उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

शुभकामना नही शुभसंकल्प


बुरा ना मानो होली है ॰ ॰ ॰

होली के अवसर पर भ्रमण ध्वनि शुभकामना संदेशों से पट गया है। नए साधनों के कारण चित्र, रंग सब इन संदेशों में आ गए है। कई बार तो संदेश मिटाना भी बड़ी समस्या हो जाती है। प्रश्न ये है कि क्या हमने अपने अपने सारे उत्सवों को यंत्रों के समान ही एकरूप तो नहीं बना दिया। हर बात पे केवल हैपी कह देना। हैपी दिवाली कहो या हैपी होली सब एक सा। सारे संदेश एक से। जीवन कभी एकरूप नहीं होता। वैसे ही सारे उत्सव भी एक से नहीं हो सकते हो। हर उत्सव का अपना महत्व है और अपनी पद्धति भी। होली तो मन को साफ़ करने का उत्सव है। केवल घर का कचरा जलना ही नहीं तो अपने मन की सब कुंठाएँ क्रोध सब को ही मन से बाहर करना है। इस हेतु देश के भिन्न भिन्न भागों में अलग अलग प्रकार की परम्पराएँ विकसित हुई है। एक दूसरे को छेड़ना, कष्ट देना और कहना -‘बुरा ना मानो होली है ‘

इसी अवसर पर प्रस्तुत है उत्सवों पर संदेश देने की वैज्ञानिक विधि पर दिवाली के बाद लिखा यह लेख। पूरा होते होते देर हो गयी इसलिए तब प्रस्तुत नहीं किया था अब लीजिए ॰ ॰ ॰

शुभकामना नही शुभसंकल्प

          दिवाली एक तरफ विश्व का सबसे बडा उत्सव बनता जा रहा है। विश्व के अनेक देशों  में बडे़ उत्साह से दीपोत्सव को मनाए जाने की खबरें मिल रही हैं संयुक्त राष्ट्र संघ मुख्यालय पर भी दियों की जगमग से Happy Diwali प्रकाशित किया गया। इंग्लैंड की नूतन प्रधानमंत्री ‘थेरेसा मे’ ने पूरा 3.30 मिनीट का वीडियो संदेश दिवाली की समस्त पौराणिक कथाओं का उल्लेख करते हुए प्रसारित किया। आस्ट्रेलिया व कॅनडा ने अक्टूबर माह को दीपोत्सव माह के रूप में मनाने की घोषणा की। ये सब समाचार भी सामाजिक माध्यम (Social Media) से ही प्राप्त हुए। दूसरी ओर भारत में उत्सवों का स्वरूप बदलता हुआ दिखाई दे रहा है। प्रत्यक्ष मिलना, साथ आना, विभिन्न परंपराओं को निभाना इससे अधिक संदेशों के आदान-प्रदान से ही उत्सव मनाए जा रहे है, ऐसा प्रतीत हुआ। संचार के माध्यम निश्चित रूप से बढ गए है और उनका पूरा उपयोग उत्सवों में किया गया। मोबाईल कंपनियों ने दिवाली और भाईदूज के दिन सारी मुफ्तसेवाओं को बंद रखा। उसके बाद भी Whatsap, Facebook आदि संचार माध्यमों में दिवाली संदेशों  का तांता लगा रहा। ऊपरी तौर पर तो यह बडा आकर्षक और उत्साहवर्धक लगता है किंतु थोडा गंभीरता से सोचने पर हमे उत्सवों के उथले होने का खतरा स्पष्ट दिखाई देगा।

         पहले थोडीसी मीमांसा संदेशों  की कर लेते हैं। यह शोध का विषय होगा कि उत्सवों के अवसर पर एक दूसरे को सदिच्छा संदेश भेजने की परंपरा कहाँ से व कबसे प्रारंभ हुयी। सतही खेज में इतना तो ध्यान में आता है कि इस परंपरा का मूल किसी भारतीय पौराणिक अथवा ऐतिहासिक तथ्य में तो नही मिलता। हमारे यहा सामान्य रूप से भी एक दूसरे के अभिवादन में आध्यात्मिकता का परिचय मिलता है। जय राम जी की, जय श्रीकृष्ण,  राम-राम आदि सीधे ईश्वर वाचक अभिवादनों के साथ ही नमस्ते जैसे सामान्य अभिवादन में भी ‘मै नही तू ही’ का अथवा ‘तेरे अंदर के ईश्वर को प्रणाम’ का आध्यात्मिक संदेश ही छुपा है। ऐसे में उत्सवों के अवसर पर एक दूसरे को दिवाली मुबारक अथवा Happy Diwali कहकर संबोधित करना एक अत्यंत उथली मनः स्थिति का निर्माण तो नहीं कर रहा? मुबारक में तो कम से कम समृद्धी की कामना है किंतु Happines तो मात्र  शारिरीक अथवा भौतिक सुख की कामना है। हिंदी में अथवा अन्य भारतीय भाषाओं में जो पर्याय ढूंढा गया वह इन दोनो से थोडा बेहतर है। ‘शुभ दीपावली’ इस संदेश से शुभ अर्थात कल्याणकारी, धार्मिक भले की बात की है। हमारे यहा लाभ भी शुभ हो अर्थात नैतिकता से कमाया हुआ हो यह मान्यता है। अशुभ आमदनी को लाभ भी नहीं कहा जाता। इन तीनों संदेशों के अर्थ भले ही अलग-अलग हो किंतु एक दूसरे को प्रेषित करने का भाव समान ही है। Happy Diwali कहने वाले को यह ध्यान में नही है कि वह केवल भौतिक सुख की कामना कर रहा है उसी प्रकार मुबारक अथवा शुभ की कामना करने वाले को भी अपने संदेश के अर्थ का ज्ञान होगा ही ऐसा आवश्यक नही है। कुल मिलाकर विषय यह है कि हम एक दूसरे के प्रति अपनी आत्मीयता को इन भिन्न-भिन्न भावों से व्यक्त करना चाह रहे है। दिवाली हमारे लिए आत्मीयता के प्रकटीकरण का अवसर है इसीलिए मन में यह प्रश्न आता है कि संचार माध्यमों के सहज प्रयोग से थोक के भाव में भेजे गए संदेश  क्या उस आत्मीयता को भेजने और पानेवाले के मन में प्रेरित कर पाते है? भेजने वाला क्या अपने ‘मित्र (?) सूची’ (Friend list) के सभी लोगों को एक साथ भेजे संदेशों की बौछार में प्रत्येक भेजने वाले से कैसे जुड सकेगा? आपस में मिलकर साथ में कुछ क्षण बिताकर जो आत्मीयता विस्तारित होती है उसका पर्याय यह यांत्रिक संदेश हो सकते है क्या?       

            भारत में उत्सवों को सामाजिक, सांस्कृतिक के साथ ही आध्यात्मिक दृष्टि से भी महत्व दिया जाता है। इसलिए, उत्सवों को मनाने का तरीका भी उसी प्रकार से होता है। उत्सवों के अवसर पर एकत्रित आकर सर्वशक्तिमान से प्रार्थना करने हेतु पूजा आदि का विधान होता है। दीपावली भी इसी प्रकार महालक्ष्मी की पूजा का उत्सव है। महालक्ष्मी केवल मात्र धन और वैभव की देवता नही है अपिुत समृद्धि के समग्र अधिष्ठान को महालक्ष्मी के रूप में पूजा जाता है।  दीपावली सबके जीवन में नैतिक समृद्धि के साथ ही स्वास्थ्य, सौभाग्य, विद्या आदि सभी वरदायिनी शक्तियों की कृपा हेतु किया जानेवाला अनुष्ठान है। अतः साथ मिलकरके इस प्रकार का आयोजन किया जाए यह अपेक्षित है। बदले हुए आधुनिक परिवेश में भी हर सामूहिक इकाई में दिवाली मिलन मनाने की परंपरा बनी है यह अधिक उचित दिखाई देता है। इस बहाने सब लोग एकत्रित आकर अपनत्व एवं आत्मीयता का अनुभव करते है। यांत्रिक संदेशों के आदान प्रदान से यह भारतीय परंपरा के अधिक निकट है। संदेश भेजने में भी हमारी सांस्कृतिक आध्यात्मिक विरासत का ध्यान यदि रखा जाए तो संदेश कामना के न होकर प्रार्थना के होंगे। कामना, वासना, इच्छा मन को नीचे की ओर ले जाती है। भौतिकता, जडता की ओर इनकी गति होती है अतः  कामना पूर्ति के लिए धर्म का अधिष्ठान आवश्यक माना गया है। नैतिक मार्ग से ही कामना पूर्ती की अपेक्षा की जाती है। जब कामना हावी हो जाती है तो नैतिकता का विलोपन होता है। परंपराओं में भी ऐसे ही क्षरण आता है। दिवाली के दिन विभिन्न प्रकारों से जुआ खेलने की परंपरा इसी नैतिक स्खलन का परिणाम है। महालक्ष्मी के समग्र रूप को भुलाकर केवल भौतिक संपत्ति को ही लक्ष्मी का प्रसाद मानने की भूल के कारण ऐसे अनैतिक मार्गो का महिमामंडन किया जाने लगा।

अतः कामना के स्थान पर मन को ऊध्र्वगामी उदात्त लक्ष्य की ओर अग्रेसर करने के लिए उत्सवों के अवसर पर सामूहिक स्तर पर प्रार्थना एवं व्यक्तिगत स्तर पर संकल्प का आधार लिया जाता है। यांत्रिक संचार माध्यमों से भेजे जानेवाले संदेशों  मे भी यदि प्रार्थना एवं संकल्प की अभिव्यक्ति हो तो वह उत्सव के उद्देश्य के अनुरूप होगा। दिवाली पर संदेश  में महालक्ष्मी की प्रार्थना के द्वारा नैतिक समृद्धि की अभिलाषा प्रकट करना एक दूसरे को व्यक्तिगत शुभकामना का आदान-प्रदान करने से अधिक उचित होगा। संदेश में प्रकाशोत्सव, राम-विजय लक्ष्मी पूजन आदि के अनुरूप शुभ संकल्प का उच्चारण भी भारतीय संस्कृती के लिए अधिक पोषक होगा। हमारे सभी उत्सवों में उदात्त सामूहिक समरसता के संदेश छापे हुए है जिनको संकल्प के रूप में दोहराने से मानव जीवन अधिक सौहार्द्रमय एवं आनंददायी होगा। 

मार्च 13, 2017 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , | 5 टिप्पणियाँ

गण संस्कृति यज्ञ संस्कृति


‘‘हम भारतवासी, पूरी गंभीरता से भारत को एक सार्वभौम, लोकतान्त्रिक गणराज्य के रुप में संगठित करने का संकल्प करते है।’’ भारत के संविधान की मूल प्रस्तावना की यह प्रारम्भिक पंक्तियाँ  हैं। 1975 में पूरे देश में आपात्काल थोपकर संविधान की हत्या करनेवाले 42 वे संविधान संशोधन में इसमें सार्वभौम के बाद पंथनिरपेक्ष तथा समाजवादी ये दो विशेषण और जोड़े गये। संविधान की मूल प्रकृति तथा प्रावधान में किसी भी प्रकार के संशोधन के बिना ही उसके उद्देश्य में दो अनावश्यक संकल्पनाओं की पूछ जोड़ दी गई। चुनावी मजबुरियों के नाम पर इन को पुनः संशोधित करने का साहस कोई भी राजनैतिक दल आजतक नही दिखा पा रहा है। आपात्काल के बाद स्थापित जनता सरकार ने 44 वें संविधान संशोधन से 42 वें संशोधन द्वारा जनता मौलिक अधिकारों को स्थगित करनेवाले सभी प्रावधानों को तो निरस्त कर पूर्ववत् कर दिया किन्तु प्रस्तावना में की गई छेड़छाड़ को वैसे ही रखा। इन विशेषणों के जुड़ने के कारण ही आज हम राजनैतिक दलों को तुष्टिकरण की नित नई सीमाओं को लांघते हुए देखते है। सहिष्णुता का दायरा सीमटता जा रहा है और कट्टरता बढ़ती ही जा रही है।

इन विषयों पर चिंतन करना इसलिये आवश्यक है क्योंकि इन बातों से गणतन्त्र की नीव पर ही आघात हो रहे है। गणराज्य का आधार हे गण। गण अर्थात एकमन से कार्य करने वाला समूह। प्रबन्धन के क्षेत्र में आजकल अत्यधिक प्रचलित अंगरेजी शब्द है टीम। इसकी परिभाषा की जाती है, ‘‘एक कार्य के लिये गठित, एकलक्ष्यगामी दल’’। यह तात्कालिक होता है कार्य की अवधि तक के लिये कार्य की पूर्णता का लक्ष्य लेकर यह कार्य करता है। ‘गण’ की संकल्पना अधिक गहरी है। अंगरेजी में उपयुक्त Republic शब्द से भी बहुत गहरी। गण एक पारम्पारिक पारिभाषिक शब्द है। इसके राजनीति शास्त्र के उपयोग से भी पूर्व इसका आध्यात्मिक प्रयोग है। हमारी परम्परा में पूजा का पहला अधिकार गणेश जी का हैं जो गणों के ईश, गणनायक हैं। केवल शिवजी के गणों का नायक होने के कारण ही वे गण पति नहीं है। मानव का मानव से सम्बन्ध स्थापित करने की वैज्ञानिक आध्यात्मिक प्रक्रिया ‘गण’ के वे अधिपति है। मै से हम की ओर जाने की प्रक्रिया है गण।  और इस प्रक्रिया के लिए लिए आवश्यक साधना के अधिपति गणपति|
भारतीय आध्यात्म विद्या में आगम व निगम की दोनों विधियो की मान्यता है। निगम विधि में जहाँ  स्वयं को नकारकर शुन्य बना दिया जाता है|  नेति नेति की विधि से अहंकार को शुन्य कर शिवत्व से एकत्व की प्रक्रिया बतायी गई है। वही आगम विधि में अपने क्षुद्र अहं को विस्तारित कर सर्वव्यापि करने की प्रक्रिया द्वारा विराट से एकाकार होने की प्रक्रिया भी आध्यात्मिक साधना है। इस विधि में अपने व्यक्तिगत मै को सामूहिक मै के साथ क्रमशः एकाकार करते हुए स्वयं के स्वत्वबोध का विकास किया जाता है। यही अखण्डमण्डल की साधना है जो चराचर में व्याप्त ईश्वर का साक्षत्कार करवाती है। यह गण साधना है। मै को समूह में विसर्जित करने की साधना। गण के अंग का कोई व्यक्तिगत अस्तीत्व ही नहीं रह जाता है वह अपने गण परिचय से एकाकार हो बड़ी इकाई के रक्षार्थ अपने आप को समर्पित कर देता है।

‘गण’ गठन की प्रक्रिया व्यक्ति की साधना के साथ ही समूह की भी साधना है। भारत में सामूहिक साधना का ही विशेष महत्व रहा है। हमारे सारे वेद मन्त्र बहुवचन में प्रार्थना करते है। अहं का नहीं वयं का प्रयोग किया जाता है। मन, वचन, कर्म में सामूहिकता की प्रार्थना बार बार की गई है। हम एक मन से एक संकल्प के साथ एक दिशा में अग्रेसर होते हुये साथसाथ उत्कर्ष व कल्याण को प्राप्त करें। यह हिन्दूओं की सनातन वैश्विक प्रार्थना है। इस बात को हमने केवल दर्शन के सिद्धान्तों तक ही सीमित नहीं रखा अपितु कर्म, अथवा आचार की परम्परा में ढ़ालकर उसे जीवन का नियमित अंग बना दिया। यह भारतीय जीवन दर्शन की विशेषता है। प्रत्येक तत्व का कर्मकाण्ड के रुप में सघनीकृत संस्थापन (Concrete  Institutionalization ) किया गया। यही अनेक आक्रमणों के बाद भी हमारे जीवित रहने का महत्वपूर्ण रहस्य है। जीवन के प्रत्येक अंग में इस ‘गण’ संकल्पना को साकार किया गया। परिवार, वर्ण, ग्राम, नगर, जनपद तथा राष्ट्र इन सभी स्तरोंपर गणों के गठन की विधि को हमने सदियों से विकसित किया है। धार्मिक, औपासनिक परम्पराओं के साथ ही सामाजिक, आर्थिक व राजनयिक व्यवस्थाओं में गणों का विकास हिन्दूओं ने प्राचीनतम काल से किया है।

यह देश का दुभाग्य ही है कि स्वतन्त्रता के बाद हमारे इन प्रचण्ड ऐतिहासिक अनुभूतियों को पूर्णतः दुर्लक्षित कर हमने विदेशी विचारों पर आधरित व्यवस्था को अपनाया। इतना ही नहीं सेक्यूलर के नाम पर अपनी सभी प्राचीन परम्पराओं को प्रभावी रुप से नकारने का काम किया। परिणामतः परिभाषा में गणराज्य होते हुए भी सामूहिक चेतना के विकास के स्थान पर हमने विखण्डित गुटों की राजनैतिक चेतना का विकास किया। पंथ, प्रांत, भाषा तथा जाति जैसी सामूहिक चेतना व्यक्ति के विस्तार का माध्यम बनने के स्थान पर हमारी प्रचलित राजनैतिक व्यवस्था में यह सभी परिचय विघटन का कारण बनते जा रहे है। समाज में धार्मिक स्तर पर आज भी जीवित ‘गण’ संकल्पना को ठीक से समझकर उसे व्यवस्थागत रुप प्रदान करना वर्तमान भारत की सबसे बड़ी चुनोति है।

गण के गठन के शास्त्र को हम समझने का प्रयत्न करते है तो हम पाते है कि इसका भावात्मक आधार ‘त्याग’ में है। त्याग से ही व्यक्ति से परिवार, परिवार से समाज व समाज से राष्ट्र के स्तर पर स्वत्वबोध का विस्तार सम्भव है। त्याग का संस्थागत स्वरुप हे यज्ञ। यज्ञ के द्वारा हम सहजता से त्याग को परम्परा के रुप में ढ़ाल पाये है। आज भी हमारे घरों में गाय के लिये गोग्रास, तुलसी को पानी देने जैसी परम्पराओं का प्रयत्नपूर्वक पालन किया जाता है। अतिथि भोजन जैसे भूतयज्ञ द्वारा समाज को आपस में बांध रखा था। अतः यज्ञ को समझने से ही गण के गठन का कार्य किया जा सकता है।

गीता में भगवान कृष्ण कहते है कि यज्ञ के द्वारा ही प्रजा का सृजन कर प्रजापति ने लोगों को कहा कि यह यज्ञ ही आपकी कामधेनु है जिसके द्वारा आप अपनी सभी ईच्छाओं की पूर्ति कर सकते हो। सहयज्ञाः प्रजा सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः। अनेन प्रसविष्यध्वम् एष्वोSस्विष्टकामधुक्।।गी 3.10।। अगले दो श्लोंकों में यज्ञ के द्वारा त्याग से कैसे परस्पर सामंजस्य बनाकर समुत्कर्ष की प्राप्ति हो सकती है इसका वर्णन है। देवान्भवयतानेन ते देवा भवयन्तु वः। परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्सथ।। गी 3.11।। यह भी कहा है कि बिना यज्ञ में हवि दिये अर्थात समाज, सृष्टि में अपने योगदान की श्रद्धापूर्वक आहुति दिये बिना जो भोग करता है वह तो चोर है। इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभावितः। तैर्दत्तान प्रदायेभ्यो यो भुन्क्ते स्तेन एव सः।। गी 3.12।। आजके समस्त भ्रष्टाचारी इसी श्रेणी में आते है। यह श्लोक तो इन पापियों के लिये और भी कठोर शब्दावली का प्रयोग करता है। यज्ञ के प्रसाद के रुप में भोग करनेवाले लोग सर्व पापों से मुक्त हो जाते है वहीँ जो केवल अपने स्वार्थ के लिये ही भोग करते है वे तो पाप को ही खा रहे होते है।

यज्ञ अपने निर्माण में सबके योगदान को अधोरेखित कर अपने कर्म में उसके प्रति कृतज्ञता का व्यवहार लाने का संस्कार देता है। अतः यज्ञ के द्वारा ही गण का गठन सम्भव है। आज हमें पुनः यज्ञ संस्कारों के जागरण के द्वारा गण संस्कृति की पुनस्थार्पना करने की आवश्यकता है। इसीसे वास्तव में हमारे संविधान का ध्येय गणतन्त्र साकार हो सकेगा। संविधान में मौलिक अधिकारों के साथ मौलिक कर्तव्यों की भी बात की है| भारतीय संस्कृति में सदा कर्त्तव्य को ही महत्त्व दिया गया है| अधिकार को उसके अप्रिनाम के रूप में ही देखा गया| यज्ञ का व्यवहारिक रूप कर्त्तव्य में ही प्रगट होता है| स्वाहः का मंत्र अपने कर्तव्यों की आहुति का परिचायक है| किन्तु भारतीय संस्कृति के स्थान पर विदेशी राज के प्रभाव में बने होने के कारण हमारे संविधान में मौलिक अधिकार तो न्यायलय में कार्यान्वित किये गए है किन्तु मौलिक कर्तव्यों का स्वरुप मात्र सुझावात्मक रखा गया है| इनकी अवहेलना को किसी न्यायलय में चुनौती नहीं दी जा सकती| यह हमारी विडम्बना है|

गण संकल्पना पर आधारित व्यवस्थाओ के निर्माण के लिये यज्ञ को और अधिक विस्तार से समझने की आवश्यकता है। इस गणतन्त्र दिवस के अवसर पर हम गणत्व को जीवन में उतारने के लिये यज्ञ को समझाने व जीवन में उतारने का संकल्प ग्रहण करें।

जनवरी 26, 2012 Posted by | योग, सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , , | 4 टिप्पणियाँ

   

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