उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

प्रसार माध्यम भी कहे – ‘पहले भारत!’


newshourयह बहस का विषय है की प्रसार माध्यम और पत्रकारिता समाज के दर्पण के रूप में काम करे या उनपर समाज के प्रबोधन का दायित्व हो? वर्तमान में प्रसार माध्यम गंदगी को परोसते समय यह तर्क देते है की समाज यही देखना/पढ़ना चाहता है | वैसे तो यह कुतर्क ही है और इसकी सत्यता को भी प्रमाणित नहीं किया जा सकता | समाज में फूहड़ पत्र-पत्रिकाओं की पाठकसंख्या कुछ हजार ही होगी वहीं दूसरी ओर ‘अखंड ज्योति’ जैसी धार्मिक पत्रिकाएँ लाखों की संख्या में प्रकाशित, मुद्रित व वितरित होती है | चित्रवाहिनियों (Channels) में भी आस्था, संस्कार जैसे धार्मिक वाहिनियों की दर्शकसंख्या MTV या iTunes जैसी दिनभर फूहड़ गाने बजानेवाली वाहिनियों से कई गुना अधिक है| फिर भी प्रसार माध्यम कहते है की ‘जो बिकता है वही छपता है’ | तर्क के लिए यह बात मान भी ली जाये की समाज अश्लीलता को देखना-पढ़ना चाहता है | तब हमारे पास यह प्रश्न उठता है कि प्रसार माध्यम और उनमें काम करनेवाले पत्रकारों का नैतिक, सामाजिक व राष्ट्रीय दायित्व क्या है?

स्वतंत्रतापूर्व राष्ट्रीय आंदोलन में पत्रकारिता राष्ट्रजागरण व जनप्रबोधन का माध्यम बनी | लगभग सभी राष्ट्रीय नेताओं ने या तो समाचारपत्र चलाये या किसी न किसी पत्र-पत्रिका में कार्य किया | लोकमान्य तिलक द्वारा प्रारंभ किये गए ‘केसरी’ और ‘मराठा’ राष्ट्रीय आंदोलन के महत्वपूर्ण आधार रहे | महात्मा गाँधी ने भी ‘Young India’ व ‘हरिजन’ को जनप्रबोधन का माध्यम बनाया | अरविंद घोष ने भी राष्ट्रीय आंदोलन का प्रारंभ ‘वंदे मातरम्’ इस पत्र के संपादन द्वारा किया | ऐसे और भी कई उदाहरण दिए जा सकते है जहा पत्रकारिता क्रांति की मशाल बन गयी | गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे राष्ट्रनायक भी पत्रकारिता की ही देन है | स्वतंत्र भारत में भी आपातकाल की तानाशाही का विरोध करने के लिए जयप्रकाश नारायण की समग्र क्रांति का साथ रामनाथ गोयनका ने Indian Express समूह के माध्यम से दिया | अरुण शौरी, एस. गुरुमूर्ति जैसे पत्रकारों ने इस राष्ट्रधर्म का निर्वाह आगे भी किया |

आज भी अनेक स्तंभलेखक पत्रकारिता को प्रबोधन का माध्यम मानकर लेखनकर्म करते है किंतु मुख्यधारा की पत्रकारिता ने यह भाव खो दिया है | 24 घंटे की समाचारवाहिनियों ने सतत ख़बरों की खोज के चलते पत्रकारिता के स्तरों को नित्य नूतन नीचाइयों के दर्शन कराए है | हमारे समाचार देने से समाज पर उसका क्या असर होगा इसका विचार शायद ही कोई पत्रकार करता है | केवल एक अंधी प्रतियोगिता में नकारात्मक समाचार लेखन/चित्रण की दौड़ चल पड़ी है | कई बार सारे तथ्य जाने बिना ही सनसनी के रूप में समाचार दिए जाते है | अनेक बार तो अच्छी बातों को भी नकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया जाता है | नवरात्रि के दिनों में एक समाचार चला कि अहमदाबाद के सरकारी अस्पताल ने राज्य के स्वास्थ्य मंत्री के कार्यक्रम के बाद डॉक्टरों और नर्सों ने गरबा किया | लगभग सभी समाचारवाहिनियों ने इसे नकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया | स्वास्थ्य मंत्री से भी प्रश्न पूछे गए और उन्होंने भी पूछताछ करने का आदेश दे दिया तथा दोषी कर्मचारियों पर कारवाई करने का आश्वासन भी | यह माध्यमों की ताकत है | किन्तु, जब तथ्य सामने आये तो वे चौंकानेवाले थे | एक अत्यंत सकारात्मक पहल के रूप में यह कार्यक्रम आयोजित हुआ था | घुटना प्रत्यारोपण (knee replacement) के बारे में समाज में जागृति लाने हेतु यह आयोजन था | गरबा करनेवाले सभी लोग ऐसे थे जिनके घुटने बदले जा चुके थे और इस शस्त्रक्रिया के बाद आप सामान्य जीवन जी सकते है इस बात का संदेश देने के लिए गरबा के सांस्कृतिक कार्यक्रम का प्रयोग किया गया था | वास्तव में इस घटना में सकारात्मक समाचार छुपा हुआ है किंतु सनसनी खोजने की जल्दबाजी में हर बात का नकारात्मक चित्रण करना ही हमारा पत्रकारधर्म है ऐसा मानकर यह उल्टा काम हुआ |

समाचार किस बात में है यह समझना पत्रकार का पहला धर्म है | नए पत्रकारों को सिखाते समय यह समझाया जाता है कि पत्रकार की नाक तेज होनी चाहिए | सड़क पर घटित होनेवाली सामान्य घटना में भी समाचार सूंघने की शक्ति पत्रकार में होती है | वही सच्चे अर्थ में पत्रकार है | किंतु, इसके साथ ही यह भी समझाया जाता है कि हर घटना समाचार नहीं होती | सामान्य से हटकर कोई बात हो तब ही वह समाचार की श्रेणी में आती है | सामान्यतः दिया जानेवाला उदाहरण है कि कुत्ता यदि मनुष्य को काटे तो समाचार नहीं बनता किन्तु यदि मनुष्य कुत्ते को काटे तो समाचार है क्योंकि यह असामान्य घटना है | असामान्यत्व के इस उदाहरण में ही इतनी नकारात्मकता छिपी हुई है कि पत्रकार का स्वभाव ही बन जाता है कि हर बात में उल्टा समाचार ही ढूंढे | जिस प्रकार गिद्ध को ऊँचे आकाश में विहार करते हुए नीचे के सुन्दर दृश्य में और कुछ नहीं दिखाई पड़ता, केवल शव ही दिखाई देता है, सडी हुई लाश हो तो और पहले दिखाई देती है, उसी प्रकार वर्तमान मीडियाकर्मी समाज में से सडांध को ढूंढकर समाज के सामने प्रस्तुत करना अपना कर्तव्य मान बैठे हैं | समाज में हो रहे सकारात्मक कार्य उनके दृष्टिपथ में ही नहीं आते | जबकि ऐसी अनेक असामान्य किन्तु अनुकरणीय घटनायें, कार्य समाज में चल रहे है | समाचार उन सकारात्मक बातों में भी छिपा है और जब कभी ऐसी बातें समाज के सामने प्रस्तुत की जाती है तो उनका बहुत अधिक स्वागत एवं सराहना होती है | समाज जो देखना चाहता है वह परोसने की बात करनेवाले माध्यम इस पर ध्यान नहीं देते |

वास्तविकता में मनुष्य की दृष्टि उसके उद्देश पर निर्भर करती है | अतः समाचारमाध्यमों के उद्देश पर विचार करना आवश्यक है | ‘केसरी’, ‘मराठा’ या ‘वंदे मातरम्’ जैसे समाचारपत्रों का उद्देश ही स्वतंत्रता आंदोलन था | अतः उसमें कार्य करनेवाले पत्रकारों की दृष्टि भी उसी प्रकार से थी | वर्तमान में प्रसारमाध्यमों को भी व्यापारिक दृष्टिकोण से ही देखा जा रहा है | जिसके कारण पत्रकारों का दृष्टिकोण भी व्यापारिक हो गया है | पत्रकारिता अब व्रत (mission) नहीं रहा | अब उसे व्यवसाय (profession) के रूप में देखा जाने लगा है | इस स्थिति को राष्ट्रभाव के जागरण से ही बदला जा सकता है | जब हर बात में राष्ट्रहित महत्वपूर्ण हो जायेगा तो समाचार लिखनेवाले पत्रकार से लेकर उसे संपादित करनेवाले संपादक और माध्यमों के कर्ताधर्ता स्वामियों में भी दृष्टिपरिवर्तन संभव होगा | जिन्हें यह अत्यंत आदर्शवादी व अव्यावहारिक बात लगती है उनके लिए वर्तमान समय के एक अत्यंत विकसित राष्ट्र का उदाहरण दिया जाना उचित होगा| डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की आत्मकथा में एक प्रसंग आता है | वे किसी संगोष्ठी हेतु इजराइल गए थे | तेल-अवीव में जिस होटल में वे रुके थे उसी पर आतंकवादी हमला हुआ | विस्फोटकों से भरा हुआ ट्रक लेकर आतंकवादी होटल की दीवार से टकरायें | विस्फोट के बाद सड़क पर लाशें बिछी हुई थी | ऊपर होटल के कमरे से इस दृश्य को देखकर डॉ. कलाम ने सोचा की कल सुबह सभी समाचारपत्रों के मुखपृष्ठ पर यही तस्वीरें दिखाई देंगी | किंतु उन्हें आश्चर्य तब हुआ जब दूसरे दिन के किसी भी समाचारपत्र में मुखपृष्ठ पर न तो घृणित तस्वीरें थी न ही इस समाचार ने कोई स्थान पाया था | सभी समाचारपत्रों के 12वे से 15वे पृष्ठ पर एक छोटीसी घटना के रूप में इस समाचार का वर्णन किया गया था और मुखपृष्ठ पर – देश के कोने में एक छोटेसे गाँव के किसान ने सिंचाई में नए प्रयोग द्वारा गन्ने का विक्रमी उत्पादन किया – यह समाचार उस किसान की हंसती हुई तस्वीर के साथ प्रमुखता से प्रकाशित था |

‘अग्निपंख’ (Wings of Fire) पुस्तक में इस प्रसंग को पढ़ने के बाद इस बात पर खोजबीन की कि ऐसा कैसे संभव है ? क्या इजराइल में कोई कानून है जो समाचारपत्रों को सकारात्मक समाचार प्रमुखता से प्रकाशित करने के लिए विवश करता है ? ऐसा कोई कानून नहीं है, ना ही कोई विवशता | वहाँ की शिक्षा पद्धति प्रत्येक नागरिक को देशभक्ति का ऐसा पाठ पढ़ाती है की वह किसी भी व्यवसाय में हो, देश उसके लिए सर्वोपरि है | व्यवसाय से चिकित्सक भी स्वेच्छा से वर्ष में कुछ माह सीमा पर जाकर सुरक्षा का कार्य करता है | हर व्यक्ति को आयु के 12 वर्ष पूर्ण करते ही 2 साल का सैनिकी प्रशिक्षण दिया जाता है | इसलिए वे अपनेआप को देश के सिपाही ही मानते है | बातचीत में भी यह सुनने को मिल सकता है की ‘मैं देश का सिपाही पहले, प्रोफेसर बाद में; सिपाही पहले और पत्रकार बाद में हूँ |’ जब ऐसा राष्ट्रीय भाव हो तब अपनेआप ही आतंकवादी गतिविधियों की खबर प्रमुखता नहीं पायेगी | हमारे देश में भी सेना व पुलिस नहीं चाहती की अपराधियों का महिमामंडन हो | यदि पत्रकार/मीडियाकर्मी स्वयं को सैनिक मानने लगे तो वह समाचारों को उसी दृष्टि से देखने लगेगा फिर घटना का समाज के मन पर और राष्ट्र के मानस पर होनेवाला परिणाम प्रमुख स्थान निश्चित करेगा |

अमेरिका जैसे घोर व्यापारिक देश में भी, समाचार माध्यमों के बीच गलाकाट प्रतिस्पर्धा होने के बाद भी, राष्ट्रहित का ध्यान रखा जाता है | न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर आतंकी हमले के बाद 2 साल तक मलबा हटाया नहीं जा सका किंतु अमेरिका की किसी समाचारवाहिनी ने यह बात विश्व के सामने नहीं रखी | ना ही कोई पत्रकार माइक लेकर न्यूयॉर्क के महापौर के पीछे भागा कि ‘देश जानना चाहता है कि मलबा अभी तक साफ़ क्यों नहीं हुआ?’ समस्त सांस्कृतिक, आर्थिक एवं सामाजिक खामियों के बावजूद अमेरिका के शक्तिशाली होने का सबसे महत्वपूर्ण कारण नागरिकों की देशभक्ति है | इसके मूल में है शिक्षा | केवल 500 साल का इतिहास होते हुए भी वे अपने प्रत्येक नागरिक को बचपन से ही उसपर गर्व करना सिखाते है | दुनियाभर के देशों के प्रवासी लाखों की संख्या में प्रतिवर्ष अमेरिकी नागरिकता के लिए प्रयास करते है | उन सभी को अमेरिका का इतिहास पढ़ना पड़ता है, परीक्षा देनी होती है | तभी नागरिकता प्राप्त होती है |

पत्रकारिता को राष्ट्रीयता का माध्यम तब बनाया जा सकता है जब हमारी शिक्षा राष्ट्रगौरव और राष्ट्रीयता का निर्माण नागरिकों में करने लगे | वर्तमान समय में परेशानी यह है कि हमारी आज की पत्रकारिता शिक्षा में इस प्रकार के परिवर्तनों के प्रयास को भी नकारात्मक रूप से प्रचारित करेगी | क्या कोई सोच सकता है कि विद्यालयों में ‘सुबह उठकर माता-पिता के चरण छूना’ यह शिक्षा देना सांप्रदायिकता है ? किंतु ऐसा भारत में हुआ | जब गुजरात सरकार ने दीनानाथ बत्रा जी की बालकों को संस्कारित करनेवाली पुस्तकें सह-पठन के लिए प्रकाशित करवाकर सरकारी विद्यालयों में वितरित की तब देश के प्रमुख अंग्रेजी समाचारपत्रों ने इसे घोर राष्ट्रद्रोही कदम के रूप में प्रचारित किया |

अतः शिक्षा बदले ना बदले, कुछ पत्रकारों को तो बदलना होगा| सकारात्मक समाचारों को सुव्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करना होगा | ग्वालियर में जब सूर्यनमस्कार का गिनीज विश्वविक्रम बना तब 4 पृष्ठों में उसकी खबर छापनेवाले संपादक मित्र ने टिप्पणी की थी, “अच्छी बातों को समाचार बनने के लिए बहुत प्रयत्न करने पड़ते है| 150 कार्यकर्ताओं द्वारा 6 माह तक 350 विद्यालयों में प्रशिक्षण के महान परिश्रम के कारण यह अच्छा समाचार तयार हुआ|” संपादक मित्र को जो उस समय उत्तर दिया था वह आज भी प्रासंगिक है | अच्छे प्रयास समाचार बनने का प्रयत्न तो छोड़ो, स्वप्न भी नहीं देखते | सच्चा पत्रकार ऐसे प्रयासों को ढूंढकर उन्हें समाचार बना देता है | अच्छे काम तो समाज में हो ही रहे है | पर आज के वातावरण में उन्हें समाचार बनने में प्रयास करना पड़ रहा है | इजराइल जैसी राष्ट्रीय पत्रकारिता भले ही भारत के लिए अभी दूर हो किंतु हमारे पत्रकार इतना काम तो कर ही सकते है कि अच्छी खबरों को प्रयत्नपूर्वक खोजकर समाज के सामने लाये | संपादक व प्रसारमाध्यमों के स्वामी ऐसे पत्रकारों को प्रोत्साहन दे, कम से कम प्रतिरोध तो ना करे | देश में राष्ट्रीय पत्रकारिता का अगला चरण होगा जब पत्रकार, संपादक व स्वामी देश में घटनेवाली नकारात्मक घटनाओं का चित्रण करते समय भी राष्ट्रहित का ध्यान रखेंगे | तब प्रसारमाध्यमों के लिए भी राष्ट्र सर्वोपरि होगा |

प्रसारमाध्यम ऐसी अगुवाई करेंगे तो उनके साथ ही देश का हर व्यवसायी, हर नागरिक अपने नीजी हित के पहले सोचने लगेगा – ‘पहले भारत!’

नवम्बर 3, 2015 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , | 1 टिप्पणी

Look beyond political controversy, Yoga is for all


Another Post as a precursor to IYD. This piece was written for bharatniti.in giving it here for the blog followers.

http://www.bharatniti.in/story/look-beyond-political-controversy-yoga-is-for-all/44

IYD

Yoga has been accepted universally as a discipline of moulding one’s own life to active overall well-being, accepting it as a way of life beyond faith, worship or religious dogmas. The same was evident when more than 170 countries across five continents unanimously supported the resolution for declaring June 21 as the International Day of Yoga at the General Assembly of the UNO.

IYD LogoMany of them proposed or seconded it without any voting or discussion. In fact, many of the Islamic countries too supported the resolution. Yoga is being practiced by people beyond the religious beliefs.

On this background of universal consensus, it is ironical that the decision of the central government to celebrate the International Day of Yoga all over the country is being opposed on religious grounds by some misguided elements. When the whole world is unanimous about the universal appeal of Yoga, it is a shame that this great science of living is being subjected to controversy in the land of its origin.

Social media is full of photographs of members of different communities performing Yogic exercises. The universal acceptance of Yoga is very much witnessed across different communities in India.

Controversy more of political concoction than popular

The present fabricated controversy over the celebration of the International Day of Yoga is the result of intolerant minds. Yoga is a science which demands experiments and experiences and does not ask one to believe or un-believe anything. The performance of Yoga does not affect any belief systems. If at all it will enhance ones capacity to have undeterred in one’s own beliefs. Yoga is necessarily an Bharatiya philosophy as it was first compiled in this holy land and has all the attributes of Sanatana Dharma because it was practiced, experimented and evolved into different systems by generations of Hindus. But it still is a universally applicable science of life and the art of living.

The practice of Yoga will not swerve the individual from his personal religious beliefs. It will also not make him antagonistic to his or any other religion but will, on the contrary, augment his affection for his personal deity. The practice of Yoga will not proselytize a Muslim or a Christian, but will on the contrary make him a better adherent of his faiths. Thus, no one should be afraid of Yoga as it includes all and excludes none.

So what is Yoga actually?

Yoga is beyond a mere physical exercise. In fact, Yoga is neither mere physical exercise nor is it just a therapy. As per the ancient traditions, it is a way of scientific living. A modern being may find it hard to comprehend but the mind is the prime factor of all our actions in life. And yoga is nothing but the training of the mind. Thus it (yoga) enables perfection in every action at all levels. The whole universe functions in disciplined manner. There are laws of existence which govern the natural phenomena irrespective of any subjective intervention. The only exception to this smooth governance of the universe are human beings.

The humans are endowed with the will to act and the power of imagination. The combination of these two have created all the scientific wonders. Like all kinds of powers, this also needs regulation. If uncontrolled, power becomes corrupt and boon is converted into a curse. This is true at individual as well as collective level.

Sage Patanjali, in his Yoga aphorisms, initiates with a simple statement – ath yoga anushasanam [Thus we begin the discipline of Yoga.] The aim of all the yogic practices right from Asanas, Suryanamaskara, Pranayamas up to Dhyana [meditation] and Samadhi is disciplining the mind. If the mind is concentrated, anything and everything can be accomplished.

Yoga is the way of orienting the mental powers to one’s aim. The conflicts and clashes in the world are a result of intolerance born out of lack of coordination among one’s own multiple roles. There are various schools of Yoga and they have different practices.

There are several variants of the same Yogic practice. Some well- meaning noble Acharyas even tried to standardize yogic practices. This futile effort has not succeeded as diversity is an inherent feature of existence. Everything that exists is unique in its form, function and role. Yoga not only takes into account this diverse uniqueness but also enriches the extraordinary individuality of the seeker, the performer. At the same time, yoga helps the sadhaka (practitioner, the doer) to realize the underlying oneness behind the apparent diversity.

So, whatever be the practice, if the mind is tuned properly with a synchronized awareness and relaxation, it integrates one with all. Essence is not in the action but in the intent. Yoga literally means union. Every practice that enables the mind to expand and unite the different levels of collectivity is Yoga. Yoga gives quietude, peace and harmony to the individual mind and if performed regularly by a sizable portion of the humanity, will spread this peace and harmony to the cosmic world.

One can say with full conviction that the mass performance of various Yoga practices on the historic occasion of the International Day of Yoga on June 21 will definitely lead to conflict free and harmonious world.

जून 18, 2015 Posted by | सामायिक टिपण्णी, English Posts | , , , , , , , , , , , , , , , , , , , | 2 टिप्पणियाँ

let us untie the knots


Krishna - New forever 02There are three basic principles of pedagogy or Educational Methodology- Near to Far, Known to unknown and subtle to gross. The student should be provided education about what is close to him, before imparting the education about matters related to the distant. The range has to be gradually increased in this order and finally we can reach the level of the entire creation and the universe. Second principle is that the spectrum of the knowledge from the unknown to the known should be used as a basis for the gradual acquisition of the knowledge. The third principle of education is to proceed from the subtle to the gross. These basic principles are not being followed in the present system of education. This is the cause of the education becoming dry, weary and complicated. We can not develop sukshm pragya [subtle insight] by teaching the laws of the gross, materialistic world. It will become easy for us to understand the characteristics of the gross after assimilating the subtle thoughts and their subsequent reflections and discussions.

Bhagwan Sri Krishna elucidates this method in the Bhagwad-Geeta. He challenges the Kshatriya Dharma of Arjuna, for impugning the grieved state of Arjuna. He touches the topic which is closest to the heart of Arjuna and advises him, not to succumb to the state of unmanliness as it does not befit you. Sri Krishna refers to topics like Swarga [heaven] and Kirti [reputation] and admonishes Arjuna for his unheavenly and disgraceful behaviour. It meant that the action of Arjuna would keep him away from heaven as well bring ignominy to him. Due to the onslaught on his grief struck mind, Arjuna recognizes the cowardice brewing in his mind. As a result of the parochial nature of his mental state, he could detect the sorrow and cowardice overwhelming his mind. Earlier in the first chapter Arjuna not only supports his escapism but also ennobles it. He justifies it being in accordance with Dharma. The intellectual hypocrisy of  Arjuna crumbles after the assailing treatment by Sri Krishna and his mind craves for the acceptance of the truth. The first step in the direction of disciplehood is the readiness of the mind to accept the truth. “कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः ||” The mind which has become afflicted with the guilt consciousness of cowardice gets deluded about what is Dharma and what is adharma. I cannot understand the difference between the two and so I am asking you’.

The voice which always points out our flaws, is eternally alive within us. It always points out all our weaknesses. However we ignore it as we are overwhelmed with our conceit. The mind gradually gets into the habit of justifying all our inanities and ennobling our habits. It develops into a psychological complex and gradually evolves as our ‘alter ego’. If any friend or well wisher brings that to our attention, we feel insulted. The mind cannot accept any exhortation as long as that knot is not untied. We have to untie our knots in the presence of the Guru. The Guru introduces us to our knots. But we only have to loosen and untie them. An experiment in the form of a game played by children in the camps, makes this matter clear. A child is told to close his fist, while another is told to open it. In spite of trying very hard, the child can not open the fists of the other person. Then the instructor says that he would utter a mantra and the fist would get opened. The teacher says something in the ear of the student and his fist gets opened in the very next attempt. Everyone gets surprised as to what mantra it is. The mantra given by the teacher is simply that ‘ When he tries to open your fist, you open it’.

The lesson conveyed through the game is that as long we do not desire, no other person can open our fist. The knotsBG vishvrup of the mind are like that. They cannot be opened by the efforts of some other person. They have to be opened very gently by us. After Arjuna becomes the disciple of Lord Krishna, he is blessed with the vision of his Universal form, which is the subtlest knowledge in the world. The message of the Geeta starts with the immortality of the Self while its final objective was to inspire Arjuna for performing his Karma and duties. Sri Krishna commences his elucidation about the immortal, eternal self so that Arjuna acquires the knowledge of the most gross duty related to the battlefield.  This is the best method of teaching. Nowadays we have regarded the subtlest knowledge as belonging to the domain of spiritualism and are distancing education from it. The syllabi have become completely mundane, in the name of practicality. But efficient behaviour is possible only after understanding the subtlest knowledge.

Arjuna was not ready to proceed on the path of his duty even after listening to the logical exhortations about Gyan [knowledge], Bhakti [devotion], Karma [action] and the highly sublime Raja Yoga. He asks numerous questions which are beautifully answered by Lord Krishna but finds himself incapable of forsaking his attachment. Then Lord Krishna blesses him with a vision of his cosmic form. Only the vision of his cosmic form will dispel all the doubts. This is the final knowledge. The Geeta gives the true message of the dedication to the Virata [cosmic form]. Arjuna gets not only confounded but also terrified by this cosmic vision. Arjuna, with folded hands tells Sri Krishna, ”I used to regard you as my friend and due to the lack of knowledge, did not behave properly with you”. This friendly affinity was in fact the foundation of Arjuna’s disciplehood. Krishna is our friend also. When we recognize him as our friend, he blesses us with a vision of his cosmic form. We shall be able to discern the sacredness present in each particle and the immanent divinity in every creature. This will enable us to march fearlessly on the path of our duty.

Come, let us untie the knots of our mind and become the disciple as well as the friend of Lord Krishna.

दिसम्बर 11, 2014 Posted by | सामायिक टिपण्णी, English Posts | , , , , , , , , , , | टिप्पणी करे

Call for Rebooting Education System


TNIEThe New Indian Express deserves congratulations for publishing the series ‘Think Edu Conclave’. The articles by Amita Sharma in the 4th March issue [page 9], and that of  Dr. S. Vaidhyasubramaniam  in the issue of 11th March [page 7] both are really commendable.

Amita Sharma has given very comprehensive overview of the work going on in various IIT’s in the field of research in ancient Bhartiya knowledge system. Her approach towards this subject is very logical and scientific. Without unduly glorifying the traditional achievements of Bharatiya scientists from time immemorial, she emphasises the need of indepth study of their works. Her concluding point appeals to the intellectual mind to come out of dogmatic thinking in terms of binaries such as traditional and modern,  eastern and western and to integrate whole knowledge system for the betterment of humanity.

It has been understood in Bharat that knowledge has no boundaries. “आ नो भद्र: क्रतवो यन्तु विश्वत:” Bharat has been traditionally an open society where knowldge and wisdom are welcomed from all the frontiers. The only purpose of knowledge as per Bharatiya tradition has been the search of inherent oneness- truth and it’s applications for the good of whole humanity. Hence, as beautifully elaborated by Dr. S. Vaidhyasubramaniam in his piece, the traditional knowledge system in Bharat had been widespread and well evolved even in the first decades of 19th century.  

dharmapalDr. S. Vaidhyasubramaniam has extensively quoted from the seminal work of Shri Dharmpal. The data given in Dharmpal’s ‘One Beautiful Tree’ from the primary sources of British surveys is an eyey opener for all of us. It is indeed tragic that this great knowledge has not been made part of formal curriculum even after being in public domain for more than five decades now. read dharmapal here – http://www.samanvaya.com/dharampal/

Both the accomplished authors lament the fact that Bharatiya traditional knowledge system has been neglected completely by the formal education system in independent India. It is indeed hightime that we in Bharat take the revolutionary step of integrating our own indegeneous knowledge system in the main stream education policy. Whole world is facing similar problems in the field of education. Right kind of methodolgy for elementary education is an area of concern for both developed and developing countries. We have the advantage of having a deep rooted cultural background in evolving decentralised, need based, socially self-sufficient education system. We have done so for centuries together. With this genetic advantage we can provide a panacea to the universal problems of complementry education system; with the use of modern technology blended with traditional methodology. This is the paradigm shift called for by both the learned authors.

There is a hope that the atmosphere for complete change in the country auguers well to this much needed systemic change in the field of education right from primary to higher education.

See the original article in TNIE here

http://www.newindianexpress.com/opinion/Designing-Integrated-Knowledge-Systems/2014/03/04/article2088788.ece

 

http://www.newindianexpress.com/nation/Reboot-Indian-Primary-Education/2014/03/11/article2101794.ece

Both of them were speaker at the event 

http://www.newindianexpress.com/nation/Indian-Educators-Ignorant-of-Countrys-Academic-Contributions-to-West/2014/01/30/article2028717.ece

मार्च 14, 2014 Posted by | सामायिक टिपण्णी, English Posts | , , , , , , , , | टिप्पणी करे

स्वावलम्बी युवा! समर्थ भारत!!


sawarkarस्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर को किसी युवा ने पूछा कि आप युवा किस कहते है? भाषा शुद्धिकरण के आन्दोलन को चलाते हुए भारतीय भाषाओं को अनेक नवरचित शब्दों का योगदान देनेवाले महान भाषाशास्त्री सावरकर ने उत्तर दिया, “पद को उलटा करके देखो तो उसका अर्थ स्पष्ट हो जाता है। युवा का प्रतिशब्द है – ‘वायु’। जैसे अनुशासनहीन वायु प्रभंजन के रुप में जीवन का नाश करता है किन्तु जब प्राणायाम से अनुशासित हो जाता है तब वही वायु प्राणदाता बन जाता है। वैसे ही युवा हैं। अनुशासित हो तो राष्ट्र का प्राण और अनुशासनहीन होकर किसी भी व्यवस्था के लिए असाध्य चुनौती।”

आज भारत की 62% जनसंख्या युवा है। जनगणना के आंकड़ों के अनुसार 13 से 45 के मध्य आयुवाले युवाओें की संख्या कुल 125 करोड की आबादी के 62% अर्थात 75 करोड से ऊपर है। किसी भी राष्ट्र के लिए यह अत्यंत गर्व के साथ ही आर्थिक विकास के प्रचंड अवसरों का विषय है। साथ ही चुनौती भी कि इस असाधारण शक्ति का समुचित सदुपयोग हो। अन्यथा अनियंत्रित होने से यही ऊर्जा राष्ट्र विघातक विस्फोटक का कार्य भी कर सकती है। ऊर्जा को बलपूर्वक नियंत्रित नहीं किया जा सकता। जबरदस्ती अथवा दबाव से तो वह और अधिक विध्वंसक बन जाती है जैसे डटे हुए सेफ्टी वाल्व वाले प्रेशर कुकर में भांफ। ऊर्जा के अनुशासित नियोजन का सर्वोत्तम तरीका है उसका सुव्यवस्थित परिचालन। ऊर्जा को सही दिशा में किसी ध्येय की ओर कार्य में लगा देना ही उसका सदुपयोग है। वर्तमान समय में भारतीय समाज के पास अपनी युवाशक्ति को सम्यक ध्येय के साथ सही दिशा की ओर कार्यरत करने की महती चुनौती हैं।

स्वंतत्रता के बाद सबसे बडी विकृती सारे समाज मे व्याप्त हुयी है वह है – शासनावलम्बिता। हम छोटे से छोटे कार्य के लिए भी सरकार का मुँह ताकते हैं। घर में सफाई करने के बाद सरकारी सडक पर सरेआम कचरा फेंकने वाले सभ्य नागरिक स्थानीय शासन से अपेक्षा करते हैं कि नगर में सफाई एवं सौन्दर्य का ध्यान रखें। इसी परावलंबी मानसिकता के कारण ‘युवा भारत‘ के सुनियोजन का दायित्व भी हम लोग सरकार को ही दे बैठे हैं। शासन का नीति निर्धारण इस दिशा में हो इस दृष्टि से आवश्यक मंथन व चिंतन समाज के प्रबुद्ध वर्ग मे होता दिखाई नही देता है। समाज द्वारा वैचारिक अधिष्ठान प्रदान किए बिना शासन की कोई भी नीति कारगर सिद्ध नही होती। अतः युवाओं के ऊर्जा प्रबंधन का दायित्व युवा वर्ग ही सामुहिक रुप से संगठित हो उठायें तो वह प्रभावी एवं परिणामकारी होगा। राष्ट्रनिर्माण का दायित्व शासन का नहीं, समाज का है। समाज जब इस उत्तरदायित्व का निर्वाह करने लगता है तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में ही नहीं राजतंत्र में भी शासन ऐसे प्रबुद्ध समाज का अनुगामी बनने लिए बाध्य हो जाता है।

स्वानुशासन से ऊर्जा का सुनियोजन करने हेतु युवाओं में संकल्प का जागरण करना आवश्यक है। वर्तमान शिक्षाप्रणाली के चलते पनपी मानसिक दासता के कारण आज का युवा स्वावलंबन के स्वप्न भी नही देखता। देश की सर्वोच्च प्रतिभा के अत्युच्च स्वप्न किसी सरकारी, निजी अथवा बहुराष्ट्रीय ऊपक्रम में नौकरी पाना हो गये हैं। प्रतिवर्ष लाखों युवा कुछ हजार सरकारी नौकरियों के लिए प्रतिस्पर्धा परीक्षा में अपनी ऊर्जा को व्यय करते हैं। सबसे प्रतिष्ठित प्रशासकीय नौकरी भारतीय प्रशासनिक सेवा की प्रथम परीक्षा में बैठने हेतु साढे पाँच लाख से अधिक युवा पंजीयन कराते हैं किन्तु उसमे से आधे ही परीक्षा मे बैठते हैं। इनमे सें 13,14 हजार ही मुख्य परीक्षा के लिए पात्र हो पाते और इनमें अंतिम सफलता 800 से 900 परीक्षार्थिओं को ही मिलती है। अर्थात प्रतिवर्ष बडी मात्रा में असफल युवाओं के झुंड़ का निर्माण यह प्रतियोगी परीक्षा करती है। इन असफल युवाओं के साथ ही अन्य नौकरियों के आकांक्षियों को मिलाकर लगभग 90 लाख परीक्षार्थी बैंक, रेल्वे, बीमा आदि अर्द्ध सरकारी नौकरियों के लिए ली जानेवाली प्रतियोगिता परीक्षाओं में बैठते हैं। इनमें से कुछ हजार नौकरी पा भी जाते हैं। उपलब्ध रिक्त स्थान व उसके लिए प्रयत्नरत परीक्षार्थिओं के मध्य यह अत्यंत विसंगत अनुपात समाज की दासता का घोतक है। पूरा समाज ही गुलामी के लिए उत्सुक है। इसका मुख्य कारण यह है कि समाज मे सरकारी नौकरी को गैर अनुपातिक प्रतिष्ठा प्राप्त है। ज्ञान, योग्यता और परिश्रम वा परिणाम में प्रशासनिक सेवा के अधिकारी समाज में बिलकुल भी अग्रणी नहीं हैं किन्तु सम्मान मे इनका स्थान लगभग सर्वोच्च हैं। इस दिखावे की प्रतिष्ठाा के लिये ही इतने युवा असफलता की आशंका के होते हुए भी नौकरी के लिये प्रयासरत रहते है।

नौकरियों के इस परिदृश्य का अत्यंत विद्रुप पहलू यह भी है कि सेना की तीनों शाखाओं मे लगभग 15000 अफसरों के स्थान इस कारण से रिक्त है क्योंकि सुयोग्य युवा उस ओर आकर्षित नही हो रहें। सामान्य सिपाही की भरती के लिए हजारों की भीड़ लग जाती है किन्तु सें संकल्पित अधिकारियों के स्थान योग्य युवाओं की तलाश मे रिक्त रह जाते हैं। किसी भी राष्ट्र की शिक्षा व्यवस्था के यह प्रेरणाहीन परिदृष्य चिन्ता का विषय होना चाहिए। इस महान गौरवशाली राष्ट्र की युवा शक्ति को राष्ट्र निर्माण करने हेतु आत्मनिर्भर बनना होगा। अपने स्वभाव के अनुरुप परिश्रम के द्वारा उद्योग के नवनिर्माण का आत्मविश्वास जब युवाओं मे जग जाता है तब वह रोजगार के लिए दूसरों की ओर नही ताकता।

ऊर्जा प्रबंधन में विकेन्द्रित स्वप्रबंधन ही सर्वोत्तम मार्ग है उसी प्रकार युवा शक्ति के प्रबन्धन हेतु स्थान स्थान पर युवाओं की टोलियाँ संगठित होकर अपने youthपरिश्रम से सृजन के स्वप्न साकार करने लगे। यही 75 करोड युवाओं के सदुपयोग का एकमात्र सुनिश्चित मार्ग है। स्व-रोजगार से ही युवा शक्ति का सम्यक, स्वाभिमानी, उत्पादक प्रयोग हो सकता हैं। कितनी भी सरकारी अथवा निजी नौकरियों का निर्माण करने का उद्यम शासन के केन्द्रीकृत प्रयासों द्वारा किया जाए तब भी यह व्यावहारिक रुप से संभव ही नही है कि किसी देश की 62% जनसंख्या नौकरी करें। हर 100 मे से कम से कम एक युवा नौकरी करने की बजाय नौकरी देने का विचार करने लगे तो यह स्वप्रेरित रोजगार निर्माण ही राष्ट्रनिर्माण का माध्यम बन सकता है।

इस हेतु शिक्षा के साथ ही समाज में पोषक वातावरण का निर्माण भी आवश्यक हैं। उद्यमियो का सम्मान सुप्रतिष्ठित करना होगा। भारतीय संस्कृति में उत्पादक कार्य को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती थी। उत्पादित सामग्री के वितरण, विपणन एवं व्यापार को दुय्यम स्थान था। इस सब आर्थिक व्यवहार के लिए पूरक सेवाओं अर्थात नौकरी को सबसे निकृष्ट माना जाता था। सबसे प्राथमिक उत्पादन तो कृषि में होता है। किसान ही मूल वित्त का निर्माता है। अन्य उद्योग कृषि उत्पाद को रुपांतरित कर सामग्री का निर्माण करते हैं। कृषि के समान ही खनन भी मूल कच्चे माल का उत्पादन करता है किंतु यह कृषि से निम्न हैं क्योंकि खनिजों का भंडार सीमित है एवं पुनर्निर्माण संभव नहीं। कृषि उत्पादन जैविक होने के कारण यदि प्रकृति के समन्वय से कृषि कार्य को किया जाए तो अनंत काल तक असीम उपज संभव हैं। इसीलिए भारत मे कहा गया ‘उत्तम कृषि, मध्यम व्यापार और अधम नौकरी’। इस शुद्ध अर्थशास्त्रीय तत्व की समाज में पुनःप्रतिष्ठा मानवता के अस्तीत्व के लिए अनिवार्य है। आज नौकरी सर्वाधिक प्रतिष्ठित एवं कृषि सर्वाधिक उपेक्षित आर्थिक कार्य हो गया है। प्रतिष्ठा व उत्पादन का यह विपरित संबंध समाज के साथ ही पर्यावरण के भी विघटन एवं विनाश का कारण बन गया है।

youth worldबाह्य रुप से परस्पर विरोधी लगने वाली यह परिस्थिति चुनौती के साथ ही युवा शक्ति को एक अवसर भी प्रदान कर रही है। बडी मात्रा में युवाबल का होना यह सकारात्मक पहलू व परावलंबी नीतियों लगातार चलने के कारण शासनवलंबी विकास के प्रादर्श को अपनाने के कारण आत्मबलहीनता यह दो परस्पर विरोधी तत्व समाज में काम कर रहे हैं। शारीरिक आयु के अनुसार युवा हैं किन्तु युवा का स्वाभाविक उत्साह, आत्मविश्वास व उत्पादक उत्सुकता शासनाभिमुख मानसिकता के कारण सुप्त अथवा मरी हुयी है। शासन में इस युवा शक्ति के सम्यक सदुपयोग की ना तो कोई दृष्टि है न ही व्यावहारिक नीति अतः युवा शक्ति के राजनैतिक दुरूपयोग की संभावना भी क्षीण है। शासन की उदासीनता ने युवा वर्ग को एक प्रकार से स्वनिर्णय व स्वनियोजन की स्वतंत्रता प्रदान कर दी है। आवश्यकता केवल स्वप्रेरणा से उद्यम की है। इसके लिये कुछ व्यावहारिक ठोस उपाय किये जा सकते है।

1. उच्च शिक्षा में पढ रहे युवाओं के मध्य युवाओं के द्वारा ही एक सकारात्मक वैचारिक आंदोलन प्रारंम्भ हो चुका है – Don’t be a job seekar be a job giver  रोजगार माँगो मत रोजगार देनेवाले बनो। सामाजिक प्रसार माध्यम फेसबुक पर इस आंदोलन का जालपृष्ठ Webpage भी है। आवश्यकता है, इस आंदोलन का सब दूर प्रसार कर अधिक से अधिक युवा इसमें जुडे़ं।

2. युवा ही एकत्रित आकर उद्यमिता विकास के प्रकल्प प्रारंभ करें। अनेक सरकारी योजनाओं का लाभ संगठित होकर लिया जा सकता है। कौशल विकास youth logo(Skill development) के माध्यम से स्वरोजगार के अनेक क्षेत्र खुले हैं। निजी सुरक्षा (Private sequrity), खरखाव (House keeping),  पर्यटन (Tourism), घरेलू सेवायें जैसे नल कार्य (Plumbing), बढई (Carpentery), सिलाई (Tailoring), बिजली कार्य (Electrician) आदि के लिए संगठित होकर प्रशिक्षण, प्रचार, विपणन व क्रियान्वयन किया जा सकता है। इन सबके लिए अलग-अलग प्रतिष्ठानों, भागीदारी व्यवसाय (Partenership) अथवा कंपनी का भी गठन किया जा सकता हैं। डा रघुनाथ माशेलकर की अध्यक्षता में कार्य कर रहा राष्ट्रीय कौशल विकास प्राधिकरणNational Skill Development Corporation (NSDC) भी इस कार्य हेतु सहायता प्रदान करता है।

3. सहकारिता के द्वारा युवाओं के नवनवीन उद्यम खोले जा सकते हैं। (National youth co-operative society (NYCS)  इस क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण पहल है।

4. युवाओं के उद्योग को वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए युवा अधिकोष (Youth bank) जैसे प्रकल्पों का प्रारंभ किया जा सकता हैं।youth

5. शिक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण अवसर हैं जिसमें युवा स्वावलंबी व्यवसाय प्रारंभ कर सकते हैं। प्राथमिक विद्यालयों से लेकर निजी मार्गदर्शन (Private coching) और निजी महाविद्यालय तक सभी प्रकार के प्रयास किये जा सकते हैं। कुछ युवाओं को एकत्रित आकर इस दिशा में पहल करनी चाहिये।

6. उत्पादन के क्षेत्र में भी संगठित युवा पहल की आवश्यकता है। जैविक खेती, गो-पालन, मत्स्यपालन, मधुमक्खीपालन, अन्य पशुपालन के क्षेत्र में अवसर उपलब्ध है। आधुनिक प्रसार माध्यमों व तकनीकों का प्रयोग कर इन पारंपारिक व्यवसायों में क्रांति की जा सकती है।

revolution7. समाज सेवाके क्षेत्र में भी युवाओं को समर्पित संगठित प्रयास करने की आवश्यकता है। शिक्षा, चिकित्सा व स्वावलंबन इन तीनों प्रकार के सेवा प्रकल्पों में युवाओं की अत्यधिक आवश्यकता है।

8. ध्येयवादी राष्ट्रीय राजनीति में भी शुद्ध चरित्र के संकल्पबद्ध युवाओं को आगे बढने की आवश्यकता है। राजनीति का अर्थ केवल मंचीय नेतृत्व नहीं है। वास्तव में नेताओं को नीतिओं के बारें में अनुसंधान, अध्ययन कर परामर्श देने वाली टोली की अनिवार्य आवश्यकता है। यह कार्य सुशिक्षित, आधुनिक तकनीक मे तज्ञ युवा ही कर सकते हैं। नीतिगत अनुसंधान, सर्वेक्षण तथा प्रसार यह भी राजनीति का एक अनुंषागिक कार्य है। जिसमें आज बहुत कम लोग लगे हुए हैं। दल-निरपेक्ष राजनीतिक अनुसंधान राष्ट्र के लिये अत्यंत आवश्यक कार्य है। 

भारत एक अतिप्राचीन चिरयुवा राष्ट्र है। समय के प्रवाह के पढकर उसके साथ गतिमान सांस्कृतिक परिवर्तन की लचीली क्षमता ने इस राष्ट्र को कठिन से कठिनतम चुनौतियों के मध्य न केवल जीवित अपितु विजयी बनाये रखा है। काल के प्रवाह में अवसर के कुछ गवाक्ष समय समय पर खुलते हैं। ऐसा ही एक युग परिवर्तन का दौर आज चल रहा है। विश्व भारत से मार्गदर्शन की प्रतीक्षा में है। आइये! ‘युवा भारत’ को उत्पाकद उत्साह से भर दें और यह राष्ट्र अपने चिरयौवन से जगत का जागरण करने के वैश्विक कर्तव्य को पूर्ण करें इस महायज्ञ मे हम अपने जीवन की आहुती प्रदार करें।

दिसम्बर 22, 2013 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , | 3 टिप्पणियाँ

चुनावी रणभूमी मे राष्ट्रवाद का शंखनाद


Republic day2चुनाव लोकतंत्र का महोत्सव है। वर्तमान में चुनाव आयोग द्वारा डाले गये कठोर निर्बंधों के कारण इस महोत्सव का उत्साह कुछ धीमा पड गया दिखता है। जमीनी गतिविधियों का स्थान अब प्रसार माध्यमों के अंदर होनेवाली प्रचार उथल-पुथल ने ले लिया है फिर भी चुनाव का समय सबके लिए ही अतिविशिष्ट सक्रियता का समय होता है। सभी प्रकार के कार्यकर्ता सक्रिय हो जाते हैं। सामाजिक कार्यों मे लगे, सामन्यतः गैर राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय कार्यकर्ताओं के लिए यह चिरंतन संभ्रम बना रहता है कि इस सक्रियता में योगदान करें अथवा नहीं और करें तो किस प्रकार से करें? भारत के वर्तमान परिदृश्य में सरकारी व्यवस्था से अछूता रहना लगभग असंभव है। जीवन के हर क्षेत्र में शासन का हस्तक्षेप है। माना कि ये स्थिति आदर्श नहीं है और विदेशी दासता के अवांछनीय अवशेष के रुप मे विद्यमान है किंतु यह भी नकारा नही जा सकता कि यह वास्तविकता है।

स्वतंत्रता पश्चात् हमने लोकतंत्र को राजनैतीक व्यवस्था के रुप मे स्वीकार किया। भारत के संविधान ने जनता को सर्वोपरि सार्वभौम सत्ता के केन्द्र के रुप के प्रतिष्ठित किया। अपेक्षा थी कि लोकतांत्रिक व्यवस्था इस धारणा को सृदृढ कर प्रत्यक्ष मे उतारती किन्तु प्रतिनिधिक लोकतंत्र के जिस स्वरुप को हमने भारत में अपनाया उसने समाज को जोडने के स्थान पर विघटित करने का ही काम किया। सर्वाधिक मत पाने वाले प्रत्याशी के विजय की व्यवस्था के कारण सबसे बडे गुट का प्रतिनिधि ही जनप्रतिनिधि कहलाया जाता है। बहुदलीय व्यवस्था के अंतर्गत चुनाव क्षेत्र मे अनेक प्रत्याशी होते हैं। जिसको सर्वाधिक मत प्राप्त होते हैं उसे विजयी घोषित कर दिया जाता है। इस व्यवस्था ने ऐसी हास्यास्पद विडम्बना की स्थिति उत्पन्न कर दी है कि कई स्थानो पर 15% से कम मत प्राप्त करने वाले प्रत्याशी भी जनप्रतिनिधि के रुप मे चुने जाते हैं। वास्तव मे देखा जाए तो डाले गए मतों मे से 85% से अधिक मतदाताओं ने इस नेता को प्रतिनिधि के रुप मे नकार दिया फिर भी सबसे बडे गुट का नेता होने के कारण वह उन 85% लोगो का भी प्रतिनिधि कहलाया जाता हैं। यह स्वाभाविक ही था कि राजनीतिक दलों ने अपने निहित स्वार्थ के लिए व्यवस्था की इस कमजोरी का उपयोग किया।

EVMजाति, वर्ग, भाषा आदि जो भी समाज को तोडने के माध्यम मिले उनके द्वारा अपने गुट को सबसे बडा सिद्ध करने का प्रयत्न किया जाने लगा। क्षेत्रीय दलों के उभार ने रणनीति को और आगे बढ़ाकर अपने सीमित समर्थन को बड़ा बनाने के लिए बाकी बचे समाज को छोटे छोटे टुकड़ों में खंडित करने का काम किया। यदि किसी नेता या दल के पास जाति अथवा ऐसे ही किसी आधार पर 100 मे से 20 मतदाताओं का समर्थन है तो उसने भिन्न-भिन्न तरीकों से समाज के बाकी बचे 80 मतदाताओं को इतने टुकडों मे बाँटने का काम किया कि कोई गुट उसके गुट से बड़ा न हो जाए। विभाजनकारी राजनीति ने स्वतंत्रता के 66 वर्षों के पश्चात भी भारत की सुप्त क्षमता को प्रकट नहीं होने दिया है। आज विश्व मे चहुँ ओर सभी देश भारत के सामथ्र्य की सराहना करते हैं। जिनके मन मे मित्रता नही है वे भारत के उभरने की संभावना से आशंकित रहते हैं। किंतु इस राष्ट्र के सामथ्र्य-सूर्य को विघटनकारी राजनीति का ग्रहण लगा है। भारत में राष्ट्र पुनर्निर्माण के कार्य को यदि पूर्ण गति प्रदान करनी है व व्यवस्थागत प्रतिष्ठा दिलानी है तो उसके लिए राजनीति के विभाजक तंत्र को बदलना आवश्यक है। इसके बिना बाकी सारे प्रयास छलनी मे पानी भरने के समान निष्प्रभावी हो जाते हैं।

व्यवस्था  परिवर्तन इसका स्थायी समाधान है।First past the post ’सर्वाधिक मत पानेवाला विजयी’ इस व्यवस्था के स्थान पर प्रत्यक्ष एवं पूर्ण लोकतंत्रकारी ECव्यवस्था ‘बहुसंख्य का समर्थन’ ‘Mojority representation’ की व्यवस्था को लागू करना होगा। इसके अंतर्गत किसी भी चुनाव में जीतने के लिए डाले गए कुल मतों में से 50 प्रतिशत से कम से कम एक मत अधिक पानेवाला व्यक्ति ही विजयी घोषित होगा। ऐसी स्थिति में समर्थन करने वाले मतदाताओं की संख्या नकारने वाले मतदाताओं से निश्चित ही अधिक होगी। तब चुना हुआ नेता सच्चे अर्थ में क्षेत्र का प्रतिनिधि होगा। इस व्यवस्था को लागू करने मे अनेक आक्षेप व कठिनाइयाँ गिनाई जाती है किन्तु राजनीति को राष्ट्रीय एकात्मता के लिए बाध्य करने के लिए यही चिरस्थायी उपाय है। विश्व के अनेक देशों में इसी व्यवस्था के अंतर्गत चुनाव होते है। भारत से भी भौगोलिक रुप से विस्तृत व आबादी में भी लगभग बराबरी के रशिया में भी सभी आम चुनाव इसी विधि से होते हैं। यदि किसी चुनाव क्षेत्र में प्रथम चरण के मतदान में किसी को भी 50% से अधिक मत नही प्राप्त होते हैं तो प्रथम व द्वितीय स्थान पर रहने वाले प्रत्याशियों के मध्य दूसरे दिन पुनः मतदान कराया जाता है। अपने आप किसी न किसी को 50% से अधिक मत मिलेंगे ही। प्रायः ऐसा देखा गया है दूसरे चरण के मतदान की आवश्यकता ही नही पड़ती। इस व्यवस्था में स्वाभाविक रुप से ही प्रत्येक दल ऐसे प्रत्याशी का चयन करता है जिसे समाज के भिन्न-भिन्न वर्गों का समर्थन मिल सके। गुटीय हितों के स्थान पर सामूहिक हित चुनावी मुद्दे बन जाते हैं। क्षेत्रीयता, साम्प्रदायिकता, जातीयता आदि चुनाव जिताने के लिए सक्षम नही होते। अतः राष्ट्रीयता, एकात्मता, एकता, समरसता यह विषय अधिक प्रभावी होते हैं।

मन में यह प्रश्न आना स्वाभाविक है कि जब तक यह व्यवस्था परिवर्तन नही हो जाता तब तक राष्ट्रवाद का चुनावी राजनीति में कोई स्थान ही नहीं? वास्तव में बात बिल्कुल इसके विपरीत है जब तक संपूर्ण एवं प्रभावी लोकतंत्र के रुप मे बहुसंख्या का प्रतिनिधित्व यह नियम लागू नही होता तब तक राजनीति के द्वारा समाज के विभाजन को रोकने का एकमात्र उपाय है ’राष्ट्रवादी राजनीति’। जातीयता, साम्प्रदायिक तुष्टीकरण, वर्गवाद, धनबल तथा बाहुबल आदि लोकतंत्र के असाध्य विकारों को ठीक करने का एकमात्र उपाय है – ’चुनावी रणभूमी मे राष्ट्रवाद का शंखनाद’। राष्ट्र का हित, राष्ट्र की संस्कृती, राष्ट्रीय परंपरायें, राष्ट्रीय जीवनध्येय इन पर आधारित नीतियों को महत्व देनेवाले दल एवं नेता का जब समाज स्वयंस्फूर्त समर्थन करने लगेगा तब अन्य सभी संकुचित स्वार्थों पर आधारित विघटनकारी मुद्दे गौण हो जायेंगे। समाज में काम कर रहे प्रत्येक सामाजिक कार्यकर्ता का यह कर्तव्य बन जाता है कि ऐसे राष्ट्रवादी वातावरण का जागरण करें।

bharatmataलोकतंत्र के महत्वपूर्ण स्तंभ प्रसार माध्यमों का भी कर्तव्य बन जाता है कि विघटनकारी मुद्दों को महत्व देने के स्थान पर जोडनेवाले एकात्मता को बढावा देने वालें विषयों, नेताओं तथा दलों का अधिक प्रचार दें। धन के द्वारा क्रय की हुयी प्रसिद्धी के आधार पर समाज को तोडनेवाले नेताओं व दलों को सबक सिखाने का काम राष्ट्रकार्य के रुप में प्रसार माध्यमों को भी करना होगा। पेड न्यूज के द्वारा माध्यमों का धनबल के आगे समर्पण लोकतंत्र के विनाश का कारण बन रहा है। भारत एक निर्णायक दौर से गुजर रहा है। वैश्विक परिदृश्य में अवसर की जो एक छोटी सी खिडकी खुली है उसका यदि निर्णायक उपयोग करना है तो आज राष्ट्र को सुदृढ, सक्षम व निःस्वार्थ नेतृत्व की आवश्यकता है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ही ऐसे नेतृत्व को जन्म एवं पोषण दे सकता है। पश्चिम में राष्ट्रवाद की अवधारणा राजैनतिक व आर्थिक है। इस कारण से वह राष्ट्रों के मध्य प्रतिस्पर्धा को जन्म देती है। इस प्रतिस्पर्धा का रुपांतरण बाजारी शोषण, शस्त्र स्पर्धा व अंततः युद्धों में भी होता है। द्वितीय महायुद्ध में सारे विश्व पर युद्ध की विभीषिका थोपने वाल हिटलर ने भी जर्मन राष्ट्रवाद के नारे का ही तात्विक आधार लिया था। उसके बाद से अंतरराष्ट्रीय विमर्श में राष्ट्रवाद एक घृणित एवं निन्दनीय पद बन गया है। भारत में भी साम्यवादी व समाजवादी विचार को पोषित करनेवाले विचारकों ने इसी पश्चिमी दृष्टि से प्रभावित होकर राष्ट्रवाद की घोर आलोचना की है। इसे संकुचित, तानाशाही व फासिस्ट जैसे संबोधनों से पुकारा है। इस कारण सामान्य बुद्धिजीवी भी राष्ट्रवाद के प्रति सकारात्मक विचार नही रखते किन्तु भारत में राष्ट्रवाद की संकल्पना कतई आर्थिक अथवा राजनैतिक नहीं है। भारत में यह मूलतः आध्यात्मिक व व्यवहार में सांस्कृतिक विचार है। आर्थिक व राजनैति राष्ट्रवाद जहाँ भौगोलिक सीमाओं और बाजारी प्रतिस्पर्धाओं के कारण विभाजनकारी बन जाता है वहीं दूसरी ओर आध्यात्मिक, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद व्यक्ति से परिवार, समाज से आगे राष्ट्र तक मन के विस्तार का माध्यम होने के कारण एकात्मदृष्टि का विकास करता है। स्वाभाविक ही यह राष्ट्रवाद विस्तार की अगली सीढ़ी के रुप में मानवता को देखता हैं। अतः इस राष्ट्रवाद में राष्ट्रहित के साथ ही विश्वहित व उससे भी परे सृष्टि का हित भी निहित है। यह राष्ट्रवाद तोडता नही जोड़ता है।

जाति, पंथ, सम्प्रदाय, वर्ग, भाषा, क्षेत्र आदि के द्वारा विभिन्न वादों का निर्माण कर चल रहे समाज विघटन के तांडव को यदि रोकना है तो सभी को मिलकर एक ही उद्घोष करना होगा कि ‘राष्ट्र सर्वोपरि है’। मेरे व्यक्तिगत, पारिवारिक, क्षे़त्रीय, सामाजिक, पांथिक, साम्प्रदायिक अथवा प्रांतीय हितों से अधिक महत्वपूर्ण राष्ट्रहित हैं। इस विचार को अपने हर कार्य मे अभिव्यक्त करना होगा। चुनाव में आग्रह पूर्वक सहभागी होना, मतदाताओं का पंजीयन करना अधिक से अधिक लोगों को सकारात्मक मतदान के लिए प्रेरित करना, दलों व नेताओं को राष्ट्रहित के मुद्दों पर विचार एवं बात करने के लिए विवश करना यह हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य है। आइए! लोकतंत्र के महोत्सव में राष्ट्रवाद के उजास को प्रकाशित करने का संकल्प लें।

नवम्बर 29, 2013 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , | 1 टिप्पणी

दिग्विजय से पाएं विश्वविजय की प्रेरणा


sVworldजब समूचा राष्ट्र ही अपनी निहित शक्तियों के प्रति अनभिज्ञ होने के कारण आत्मग्लानि से ग्रस्त हो जाता है तब कोई अद्वितीय विजय ही उसे मानसिक लकवे से बाहर ला सकती है।

‘मन के हारे हार है मन के जीते जीत’, ये कहावत जितनी व्यक्ति पर लागू होती है उतनी ही समाज पर भी लागू होती है। विजय की आकांक्षा व विजय की अनुभूति समाजमन का शक्तिवर्धन करते हैं। जब समूचा राष्ट्र ही अपनी निहित शक्तियों के प्रति अनभिज्ञ होने के कारण आत्मग्लानि से ग्रस्त हो जाता है तब कोई अद्वितीय विजय ही उसे मानसिक लकवे से बाहर ला सकती है। आत्म-विस्मृति की मानसिकता पराभव की मानसिकता होती है, अकर्मण्यता की मानसिकता होती है। ऐसे में स्वप्न भी संकुचित हो जाते हैं। असाधारण पराक्रम तो छोड़िये सामान्य जीवनयापन की क्रियाओं के प्रति भी आत्मविश्वास शिथिल हो जाता है। ऐसे में समाज में परावलंबिता तथा बुद्धिजीवियों में परांगमुखता (उदासीनता) आ जाती है। व्यापार व्यवहार में दूसरों पर निर्भरता ही एकमात्र उपाय दिखाई पड़ता है। सोच विचार में भी हर बात के लिए दूसरों का मुख ताकने की प्रवृत्ति होती है। अपना सब कुछ क्षुद्र, त्याज्य लगने लगता है और पराई परम्पराएं, विचार व संस्कार केवल अनुकरणीय ही नहीं सम्माननीय भी बन जाते हैं।26

19वीं शताब्दी के अंत में भारत की यही स्थिति थी कहीं से कोई आशा नहीं दिखाई देती थी। पराधीनता तो थी ही, स्वाधीनता के लिए प्रयत्न करने का आत्मविश्वास भी नष्टप्राय सा हो गया था। उधार के विचार तथा शिक्षाओं पर अपना सार्वजनिक जीवन रचने की होड़ सी लगी हुई थी।  अंग्रेजों के अंधानुकरण का यह चरम काल था। विदेशी शिक्षा में शिक्षित उच्चभू वर्ग अंग्रेज-भक्ति में ही अपनी धन्यता समझने लगा था। यहां तक कि स्वाधीनता के लिए राजनीतिक संगठन की निर्मिती के लिए भी हम विदेशियों पर निर्भर हो गए थे। एल.ओ. ह्यूम द्वारा स्थापित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस हर शिक्षित भारतीय के लिए देशभक्ति का साधन बन गई थी। सामाजिक सांस्कृतिक और धार्मिक सुधारों हेतु भी आयातित विचारों पर उपजे संगठनों यथा थियोसॉफिकल सोसायटी, ब्रह्म समाज, प्रार्थना समाज आदि का ही बोलबाला था। स्वयं के पूर्वजों, परंपराओं यहां तक कि आराध्यों को भी प्रताड़ित करना, मनोरंजन एवं प्रतिष्ठा का साधन बन गया था।

sv chicago stageइस बौद्धिक, मानसिक व आर्थिक दासता की पृष्ठभूमि में 11 सितम्बर, 1893 को शिकागो के सर्वपंथ सभा में हुए दिग्विजयी चमत्कार को समझा जाना चाहिए। सनातन हिन्दू धर्म का गर्वोन्नत प्रतिनिधित्व करते हुए योद्धा युवा संन्यासी स्वामी विवेकानन्द ने प्राचीन ऋषियों के दिव्य सम्बोधन से जब समूचे विश्व को सम्बोधित किया, तब केवल सभागार में बैठे 7000 श्रोता ही नहीं अपितु पूरा अमेरिका बंधुत्वभाव से अनुप्राणित हो गया। उपस्थितों को लगभग आध्यात्मिक सी अनुभूतियां होने लगीं। किसी ने कहा कि – “अमेरिका निवासी मेरे प्यारे भगिनी और बंधुवर”, इन पांच शब्दों को सुनकर हमारे शरीर में विद्युत तरंग सी दौड़ने लगी थी। किसी ने अपनी दैनंदिनी में लिखा कि मुझे मेरा खोया भाई मिल गया। जैसे सामान्यत: प्रचारित किया गया है कि श्रोताओं ने ‘बहनों और भाइयों’ के संबोधन को पहले सुना नहीं था, इस कारण कई मिनिटों तक तालियां बजती रहीं। इसके विपरीत तथ्य यह है कि बंधुत्व के संबोधन का प्रयोग करनेवाले स्वामी विवेकानन्द उस दिन की सभा के पहले वक्ता नहीं थे। उनसे पूर्व महाबोधि सोसायटी के प्रतिनिधि श्रीलंका से पधारे धम्मपाल अंगिकारा, भारत से ही थियोसॉफिकल सोसायटी का प्रतिनिधित्व कर रहे प्रतापचंद्र मजुमदार तथा जापान के एक बौद्ध भिक्खु ने लगभग ऐसे ही संबोधन से सभा को संबोधित किया था। उसी समय लगभग ½ घंटे के उपरांत चौथी बार यह संबोधन सुनने के बाद श्रोताओं ने ऐसी अनूठी प्रतिक्रिया दी। इसके पीछे का कारण केवल नावीन्य नहीं था, अपितु वैदिक ऋषियों की परंपरा से उत्पन्न भारतीय संस्कृति के एकात्म जीवन दर्शन की प्रत्यक्षानुभूति थी। इसलिए यह केवल एक व्यक्ति का जागतिक मंच पर प्रतिष्ठित होना नहीं था, अपितु चिरपुरातन नित्यनूतन हिन्दू जीवन पद्धति का विश्वविजय था।

वर्तमान संचार व्यवस्था के समान अतिजलद संवाद के साधन उपलब्ध न होते हुए भी यह समाचार किसी वडवानल की भांति प्रथम अमेरिका तत्पश्चात यूरोप व अंतत: भारत में प्रसारित हुआ। इस अद्भुत घटना के मात्र 1 वर्ष के अंदर ही देश का सामान्य किसान भी इसके बारे में चर्चा करने लगा था। इस दिग्विजय की घटना ने भारत के मानस को झकझोर दिया और यह सुप्त देश जागृत हुआ। हम भी कुछ कर सकते हैं, हमारे अपने धर्म, संस्कृति, परंपरा में विश्वविजय की क्षमता है इसका भान आत्मग्लानि से ग्रसित राष्ट्रदेवता को अपनी घोर निद्रा से बाहर लाने के लिए पर्याप्त था। अत: शिकागो की परिषद में हुए आध्यात्मिक दिग्विजय को हम भारत के सर्वतोमुखी विश्वविजय का शुभारंभ कह सकते हैं। इतिहास इस घटना के गाम्भीर्य को भले ही अभी पूर्णता से न समझा पाया हो और संभवत: आनेवाले निकट भविष्य में भारत के विजय के पश्चात इस जान सके, किंतु स्वामी विवेकानन्द स्वयं अपने पराक्रम को पहचानते थे। अत: 2 जनवरी, 1897 को रामनाड में बोलते हुए उन्होंने अपने अभूतपूर्व स्वागत के प्रत्युत्तर का प्रारंभ इन शब्दों से किया, – “सुदीर्घ रजनी अब प्राय: समाप्त सी जान पड़ती है; यह काली घनी लम्बी रात अब टल गयी;  पूर्वांचल नभ में उष:काल की लाली ने समूचे विश्व के समुख यह उद्घोष कर दिया है कि यह सोया भारत अब जाग उठा है।”

1897 में अंग्रेजों की पराधीनता से ग्रस्त भारत के प्रति स्वामी विवेकानन्द का अदभुत आत्मविश्वास तो देखिए कि वे आगे कहते हैं, – ‘केवल अंधे देख नहीं सकते और विक्षिप्त बुद्धि समझ नहीं सकते कि यह सोया हुआ अतिकाय अब जाग उठा है। अब यह नहीं सोयेगा। विश्व की कोई शक्ति इसे तबतक परास्त नहीं कर सकती जबतक यह अपने दायित्व को न भूला दे।’ स्वामी विवेकानन्द ने मृतप्राय: हिन्दू समाज के सम्मुख विश्व विजय का उदात्त लक्ष्य रखा।

एक स्थान पर बोलते हुए उन्होंने स्पष्टता से कहा है,- कोई अन्य नहीं व इससे तनिक भी कम नहीं, केवल विश्वविजय ही मेरा लक्ष्य है। जब हम स्वामी विवेकानन्दजी की 150वीं जयंती को पूरे विश्व में तथा भारत के गांव-गांव में मना रहे हैं, तब हमें भारत के इस आध्यात्मिक विश्वविजय के जीवनलक्ष्य का पुन:स्मरण करना अत्यावश्यक है। स्वतंत्रता के पश्चात हमारी शिथिलता ने हमारी नयी पीढ़ी को राष्ट्रध्येय के प्रति विस्मृत कर दिया है। भारत के स्वातंत्र्य का अर्थ ही वर्तमान पीढ़ी भूल गई है। इस कारण जब थोड़े से देशाभिमान से आज का युवा प्रेरित भी हो जाएं तो वह भारत को विश्व का सबसे अमीर देश बनाने का स्वप्न देखता है। वैश्विक महाशक्ति का स्वप्न वर्तमान पीढ़ी आर्थिक महास्वप्न के रूप में ही देखती है। यह भारत के स्वभावानुरूप नहीं है और इसलिए स्वामी विवेकानन्द को अभिप्रेत विश्वविजय भी नहीं है।

स्वामी विवेकानन्द ने स्पष्ट कहा है, भारत विश्वविजय करेगा यह निश्चित है, किन्तु यह विजय राजनीतिक, सामाजिक अथवा आर्थिक बल से नहीं होगी अपितु आत्मा की शक्ति से ही होगी। स्वामीजी ने सिंहगर्जना की थी, “उठो भारत! अपनी आध्यात्मिक शक्ति से सम्पूर्ण विश्व पर विजय प्राप्त करो।”

आर्थिक सम्पन्नता, कूटनीतिक सम्प्रभुता इस आध्यात्मिक जगदगुरु पद के प्रतिबिम्ब मात्र होंगे। अत: प्रयत्न राष्ट्र की संस्कृति के आध्यात्मिक जागरण के लिए होने चाहिए। आर्थिक व राजनीतिक समृद्धि तो इस सांस्कृतिक पुनर्जागरण के सहज सहउत्पाद होंगे। स्वामी विवेकानन्द की सार्ध शती पर हमारी सम्यक श्रद्धांजलि यह होगी कि हम चिरविजय की अक्षय आकांक्षा को राष्ट्रजीवन में पुन: जागृत कर दें। भारत का स्वधर्म ज्ञान प्रवण अध्यात्म है, और इसका व्यावहारिक आचरण जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में धर्म संस्थापना है। अत: 17वीं शताब्दी के प्रारंभ तक विश्व की सकल सम्पदा के 66 प्रतिशत हिस्से का उत्पादन करनेवाला समृद्ध राष्ट्र विश्व व्यापार का आकांक्षी नहीं रहा। हर्षवर्धन, चंद्रगुप्त, समुद्रगुप्त, विक्रमादित्य आदि की बलाढ्य पराक्रमी सेनाओं ने राजनीतिक विजय के लिए कभी राष्ट्र की सीमाओं का उल्लंघन नहीं किया। भारत न तो अपने सामरिक सामर्थ्य से जगत को पादाक्रांत करने की अभिलाषा रखता है, न ही अपनी आर्थिक सम्पत्ति से अन्य राष्ट्रों को बाजार बनाकर उनका शोषण करना चाहता है। भारत की तो सहस्त्राब्दियों से एक ही आकांक्षा रही है कि विश्व की मानवता को ऋषियों की वैज्ञानिक जीवनपद्धति की सीख दे। भारत की महानतम उपलब्धि जगतगुरु बनने में है।

हमारा स्वप्न है कि पुन: आत्मसाक्षात्कारी ज्ञानियों से विश्व के समस्त देशों को प्लावित कर दिया जाए और सभी सभ्यताओं के प्रतिनिधि इस भूमि की दिव्य आध्यात्मिक अनुभूति का स्वाद चखने के लिए पुन: यहां के विश्वविद्यालयों में प्रवेश प्राप्त करें। यह ज्ञानभूमि सच्चे अर्थ में सहिष्णुता, सर्वसमावेशक एकात्म जीवन दृष्टि का ज्ञान सारे विश्व की मानवता को पुन: देने लगे, यही हमारा चरम लक्ष्य है।

स्वामी विवेकानन्द ने यही दृश्य अपनी आँखों से जीवन्त स्पष्ट देखा था और उन्होंने आह्वान किया था हम अपने जीवन पुष्प अर्पित कर अपनी मातृभूमि को अपने विश्वमान्य गुरुपद पर आसीन करें। आइए, उनकी 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में संकल्प करें कि अपने जीते जी इस दृष्टि को जीवन्त करने का प्राणपण से पराक्रम करेंगे।

सितम्बर 11, 2013 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , , , , , | टिप्पणी करे

अस्मिता भारतीय की, परिचय भारत का . . .


कल वर्षप्रतिपदा है। पूरे देश में उल्हास व धार्मिक पवित्रता के साथ नववर्ष के उत्सव मनाये जायेंगे। विदेशी पंचांग के आदी तथाकथित आधुनिक लोग शायद इसको जानते भी नहीं होंगे। निश्चित ही माध्यमों द्वारा 1 जनवरी के समान हंगामा तो होगा ही नहीं। यदि कोई केवल प्रसार माध्यमों पर ही निर्भर करता हो तो सम्भवतः इस नववर्ष से अनभिज्ञ ही रहेगा। इन परिस्थितियों को देखकर मन में प्रश्न आता है- क्या यही भारत है?

पुदुचेरी के एक युवा लेखक ने अमेरिकी समाचारपत्र न्यूयार्क टाइम्स में लेख लिखा है कि ‘‘भारत अब अमेरिका बन गया है’’।

http://www.nytimes.com/2012/03/11/opinion/sunday/how-india-became-america.html?_r=4&hp

बड़े बड़े माल के चित्र दिखाकर भारत में फैल रहे पाश्चात्य प्रभाव का उदात्तीकरण ही इस लेख में किया है। इसी को विकास के पर्याय के रूप में चित्रित किया गया है। पूरे लेख में ऐसा चित्रण दिया गया है मानो भारत में पूरे संस्कार ही अमेरिका जैसे हो गये है। इस सब में लेखक का भाव उत्सव का है। मानों अमेरिका बन जाना भारत की कोई बहुत बड़ी उपलब्धी है। दो प्रश्न इस युवा पत्रकार को अपने आप से पूछने चाहिये। एक क्या वाकई बहुतांश भारत में यह पाश्चात्यीकरण हुआ है? और दूसरा कि क्या बाहरी परिवर्तन से भारत का मूल स्वभाव, भारत की आत्मा ही बदल जायेगी? हमारी शिक्षा ने हमें अपने आप से ही अनभिज्ञ कर दिया है। आज हमारे शिक्षित युवा नहीं जानते कि भारत क्या है। केवल किसी एक युवा पत्रकार की बात नहीं है अपने इतिहास, संस्कार व संस्कृति से परिचय ना होने के कारण अनेक तथाकथित उच्च शिक्षित युवा विकसित सम्पन्न भारत को अमेरिका की प्रतिकृति के रूप में ही देखना चाहते है।

इसमें वाकई इन युवाओं का दोष नहीं है। हमारे प्रबुद्ध वर्ग का यह दायित्व है। पर प्रबुद्ध वर्ग स्वयं ही भ्रमित दिखाई देता है। सर्वोच्च न्यायालय के एक भूतपूर्व न्यायाधीश जो वर्तमान में प्रसार माध्यमों की संस्था के अध्यक्ष है, ने अमेरिका में दिये अपने व्याख्यान में भारत को एक सराय के रूप में परिभाषित किया। उन्होंने भारत को दूसरे देश से आये प्रवासियों का देश बताया। उनके अनुसार सहस्रों वर्षों से अनेक अलग अलग मूल के लोग यहाँ आते गये और बसते गये। अर्थात वर्तमान में जो हम सब यहाँ के निवासी है उनका इस भूमि से कोई नाता ही नहीं है। हमने भी अपने विद्यालय में इतिहास की पुस्तकों में ऐसी ही बातें पढ़ी है। किन्तु गत 2 से भी अधिक दशकों से मिली पुरातात्विक जानकारी ने इस कहानी को झूठा साबित कर दिया है। आर्यों के भारत बाहर से आने के सिद्धांत का विश्वभर के विद्वान पुरातत्व वेत्ताओं तथा इतिहासकारों ने खण्डन किया है। 1300 से भी अधिक स्थानों पर हुई खुदाई ने हड़प्पा व माहन जो दारों से भी 2000 वर्ष पूर्व से आज तक एक सलग, अखण्ड सरस्वति-सिंधु सभ्यता के होने के प्रमाण प्रचूर मात्रा मे प्रस्तुत किये है। भले ही विद्यालय व महाविद्यालयों की पुस्तकों में इन तथ्यों को आने में और देरी हो सकती है किन्तु विद्वान पूर्वन्यायाधीश को तो यह ज्ञात ही होगा। अतः उनके द्वारा विदेश में भारत की राष्ट्रीय अस्मिता के बारे में इस प्रकार का विपर्याय देख मन में प्रश्न उठता है कि यह भ्रमप्रणीत प्रामाणिक अभिमत है अथवा वाममार्गी विचारकों द्वारा हेतु पुरस्सर किये जा रहे बुद्धिभेद का अंग है?

स्वतन्त्र भारत में हम अपनी अस्मिता को भूलते जा रहे है। अस्मिता अर्थात पहचान। अपने होने का मूल्य, सार्थकता। बिना अस्मिता के भान के देश का स्वाभिमान जागना सम्भव ही नहीं है। विड़म्बना यह है कि भारत में विदेशी शासन के विकट काल में हमने अपनी अस्मिता को अक्षुण्ण रखा और आज जब राजनैतिक स्वतन्त्रता है तब हम इसे भूलते जा रहे है। भारत की आत्मा धर्म है। किसी विदेशी विश्वविद्यालय में इस बात पर अनुसंधान हो रहा है कि इस्लाम के कठोर आक्रमण के सामने विश्व की बड़ी बड़ी सामथ्र्यवान व समृद्ध सभ्यतायें, जैसे मिस्र, मेसोपोटेमिया, पारस आदि कुछ दशकों में ही ध्वस्त हो गई। वहाँ की पूरी जनसंख्या ईस्लाम में मतांतरित हो गई। आज वहाँ पूरानी सभ्यता के केवल अवशेष ही बचे है। कोई जीवित वंशधर नहीं बचा। 700 वर्षों से अधिक के इस्लामी आक्रमण व 170 साल के मुगल राज्य के बाद भी आज भारत में हिन्दू न केवल जीवित है अपितु फल फूल रहा है और अपने पूर्व वैभव को प्राप्त करने की ओर अग्रेसर है। इसके मूल में क्या कारण है? क्या इस संस्कृति की विशेषता है जो इसे शाश्वत सनातन अमृतत्व प्रदान कर रहा है? यह विदेशों में शोध का विषय है किन्तु भारत में आज इस बात का भान ही नहीं है।

वास्तव में हम भ्रमित हैं अतः विरोधाभास से भी ग्रसित हैं। गीता को सायबेरिया के कोर्ट में चुनौति दी जाती है तो सारा देश एकस्वर में विरोध करता है। देश के विदेशमन्त्री रशिया के राजदूत को बुलाकर अपनी नाराजगी व्यक्त करते है। किन्तु इसी के 6 माह पूर्व जब मध्य प्रदेश सरकार विद्यालयों में गीता का पाठ पढ़ाने का निर्णय करती है तो इन्हीं के दल के लोग जबलपुर उच्च न्यायालय में इसका विरोध करते है। नार्वे में हाथ से भोजन करने जैसी भारतीय परम्पराओं को स्वास्थ्य के विपरित बताकर बच्चों को मातापिता से दूर करने का घोर विरोध करते समय मिड़िया कहता रहा कि आप हमारी परम्पराओं को अपनी दृष्टि से कैसे देख सकते है? वही मिड़िया पाद्यपूजा की अतिप्राचीन परम्परा की आलोचना करते समय भूल जाता है कि ये सारी आलोचना पश्चिमी दृष्टि के कारण है। शिक्षित भारत की यह विडम्बना आज के सभी समस्याओं की जड़ है।

वर्तमान में भ्रमित भारत पुनः अपनी अस्मिता को खोज रहा है तब वर्षप्रतिपदा का अवसर भारतीय अस्मिता के जागरण का अवसर है। पूरे देश के अधिकांश भागों में यह नववर्ष का दिन है। हमारी मान्यता के अनुसार आजही के दिन ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना की। यह एक संकल्प लेने का अवसर है। नवीकरण, सृजन के संकल्प का अवसर। इसी दिन भारत की अस्मिता को मूल वेदों की रक्षा द्वारा पुनर्जागृत करने के लिये महर्षि दयानन्द सरस्वति ने आर्य समाज की स्थापना की। हिन्दू समाज को संगठित कर भारत की राष्ट्रीयता का अलख जगाने के लिये राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना करनेवाले युगपुरूष डॉ केशव बळीरामपंत हेडगेवार का भी यह जन्मदिन है। कुल मिलाकर भारत की भारतीयता को जगाने का दिन है। इस वर्ष का संयोग ऐसा है कि इसी दिन हुतात्मा दिवस है। भारत की स्वतन्त्रता के लिये अपने यौवन को आहुत करनेवाले हुतात्मा भगतसिंह, सुखदेव व राजगुरू का बलिदान दिवस 23 मार्च सभी युवाओं के लिये अपने देश के लिये संकल्प लेने का दिन है। किस स्वप्न को संजोंये हँसते हँसते बलिदान हुए थे ये वीर? यह प्रश्न हर मन में गुंजाने का यह दिन है। भारत से भारत का परिचय करा हर भारतीय की अस्मिता को जगाने का संकल्प ही विश्व मानवता का त्राण कर सकता है।

मार्च 22, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , | 3 टिप्पणियाँ

Fractured Democracy : Demands Surgery


People’s power was amply exhibited in different protests in the year 2011. In a democratic setup public opinion is very important factor in policy making. Hence there is always a concerted effort on the part of the establishment to mange the public perception. With the explosion of media of mass communication this task has become more and more specialized. Print media has its own influence in the class of people in the polpulation but the spread of electronic channels and then the sudden explosion of social media has given the masses multiple avenues to express there opinion. The first two are influenced by the government by spending enormous amounts on advertisements. But the internet being an open forum without much financial involvement it is very difficult for the governments all over the world to effectively control this.

Professional perception managers are employed to meet this unprecedented challenge. The art and science has been developing gin the developed countries for more than decade now but we are experimenting with this in last couple of years. This government is learnt to have used most expensive professionals available in the field. It was reported in some news papers that these agencies have been advising the prince of the ruling party on matters like how to dress? How to speak? How to pick up a child at appropriate moment to be photographed etc. Same report claimed that the couple of day’s growth seen on the face is also a planned move suggested by PMs –Perception managers. On a more serious stage an example of effective perception management was the Mumbai fast of Anna. It was reversal of perceptions that worked against India Against Corruption. Earlier IAC had successfully created a perception (without any professional help) that Janalokpal is the key to all the problems related to Governance. The central government very cleverly managed to put forth that they have come up with Lokpal. May not be copycat of JLP but nevertheless a Lokpal is here. This created an overwhelming impression in the public mind that Mumbai fast is just an ego boosting exercise. Hence we did not see the response as before. It was naive on the part of team Anna to think that they are in an honest fight. They proved to be politically immature to match the choreography of the political managers of the government. Basically Bharatiya Public wants to believe in the Rule of law. They tend to follow the government even if little less than perfect. Agitation is only an extreme measure. The UPA had failed to give this room for an alternative earlier in April and August. After the 4th June crack down on the peaceful gathering of fasting protestors including women and children in the Ramlila grounds created an out rage. Public felt cornered hence the agitations got mass support. This time around the government was successful in creating a perception that the effort is on and there are parties like TMC apart from the opposition who are grinding the Govt for strong Lokpal, hence no need for extracurricular measures. This is most typical how Bharat works.

There is another extreme in the discourse. They claim that the system and not the governing group are responsible for the mess. The Democratic set-up adopted by Bharat is the root cause of all the problems. Even the team Anna members criticized the practice MPs following the party line. They demanded removing the provision of whip so that individuals can vote in the parliament according to their own thinking. This is height of duplicity. On one hand we are talking about people’s right to recall and on the other we want the MPs not to follow party discipline. The legal provisions of whip were strengthened by anti defection law after the repeated horse-trading episodes in the 1980s. An MP is elected on the party symbol. It is not his individual win. The party policy is projected to the public in the election; they are supposed to have voted accordingly. To claim that the individual will be in a better position to take moral position than within the party mandate may open flood gates for more dangerous corruption in the houses of Parliament. In fact the present irony of coalitions is also a great drama of our flawed democracy. The parties which fought against each other in the election come together and form the government. On one hand at the central level support of parties is bought by CBI threats or relaxations, on the other hand the same parties are target of vicious campaign at the State level.

But can we blame Democracy for all this? Contention that Democracy is the root cause of all the evil does not hold good in an objective analysis. Any other alternative will be inherently more prone to dishonesty and exploitation. Democracy as such at least notionally has the potential of generating people’s power as witnessed in the “Samagra Kranti” led by Jaiprakash Narain in 1977 and again during the Ayodhya agitation in 1992. The same was done apolitically last year. We can definitely infer that present form of democracy has created systemic faults that are responsible for the failure of governance mechanism in the country today. But to say that per say Democracy need to be negated does not go with the times. We will have to win the game by following the rules of the game. Reforms are no doubt needed in our democratic system. But we will have to demand reforms in accordance with the evolved system and not totally out of box.

Theoretically speaking, there are two forms of practicing Democracy. A > Direct Democracy – This is said to be practiced in the city states of Athens or some of the Ganas in the northern Bharat at the time of Alexander’s attack. The citizens directly participate in the governance process in legislature and they elect the executive, even the Judiciary in some cases.

B> Representative Democracy- The Westminster model that we have adopted as a legacy of British Raj. In this the representatives are elected by the citizens and they in turn ‘choose’ the Executive. Mostly the Judiciary is not elected but selected.

Both the models have their pros and cons. US has hybridized the two systems. It has direct elections for the executive heads in the states as well as at the Federal level. At the same time there is a representative houses for legislation primarily but it also serves as a regulatory authority on the Executive.  It seems the Judiciary is also elected in most of the States in US.

We, in Bharat seem to have made a total mess of the democratic principles. The most important of which is the Rule of the majority. Whether in the direct or representative democracy it is the majority that should decide the policy. The elections should ensure that the winning representative of the citizens should have the backing of at least one more than 50% of the polled votes. Here, in Bharat the Decorative head, President, is elected by indirect elections. The more damaging constitutional provision is that the executive Head, Prime-minister, as well need not even be elected directly. Present PM is Rajyasabha member, where the election does not involve citizen’s vote directly. But to continue as the Prime-minister he must always have backing of Majority Members of Loksabha. There 1+50% is mandatory. But the MPs are elected by a process where they do not need to have majority vote in their respective constituency. So, we have MPs who won the elections by securing only 7% of the polled votes. There are hardly a few members who can claim to have got more than 50% of the polled votes in their own Loksabha seat.

This is systemic failure of the democracy. We do not have democracy in practice here even in the constitutional provisions, it is only notional. Hence the rise of elite ruling class and also the evolution of increasingly divisive politics based on all the possible fault lines of caste, region, language or religion. The only thing the politician has to make sure to win an election is to divide others into enough groups to make his group largest. This is inherent in the system.

We can not hope to have any reforms unless we change this basic flaw in the democratic set-up. Two basic demands need to be put forward.

1)      Direct election of the head of the executive, Prime minister in present scenario. This will need constitutional amendment hence very difficult in the era of coalition politics in which even small regional parties have disproportionate importance and value. But we must start a discourse to create a demand for this. The other alternative is Presidential form of government with direct election of the President being the first step.

2)      Demand for making 1+50% as the winning criterion in all the elections from Panchayat to Rashtrapati. This is relatively easier. It can be done by amending the Peoples Representative act. This can be done by simple majority. The major two political parties are expected to benefit most by this reform so it can be done with consensus. It is morally and logically very sound argument and no one ca deny that those who are denied support by the majority of the voters in their constituency have no right to represent people.

These are not the magic wand reforms which will cure all the evils of our system. Ultimately we need to go beyond the historical experience of just a couple of centuries. The present day system has evolved out of the British raj and has its Historic roots in the colonial period. But for the final cure we will have to go to root cause and for that we will have to still deeper in the Historical experience of the nation. We have known history of more than 5000 years with a golden era every second century. We led the world in economic prosperity, Education, Science and Technology and most importantly a peaceful socio-political system. We had variety of political experiments. We can not bring back the diverse political systems which existed in different parts of Bharat. Hindus have always believed in diversity of expression of the same principle. We followed it in political systems also. The Chakravartis respected the existing system of the conquered state and allowed it to continue. We had so many variations of political systems Gana-rajya with total direct democracy on one end of the spectrum to different forms of complex structures like the Magadha Empire. There were systems where only women ruled. But the basic principle of rule was Dharma. That was the common thread.

What we lack today is the Dharmik System. Today we have to accept the system that has evolved and apply the Dharmik principles to it. That is the Hindu way of digesting the alien. We need a fresh Smriti to interpret Sanatana Dharma according to present day society and to codify Yugadharma. This is our indigenous idea of constitution. We need a Smriti instead of this cut & paste document, that we call Constitution of India.

The parliament house has drawn inspiration for its architecture from the Chausath Yogini Temple in Mitawali, Madhya Pradesh in the same way our democratic structure needs to be based on the sound foundations of the principles of the Dharma of the land. The fractured Democracy demands a complete surgery not just cosmetic make-over.

जनवरी 7, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी, English Posts | , , , , , , , , , , , , , , , | 4 टिप्पणियाँ

स्वामी विवेकानन्द का राष्ट्र-ध्यान 25 से 27 दिसम्बर 1892


25 दिसम्बर 1892, स्वामी विवेकानन्द ने श्रीपाद शिला पर अपना ध्यान प्रारम्भ किया। मान्यता है कि उसी शिलापर देवी कन्याकुमारी ने स्वयं तपस्या की थी। तप तो हर जन्म की भाँति ही शिवजी को प्राप्त करने के लिये था। किन्तु इस अवतार में देवी का जीवनध्येय कुछ और था। बाणासुर के वध के लिये देवी का कुवांरी रहना आवश्यक था। नारदजी ने शिवजी के विवाह में विघ्न ड़ाला और शिवजी 8 मिल दूर सुचिन्द्रम् में रुक गये। माँ पार्वती को अपने जीवन का लक्ष्य प्राप्त हुआ। शिला पर माँ का पदचिह्न है। एक ही पाँव का है क्योकि कहते है माँ ने वृक्षासन में 7 साल तक तप किया था। इस पदचिह्न के कारण शिला को ‘श्रीपाद शिला’ के नाम से जाना जाता है।
युवा स्वामी, केवल 29 वर्ष की आयु थी इस समय स्वामीजी की, 6 वर्षोंसे भारत का भ्रमण कर रहा है। कुछ खोज रहा है। अपने गुरु के सान्निध्य में योग की सर्वोच्च अनुभूति, निर्विकल्प समाधि को प्राप्त कर चुका है। उन्ही की कृपा से काली माता के साक्षात साकार दर्शन भी कर लिये। कण कण में ईश्वर के अस्तीत्व व जन जन में उपस्थित दिव्यत्व को भी पूर्णता से अनुभ्सव कर लिया। फिर भी कुछ अधुरा, धुंधलासा लगता रहा। अपने जीवन के व्रत को ठीक से स्पष्ट नहीं देख पा रहे थे। उसी खोज में सारे देश का भ्रमण किया और कन्याकुमारी पहुँचे।
माता कन्याकुमारी के दर्शन किये और बाहर आकर समुद्र के मध्य ‘श्रीपाद शिला’ ने आकर्षित किया। सोचा कि इस शिला पर मन को शांति भी मिलेगी और जहाँ माँ कन्याकुमारी को जीवन का लक्ष्य मिला वहाँ अपनी भी कार्ययोजना स्पष्ट हो जायेगी। जब मछुआरों से शिला तक ले जाने के लिये कहा तो उन्होंने 3 पैसे मांगे। सच्चे परिव्राजक सन्यासी के पास तीन तो क्या एक भी पैसा नहीं था। पर साहस की कोई कमी नहीं थी। छलांग लगाई और तैरकर 600 गज की दूरी को पार कर लिया। कुछ युवाओं ने इस साहसी छलांग को देखा। वे अपनी नौका से स्वामीजी के पास पहुँचे। स्वामीजी ने उन्हें अपना ध्यान का संकल्प बताया और लौटा दिया। युवाओं ने कुछ केले और दूध वहाँ रखे। जो तिन दिन बाद भी वैसे ही रखे रहे| वे रोज स्वामीजी को देखने जाते थे। तीन दिन और तीन रात स्वामीजी वैसे ही ध्यानमग्न बैठे थे। चौथी सुबह इन युवाओं के साथ कट्टमारन, नारीयल के पेड के तने से बनी नौका, पर बैठकर किनारे वापिस आये। ध्यान के बारे में स्वामीजी ने अधिक विस्तार से तो कुछ नहीं कहा किन्तु इतना बताया कि ‘जो खोजने आया था वो पा गया।’
बादमें अपने गुरुभाई शशी महाराज, स्वामी रामकृष्णानन्द को लिखे पत्र में स्वामीजी ने बताया कि इस ध्यान में उन्हें अपने जीवन की योजना प्राप्त हुई। एक और स्थान पर इस ध्यान का उल्लेख करते हुए स्वामीजी ने कहा है कि भारत का गौरवशाली अतीत, भयावह वर्तमान व पूर्व से भी अधिक स्वर्णीम भविष्य किसी चलचित्र के भाँति मेरी आँखों के सम्मूख प्रवाहित हुआ। स्वामीजी की बोधिस्थली पर आज भव्य विवेकानन्द शिलास्मारक खड़ा है। स्मारक के प्रणेता एकनाथ रानडे ने केवल प्रस्तर स्मारक ही नहीं बनाया स्वामीजी की कार्ययोजना को कार्यरुप देने वैचारिक आंदोलन विवेकानन्द केन्द्र की भी स्थापना की। केन्द्र के कन्याकुमारी स्थित मुख्यालय विवेकानन्दपुरम् में स्वामीजी के ध्यान के समय उनके विचारों पर आधरित प्रदर्शनी ‘विवेकानन्द चित्र प्रदर्शनी – उत्तिष्ठत! जाग्रत!!’ लगाई गई है। इसमें माननीय एकनाथजी ने स्वामीजी द्वारा देखे भारत के इतिहास वर्तमान व भविष्य को चित्रों में प्रगट करवाया है। वे इसे स्वामीजी का बौद्धिक स्मारक कहा करते थे। प्रत्येक भारतीय को एक बार अवश्य कन्याकुमारी जाना चाहिये। क्या पता जहाँ माँ कन्याकुमारी व स्वामीजी को अपने जीवन का ध्येय मिला हमें भी मिल जाये। कई लोगों को मिलता है। लेखक का भी ऐसा ही कुछ स्वानुभव है।
स्वामीजी के ध्यान की स्मृति में 25 से 27 दिसम्बर को हम  ‘राष्ट्र चिन्तन पर्व’ कह सकते है। यह  इससे बड़े 12 जनवरी तक चलनेवाले ‘समर्थ भारत पर्व’ का शुभारम्भ है। आइये इस चिंतन पर्व में हम भी स्वामीजी के मानस को समझने का प्रयत्न करें। भारत के गौरवशाली अतीत, वर्तमान अवस्था के कारण तथा इसे पुनः परमवैभव पर आसीन करने की कार्ययोजना को समझने का अपनी ओर से यत्न करें। आज प्रथम चरण को देखते है। कल अगले दोनों चरण देखेंगे।
स्वामीजी ने भारत को करीब से देखा था। उसकी आत्मा के दर्शन आध्यात्मिक स्तर पर तो किये ही थे, साथ ही भ्रमण काल में देश की जनता के संग निकट से उनके जीवन में इस प्राण को ओतप्रोत देखा था। कन्याकुमारी में उन्हे भारत का समग्र दर्शन हुआ। उसके अखण्ड प्राणवान् स्वरुप को उन्होने चिन्मय प्रत्यक्ष देखा। जैसा कि योगी अरविन्द कहते है उन्होंने अपने जीवन व संदेश से भारत की चिति का भारत से परिचय कराया। यह परिचय पूर्ण एकात्मता के साथ उन्हें कन्याकुमारी में हुआ था। इसीलिये उन्होंने कहा था – भारत का प्राण धर्म है। धर्म से ही भारत प्राणवान् है। भारत का पतन-उत्थान धर्म के पालन अथवा अवहेलना पर निर्भर करता है। स्वामीजी का स्पष्ट कथन था की भारत का पतन हिन्दूत्व के कारण नहीं अपितु इसको छोड़ देने के कारण हुआ था। भारत ने जीवन के हर क्षेत्र में धर्म के द्वारा ही सर्वोच्च उँचाई को प्राप्त किया।
भारत के गौरवशाली अतीत की बात करते ही हमारे सम्मूख केवल आध्यात्मिक गौरव की बात आती है। भारत आध्यात्म की तो जननी है ही। स्वामीजी कहा करते थे, जगत की प्रत्येक जीवात्मा को अन्ततः अपनी मुक्ति हेतु इसी पूण्यभूमि में जन्म लेना होगा। यह देवतात्मा भारत जिसमें जन्म लेने के लिये देवता भी लालायित रहते है मानवता की आध्यात्मिक पाठशाला है।
यह ऐतिहासिक तथ्य है कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में भारत ने सर्वोत्कृष्ठ की साधना की थी। चाहे विज्ञान तथा तकनिकी हो भारत ने अद्वितीय खोजें दुनिया को दी है। गणित में भारत का योगदान सर्वमान्य है। आज ही के दिन भारत के चमत्कारी गणिती रामानुजम् की 125 वी जयन्ति है। रामानुजम् आर्यभट्ट, भास्कराचार्य वराहमिहिर व लीलावति की अखण्ड श्रृंखला की ही एक कड़ी है। हमारा दुर्भाग्य है कि स्वतन्त्रता के बाद भी हमें हमारे विस्मृत इतिहास से अवगत नहीं कराया जाता। साम्राज्यवादियों की शिक्षा नीति को पता नहीं किन राजनयिक स्वार्थों के चलते आज भी चलाया जा रहा है। अनेक अनुसंधानकर्ताओं ने व्यक्तिगत परिश्रम से 18 वी शती तक भारत के वैज्ञानिक समृद्धि को खोज निकाला है।
शिक्षा के क्षेत्र में हम विश्व के अग्रणी थे। 19 शताब्दी के प्रारम्भ तक भारत पूर्ण शिक्षित था। सभी जातियों के बालकों को निःशुल्क प्रार्थमिक शिक्षा उपलब्ध थी। भारत की शिक्षा का गौरवशाली अतीत केवल नालन्दा, तक्षशिला व विक्रमशिला के प्राचीन विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं है। इस देश में हजारों नहीं लाखों उच्च शिक्षा संस्थान 1823 तक कार्यरत थे। अंगरेजी कलेक्टरों द्वारा एकत्रित शिक्षा सर्वेक्षण में ये जानकारी जब ब्रिटिश संसद में रखी गई तब सब अचंभित रह गये। तब इस शिक्षा के वटवृक्ष को तहस नहस करने एक वकील को भारत भेजा गया। लोर्ड मेकाले शिक्षाविद् नहीं थे वे तो इस्ट इण्डिया कम्पनी के विधि सलाहकार थे। इस विषय पर पूरी जानकारी गांधी के शिष्य डॉ धरमपाल ने लिखी है। उन्होंने ब्रिटीश अभिलेखों से इस शिक्षा सर्वे के साथ ही भारत में विज्ञान के बारे में भी अनेक आश्चर्यजनक जानकारियाँ प्राप्त की। हिन्दी में उनके समग्र साहित्य को अहमदाबाद की पुनरुत्थान ट्रस्ट ने प्रकाशित किया है। किन्तु उनके द्वारा एकत्रित सामग्री पर पूरा अनुसंधान अभी बाकि ही है। the matter in English is available on http://www.samanvaya.com/dharampal/
इससे यह भी स्पष्ट होता है कि विश्व की सबसे वैज्ञानिक सामाजिक व्यवस्था भारत में स्थापित थी। जातिव्यवस्था के अन्यायकारी होने का आरोप हिन्दू समाज पर लगाया जाता है वह भी ऐतिहासिक रुप से जाँचा जाना चाहिये। जब 1823 तक जिन्हे आज अनुसुचित कहा जाता है, गांधी जिन्हें हरिजन कहते थे और अंगरेजों के सर्वेक्षण में जिन्हें शुद्र के रुप में अंकित किया है उन जातियों के लोग न केवल छात्रों में 27 से 70 प्रतिशत, अपितु शिक्षकों में भी 7 से लेकर 27 प्रतिशत तक का प्रतिनिधित्व बिना किसी आरक्षण के पाते थे। केवल 50 वर्षों में किस प्रकार शिक्षा से वंचित कर समाज के इस बड़े वर्ग को दलित बनाया गया इस पर निष्पक्ष अनुसंधान होना चाहिये। यही इस विषय पर निर्मित खाई को पाटने का एकमात्र तरिका है। केवल सही ज्ञान ही इस वेदना का उपचार कर सकता है।

भारत की भूमि भी 19 वी शताब्दी के प्रारम्भ तक कितनी बड़ी थी यह भी आज हमें नहीं बताया जाता। सांस्कृतिक एकात्मता से बंधे भारत की राष्ट्रीय परिसीमायें वर्तमान के 24 देशों को अपने में समेटे हुए थी। मुस्लिम आक्रांताओं के अत्याचारों से हुए मतांतरण व बाद में अंगरेजों की फूटनीति के अन्तर्गत हुए प्रशासनिक विभाजनों से देश बँटता गया। पर सांस्कृतिक एकत्व की धरा आज भी देखी जा सकती है। घोर कटुता से विभाजित पाकिस्तान में भी कला व परम्पराओं में भारत की प्राचीन संस्कृति आज भी झलकती है। पंथ भिन्न होने के बाद भी अपने गहन आंतरिक संस्कार को भूलाना सम्भव नहीं होता। वह सांस्कृतिक एकत्व ही आज भी राजनयिक बाधाओं को पार कर लोगों को जोड़ सकता है। किन्तु इस्लाम के अपने नेतृत्व को महजब की कट्टरता को ठीक करना होगा। इस्लाम में मजहबी सुधार भारत से ही प्रारम्भ हो सकते है। यह कठीन अवश्य है किन्तु असम्भव नहीं। तब तक अपने पूर्वजों के एक खून को याद करना जुड़ने का माध्यम बन सकता है।
भारता का गौरव आर्थिक क्षेत्र में भी अद्वितीय रहा है। विश्व के माने हुए अर्थशास्त्री एग्नस मेडिसन ने अपने अनुसंधान द्वारा सिद्ध किया है कि 18 शताब्दी तक भारत विश्व के सकल उत्पादन का सबसे बड़ा भागीदार था। विश्व उत्पादन का 33 प्रतिशत भारत में होता था। भारत का व्यापार सारे विश्व से था। इसके बाद भी यहाँ का उत्पादन पर्यावरण के अनुरुप होता था। वर्तमान समय में विश्व जिस संकट से गुजर रहा है, हिन्दू अर्थव्यवस्था पर वैज्ञानिक अनुसंधान ही उस में से मार्ग दिखाने में सक्षम है।

स्वामीजी कहा करते थे प्रत्येक राष्ट्र की नियति है, जिसे पाना ही है, एक संदेश है जो उसे विश्व को देना है और एक विशिष्ठ जीवनव्रत है जो उसे पूर्ण करना है। कन्याकुमारी में स्वामीजी ने भारत की नियति, संदेश व व्रत का साक्षात्कार किया। उन्होंने अपने जीवन भर इस सन्देश को लोगों तक पहुँचाया। आध्यात्म भारत का संदेश, मानवता को जीवन का विज्ञान सिखाना उसका जीवनव्रत तथा जगत्गुरु बनना भारत की नियति है। इसे जीवन में साकार करना हम सब भारतीयों का कर्तव्य है !
वर्तमान में हम अपने आत्मगौरव, प्राणधर्म के साथ ही हमारे राष्ट्रीय ध्येय को भूल गये है। इस पतन के कारण निदान व उपचार के बारे में स्वामीजी के राष्ट्र-चिन्तन को कल देखेंगे।

दिसम्बर 26, 2011 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , | 5 टिप्पणियाँ

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