उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

एकात्म स्वावलंबी ग्राम विकास


sgv1अनेक विद्यालयों के द्वार पर लिखा होता है ‘ज्ञानार्थ प्रवेश-सेवार्थ प्रस्थान’ | यह शिक्षा के समग्र उद्दिष्ट का नित्य स्मरण है | केवल ज्ञानप्राप्ति अथवा व्यक्तिगत कौशल का विकास शिक्षा का पूर्ण उद्देश नहीं प्रकट करता | यह ज्ञानप्राप्ति अथवा कौशल विकास किस उद्देश से है यह भी स्पष्ट होना आवश्यक है | विद्यालय से निकला बालक परिवार, समाज, राष्ट्र व विश्व में योगदान करने के लिए सुयोग्य बने ऐसी अपेक्षा है | यह योगदान कितना भी अर्थकारक हो किंतु उसके पीछे का भाव सेवा का ही रहे ऐसा संस्कार विद्यालयों में नई पीढ़ी को प्राप्त हो यह शिक्षा के परिपूर्ण उद्देश की व्याख्या है | अतः शिक्षा के विषय में चिंतन करते समय व्यक्तित्व विकास के साथ ही सामाजिक विकास के विभिन्न आयामों पर चिंतन करना भी आवश्यक है | जब तक समाज की भिन्न-भिन्न इकाइयाँ यथा परिवार, ग्राम, संगठन, नगर आदि के विकास की सम्यक अवधारणा सुस्पष्ट न हो तब तक शिक्षित पीढ़ी के सम्यक उपाययोजन की योजना शिक्षाविद नहीं बना सकते | समग्र ग्राम विकास, नगर विकास, संगठनशास्त्र, व्यापार प्रबंधन आदि पर स्पष्ट प्रारूप तयार करना भी शिक्षा के भारतीय स्वरुप के विकास हेतु आवश्यक है |

आजकल स्मार्ट सिटी, स्मार्ट विलेज आदि की चर्चा चलती है | स्मार्ट विलेज की बात करते हीsgv2 योजनाकारों के मन में आधुनिक शहरी सुविधाओं से संपन्न, संचार के सभी साधनों से परिपूर्ण गांव का ही विचार मन में आता है | चिकनी-चुपड़ी पक्की सड़कें हो, बिजली की अखंड आपूर्ति, मोबाइल इंटरनेट आदि सभी संचार के साधन हर गांव में उपलब्ध करा दिए जाएँ | सरकार ने इस दिशा में कार्य प्रारंभ भी कर दिया है | पंडित दीनदयाल उपाध्याय के नाम से ग्रामीण फीडरों को अलग करने की देशव्यापी महत्त्वाकांक्षी योजना केन्द्र सरकार ने सितंबर 2015 में प्रारंभ की | इसके माध्यम से गांव-गांव में 24 घंटे बिजली की आपूर्ति होगी | सिंचाई के लिए आवश्यक 3 चरण (three phase) विद्युत आपूर्ति भले ही कुछ समय के लिए प्राप्त हो किंतु घरेलू एवं अन्य व्यापारी उपयोग के लिए आवश्यक एकल चरण (single phase) बिजली 24 घंटे गांव-गांव में उपलब्ध होगी | इस आधार पर इंटरनेट आदि संचार के साधन गांव में पूरे समय उपलब्ध रह सकेंगे | सभी गांवों को पक्की सड़क से जोड़ने की योजना भी इसी दिशा में एक प्रयास है कि गांवों का यातायात तथा मालवाहक संपर्क द्रुत गति से हो सके | किंतु प्रश्न यह है कि क्या इस सबसे गांव का समग्र विकास हो पायेगा? केवल व्यापार और संचार के अवसर उपलब्ध हो जाने से नई पीढ़ी का नगरों की ओर पलायन रुक जायेगा?

शहरों की ओर स्थानांतरण के अन्य दो महत्वपूर्ण कारक योजनाकारों ने खोजे है – स्वाथ्य एवं शिक्षा | प्राथमिक एवं माध्यमिक के आगे की शिक्षा तथा इस स्तर पर भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा गांवों में उपलब्ध न होने के कारण जिन्हें भी संभव है वो अपने बच्चों को शिक्षा हेतु शहर में भेजना पसंद करते है | एकबार पढ़ाई के लिए शहर गया बालक पढ़-लिख कर जवान होने पर गांव क्यों लौटेंगे ? अतः गांव के गांव ही युवाओं से रिक्त होते जा रहे है | अनेक राज्यों में आने वाले दिनों में यह एक बहुत बड़ी चुनौती होगी | नई पीढ़ी जब गांव में रहेगी ही नहीं तो ये संचार साधन, ये बिजली किस काम आयेगी ?

ग्रामीण स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए स्थिति बड़ी विकट है | अनेक स्थानों पर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र उपलब्ध ही नहीं है | जहाँ भवन उपलब्ध है वहां भी चिकित्सकों का अभाव है | कोई चिकित्सक गांव जाना ही नहीं चाहता है | सरकार ने अनेक प्रयास कर लिए, कुछ वर्षों की अनिवार्यता कर दी, अतिरिक्त भत्ता देना प्रारंभ कर दिया फिर भी चिकित्सक शहर छोड़ना नहीं चाहता है | निजी व्यवसाय में इतनी अधिक कमाई है कि महाराष्ट्र जैसे राज्यों के शहरों के सरकारी अस्पतालों में भी चिकित्सक नहीं जाना चाहते है | अतः स्वास्थ्य सुविधाओं का गांवों में उन्नयन असंभव के बराबर है | इस हेतु नए सिरे से सोचना होगा |

शहरीकरण की नकल के रूप में ग्रामविकास का विचार किया जा रहा है | इस सोच में ही मूलभूत परिवर्तन आवश्यक हैsgv | वर्तमान में विकास के वैश्विक परिमाणों में शहरीकरण एक प्रमुख मापदंड है | जिस देश में जितना अधिक शहरीकरण होगा उसे उतना ही अधिक विकसित माना जाता है | समूची जनसंख्या के कितने प्रतिशत जनसंख्या शहरी है यह विकास का मापदंड है | इसी जीवनदृष्टि के कारण गांवों का शहरीकरण ही गांव का विकास माना जा रहा है | ग्राम विकास के नाम पर सारा सरकारी चिंतन व योजनायें इसी दिशा में है | यह पूर्णतया अभारतीय विचार है | भारत में गांव एक परिपूर्ण जैविक इकाई है | पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने ग्रामोदय के एकात्मिक प्रारूप में इस बात का विचार किया है | सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक स्तर पर पूर्णतः स्वावलंबी ग्रामों अथवा ग्रामसमूहों का विकास किया जाना भारत में ग्रामविकास का माध्यम हो सकता है | गांवों की जीवनशैली में कृषि व गोरक्ष यह केवल आर्थिक उत्पादन के साधन न होकर उनका सांस्कृतिक व सामाजिक मूल्य भी है | जब तक हम इन दोनों को लाभ का व्यवसाय नहीं बनाते तब तक ग्रामोदय के सारे प्रयास अधूरे ही होंगे | वर्तमान समय के अनुरूप कृषि एवं गोरक्षा के साथ-साथ ग्रामीण उद्योग और कृषि उत्पादों के व्यापार को भी जोड़ा जा सकता है | इन सबके आधार पर संपूर्णरूपेण स्वावलंबी ग्रामों का विकास किया जा सकता है |

इस विकास की प्रक्रिया का भी जैविक होना आवश्यक है | स्वावलंबी समाज निर्माण सरकारी बैसाखियों से नहीं हो सकता | सरकारी योजनाओं के माध्यम से सरकारी पैसा सरकारी अधिकारियों द्वारा ही खर्च किया जाता रहा तो सारे विश्व की पूंजी एक गाँव में लगाने पर भी ग्रामविकास कतई संभव नहीं है | योजना के स्तर से ही ग्रामीणों का न केवल सहभाग अपितु नेतृत्व सच्चे ग्रामविकास में अनिवार्य है | सारा गांव पूर्ण जागरूकता के साथ संगठित होकर एक मन से विकास का संकल्प ले तब वह ग्रामविकास का प्रथम चरण होगा | भौगोलिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक आधार पर कुछ गांवों के समूह बनाये जा सकते है | समूह में कितने और कौनसे गांव हो इसका निर्णय भी ग्रामवासी ही आपस में मिल कर करें | नैसर्गिक संसाधन, मानव बल, आर्थिक उपलब्धता तथा भौगोलिक दूरी के आधार पर पूर्ण स्वावलंबी ग्रामसमूह विकसित करने हेतु आवश्यक गांवों की संख्या ग्रामवासी निर्धारित करेंगे | यह एकत्रिकरण बहुत अधिक कठोर नहीं होना चाहिए | और अधिक ग्रामों को जोड़ने अथवा कुछ गांवों को समूह बदलने की लचीली सुविधा इस व्यवस्था में उपलब्ध हो | कुछ गांव धीरे-धीरे अपनेआप में ही स्वावलंबी बनने का प्रयत्न कर सकते है | इस स्थिति में उन्हें किसी समूह का हिस्सा बने रहने की आवश्यकता नहीं रहेगी |

यह ग्रामसमूह अपने स्तर पर नियोजन करे कि किस प्रकार वे पाँच-सात वर्षों की अवधि में पूर्णतः आत्मनिर्भर हो सकते है | शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, गौरक्षा, व्यापार के साथ ही ऊर्जा के उत्पादन आदि में भी यह ग्रामसमूह पूर्णरूपेण आत्मनिर्भर बने | इस हेतु ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों का उपयोग करना आवश्यक होगा | तेलंगाना के लगभग 40 गांव जैव-इंधन (bio-diesel) के माध्यम से बिजली के उत्पादन में आत्मनिर्भर हो गए है | ऐसे ही सौर, पवन, छोटे नालों पर बने चक बाँध आदि को मिलाकर विकेन्द्रित विद्युत् आत्मनिर्भरता को प्राप्त किया जा सकता है | सिंचाई एवं पेयजल हेतु भी इसी प्रकार का चिंतन एवं नियोजन किया जाये कि कुछ अवधि में यह ग्रामसमूह उस मामले में भी आत्मनिर्भर बन सके | कृषि का नियोजन भी ‘स्वपोषण’ व ‘व्यापार’ इन दो रूपों में किया जाये | गांवों की अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ ही गांव शहरों के भी अन्नदाता है | आसपास की नगरीय आवश्यकताओं का ध्यान रखते हुए कृषि का व्यापारिक नियोजन किया जाये | फल, सब्जी और अनाज की आपूर्ति के अलावा अनेक ऐसे कृषिउत्पाद है जिनकी औद्योगिक उपयोगिता है | इन सभी का अपनी स्थानीय विशेषताओं के अनुरूप नियोजन किया जाये तो कृषि न केवल भरण-पोषण का अपितु अच्छे लाभ का माध्यम भी बन सकती है | किंतु यह एकल चिंतन अथवा प्रयोग से संभव नहीं है | सामूहिक चिंतन, संगठित प्रयास इस हेतु अनिवार्य है | कुछ कृषिउत्पाद सीधे बाजार में बेचने के स्थान पर थोड़ी सी प्रक्रिया करने से उनमें बहुत बड़ी मूल्य वृद्धि हो सकती है | अतः ऐसे कृषि के सहयोगी ग्रामोद्योगों की योजना भी ग्राम्य विकास का महत्वपूर्ण अंग है |

इस sgv3सब हेतु, शिक्षा में भी स्वावलंबी विचार इन ग्रामसमूहों को करना होगा | अपने नए पीढ़ी की शैक्षिक आवश्यकताओं की पूर्ति अपने ही ग्रामसमूह में हो सके ऐसी आत्मनिर्भरता को लक्ष्य किया जाये | हर बालक को 8वी तक जीवनोपयोगी सामान्य शिक्षा सहज, सुलभ, जहा तक हो सके निःशुल्क प्राप्त हो | उसके आगे की शिक्षा का नियोजन बालकों के स्वभाव एवं रूचि के अनुरूप तथा ग्रामसमूह की आवश्यकता के अनुसार किया जाये | इस हेतु विशेष रूप से ग्रामीण शिक्षा संस्थानों का निर्माण करना पड़ेगा जिसमें कृषि एवं कृषि सहायक उद्योगों में कार्य करने का प्रशिक्षण ग्रामीणों को दिया जाये | सामान्य उच्च विद्यालयीन शिक्षा (9वी से 12वी) तथा स्नातक तक महाविद्यालयीन शिक्षा ग्रामसमूह में उपलब्ध हो | केवल परास्नातक अथवा व्यावसायिक शिक्षा हेतु छात्रों को किसी अन्य ग्रामसमूह अथवा शहर में जाने की आवश्यकता रहे | इस प्रकार ग्रामसमूह शैक्षिक आवश्यकताओं हेतु पूर्णतः आत्मनिर्भर बन सकेंगे | स्वास्थ्य सुविधाओं में भी इसी प्रकार की आत्मनिर्भरता पाई जा सकती है | प्रत्येक गांव के एक या दो युवा-युवती को परा-चिकित्सकीय (para-medical) प्रशिक्षण दिलाकर आरोग्य मित्र के रूप में तैयार किया जाये | सामान्य छोटे-मोटे हादसों से होनेवाली छोटी-मोटी चोटें, सामान्य संक्रमण, बुखार, जुकाम, पेट की बिमारियाँ आदि के उपचार का ज्ञान व दवाई आरोग्य मित्र के माध्यम से हर गांव में उपलब्ध हो | थोड़े प्रगत उपचार तथा कुछ दिन के निवासी उपचार हेतु प्राथमिक स्वाथ्य केंद्र हर ग्रामसमूह में हो | ग्रामीणों के हाथ इस सबका प्रबंधन/संचालन दिया जाये ताकि चिकित्सकों की साप्ताहिक उपस्थिति व परिचारक कर्मचारियों (nursing staff) की नित्य उपलब्धता सुनिश्चित हो |

इस प्रकार का स्वावलंबी ग्रामविकास तभी संभव है जब शिक्षित, समरस, संगठित, शोषणमुक्त समाज स्थापित किया जाये | यह काम धार्मिक आयोजनों के माध्यम से सदियों से होता रहा है | यज्ञ, कथा, कीर्तन, जत्रा, उत्सव आदि के पारंपारिक आयोजन समाज को सुसंगठित करने के माध्यम रहे हैं | स्वावलंबी ग्रामविकास में इनकी महती भूमिका है | मठों, मंदिरों, धर्माचार्यों तथा सामाजिक संगठनों ने एकात्म स्वावलंबी ग्रामविकास के इस व्रत को अपनाया तो यह स्वप्न साकार होने में बहुत अधिक समय नहीं लगेगा | सरकार की भूमिका केवल उत्प्रेरक (catalyst) की रह जाएगी | रास्तें, भवन, तालाब, कैनाल, उर्जा संयंत्र, शिक्षा जैसी आवश्यक अधोसंरचनाओं (infrastructures) का निर्माण ग्रामीणों के माध्यम से सरकारी अनुदान के उपयोग से हो | बाकि आवश्यक संसाधन समाज के संबल से ही खडे किये जाये |

स्वावलंबी ग्रामविकास की प्रक्रिया भी शासनमुक्त, समाज पोषित व ग्रामीणों पर पूर्ण विश्वास रखनेवाली होगी तभी उचित परिणाम भी प्राप्त होंगे |

अक्टूबर 24, 2015 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , | 3 टिप्पणियाँ

स्वाधीनता का मर्म


गत माह अमेरिकी विदेषमंत्री हिलेरी क्लिंटन ने एक व्याख्यान में कहा कि चीन में लोकतन्त्र के विकास की ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है और यह चीन के विकास में सबसे बड़ी बाधा है। चीन के एक शोध संस्थान ने इसकी प्रतिक्रीया में एक लेख प्रकाशित किया जिसमें चीनी विद्वानों ने अमेरिकी वैश्विकवाद को चुनौति दी। उन्होंने प्रश्न किये कि जो पश्चिम में अपनाया गया है उसी व्यवस्था को अपनाना विकास कैसे माना जायेगा? क्या पश्चिमी देश दावे के साथ कह सकते है कि उनके द्वारा गत कई वर्षों से अपनाये गये तन्त्र ने देश के सभी लोगों को सुख प्रदान किया है? यदि पश्चिम द्वारा अपनायी व्यवस्था आदर्श होती तो आज उन देशों में बेराजगारी, कर्ज, सामाजिक व पारिवारिक विघटन क्यों बढ़ रहा है? लोकतन्त्र यदि आदर्श व्यवस्था है तो क्या इसने सभी देशों में आदर्श परिणाम दिये है? जिन देशों ने इसे अपनाया वे आज भी जब आदर्श समाज, राजनीति व अर्थव्यवस्था को नही प्राप्त कर सके हैं तो फिर अमेरिका को क्या अधिकार है कि वो इस अधुरी असफल व्यवस्था को सबके उपर थोपें? चीनी विद्वान केवल प्रश्नों तक ही सीमित नहीं रहे। उन्होंने दावा किया कि चीन में व्यवस्थागत सुधार उसके अपने ऐतिहासिक अनुभव, संस्कृति व दर्शन के अनुसार ही होना चाहिये। उनके अनुसार चीन के लिये लोकतन्त्र के स्थान पर कन्फुशियन द्वारा प्रणीत ‘मानवीय सत्ता’ के सिद्धान्त पर विकसित व्यवस्था अधिक उपकारक व सम्यक होगी। शोधकारकों ने इस सिद्धान्त पर आधारित एक व्यवस्था के बारे में विस्तार से प्रस्ताव भी लिखा।

लोकतन्त्र की उपयोगिता अथवा चीनी विद्वानों द्वारा प्रस्तुत राजनयिक व्यवस्था पर विचार विमर्श अथवा विवाद भी हो सकता है किन्तु सबसे महत्वपूर्ण विचारणीय बिन्दू है कि उन्होंने छाती ठोक कर यह कहा कि उनके देश के लिये उनके अपने विचार व इतिहास में से निकली व्यवस्था ही उपयोगी है। किसी और के लिये जो ठीक है वह सबके लिये ठीक ही होगा यह साम्राज्यवादी सोच नहीं चलेगी। साथ ही अपने अन्दर से तन्त्र को विकसित करने के स्थान पर विदेशी विचार से प्ररित होकर व्यवस्था बनाना भी मानसिक दासतता का ही लक्षण है। जब हम स्वतन्त्रता के छः दशकों के बाद के भारत की स्थिति का अवलोकन करते हे तो हमे निराशा ही होती है। 15 अगस्त 1947 को जब भारत स्वतन्त्र हुआ तो हमारे राष्ट्रीय नेतृत्व के साथ ही पूरे विश्व को भी भारत से अनेक अपेक्षायें थी। इसी कारण 1950 के दशक में पूरा विश्व जब दो खेमों में बटा हुआ था तब भारत के आहवान पर 108 देशों ने ‘‘निर्गुट आंदोलन’’ के रूप में भारत का नेतृत्व स्वीकार किया था। भारत के इतिहास व संस्कृति के कारण विश्व के समस्त दुर्बल देशों को भारत से एक कल्याणकारी मार्गदर्शक नेतृत्व की अपेक्षा थी। हमारे प्रथम प्रधानमंत्री ने 14 व 15 अगस्त की मध्यरात्री पर लाल किले पर तिरंगा फहराते हुये ही घोषणा की थी कि भारत विश्व के राष्ट्रपरिवार में अपनी सकारात्मक भुमिका को निभाने के लिये तत्पर है। 15 अगस्त को आकाशवाणी पर प्रसारित संदेश में महायोगी अरविन्द ने स्वतन्त्र भारत के समक्ष तीन चरणो में लक्ष्य रखा था। पहले चरण में भारत के अस्वाभाविक, अप्राकृतिक विभाजन को मिटा अखण्ड भारत का पुनर्गठन, द्वितीय चरण में पूरे एशिया महाद्विप का भारत के द्वारा नेतृत्व तथा अन्ततः पूरे विश्व में गुरूरूप में संस्थापना। आज 65 वर्ष के बाद क्या हम इनमें से किसी भी लक्ष्य के निकट भी पहूँच पाये है?

विश्व के मार्गदर्शन की तो बात दूर रही हम अपने देश को ही पूर्णतः समर्थ, समृद्ध व स्वावलम्बी भी कहाँ बना पाये है? सारा विश्व भारत की असीम सम्भावनाओं की चर्चा करता है। किन्तु उन सम्भावनाओं को प्रत्यक्ष धरातल पर उतारने का काम अभी भी कहाँ हो पाया है? देश 70 प्रतिशत जनता अभाव में जी रही है। धनी व निर्धन के बीच की खाई बढ़ती जा रही है। संस्कारों का क्षरण तेजी से हो रहा है। भारतीय भाषाओं का महत्व व प्रासंगिकता दोनों ही इतनी गति से कम हो रही है कि कई देशी बोलियों के अस्तीत्व पर ही प्रश्नचिन्ह लग रहा है। कुल मिलाकर भारत में से भारतीयता की प्रतिष्ठा समाप्त हो रही है। कहीं पर भी कोई व्यवस्था नहीं दिखाई देती। राजनयिक, सामाजिक तथा प्रशासनिक व्यवस्था पूर्णतः शिथिल व दिशाहीन हो रही है। शिक्षा व्यवस्था भी इतनी प्राणहीन हो गई है कि चरित्रनिर्माण तो दूर की बात सामान्य लौकिक ज्ञान को प्रदान करने में भी इसे सफलता नहीं मिल पा रही। स्नातकोत्तर उपाधि धारण करनेवाले छात्र भी किसी भी एक भाषा में सादा पत्र भी नहीं लिख पाते है। इन शिक्षितों को बिना अंगरेजी का उपयोग किये 4 वाक्य बोलना भी असम्भव सा लगता है। दूसरी ओर वही उच्चशिक्षित छात्र शुद्ध अंगरेजी में भी 4 वाक्य नहीं बोल पाता है। ऐसी शिक्षापद्धति के कारण उत्पन्न चरित्रहीनता से सर्वत्र भ्रष्टाचार व अराजकता का वातावरण बन गया है। इस सबको बदलने के लिये अनेक आंदोलन भी चलाये जा रहे है। जब तक हम समस्या की जड़ को नही जान जाते तब तक सारे प्रयास पूर्ण प्रामाणिक होते हुए भी व्यर्थ ही होंगे।

देश की इस परिस्थिति के कई कारण है। समस्याएं बहुआयामी हैं। आर्थिक, नीतिगत, कार्यकारी, संस्थागत, सामाजिक, व्यक्तिगत कई कारणों से समस्या जटील होती जा रही है। कई प्रकार के देशभक्त व्यक्ति व संगठन इन कारणों के निवारण पर कार्य कर रहे है। फिर भी अपेक्षित परिणाम दिखाई नहीं दे रहा। समस्या के समाधान हेतु सभी पहलुओं पर काम तो करना ही पड़ेगा किन्तु दिशा एक होना आवश्यक है। हमें अपने देश के मूलतत्व, चिति के अनुरूप व्यवस्थाओं का निर्माण करने की ओर प्रयास करना होगा। भारत का जागरण भारतीयता का जागरण है। हमारा राष्ट्रीय तन्त्र हमारे स्वबोध को लेकर विकसित करना होगा तभी यह स्वतन्त्र कहा जायेगा। राज्यव्यवस्था हमारे राष्ट्रीय स्वभाव के अनुसार होगी तभी स्वराज्य का स्वप्न साकार होगा। स्वामी विवेकानन्द ने बार बार कहा है प्रत्येक राष्ट्र का विश्व को संप्रेषित करने अपना विशिष्ट संदेश होता है, नियति होती है जिसे उसे पाना होता है और जीवनव्रत होता है जिसका उसे पालन करना होता है। वे कहते है भारत का प्राणस्वर धर्म है और उसी के अनुरूप उसका मानवता को संदेश है आध्यात्म, नियति है जगत्गुरू तथा जीवनव्रत है मानवता को ऐसी जीवनपद्धति का पाठ पढ़ाना जो सर्वसमावेशक, अक्षय व समग्र हो।

स्वतन्त्र भारत को अपनी नियति को पाने के लिये अपने जीवनव्रत के अनुसार व्यवस्था का निर्माण करना था। उसके स्थान पर हम सदैव उधार की व्यवस्थाओं को अपनाते रहे। हमने अपना संविधान तक विभिन्न देशों से उधार लिया। अनेक शताब्दियों तक विविधता से सम्पन्न विस्तृत राज्य पर सुचारू संचालन करने वाली नैसर्गिक व्यवस्था का सैद्धान्तिक व व्यावहारिक प्रतिपादन करनेवाले चाणक्य, विद्यारण्य तथा शिवाजी आदि स्वदेशी चिंतको की सफल राजव्यवस्थाओं का अध्ययन कर उन्हें कालानुरूप समायोजित करने का विचार ही नहीं हुआ। क्या विदेशी आधार पर बने संविधान से विकसित तन्त्र स्वदेशी हो सकता है? इसी का परिणाम हुआ कि हमने आगे चलकर राष्ट्र के प्राण ‘धर्म’ को ही राजतन्त्र से नकार दिया। यही कारण है कि पूरी व्यवस्था ही प्राणहीन हो गई।

अर्थतन्त्र में भी हमने प्रथम चार दशक तक रूस की साम्यवादी व्यवस्था से प्रेरणा ग्रहण कर समाजवादी अर्थव्यवस्था का निर्माण किया। उसकी निष्फलता सिद्ध हो जाने पर 1991 के बाद आर्थिक उदारता के नाम पर पश्चिम के मुक्त बाज़ार व्यवस्था को अपनाया। जब कि यह विश्वमान्य तथ्य है कि 18 वी शति के प्रारम्भ तक भारत ना केवल विश्व का सबसे समृद्ध देश था अपितु वैश्विक संपदा का 33 प्रतिशत भारत में था। विश्व के धनी देशों के संगठन Organisation for Economic Co-operation and Development (OECD) ने ख्यातनाम अर्थवेत्ता एंगस मेडीसन को इसवी सन के प्रारम्भ से विश्व की सकल सम्पदा (गडप) पर अनुसंधान करने का प्रकल्प दिया। उन्होंने विश्व के आर्थिक इतिहास का संकलन किया। उनके अनुसार भारत व चीन विश्व के सबसे धनी देश रहे है। इसा के काल के प्रारम्भ से 14 वी शती तक तो चीन भी किसी होड़ में नहीं था। अंगरेजों ने इस प्राचीन समग्र व्यवस्था को तोड़ अपनी शोषण पर आधारित व्यवस्था को लागु किया तब से इस देश में विपन्नता का राज प्रारम्भ हुआ। आज राजनैतिक स्वतन्त्रता के 65 वर्षों बाद भी हम उसी दासता को क्यों ढ़ो रहे है? इस देश का अतीत जब इतना समृद्ध रहा है तब यदि आज भी हम अपने सिद्धान्तों पर आधारित व्यवस्था का निर्माण करेंगे तो पुनः विश्व के सिरमौर बन सकते है।

आज हम अपनी स्वतन्त्रता को खोने के कगार पर आ पहूँचे है ऐसे में मानसिक स्वाधीनता का वैचारिक आंदोलन प्रारम्भ करने की आवश्यकता है। एक ऐसे तन्त्र के निर्माण का आन्दोलन जो देशज हो अर्थात इस देश के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक तथा धार्मिक अनुभव से उपजा हो। ऐसे तन्त्र का स्वाधीन होना भी आवश्यक है। अर्थात इसके सभी कारकों पर अपने राष्ट्र का ही निर्णय हो। इस हेतु शिक्षा के राष्ट्रीय बनने की आवश्यकता है। जिससे निर्णायक भी स्वदेश की भावना व ज्ञान से परिपूर्ण हो। स्व-तन्त्र का तिसरा आवश्यक पहलु है स्वावलम्बी तन्त्र। तन्त्र की सहजता व सफलता उसके निचली इकाई तक स्वावलम्बी होने में है। गाँव अपने आप में स्वावलम्बी हो तो ही सबका अभ्युदय सम्भव होगा। भारतीय व्यवस्था हर स्तर पर स्वावलम्बी होती है। इसमें तन्त्र के निर्माण के बाद नियमित संचालन के लिये शासन के भी किसी हस्तक्षेप अथवा सहभाग की आवश्यकता नहीं होती। समाज ही स्वयं संचालन करता है। आपात् स्थिति में ही शासन को ध्यान देना पड़ता है।

आज हम सब स्वाधीनता दिवस मनायेंगे। केवल देशभक्ति की भावना को उजागर करने के साथ ही स्वाधीनता के मर्म पर विचार भी हो यह शुभाकांक्षा।

अगस्त 15, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , , , , , , , | 1 टिप्पणी

युवा शक्ति ही राष्ट्रनिर्माण का प्रभावी साधन


भारत एक युवा देश है। जनसंख्या के अनुसार विश्व की सर्वाधिक युवा आबादी भारत में निवास करती है। भारत में जनगणना के नियमों में 18 से 35 वर्ष की आयु को युवा माना जाता है। विश्व में 15 वर्ष की आयु से यौवन प्रारम्भ होता है। दोनों गणनाओं में भारत विश्व में ना केवल अग्रणी है अपितु विश्व की युवा आबादी का 60 प्रतिशत से अधिक भारत में वास करता है। यह निश्चित ही एक महान निधि है किन्तु साथ ही बहुत बड़ी जिम्मेवारी भी है। इतने बड़ी संख्या में उपस्थित युवा शक्ति का राष्ट्रनिर्माण में प्रयोग करना एक चुनौति है। अर्थशास्त्र के विशेषज्ञों के अनुसार भी इस युवा आबादी को उपयोगी कौशल में प्रशिक्षित करना, फिर इनके लिये पर्याप्त रोजगार उपलब्ध कराना तथा उद्योग, कृषि व सेवा क्षेत्र में संतुलन स्थापित करना अपने आप में बड़ा ही दुष्कर कार्य है। उच्च शिक्षा में असंतुलित वृद्धि के कारण एक ओर हम बड़ी संख्या में तैयार हो रहे अभियंताओं को उचित रोजगार नहीं दे पा रहे है वहीं दूसरी ओर अनेक आवश्यक कार्यों के लिये प्रशिक्षित व्यक्ति उपलब्ध नहीं है। एक आकलन के अनुसार स्नातक स्तर पर कला क्षेत्र में घटते प्रवेश के कारण आनेवाले दशकों में पूरे विश्व में भाषा शिक्षकों की कमी होगी। तकनिकी क्षेत्र के बढ़ते प्रभाव के कारण मूलभूत विज्ञान यथा भौतिकी, रसायन तथा जीवविज्ञान के क्षेत्र में अनुसंधान करने के लिये पर्याप्त संख्या में वैज्ञानिक नहीं मिल पा रहे है। अभी से दिख रहे इस असंतुलन की स्थिति आगामी दशकों में और विकट होनेवाली है।

इसके मूल में हमारे युवाओं में यौवन के वास्तविक शक्ति के ज्ञान का अभाव है। युवा को युवा होने का अर्थ ही पता नहीं है। युवा अर्थात अनुशासनहीन, अस्तव्यस्त, उपद्रवकारी ऐसा ही विचार सबके मन में आता है। किन्तु यह केवल उपरी विचार है। वास्तव में आज के युवा को ज्ञान की बड़ी पिपासा है। केन्द्र के स्वाध्याय वर्गों में सभी कार्यकर्ताओं का अनुभव है कि अवसर मिलने पर युवा अध्ययन, विचार व चर्चा सभी के लिये तत्पर है। इससे आगे बढ़कर वह इन विचारों को क्रियान्वित भी करना चाहता है। अतः युवा आबादी को काम देने को एक भार माननें के स्थान पर अवसर मानकर विचार किया जाना चाहिये। रोजगार की ही बात लें। युवा केवल नौकरी पाने का विचार क्यों करे? क्या स्वयं के बुते पर व्यवसाय कर नौकरी देने का विचार युवा नहीं कर सकता? युवा को चुनौति तो देकर देखों क्या क्या चमत्कार कर सकता है। वीर सावरकर कहा करते थे, ‘युवा की क्षमता को समझना है तो इस पद को पलट कर देखों – वायु! युवा वायु के समान शक्तिशाली है। यदि अनुशासन तोड़ दे तो प्रभंजन बन पूरी दुनिया को तबाह कर सकता है। प्राण हरण कर सकता है। वहीं यदि नियम से अनुशासित हो तो प्राणायाम बन जीवन की रक्षा भी कर सकता है।’ आवश्यकता है इस शक्ति के अनुशासित जागरण की।

युवा बल को युवा शक्ति में रूपांतरित करने के लिये सबसे पहले युवा को अपने स्वभाव को पहचानने का प्रशिक्षण देना होगा। स्वभाव के अनुरूप कार्य का चयन करने से पूरी क्षमता व संभावना का विकास हो सकता है। भेड़चाल में आजिविका का चयन करने के स्थान पर अपने स्वभाव के अनुसार उच्च शिक्षा व तदनरूप व्यवसाय चयन करने से राष्ट्रनिर्माण के सभी क्षेत्रों मे पर्याप्त कौशल उपलब्ध हो सकेगा। अतः युवाशक्ति जागरण का प्रथम मन्त्र हुआ ‘स्वभाव से स्वावलम्बन’। इसमें सफलता प्राप्त करने के लिये दूसरी महत्वपूर्ण आवश्यकता है संकल्प की। मन तथा इन्द्रियों की असीम शक्ति को एक लक्ष्य पर एकाग्र करने को संकल्प कहते है। संकल्पित युवा ही अपनी पूर्ण क्षमता को प्रगट कर किसी भी लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। यह संकल्प जीवन के हर क्षेत्र में चमत्कार कर सकता है। विज्ञान में अनुसंधान हो, स्वरोजगार के लिये व्यवसाय को संचालन हो, देश की रक्षा के लिये सेना में प्रवेश हो अथवा जनजागरण के लिये समाज सेवा का क्षेत्र हो हर स्थान पर संकल्पित युवा ही असम्भव को सम्भव कर दिखाता है।

अपने स्वभाव को पहचान, उच्च लक्ष्य के लिये संकल्पित युवाओं को संगठित करना होगा। संगठन में ही शक्ति है। स्वामीजी ने अपने पश्चिम प्रवास में इस शक्ति के चमत्कार को देखा और भारत में सामूहिक कार्य की शक्ति को पुनः जागृत करने का काम किया। बड़े बड़े संगठनों का निर्माण स्वामीजी के विचारों की प्रेरणा से हुआ। इसके साथ ही हर स्तर पर छोटे बड़े संगठित प्रयासों की आवश्यकता है। संकल्पित युवा एकत्रित आकर एक दूसरे की क्षमताओं के परिपूरक बन प्रचण्ड शक्ति का जागरण कर सकते है। देश सेवा के हर क्षेत्र में सहकार पर आधारित संगठित प्रयास की नितान्त आवश्यकता हैै। इस संगठित शक्ति का उदात्त ध्येय के लिये समर्पित होना अनिवार्य है। अन्यथा अपने स्वार्थ में संलिप्त हो कर यही शक्ति प्रभंजन के समान विनाश कर सकती है। भारत का राष्ट्रीय जीवनध्येय विश्व मानवता का मार्गदर्शन करना है। जगत् गुरू के अपने नियत सिंहासन पर आरूढ़ होने की ओर भारत की यात्रा स्वामीजी के शिकागो दिग्विजय से प्रारम्भ हो चुकी है। वैश्विक परिदृष्य प्रचण्ड गति से इसके शीघ्र ही साकार होने की ओर अग्रेसर है। ऐसे में भारत की संगठित युवा शक्ति को स्वयं को राष्ट्रकार्य के लिये समर्पित करने की आवश्यकता है। सीधे राष्ट्रसेवा में समर्पित होने के अवसर विवेकानन्द केन्द्र जैसे संगठन देते ही है। साथ ही राष्ट्रजीवन के हर क्षेत्र में स्वभाव के अनुरूप, संगठित कार्य करते हुए अपने लक्ष्य व समस्त उपलब्धियों को राष्ट्र के जीवनध्येय के साथ समाहित करना भी समर्पण का एक माध्यम है।

स्वभाव से स्वावलम्बन, संकल्प, संगठन तथा समर्पण के सकारात्मक मन्त्र से अभिमंत्रित युवा शक्ति ही राष्ट्रनिर्माण का प्रभावी साधन बन सकती है।

जून 8, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , | 1 टिप्पणी

   

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