उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

COME AND ROUSE THE ARJUNA WITHIN


There has been an eternal battle between the Dharma and the Adharma. It has been occurring since the era of the Mahabharata. The selfish people whose allegiance was towards  some individuals, rallied in the Kaurava army, for the fulfillment of their ulterior motives. Even the valiant Bhishma Pitamaha, who was endowed with a noble thoughts and an impeccable character got constrained by the shackles of his personal oath and joins the army of Adharma. Guru Dronacharya who had been encumbered by the onus of the illusory gratitude towards the Kauravas, while blessing Yudishtara, nevertheless got influenced by his allegiance and formulated a strategy of creating a Chakravyuha. On the other hand the army fighting for the Dharma, was also wrought with personal ambitions, oaths and vengeance. Everyone was not fighting for attaining a common goal. Then what was the difference between them. Were the Pandavas on the side of the Dharma and the Kauravas against it? Was it because they were seeking retribution for the injustice meted out to them?  Were they avenging the dishonour done to Draupadi? No…

bhagawadgitaThe side of the Pandavas becomes associated with Dharma only due to the charioteer, Lord Krishna. His message of Dharma converts the family feud into a battle of Dharma. The battle in Mahabharata would have remained a struggle between two brothers in the absence of Geeta, at the start of the battle. The exhortation of the Karma, is a ceaseless message for the establishment of the Dharma. All our personal objectives get elevated to a noble level, by the benediction of the Geeta. They serve as contrivances for establishing Dharma. The gist of the Dharma is shrouded in the first and the last word of the Geeta. The first shloka is spoken by Dhritarashtra whose attachment for his son, is the fundamental reason for this war. ‘ धर्म षेत्रे कुरु क्षेत्रे ‘. Dharma is the first word. The last shloka of the Geeta is uttered by the first clairvoyant correspondent of known history. यत्र योगेश्वरो कृष्ण यत्र पार्थो धनुर्धरः | तत्र श्री विजयी भूति धृवा नीतिर्मतिर्मम || The last word is मम[ me]. The subject of Geeta is मम धर्म- my Dharma-Swadharma. Geeta instructs on what is to be done in any circumstances. Geeta guides us into metamorphosing our individual-centric thoughts into holistic thoughts.

Everything which has come into existence has a definite objective. The creation of lifeless objects by the human race, even has a objective. The most expensive car, cannot be even regarded as a vehicle, meant for own transportation. It is made for ferrying the driver and the other passengers to their destination. The chair is made so as to perform the function of making others comfortable. It does not seek its own comfort. When all these objects have been created for serving others, when their existence has a definite  objective, how can the human race that deem itself to be the most superior of all the living beings, be selfish? This is caused by lack of self consciousness. Arjuna was also afflicted by this ailment, at the beginning of the Geeta. He got completely overwhelmed by the sorrow of the imminent death of his loved ones, due to his illusion of regarding the battle as a means for fulfilling his personal interests.

vikalpThe entire world has presently, got deluded about his self-consciousness. As his vision has got dazzled by the external glitz and glamour, he has lost the identity of the truth. This identity crisis is the root cause of all the trouble tension, crime, violence, communalism, terrorism and robbery in the world. Man is trying to escape from himself. The increasing importance of ostentation in worship indicates this tendency of escapism. The religion propounded by the descendants of Abraham has been regarding their strife for augmenting their political hegemony and numerical preponderance, as a battle for Dharma and   shading human blood for the last few centuries. The fallacy of regarding the environment as a means for fulfilling the vested interests is also responsible for this delusion about the self consciousness. All this is propelling the world to a cataclysmic culmination. The Mahabharata also witnessed this kind of catastrophe. Geeta imparted relevance to the battle. Hence Dharma was established after the war and sublime peace which gave joy to all reigned for various eras and attained a lofty reputation.

Geeta is alive even today. Yogeshwar Krishna is eager to guide us even today. Are we ready to rouse the spirit of Arjuna. Arjuna attained his disciple hood in the  seventh shloka of the second chapter. शिष्यस्तेहम शाधि माम् त्वां प्रपन्नं After accepting our drawbacks and attaining disciple hood, Geeta will manifest itself. Are we prepared for this?

दिसम्बर 3, 2014 Posted by | सामायिक टिपण्णी, English Posts | , , , , , , , , | 1 टिप्पणी

अंग भी पूर्ण है


गढ़े जीवन अपना अपना -4
एक बार शरीर के सारे अंगों में विवाद हो गया। पांव कहने कहने लगे ‘हम ही श्रेष्ठ है। हमारे आधार पर ही तो सारा शरीर खड़ा होता है।’ हाथ कहने लगे ‘हम तो सारा काम करते है। हमारे कार्य से ही कमाई होती है। कमाई से पोषण। हम ही सर्वश्रेष्ठ है।’ पेट ने अपना तर्क दिया ‘मैं भोजन ना पचाऊ तो सबकी बैटरी डाऊन हो जाएगी।’ हृदय ने कहा, ‘मैं धड़कना बन्द कर दूं क्या?’ मस्तिष्क कह उठा ‘सब मेरे नियत्रंण से ही संचालित होता है। मैं ही सबका राजा हूं।’ फेफड़ों ने कहा कुछ नहीं एक क्षण रूक गये। श्वास रूकी और सब परेशान। सारे अंग अपनी-अपनी श्रेष्ठता साबित करने में लग गये। कहानी का अंत तो लेखक ने किया आत्मा के विधान द्वारा आत्मा घर छोड़ जाने लगी तो सबकी शक्ति क्षीण हो गई। सब कहने लगे आत्मा ही श्रेष्ठ है क्योंकि इसके बिना तो किसी का कोई अस्तित्व ही नहीं है। किन्तु आत्मा ने कहा ‘आप सभी अपने आप में श्रेष्ठ हो। प्रत्येक अपने अपने कार्य में श्रेष्ठ है। सब अपना कार्य व्यवस्थित करेंगे। तभी शरीर अपना काम कर सकेगा।’ अंगों का कार्य तथा ध्येय पूरे शरीर के अनुरूप होगा तभी उसका महत्व है। शरीर को जहां जाना है पैरों को उसी दिशा में चलना होगा। अन्यथा पैरों का कार्य निरर्थक ही होगा। अंगों की सार्थकता पूरे शरीर के लक्ष्य-पूर्ति में हैं।
अब हम स्वयं को देखें। हमारा अपना एक सर्वश्रेष्ठ भाव है। जैसे पैरों का कार्य हाथ नहीं कर सकते वैसे यदि हम अपने स्वभाव एवं क्षमता के अनुसार जीवन ध्येय चुनेंगे तो सहज सफलता प्राप्त होगी। हमारी क्षमता व रूचि का मेल होता है उसी के अनुसार हमें काम में आनन्द आता है। पूर्व में जो वर्णव्यवस्था थी वह इसी प्रकार गुण-कर्म पर आधारित थी। आज भी यदि हम अपना जीवनध्येय वैज्ञानिक तरीके से तय करना चाहते है तो हमें अपने स्वभाव का वर्ण पहचानना होगा। हमें आनन्द यदि सेवा में आता है तो उसके अनुसार हमें जीवनध्येय चुनना होगा। यदि हमें लाभ प्राप्ति में रस आता है तो हम व्यापारादि उत्पादक कार्यों में अपना जीवनध्येय तय कर सकते है। शारीरिक बल अथवा नेतृत्व में सहजता से रमनेवाले व्यक्ति को रक्षासेवा, प्रशासनिक सेवा अथवा राजनैतिक सेवा का चयन करना उपयोगी होगा। अन्ततः यदि अध्ययन, अनुसंधान या कला संगीत में रूचि हो उसके अनुसार जीवनध्येय बनाने से सहज सफलता मिलेगी।
इस विचार के बाद भी एक बात बच ही जाती है। केवल अपने स्वभाव एवं शक्ति का निर्णय कर लेने से काम नहीं चलेगा। समग्रता से भी विचार करना होगा। जैसे हाथ-पांव आदि हमारे शरीर के अंग है उसी प्रकार हम भी तो राष्ट्रपुरूष के अंग है। भारतमाता के हम अंग है अतः हमारा जीवनध्येय मां भारती के जीवनधर्म के अनुकुल होगा तब ही वह उपयोगी होगा। स्वामी विवेकानन्द कहते है कि भारत का जीवनध्येय (मिशन) है विश्व का मार्गदर्शन करना। हम भारत को विश्वगुरू के पद पर आसीन देखना चाहते है। हमारा जीवनध्येय, कर्म और व्यवसाय चुनते समय हम यदि इस बात का ध्यान रखे तो हमारी सफलता राष्ट्र-सेवा का माध्यम बनेगी और यह भाव कर्म की विशेष प्रेरणा देगा।

एक और बात…
व्यावसायिक लक्ष्य को ही जीवनध्येय न मान बैठे। प्रतिवर्ष लाखों छात्र पीईटी, पीएमटी अथवा आईआईटी की प्रतियोगी परीक्षा में बैठते है। कुछ ही सफल होते है। असफलता छात्र निराशा व हताशा के शिकार हो जाते है। हमने इंजिनियर व डाॅक्टर बनने के व्यावसायिक लक्ष्य को ही जीवनध्येय मान लिया है। व्यवसाय तो साधन है। हमें मुम्बई जाना है। रेल के आरक्षण की लाईन में लगे है। आरक्षण नहीं मिला तो क्या जाना रूक जाएगा? किसी और साधन से चले जाएंगे। हमें अपना ध्येय स्पष्ट होना चाहिए फिर साधन पाने की सफलता अथवा असफलता से निराशा नहीं होगी। डॉक्टर बनना, सीए बनना तो साधन है साध्य अलग-अलग हो सकते है। एक डॉक्टर बनकर सेवा करना चाहता है, दुसरा पैसा कमाना, कोई नया अनुसंधान करना। यदि ध्येय स्पष्ट है तो पी एम टी में असफल रहने पर भी सेवा करने, पैसा कमाने अथवा अनुसंधान करने के वैकल्पिक रास्तों पर विचार किया जा सकता है। दूसरी ओर ध्येय स्पष्ट नहीं हो और केवल भेड़चाल में व्यवसायिक लक्ष्य प्राप्त भी कर लिया तब भी जीवन में संतोष नहीं मिल पाएगा। अतः व्यावसायिक लक्ष्यप्राप्ति पर चिंतन करते समय ही उसके द्वारा प्राप्त करने के जीवनध्येय पर भी ध्यान दें। दोनों स्पष्ट हो जाने पर राह सुगम और आनन्दमय हो जाती है।
एक व्यक्ति ने घर पहूंचकर अपनी पत्नि को कहा, ‘आज मैंने पांच रुपये बचाये।’ ‘कैसे?’ ‘मैं बस के पीछे दौड़ता चला आया।’ पत्नि ने कहा, ‘कल टैक्सी के पीछे दौड़कर आना पच्चीस रुपये बचेंगे।’
साधन का मूल्य सुविधा नहीं, पहुंचना है। क्या बड़े व्यवसाय के पीछे भागकर ज्यादा लाभ मिलेगा? उसी प्रकार एक बार ध्येय, मार्ग और वाहन तीनों का चयन कर लेने के बाद फिर जल्दबाजी या तनाव का क्या काम? रेल गाड़ी में चढ़ जाने के बाद भी यदि कोई अपना सामान सिर पर उठाये रखे तो उसे क्या कहेंगे? या फिर कोई रेल में चढ़ने के बाद भी इंजिन की दिशा में दौड़ता रहे तो क्या जल्दी पहुंच जाएगा?

अक्टूबर 28, 2011 Posted by | आलेख | , , , | 2 टिप्पणियाँ

   

%d bloggers like this: