उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

कैसे दूर हो संसद के प्रति समाज की अनास्था ?


संसद के ६० वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर विशेष सत्र का आयोजन कर उत्सव मनाया गया । पर क्या केवल उत्सव मनाना पर्याप्त है ? सैद्धांतिक रूप से जो सम्मान व महत्व संसद का है क्या वह गरिमा आज जनमानस में स्थापित है ? क्या देश की जनता संसद के हीरक महोत्सव के समारोह में मन से जुडी ? क्या उसे इसका कोई हर्ष हुआ ?

हमारे लोकतन्त्र की सबसे बडी पंचायत संसद के सत्रों को १३ मई २०१२ को ६० वर्ष पूरे हुए । संसद का महत्व इस कारण है क्योंकि स्वतन्त्र भारत के संविधान के अनुसार यह हमारी सर्वोच्च विधायिका है । देश में सुशासन के लिये समुचित कानून बनाने का कार्य संसद को करना है । जिस संविधान के द्वारा इसकी स्थापना हुई उसमें परिवर्तन का अधिकार भी संसद को ही है । सामूहिक निर्णय लोकतन्त्र में सुराज की आत्मा है । संसद चर्चा के द्वारा सामूहिक निर्णय का स्थान है । देश की नीतियों के निर्धारण का कार्य यद्यपि कार्यपालिका का है, किन्तु उनकी समीक्षा तथा दिशा निर्देशन का कार्य संसद में विभिन्न चर्चाओं के माध्यम से किया जाता है । भारतीय लोकतन्त्र में हमने जो व्यवस्था स्वीकार की है उसमें कार्यपालिका भी संसद का ही अंग होती है । मुख्य कार्यपालक प्रधानमंत्री का संसद सदस्य होना अनिवार्य है । यदि नियुक्ति के समय वह सांसद नहीं है तो ६ माह के भीतर सांसद बनना अनिवार्य है । इस प्रकार संसद भारतीय राजव्यवस्था में सर्वोच्च है । न्यायपालिका को संसद के निर्णय बदलने का अधिकार नहीं है । संसद द्वारा बनाये कानून यदि संविधान के विपरीत हो तब ही न्यायपालिका हस्तक्षेप कर सकती है । अन्यथा इन कानूनों के अनुसार ही निर्णय देने के लिये सर्वोच्च न्यायालय बाध्य है ।

संसद के वर्चस्व का आधार उसका निर्वाचित स्वरूप है । सैद्धांतिक रूप से लोकतन्त्र में जनता ही राजा है । जनता के प्रतिनिधि राज चलाते हैं । अत: जनता के प्रतिनिधियों को सर्वाधिक अधिकार प्राप्त हैं । जिसको संसद में बहुमत प्राप्त है वह भारतीय राजव्यवस्था में सर्वाधिकारी है । जनता के निर्वाचन द्वारा सांसदों को यह नैतिक अधिकार मिल जाता है कि वे देश के बारे में निर्णय करें । यह नैतिक अधिकार ही वास्तव में संसद को राजनीति की सबसे महत्वपूर्ण संस्था का दर्जा देता है । संसद के ६० वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर विशेष सत्र का आयोजन हुआ । स्मृतियों को संजोया गया । पूर्व सांसदों का स्मरण किया गया । प्रथम लोकसभा के दो जीवित सदस्यों श्री रिशांग किशिंग तथा श्री रेशमलाल जांगिड का सम्मान भी किया गया । कुल मिलाकर उत्सव मनाया गया । पर क्या केवल उत्सव मनाना पर्याप्त है ? सैद्धांतिक रूप से जो सम्मान व महत्व संसद का है क्या वह गरिमा आज जनमानस में स्थापित है ? क्या देश की जनता संसद के हीरक महोत्सव के समारोह में मन से जुडी ? क्या उसे इसका कोई हर्ष हुआ ?

वास्तव में स्वतन्त्र भारत के पडौस में जो देश हैं उसकी राजनीतिक दृष्टि से समीक्षा करें तो यह अपने आप में हमारे लिए बहुत बडी उपलब्धि है । भारत के साथ उसी से कटकर बने सभी पडौसी देशों में लोकतन्त्र का अस्तित्व ही खतरे में रहा है । पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यान्मार, श्रीलंका, नेपाल, मालदीव तथा अफगानिस्तान सभी देशों में राजनैतिक उथल-पुथल ही चल रही है । ऐसे में १९७५ से ७७ के आपात्काल के कुछ माह छोड दिये जाये तो भारत ने स्थिर लोकतन्त्र का परिचय दिया है । इतने विशाल, विविधता सम्पन्न राष्ट्र के लिये यह अपने आप में ही बहुत बडी उपलब्धि है । किन्तु आज कितने भारतीय इस विचार से ऐसी सकारात्मकता से जुड सकते हैं ? दोष उनका भी नहीं है । हमारी लगभग सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं में से समाज की आस्था उठ चुकी है । इसके चारित्रिक कारण है । संसद की गरिमा की रक्षा सांसद ही कर सकते हैं और पिछले कई वर्षों में राजनीतिक दलों के साथ ही सांसदों के चरित्र में भी गिरावट आई है । जो हमारी विशेषतायें थी वे ही बाधा बन गई । कार्यपालिका पर निर्वाचित संसद का अंकुश रहने के स्थान पर भ्रष्टाचार में भागीदारी के लिए कार्यपालिका का अंग बनने हेतु सांसद चुने जाने की परम्परा प्रारम्भ हो गई । सेवा के स्थान पर राजनीति व्यवसाय बन गई । इसी कारण संसद के ६० वर्ष पूर्ण होने पर सांसदों के अलावा किसी ने उत्सव नहीं मनाया । यह तो ऐसा हुआ कि स्वयं का जन्मदिन केवल स्वयं ही मनाये । केवल व्यक्तिगत चारित्र्य ही संसद की गिरती गरिमा के लिए कारणीभूत नहीं है, वरन् वास्तव में ऐसे व्यवस्थागत कारण भी है जिसके चलते चरित्रहीन व्यक्ति लोकतन्त्र के मंदिर का पुजारी बन सकता है । भारत में पंचों को परमेश्वर का प्रतिनिधि माना जाता है । यदि संसद को देश की सर्वोच्च पंचायत का यह दैवी सम्मान पुन: दिलाना है तो राजनैतिक दलों से सुयोग्य व्यक्ति को विधायिका में भेजने के साथ ही दो महत्वपूर्ण व्यवस्थागत सुधार भी अनिवार्य है ।

१.   निर्वाचन में सही अर्थों में बहुमत के प्रतिनिधि का चयन हो । वर्तमान चुनाव प्रणाली में मतदान के सर्वाधिक हिस्से का प्रतिनिधि निर्वाचित हो जाता है । विविधता के कारण दलों व प्रत्याशियों की संख्या बडी होती है । अत: ऐसा यदा कदा ही होता है कि निर्वाचित प्रतिनिधि को बहुमत ने चुना हो । अधिकतर सांसद १५ से २५ प्रतिशत मत पाकर सांसद बन जाते हैं । यह प्रतिशत भी उन मतों का है जो मतदान में सम्मिलित हुए । परंतु जो २५ से ४० प्रतिशत मतदाता अपने मताधिकार का आलस, व्यस्तता अथवा घोर अनास्था के कारण प्रयोग ही नहीं कर रहे, उनकी तो गणना ही नहीं है । इस प्रकार समाज के ८० प्रतिशत से अधिक लोगों द्वारा नकारे हुए प्रतिनिधि संसद में जनता का प्रतिनिधित्व करने का दंभ भरते हैं । इस नकारा पद्धति के कारण राजनीति का स्वरूप विभाजनकारी हो गया है । जाति, पंथ, भाषा अथवा जो भी मिल जाये उस आधार पर जनता को बाँटकर अपने लिये प्रभावी अल्पमत का समर्थन प्राप्त करना प्रत्येक दल व नेता का लक्ष्य बन गया है । इसी के चलते सांसदों की भी मंडी लगती है । अत: संसद के ६० वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर चुनाव में विजय के लिये ५० प्रतिशत से कम से कम एक मत अधिक का प्रावधान किया जाना चाहिये ।

२.   सांसदों में भ्रष्टाचार का दूसरा व्यवस्थागत कारण कार्यपालिका व विधायिका का घोलमेल है । मंत्री बनने के लिये सांसद होना अनिवार्य है । मंत्री के कार्यों पर नियन्त्रण व अंकुश रखने का काम भी संसद को करना है । इस दोहरे दायित्व के आपसी हितसम्बन्ध होने के कारण ही कार्यपालिका के भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के स्थान पर विधायिका उसकी भागीदार बनती दिखाई दे रही है । अत: कार्यपालिका के स्वतन्त्र स्वरूप को विकसित कर संसद केवल विधायिका के रूप में तथा कार्यपालिका की नीति के लिये मार्गदर्शक तथा समीक्षक की भूमिका में हो, यह आवश्यक है । वर्तमान स्थिति में इसका एक समाधान मुख्य कार्यपालक प्रधानमंत्री के प्रत्यक्ष चुनाव से हो सकेगा । यदि देश की पूरी जनता प्रधानमंत्री के चुनाव में मतदान करे तथा उसमें भी बहुमत से चयन का ही नियम हो तो, एक स्थिर कार्यपालिका के साथ ही तटस्थ विधायिका का निर्माण हो सकेगा ।

संसद के हीरक महोत्सव के अवसर पर हम वैचारिक मंथन के द्वारा देश में एक लोकतांत्रिक क्रांति का सुत्रपात करें जिससे कि विश्व का सबसे बडा लोकतन्त्र भारत और भी अधिक आदर्श एवं प्रभावशाली बनें ।

मई 16, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , | 2 टिप्पणियाँ

गण संस्कृति यज्ञ संस्कृति


‘‘हम भारतवासी, पूरी गंभीरता से भारत को एक सार्वभौम, लोकतान्त्रिक गणराज्य के रुप में संगठित करने का संकल्प करते है।’’ भारत के संविधान की मूल प्रस्तावना की यह प्रारम्भिक पंक्तियाँ  हैं। 1975 में पूरे देश में आपात्काल थोपकर संविधान की हत्या करनेवाले 42 वे संविधान संशोधन में इसमें सार्वभौम के बाद पंथनिरपेक्ष तथा समाजवादी ये दो विशेषण और जोड़े गये। संविधान की मूल प्रकृति तथा प्रावधान में किसी भी प्रकार के संशोधन के बिना ही उसके उद्देश्य में दो अनावश्यक संकल्पनाओं की पूछ जोड़ दी गई। चुनावी मजबुरियों के नाम पर इन को पुनः संशोधित करने का साहस कोई भी राजनैतिक दल आजतक नही दिखा पा रहा है। आपात्काल के बाद स्थापित जनता सरकार ने 44 वें संविधान संशोधन से 42 वें संशोधन द्वारा जनता मौलिक अधिकारों को स्थगित करनेवाले सभी प्रावधानों को तो निरस्त कर पूर्ववत् कर दिया किन्तु प्रस्तावना में की गई छेड़छाड़ को वैसे ही रखा। इन विशेषणों के जुड़ने के कारण ही आज हम राजनैतिक दलों को तुष्टिकरण की नित नई सीमाओं को लांघते हुए देखते है। सहिष्णुता का दायरा सीमटता जा रहा है और कट्टरता बढ़ती ही जा रही है।

इन विषयों पर चिंतन करना इसलिये आवश्यक है क्योंकि इन बातों से गणतन्त्र की नीव पर ही आघात हो रहे है। गणराज्य का आधार हे गण। गण अर्थात एकमन से कार्य करने वाला समूह। प्रबन्धन के क्षेत्र में आजकल अत्यधिक प्रचलित अंगरेजी शब्द है टीम। इसकी परिभाषा की जाती है, ‘‘एक कार्य के लिये गठित, एकलक्ष्यगामी दल’’। यह तात्कालिक होता है कार्य की अवधि तक के लिये कार्य की पूर्णता का लक्ष्य लेकर यह कार्य करता है। ‘गण’ की संकल्पना अधिक गहरी है। अंगरेजी में उपयुक्त Republic शब्द से भी बहुत गहरी। गण एक पारम्पारिक पारिभाषिक शब्द है। इसके राजनीति शास्त्र के उपयोग से भी पूर्व इसका आध्यात्मिक प्रयोग है। हमारी परम्परा में पूजा का पहला अधिकार गणेश जी का हैं जो गणों के ईश, गणनायक हैं। केवल शिवजी के गणों का नायक होने के कारण ही वे गण पति नहीं है। मानव का मानव से सम्बन्ध स्थापित करने की वैज्ञानिक आध्यात्मिक प्रक्रिया ‘गण’ के वे अधिपति है। मै से हम की ओर जाने की प्रक्रिया है गण।  और इस प्रक्रिया के लिए लिए आवश्यक साधना के अधिपति गणपति|
भारतीय आध्यात्म विद्या में आगम व निगम की दोनों विधियो की मान्यता है। निगम विधि में जहाँ  स्वयं को नकारकर शुन्य बना दिया जाता है|  नेति नेति की विधि से अहंकार को शुन्य कर शिवत्व से एकत्व की प्रक्रिया बतायी गई है। वही आगम विधि में अपने क्षुद्र अहं को विस्तारित कर सर्वव्यापि करने की प्रक्रिया द्वारा विराट से एकाकार होने की प्रक्रिया भी आध्यात्मिक साधना है। इस विधि में अपने व्यक्तिगत मै को सामूहिक मै के साथ क्रमशः एकाकार करते हुए स्वयं के स्वत्वबोध का विकास किया जाता है। यही अखण्डमण्डल की साधना है जो चराचर में व्याप्त ईश्वर का साक्षत्कार करवाती है। यह गण साधना है। मै को समूह में विसर्जित करने की साधना। गण के अंग का कोई व्यक्तिगत अस्तीत्व ही नहीं रह जाता है वह अपने गण परिचय से एकाकार हो बड़ी इकाई के रक्षार्थ अपने आप को समर्पित कर देता है।

‘गण’ गठन की प्रक्रिया व्यक्ति की साधना के साथ ही समूह की भी साधना है। भारत में सामूहिक साधना का ही विशेष महत्व रहा है। हमारे सारे वेद मन्त्र बहुवचन में प्रार्थना करते है। अहं का नहीं वयं का प्रयोग किया जाता है। मन, वचन, कर्म में सामूहिकता की प्रार्थना बार बार की गई है। हम एक मन से एक संकल्प के साथ एक दिशा में अग्रेसर होते हुये साथसाथ उत्कर्ष व कल्याण को प्राप्त करें। यह हिन्दूओं की सनातन वैश्विक प्रार्थना है। इस बात को हमने केवल दर्शन के सिद्धान्तों तक ही सीमित नहीं रखा अपितु कर्म, अथवा आचार की परम्परा में ढ़ालकर उसे जीवन का नियमित अंग बना दिया। यह भारतीय जीवन दर्शन की विशेषता है। प्रत्येक तत्व का कर्मकाण्ड के रुप में सघनीकृत संस्थापन (Concrete  Institutionalization ) किया गया। यही अनेक आक्रमणों के बाद भी हमारे जीवित रहने का महत्वपूर्ण रहस्य है। जीवन के प्रत्येक अंग में इस ‘गण’ संकल्पना को साकार किया गया। परिवार, वर्ण, ग्राम, नगर, जनपद तथा राष्ट्र इन सभी स्तरोंपर गणों के गठन की विधि को हमने सदियों से विकसित किया है। धार्मिक, औपासनिक परम्पराओं के साथ ही सामाजिक, आर्थिक व राजनयिक व्यवस्थाओं में गणों का विकास हिन्दूओं ने प्राचीनतम काल से किया है।

यह देश का दुभाग्य ही है कि स्वतन्त्रता के बाद हमारे इन प्रचण्ड ऐतिहासिक अनुभूतियों को पूर्णतः दुर्लक्षित कर हमने विदेशी विचारों पर आधरित व्यवस्था को अपनाया। इतना ही नहीं सेक्यूलर के नाम पर अपनी सभी प्राचीन परम्पराओं को प्रभावी रुप से नकारने का काम किया। परिणामतः परिभाषा में गणराज्य होते हुए भी सामूहिक चेतना के विकास के स्थान पर हमने विखण्डित गुटों की राजनैतिक चेतना का विकास किया। पंथ, प्रांत, भाषा तथा जाति जैसी सामूहिक चेतना व्यक्ति के विस्तार का माध्यम बनने के स्थान पर हमारी प्रचलित राजनैतिक व्यवस्था में यह सभी परिचय विघटन का कारण बनते जा रहे है। समाज में धार्मिक स्तर पर आज भी जीवित ‘गण’ संकल्पना को ठीक से समझकर उसे व्यवस्थागत रुप प्रदान करना वर्तमान भारत की सबसे बड़ी चुनोति है।

गण के गठन के शास्त्र को हम समझने का प्रयत्न करते है तो हम पाते है कि इसका भावात्मक आधार ‘त्याग’ में है। त्याग से ही व्यक्ति से परिवार, परिवार से समाज व समाज से राष्ट्र के स्तर पर स्वत्वबोध का विस्तार सम्भव है। त्याग का संस्थागत स्वरुप हे यज्ञ। यज्ञ के द्वारा हम सहजता से त्याग को परम्परा के रुप में ढ़ाल पाये है। आज भी हमारे घरों में गाय के लिये गोग्रास, तुलसी को पानी देने जैसी परम्पराओं का प्रयत्नपूर्वक पालन किया जाता है। अतिथि भोजन जैसे भूतयज्ञ द्वारा समाज को आपस में बांध रखा था। अतः यज्ञ को समझने से ही गण के गठन का कार्य किया जा सकता है।

गीता में भगवान कृष्ण कहते है कि यज्ञ के द्वारा ही प्रजा का सृजन कर प्रजापति ने लोगों को कहा कि यह यज्ञ ही आपकी कामधेनु है जिसके द्वारा आप अपनी सभी ईच्छाओं की पूर्ति कर सकते हो। सहयज्ञाः प्रजा सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः। अनेन प्रसविष्यध्वम् एष्वोSस्विष्टकामधुक्।।गी 3.10।। अगले दो श्लोंकों में यज्ञ के द्वारा त्याग से कैसे परस्पर सामंजस्य बनाकर समुत्कर्ष की प्राप्ति हो सकती है इसका वर्णन है। देवान्भवयतानेन ते देवा भवयन्तु वः। परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्सथ।। गी 3.11।। यह भी कहा है कि बिना यज्ञ में हवि दिये अर्थात समाज, सृष्टि में अपने योगदान की श्रद्धापूर्वक आहुति दिये बिना जो भोग करता है वह तो चोर है। इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभावितः। तैर्दत्तान प्रदायेभ्यो यो भुन्क्ते स्तेन एव सः।। गी 3.12।। आजके समस्त भ्रष्टाचारी इसी श्रेणी में आते है। यह श्लोक तो इन पापियों के लिये और भी कठोर शब्दावली का प्रयोग करता है। यज्ञ के प्रसाद के रुप में भोग करनेवाले लोग सर्व पापों से मुक्त हो जाते है वहीँ जो केवल अपने स्वार्थ के लिये ही भोग करते है वे तो पाप को ही खा रहे होते है।

यज्ञ अपने निर्माण में सबके योगदान को अधोरेखित कर अपने कर्म में उसके प्रति कृतज्ञता का व्यवहार लाने का संस्कार देता है। अतः यज्ञ के द्वारा ही गण का गठन सम्भव है। आज हमें पुनः यज्ञ संस्कारों के जागरण के द्वारा गण संस्कृति की पुनस्थार्पना करने की आवश्यकता है। इसीसे वास्तव में हमारे संविधान का ध्येय गणतन्त्र साकार हो सकेगा। संविधान में मौलिक अधिकारों के साथ मौलिक कर्तव्यों की भी बात की है| भारतीय संस्कृति में सदा कर्त्तव्य को ही महत्त्व दिया गया है| अधिकार को उसके अप्रिनाम के रूप में ही देखा गया| यज्ञ का व्यवहारिक रूप कर्त्तव्य में ही प्रगट होता है| स्वाहः का मंत्र अपने कर्तव्यों की आहुति का परिचायक है| किन्तु भारतीय संस्कृति के स्थान पर विदेशी राज के प्रभाव में बने होने के कारण हमारे संविधान में मौलिक अधिकार तो न्यायलय में कार्यान्वित किये गए है किन्तु मौलिक कर्तव्यों का स्वरुप मात्र सुझावात्मक रखा गया है| इनकी अवहेलना को किसी न्यायलय में चुनौती नहीं दी जा सकती| यह हमारी विडम्बना है|

गण संकल्पना पर आधारित व्यवस्थाओ के निर्माण के लिये यज्ञ को और अधिक विस्तार से समझने की आवश्यकता है। इस गणतन्त्र दिवस के अवसर पर हम गणत्व को जीवन में उतारने के लिये यज्ञ को समझाने व जीवन में उतारने का संकल्प ग्रहण करें।

जनवरी 26, 2012 Posted by | योग, सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , , | 4 टिप्पणियाँ

   

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