उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

चुनावी रणभूमी मे राष्ट्रवाद का शंखनाद


Republic day2चुनाव लोकतंत्र का महोत्सव है। वर्तमान में चुनाव आयोग द्वारा डाले गये कठोर निर्बंधों के कारण इस महोत्सव का उत्साह कुछ धीमा पड गया दिखता है। जमीनी गतिविधियों का स्थान अब प्रसार माध्यमों के अंदर होनेवाली प्रचार उथल-पुथल ने ले लिया है फिर भी चुनाव का समय सबके लिए ही अतिविशिष्ट सक्रियता का समय होता है। सभी प्रकार के कार्यकर्ता सक्रिय हो जाते हैं। सामाजिक कार्यों मे लगे, सामन्यतः गैर राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय कार्यकर्ताओं के लिए यह चिरंतन संभ्रम बना रहता है कि इस सक्रियता में योगदान करें अथवा नहीं और करें तो किस प्रकार से करें? भारत के वर्तमान परिदृश्य में सरकारी व्यवस्था से अछूता रहना लगभग असंभव है। जीवन के हर क्षेत्र में शासन का हस्तक्षेप है। माना कि ये स्थिति आदर्श नहीं है और विदेशी दासता के अवांछनीय अवशेष के रुप मे विद्यमान है किंतु यह भी नकारा नही जा सकता कि यह वास्तविकता है।

स्वतंत्रता पश्चात् हमने लोकतंत्र को राजनैतीक व्यवस्था के रुप मे स्वीकार किया। भारत के संविधान ने जनता को सर्वोपरि सार्वभौम सत्ता के केन्द्र के रुप के प्रतिष्ठित किया। अपेक्षा थी कि लोकतांत्रिक व्यवस्था इस धारणा को सृदृढ कर प्रत्यक्ष मे उतारती किन्तु प्रतिनिधिक लोकतंत्र के जिस स्वरुप को हमने भारत में अपनाया उसने समाज को जोडने के स्थान पर विघटित करने का ही काम किया। सर्वाधिक मत पाने वाले प्रत्याशी के विजय की व्यवस्था के कारण सबसे बडे गुट का प्रतिनिधि ही जनप्रतिनिधि कहलाया जाता है। बहुदलीय व्यवस्था के अंतर्गत चुनाव क्षेत्र मे अनेक प्रत्याशी होते हैं। जिसको सर्वाधिक मत प्राप्त होते हैं उसे विजयी घोषित कर दिया जाता है। इस व्यवस्था ने ऐसी हास्यास्पद विडम्बना की स्थिति उत्पन्न कर दी है कि कई स्थानो पर 15% से कम मत प्राप्त करने वाले प्रत्याशी भी जनप्रतिनिधि के रुप मे चुने जाते हैं। वास्तव मे देखा जाए तो डाले गए मतों मे से 85% से अधिक मतदाताओं ने इस नेता को प्रतिनिधि के रुप मे नकार दिया फिर भी सबसे बडे गुट का नेता होने के कारण वह उन 85% लोगो का भी प्रतिनिधि कहलाया जाता हैं। यह स्वाभाविक ही था कि राजनीतिक दलों ने अपने निहित स्वार्थ के लिए व्यवस्था की इस कमजोरी का उपयोग किया।

EVMजाति, वर्ग, भाषा आदि जो भी समाज को तोडने के माध्यम मिले उनके द्वारा अपने गुट को सबसे बडा सिद्ध करने का प्रयत्न किया जाने लगा। क्षेत्रीय दलों के उभार ने रणनीति को और आगे बढ़ाकर अपने सीमित समर्थन को बड़ा बनाने के लिए बाकी बचे समाज को छोटे छोटे टुकड़ों में खंडित करने का काम किया। यदि किसी नेता या दल के पास जाति अथवा ऐसे ही किसी आधार पर 100 मे से 20 मतदाताओं का समर्थन है तो उसने भिन्न-भिन्न तरीकों से समाज के बाकी बचे 80 मतदाताओं को इतने टुकडों मे बाँटने का काम किया कि कोई गुट उसके गुट से बड़ा न हो जाए। विभाजनकारी राजनीति ने स्वतंत्रता के 66 वर्षों के पश्चात भी भारत की सुप्त क्षमता को प्रकट नहीं होने दिया है। आज विश्व मे चहुँ ओर सभी देश भारत के सामथ्र्य की सराहना करते हैं। जिनके मन मे मित्रता नही है वे भारत के उभरने की संभावना से आशंकित रहते हैं। किंतु इस राष्ट्र के सामथ्र्य-सूर्य को विघटनकारी राजनीति का ग्रहण लगा है। भारत में राष्ट्र पुनर्निर्माण के कार्य को यदि पूर्ण गति प्रदान करनी है व व्यवस्थागत प्रतिष्ठा दिलानी है तो उसके लिए राजनीति के विभाजक तंत्र को बदलना आवश्यक है। इसके बिना बाकी सारे प्रयास छलनी मे पानी भरने के समान निष्प्रभावी हो जाते हैं।

व्यवस्था  परिवर्तन इसका स्थायी समाधान है।First past the post ’सर्वाधिक मत पानेवाला विजयी’ इस व्यवस्था के स्थान पर प्रत्यक्ष एवं पूर्ण लोकतंत्रकारी ECव्यवस्था ‘बहुसंख्य का समर्थन’ ‘Mojority representation’ की व्यवस्था को लागू करना होगा। इसके अंतर्गत किसी भी चुनाव में जीतने के लिए डाले गए कुल मतों में से 50 प्रतिशत से कम से कम एक मत अधिक पानेवाला व्यक्ति ही विजयी घोषित होगा। ऐसी स्थिति में समर्थन करने वाले मतदाताओं की संख्या नकारने वाले मतदाताओं से निश्चित ही अधिक होगी। तब चुना हुआ नेता सच्चे अर्थ में क्षेत्र का प्रतिनिधि होगा। इस व्यवस्था को लागू करने मे अनेक आक्षेप व कठिनाइयाँ गिनाई जाती है किन्तु राजनीति को राष्ट्रीय एकात्मता के लिए बाध्य करने के लिए यही चिरस्थायी उपाय है। विश्व के अनेक देशों में इसी व्यवस्था के अंतर्गत चुनाव होते है। भारत से भी भौगोलिक रुप से विस्तृत व आबादी में भी लगभग बराबरी के रशिया में भी सभी आम चुनाव इसी विधि से होते हैं। यदि किसी चुनाव क्षेत्र में प्रथम चरण के मतदान में किसी को भी 50% से अधिक मत नही प्राप्त होते हैं तो प्रथम व द्वितीय स्थान पर रहने वाले प्रत्याशियों के मध्य दूसरे दिन पुनः मतदान कराया जाता है। अपने आप किसी न किसी को 50% से अधिक मत मिलेंगे ही। प्रायः ऐसा देखा गया है दूसरे चरण के मतदान की आवश्यकता ही नही पड़ती। इस व्यवस्था में स्वाभाविक रुप से ही प्रत्येक दल ऐसे प्रत्याशी का चयन करता है जिसे समाज के भिन्न-भिन्न वर्गों का समर्थन मिल सके। गुटीय हितों के स्थान पर सामूहिक हित चुनावी मुद्दे बन जाते हैं। क्षेत्रीयता, साम्प्रदायिकता, जातीयता आदि चुनाव जिताने के लिए सक्षम नही होते। अतः राष्ट्रीयता, एकात्मता, एकता, समरसता यह विषय अधिक प्रभावी होते हैं।

मन में यह प्रश्न आना स्वाभाविक है कि जब तक यह व्यवस्था परिवर्तन नही हो जाता तब तक राष्ट्रवाद का चुनावी राजनीति में कोई स्थान ही नहीं? वास्तव में बात बिल्कुल इसके विपरीत है जब तक संपूर्ण एवं प्रभावी लोकतंत्र के रुप मे बहुसंख्या का प्रतिनिधित्व यह नियम लागू नही होता तब तक राजनीति के द्वारा समाज के विभाजन को रोकने का एकमात्र उपाय है ’राष्ट्रवादी राजनीति’। जातीयता, साम्प्रदायिक तुष्टीकरण, वर्गवाद, धनबल तथा बाहुबल आदि लोकतंत्र के असाध्य विकारों को ठीक करने का एकमात्र उपाय है – ’चुनावी रणभूमी मे राष्ट्रवाद का शंखनाद’। राष्ट्र का हित, राष्ट्र की संस्कृती, राष्ट्रीय परंपरायें, राष्ट्रीय जीवनध्येय इन पर आधारित नीतियों को महत्व देनेवाले दल एवं नेता का जब समाज स्वयंस्फूर्त समर्थन करने लगेगा तब अन्य सभी संकुचित स्वार्थों पर आधारित विघटनकारी मुद्दे गौण हो जायेंगे। समाज में काम कर रहे प्रत्येक सामाजिक कार्यकर्ता का यह कर्तव्य बन जाता है कि ऐसे राष्ट्रवादी वातावरण का जागरण करें।

bharatmataलोकतंत्र के महत्वपूर्ण स्तंभ प्रसार माध्यमों का भी कर्तव्य बन जाता है कि विघटनकारी मुद्दों को महत्व देने के स्थान पर जोडनेवाले एकात्मता को बढावा देने वालें विषयों, नेताओं तथा दलों का अधिक प्रचार दें। धन के द्वारा क्रय की हुयी प्रसिद्धी के आधार पर समाज को तोडनेवाले नेताओं व दलों को सबक सिखाने का काम राष्ट्रकार्य के रुप में प्रसार माध्यमों को भी करना होगा। पेड न्यूज के द्वारा माध्यमों का धनबल के आगे समर्पण लोकतंत्र के विनाश का कारण बन रहा है। भारत एक निर्णायक दौर से गुजर रहा है। वैश्विक परिदृश्य में अवसर की जो एक छोटी सी खिडकी खुली है उसका यदि निर्णायक उपयोग करना है तो आज राष्ट्र को सुदृढ, सक्षम व निःस्वार्थ नेतृत्व की आवश्यकता है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ही ऐसे नेतृत्व को जन्म एवं पोषण दे सकता है। पश्चिम में राष्ट्रवाद की अवधारणा राजैनतिक व आर्थिक है। इस कारण से वह राष्ट्रों के मध्य प्रतिस्पर्धा को जन्म देती है। इस प्रतिस्पर्धा का रुपांतरण बाजारी शोषण, शस्त्र स्पर्धा व अंततः युद्धों में भी होता है। द्वितीय महायुद्ध में सारे विश्व पर युद्ध की विभीषिका थोपने वाल हिटलर ने भी जर्मन राष्ट्रवाद के नारे का ही तात्विक आधार लिया था। उसके बाद से अंतरराष्ट्रीय विमर्श में राष्ट्रवाद एक घृणित एवं निन्दनीय पद बन गया है। भारत में भी साम्यवादी व समाजवादी विचार को पोषित करनेवाले विचारकों ने इसी पश्चिमी दृष्टि से प्रभावित होकर राष्ट्रवाद की घोर आलोचना की है। इसे संकुचित, तानाशाही व फासिस्ट जैसे संबोधनों से पुकारा है। इस कारण सामान्य बुद्धिजीवी भी राष्ट्रवाद के प्रति सकारात्मक विचार नही रखते किन्तु भारत में राष्ट्रवाद की संकल्पना कतई आर्थिक अथवा राजनैतिक नहीं है। भारत में यह मूलतः आध्यात्मिक व व्यवहार में सांस्कृतिक विचार है। आर्थिक व राजनैति राष्ट्रवाद जहाँ भौगोलिक सीमाओं और बाजारी प्रतिस्पर्धाओं के कारण विभाजनकारी बन जाता है वहीं दूसरी ओर आध्यात्मिक, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद व्यक्ति से परिवार, समाज से आगे राष्ट्र तक मन के विस्तार का माध्यम होने के कारण एकात्मदृष्टि का विकास करता है। स्वाभाविक ही यह राष्ट्रवाद विस्तार की अगली सीढ़ी के रुप में मानवता को देखता हैं। अतः इस राष्ट्रवाद में राष्ट्रहित के साथ ही विश्वहित व उससे भी परे सृष्टि का हित भी निहित है। यह राष्ट्रवाद तोडता नही जोड़ता है।

जाति, पंथ, सम्प्रदाय, वर्ग, भाषा, क्षेत्र आदि के द्वारा विभिन्न वादों का निर्माण कर चल रहे समाज विघटन के तांडव को यदि रोकना है तो सभी को मिलकर एक ही उद्घोष करना होगा कि ‘राष्ट्र सर्वोपरि है’। मेरे व्यक्तिगत, पारिवारिक, क्षे़त्रीय, सामाजिक, पांथिक, साम्प्रदायिक अथवा प्रांतीय हितों से अधिक महत्वपूर्ण राष्ट्रहित हैं। इस विचार को अपने हर कार्य मे अभिव्यक्त करना होगा। चुनाव में आग्रह पूर्वक सहभागी होना, मतदाताओं का पंजीयन करना अधिक से अधिक लोगों को सकारात्मक मतदान के लिए प्रेरित करना, दलों व नेताओं को राष्ट्रहित के मुद्दों पर विचार एवं बात करने के लिए विवश करना यह हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य है। आइए! लोकतंत्र के महोत्सव में राष्ट्रवाद के उजास को प्रकाशित करने का संकल्प लें।

नवम्बर 29, 2013 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , | 1 टिप्पणी

परिवर्तन का मत


बहुप्रतिक्षित चुनाव परिणाम आ गये। कहीं भी कोई आश्चर्य नहीं रहा। 24 घण्टें कुछ ना कुछ परोसने की मजबुरी में समाचार माध्यम कुछ ना कुछ विश्लेषण करेंगे ही। संविधान की भावना व भाषा के विपरित पंथ व जाति की चर्चा तथाकथित विशेषज्ञ बड़ी निर्लज्जता से करते है। राजनेताओं को जनता में गुट बनाबनाकर उनके मत पाने है अतः वे पंथ, जाति आदि आधार पर घोषणायें कर प्रचार करते है यह तो समझा जा सकता है किन्तु समाचार वाहिनियों के सुत्रधारों, अंग्रेजी में तो इन्हें लंगर कहते है, तथा उनके साथ चर्चा करने के लिये एकत्रित ‘विशेषज्ञों’ की क्या अनिवार्यता हे जो वे इन विभाजनकारी तत्वों के आधार पर चुनाव का विश्लेषण करते है? उत्तर प्रदेश में स्पष्ट बहुमत पानेवाली स पा के युवा नेता अखिलेश यादव ने बड़ी प्रगल्भता के साथ पहली पत्रकार परिषद में जनता का आभार मानते हुए स्पष्ट किया कि ‘‘हमें जनता ने जाति, पंथ (भैयाजी ने तो धर्म ही कहा था) से उपर उठकर समर्थन दिया है।’’ पर तथाकथित विशेषज्ञ कहाँ मानने वाले? वे तो अभी तक रट लगा रहे है कि साम्प्रदायित मतों के ध्रुवीकरण के कारण ही उ प्र में स पा को विजय प्राप्त हुई। आशा है कि अखिलेश यादव अपने पिता के विपरित, साम्प्रदायिकता व आपराधिक बाहुबल के स्थान पर विकासोन्मुखी राजनीति करेंगे।

समाचार माध्यमों की रट ने काँग्रेस को भी अपनी हार के लिये कारण मिल गया। जिन वाहिनियों ने प्रतिदिन काँग्रेस के बाबा को अवास्तव महत्व दिया था वे काँग्रेस की करारी हार को नहीं पचा पा रहे थे। वे और काँग्रेस के अंतहीन नेता हार के लिये अपने युवराज के बचपने को छोड़ कर और सभी कारण ढ़ुंढ़ने में लगे है। इसमे फिर साम्प्रदायिक विलेषण से उनके लिये अच्छा अवसर मिल गया। सलमान खुर्शीद जिनकी पत्नि ना केवल चुनाव हारी अपितु तीसरे क्रमांक पर रही, बिना किसी लाग लपेट के कॅमेरा के सामने कह रहे थे कि ‘‘मुस्लिम आरक्षण की हमारी रणनीति बिल्कुल ठीक थी। स पा को भी विजय इन्हीं के भरोसे मिली है।’’ चुनावों को साम्प्रदायिक बनाने के बावजूद पूर्णतः सपाट हो जाने के बाद भी इस प्रकार की विघटनकारी वृत्ति राष्ट्रद्रोह ही कही जा सकती है।

यदि सभी राज्यों के परिणामों को एकसाथ देखा जाये तो देश के मूड़ का भान हो सकता है। देश परिवर्तन चाहता है। अधुरे परिवर्तन से समाज को संतुष्टि नहीं है। आज जनता परिणामकारी परिवर्तन चाहती है। अतः जहाँ विकल्प स्पष्ट था वहाँ जनता ने पूर्ण परिवर्तन कर दिखाया। भ्रष्ट सरकारों को जनता सबक सीखाना चाहती है। सब जगह इसी इच्छा से सभी राज्यों में मतदान का प्रतिशत भी अधिक रहा है। भले ही चुनाव विधानसभा के हो, लोगों का केन्द्र सरकार के प्रति आक्रोश मतदान में व्यक्त हुआ है। पंजाब व उत्तराखण्ड में राज्य सरकारों के विरूद्ध परिवर्तन की हवा को केन्द्र सरकार के प्रति आक्रोश ने काटा। जिसके कारण आसन्न दलों को पूर्णतः हटाया नहीं जा सका। उत्तर प्रदेश के समान गैर काँग्रेसी विकल्प होता तो पंजाब व उत्तराखण्ड में भी उ प्र व गोवा के समान ही परिवर्तन दिख सकता था।

जनता की इस परिवर्तन की मनिषा को समझे बिना किसी भी दल के लिये आगामी राज्य चुनावों अथवा कभी भी सम्भव लोकसभा चुनावों के लिये प्रभावी रणनीति बनाना सम्भव नहीं है। जनता भ्रष्ट, निकृष्ट शासन से उब चुकी है। व्यवस्था की शिथिलता, अप्रामाणिकता तथा प्रभावहीनता ने देश की समस्त क्षमताओं को ग्रहण लगा रखा है। इन बातों से देश का युवा त्रस्त है। अतः वह उस दल को चुनना चाहता है जिसमें उसे परिवर्तन की सम्भावना दिखाई देती है। गत वर्ष तामिलनाडु व पश्चिम बंगाल में भी यही भाव जनता ने व्यक्त किया। अतः जो व्यवस्था परिवर्तन के पक्ष में समाज का अभिमत बना है उसे चुनावी मतदान में रूपांतरित करना हो तो केवल जाति पाति के गणित बिठाकर काम नहीं चलेगा। अपनी भावी नीति को ठीक से रेखांकित करना होगा। केवल सत्तासीन पक्ष की आलोचना से काम नहीं चलेगा अपितु व्यवस्था के परिक्षालन की, पूर्ण परिवर्तन की अपनी योजना भी समाज के सम्मूख रखनी होगी। वर्तमान केन्द्र सरकार ने अक्षमता, भ्रष्टाचार व अनिर्णय के समस्त कीर्तिमान तोड़ दिये है। किन्तु केवल उसकी नीतियों की आलोचना भर करने से काम नहीं चलेगा।

काँग्रेस नीत सं प्र ग के विरूद्ध जनता की हवा तो इस बात से ही स्पष्ट है कि शासनविरोधी लहर तथा एकमात्र विकल्प होने के बावजूद पंजाब व उत्तराखण्ड में वह पूर्ण बहूमत नहीं पा सकी है। आगामी विधानसभा चुनावों में अधिकतर राज्य भाजपा शासित हैं। शासन के विरूद्ध जो अभिमत होगा उसका लाभ उठाने में काँग्रेस तभी सफल हो पायेगी जब वो केन्द्र में भ्रष्टाचार व महंगाई जैसे जनता से जुड़े मुद्दों पर कुछ कारवाई करती हुई दिखाई दें। अन्यथा धीरे धीरे इन राज्यों में भी क्षेत्रीय दलों की शक्ति उभर सकती है। वैश्विक स्तर पर भारत की सम्भावनाओं को देखते हुए राष्ट्रहित में केन्द्र में सशक्त सरकार की अनिवार्यता है। यदि अनेक क्षेत्रीय दलों पर निर्भर गठबन्धन पुनः केन्द्र में शासन में आता है तो ऐसी स्थिति में आगामी 5 वर्ष बड़े ही कठीन होंगे। भारत के सम्मूख विश्वमंच पर प्रभावी भूमिका के लिये खुल रहे अवसर के द्वार अधिक समय तक खुले रहेंगे ऐसा नहीं है। यदि समर्थ सरकार की अनुपस्थिति के कारण भारत यह अवसर खो देता है तो ऐसे में फिर ऐसी अनुकूल स्थितियाँ बनने में दशकों का समय लग जायेगा। अतः 2013 या 2014 जब भी अगले साधारण चुनाव हो भारत को एक दल के सशक्त शासन के लिये प्रयासरत होना चाहिये।
वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में भा ज  पा व काँग्रेस ही ऐसे विकल्प है जो एकदलीय स्थिर सरकार दे सकने की स्थिति में है। काँग्रेस की नीतियों की विफलता के कारण उसके विरूद्ध जनमत को देखते हुए यह दायित्व भा ज पा पर अधिक है। गठबन्धन की राजनीति के साथ ही स्वयं के बूते पर 250 सांसद चुनने का लक्ष्य लेकर काम करने की आवश्यकता है। अभी तो इस दल के संसद के दोनों सदनों के नेता भी मिड़िया में खुली चर्चा में 160-170 के आंकड़े गिनाते दिखाई देते है। जबकि अब तक 302 ऐसे निर्वाचन क्षेत्र है जहाँ कभी ना कभी भा ज पा के सांसद चुनाव जीत चूके हैं। ऐसे में परिवर्तन की हवा में सही प्रकार से प्रयास करने पर 250 स्थानों पर विजय प्राप्त करना बहुत असम्भव स्वप्न नहीं है। किन्तु वर्तमान चुनाव परिणामों से सही सबक सीख कर इस ओर तेयारी करने के लिये बहुत अधिक समय नहीं बचा है। साम्प्रदायिकता के आधार पर चुनाव जीतने की तकनिक गत 3-4 चुनावों से स्वयं को सेक्यूलर कहलाने वाले दलों ने विकसित की है। यह देशविघातक तकनिक तभी कारगर होती है जब बाकि मतों का जाति आधारित विभाजन होता है। यदि भा ज पा अपनी मूल राष्ट्रवादी विचारधारा पर बनीं रहती है तब ही जाति से उपर उठकर मतों को पाने की सम्भावना हो सकती है। प्रचार माध्यमों द्वारा हिन्दुत्व, भगवा आदि संकीर्ण नामों से सम्बोधित कर कुख्यात किये जाने के भय से अपनी मूल विचारधारा को छोड़ने का ही परिणाम है कि उ प्र में परिवर्तन के मत को भा ज पा अपने पक्ष में नहीं कर सकी। मिड़िया के कहने से अपने प्रचारक तय करने की भूल अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की साम्प्रदायिकता को अवसर प्रदान करती है। यदि जाति, पंथ के उपर उठकर देशहित का आहवान करना है तो राष्ट्रहित की बात करने में आक्रमक आग्रह आवश्यक होगा।

इसके साथ ही केवल आलोचना के स्थान पर पर्यायी व्यवस्था का खाका प्रस्तुत करने की क्षमता भी इस राष्ट्रवादी विचारधारा में है। स्वतन्त्रता से लेकर अब तक हमने विदेशी विचार पर आधारित व्यवस्था को ही अपनाया है। नीतिनिर्धारण में 1991 से पूर्व रूस प्रेरित समाजवाद तथा 1991 के भूमण्डलीकरण के दौर से पश्चिम का अन्धानुकरण हमारी सरकारों ने किया है। भारत की विशिष्ठ आवश्यकताओं के अनुरूप भारत की अपनी व्यवस्था निर्माण का प्रयास किया ही नहीं गया। वैचारिक स्तर पर भी इस प्रकार के मौलिक चिंतन का अभाव रहा है। गांधी व पं दीनदयाल उपाध्याय ने क्रमशः सर्वोदय व अन्त्योदय के लक्ष्य को सामने रखते हुए लोकहितकारी शासन तथा राजव्यवस्था की शुद्ध भारतीय वैचारिक पृष्ठभूमि दी थी। आज इन दोनों की ही थाती भा ज पा की पैतृक विचारधारा ने ही जीवित रखी है। राज्यों में इस विचारधारा पर आधरित विकास व सुशासन के प्रादर्श माॅड़ेल खड़े करने का दावा करने के साथ ही पूरे देश के लिये एक देशज, प्रभावी व्यवस्था का खाका प्रस्तुत कर चुनाव लड़ने से ही आगामी समय में समाज का समर्थन मिल सकेगा।

भारत में चुनाव जीतने के लिये भाव जागरण तो आवश्यक ही है साथ ही प्रत्यक्ष धरातल पर परिणामकारी व्यवस्था की खातरी ;ळनंतंदजममद्ध भी। देश को सांस्कृतिक आधार पर एकत्र करनेवाले आह्वान का भावजागरण व भावी सुशासन की योजना इन दो ध्रुवों पर ही परिवर्तन का मत अपने पक्ष में किया जा सकेगा। जो भी दल इस प्रकार का विश्वास देनें में सक्षम होगा वहीं देश को अत्यावश्यक समर्थ, सक्षम व स्थिर शासन प्रदान कर सकेगा। अन्यथा जनता में परिवर्तन प्रज्वलित आकांक्षा क्षेत्रशः भिन्न भिन्न आधार पाकर प्रगट होगी व विपरित विचार व विरोधी हितों से परिचालित दलों के गुटबंदी में देश का भावी पुनः भटक जायेगा।

मार्च 9, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , | 3 टिप्पणियाँ

   

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