उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

स्वाधीनता का मर्म


गत माह अमेरिकी विदेषमंत्री हिलेरी क्लिंटन ने एक व्याख्यान में कहा कि चीन में लोकतन्त्र के विकास की ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है और यह चीन के विकास में सबसे बड़ी बाधा है। चीन के एक शोध संस्थान ने इसकी प्रतिक्रीया में एक लेख प्रकाशित किया जिसमें चीनी विद्वानों ने अमेरिकी वैश्विकवाद को चुनौति दी। उन्होंने प्रश्न किये कि जो पश्चिम में अपनाया गया है उसी व्यवस्था को अपनाना विकास कैसे माना जायेगा? क्या पश्चिमी देश दावे के साथ कह सकते है कि उनके द्वारा गत कई वर्षों से अपनाये गये तन्त्र ने देश के सभी लोगों को सुख प्रदान किया है? यदि पश्चिम द्वारा अपनायी व्यवस्था आदर्श होती तो आज उन देशों में बेराजगारी, कर्ज, सामाजिक व पारिवारिक विघटन क्यों बढ़ रहा है? लोकतन्त्र यदि आदर्श व्यवस्था है तो क्या इसने सभी देशों में आदर्श परिणाम दिये है? जिन देशों ने इसे अपनाया वे आज भी जब आदर्श समाज, राजनीति व अर्थव्यवस्था को नही प्राप्त कर सके हैं तो फिर अमेरिका को क्या अधिकार है कि वो इस अधुरी असफल व्यवस्था को सबके उपर थोपें? चीनी विद्वान केवल प्रश्नों तक ही सीमित नहीं रहे। उन्होंने दावा किया कि चीन में व्यवस्थागत सुधार उसके अपने ऐतिहासिक अनुभव, संस्कृति व दर्शन के अनुसार ही होना चाहिये। उनके अनुसार चीन के लिये लोकतन्त्र के स्थान पर कन्फुशियन द्वारा प्रणीत ‘मानवीय सत्ता’ के सिद्धान्त पर विकसित व्यवस्था अधिक उपकारक व सम्यक होगी। शोधकारकों ने इस सिद्धान्त पर आधारित एक व्यवस्था के बारे में विस्तार से प्रस्ताव भी लिखा।

लोकतन्त्र की उपयोगिता अथवा चीनी विद्वानों द्वारा प्रस्तुत राजनयिक व्यवस्था पर विचार विमर्श अथवा विवाद भी हो सकता है किन्तु सबसे महत्वपूर्ण विचारणीय बिन्दू है कि उन्होंने छाती ठोक कर यह कहा कि उनके देश के लिये उनके अपने विचार व इतिहास में से निकली व्यवस्था ही उपयोगी है। किसी और के लिये जो ठीक है वह सबके लिये ठीक ही होगा यह साम्राज्यवादी सोच नहीं चलेगी। साथ ही अपने अन्दर से तन्त्र को विकसित करने के स्थान पर विदेशी विचार से प्ररित होकर व्यवस्था बनाना भी मानसिक दासतता का ही लक्षण है। जब हम स्वतन्त्रता के छः दशकों के बाद के भारत की स्थिति का अवलोकन करते हे तो हमे निराशा ही होती है। 15 अगस्त 1947 को जब भारत स्वतन्त्र हुआ तो हमारे राष्ट्रीय नेतृत्व के साथ ही पूरे विश्व को भी भारत से अनेक अपेक्षायें थी। इसी कारण 1950 के दशक में पूरा विश्व जब दो खेमों में बटा हुआ था तब भारत के आहवान पर 108 देशों ने ‘‘निर्गुट आंदोलन’’ के रूप में भारत का नेतृत्व स्वीकार किया था। भारत के इतिहास व संस्कृति के कारण विश्व के समस्त दुर्बल देशों को भारत से एक कल्याणकारी मार्गदर्शक नेतृत्व की अपेक्षा थी। हमारे प्रथम प्रधानमंत्री ने 14 व 15 अगस्त की मध्यरात्री पर लाल किले पर तिरंगा फहराते हुये ही घोषणा की थी कि भारत विश्व के राष्ट्रपरिवार में अपनी सकारात्मक भुमिका को निभाने के लिये तत्पर है। 15 अगस्त को आकाशवाणी पर प्रसारित संदेश में महायोगी अरविन्द ने स्वतन्त्र भारत के समक्ष तीन चरणो में लक्ष्य रखा था। पहले चरण में भारत के अस्वाभाविक, अप्राकृतिक विभाजन को मिटा अखण्ड भारत का पुनर्गठन, द्वितीय चरण में पूरे एशिया महाद्विप का भारत के द्वारा नेतृत्व तथा अन्ततः पूरे विश्व में गुरूरूप में संस्थापना। आज 65 वर्ष के बाद क्या हम इनमें से किसी भी लक्ष्य के निकट भी पहूँच पाये है?

विश्व के मार्गदर्शन की तो बात दूर रही हम अपने देश को ही पूर्णतः समर्थ, समृद्ध व स्वावलम्बी भी कहाँ बना पाये है? सारा विश्व भारत की असीम सम्भावनाओं की चर्चा करता है। किन्तु उन सम्भावनाओं को प्रत्यक्ष धरातल पर उतारने का काम अभी भी कहाँ हो पाया है? देश 70 प्रतिशत जनता अभाव में जी रही है। धनी व निर्धन के बीच की खाई बढ़ती जा रही है। संस्कारों का क्षरण तेजी से हो रहा है। भारतीय भाषाओं का महत्व व प्रासंगिकता दोनों ही इतनी गति से कम हो रही है कि कई देशी बोलियों के अस्तीत्व पर ही प्रश्नचिन्ह लग रहा है। कुल मिलाकर भारत में से भारतीयता की प्रतिष्ठा समाप्त हो रही है। कहीं पर भी कोई व्यवस्था नहीं दिखाई देती। राजनयिक, सामाजिक तथा प्रशासनिक व्यवस्था पूर्णतः शिथिल व दिशाहीन हो रही है। शिक्षा व्यवस्था भी इतनी प्राणहीन हो गई है कि चरित्रनिर्माण तो दूर की बात सामान्य लौकिक ज्ञान को प्रदान करने में भी इसे सफलता नहीं मिल पा रही। स्नातकोत्तर उपाधि धारण करनेवाले छात्र भी किसी भी एक भाषा में सादा पत्र भी नहीं लिख पाते है। इन शिक्षितों को बिना अंगरेजी का उपयोग किये 4 वाक्य बोलना भी असम्भव सा लगता है। दूसरी ओर वही उच्चशिक्षित छात्र शुद्ध अंगरेजी में भी 4 वाक्य नहीं बोल पाता है। ऐसी शिक्षापद्धति के कारण उत्पन्न चरित्रहीनता से सर्वत्र भ्रष्टाचार व अराजकता का वातावरण बन गया है। इस सबको बदलने के लिये अनेक आंदोलन भी चलाये जा रहे है। जब तक हम समस्या की जड़ को नही जान जाते तब तक सारे प्रयास पूर्ण प्रामाणिक होते हुए भी व्यर्थ ही होंगे।

देश की इस परिस्थिति के कई कारण है। समस्याएं बहुआयामी हैं। आर्थिक, नीतिगत, कार्यकारी, संस्थागत, सामाजिक, व्यक्तिगत कई कारणों से समस्या जटील होती जा रही है। कई प्रकार के देशभक्त व्यक्ति व संगठन इन कारणों के निवारण पर कार्य कर रहे है। फिर भी अपेक्षित परिणाम दिखाई नहीं दे रहा। समस्या के समाधान हेतु सभी पहलुओं पर काम तो करना ही पड़ेगा किन्तु दिशा एक होना आवश्यक है। हमें अपने देश के मूलतत्व, चिति के अनुरूप व्यवस्थाओं का निर्माण करने की ओर प्रयास करना होगा। भारत का जागरण भारतीयता का जागरण है। हमारा राष्ट्रीय तन्त्र हमारे स्वबोध को लेकर विकसित करना होगा तभी यह स्वतन्त्र कहा जायेगा। राज्यव्यवस्था हमारे राष्ट्रीय स्वभाव के अनुसार होगी तभी स्वराज्य का स्वप्न साकार होगा। स्वामी विवेकानन्द ने बार बार कहा है प्रत्येक राष्ट्र का विश्व को संप्रेषित करने अपना विशिष्ट संदेश होता है, नियति होती है जिसे उसे पाना होता है और जीवनव्रत होता है जिसका उसे पालन करना होता है। वे कहते है भारत का प्राणस्वर धर्म है और उसी के अनुरूप उसका मानवता को संदेश है आध्यात्म, नियति है जगत्गुरू तथा जीवनव्रत है मानवता को ऐसी जीवनपद्धति का पाठ पढ़ाना जो सर्वसमावेशक, अक्षय व समग्र हो।

स्वतन्त्र भारत को अपनी नियति को पाने के लिये अपने जीवनव्रत के अनुसार व्यवस्था का निर्माण करना था। उसके स्थान पर हम सदैव उधार की व्यवस्थाओं को अपनाते रहे। हमने अपना संविधान तक विभिन्न देशों से उधार लिया। अनेक शताब्दियों तक विविधता से सम्पन्न विस्तृत राज्य पर सुचारू संचालन करने वाली नैसर्गिक व्यवस्था का सैद्धान्तिक व व्यावहारिक प्रतिपादन करनेवाले चाणक्य, विद्यारण्य तथा शिवाजी आदि स्वदेशी चिंतको की सफल राजव्यवस्थाओं का अध्ययन कर उन्हें कालानुरूप समायोजित करने का विचार ही नहीं हुआ। क्या विदेशी आधार पर बने संविधान से विकसित तन्त्र स्वदेशी हो सकता है? इसी का परिणाम हुआ कि हमने आगे चलकर राष्ट्र के प्राण ‘धर्म’ को ही राजतन्त्र से नकार दिया। यही कारण है कि पूरी व्यवस्था ही प्राणहीन हो गई।

अर्थतन्त्र में भी हमने प्रथम चार दशक तक रूस की साम्यवादी व्यवस्था से प्रेरणा ग्रहण कर समाजवादी अर्थव्यवस्था का निर्माण किया। उसकी निष्फलता सिद्ध हो जाने पर 1991 के बाद आर्थिक उदारता के नाम पर पश्चिम के मुक्त बाज़ार व्यवस्था को अपनाया। जब कि यह विश्वमान्य तथ्य है कि 18 वी शति के प्रारम्भ तक भारत ना केवल विश्व का सबसे समृद्ध देश था अपितु वैश्विक संपदा का 33 प्रतिशत भारत में था। विश्व के धनी देशों के संगठन Organisation for Economic Co-operation and Development (OECD) ने ख्यातनाम अर्थवेत्ता एंगस मेडीसन को इसवी सन के प्रारम्भ से विश्व की सकल सम्पदा (गडप) पर अनुसंधान करने का प्रकल्प दिया। उन्होंने विश्व के आर्थिक इतिहास का संकलन किया। उनके अनुसार भारत व चीन विश्व के सबसे धनी देश रहे है। इसा के काल के प्रारम्भ से 14 वी शती तक तो चीन भी किसी होड़ में नहीं था। अंगरेजों ने इस प्राचीन समग्र व्यवस्था को तोड़ अपनी शोषण पर आधारित व्यवस्था को लागु किया तब से इस देश में विपन्नता का राज प्रारम्भ हुआ। आज राजनैतिक स्वतन्त्रता के 65 वर्षों बाद भी हम उसी दासता को क्यों ढ़ो रहे है? इस देश का अतीत जब इतना समृद्ध रहा है तब यदि आज भी हम अपने सिद्धान्तों पर आधारित व्यवस्था का निर्माण करेंगे तो पुनः विश्व के सिरमौर बन सकते है।

आज हम अपनी स्वतन्त्रता को खोने के कगार पर आ पहूँचे है ऐसे में मानसिक स्वाधीनता का वैचारिक आंदोलन प्रारम्भ करने की आवश्यकता है। एक ऐसे तन्त्र के निर्माण का आन्दोलन जो देशज हो अर्थात इस देश के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक तथा धार्मिक अनुभव से उपजा हो। ऐसे तन्त्र का स्वाधीन होना भी आवश्यक है। अर्थात इसके सभी कारकों पर अपने राष्ट्र का ही निर्णय हो। इस हेतु शिक्षा के राष्ट्रीय बनने की आवश्यकता है। जिससे निर्णायक भी स्वदेश की भावना व ज्ञान से परिपूर्ण हो। स्व-तन्त्र का तिसरा आवश्यक पहलु है स्वावलम्बी तन्त्र। तन्त्र की सहजता व सफलता उसके निचली इकाई तक स्वावलम्बी होने में है। गाँव अपने आप में स्वावलम्बी हो तो ही सबका अभ्युदय सम्भव होगा। भारतीय व्यवस्था हर स्तर पर स्वावलम्बी होती है। इसमें तन्त्र के निर्माण के बाद नियमित संचालन के लिये शासन के भी किसी हस्तक्षेप अथवा सहभाग की आवश्यकता नहीं होती। समाज ही स्वयं संचालन करता है। आपात् स्थिति में ही शासन को ध्यान देना पड़ता है।

आज हम सब स्वाधीनता दिवस मनायेंगे। केवल देशभक्ति की भावना को उजागर करने के साथ ही स्वाधीनता के मर्म पर विचार भी हो यह शुभाकांक्षा।

अगस्त 15, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , , , , , , , | 1 टिप्पणी

कैसे दूर हो संसद के प्रति समाज की अनास्था ?


संसद के ६० वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर विशेष सत्र का आयोजन कर उत्सव मनाया गया । पर क्या केवल उत्सव मनाना पर्याप्त है ? सैद्धांतिक रूप से जो सम्मान व महत्व संसद का है क्या वह गरिमा आज जनमानस में स्थापित है ? क्या देश की जनता संसद के हीरक महोत्सव के समारोह में मन से जुडी ? क्या उसे इसका कोई हर्ष हुआ ?

हमारे लोकतन्त्र की सबसे बडी पंचायत संसद के सत्रों को १३ मई २०१२ को ६० वर्ष पूरे हुए । संसद का महत्व इस कारण है क्योंकि स्वतन्त्र भारत के संविधान के अनुसार यह हमारी सर्वोच्च विधायिका है । देश में सुशासन के लिये समुचित कानून बनाने का कार्य संसद को करना है । जिस संविधान के द्वारा इसकी स्थापना हुई उसमें परिवर्तन का अधिकार भी संसद को ही है । सामूहिक निर्णय लोकतन्त्र में सुराज की आत्मा है । संसद चर्चा के द्वारा सामूहिक निर्णय का स्थान है । देश की नीतियों के निर्धारण का कार्य यद्यपि कार्यपालिका का है, किन्तु उनकी समीक्षा तथा दिशा निर्देशन का कार्य संसद में विभिन्न चर्चाओं के माध्यम से किया जाता है । भारतीय लोकतन्त्र में हमने जो व्यवस्था स्वीकार की है उसमें कार्यपालिका भी संसद का ही अंग होती है । मुख्य कार्यपालक प्रधानमंत्री का संसद सदस्य होना अनिवार्य है । यदि नियुक्ति के समय वह सांसद नहीं है तो ६ माह के भीतर सांसद बनना अनिवार्य है । इस प्रकार संसद भारतीय राजव्यवस्था में सर्वोच्च है । न्यायपालिका को संसद के निर्णय बदलने का अधिकार नहीं है । संसद द्वारा बनाये कानून यदि संविधान के विपरीत हो तब ही न्यायपालिका हस्तक्षेप कर सकती है । अन्यथा इन कानूनों के अनुसार ही निर्णय देने के लिये सर्वोच्च न्यायालय बाध्य है ।

संसद के वर्चस्व का आधार उसका निर्वाचित स्वरूप है । सैद्धांतिक रूप से लोकतन्त्र में जनता ही राजा है । जनता के प्रतिनिधि राज चलाते हैं । अत: जनता के प्रतिनिधियों को सर्वाधिक अधिकार प्राप्त हैं । जिसको संसद में बहुमत प्राप्त है वह भारतीय राजव्यवस्था में सर्वाधिकारी है । जनता के निर्वाचन द्वारा सांसदों को यह नैतिक अधिकार मिल जाता है कि वे देश के बारे में निर्णय करें । यह नैतिक अधिकार ही वास्तव में संसद को राजनीति की सबसे महत्वपूर्ण संस्था का दर्जा देता है । संसद के ६० वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर विशेष सत्र का आयोजन हुआ । स्मृतियों को संजोया गया । पूर्व सांसदों का स्मरण किया गया । प्रथम लोकसभा के दो जीवित सदस्यों श्री रिशांग किशिंग तथा श्री रेशमलाल जांगिड का सम्मान भी किया गया । कुल मिलाकर उत्सव मनाया गया । पर क्या केवल उत्सव मनाना पर्याप्त है ? सैद्धांतिक रूप से जो सम्मान व महत्व संसद का है क्या वह गरिमा आज जनमानस में स्थापित है ? क्या देश की जनता संसद के हीरक महोत्सव के समारोह में मन से जुडी ? क्या उसे इसका कोई हर्ष हुआ ?

वास्तव में स्वतन्त्र भारत के पडौस में जो देश हैं उसकी राजनीतिक दृष्टि से समीक्षा करें तो यह अपने आप में हमारे लिए बहुत बडी उपलब्धि है । भारत के साथ उसी से कटकर बने सभी पडौसी देशों में लोकतन्त्र का अस्तित्व ही खतरे में रहा है । पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यान्मार, श्रीलंका, नेपाल, मालदीव तथा अफगानिस्तान सभी देशों में राजनैतिक उथल-पुथल ही चल रही है । ऐसे में १९७५ से ७७ के आपात्काल के कुछ माह छोड दिये जाये तो भारत ने स्थिर लोकतन्त्र का परिचय दिया है । इतने विशाल, विविधता सम्पन्न राष्ट्र के लिये यह अपने आप में ही बहुत बडी उपलब्धि है । किन्तु आज कितने भारतीय इस विचार से ऐसी सकारात्मकता से जुड सकते हैं ? दोष उनका भी नहीं है । हमारी लगभग सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं में से समाज की आस्था उठ चुकी है । इसके चारित्रिक कारण है । संसद की गरिमा की रक्षा सांसद ही कर सकते हैं और पिछले कई वर्षों में राजनीतिक दलों के साथ ही सांसदों के चरित्र में भी गिरावट आई है । जो हमारी विशेषतायें थी वे ही बाधा बन गई । कार्यपालिका पर निर्वाचित संसद का अंकुश रहने के स्थान पर भ्रष्टाचार में भागीदारी के लिए कार्यपालिका का अंग बनने हेतु सांसद चुने जाने की परम्परा प्रारम्भ हो गई । सेवा के स्थान पर राजनीति व्यवसाय बन गई । इसी कारण संसद के ६० वर्ष पूर्ण होने पर सांसदों के अलावा किसी ने उत्सव नहीं मनाया । यह तो ऐसा हुआ कि स्वयं का जन्मदिन केवल स्वयं ही मनाये । केवल व्यक्तिगत चारित्र्य ही संसद की गिरती गरिमा के लिए कारणीभूत नहीं है, वरन् वास्तव में ऐसे व्यवस्थागत कारण भी है जिसके चलते चरित्रहीन व्यक्ति लोकतन्त्र के मंदिर का पुजारी बन सकता है । भारत में पंचों को परमेश्वर का प्रतिनिधि माना जाता है । यदि संसद को देश की सर्वोच्च पंचायत का यह दैवी सम्मान पुन: दिलाना है तो राजनैतिक दलों से सुयोग्य व्यक्ति को विधायिका में भेजने के साथ ही दो महत्वपूर्ण व्यवस्थागत सुधार भी अनिवार्य है ।

१.   निर्वाचन में सही अर्थों में बहुमत के प्रतिनिधि का चयन हो । वर्तमान चुनाव प्रणाली में मतदान के सर्वाधिक हिस्से का प्रतिनिधि निर्वाचित हो जाता है । विविधता के कारण दलों व प्रत्याशियों की संख्या बडी होती है । अत: ऐसा यदा कदा ही होता है कि निर्वाचित प्रतिनिधि को बहुमत ने चुना हो । अधिकतर सांसद १५ से २५ प्रतिशत मत पाकर सांसद बन जाते हैं । यह प्रतिशत भी उन मतों का है जो मतदान में सम्मिलित हुए । परंतु जो २५ से ४० प्रतिशत मतदाता अपने मताधिकार का आलस, व्यस्तता अथवा घोर अनास्था के कारण प्रयोग ही नहीं कर रहे, उनकी तो गणना ही नहीं है । इस प्रकार समाज के ८० प्रतिशत से अधिक लोगों द्वारा नकारे हुए प्रतिनिधि संसद में जनता का प्रतिनिधित्व करने का दंभ भरते हैं । इस नकारा पद्धति के कारण राजनीति का स्वरूप विभाजनकारी हो गया है । जाति, पंथ, भाषा अथवा जो भी मिल जाये उस आधार पर जनता को बाँटकर अपने लिये प्रभावी अल्पमत का समर्थन प्राप्त करना प्रत्येक दल व नेता का लक्ष्य बन गया है । इसी के चलते सांसदों की भी मंडी लगती है । अत: संसद के ६० वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर चुनाव में विजय के लिये ५० प्रतिशत से कम से कम एक मत अधिक का प्रावधान किया जाना चाहिये ।

२.   सांसदों में भ्रष्टाचार का दूसरा व्यवस्थागत कारण कार्यपालिका व विधायिका का घोलमेल है । मंत्री बनने के लिये सांसद होना अनिवार्य है । मंत्री के कार्यों पर नियन्त्रण व अंकुश रखने का काम भी संसद को करना है । इस दोहरे दायित्व के आपसी हितसम्बन्ध होने के कारण ही कार्यपालिका के भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के स्थान पर विधायिका उसकी भागीदार बनती दिखाई दे रही है । अत: कार्यपालिका के स्वतन्त्र स्वरूप को विकसित कर संसद केवल विधायिका के रूप में तथा कार्यपालिका की नीति के लिये मार्गदर्शक तथा समीक्षक की भूमिका में हो, यह आवश्यक है । वर्तमान स्थिति में इसका एक समाधान मुख्य कार्यपालक प्रधानमंत्री के प्रत्यक्ष चुनाव से हो सकेगा । यदि देश की पूरी जनता प्रधानमंत्री के चुनाव में मतदान करे तथा उसमें भी बहुमत से चयन का ही नियम हो तो, एक स्थिर कार्यपालिका के साथ ही तटस्थ विधायिका का निर्माण हो सकेगा ।

संसद के हीरक महोत्सव के अवसर पर हम वैचारिक मंथन के द्वारा देश में एक लोकतांत्रिक क्रांति का सुत्रपात करें जिससे कि विश्व का सबसे बडा लोकतन्त्र भारत और भी अधिक आदर्श एवं प्रभावशाली बनें ।

मई 16, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , | 2 टिप्पणियाँ

   

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