उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

स्वावलम्बी युवा! समर्थ भारत!!


sawarkarस्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर को किसी युवा ने पूछा कि आप युवा किस कहते है? भाषा शुद्धिकरण के आन्दोलन को चलाते हुए भारतीय भाषाओं को अनेक नवरचित शब्दों का योगदान देनेवाले महान भाषाशास्त्री सावरकर ने उत्तर दिया, “पद को उलटा करके देखो तो उसका अर्थ स्पष्ट हो जाता है। युवा का प्रतिशब्द है – ‘वायु’। जैसे अनुशासनहीन वायु प्रभंजन के रुप में जीवन का नाश करता है किन्तु जब प्राणायाम से अनुशासित हो जाता है तब वही वायु प्राणदाता बन जाता है। वैसे ही युवा हैं। अनुशासित हो तो राष्ट्र का प्राण और अनुशासनहीन होकर किसी भी व्यवस्था के लिए असाध्य चुनौती।”

आज भारत की 62% जनसंख्या युवा है। जनगणना के आंकड़ों के अनुसार 13 से 45 के मध्य आयुवाले युवाओें की संख्या कुल 125 करोड की आबादी के 62% अर्थात 75 करोड से ऊपर है। किसी भी राष्ट्र के लिए यह अत्यंत गर्व के साथ ही आर्थिक विकास के प्रचंड अवसरों का विषय है। साथ ही चुनौती भी कि इस असाधारण शक्ति का समुचित सदुपयोग हो। अन्यथा अनियंत्रित होने से यही ऊर्जा राष्ट्र विघातक विस्फोटक का कार्य भी कर सकती है। ऊर्जा को बलपूर्वक नियंत्रित नहीं किया जा सकता। जबरदस्ती अथवा दबाव से तो वह और अधिक विध्वंसक बन जाती है जैसे डटे हुए सेफ्टी वाल्व वाले प्रेशर कुकर में भांफ। ऊर्जा के अनुशासित नियोजन का सर्वोत्तम तरीका है उसका सुव्यवस्थित परिचालन। ऊर्जा को सही दिशा में किसी ध्येय की ओर कार्य में लगा देना ही उसका सदुपयोग है। वर्तमान समय में भारतीय समाज के पास अपनी युवाशक्ति को सम्यक ध्येय के साथ सही दिशा की ओर कार्यरत करने की महती चुनौती हैं।

स्वंतत्रता के बाद सबसे बडी विकृती सारे समाज मे व्याप्त हुयी है वह है – शासनावलम्बिता। हम छोटे से छोटे कार्य के लिए भी सरकार का मुँह ताकते हैं। घर में सफाई करने के बाद सरकारी सडक पर सरेआम कचरा फेंकने वाले सभ्य नागरिक स्थानीय शासन से अपेक्षा करते हैं कि नगर में सफाई एवं सौन्दर्य का ध्यान रखें। इसी परावलंबी मानसिकता के कारण ‘युवा भारत‘ के सुनियोजन का दायित्व भी हम लोग सरकार को ही दे बैठे हैं। शासन का नीति निर्धारण इस दिशा में हो इस दृष्टि से आवश्यक मंथन व चिंतन समाज के प्रबुद्ध वर्ग मे होता दिखाई नही देता है। समाज द्वारा वैचारिक अधिष्ठान प्रदान किए बिना शासन की कोई भी नीति कारगर सिद्ध नही होती। अतः युवाओं के ऊर्जा प्रबंधन का दायित्व युवा वर्ग ही सामुहिक रुप से संगठित हो उठायें तो वह प्रभावी एवं परिणामकारी होगा। राष्ट्रनिर्माण का दायित्व शासन का नहीं, समाज का है। समाज जब इस उत्तरदायित्व का निर्वाह करने लगता है तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में ही नहीं राजतंत्र में भी शासन ऐसे प्रबुद्ध समाज का अनुगामी बनने लिए बाध्य हो जाता है।

स्वानुशासन से ऊर्जा का सुनियोजन करने हेतु युवाओं में संकल्प का जागरण करना आवश्यक है। वर्तमान शिक्षाप्रणाली के चलते पनपी मानसिक दासता के कारण आज का युवा स्वावलंबन के स्वप्न भी नही देखता। देश की सर्वोच्च प्रतिभा के अत्युच्च स्वप्न किसी सरकारी, निजी अथवा बहुराष्ट्रीय ऊपक्रम में नौकरी पाना हो गये हैं। प्रतिवर्ष लाखों युवा कुछ हजार सरकारी नौकरियों के लिए प्रतिस्पर्धा परीक्षा में अपनी ऊर्जा को व्यय करते हैं। सबसे प्रतिष्ठित प्रशासकीय नौकरी भारतीय प्रशासनिक सेवा की प्रथम परीक्षा में बैठने हेतु साढे पाँच लाख से अधिक युवा पंजीयन कराते हैं किन्तु उसमे से आधे ही परीक्षा मे बैठते हैं। इनमे सें 13,14 हजार ही मुख्य परीक्षा के लिए पात्र हो पाते और इनमें अंतिम सफलता 800 से 900 परीक्षार्थिओं को ही मिलती है। अर्थात प्रतिवर्ष बडी मात्रा में असफल युवाओं के झुंड़ का निर्माण यह प्रतियोगी परीक्षा करती है। इन असफल युवाओं के साथ ही अन्य नौकरियों के आकांक्षियों को मिलाकर लगभग 90 लाख परीक्षार्थी बैंक, रेल्वे, बीमा आदि अर्द्ध सरकारी नौकरियों के लिए ली जानेवाली प्रतियोगिता परीक्षाओं में बैठते हैं। इनमें से कुछ हजार नौकरी पा भी जाते हैं। उपलब्ध रिक्त स्थान व उसके लिए प्रयत्नरत परीक्षार्थिओं के मध्य यह अत्यंत विसंगत अनुपात समाज की दासता का घोतक है। पूरा समाज ही गुलामी के लिए उत्सुक है। इसका मुख्य कारण यह है कि समाज मे सरकारी नौकरी को गैर अनुपातिक प्रतिष्ठा प्राप्त है। ज्ञान, योग्यता और परिश्रम वा परिणाम में प्रशासनिक सेवा के अधिकारी समाज में बिलकुल भी अग्रणी नहीं हैं किन्तु सम्मान मे इनका स्थान लगभग सर्वोच्च हैं। इस दिखावे की प्रतिष्ठाा के लिये ही इतने युवा असफलता की आशंका के होते हुए भी नौकरी के लिये प्रयासरत रहते है।

नौकरियों के इस परिदृश्य का अत्यंत विद्रुप पहलू यह भी है कि सेना की तीनों शाखाओं मे लगभग 15000 अफसरों के स्थान इस कारण से रिक्त है क्योंकि सुयोग्य युवा उस ओर आकर्षित नही हो रहें। सामान्य सिपाही की भरती के लिए हजारों की भीड़ लग जाती है किन्तु सें संकल्पित अधिकारियों के स्थान योग्य युवाओं की तलाश मे रिक्त रह जाते हैं। किसी भी राष्ट्र की शिक्षा व्यवस्था के यह प्रेरणाहीन परिदृष्य चिन्ता का विषय होना चाहिए। इस महान गौरवशाली राष्ट्र की युवा शक्ति को राष्ट्र निर्माण करने हेतु आत्मनिर्भर बनना होगा। अपने स्वभाव के अनुरुप परिश्रम के द्वारा उद्योग के नवनिर्माण का आत्मविश्वास जब युवाओं मे जग जाता है तब वह रोजगार के लिए दूसरों की ओर नही ताकता।

ऊर्जा प्रबंधन में विकेन्द्रित स्वप्रबंधन ही सर्वोत्तम मार्ग है उसी प्रकार युवा शक्ति के प्रबन्धन हेतु स्थान स्थान पर युवाओं की टोलियाँ संगठित होकर अपने youthपरिश्रम से सृजन के स्वप्न साकार करने लगे। यही 75 करोड युवाओं के सदुपयोग का एकमात्र सुनिश्चित मार्ग है। स्व-रोजगार से ही युवा शक्ति का सम्यक, स्वाभिमानी, उत्पादक प्रयोग हो सकता हैं। कितनी भी सरकारी अथवा निजी नौकरियों का निर्माण करने का उद्यम शासन के केन्द्रीकृत प्रयासों द्वारा किया जाए तब भी यह व्यावहारिक रुप से संभव ही नही है कि किसी देश की 62% जनसंख्या नौकरी करें। हर 100 मे से कम से कम एक युवा नौकरी करने की बजाय नौकरी देने का विचार करने लगे तो यह स्वप्रेरित रोजगार निर्माण ही राष्ट्रनिर्माण का माध्यम बन सकता है।

इस हेतु शिक्षा के साथ ही समाज में पोषक वातावरण का निर्माण भी आवश्यक हैं। उद्यमियो का सम्मान सुप्रतिष्ठित करना होगा। भारतीय संस्कृति में उत्पादक कार्य को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती थी। उत्पादित सामग्री के वितरण, विपणन एवं व्यापार को दुय्यम स्थान था। इस सब आर्थिक व्यवहार के लिए पूरक सेवाओं अर्थात नौकरी को सबसे निकृष्ट माना जाता था। सबसे प्राथमिक उत्पादन तो कृषि में होता है। किसान ही मूल वित्त का निर्माता है। अन्य उद्योग कृषि उत्पाद को रुपांतरित कर सामग्री का निर्माण करते हैं। कृषि के समान ही खनन भी मूल कच्चे माल का उत्पादन करता है किंतु यह कृषि से निम्न हैं क्योंकि खनिजों का भंडार सीमित है एवं पुनर्निर्माण संभव नहीं। कृषि उत्पादन जैविक होने के कारण यदि प्रकृति के समन्वय से कृषि कार्य को किया जाए तो अनंत काल तक असीम उपज संभव हैं। इसीलिए भारत मे कहा गया ‘उत्तम कृषि, मध्यम व्यापार और अधम नौकरी’। इस शुद्ध अर्थशास्त्रीय तत्व की समाज में पुनःप्रतिष्ठा मानवता के अस्तीत्व के लिए अनिवार्य है। आज नौकरी सर्वाधिक प्रतिष्ठित एवं कृषि सर्वाधिक उपेक्षित आर्थिक कार्य हो गया है। प्रतिष्ठा व उत्पादन का यह विपरित संबंध समाज के साथ ही पर्यावरण के भी विघटन एवं विनाश का कारण बन गया है।

youth worldबाह्य रुप से परस्पर विरोधी लगने वाली यह परिस्थिति चुनौती के साथ ही युवा शक्ति को एक अवसर भी प्रदान कर रही है। बडी मात्रा में युवाबल का होना यह सकारात्मक पहलू व परावलंबी नीतियों लगातार चलने के कारण शासनवलंबी विकास के प्रादर्श को अपनाने के कारण आत्मबलहीनता यह दो परस्पर विरोधी तत्व समाज में काम कर रहे हैं। शारीरिक आयु के अनुसार युवा हैं किन्तु युवा का स्वाभाविक उत्साह, आत्मविश्वास व उत्पादक उत्सुकता शासनाभिमुख मानसिकता के कारण सुप्त अथवा मरी हुयी है। शासन में इस युवा शक्ति के सम्यक सदुपयोग की ना तो कोई दृष्टि है न ही व्यावहारिक नीति अतः युवा शक्ति के राजनैतिक दुरूपयोग की संभावना भी क्षीण है। शासन की उदासीनता ने युवा वर्ग को एक प्रकार से स्वनिर्णय व स्वनियोजन की स्वतंत्रता प्रदान कर दी है। आवश्यकता केवल स्वप्रेरणा से उद्यम की है। इसके लिये कुछ व्यावहारिक ठोस उपाय किये जा सकते है।

1. उच्च शिक्षा में पढ रहे युवाओं के मध्य युवाओं के द्वारा ही एक सकारात्मक वैचारिक आंदोलन प्रारंम्भ हो चुका है – Don’t be a job seekar be a job giver  रोजगार माँगो मत रोजगार देनेवाले बनो। सामाजिक प्रसार माध्यम फेसबुक पर इस आंदोलन का जालपृष्ठ Webpage भी है। आवश्यकता है, इस आंदोलन का सब दूर प्रसार कर अधिक से अधिक युवा इसमें जुडे़ं।

2. युवा ही एकत्रित आकर उद्यमिता विकास के प्रकल्प प्रारंभ करें। अनेक सरकारी योजनाओं का लाभ संगठित होकर लिया जा सकता है। कौशल विकास youth logo(Skill development) के माध्यम से स्वरोजगार के अनेक क्षेत्र खुले हैं। निजी सुरक्षा (Private sequrity), खरखाव (House keeping),  पर्यटन (Tourism), घरेलू सेवायें जैसे नल कार्य (Plumbing), बढई (Carpentery), सिलाई (Tailoring), बिजली कार्य (Electrician) आदि के लिए संगठित होकर प्रशिक्षण, प्रचार, विपणन व क्रियान्वयन किया जा सकता है। इन सबके लिए अलग-अलग प्रतिष्ठानों, भागीदारी व्यवसाय (Partenership) अथवा कंपनी का भी गठन किया जा सकता हैं। डा रघुनाथ माशेलकर की अध्यक्षता में कार्य कर रहा राष्ट्रीय कौशल विकास प्राधिकरणNational Skill Development Corporation (NSDC) भी इस कार्य हेतु सहायता प्रदान करता है।

3. सहकारिता के द्वारा युवाओं के नवनवीन उद्यम खोले जा सकते हैं। (National youth co-operative society (NYCS)  इस क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण पहल है।

4. युवाओं के उद्योग को वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए युवा अधिकोष (Youth bank) जैसे प्रकल्पों का प्रारंभ किया जा सकता हैं।youth

5. शिक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण अवसर हैं जिसमें युवा स्वावलंबी व्यवसाय प्रारंभ कर सकते हैं। प्राथमिक विद्यालयों से लेकर निजी मार्गदर्शन (Private coching) और निजी महाविद्यालय तक सभी प्रकार के प्रयास किये जा सकते हैं। कुछ युवाओं को एकत्रित आकर इस दिशा में पहल करनी चाहिये।

6. उत्पादन के क्षेत्र में भी संगठित युवा पहल की आवश्यकता है। जैविक खेती, गो-पालन, मत्स्यपालन, मधुमक्खीपालन, अन्य पशुपालन के क्षेत्र में अवसर उपलब्ध है। आधुनिक प्रसार माध्यमों व तकनीकों का प्रयोग कर इन पारंपारिक व्यवसायों में क्रांति की जा सकती है।

revolution7. समाज सेवाके क्षेत्र में भी युवाओं को समर्पित संगठित प्रयास करने की आवश्यकता है। शिक्षा, चिकित्सा व स्वावलंबन इन तीनों प्रकार के सेवा प्रकल्पों में युवाओं की अत्यधिक आवश्यकता है।

8. ध्येयवादी राष्ट्रीय राजनीति में भी शुद्ध चरित्र के संकल्पबद्ध युवाओं को आगे बढने की आवश्यकता है। राजनीति का अर्थ केवल मंचीय नेतृत्व नहीं है। वास्तव में नेताओं को नीतिओं के बारें में अनुसंधान, अध्ययन कर परामर्श देने वाली टोली की अनिवार्य आवश्यकता है। यह कार्य सुशिक्षित, आधुनिक तकनीक मे तज्ञ युवा ही कर सकते हैं। नीतिगत अनुसंधान, सर्वेक्षण तथा प्रसार यह भी राजनीति का एक अनुंषागिक कार्य है। जिसमें आज बहुत कम लोग लगे हुए हैं। दल-निरपेक्ष राजनीतिक अनुसंधान राष्ट्र के लिये अत्यंत आवश्यक कार्य है। 

भारत एक अतिप्राचीन चिरयुवा राष्ट्र है। समय के प्रवाह के पढकर उसके साथ गतिमान सांस्कृतिक परिवर्तन की लचीली क्षमता ने इस राष्ट्र को कठिन से कठिनतम चुनौतियों के मध्य न केवल जीवित अपितु विजयी बनाये रखा है। काल के प्रवाह में अवसर के कुछ गवाक्ष समय समय पर खुलते हैं। ऐसा ही एक युग परिवर्तन का दौर आज चल रहा है। विश्व भारत से मार्गदर्शन की प्रतीक्षा में है। आइये! ‘युवा भारत’ को उत्पाकद उत्साह से भर दें और यह राष्ट्र अपने चिरयौवन से जगत का जागरण करने के वैश्विक कर्तव्य को पूर्ण करें इस महायज्ञ मे हम अपने जीवन की आहुती प्रदार करें।

दिसम्बर 22, 2013 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , | 3 टिप्पणियाँ

चुनावी रणभूमी मे राष्ट्रवाद का शंखनाद


Republic day2चुनाव लोकतंत्र का महोत्सव है। वर्तमान में चुनाव आयोग द्वारा डाले गये कठोर निर्बंधों के कारण इस महोत्सव का उत्साह कुछ धीमा पड गया दिखता है। जमीनी गतिविधियों का स्थान अब प्रसार माध्यमों के अंदर होनेवाली प्रचार उथल-पुथल ने ले लिया है फिर भी चुनाव का समय सबके लिए ही अतिविशिष्ट सक्रियता का समय होता है। सभी प्रकार के कार्यकर्ता सक्रिय हो जाते हैं। सामाजिक कार्यों मे लगे, सामन्यतः गैर राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय कार्यकर्ताओं के लिए यह चिरंतन संभ्रम बना रहता है कि इस सक्रियता में योगदान करें अथवा नहीं और करें तो किस प्रकार से करें? भारत के वर्तमान परिदृश्य में सरकारी व्यवस्था से अछूता रहना लगभग असंभव है। जीवन के हर क्षेत्र में शासन का हस्तक्षेप है। माना कि ये स्थिति आदर्श नहीं है और विदेशी दासता के अवांछनीय अवशेष के रुप मे विद्यमान है किंतु यह भी नकारा नही जा सकता कि यह वास्तविकता है।

स्वतंत्रता पश्चात् हमने लोकतंत्र को राजनैतीक व्यवस्था के रुप मे स्वीकार किया। भारत के संविधान ने जनता को सर्वोपरि सार्वभौम सत्ता के केन्द्र के रुप के प्रतिष्ठित किया। अपेक्षा थी कि लोकतांत्रिक व्यवस्था इस धारणा को सृदृढ कर प्रत्यक्ष मे उतारती किन्तु प्रतिनिधिक लोकतंत्र के जिस स्वरुप को हमने भारत में अपनाया उसने समाज को जोडने के स्थान पर विघटित करने का ही काम किया। सर्वाधिक मत पाने वाले प्रत्याशी के विजय की व्यवस्था के कारण सबसे बडे गुट का प्रतिनिधि ही जनप्रतिनिधि कहलाया जाता है। बहुदलीय व्यवस्था के अंतर्गत चुनाव क्षेत्र मे अनेक प्रत्याशी होते हैं। जिसको सर्वाधिक मत प्राप्त होते हैं उसे विजयी घोषित कर दिया जाता है। इस व्यवस्था ने ऐसी हास्यास्पद विडम्बना की स्थिति उत्पन्न कर दी है कि कई स्थानो पर 15% से कम मत प्राप्त करने वाले प्रत्याशी भी जनप्रतिनिधि के रुप मे चुने जाते हैं। वास्तव मे देखा जाए तो डाले गए मतों मे से 85% से अधिक मतदाताओं ने इस नेता को प्रतिनिधि के रुप मे नकार दिया फिर भी सबसे बडे गुट का नेता होने के कारण वह उन 85% लोगो का भी प्रतिनिधि कहलाया जाता हैं। यह स्वाभाविक ही था कि राजनीतिक दलों ने अपने निहित स्वार्थ के लिए व्यवस्था की इस कमजोरी का उपयोग किया।

EVMजाति, वर्ग, भाषा आदि जो भी समाज को तोडने के माध्यम मिले उनके द्वारा अपने गुट को सबसे बडा सिद्ध करने का प्रयत्न किया जाने लगा। क्षेत्रीय दलों के उभार ने रणनीति को और आगे बढ़ाकर अपने सीमित समर्थन को बड़ा बनाने के लिए बाकी बचे समाज को छोटे छोटे टुकड़ों में खंडित करने का काम किया। यदि किसी नेता या दल के पास जाति अथवा ऐसे ही किसी आधार पर 100 मे से 20 मतदाताओं का समर्थन है तो उसने भिन्न-भिन्न तरीकों से समाज के बाकी बचे 80 मतदाताओं को इतने टुकडों मे बाँटने का काम किया कि कोई गुट उसके गुट से बड़ा न हो जाए। विभाजनकारी राजनीति ने स्वतंत्रता के 66 वर्षों के पश्चात भी भारत की सुप्त क्षमता को प्रकट नहीं होने दिया है। आज विश्व मे चहुँ ओर सभी देश भारत के सामथ्र्य की सराहना करते हैं। जिनके मन मे मित्रता नही है वे भारत के उभरने की संभावना से आशंकित रहते हैं। किंतु इस राष्ट्र के सामथ्र्य-सूर्य को विघटनकारी राजनीति का ग्रहण लगा है। भारत में राष्ट्र पुनर्निर्माण के कार्य को यदि पूर्ण गति प्रदान करनी है व व्यवस्थागत प्रतिष्ठा दिलानी है तो उसके लिए राजनीति के विभाजक तंत्र को बदलना आवश्यक है। इसके बिना बाकी सारे प्रयास छलनी मे पानी भरने के समान निष्प्रभावी हो जाते हैं।

व्यवस्था  परिवर्तन इसका स्थायी समाधान है।First past the post ’सर्वाधिक मत पानेवाला विजयी’ इस व्यवस्था के स्थान पर प्रत्यक्ष एवं पूर्ण लोकतंत्रकारी ECव्यवस्था ‘बहुसंख्य का समर्थन’ ‘Mojority representation’ की व्यवस्था को लागू करना होगा। इसके अंतर्गत किसी भी चुनाव में जीतने के लिए डाले गए कुल मतों में से 50 प्रतिशत से कम से कम एक मत अधिक पानेवाला व्यक्ति ही विजयी घोषित होगा। ऐसी स्थिति में समर्थन करने वाले मतदाताओं की संख्या नकारने वाले मतदाताओं से निश्चित ही अधिक होगी। तब चुना हुआ नेता सच्चे अर्थ में क्षेत्र का प्रतिनिधि होगा। इस व्यवस्था को लागू करने मे अनेक आक्षेप व कठिनाइयाँ गिनाई जाती है किन्तु राजनीति को राष्ट्रीय एकात्मता के लिए बाध्य करने के लिए यही चिरस्थायी उपाय है। विश्व के अनेक देशों में इसी व्यवस्था के अंतर्गत चुनाव होते है। भारत से भी भौगोलिक रुप से विस्तृत व आबादी में भी लगभग बराबरी के रशिया में भी सभी आम चुनाव इसी विधि से होते हैं। यदि किसी चुनाव क्षेत्र में प्रथम चरण के मतदान में किसी को भी 50% से अधिक मत नही प्राप्त होते हैं तो प्रथम व द्वितीय स्थान पर रहने वाले प्रत्याशियों के मध्य दूसरे दिन पुनः मतदान कराया जाता है। अपने आप किसी न किसी को 50% से अधिक मत मिलेंगे ही। प्रायः ऐसा देखा गया है दूसरे चरण के मतदान की आवश्यकता ही नही पड़ती। इस व्यवस्था में स्वाभाविक रुप से ही प्रत्येक दल ऐसे प्रत्याशी का चयन करता है जिसे समाज के भिन्न-भिन्न वर्गों का समर्थन मिल सके। गुटीय हितों के स्थान पर सामूहिक हित चुनावी मुद्दे बन जाते हैं। क्षेत्रीयता, साम्प्रदायिकता, जातीयता आदि चुनाव जिताने के लिए सक्षम नही होते। अतः राष्ट्रीयता, एकात्मता, एकता, समरसता यह विषय अधिक प्रभावी होते हैं।

मन में यह प्रश्न आना स्वाभाविक है कि जब तक यह व्यवस्था परिवर्तन नही हो जाता तब तक राष्ट्रवाद का चुनावी राजनीति में कोई स्थान ही नहीं? वास्तव में बात बिल्कुल इसके विपरीत है जब तक संपूर्ण एवं प्रभावी लोकतंत्र के रुप मे बहुसंख्या का प्रतिनिधित्व यह नियम लागू नही होता तब तक राजनीति के द्वारा समाज के विभाजन को रोकने का एकमात्र उपाय है ’राष्ट्रवादी राजनीति’। जातीयता, साम्प्रदायिक तुष्टीकरण, वर्गवाद, धनबल तथा बाहुबल आदि लोकतंत्र के असाध्य विकारों को ठीक करने का एकमात्र उपाय है – ’चुनावी रणभूमी मे राष्ट्रवाद का शंखनाद’। राष्ट्र का हित, राष्ट्र की संस्कृती, राष्ट्रीय परंपरायें, राष्ट्रीय जीवनध्येय इन पर आधारित नीतियों को महत्व देनेवाले दल एवं नेता का जब समाज स्वयंस्फूर्त समर्थन करने लगेगा तब अन्य सभी संकुचित स्वार्थों पर आधारित विघटनकारी मुद्दे गौण हो जायेंगे। समाज में काम कर रहे प्रत्येक सामाजिक कार्यकर्ता का यह कर्तव्य बन जाता है कि ऐसे राष्ट्रवादी वातावरण का जागरण करें।

bharatmataलोकतंत्र के महत्वपूर्ण स्तंभ प्रसार माध्यमों का भी कर्तव्य बन जाता है कि विघटनकारी मुद्दों को महत्व देने के स्थान पर जोडनेवाले एकात्मता को बढावा देने वालें विषयों, नेताओं तथा दलों का अधिक प्रचार दें। धन के द्वारा क्रय की हुयी प्रसिद्धी के आधार पर समाज को तोडनेवाले नेताओं व दलों को सबक सिखाने का काम राष्ट्रकार्य के रुप में प्रसार माध्यमों को भी करना होगा। पेड न्यूज के द्वारा माध्यमों का धनबल के आगे समर्पण लोकतंत्र के विनाश का कारण बन रहा है। भारत एक निर्णायक दौर से गुजर रहा है। वैश्विक परिदृश्य में अवसर की जो एक छोटी सी खिडकी खुली है उसका यदि निर्णायक उपयोग करना है तो आज राष्ट्र को सुदृढ, सक्षम व निःस्वार्थ नेतृत्व की आवश्यकता है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ही ऐसे नेतृत्व को जन्म एवं पोषण दे सकता है। पश्चिम में राष्ट्रवाद की अवधारणा राजैनतिक व आर्थिक है। इस कारण से वह राष्ट्रों के मध्य प्रतिस्पर्धा को जन्म देती है। इस प्रतिस्पर्धा का रुपांतरण बाजारी शोषण, शस्त्र स्पर्धा व अंततः युद्धों में भी होता है। द्वितीय महायुद्ध में सारे विश्व पर युद्ध की विभीषिका थोपने वाल हिटलर ने भी जर्मन राष्ट्रवाद के नारे का ही तात्विक आधार लिया था। उसके बाद से अंतरराष्ट्रीय विमर्श में राष्ट्रवाद एक घृणित एवं निन्दनीय पद बन गया है। भारत में भी साम्यवादी व समाजवादी विचार को पोषित करनेवाले विचारकों ने इसी पश्चिमी दृष्टि से प्रभावित होकर राष्ट्रवाद की घोर आलोचना की है। इसे संकुचित, तानाशाही व फासिस्ट जैसे संबोधनों से पुकारा है। इस कारण सामान्य बुद्धिजीवी भी राष्ट्रवाद के प्रति सकारात्मक विचार नही रखते किन्तु भारत में राष्ट्रवाद की संकल्पना कतई आर्थिक अथवा राजनैतिक नहीं है। भारत में यह मूलतः आध्यात्मिक व व्यवहार में सांस्कृतिक विचार है। आर्थिक व राजनैति राष्ट्रवाद जहाँ भौगोलिक सीमाओं और बाजारी प्रतिस्पर्धाओं के कारण विभाजनकारी बन जाता है वहीं दूसरी ओर आध्यात्मिक, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद व्यक्ति से परिवार, समाज से आगे राष्ट्र तक मन के विस्तार का माध्यम होने के कारण एकात्मदृष्टि का विकास करता है। स्वाभाविक ही यह राष्ट्रवाद विस्तार की अगली सीढ़ी के रुप में मानवता को देखता हैं। अतः इस राष्ट्रवाद में राष्ट्रहित के साथ ही विश्वहित व उससे भी परे सृष्टि का हित भी निहित है। यह राष्ट्रवाद तोडता नही जोड़ता है।

जाति, पंथ, सम्प्रदाय, वर्ग, भाषा, क्षेत्र आदि के द्वारा विभिन्न वादों का निर्माण कर चल रहे समाज विघटन के तांडव को यदि रोकना है तो सभी को मिलकर एक ही उद्घोष करना होगा कि ‘राष्ट्र सर्वोपरि है’। मेरे व्यक्तिगत, पारिवारिक, क्षे़त्रीय, सामाजिक, पांथिक, साम्प्रदायिक अथवा प्रांतीय हितों से अधिक महत्वपूर्ण राष्ट्रहित हैं। इस विचार को अपने हर कार्य मे अभिव्यक्त करना होगा। चुनाव में आग्रह पूर्वक सहभागी होना, मतदाताओं का पंजीयन करना अधिक से अधिक लोगों को सकारात्मक मतदान के लिए प्रेरित करना, दलों व नेताओं को राष्ट्रहित के मुद्दों पर विचार एवं बात करने के लिए विवश करना यह हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य है। आइए! लोकतंत्र के महोत्सव में राष्ट्रवाद के उजास को प्रकाशित करने का संकल्प लें।

नवम्बर 29, 2013 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , | 1 टिप्पणी

स्मृति स्वाधीनता संग्राम की . . .


10 मई 1857, अंग्रेजी सत्ता के विरूद्ध प्रथम स्वाधीनता संग्राम का शुभारम्भ। 1908 में स्वातन्त्र्यवीर सावरकर ने लंदन में 10 मई को क्रांति दिवस के रूप में मनाया था। उन्होंने हुतात्माओं की शपथ ली थी कि जब तक देश स्वतन्त्र नहीं हो जाता क्रांति की अग्निशिखा को प्रज्वलित रखेंगे। सावरकर ने ही ‘प्रथम स्वातन्त्र्य समर‘ नाम से पुस्तक लिख कर इसके वास्तविक राष्ट्रीय स्वरूप का परिचय भारतीयों को करवाया था। यह विश्व की एकमात्र ऐसी पुस्तक है जिसे छपने पूर्व ही प्रतिबंधित कर दिया गया तथा मूल पुस्तक के प्रकाशन से पूर्व ही इसका फ्रेंच अनुवाद प्रकाशित हुआ।

सावरकर ने उस समय की परिस्थिति के अनुसार इसे केवल प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम कहा है किन्तु आज हमें यह स्पष्ट करना चाहिये कि यह अंग्रेजों के विरूद्ध प्रथम आंदोलन था। केवल प्रथम कहना तो पूर्ण सत्य नहीं होगा। शिवाजी, राणाप्रताप के संग्राम भी स्वाधीनता के ही संग्राम थे। शिवाजी से प्रेरणा प्राप्त कर छत्रसाल जैसे अनेक वीरों ने मुगलों के परकीय शासन को उखाड़ स्वकीयों के शासन को प्रस्थापित किया था। उससे भी अनेक शताब्दियों पहले सिकन्दर की सेना को भगाने का कार्य चाणक्य के शिष्यों ने किया था। अतः स्वाधीनता का संग्राम तो भारत में सतत चलता रहा है। गत 2000 वर्षों में कोई भी 25-50 वर्ष का भी कालखण्ड ऐसा ना बीता हो जब देश के किसी ना किसी कोने में स्वतन्त्रता का आंदोलन ना हुआ हो। हमने कभी भी विदेशी, विधर्मी सत्ता को पूर्णतः स्वीकार नही किया। इतना ही नहीं इस कालखण्ड के बहुत बड़े हिस्सें में प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से हमारा अपना स्वदेशी शासन चलता रहा है। विदेशी इतिहासकारों के प्रभाव में आज भी हम इसे मराठा, राजपूत, सिख शासन इस प्रकार बाँटकर देखते है। जब कि ये सब स्वकीय शासन थे। इतिहास को पश्चिमी दृष्टि के स्थान पर भारतीय राष्ट्रीय दृष्टिकोण से देखने पर हमको इस कालखण्ड को दासता अथवा गुलामी का काल कहने के स्थान पर संग्राम युग कहना होगा।

प्लासी में द्रोहियों के कारण हुए पराभव के बाद पराधीन हुए भारत का अंग्रजों की सत्ता के विरूद्ध पहला संगठित संग्राम 1857 का है। इस संग्राम की अनेक विशेषतायें हैं। सामान्यतः जिसे केवल सिपाही विद्रोह कहा जाता रहा है तथा दुर्भाग्य से आज भी अनेक भारतीय विश्वविद्यायलों के पाठ्यक्रम में इसी रूप में पढ़ाया भी जाता है वह जन सामान्य का संग्राम था। अंग्रेजी फौज में सम्मिलित भारतीय सैनिक भी जनविद्रोह का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थे। दूसरा भ्रम यह फैलाया जाता है कि यह केवल राजे रजवाड़ों तथा नबाबों का अपने अपने संस्थानों के लिये किया युद्ध था। राष्ट्रीय स्वतन्त्रता का भाव इसमेे निहित नहीं था। यह भी जानबुझकर फैलाया भ्रम है। उस समय के अंग्रजों के दस्तावेज प्रमाण है कि झांसी की रानी लक्ष्मीबाई तथा उनके सेनापति तात्या टोपे के अद्भूत नियोजन से पूरे देश में ही इस संग्राम का जाल बिछाया गया था। ब्रिटिश सेना की छावनियों में फैला असंतोष भी कोई संयोग मात्र नहीं था। रानी के प्रभावी गुप्तचर विभाग का वह सफलतम छù युद्ध था। रानी ने सामान्य वेश्याओं को अपनी कला के माध्यम से राष्ट्र कार्य के लिये प्ररित किया। स्वर्गीय पति की नाट्यशाला की नटियाँ गुप्तचर बनीं और सैनिक शिविरों में नांच गाने के माध्यम से प्रथम असंतोष फैलाने का व बाद में संदेश पहुँचाने का कार्य इन वीरांगनाओं ने किया था।

पूरे देश में ही रोटी व कमल के निशान के द्वारा क्रांति का संदेश प्रवाहित हुआ था। जो इतिहासकार अज्ञान अथवा कपट के कारण इसे केवल उत्तरी भारत में सीमित बताते है वे भी सत्य से परें है। मैसूर तथा त्रावणकोर तक इस क्रांति की ज्वाला लगी थी। पूर्वनिर्धारित तिथि 31 मई को दोनों ही राज्यों ने अंग्रेजों के शासन को नकारा तथा युद्ध की घोषणा की। कंपनी के प्रतिनिधियों को निष्कासित कर दिया। मैसूर जैसे राज्यों में जहाँ कंपनी की टुकड़ियों ने विरोध किया वहाँ सभी अंग्रेजों को बंदी बना लिया गया। एक ही दिन में भारत के एक बड़े हिस्से ने स्वयं को कंपनी की सत्ता से मुक्त घोषित कर दिया। इतिहास की कठोर वास्तविकताओं में ‘‘यदि’’ की कल्पनाओं को कोई स्थान नहीं होता। फिर भी यह तो कहना ही होगा कि यदि 10 मई को मंगल पाण्डें संयम नहीं खोता और पूर्वनिर्धारित योजना के अनुसार 31 मई को क्रांति की चिंगारी एकसाथ पूरे देश में प्रगट होती तो अंग्रेजों के लिये इसे नियंत्रित करना निश्चित ही असम्भव हो जाता। अतः 10 मई के क्रांति दिवस का एक संदेश यह भी है कि जोश, उत्साह, उमंग, उत्सर्ग व समर्पण के साथ ही देशसेवा में धैर्य तथा संयम का भी बड़ा स्थान है। कई बार परिवर्तन के आंदोलन की अनिवार्यता व आग्रह के चलते हम प्रतिक्षा को असहनीय मान बैठते है किन्तु बृहत् योजना में इसका भी महत्वपूर्ण स्थान है।

अंग्रेजों को समूल भारत से बाहर करने के जिस उद्देश्य से इस महाक्रांति का आज ही के दिन सूत्रपात हुआ था क्या वह लक्ष्य पूर्ण हुआ है? आज के दिन हमें यह सोचने पर विवश होना पड़ता है कि क्या देश मानसिक दासता से स्वाधीन हुआ है? का हम वास्तव में स्वतन्त्र हुए है? क्या यह जो तन्त्र, व्यवस्था हमने अपनायी है वह स्व की है? स्वदेशी है? इस देश के ऐतिहासिक अनुभव व संस्कारों में से पनपी है? यदि इन सारे प्रश्नों के उत्तर नहीं में दिये जा रहे है तो फिर आज पुनः क्राति की ज्वाला प्रज्वलित करनी होगी। सच्ची स्वाधीनता के लक्ष्य को प्राप्त करने तक यह क्रांति जीवित रहेगी। यही संकल्प 1857 के वीरों की स्मृति में हर देशभक्त को लेना होगा।

सावरकर का उद्बोधन १० मई १९०८ अवश्य देखें

http://www.youtube.com/watch?v=nCMk3HcXr-8&feature=youtu.be

मई 10, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , | 1 टिप्पणी

दे दी तुने आज़ादी या पायी है हमने बलिदानों से?


जो राष्ट्र अपने वीरों का सम्मान नहीं करता वह अपनी अस्मिता को खो देता है। ऐसे पाप तो रक्त से ही धोये जाते हैं। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ऐसे वीरों में से एक हे जिनके साथ देश के शासन ने न्याय नहीं किया। आज जब सारा देश इस वीर के जन्मदिन को मना रहा है तब इस अन्याय का स्मरण करना आवश्यक हो जाता है। सरकार भले ही स्वयं भूल जाये और प्रयत्नपूर्वक देश की नई पीढ़ियों को इतिहास के इस महत्वपूर्ण तथ्य से अनभिज्ञ रखें पर सत्य तो घनघोर बादलों को चीर कर आलोकित होनेवाले सूर्य के समान अपने आप को प्रगट कर ही देता है। पर जब प्रस्थापित व्यवस्था जानबूझकर बलिदानों को भूलाने के घोर पातक करती है तो कीमत पूरे राष्ट्र को चुकानी पड़ती है। क्यों आज भारत में समस्त क्षमताओं के होते हुए हम दुय्यम नेतृत्व की कायर नीतियों को सहनें के लिये विवश है? पूरे देश से ही वीरत्व ना केवल लुप्त हो रहा है इसे तिरस्करणीय बनाया जा रहा है। आतंक, साम्प्रदायिकता व भ्रष्टाचार से इस पावन मातृभूमि को बार बार क्षत विक्षत किया जा रहा है। सर्वस्व देश के लिये अर्पण करनेवाले वीर के बलिदान को भी जब विवादास्पद बना दिया जाता है; न्यूनगण्ड से ग्रसित नेतृत्व अपनी सत्ता को खोने के भय से जब अपने वीर राष्ट्रनायक को षड़यन्त्र पूर्वक जीवित ही समाधि में गाड़ देने के लिये संदेह से देखे जाते है तब पूरे राष्ट्र को अपने रक्त, स्वेद ओर मेद की आहुति से कीमत चुकानी पड़ती है।

कुछ वर्ष पूर्व जब अपने विराट योग शिविरों में स्वामी रामदेवजी ने यह प्रश्न पूछना शुरु किया कि हमको क्या अधिकार है कि हम, ‘‘दे दी तुने आज़ादी हमे बिना खड्ग बिना ढ़ाल’’ जैसे पूर्णतः असत्य गीतों को आलापकर हमारे वीरों के बलिदान का अपमान करें, तब इसे गांधी के विरुद्ध बात कहकर उनकी आलोचना की गई। पर क्या वर्तमान पीढ़ि को अधिकार नहीं हे कि वे इतिहास का वस्तुनिष्ठ विश्लेषण समस्त उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर करें? क्या आज के दिन यह प्रश्न नहीं पुछा जाना चाहिये कि गीता का प्रतिदिन पाठ करने वाले हे महात्मा, अंधे धृतराष्ट्र के समान किस मोह में पड़कर तूने काँग्रेस अधिवेशन में लोकतान्त्रिक विधि से निर्वाचित सुभाषचन्द्र बोस को हटाकर अपने चमचे पट्टाभिसीतारामय्या को अध्यक्ष बनाया था? हम में से कम ही लोग इस ऐतिहासिक तथ्य से अवगत होंगे कि इसी विराट हृदय के योद्धा ने इस अन्याय के बाद भी मोहनदास करमचंद गांधी को राष्ट्रपिता की उपाधि दी। नेताजी का प्रशंसा की अतिशयोक्ति में कहा गया विशेषण आज ऐसा चिपक गया है कि हम गांधी के निर्णयों का विश्लेषण ही नहीं करना चाहते। ऐसा करने का नाम लेना भी मानों घोर अपराध है।

पर 1947 में भारत के स्वतंत्र होने के महत्वपूर्ण अध्याय का तो विश्लेषण करना ही होगा ना। महानायक सुभाष बाबू के जन्मदिन से अधिक उपयुक्त पर्व इस पावन कार्य के लिये और कौनसा होगा। आधुनिक भारत के निर्विवाद रुप से सबसे सशक्त इतिहासकार आर सी मजुमदार ने इस पूरी घटना के बारे में स्पष्टता से लिखा है। अहिंसा, ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के माध्यम से गांधी को भारत की स्वतंत्रता पूरा श्रेय देनेवाले इतिहास को रोज रोज पढ़नेवाले और ‘दे दी हमें . . .’ के तरानों को निर्लज्जता से दोहरानेवाले भारतवासी इस ऐतिहासिक सच्चाई को अवश्य पढ़े।

Majumdar, R.C., Three Phases of India’s Struggle for Freedom, Bombay, Bharatiya Vidya Bhavan, 1967, pp. 58-59. There is, however, no basis for the claim that the Civil Disobedience Movement directly led to independence. The campaigns of Gandhi … came to an ignoble end about fourteen years before India achieved independence…. During the First World War the Indian revolutionaries sought to take advantage of German help in the shape of war materials to free the country by armed revolt. But the attempt did not succeed. During the Second World War Subhas Bose followed the same method and created the INA. In spite of brilliant planning and initial success, the violent campaigns of Subhas Bose failed…. The Battles for India’s freedom were also being fought against Britain, though indirectly, by Hitler in Europe and Japan in Asia. None of these scored direct success, but few would deny that it was the cumulative effect of all the three that brought freedom to India. In particular, the revelations made by the INA trial, and the reaction it produced in India, made it quite plain to the British, already exhausted by the war, that they could no longer depend upon the loyalty of the sepoys for maintaining their authority in India. This had probably the greatest influence upon their final decision to quit India.

अंतिम पंक्ति में वे स्पष्ट लिखते है कि आज़ाद हिन्द सेना के वीरों के उपर चलाये गये देशद्रोह के मुकदमें में उजागर तथ्यों व उनपर पूरे देश में उठी प्रतिक्रियाओं के कारण द्वितीय महायुद्ध में क्षीण हुए ब्रिटिश साम्राज्य का भारत में टिका रहना असम्भव था। वे भारत में उनकी सेना के सिपाहियों पर विश्वास नहीं कर सकते थे। इस बात का भारत छोड़ने के उनके अंतिम निर्णय पर सर्वाधिक प्रभाव था।

नेताजी भारत छोड़कर विदेश जाने से पूर्व रत्नागिरी में स्थानबद्ध सावरकर से मिलने गये थे। सावरकर ने उन्हें द्वितीय महायुद्ध के समय विदेश में जाकर सेना गठित करने का सुझाव दिया। योरोप के क्रांतिकारियों से अपने सम्पर्क भी उन्होंने नेताजी को दिये। इन्हीं में से एक की सहायता से नेताजी अफगानिस्तान मार्ग से योरोप पहुँचे। सावरकर की योजना का दूसरा अंग था- ब्रिटिश सेना का हिन्दवीकरण अर्थात हिन्दूओं क सैनिकीकरण। कुछ वर्ष पूर्व अंडमान से सावरकर के नाम पट्ट को हटाने वाले देशद्रोही नेता सावरकर के जिस पत्र का हवाला देकर उन्हें अंग्रजों का एजण्ट कहते थे वही पत्र सावरकर की चाणक्य नीति का परिचायक है। सावरकर ने अंग्रेजों को इस बात के लिये अनुमति मांगी कि वे देशभर घूमघूम कर युवाओं को सेना में भरती होने का आवाहन करना चाहते है। महायुद्ध के लिये सेना की मांग के चलते सावरकर को स्थानबद्धता से मुक्त किया गया। सावरकर ने देशभर में सभायें कर हिन्दू युवाओं से सेना में भरती होने को कहा। एक अनुमान के अनुसार उनके आह्वान के प्रत्यूत्तर के रूप में 6 लाख से अधिक हिन्दू सेना में भरती हूए। एक साथी के शंका करने पर सावरकर ने उत्तर दिया कि 20 साल पूर्व जिस ब्रिटिश शासन ने हमारे शस्त्र छीने थे वह आज स्वयं हमें शस्त्र देने को तत्पर है। एक बार हमारे युवाओं को शस्त्रबद्ध हो जाने दों। समय आने पर वे तय करेंगे कि इसे किस दिशा में चलाना है।

योजना यह थी कि बाहर से सुभाष की आज़ाद हिन्द सेना चलो दिल्ली के अभियान को छेड़ेगी और जब उनसे लड़ने के लिये अंग्रेज भारतीय सेना के भेजेंगे तो यह सावरकरी युवक विद्रोह कर देंगे। हिरोशिमा व नागासाकी पर हुए अमानवीय आण्विक हमले के कारण जापान के असमय युद्धविराम कर देने से यह योजना इस रूप में पूण नही हो सकीं। किन्तु भारत के स्वतन्त्रता अधिनियम को ब्रिटिश पार्लियामेण्ट में प्रस्तुत करते समय प्रधानमन्त्री क्लेमण्ट एटली द्वारा दिये कारण इस योजना की सफलता को स्पष्ट करते है। उन्होंने अपनी असमर्थता में सेना के विद्रोह की बात को पूर्ण स्पष्टता से कहा है। गांधी के ‘भारत छोड़ो’ अथवा सविनय आज्ञाभंग का उसमें कतई उल्लेख नहीं मिलता। आज़ाद हिन्द सेना का भय व भारतीय सेना पर अविश्वास के अलावा बाकि कारण केवल दिखावटी सिद्धान्त मात्र है।
कलकत्ता उच्च न्यायालय के पुर्व मुख्य न्यायाधीश पी वी चक्रवर्ति के 30 मार्च 1976 को लिखे पत्र से स्पष्ट है कि एटली ने उन्हें साफ शब्दों में भारत की स्वतन्त्रता के समय ब्रिटिश सोच के बारे में बताया था।

Dhanjaya Bhat, Writing in The Tribune,Sunday, February 12, 2006. Spectrum Suppl.

Which phase of our freedom struggle won for us Independence? Mahatma Gandhi’s 1942 Quit India movement or The INA army launched by Netaji Bose to free India or the Royal Indian Navy Mutiny of 1946? According to the British Prime Minister Clement Attlee, during whose regime India became free, it was the INA and the RIN Mutiny of February 18–23, 1946 that made the British realize that their time was up in India. It has been argued that when the leaders of the Congress were finally released, they came out as tired and broken men. This allowed the British and the sectarian parties to press home the advantage and negotiate better terms for themselves. An extract from a letter written by P.V. Chuckraborty, former Chief Justice of Calcutta High Court, on March 30, 1976, reads thus: “When I was acting as Governor of West Bengal in 1956, Lord Clement Attlee, who as the British Prime Minister in post war years was responsible for India’s freedom, visited India and stayed in Raj Bhavan Calcutta for two days`85 I put it straight to him like this: ‘The Quit India Movement of Gandhi practically died out long before 1947 and there was nothing in the Indian situation at that time, which made it necessary for the British to leave India in a hurry. Why then did they do so?’ In reply Attlee cited several reasons, the most important of which were the INA activities of Netaji Subhas Chandra Bose, which weakened the very foundation of the British Empire in India, and the RIN Mutiny which made the British realise that the Indian armed forces could no longer be trusted to prop up the British. When asked about the extent to which the British decision to quit India was influenced by Mahatma Gandhi’s 1942 movement, Attlee’s lips widened in smile of disdain and he uttered, slowly, ‘Minimal’.”

माननीय न्यायमुर्ति के अनुसार पूर्व प्रधानमन्त्री एटलीने दो बाते बिलकुल स्पष्टता से कही है – 1. गांधी का असहयोग व सविनय आज्ञाभंग का आंदोलन तो कबका समाप्त हो गया था। स्पष्ट प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि उसका प्रभाव ‘नहीं के बराबर’ था। 2. भारत छोड़ने की जल्दबाजी के मुख्य कारणों में सुभाष जी की आज़ाद हिन्द सेना और भारतीय शाही नौसेना में विद्रोह से उपजे अविश्वास को गिनाया।

अब इन तथ्यों पर चर्चा करने का समय आ गया है। केवल स्वतन्त्रता के श्रेय की बात नहीं, भारत के खोये आत्मविश्वास को पुनः पाने की बात है। कब तक भीरु बनकर मार खाने के तराने गर्व से गाते रहेंगे? दे दी तुने आज़ादी कहते लज्जा नहीं आती? अरे क्या किसी ने भीक्षा में दी है ये स्वतन्त्रता? वीरों ने अपने बासंती बलिदान से छीनी है अत्याचारी के क्रूर कराल जबड़े से माता की धानी चुनरियाँ।

‘दे दी . . ’ के कायर तराने छोड़ो! वीर सुभाष के जन्मदिन पर गर्व से सिंहगर्जन करों – दे दी तुने आज़ादी नहीं पायी है हमने बलिदानों से स्वतन्त्रता ! वीरों की शहादत ने छिनी है जालीम से आज़ादी। किसी का उपकार नही अपने लहू के पराक्रम की है ये गाथा।

हे वीर सुभाष! अच्छा ही है कि इस कायर सरकार के विज्ञापनों से अपवित्र नहीं है आपकी जयंति। हमारे हृदय की हर धड़कन में तेरा हर संघर्ष आज भी है जीवित। कसम है हमें किसी अज्ञात कोने में तुम्हारे अंतेष्टि को तरसते अस्थियों की – तुम्हारी गाथा को हम दुखान्तिका मे न बदलने देंगे। अपने पौरुष से तेरा खोया सम्मान पुनः दिलायेंगे।
जय हिन्द  . . .

जनवरी 23, 2012 Posted by | चरित्र, सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , , | 4 टिप्पणियाँ

लक्ष्यवेध का प्रथम आंतरिक साधन – प्रेरणा!


गढ़े जीवन अपना अपना -8

‘असम्भव! ये हमसे नहीं होगा!’ युवाओं के सामने चुनौति रखने पर पहली बार ऐसी प्रतिक्रिया पाने की उनको आदत थी। और फिर बात भी ऐसी ही हो रही थी। अंग्रेजी साम्राज्य की राजधानी लण्डन में बैठकर उनके ही बड़े अफसर से उसकी भारत में की गई ज्यादतियों का हिसाब मांगना? अपनी माँ बहनों के अपमान का प्रतिशोध लेना। बात से तो सब सहमत थे, पर क्या लण्डन में ये सम्भव है? सभी अनुभवी क्रांतिकारियों का मत था की अभी उनके दल की ऐसी स्थिति नहीं थी कि ऐसा कोई बड़ा कार्य सीधे हाथ में लिया जाये। बैठक में तर्कपूर्ण बातों पर ही निर्णय होता है। सावरकर को भी सबकी बात मानकर योजना को स्थगित करना पड़ा। पर उनकी भाव-भंगिमा से साथियों को पता चल ही गया कि वे इस निर्णय से प्रसन्न नहीं हैं। सब धीरे धीरे खिसक गये। केवल मदन बैठा रहा। सबसे छोटा तो था ही पूरे दल में नया भी था। इसलिये बैठक मे कुछ नहीं बोला था।
उसे याद आ रहा था सावरकर से प्रथम भेट का प्रसंग। युवा मदनलाल अपने पिता की अमीरी के मद में चूर लण्डन में पढ़ाई के बहाने रह रहा था और नाच-गाने, मस्ती में लगा रहता था। तब यह भोग ही उसे जीवन का सबसे बड़ा सुख अनुभव होता था। एक दिन उसने अपने देशी विदेशी युवा-युवतियों के दल के साथ इण्डिया हाउस के नीचे महफिल जमा ली। ग्रामोफोन की धुन पर सब थिरक रहे थे। उपर क्रांतिकारी दल की बैठक चल रही थी। एक भारतीय युवा इस अय्याश दल का नेता है ये सुनकर स्वयं सावरकर नीचे उतर आये। अचानक ग्रामोफोन के बन्द होने से मदन भड़क उठा। जोर से चिल्लाया भी, ‘‘कौन है?’’ पर उसे आज भी याद है लड़ने के लिये जैसे ही वह ग्रामोफोन की ओर मुड़ा इस दुबले-पतले शरीर के महामानव से आंखे भिड़ गई। क्या आंखें थी वो! आज भी कई बार सपने में दिखाई देतीं हैं। उस तेज के सामने धष्ट-पुष्ट पहलवानी काया का मदन भी स्तब्ध हो गया। और फिर वह कलेजे को चीरता प्रश्न, ‘क्या इसी के लिये तुम्हारी मां ने तुम्हें जन्म दिया? तुम्हारी भारतमाता परतन्त्र है और तुम मस्ती में ड़ुबे हो क्या यही तुम्हारे जीवन का उद्देश्य है?’ उस समय तो गर्दन झुकाकर उन तेजस्वी आंखों के अंगारों से दूर चला गया मदन पर प्रश्न मन में कौंधता रहा। और फिर उसी में से जीवन का उद्देश्य भी मिला और प्रेरणा भी। मदन क्रांतिगंगा में सम्मिलित हो गया। अनेक परीक्षाओं के बाद आज उसे अंतरंग मंत्रणा में बैठने का पहला अवसर मिला था। बैठक के तर्क तो उसे कुछ कुछ समझ आये थे। पर उससे अधिक समझ में आयी थी कार्य की अनिवार्यता। मन में तो ठान ही लिया।
‘सावरकर, व्यक्ति बलिदान के लिये कब तैयार होता है?’ प्रगटतः तो मदनने केवल यही प्रश्न पूछा।
सावरकरने कहा, ‘मदन ये जोश का काम नहीं है। इसके लिये आंतरिक प्रेरणा चाहिये। नारे लगाने की वीरता नहीं है यह इसमें योगेश्वर कृष्ण सा गाभ्भीर्य चाहिये।’
‘मैने कब कहा कि मै कुछ करने वाला हूँ। समिति के निर्णय से मै सहमत हूँ कि अभी ऐसी किसी योजना की आंच समिति पर नहीं आनी चाहिये। ये क्रांतिकारियों की बड़ी योजना में बाधक होगा। मै तो केवल सैद्धांतिक प्रश्न पूछ रहा हूँ कि व्यक्ति बलिदान के लिये कब तैयार होता है?’
‘जब वह स्वयं प्रेरणा से ठान ले तब!’ सावरकर ने भी संक्षिप्त सा उत्तर दिया। मदन ने कैसे समिति से अपना सम्पर्क तोड़ दिया, कैसे अकेले तैयारी की और कैसे दुष्ट कर्जन वायली को मृत्युदण्ड की सजा दी। ये तो सब आज नहीं बतायेंगे। आपको मदनलाल धींगरा की जीवनी में ये सब स्वयं पढ़ना पड़ेगा। आज तो ये प्रसंग इसलिये चल पड़ा क्योंकि चरित्र निर्माण की कड़ी में आज का विषय है, लक्ष्यवेध का प्रथम आंतरिक साधन – प्रेरणा।
प्रेरणा ही जीवन बदल देती है। इसी प्रेरणा के द्वारा मस्ती में ड़ूबा युवा योगेश्वर का सामथ्र्य प्राप्त कर मातृभूमि पर बलिदान होने का सौभाग्य प्राप्त करता है। गंगा के तट पर एअर फोर्स में प्रवेश परीक्षा में असफलता के कारण निराशा में आत्मघाती विचारों में बैठै अब्दुल को कोई स्वामी शिवानन्द मिल जाता है। गीता की प्ररणा दे जाता है और भारत को मिसाइल मैन मिल जाता है। 1965 के युद्ध में अपने सब साथियों के बलिदान के बाद स्वयं को ही जीवित बचा देख जीवन से हताश सेना के सीधे-साधे ड्राइवर को अहमदनगर के स्टेशन पर चने की भुंगळी में स्वामी विवेकानन्द के कर्मयोग का कागज पढ़ने को मिलता है और जीने की प्रेरणा मिल जाती है। भारत के निराश यौवन को नया गांधी मिल जाता है। अन्ना हजारे स्वयं लाखों की प्रेरणा बन जाते है।
प्रत्येक सफलता का कारण प्रेरणा ही होती है। तुलसी और कालिदास के जीवन में पत्नि से मिली झिड़क का अपमान कवित्व की प्रेरणा बन रसधारा में बह उठता है। तो माता से पिता की गोद छिन जाने का अपमान धृव की अड़ीग साधना की प्रेरणा बन जाती है।
सतर्क मन में ही अधिक कुतर्क आते है। आजके आधुनिक विज्ञाननिष्ठ युवा के मन में कुलबुला रहे प्रश्न को हम जानते है। आप पूछे इससे पहले हम ही पूछ लेते है, ‘क्या प्रेरणा के लिये हमे भी किसी घटना की प्रतीक्षा करनी होगी? मदनलाल, ए पी जे या अन्ना के समान सकारात्मक या तुलसी या धृव के समान अपमानकारक?’
निश्चित ही यह नहीं हो सकता कि प्रत्येक के जीवन में किसी हादसे से ही प्रेरणा का जागरण हो। वास्तव में हम सबके जीवन में प्रेरणा तो कार्य कर ही रही होती है। बिना प्रेरणा के कोई भी कार्य सम्भव नहीं किन्तु जब जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर सके ऐसी तगड़ी प्रेरणा की बात करनी हे तो उसका वैज्ञानिक विधि से विकास किया जा सकता है। शिवाजी, स्वामी विवेकानन्द जैसे महापुरूषों के जीवन में यह संस्कारों से विकसित स्थायी प्रेरणा कार्य करती हुई दिखाई देती है। माता जिजाउ तथा गुरु श्रीरामकृष्ण परमहंस की शिक्षा पद्धति आज भी सभी अभिभावकों व शिक्षकों के लिये आदर्श है। उस शिक्षा-विज्ञान पर फिर किसी और प्रयोजन में बात होगी। आज तो प्रेरणा के विकास का विज्ञान देखते है।
प्रेरणा भाव से उत्पन्न होती है विचार से नहीं। किन्तु आज के युग में हम इतने तार्किक हो गये है कि कई बार विचार ही भाव का ट्रीगर बन जाते है। प्रेरणा कुछ पाने की भी हो सकती है और कुछ देने की भी। पद, पैसा, प्रतिष्ठा पाने की प्रेरणा जीवन की प्रतिस्पद्र्धा में इन्धन का काम करती है। व्यावसायिक लक्ष्यसिद्धि में यह सहायक भी होती है। पर देखा गया है कि यह स्थायी नहीं होती और असफलता में घोर हताशा का कारण बनती है। अनेक सम्पन्न लोगों के जीवन में रिक्तता के कारण पैदा हुए विषाद (Depression) में हम इसे देख सकते है। अनेक रोगों को भी ये जन्म देती है।
देने की पे्ररणा अधिक स्थायी और प्रभावी होती है। परिवार को आधार अथवा सम्मान प्रदान करना, समाज में कुछ योगदान देना, ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में नये अविष्कार करना, देश की रक्षा, सेवा व सम्मान में अपनी आहुति देना ये प्रेरणा के तत्व बड़ें जीवनलक्ष्य के वेध में सहायक हो सकते है। एक व्यक्ति के जीवन में ये दोनों पे्ररक तत्व कार्य कर रहे हो सकते है। जैसे एक खिलाड़ी पैसे और प्रतिष्ठा के लिये तो खेलता ही है पर उसका सर्वोत्तम तो तब प्रगट होता है जब वह अपने देश के सम्मान के लिये खेलता है। विम्बल्डन व अमेरिकन ओपन जैसी प्रतियोगिताओं में प्रचण्ड पुरस्कार राशि की प्रेरणा के होते हुए भी दूसरे राउण्ड से आगे ना जा पाने वाले भारतीय टेनिस खिलाड़ी देश के लिये खेलते हुए डेविस कप में विश्व के उंचे से उंचे खिलाडियों को मात दे देते है। इसके पीछे के रहस्य के बारे में पूछने पर, ‘कुर्सी पर बैठा रेफरी हर अंक में भारत का नाम लेता है, तो मेरा हर अंक भारत को समर्पित है ये बात खेल को अलग ही स्तर पर ले जाती है’ ऐसा बताते है।
हम भी भाव के उचित संस्कार से अपनी प्रेरणा को राष्ट्रार्पित कर सकते है। इसी से हमारा सर्वोत्तम प्रगट होगा। इसके लिये देशभक्ति गीत, देशभक्तों की जीवनियों का पठन, संकल्पपूर्वक देश के लिये प्रतिदिन कुछ करना यह उपाय है।
एक और बात पोषक वातावरण में ही प्रेरणा का विकास होता है। इसलिये सही संगत भी अत्यावश्यक है। हमारी प्रेरणा का विस्तार देश के स्तर तक होने के लिये आवश्यक है कि हम ऐसे भाव वाली टोली का हिस्सा बनें। अथवा ऐसी टोली बनायें। प्रेरणा के स्रोत माता-पिता, गुरु, मित्र, सम्बन्धी कोई भी बन सकते हैं पर इसका सुनिश्चित स्रोत तो हम स्वयं ही है। अतः प्रेरणा तो वही स्थायी है जो स्वयंप्रेरणा हो। इस के विकास के लिये नित्य आत्मावलोकन आवश्यक है। रोज सोने से पूर्व 5 मिनट भारतमाता का ध्यान करे और फिर स्वयं के दिन की समिक्षा करें।

दिसम्बर 3, 2011 Posted by | आलेख, चरित्र | , , , , , , | 1 टिप्पणी

   

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