उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

छलांग तो लगानी पड़ेगी!


गढ़े जीवन अपना अपना -9
छलांग तो लगानी ही पड़ती है। साधारणतः जीवन में किसी बड़े निर्णय को कर लेने के बाद भी जब व्यक्ति उस दिशा में पहला कदम उठाने से ड़रता है तो उसे ऐसे ही समझाइश दी जाती है। तैरना सीखने के लिये भी तो पहले पानी में उतरना ही पड़ेगा ना? कहते है कि धक्का दे के पानी में डाल दो तो बच्चा भी अपने आप तैरना सीख ही लेता है। कितनी भी सोच समझ या प्रेरणा से जीवन में कार्य करने की दिशा और क्षेत्र चुन भी लिया तब भी सारी बात तो इसी पर निर्भर होगी कि पहला कदम डाला जाय। कहते ही है ना कि कितनी भी लम्बी यात्रा हो प्रारम्भ तो एक कदम से ही होता है। यही सबसे महत्वपूर्ण होता है। यही वो छलांग हे जो सफलता की संगिनी है।
जटायु के बड़े भाई संपाति ने अपनी दूरदृष्टि से सागरपार देख कर बता तो दिया की श्रीलंका में अशोक वाटिका में माता सीता बैठी है। तो लक्ष्य निश्चित हो गया। कार्य भी स्पष्ट है। प्रभु का संदेश सीतामैया को पहुँचाना है और उनका कुशलक्षेम जानकर प्रभु को बताना है। लक्ष्य भी स्पष्ट और कार्य भी स्पष्ट। जांबवंत के वचनों से अंतःप्रेरणा का जागरण भी हो गया – ‘रामकाज लगी तव अवतारा। सुनतहि भयहु पर्वताकारा।’ रामकार्य के लिये तुम्हारा जन्म है इसका स्मरण होते ही हनुमानजी की शक्ति का जागरण हुआ। पर केवल इतने से ही काम नहीं बनता। हनुमान जी को महावीर ऐसे ही नहीं कहते। वीरता के सभी आवश्यक गुण उनमें विद्यमान है। साहस, धैर्य, बल, और विवेक चारों का अद्भूत मिश्रण ही इस कपिश्रेष्ठ को ‘महावीर’ बनाता है।
पर्वताकार हो जाने के बाद वे अपनी पुनर्जागृत शक्ति को प्रगट करने लगे। जांबवंत को कहने लगे बताइये अब मै क्या करू? आप कहो तो पूरी लंका को ही उखाड़ लाउ? या रावण के सभी सहायकों के साथ उसका विनाश कर दूँ? पर वीरता तो कार्य को उचित मात्रा में करने में ही होती है। इसलिये जांबवंत जी ने कहा कि अभी तो तुमको केवल इतना ही कार्य करना है कि माता सीता को ढ़ाढ़स बंधाना हे और उनकी स्थिति के बारे में रामजी को वापिस आकर सूचना देनी है। साहस का अर्थ ये नहीं कि मनमानी करें। दल के नेता की आज्ञा के अनुसार पराक्रम करने के लिये साहस के साथ ही धैर्य भी चाहिये। फिर इसका अर्थ ये भी नहीं कि अपनी बुद्धि का प्रयोग ही नहीं करना है। दो काम बताये थे पर जब लंका आ ही गये तो लगे हाथ शत्रु की सेना का आकलन भी कर लिया।
हनुमानचालिसा में हम गाते है, ‘‘प्रभुमुद्रिका मेली मुख माहि। जलधी लांघि गये अचरज नाहि।।’’ यदि इस समुद्र लांघने वाली छलांग को ध्यान से समझे तो हम अपने चरित्र निर्माण के लिये महत्वपूर्ण संकेत प्राप्त कर सकते है। सबसे पहले तो पिता के मित्र मैनाक पर्वत ने मित्रतापूर्ण विघ्न ड़ाला। ‘आओ कुछ क्षण विश्राम करों!’ पर कार्य में विघ्न ड़ालते सुख को ठीक से समझ कर वीर उससे बच निकलता है। पवनपुत्र ने पिता के मित्र को विनम्रता से उत्तर दिया, ‘राम काजु किन्हें बिनु मोहि कहा विश्राम!’ यह कार्य के प्रति लगन वीरता का लक्षण है। सुरसा और छाया के विघ्नों को विवेकपूर्ण बुद्धि से जहाँ आवश्यक वहाँ छोटा बनकर पार किया और लंकीनी के लिये ऐसे बल का प्रयोग किया की एक ही मुठ्ठी के प्रहार में उसे चित कर दिया। जैसा विघ्न वैसा ही उपाय। यह वीरता है। सब समय आवेश और शक्ति का ही प्रयोग नहीं तो जहाँ जो उचित हो उस प्रकार से समस्या का समाधान करना।
हमारे भी जीवन में रोज अनेक ऐसे प्रसंग आते हे जहाँ हमें छलांग लगानी होती है। पर वीरता अपने आप नहीं आती है। अपने आप तो कुछ भी नया करने में संकोच और कुछ कुछ भय भी लगता है। जिस कमरे में अंधेरा हो उसमें प्रवेश करने में भी तो हिचकिचाहट होती है। पता नहीं क्या होगा अंधेरे में। और मन सहज ही विपरित से विपरित ही कल्पनायें करता है और भय को बढ़ाता है। एक तो अज्ञात का भय और दूसरा आलस ये हमें छलांग लगाने से रोकते है। आलस केवल शारीरिक ही नहीं होता। मन का आलस बड़ा होता है। पर यदि नये प्रयोग नहीं करेंगे तो हमें हमारी क्षमताओं का परिचय कैसे होगा? यदि पानी में ही नहीं उतरेंगे तो तैरेंगे कैसे? अतः मन को संस्कार देना होता है कि नये काम करें। प्रयत्नपूर्वक कुछ ना कुछ नया करते रहना। ताकि जब कार्य के लिये कुछ नया करना पड़ें तो मन हिचकिचाये नहीं। साहस का संस्कार जितना बचपन में हो उतना सहज और पक्का होता है। क्योंकि एक बार मन में तरह तरह के भय भर गये तो फिर उनको हटाना ही बड़ा काम हो जाता है।
धैर्य तो बाद में आ जायेगा पर पहले साहस और पराक्रम विकसित होना चाहिये। बिना साहस के धैर्य तो भीरुता है और शौर्य के साथ धैर्य है वीरता। हम सब जीवन में स्थायित्व लाना चाहते है। Settle होना चाहते है। सारे व्यावसायिक लक्ष्य बंततपमत की योजना जीवन को स्थिर करने के लिये है। ये तो होना ही है समय के साथ हो भी जायेगा। पर बचपन में या युवावस्था में ही यह मानसिकता बना लेने से वीरता का विकास नहीं होता। व्यवसाय में भी विशिष्ठ सफलता तो वीरों को ही मिलती है जो साहस करते है। जिसे आधुनिक भाषा में Risk कहते है। चुनौती के बिना प्रगति की कल्पना ही नहीं कर सकते। धैर्य का अर्थ है परिस्थिति को भाँपकर प्रतीक्षा करने की क्षमता। समय के अनुरूप ही साहस विजय देता है। कई बार सही समय की प्रतीक्षा करने का धैर्य नहीं होने के कारण सामर्थ्य और पूर्ण योजना के बाद भी अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते।
14 साल की आयु के शिवाजी तोरणगढ़ के किले पर हमले की योजना बनाते है और सफलता पूर्वक स्वराज्य की पहली विजय प्राप्त करते है। सोचिये, आज 14 साल का बालक 10 वी कक्षा में होता है। अपनी पढ़ाई में आगे क्या विषय लेने है इसका निर्णय लेने का साहस भी हम 10 वी तक विकसित नहीं कर पाते है। जिस विधि से शिवाजी जैसे वीरों का निर्माण होता है वही है यह साहस और धैर्य के उचित सदुपयोग की विधि। कब, कहाँ किसका प्रयोग करना है इसके निर्णय के लिये विवेक। यह सब सिद्धान्त जानने से ही विकसित नहीं हो जाते उसके लिये व्यवहार में अभ्यास करना होता है। गलतियाँ भी होंगी। कुछ नुकसान भी हो सकता है पर निराश होने कि आवश्यकता नहीं यदि सही सबक सीख लिये तो ये छोटे मोटे नुकसान तो उस सीख की ट्यूशन फीज मात्र है। जीवन में प्रयोग करने के लिये तत्पर होना चाहिये। जिस बात का भय लगता हो उसे करके देख लेने से ही भय दूर होगा। वीरों की जीवनियां पढ़ने से भी मन तैयार होता है।
महावीर हनुमान को अपने जीवन का आदर्श बना ले ओर सोचें इस स्थिति में मेरे स्थान पर पवनसुत होते तो क्या करते? राह मिल ही जायेगी। वीरतापूर्ण सार्थक जीवन का मन्त्र तो यही है ‘छलांग तो लगानी ही पड़ेगी।’

दिसम्बर 14, 2011 Posted by | आलेख | , , , , , , , , , , | 10 टिप्पणियाँ

   

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