक्षावल्ली अनुवाक् में गुरु अपने दीक्षांत आदेश में स्पष्ट निर्देश दे रहा है – स्वाध्याय प्रवचनाभ्यां मा प्रमदितव्यं – स्वाध्याय और प्रवचन में कभी आलस न करना | यहाँ वर्तमान युग के अनुरूप प्रवचन के अर्थ को विस्तारित करके समझना होगा | वैसे भी प्रवचन का अर्थ है पूर्ण गंभीरता से प्रकट करना – प्रकर्षेण वाच्यति इति प्रवचनं | वर्तमान स्थिति में वैखरी वाणी का अक्षररूप अर्थात लिखित साहित्य अधिक प्रामाणिक माना जाता है | अतः प्रवचन के अर्थ में गंभीर लेखन को सम्मिलित करना पड़ेगा | वैचारिक संगठनों के कार्यकर्ताओं को प्रयत्नपूर्वक नित्यलेखन का अभ्यास करना होगा | प्रतिदिन नियमपूर्वक कुछ पृष्ठ लिखने की आदत बन जाये तो शनैः शनैः लेखनी में स्पष्टता व लेखन में गांभीर्य आ जायेगा |

धर्म के सुस्पष्ट साक्षात्कार के साथ ही वैचारिक संगठनों के कार्यकर्ताओं का यह भी दायित्व बनता है कि उसका युगानुकुल प्रयोग करे | अतः शिक्षकों व पहले दो प्रकार के संगठनों के साथ मिलकर शिक्षा में धर्मप्राण नवोन्मेष करने का शुभ व्रत भी इन संगठनों का है | ऐसे प्रयोगों से प्राप्त निष्कर्षों को संहिताबद्ध कर अनेक स्थानों पर दोहराने योग्य प्रतिमान का निर्माण करना होगा | यह प्रतिमान सभी स्तरों पर स्वाध्याय, प्रयोग व धर्माचरण का आधार बनेगा | इसी प्रतिमान से धर्मानुसारी शिक्षा को स्थापित करने, धर्मप्राण, स्वाध्यायी आचार्यों की संक्रांति संभव होगी |

अप्रैल 4, 2016 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , | 11 टिप्पणियाँ

Call for Rebooting Education System


TNIEThe New Indian Express deserves congratulations for publishing the series ‘Think Edu Conclave’. The articles by Amita Sharma in the 4th March issue [page 9], and that of  Dr. S. Vaidhyasubramaniam  in the issue of 11th March [page 7] both are really commendable.

Amita Sharma has given very comprehensive overview of the work going on in various IIT’s in the field of research in ancient Bhartiya knowledge system. Her approach towards this subject is very logical and scientific. Without unduly glorifying the traditional achievements of Bharatiya scientists from time immemorial, she emphasises the need of indepth study of their works. Her concluding point appeals to the intellectual mind to come out of dogmatic thinking in terms of binaries such as traditional and modern,  eastern and western and to integrate whole knowledge system for the betterment of humanity.

It has been understood in Bharat that knowledge has no boundaries. “आ नो भद्र: क्रतवो यन्तु विश्वत:” Bharat has been traditionally an open society where knowldge and wisdom are welcomed from all the frontiers. The only purpose of knowledge as per Bharatiya tradition has been the search of inherent oneness- truth and it’s applications for the good of whole humanity. Hence, as beautifully elaborated by Dr. S. Vaidhyasubramaniam in his piece, the traditional knowledge system in Bharat had been widespread and well evolved even in the first decades of 19th century.  

dharmapalDr. S. Vaidhyasubramaniam has extensively quoted from the seminal work of Shri Dharmpal. The data given in Dharmpal’s ‘One Beautiful Tree’ from the primary sources of British surveys is an eyey opener for all of us. It is indeed tragic that this great knowledge has not been made part of formal curriculum even after being in public domain for more than five decades now. read dharmapal here – http://www.samanvaya.com/dharampal/

Both the accomplished authors lament the fact that Bharatiya traditional knowledge system has been neglected completely by the formal education system in independent India. It is indeed hightime that we in Bharat take the revolutionary step of integrating our own indegeneous knowledge system in the main stream education policy. Whole world is facing similar problems in the field of education. Right kind of methodolgy for elementary education is an area of concern for both developed and developing countries. We have the advantage of having a deep rooted cultural background in evolving decentralised, need based, socially self-sufficient education system. We have done so for centuries together. With this genetic advantage we can provide a panacea to the universal problems of complementry education system; with the use of modern technology blended with traditional methodology. This is the paradigm shift called for by both the learned authors.

There is a hope that the atmosphere for complete change in the country auguers well to this much needed systemic change in the field of education right from primary to higher education.

See the original article in TNIE here

http://www.newindianexpress.com/opinion/Designing-Integrated-Knowledge-Systems/2014/03/04/article2088788.ece

 

http://www.newindianexpress.com/nation/Reboot-Indian-Primary-Education/2014/03/11/article2101794.ece

Both of them were speaker at the event 

http://www.newindianexpress.com/nation/Indian-Educators-Ignorant-of-Countrys-Academic-Contributions-to-West/2014/01/30/article2028717.ece

मार्च 14, 2014 Posted by | सामायिक टिपण्णी, English Posts | , , , , , , , , | टिप्पणी करे

स्वावलम्बी युवा! समर्थ भारत!!


sawarkarस्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर को किसी युवा ने पूछा कि आप युवा किस कहते है? भाषा शुद्धिकरण के आन्दोलन को चलाते हुए भारतीय भाषाओं को अनेक नवरचित शब्दों का योगदान देनेवाले महान भाषाशास्त्री सावरकर ने उत्तर दिया, “पद को उलटा करके देखो तो उसका अर्थ स्पष्ट हो जाता है। युवा का प्रतिशब्द है – ‘वायु’। जैसे अनुशासनहीन वायु प्रभंजन के रुप में जीवन का नाश करता है किन्तु जब प्राणायाम से अनुशासित हो जाता है तब वही वायु प्राणदाता बन जाता है। वैसे ही युवा हैं। अनुशासित हो तो राष्ट्र का प्राण और अनुशासनहीन होकर किसी भी व्यवस्था के लिए असाध्य चुनौती।”

आज भारत की 62% जनसंख्या युवा है। जनगणना के आंकड़ों के अनुसार 13 से 45 के मध्य आयुवाले युवाओें की संख्या कुल 125 करोड की आबादी के 62% अर्थात 75 करोड से ऊपर है। किसी भी राष्ट्र के लिए यह अत्यंत गर्व के साथ ही आर्थिक विकास के प्रचंड अवसरों का विषय है। साथ ही चुनौती भी कि इस असाधारण शक्ति का समुचित सदुपयोग हो। अन्यथा अनियंत्रित होने से यही ऊर्जा राष्ट्र विघातक विस्फोटक का कार्य भी कर सकती है। ऊर्जा को बलपूर्वक नियंत्रित नहीं किया जा सकता। जबरदस्ती अथवा दबाव से तो वह और अधिक विध्वंसक बन जाती है जैसे डटे हुए सेफ्टी वाल्व वाले प्रेशर कुकर में भांफ। ऊर्जा के अनुशासित नियोजन का सर्वोत्तम तरीका है उसका सुव्यवस्थित परिचालन। ऊर्जा को सही दिशा में किसी ध्येय की ओर कार्य में लगा देना ही उसका सदुपयोग है। वर्तमान समय में भारतीय समाज के पास अपनी युवाशक्ति को सम्यक ध्येय के साथ सही दिशा की ओर कार्यरत करने की महती चुनौती हैं।

स्वंतत्रता के बाद सबसे बडी विकृती सारे समाज मे व्याप्त हुयी है वह है – शासनावलम्बिता। हम छोटे से छोटे कार्य के लिए भी सरकार का मुँह ताकते हैं। घर में सफाई करने के बाद सरकारी सडक पर सरेआम कचरा फेंकने वाले सभ्य नागरिक स्थानीय शासन से अपेक्षा करते हैं कि नगर में सफाई एवं सौन्दर्य का ध्यान रखें। इसी परावलंबी मानसिकता के कारण ‘युवा भारत‘ के सुनियोजन का दायित्व भी हम लोग सरकार को ही दे बैठे हैं। शासन का नीति निर्धारण इस दिशा में हो इस दृष्टि से आवश्यक मंथन व चिंतन समाज के प्रबुद्ध वर्ग मे होता दिखाई नही देता है। समाज द्वारा वैचारिक अधिष्ठान प्रदान किए बिना शासन की कोई भी नीति कारगर सिद्ध नही होती। अतः युवाओं के ऊर्जा प्रबंधन का दायित्व युवा वर्ग ही सामुहिक रुप से संगठित हो उठायें तो वह प्रभावी एवं परिणामकारी होगा। राष्ट्रनिर्माण का दायित्व शासन का नहीं, समाज का है। समाज जब इस उत्तरदायित्व का निर्वाह करने लगता है तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में ही नहीं राजतंत्र में भी शासन ऐसे प्रबुद्ध समाज का अनुगामी बनने लिए बाध्य हो जाता है।

स्वानुशासन से ऊर्जा का सुनियोजन करने हेतु युवाओं में संकल्प का जागरण करना आवश्यक है। वर्तमान शिक्षाप्रणाली के चलते पनपी मानसिक दासता के कारण आज का युवा स्वावलंबन के स्वप्न भी नही देखता। देश की सर्वोच्च प्रतिभा के अत्युच्च स्वप्न किसी सरकारी, निजी अथवा बहुराष्ट्रीय ऊपक्रम में नौकरी पाना हो गये हैं। प्रतिवर्ष लाखों युवा कुछ हजार सरकारी नौकरियों के लिए प्रतिस्पर्धा परीक्षा में अपनी ऊर्जा को व्यय करते हैं। सबसे प्रतिष्ठित प्रशासकीय नौकरी भारतीय प्रशासनिक सेवा की प्रथम परीक्षा में बैठने हेतु साढे पाँच लाख से अधिक युवा पंजीयन कराते हैं किन्तु उसमे से आधे ही परीक्षा मे बैठते हैं। इनमे सें 13,14 हजार ही मुख्य परीक्षा के लिए पात्र हो पाते और इनमें अंतिम सफलता 800 से 900 परीक्षार्थिओं को ही मिलती है। अर्थात प्रतिवर्ष बडी मात्रा में असफल युवाओं के झुंड़ का निर्माण यह प्रतियोगी परीक्षा करती है। इन असफल युवाओं के साथ ही अन्य नौकरियों के आकांक्षियों को मिलाकर लगभग 90 लाख परीक्षार्थी बैंक, रेल्वे, बीमा आदि अर्द्ध सरकारी नौकरियों के लिए ली जानेवाली प्रतियोगिता परीक्षाओं में बैठते हैं। इनमें से कुछ हजार नौकरी पा भी जाते हैं। उपलब्ध रिक्त स्थान व उसके लिए प्रयत्नरत परीक्षार्थिओं के मध्य यह अत्यंत विसंगत अनुपात समाज की दासता का घोतक है। पूरा समाज ही गुलामी के लिए उत्सुक है। इसका मुख्य कारण यह है कि समाज मे सरकारी नौकरी को गैर अनुपातिक प्रतिष्ठा प्राप्त है। ज्ञान, योग्यता और परिश्रम वा परिणाम में प्रशासनिक सेवा के अधिकारी समाज में बिलकुल भी अग्रणी नहीं हैं किन्तु सम्मान मे इनका स्थान लगभग सर्वोच्च हैं। इस दिखावे की प्रतिष्ठाा के लिये ही इतने युवा असफलता की आशंका के होते हुए भी नौकरी के लिये प्रयासरत रहते है।

नौकरियों के इस परिदृश्य का अत्यंत विद्रुप पहलू यह भी है कि सेना की तीनों शाखाओं मे लगभग 15000 अफसरों के स्थान इस कारण से रिक्त है क्योंकि सुयोग्य युवा उस ओर आकर्षित नही हो रहें। सामान्य सिपाही की भरती के लिए हजारों की भीड़ लग जाती है किन्तु सें संकल्पित अधिकारियों के स्थान योग्य युवाओं की तलाश मे रिक्त रह जाते हैं। किसी भी राष्ट्र की शिक्षा व्यवस्था के यह प्रेरणाहीन परिदृष्य चिन्ता का विषय होना चाहिए। इस महान गौरवशाली राष्ट्र की युवा शक्ति को राष्ट्र निर्माण करने हेतु आत्मनिर्भर बनना होगा। अपने स्वभाव के अनुरुप परिश्रम के द्वारा उद्योग के नवनिर्माण का आत्मविश्वास जब युवाओं मे जग जाता है तब वह रोजगार के लिए दूसरों की ओर नही ताकता।

ऊर्जा प्रबंधन में विकेन्द्रित स्वप्रबंधन ही सर्वोत्तम मार्ग है उसी प्रकार युवा शक्ति के प्रबन्धन हेतु स्थान स्थान पर युवाओं की टोलियाँ संगठित होकर अपने youthपरिश्रम से सृजन के स्वप्न साकार करने लगे। यही 75 करोड युवाओं के सदुपयोग का एकमात्र सुनिश्चित मार्ग है। स्व-रोजगार से ही युवा शक्ति का सम्यक, स्वाभिमानी, उत्पादक प्रयोग हो सकता हैं। कितनी भी सरकारी अथवा निजी नौकरियों का निर्माण करने का उद्यम शासन के केन्द्रीकृत प्रयासों द्वारा किया जाए तब भी यह व्यावहारिक रुप से संभव ही नही है कि किसी देश की 62% जनसंख्या नौकरी करें। हर 100 मे से कम से कम एक युवा नौकरी करने की बजाय नौकरी देने का विचार करने लगे तो यह स्वप्रेरित रोजगार निर्माण ही राष्ट्रनिर्माण का माध्यम बन सकता है।

इस हेतु शिक्षा के साथ ही समाज में पोषक वातावरण का निर्माण भी आवश्यक हैं। उद्यमियो का सम्मान सुप्रतिष्ठित करना होगा। भारतीय संस्कृति में उत्पादक कार्य को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती थी। उत्पादित सामग्री के वितरण, विपणन एवं व्यापार को दुय्यम स्थान था। इस सब आर्थिक व्यवहार के लिए पूरक सेवाओं अर्थात नौकरी को सबसे निकृष्ट माना जाता था। सबसे प्राथमिक उत्पादन तो कृषि में होता है। किसान ही मूल वित्त का निर्माता है। अन्य उद्योग कृषि उत्पाद को रुपांतरित कर सामग्री का निर्माण करते हैं। कृषि के समान ही खनन भी मूल कच्चे माल का उत्पादन करता है किंतु यह कृषि से निम्न हैं क्योंकि खनिजों का भंडार सीमित है एवं पुनर्निर्माण संभव नहीं। कृषि उत्पादन जैविक होने के कारण यदि प्रकृति के समन्वय से कृषि कार्य को किया जाए तो अनंत काल तक असीम उपज संभव हैं। इसीलिए भारत मे कहा गया ‘उत्तम कृषि, मध्यम व्यापार और अधम नौकरी’। इस शुद्ध अर्थशास्त्रीय तत्व की समाज में पुनःप्रतिष्ठा मानवता के अस्तीत्व के लिए अनिवार्य है। आज नौकरी सर्वाधिक प्रतिष्ठित एवं कृषि सर्वाधिक उपेक्षित आर्थिक कार्य हो गया है। प्रतिष्ठा व उत्पादन का यह विपरित संबंध समाज के साथ ही पर्यावरण के भी विघटन एवं विनाश का कारण बन गया है।

youth worldबाह्य रुप से परस्पर विरोधी लगने वाली यह परिस्थिति चुनौती के साथ ही युवा शक्ति को एक अवसर भी प्रदान कर रही है। बडी मात्रा में युवाबल का होना यह सकारात्मक पहलू व परावलंबी नीतियों लगातार चलने के कारण शासनवलंबी विकास के प्रादर्श को अपनाने के कारण आत्मबलहीनता यह दो परस्पर विरोधी तत्व समाज में काम कर रहे हैं। शारीरिक आयु के अनुसार युवा हैं किन्तु युवा का स्वाभाविक उत्साह, आत्मविश्वास व उत्पादक उत्सुकता शासनाभिमुख मानसिकता के कारण सुप्त अथवा मरी हुयी है। शासन में इस युवा शक्ति के सम्यक सदुपयोग की ना तो कोई दृष्टि है न ही व्यावहारिक नीति अतः युवा शक्ति के राजनैतिक दुरूपयोग की संभावना भी क्षीण है। शासन की उदासीनता ने युवा वर्ग को एक प्रकार से स्वनिर्णय व स्वनियोजन की स्वतंत्रता प्रदान कर दी है। आवश्यकता केवल स्वप्रेरणा से उद्यम की है। इसके लिये कुछ व्यावहारिक ठोस उपाय किये जा सकते है।

1. उच्च शिक्षा में पढ रहे युवाओं के मध्य युवाओं के द्वारा ही एक सकारात्मक वैचारिक आंदोलन प्रारंम्भ हो चुका है – Don’t be a job seekar be a job giver  रोजगार माँगो मत रोजगार देनेवाले बनो। सामाजिक प्रसार माध्यम फेसबुक पर इस आंदोलन का जालपृष्ठ Webpage भी है। आवश्यकता है, इस आंदोलन का सब दूर प्रसार कर अधिक से अधिक युवा इसमें जुडे़ं।

2. युवा ही एकत्रित आकर उद्यमिता विकास के प्रकल्प प्रारंभ करें। अनेक सरकारी योजनाओं का लाभ संगठित होकर लिया जा सकता है। कौशल विकास youth logo(Skill development) के माध्यम से स्वरोजगार के अनेक क्षेत्र खुले हैं। निजी सुरक्षा (Private sequrity), खरखाव (House keeping),  पर्यटन (Tourism), घरेलू सेवायें जैसे नल कार्य (Plumbing), बढई (Carpentery), सिलाई (Tailoring), बिजली कार्य (Electrician) आदि के लिए संगठित होकर प्रशिक्षण, प्रचार, विपणन व क्रियान्वयन किया जा सकता है। इन सबके लिए अलग-अलग प्रतिष्ठानों, भागीदारी व्यवसाय (Partenership) अथवा कंपनी का भी गठन किया जा सकता हैं। डा रघुनाथ माशेलकर की अध्यक्षता में कार्य कर रहा राष्ट्रीय कौशल विकास प्राधिकरणNational Skill Development Corporation (NSDC) भी इस कार्य हेतु सहायता प्रदान करता है।

3. सहकारिता के द्वारा युवाओं के नवनवीन उद्यम खोले जा सकते हैं। (National youth co-operative society (NYCS)  इस क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण पहल है।

4. युवाओं के उद्योग को वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए युवा अधिकोष (Youth bank) जैसे प्रकल्पों का प्रारंभ किया जा सकता हैं।youth

5. शिक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण अवसर हैं जिसमें युवा स्वावलंबी व्यवसाय प्रारंभ कर सकते हैं। प्राथमिक विद्यालयों से लेकर निजी मार्गदर्शन (Private coching) और निजी महाविद्यालय तक सभी प्रकार के प्रयास किये जा सकते हैं। कुछ युवाओं को एकत्रित आकर इस दिशा में पहल करनी चाहिये।

6. उत्पादन के क्षेत्र में भी संगठित युवा पहल की आवश्यकता है। जैविक खेती, गो-पालन, मत्स्यपालन, मधुमक्खीपालन, अन्य पशुपालन के क्षेत्र में अवसर उपलब्ध है। आधुनिक प्रसार माध्यमों व तकनीकों का प्रयोग कर इन पारंपारिक व्यवसायों में क्रांति की जा सकती है।

revolution7. समाज सेवाके क्षेत्र में भी युवाओं को समर्पित संगठित प्रयास करने की आवश्यकता है। शिक्षा, चिकित्सा व स्वावलंबन इन तीनों प्रकार के सेवा प्रकल्पों में युवाओं की अत्यधिक आवश्यकता है।

8. ध्येयवादी राष्ट्रीय राजनीति में भी शुद्ध चरित्र के संकल्पबद्ध युवाओं को आगे बढने की आवश्यकता है। राजनीति का अर्थ केवल मंचीय नेतृत्व नहीं है। वास्तव में नेताओं को नीतिओं के बारें में अनुसंधान, अध्ययन कर परामर्श देने वाली टोली की अनिवार्य आवश्यकता है। यह कार्य सुशिक्षित, आधुनिक तकनीक मे तज्ञ युवा ही कर सकते हैं। नीतिगत अनुसंधान, सर्वेक्षण तथा प्रसार यह भी राजनीति का एक अनुंषागिक कार्य है। जिसमें आज बहुत कम लोग लगे हुए हैं। दल-निरपेक्ष राजनीतिक अनुसंधान राष्ट्र के लिये अत्यंत आवश्यक कार्य है। 

भारत एक अतिप्राचीन चिरयुवा राष्ट्र है। समय के प्रवाह के पढकर उसके साथ गतिमान सांस्कृतिक परिवर्तन की लचीली क्षमता ने इस राष्ट्र को कठिन से कठिनतम चुनौतियों के मध्य न केवल जीवित अपितु विजयी बनाये रखा है। काल के प्रवाह में अवसर के कुछ गवाक्ष समय समय पर खुलते हैं। ऐसा ही एक युग परिवर्तन का दौर आज चल रहा है। विश्व भारत से मार्गदर्शन की प्रतीक्षा में है। आइये! ‘युवा भारत’ को उत्पाकद उत्साह से भर दें और यह राष्ट्र अपने चिरयौवन से जगत का जागरण करने के वैश्विक कर्तव्य को पूर्ण करें इस महायज्ञ मे हम अपने जीवन की आहुती प्रदार करें।

दिसम्बर 22, 2013 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , | 3 टिप्पणियाँ

चुनावी रणभूमी मे राष्ट्रवाद का शंखनाद


Republic day2चुनाव लोकतंत्र का महोत्सव है। वर्तमान में चुनाव आयोग द्वारा डाले गये कठोर निर्बंधों के कारण इस महोत्सव का उत्साह कुछ धीमा पड गया दिखता है। जमीनी गतिविधियों का स्थान अब प्रसार माध्यमों के अंदर होनेवाली प्रचार उथल-पुथल ने ले लिया है फिर भी चुनाव का समय सबके लिए ही अतिविशिष्ट सक्रियता का समय होता है। सभी प्रकार के कार्यकर्ता सक्रिय हो जाते हैं। सामाजिक कार्यों मे लगे, सामन्यतः गैर राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय कार्यकर्ताओं के लिए यह चिरंतन संभ्रम बना रहता है कि इस सक्रियता में योगदान करें अथवा नहीं और करें तो किस प्रकार से करें? भारत के वर्तमान परिदृश्य में सरकारी व्यवस्था से अछूता रहना लगभग असंभव है। जीवन के हर क्षेत्र में शासन का हस्तक्षेप है। माना कि ये स्थिति आदर्श नहीं है और विदेशी दासता के अवांछनीय अवशेष के रुप मे विद्यमान है किंतु यह भी नकारा नही जा सकता कि यह वास्तविकता है।

स्वतंत्रता पश्चात् हमने लोकतंत्र को राजनैतीक व्यवस्था के रुप मे स्वीकार किया। भारत के संविधान ने जनता को सर्वोपरि सार्वभौम सत्ता के केन्द्र के रुप के प्रतिष्ठित किया। अपेक्षा थी कि लोकतांत्रिक व्यवस्था इस धारणा को सृदृढ कर प्रत्यक्ष मे उतारती किन्तु प्रतिनिधिक लोकतंत्र के जिस स्वरुप को हमने भारत में अपनाया उसने समाज को जोडने के स्थान पर विघटित करने का ही काम किया। सर्वाधिक मत पाने वाले प्रत्याशी के विजय की व्यवस्था के कारण सबसे बडे गुट का प्रतिनिधि ही जनप्रतिनिधि कहलाया जाता है। बहुदलीय व्यवस्था के अंतर्गत चुनाव क्षेत्र मे अनेक प्रत्याशी होते हैं। जिसको सर्वाधिक मत प्राप्त होते हैं उसे विजयी घोषित कर दिया जाता है। इस व्यवस्था ने ऐसी हास्यास्पद विडम्बना की स्थिति उत्पन्न कर दी है कि कई स्थानो पर 15% से कम मत प्राप्त करने वाले प्रत्याशी भी जनप्रतिनिधि के रुप मे चुने जाते हैं। वास्तव मे देखा जाए तो डाले गए मतों मे से 85% से अधिक मतदाताओं ने इस नेता को प्रतिनिधि के रुप मे नकार दिया फिर भी सबसे बडे गुट का नेता होने के कारण वह उन 85% लोगो का भी प्रतिनिधि कहलाया जाता हैं। यह स्वाभाविक ही था कि राजनीतिक दलों ने अपने निहित स्वार्थ के लिए व्यवस्था की इस कमजोरी का उपयोग किया।

EVMजाति, वर्ग, भाषा आदि जो भी समाज को तोडने के माध्यम मिले उनके द्वारा अपने गुट को सबसे बडा सिद्ध करने का प्रयत्न किया जाने लगा। क्षेत्रीय दलों के उभार ने रणनीति को और आगे बढ़ाकर अपने सीमित समर्थन को बड़ा बनाने के लिए बाकी बचे समाज को छोटे छोटे टुकड़ों में खंडित करने का काम किया। यदि किसी नेता या दल के पास जाति अथवा ऐसे ही किसी आधार पर 100 मे से 20 मतदाताओं का समर्थन है तो उसने भिन्न-भिन्न तरीकों से समाज के बाकी बचे 80 मतदाताओं को इतने टुकडों मे बाँटने का काम किया कि कोई गुट उसके गुट से बड़ा न हो जाए। विभाजनकारी राजनीति ने स्वतंत्रता के 66 वर्षों के पश्चात भी भारत की सुप्त क्षमता को प्रकट नहीं होने दिया है। आज विश्व मे चहुँ ओर सभी देश भारत के सामथ्र्य की सराहना करते हैं। जिनके मन मे मित्रता नही है वे भारत के उभरने की संभावना से आशंकित रहते हैं। किंतु इस राष्ट्र के सामथ्र्य-सूर्य को विघटनकारी राजनीति का ग्रहण लगा है। भारत में राष्ट्र पुनर्निर्माण के कार्य को यदि पूर्ण गति प्रदान करनी है व व्यवस्थागत प्रतिष्ठा दिलानी है तो उसके लिए राजनीति के विभाजक तंत्र को बदलना आवश्यक है। इसके बिना बाकी सारे प्रयास छलनी मे पानी भरने के समान निष्प्रभावी हो जाते हैं।

व्यवस्था  परिवर्तन इसका स्थायी समाधान है।First past the post ’सर्वाधिक मत पानेवाला विजयी’ इस व्यवस्था के स्थान पर प्रत्यक्ष एवं पूर्ण लोकतंत्रकारी ECव्यवस्था ‘बहुसंख्य का समर्थन’ ‘Mojority representation’ की व्यवस्था को लागू करना होगा। इसके अंतर्गत किसी भी चुनाव में जीतने के लिए डाले गए कुल मतों में से 50 प्रतिशत से कम से कम एक मत अधिक पानेवाला व्यक्ति ही विजयी घोषित होगा। ऐसी स्थिति में समर्थन करने वाले मतदाताओं की संख्या नकारने वाले मतदाताओं से निश्चित ही अधिक होगी। तब चुना हुआ नेता सच्चे अर्थ में क्षेत्र का प्रतिनिधि होगा। इस व्यवस्था को लागू करने मे अनेक आक्षेप व कठिनाइयाँ गिनाई जाती है किन्तु राजनीति को राष्ट्रीय एकात्मता के लिए बाध्य करने के लिए यही चिरस्थायी उपाय है। विश्व के अनेक देशों में इसी व्यवस्था के अंतर्गत चुनाव होते है। भारत से भी भौगोलिक रुप से विस्तृत व आबादी में भी लगभग बराबरी के रशिया में भी सभी आम चुनाव इसी विधि से होते हैं। यदि किसी चुनाव क्षेत्र में प्रथम चरण के मतदान में किसी को भी 50% से अधिक मत नही प्राप्त होते हैं तो प्रथम व द्वितीय स्थान पर रहने वाले प्रत्याशियों के मध्य दूसरे दिन पुनः मतदान कराया जाता है। अपने आप किसी न किसी को 50% से अधिक मत मिलेंगे ही। प्रायः ऐसा देखा गया है दूसरे चरण के मतदान की आवश्यकता ही नही पड़ती। इस व्यवस्था में स्वाभाविक रुप से ही प्रत्येक दल ऐसे प्रत्याशी का चयन करता है जिसे समाज के भिन्न-भिन्न वर्गों का समर्थन मिल सके। गुटीय हितों के स्थान पर सामूहिक हित चुनावी मुद्दे बन जाते हैं। क्षेत्रीयता, साम्प्रदायिकता, जातीयता आदि चुनाव जिताने के लिए सक्षम नही होते। अतः राष्ट्रीयता, एकात्मता, एकता, समरसता यह विषय अधिक प्रभावी होते हैं।

मन में यह प्रश्न आना स्वाभाविक है कि जब तक यह व्यवस्था परिवर्तन नही हो जाता तब तक राष्ट्रवाद का चुनावी राजनीति में कोई स्थान ही नहीं? वास्तव में बात बिल्कुल इसके विपरीत है जब तक संपूर्ण एवं प्रभावी लोकतंत्र के रुप मे बहुसंख्या का प्रतिनिधित्व यह नियम लागू नही होता तब तक राजनीति के द्वारा समाज के विभाजन को रोकने का एकमात्र उपाय है ’राष्ट्रवादी राजनीति’। जातीयता, साम्प्रदायिक तुष्टीकरण, वर्गवाद, धनबल तथा बाहुबल आदि लोकतंत्र के असाध्य विकारों को ठीक करने का एकमात्र उपाय है – ’चुनावी रणभूमी मे राष्ट्रवाद का शंखनाद’। राष्ट्र का हित, राष्ट्र की संस्कृती, राष्ट्रीय परंपरायें, राष्ट्रीय जीवनध्येय इन पर आधारित नीतियों को महत्व देनेवाले दल एवं नेता का जब समाज स्वयंस्फूर्त समर्थन करने लगेगा तब अन्य सभी संकुचित स्वार्थों पर आधारित विघटनकारी मुद्दे गौण हो जायेंगे। समाज में काम कर रहे प्रत्येक सामाजिक कार्यकर्ता का यह कर्तव्य बन जाता है कि ऐसे राष्ट्रवादी वातावरण का जागरण करें।

bharatmataलोकतंत्र के महत्वपूर्ण स्तंभ प्रसार माध्यमों का भी कर्तव्य बन जाता है कि विघटनकारी मुद्दों को महत्व देने के स्थान पर जोडनेवाले एकात्मता को बढावा देने वालें विषयों, नेताओं तथा दलों का अधिक प्रचार दें। धन के द्वारा क्रय की हुयी प्रसिद्धी के आधार पर समाज को तोडनेवाले नेताओं व दलों को सबक सिखाने का काम राष्ट्रकार्य के रुप में प्रसार माध्यमों को भी करना होगा। पेड न्यूज के द्वारा माध्यमों का धनबल के आगे समर्पण लोकतंत्र के विनाश का कारण बन रहा है। भारत एक निर्णायक दौर से गुजर रहा है। वैश्विक परिदृश्य में अवसर की जो एक छोटी सी खिडकी खुली है उसका यदि निर्णायक उपयोग करना है तो आज राष्ट्र को सुदृढ, सक्षम व निःस्वार्थ नेतृत्व की आवश्यकता है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ही ऐसे नेतृत्व को जन्म एवं पोषण दे सकता है। पश्चिम में राष्ट्रवाद की अवधारणा राजैनतिक व आर्थिक है। इस कारण से वह राष्ट्रों के मध्य प्रतिस्पर्धा को जन्म देती है। इस प्रतिस्पर्धा का रुपांतरण बाजारी शोषण, शस्त्र स्पर्धा व अंततः युद्धों में भी होता है। द्वितीय महायुद्ध में सारे विश्व पर युद्ध की विभीषिका थोपने वाल हिटलर ने भी जर्मन राष्ट्रवाद के नारे का ही तात्विक आधार लिया था। उसके बाद से अंतरराष्ट्रीय विमर्श में राष्ट्रवाद एक घृणित एवं निन्दनीय पद बन गया है। भारत में भी साम्यवादी व समाजवादी विचार को पोषित करनेवाले विचारकों ने इसी पश्चिमी दृष्टि से प्रभावित होकर राष्ट्रवाद की घोर आलोचना की है। इसे संकुचित, तानाशाही व फासिस्ट जैसे संबोधनों से पुकारा है। इस कारण सामान्य बुद्धिजीवी भी राष्ट्रवाद के प्रति सकारात्मक विचार नही रखते किन्तु भारत में राष्ट्रवाद की संकल्पना कतई आर्थिक अथवा राजनैतिक नहीं है। भारत में यह मूलतः आध्यात्मिक व व्यवहार में सांस्कृतिक विचार है। आर्थिक व राजनैति राष्ट्रवाद जहाँ भौगोलिक सीमाओं और बाजारी प्रतिस्पर्धाओं के कारण विभाजनकारी बन जाता है वहीं दूसरी ओर आध्यात्मिक, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद व्यक्ति से परिवार, समाज से आगे राष्ट्र तक मन के विस्तार का माध्यम होने के कारण एकात्मदृष्टि का विकास करता है। स्वाभाविक ही यह राष्ट्रवाद विस्तार की अगली सीढ़ी के रुप में मानवता को देखता हैं। अतः इस राष्ट्रवाद में राष्ट्रहित के साथ ही विश्वहित व उससे भी परे सृष्टि का हित भी निहित है। यह राष्ट्रवाद तोडता नही जोड़ता है।

जाति, पंथ, सम्प्रदाय, वर्ग, भाषा, क्षेत्र आदि के द्वारा विभिन्न वादों का निर्माण कर चल रहे समाज विघटन के तांडव को यदि रोकना है तो सभी को मिलकर एक ही उद्घोष करना होगा कि ‘राष्ट्र सर्वोपरि है’। मेरे व्यक्तिगत, पारिवारिक, क्षे़त्रीय, सामाजिक, पांथिक, साम्प्रदायिक अथवा प्रांतीय हितों से अधिक महत्वपूर्ण राष्ट्रहित हैं। इस विचार को अपने हर कार्य मे अभिव्यक्त करना होगा। चुनाव में आग्रह पूर्वक सहभागी होना, मतदाताओं का पंजीयन करना अधिक से अधिक लोगों को सकारात्मक मतदान के लिए प्रेरित करना, दलों व नेताओं को राष्ट्रहित के मुद्दों पर विचार एवं बात करने के लिए विवश करना यह हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य है। आइए! लोकतंत्र के महोत्सव में राष्ट्रवाद के उजास को प्रकाशित करने का संकल्प लें।

नवम्बर 29, 2013 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , | 1 टिप्पणी

एक मन, विचार, संकल्प और स्वप्न


brahmacharini mataकेवल ध्येय और विचार ही उदात्त होने से काम नहीं चलता संगठन के साने दृष्टि भी उदार होना आवश्यक है। बड़े लक्ष्य लेकर चलने ही बड़े कार्य सम्भव होते है। यदि संग्ठन अपने सम्मूख लक्ष्य ही छोटा रख ले तो फिर उसका दायरा भी सीमित हो जायेगा। शक्तिपूजा हमें उदात्तता की ही प्रेरणा देती है। 1897 में जब भारत की स्वतंत्रता का भी को चिन्ह नहीं दिखाई दे रहा था तब स्वामी विवेकानन्द ने भारत के सम्मूख विश्वविजय का ध्येय रखा। 12 संन्यासी भाइयों से प्रारम्भ कर रामकृष्ण मठ को विश्व को हिन्दू संस्कृति व वेदान्त के संदेश का कार्य दिया। डा हेड़गेवार ने जब 1925 की विजयादशमी को कुछ मुठ्ठीभर बालकों के साथ संघ शाखा का प्रारम्भ किया था तभी उनके सम्मूख पूरे हिन्दू समाज के संगठन का लक्ष्य था। इन उदात्त विचारों ने ही चमत्कार किये है।

महान विचार के साथ लोग जुड़ते है तभी संगठन का स्वरूप बनता है। केवल कुछ लोगों तक विचार पहुँचाने मात्र से संगठन का काम नहीं हो जाता। अधिक से अधिक लोगों के जीवन में यह विचार उतारना ही संगठन का ध्येय है। ध्येयवादी संगठन सत्य पर आधृत होता है। इस विचार की सार्वभौमिकता के कारण ही यह सबके लिये स्वीकार्य हो सकता है। सनातन हिन्दू धर्म इन्हीं शाश्वत सिद्धांतों को व्यावहारिक रूप में उतारने का नाम है। जब संग्ठन का आधार भी ऐसा ही पूर्णतः शास्त्रीय सनातन सिद्धांत होता है तब संगठन सार्वजनीन हो जाता है और उससे जुड़ने की क्षमता के लोगों की संख्या असीम होती है। वास्तव में कोई भी ऐसे संगठन से विचार के स्तर पर जुड़ सकता है। कार्यप्रणाली व पद्धति के अनुसार रूचि रखनेवाले लोग ही संगठन से जुड़ेंगे किन्तु विचार के स्तर पर किसी को भी कोई आपत्ती नहीं होगी। इन सनातन सत्यों को अनेक प्रकार से पुकारा जाता है। उनमें से एक नाम है ब्रह्म। संगठन का ध्येय ही ब्रह्म है।

ब्रह्मचर्य का सही अर्थ है – ब्रह्मकी ओर चलना। ब्रह्मैव चरति इति ब्रह्मचारी। संगठनात्मक सन्दर्भ में इसका अर्थ हुआ सतत ध्येय की ओर चलना। मार्ग में आनेवाले अन्य प्रलोभनों अथवा आकर्षणों की ओर किंचित भी ध्यान ना बंटनें देना। नवरात्री के दूसरे दिन की देवी है माँ ब्रह्मचारीणी। माता पार्वती द्वारा पूर्ण एकाग्रता से दीर्घकाल तक किये तप के कारण उन्हें यह नाम मिला है। अपने ध्येय शिवकृपा के लिये सबकुछ दांव पर लगानेवाले तप की अवधि में माता ने पूर्ण कठोरता के साथ ब्रह्मचर्य का पालन किया। यहाँ तक की आहार का भी पूर्ण त्याग कर दिया। एक समय पेड़ के पत्तों का सेवन भी त्याग देने के कारण ही उनका एक नाम पड़ा – अपर्णा। पार्वती की तपस्या से विव्हल उनकी माता ने करूण पुकार के साथ उन्हे कहा ‘अरी मत’ संस्कृत में उSSमा और पार्वती का नाम ही पड़ गया उमा। माता ब्रह्मचारिणी इस तप की प्रतिक हैं। इसीलिए उनके हाथ में जपमाल है। जप मन की उकतानता से की गई धारणा का द्योतक है। यह जपमाल रूद्राक्ष की है। रूद्र के अक्ष की आस में ही तो सारा तप चल रहा है ना?

संगठन में ब्रह्मचारिणी की साधना का क्या अर्थ होगा? यहाँ केवल एक व्यक्ति की व्यक्तिगत निष्ठा की बात नहीं है। पूरे संगठन का ही एकसाथ एक विचार पर एकाग्र होना संगठनात्मक ब्रह्मचर्य होगा। इसलिये ये लम्बी प्रक्रिया है। अत्यंत सुव्यवस्थित योजना से संगठन के मन का संस्कार करना होता है। सब एक विचार पर एकाग्र हो सके इस हेतु संगठन को एक सामान्य शब्दावली का निर्माण करना होता है। संगठनात्मक अनुशासन की रचना करनी होती है। विविध स्वभाव के कार्यकर्ता संगठन में एक विचार से एक ध्येय के लिये एकसाथ आकर कार्य कर रहे होते है। थोड़ासा भी व्यवधान होने से व्यक्तिगत आकांक्षायें, क्षुद्र अहंकार उपर आ जाते हैं। यह सब संगठन की एकाग्रता को भग्न करने के लिये पर्याप्त होते है। उपाय एक ही है सतत ध्येयस्मरण। पर फिर याद रहे कि एक व्यक्ति के मन की बात नहीं है। अनेक विविधताओं से भरे, कई बार मीलों की दूरी पर फैली शाखाओं में कार्यरत व्यक्तियों के समूह को अनेक प्रकार की स्थितियों के मध्य इस ध्येयस्मरण को जीवित रखना है। संगठन के सीाी सदस्यों को, कार्यकर्ता, पदाधिकारी सभी को एक मन से एक विचार पर एकाग्र होना है। एक संकल्प के साथ एकसमान स्वप्न देखने से ही यह सम्भव है। सबके स्वप्न एक हो, संकल्प एक हो और वे एक मन से किये गये एक विचार पर आधृत हो। इस अद्वितीय एकात्मता हेतु विशिष्ठ तकनिक का प्रयोग करना होता है। इस तकनिक को नित्य कार्यपद्धति कहते है।

ब्रह्मचारिणी माता की जपमाल ही संगठन की कार्यपद्धति है। संगठन के विचार, ध्येय व स्वभाव के अनुरूप ही संगठन की कार्यपद्धति को गढ़ना होता है। जैसे जपमाल में एक एक मणके को फेरने के साथ इष्ट का नामस्मरण किया जाता है वैसे ही कार्यपद्धति में नियमित अंतराल में नियत गतिविधि के द्वारा ध्येयस्मरण किया जाता है। कार्यपद्धति की नियमितता उसका सबसे प्रमुख लक्षण है। नियमित समय के अंतराल पर आयोजित होने कारण इसकी आदत पड़ती है मन को संस्कारित करने का यही एकमात्र उपाय है। कार्यपद्धति की गतिविधि सबके लिये होती है। अतः उसके बहुत अधिक क्लिष्ट होने से नहीं चलेगा। कार्यपद्धति के कार्यक्रम सहज सरल होने चाहिये। बहुत अधिक साधनों अथवा स्थान आदि में विशिष्ठता की आवश्यकता नहीं होनी चाहिये। कार्यपद्धति जितनी सरल होगी उतनी ही प्रभावी होगी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रभाव का सबसे प्रमुख कारण उसक अत्यंत सरल कार्यपद्धति में है। प्रतिदिन लगनेवाली शाखा के लिये किसी भी विशेष साधन अथवा प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं होती। सहज, सरल, सुलभ होना ही इसकी सफलता का रहस्य है।

प्रत्येक संग्ठन को अपनी कार्यपद्धति की रचना करनी होती है। जो संगठन ऐसा कर पाते है वे संगठन लम्बे चलते है और एक मन, विचार, संकल्प और स्वप्न के साथ ध्येय की ओर अग्रसर होते है। ब्रह्मचारिणी की कृपा का यही माध्यम है। आइये अपनी कार्यपद्धति की माला जपे और संगठनात्मक ब्रह्मचर्य के द्वारा ध्येय की ओर बढ़ें।

अक्टूबर 6, 2013 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , | 1 टिप्पणी

संगठन की घटस्थापना


maa-shailputri1नवरात्री का शुभारम्भ! शक्तिपूजा का उत्सव! यह केवल शक्ति के आध्यात्मिक स्वरूप का पूजन नहीं है। वास्तव में हर स्तर पर ही शक्ति का ही असविष्कार जीवन के रूप में हो रहा है। अतः शक्तिपूजा तो जीवन का ही उत्सव है। उत्स से बनता है उत्सव। मन को जो उपर उठाये वह उत्सव। उपर उठने को ही उत्स कहते है। इसी से उत्साह शब्द भी बना है। जब मन उदात्तता का अनुभव करता है तब उत्साह होता है। उत्साह से ही मानव पराक्रम करने में सक्षम होता है। जीवन में जितना अधिक उत्साह होगा उतना ही महान कार्य हो सकेगा। उत्साह का निमित्त यदि भौतिक, शारीरिक या कि स्पष्ट कहे तो केवल ऐन्द्रिक होने से उत्साह क्षणिक और विध्वंसक हो सकता है। यही कुछ उधार के लिये आधुनिक उत्सवों में देखने को मिलता है। गणेशोत्सव व दूर्गापूजा जैसे पारम्पारिक त्योहारों पर भी इस उथली उफन का परिणाम गत कुछ वर्षों में दिखाई देने लगा है। अतः उत्सव के विज्ञान को समझने की आवश्यकता है। मन को उदात्तता की ओर लेजानेवाले निमित्त से यदि उत्साह को प्रगट किया जाय तो अधिक स्थायी और कल्याणकारी उत्सव मनाये जा सकते है।

अभी तो शक्तिपूजा का उत्सव है। इसे भी उदात्तता से ही मनाना होगा। वर्तमान समय में पूरे विश्व में ही शक्ति की संकल्पना में परिवर्तन हो रहा है। राष्ट्रों की शक्ति का मापन करने में भी अब केवल सामरिक, राजनैतिक व आर्थिक सुदृढ़ता पर्याप्त नहीं मानी जाती। कला संस्कृति, शिक्षा का स्त्र, सामाजिक समरसता जैसे कारक भी महत्वपूर्ण माने जाने लगे हैं। राष्ट्र की सकल शक्ति के आकलन में इनका भी समावेश किया जाने लगा है। इसे ‘समग्र राष्ट्रीय बल’ – स रा ब Comprehensive National Power CNP कहा जाता है। संगठन में शक्ति के मन्त्र का यह वैश्विक प्रतिष्ठापन है। समाज को स्वावलम्बी बनाने के लिये कार्यरत स्वयंसेवी संगठनों की भूमिका स रा ब के दृढ़करण में अत्यन्त महत्वपूर्ण हो जाती है। यह हमेशा से ही रही है अब उसे रणनीतिक मान्यता भी मिल गई है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए हम इस नवरात्री में संगठन की शक्तिपूजा के तत्वों को नवदूर्गा के भिन्न भिन्न रूपों के माध्यम से समझने का प्रयास करेंगे। यह हमारी नवरात्री साधना होगी।

पहले रात्री की देवी है – शैलपुत्री। हिमालय की पुत्री होने के नाते माँ पार्वती का ही यह नाम है। हिमवान की पुत्रीने उसी के समान कठोर तपस्या से भगवान शिव को प्रसन्न किया। यदि हमारे लक्ष्य को हम शिव अर्थात कल्याण करनेवाला मानते है तो हमारा संगठन उन्हें पाने के लिये ही कार्य कर रहा है। इस उद्देश्य में सिद्धी तभी सम्भव है जब संगठन का जन्म उदात्त ध्येय के लिये हुआ हो। ध्येय जितना उँचा होगा उतना ही संगठन का मूल बल अधिक होगा। किसी भी संगठन की प्रथम शक्ति उसके ध्येय की नैतिक उदात्तता होती है। अतः शैल पुत्री का संदेश है। शैलसमान उदात्त विचार से हुआ जन्म। किसी भी संगठन का जन्म एक विचार से होता है। यदि वह विचार संकुचित हो तो संगठन नहीं होगा गिरोह होगा। यदि ध्येय स्वार्थ होगा तो संगठन व्यापारी संस्थान ही होगा। इसी कारण राजनीतिक संगठन जब अपने उदात्त ध्येयवाद को भुला देते है अथवा जिन दलों का जन्म ही व्यक्तिगत अहंकार वा स्वार्थ से हुआ होता है वे शीघ्र ही एक व्यापारी संस्थान का रूप ले लेते है। दीर्घकाल तक मानव कल्याण के कार्य का ध्येय प्राप्त करते हुए कार्य करने वाले संगठन वे ही हो सकते है जिनके मूल में हिमालय सा भव्य व दिव्य विचार होता है।

विचार के उदात्त होने के साथ ही उसके मूर्तरूप में उतरने के लिये प्रखर तप भी करना पड़ता है। पार्वती ने शिवजी को पाने के लिये उग्र तप किया। स्वयं को पूर्ण समर्पित कर दिया। ऐसे समय जब शिवजी उनकी ओर देखने को भी तैयार नही थे तब भी पूर्ण लगन से अपनी तपस्या को जारी रखा। सच्चे कार्यकर्ता को भी ध्येय के प्रति पूर्ण श्रद्धा रखते हुए कार्य करना चाहिये। कई बार बाहरी रूप से कोई परिणाम अथवा यश नहीं दिखाई देता तब भी यदि लगन टिक सकें तो ही अन्ततः लक्ष्य प्राप्ति हो पाती है। इसका एकही मार्ग है सतत अपने जन्म के रहस्य अर्थात अपने संगठन के बीज विचार का स्मरण। यदि उस विचार की उदात्तता वसत्यता पर विश्वास दृढ़ हो तो फिर कितनी भी निराशाजनक परिस्थिति में कार्यकर्ता अपने पथ से विचलित नहीं होता।

माँ शैलपुत्री का नाम ही कार्यकर्ता को प्रेरणा देता है अपने पिता अर्थात अपने मूल को सदा अपने परिचय के रूप में धारण करने की। हमारा विचार ही हमारा सच्चा परिचय होता है। जब हम किसी महान कार्य में जुटे संगठन के अंग होते है तब वह संगठन विचार ही हमारा एकमात्र स्थायी आधार होता है वही हमें शक्ति प्रदान करता है। माता शैलपुत्री का रूप भी अत्यन्त सांकेतिक है। पहले नवरात्री को इसका पूजन करते समय इसके अर्थ को समझना चाहिये। माता का वाहन श्वेत वृषभ है-सफेद बैल। यह शक्ति का सनातन प्रतिक है। हमारी ध्येय साधना को वाहन ऐसा ही बलवान हो। शुभ्र रंग बल की सात्विकता का द्योतक है। बल जब कल्याणकारी होता है तब सात्विक होता है। जब औरों को पीडा देने में बल का प्रयोग होता है तब वह तामसिक बल कहलाता है और जब बल का गर्व कर उसका दुरूपयोग होता है तब वह राजसिक बल होता है। संगठन हमें बल प्रदान करता है वह सात्विक तभी होगा जब हम उसका प्रयोग संगठन की ध्येयप्राप्ति में ही करेंगे अपने स्वार्थ अथवा दुसरों की हानी के लिये नहीं।

शैलपुत्री माता के एक हाथ में त्रिशुल है और दूसरे में कमल। इस प्रतिक का भी यही अर्थ है। कमल शांति का प्रतिक है और त्रिशुल साधनों का। संगठन हमें अनेक शस्त्र अर्थात विविध साधन प्रदान करता है। यह आंतरिक गुणों के रूप में भी होते है और बाह्य संसाधनों सम्पर्कों के रूप में भी। इनका भी उपयोग संगठन के ध्येय के अनुरूप सबके कल्याण व शांति के लिये करना होता है।

आइये! पहले नवरात्री को संगठन की शक्तिपूजा की घटस्थापना करते है। माँ शैलपुत्री की पूजा में हिमालय सा उदात्त विचार व उसके आचरण हेतु तप व प्राप्त बल का सदुपयोग करने का संकल्पलेते है। माता हमें संगठन को सशक्त बनाने का शुभाशिष प्रदान करें।

अक्टूबर 5, 2013 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , , , | 3 टिप्पणियाँ

युवा शक्ति ही राष्ट्रनिर्माण का प्रभावी साधन


भारत एक युवा देश है। जनसंख्या के अनुसार विश्व की सर्वाधिक युवा आबादी भारत में निवास करती है। भारत में जनगणना के नियमों में 18 से 35 वर्ष की आयु को युवा माना जाता है। विश्व में 15 वर्ष की आयु से यौवन प्रारम्भ होता है। दोनों गणनाओं में भारत विश्व में ना केवल अग्रणी है अपितु विश्व की युवा आबादी का 60 प्रतिशत से अधिक भारत में वास करता है। यह निश्चित ही एक महान निधि है किन्तु साथ ही बहुत बड़ी जिम्मेवारी भी है। इतने बड़ी संख्या में उपस्थित युवा शक्ति का राष्ट्रनिर्माण में प्रयोग करना एक चुनौति है। अर्थशास्त्र के विशेषज्ञों के अनुसार भी इस युवा आबादी को उपयोगी कौशल में प्रशिक्षित करना, फिर इनके लिये पर्याप्त रोजगार उपलब्ध कराना तथा उद्योग, कृषि व सेवा क्षेत्र में संतुलन स्थापित करना अपने आप में बड़ा ही दुष्कर कार्य है। उच्च शिक्षा में असंतुलित वृद्धि के कारण एक ओर हम बड़ी संख्या में तैयार हो रहे अभियंताओं को उचित रोजगार नहीं दे पा रहे है वहीं दूसरी ओर अनेक आवश्यक कार्यों के लिये प्रशिक्षित व्यक्ति उपलब्ध नहीं है। एक आकलन के अनुसार स्नातक स्तर पर कला क्षेत्र में घटते प्रवेश के कारण आनेवाले दशकों में पूरे विश्व में भाषा शिक्षकों की कमी होगी। तकनिकी क्षेत्र के बढ़ते प्रभाव के कारण मूलभूत विज्ञान यथा भौतिकी, रसायन तथा जीवविज्ञान के क्षेत्र में अनुसंधान करने के लिये पर्याप्त संख्या में वैज्ञानिक नहीं मिल पा रहे है। अभी से दिख रहे इस असंतुलन की स्थिति आगामी दशकों में और विकट होनेवाली है।

इसके मूल में हमारे युवाओं में यौवन के वास्तविक शक्ति के ज्ञान का अभाव है। युवा को युवा होने का अर्थ ही पता नहीं है। युवा अर्थात अनुशासनहीन, अस्तव्यस्त, उपद्रवकारी ऐसा ही विचार सबके मन में आता है। किन्तु यह केवल उपरी विचार है। वास्तव में आज के युवा को ज्ञान की बड़ी पिपासा है। केन्द्र के स्वाध्याय वर्गों में सभी कार्यकर्ताओं का अनुभव है कि अवसर मिलने पर युवा अध्ययन, विचार व चर्चा सभी के लिये तत्पर है। इससे आगे बढ़कर वह इन विचारों को क्रियान्वित भी करना चाहता है। अतः युवा आबादी को काम देने को एक भार माननें के स्थान पर अवसर मानकर विचार किया जाना चाहिये। रोजगार की ही बात लें। युवा केवल नौकरी पाने का विचार क्यों करे? क्या स्वयं के बुते पर व्यवसाय कर नौकरी देने का विचार युवा नहीं कर सकता? युवा को चुनौति तो देकर देखों क्या क्या चमत्कार कर सकता है। वीर सावरकर कहा करते थे, ‘युवा की क्षमता को समझना है तो इस पद को पलट कर देखों – वायु! युवा वायु के समान शक्तिशाली है। यदि अनुशासन तोड़ दे तो प्रभंजन बन पूरी दुनिया को तबाह कर सकता है। प्राण हरण कर सकता है। वहीं यदि नियम से अनुशासित हो तो प्राणायाम बन जीवन की रक्षा भी कर सकता है।’ आवश्यकता है इस शक्ति के अनुशासित जागरण की।

युवा बल को युवा शक्ति में रूपांतरित करने के लिये सबसे पहले युवा को अपने स्वभाव को पहचानने का प्रशिक्षण देना होगा। स्वभाव के अनुरूप कार्य का चयन करने से पूरी क्षमता व संभावना का विकास हो सकता है। भेड़चाल में आजिविका का चयन करने के स्थान पर अपने स्वभाव के अनुसार उच्च शिक्षा व तदनरूप व्यवसाय चयन करने से राष्ट्रनिर्माण के सभी क्षेत्रों मे पर्याप्त कौशल उपलब्ध हो सकेगा। अतः युवाशक्ति जागरण का प्रथम मन्त्र हुआ ‘स्वभाव से स्वावलम्बन’। इसमें सफलता प्राप्त करने के लिये दूसरी महत्वपूर्ण आवश्यकता है संकल्प की। मन तथा इन्द्रियों की असीम शक्ति को एक लक्ष्य पर एकाग्र करने को संकल्प कहते है। संकल्पित युवा ही अपनी पूर्ण क्षमता को प्रगट कर किसी भी लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। यह संकल्प जीवन के हर क्षेत्र में चमत्कार कर सकता है। विज्ञान में अनुसंधान हो, स्वरोजगार के लिये व्यवसाय को संचालन हो, देश की रक्षा के लिये सेना में प्रवेश हो अथवा जनजागरण के लिये समाज सेवा का क्षेत्र हो हर स्थान पर संकल्पित युवा ही असम्भव को सम्भव कर दिखाता है।

अपने स्वभाव को पहचान, उच्च लक्ष्य के लिये संकल्पित युवाओं को संगठित करना होगा। संगठन में ही शक्ति है। स्वामीजी ने अपने पश्चिम प्रवास में इस शक्ति के चमत्कार को देखा और भारत में सामूहिक कार्य की शक्ति को पुनः जागृत करने का काम किया। बड़े बड़े संगठनों का निर्माण स्वामीजी के विचारों की प्रेरणा से हुआ। इसके साथ ही हर स्तर पर छोटे बड़े संगठित प्रयासों की आवश्यकता है। संकल्पित युवा एकत्रित आकर एक दूसरे की क्षमताओं के परिपूरक बन प्रचण्ड शक्ति का जागरण कर सकते है। देश सेवा के हर क्षेत्र में सहकार पर आधारित संगठित प्रयास की नितान्त आवश्यकता हैै। इस संगठित शक्ति का उदात्त ध्येय के लिये समर्पित होना अनिवार्य है। अन्यथा अपने स्वार्थ में संलिप्त हो कर यही शक्ति प्रभंजन के समान विनाश कर सकती है। भारत का राष्ट्रीय जीवनध्येय विश्व मानवता का मार्गदर्शन करना है। जगत् गुरू के अपने नियत सिंहासन पर आरूढ़ होने की ओर भारत की यात्रा स्वामीजी के शिकागो दिग्विजय से प्रारम्भ हो चुकी है। वैश्विक परिदृष्य प्रचण्ड गति से इसके शीघ्र ही साकार होने की ओर अग्रेसर है। ऐसे में भारत की संगठित युवा शक्ति को स्वयं को राष्ट्रकार्य के लिये समर्पित करने की आवश्यकता है। सीधे राष्ट्रसेवा में समर्पित होने के अवसर विवेकानन्द केन्द्र जैसे संगठन देते ही है। साथ ही राष्ट्रजीवन के हर क्षेत्र में स्वभाव के अनुरूप, संगठित कार्य करते हुए अपने लक्ष्य व समस्त उपलब्धियों को राष्ट्र के जीवनध्येय के साथ समाहित करना भी समर्पण का एक माध्यम है।

स्वभाव से स्वावलम्बन, संकल्प, संगठन तथा समर्पण के सकारात्मक मन्त्र से अभिमंत्रित युवा शक्ति ही राष्ट्रनिर्माण का प्रभावी साधन बन सकती है।

जून 8, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , | 1 टिप्पणी

जाग उठी है तरुणाई !


विवेकानन्द जयंती १२ जनवरी “राष्ट्रीय युवा दिवस” पर विशेष:


‘‘मेरी आशा युवाओं में है। इनमें से मेरे कार्यकर्ता आयेंगे।’’ स्वामी विवेकानन्द ने कहा था। युवा शक्ति ने प्रतिसाद भी दिया और देश के लिये अपने आप को समर्पित कर दिया। भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में सम्मिलित क्रांतिकारी हो या असहयोग के शांतिपूर्ण मार्ग से विरोध प्रदर्शन करने वाले देशभक्त हो दोनों ही ने स्वामी विवेकानन्द से प्रेरणा प्राप्त की। वर्तमान में भी भारत को पुनः उस जागरण की आवश्यकता है।
शिकागों से लौटते ही रामेश्वरम के किनारे पर अपने सम्बोधन में स्वामी विवेकानन्द ने कहा था, ‘‘सूदीर्घ रजनी अब समाप्तप्राय सी दिखाई देती है। लम्बी काली रात टल गई अब उषा होने को है। यह सोया भारत जाग उठा है। केवल अन्धे देख नही सकते, विक्षिप्तबुद्धि समझ नहीं सकते कि यह सुप्त विराट जाग गया है। हिमालय से चल रही मंद शीतल लहर ने इस महाकाय को जगा दिया है। अपनी नियती को यह प्राप्त करके रहेगा। विश्व की कोई शक्ति इसे नहीं रोक सकती।’’
वर्तमान में एक ओर स्वामीजी की भविष्यवाणी सत्य होने के लक्षण दिखाई दे रहे है। देश की युवाशक्ति अनेक क्षेत्रों में नये नये कीर्तिमान गढ़ रही है। ज्ञान-विज्ञान, आर्थिक विकास, अंतरिक्ष तकनिक, संगणक, व्यापार आदि सब में भारतीय युवा पुनः अपने खोये गौरव को प्राप्त कर विश्व नेतृत्व की ओर अग्रेसर है। भारत विश्व का सर्वाधिक युवा जनसंख्या वाला देश बन गया है। इतना ही नहीं विश्व के सर्वाधिक अभियंता व चिकित्सक निर्माण करने का श्रेय भी हमें ही है। इसके साथ ही इतनी बड़ी कुशल व अकुशल श्रामिक संख्या भी और किसी देश के पास नहीं है। जनसंख्या में चीन भले ही हमसे आगे हो किंतु उसकी औसत आयु प्रौढ़ता की ओर है और 3 वर्षों में वहाँ कार्यबल इतना कम हो जायेगा कि वर्तमान उत्पादकता बनाये रखने के लिये भी उसे अन्य आशियाई देशों की सहायता लेनी होगी। आध्यात्मिक क्षेत्र में तो भारत का वर्चस्व सदा से ही रहा है।
किन्तु दूसरी ओर एक राष्ट्र के रुप में भारत की स्थिति बड़ी विकट है। देश चारों ओर से चुनौतियों से घिरा हुआ है। चीन व पाकिस्तान का आपसी गठजोड़ सामरिक रूप से भारत को चारों ओर से घेर रहा है। इसी समय हमारी प्रशासकीय व्यवस्था पूर्णतः चरमराई हुई दिखाई पड़ रही है। समाज में मूल्यों के ह्रास का संकट है। शासन द्वारा अल्पसंख्यकों के नाम पर चल रहा तुष्टीकरण का खेल फिर से विभाजन जैसे हालात पैदा कर रहा है। अर्थात चारों ओर चुनौती ही चुनौती है।


अवसर व चुनौती के एकसाथ सामने है ऐसे समय देश के युवाशक्ति को सन्नध होना होगा। अपनी तरुणाई को ललकार कर शक्ति को जागृत करना होगा। युवा की परिभाषा ही बल से है। स्वामी विवेकानन्द युवाओं से आवाहन किया करते थे, ‘‘मुझे चाहिये लोहे की मांसपेशियाँ, फौलाद का स्नायुतन्त्र व वज्र का सा हृदय।’’ शारीरिक बल, मानसिक बल व आत्मबल तीनों से युक्त युवा ही स्वामीजी का कार्य कर सकता है। स्थान स्थान पर फिर आखाड़े लगें। बलोपासना को पुनः जगाने का प्रसंग है। जागों युवा साथियों अपनी कमर कस कर खड़े हो जाओ। माँ की सेवा के लिये सामर्थ्य जुटाओं!
तरुणाई का आह्वान है तो साहस तो चाहिये ही। स्वामीजी के शब्दों में, ‘‘समुद्र को पी जाने का साहस, सागर तल की गहराई से माती चुन लाने का साहस, मृत्यु का सामना कर सके ऐसा साहस।’’ साहस की जागृति होती हे वीरव्रत के धारण करने से। युवा के जीवन में व्रत हो। व्रत के बिना जीवन व्यर्थ है। व्रत अर्थात संकल्प के साथ चुनौती धारण कर किया पूर्ण नियोजित कार्य। जागो भारती के पुत्रों वीरेश्वर विवेकानन्द के समान वीरव्रती बनों।
राष्ट्रीय चुनौतियों का प्रतिसाद भी राष्ट्रीय होना होगा। अतः सामर्थ्य व साहस से सम्पन्न युवाओं को संगठित होना होगा। स्वामी जी ने भारत को संगठन का मन्त्र देकर सामूहिक साधना की वैदिक परम्परा का पुनर्जागरण किया। उनकी प्रेरणा व विचार से ही देश में सकारात्मक कार्य करनेवाले सामाजिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक तथा वैचारिक संवा संगठनों का महाप्रवाह प्रारम्भ हुआ। वीर पूत्रों अपनी स्वार्थी तमनिद्रा को त्याग संगठित हो जाओ। सदियों की मानसिक दासता से उत्पन्न इर्ष्या का त्याग कर साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करनें को तत्पर हो जाओ। जहाँ जहाँ हो वही संगठित होकर देशसेवा में लग जाओ। स्वामीजी का आश्वासन हमारे साथ है, ‘‘मेरे बच्चों यदि तुम मेरी योजना पर कार्य करना प्रारम्भ कर दो तो मै सदा तुम्हारे साथ कंधे से कंधा मिलाकर कार्य करुंगा। इसके लिये मुझे बार बार ही क्यों ना जन्म लेना पड़े?’’
जागृत, सामर्थ्यशाली, वीर व संगठित तरुणाई को समर्पित भी होना होगा। समर्पण के बिना, आहुती के बिना तो सारा प्रयास ही अधुरा रह जाता है। स्वामीजी कहते है, ‘‘उठो! काम में लग जाओं! अपने आप को झोंक दो। कोई व्यक्तिगगत चिंता ना करों भगवति सब चिंता करेगी। मेरे बच्चों मै तुमसे अपार प्रेम करता हूँ। इसीलिये चाहता हूँ कि देश का काम करते करते तुम हँस कर मृत्यु का वरण करों!’’ कितना अद्भूत प्रेम! क्या हम इस अनल प्रेम का प्राशन करने के अधिकारी है? क्या इतना समर्पण है कि अपने आप को मिटाकर माँ भारती की सेवा में लग जाये?
स्वामी विवेकानन्द के 149 वी जयन्ति 12 जनवरी के अवसर पर हम संकल्पबद्ध होकर स्वामीजी को जन्मदिन पर अपने युवा जीवन का उपहार प्रदान करें। ताकि फिर गान गूँज उठे
जाग उठी है तरुणाई!!

जनवरी 11, 2012 Posted by | चरित्र, सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , , , , | 4 टिप्पणियाँ

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